साहित्य चक्र

16 December 2022

कविताः शिक्षा से ही गरीबी दूर होगी




बाबूजी! कहांँ चलना है?
आ जाइए ! मेरे रिक्शे में बैठिए!
आप घबराइए नहीं मैं आराम से चलूंँगा ,
मुझे कहीं गड्ढा या ब्रेकर मिलेगा
मैं रिक्शा की गति धीरे कर लूँगा।

अम्मा आओ!
पहले बैग हमको थमा कर
आराम से रिक्शे पर बैठ जाओ,
फिर सुरक्षित अपना समान पकड़ो,
अम्मा!
हम भी दो पैसे कमा लें।

इतने में , बाबूजी ने कहा -
बेटा ! तुम पढ़े - लिखे लग रहे हो।

रिक्शावाले ने कहा -
बाबूजी!
मेरा भी है परिवार ,
पढ़ लिख कर मेहनत करता हूँ‌,
देश दुनिया की ख़बर
मैं भी रखता हूंँ ,
जब मिलती नहीं सवारी,
इधर - उधर दौड़ कर , थक हार
एक घूंट पानी पीकर पसीना सुखाता हूंँ,
फिर थोड़ी देर सोचता हूंँ ,क्या करूं?
रिक्शे के बॉक्स में से पेपर निकाल इसी रिक्शे पर
बैठ समाचार पत्र पढ़ता हूंँ।

बाबूजी!
मैं भी आगे पढ़ना चाहता था,
माता - पिता की मज़बूरी
देख ,
बीच राह में पढ़ाई छोड़नी पड़ी ,

अम्मा! बीच में ही पूछ पड़ी कितने बच्चे हैं ?

रिक्शावाले ने अम्मा से कहा -
एकमात्र मेरी बिटिया है
इसी रिक्शे की कमाई से ,
मैं अपनी गुड़िया को बी. एड. करवा रहा हूंँ ,

पास में ही ,चेतना!
संवाद सुन प्रकाश से कही -
शिक्षा से ही गरीबी दूर होगी।


- चेतना प्रकाश 'चितेरी'


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