साहित्य चक्र

28 November 2022

सुंदर-10 गज़लें पढ़िए



पहली गज़ल


ज़िन्दगी में वो मुकद्दर का सिकंदर निकला
उसने पत्थर भी छुआ गर तो वो गौहर निकला

बर्ग-ए-गुल बिखरी हैं राहों में फ़ज़ा महकी है
कौन दिलदार मुहब्बत के सफ़र पर निकला

आज इस दिल में ख़लिश सी कोई महसूस हुई
आज महबूब मेरा घर से सँवर कर निकला

यूँ हर इक गहना मेरे यार पे फबता था मगर
जो बनाता था हसीं प्यार का ज़ेवर निकला

मैंने बस प्यार ही मांगा था वफ़ा के बदले
दे गया हिज्र वो उम्मीद से बढ़कर निकला

मैं जिसे ढूँढती रहती थी पराए दर पर
वो सुकूँ जिसमें समाया था मेरा घर निकला

वो नदी प्यास बुझाकर भी रही मीठी ही
आब पीता रहा जो खारा समंदर निकला

अब रुलाएगा नहीं तर्क-ए-मुहब्बत 'मीरा'
दर्द इस बार मेरे ज़ेहन से डरकर निकला

*****


दूसरी गज़ल

ये मुल्क़ तुम्हारा है ये मुल्क़ हमारा है
ये मुल्क़ रिआया के जीने का सहारा है

इस मुल्क़ की ख़ातिर ही दी जान है वीरों ने
इस मुल्क़ ने जब-जब भी अपनों को पुकारा है

पुरवाई चले जब भी तेरी ही महक आए
तेरा ही तसव्वुर है तेरा ही नज़ारा है

सागर में तेरे बहती दौलत है मुहब्बत की
जो डूब गया इसमें पा लेता कनारा है

हर सिम्त है हरियाली हर सिम्त बहारें हैं
मैं देखूं वतन मेरा खुशियों का पिटारा है

गंगा की यहाँ मौज़ें यमुना की वहाँ लहरें
पर्वत से गिरें झरने क्या खूब नज़ारा है

लगते हैं यहां लंगर हर रोज़ मुहब्बत के
सो जाए कोई भूखा हमको न गवारा है

हम प्यार के मरहम से हर जख़्म सँवारेंगे
इक दर्द हमारा है इक दर्द तुम्हारा है

इस मुल्क़ का हर बच्चा इस मुल्क़ का पहरेदार
दुश्मन तू सँभल जाना हर दिल में शरारा है

मोमिन है तो ग़ालिब भी 'मीरा' है तो तुलसी भी
ये मुल्क़ मेरा यारो हर आँख का तारा है

*****


तीसरी गज़ल

कभी साग़र कभी साक़ी कभी पर छीन लेता है
ये कैसा इश्क़ है जो देके अक्सर छीन लेता है 

वज़ूद उसका रहे है ज़ेहन पर कुछ इस तरह तारी
कि ख़्वाबों में भी आकर मेरा पैकर छीन लेता है

कहाँ से हौसला पाता है वो ये तो ख़ुदा जाने
उतरता है नदी में और समंदर छीन लेता है

अगर मैं आइना देखूँ वहाँ भी अक्स है उसका 
वो मेरी हर वजूद-ए-शय से जौहर छीन लेता है

भरूँ मैं आह कितनी वो नहीं सुनता सदा मेरी
मगर जब ख़ुद पे आता है तो हर डर छीन लेता है

मुकद्दर का सिकंदर ही लगे है तब मुझे मेरा
जबीं से जब वो मेरी दुख के तेवर छीन लेता है

न जाने भेद कैसे जान लेता है मेरे दिल के
छुपाकर लाख रख लूँ ग़म वो दिलबर छीन लेता है

भरा करता है मेरी मांग बस उल्फ़त के गौहर से
वो 'मीरा' का सनम है नकली जेवर छीन लेता है

*****


चौथी गज़ल

वो दिल देता है पहले फिर मेरी मत छीन लेता है
मुहब्बत के बहाने से नदामत छीन लेता है

वो मुझसे दूर होता है तो रंगत छीन लेता है
मगर जब पास आता है सबाहत छीन लेता है

न जाने क्या फ़ुसूँ  है उस फ़ुसूँगर की मुहब्बत में
पिघल जाती हूँ बाहों में तो क़ामत छीन लेता है

नहीं रहती हूँ मैं तन्हा कभी भी आ धमकता है
मेरी तन्हाइयों तक से वो ख़ल्वत छीन लेता है

कभी देखा नहीं उसको मगर रहता है ख़्यालों में
मैं महव-ए-ख़्वाब होती हूँ तो फ़ुर्क़त छीन लेता है

किसी के पास आ जाने से दूरी कम नहीं होती
वो ऐसा कहके तन की सारी दौलत छीन लेता है

वो दौर-ए-आशिक़ी आया कि ख़ुद को भूल ही बैठी
मैं देखूँ आइना भी गर तो सूरत छीन लेता है

रही 'मीरा' न अब 'मीरा' दिवाना कर दिया उसने
नज़र भर देखता है और बसीरत छीन लेता है


*****


पाँचवीं गज़ल

वो मेरे रू-ब-रू जब से हुआ है
लगा जैसे वही दिल का ख़ुदा है

हवाओं में है पहचानी सी खुश्बू
सुना है शह्र में ही दिलरुबा है

जरा दिल तक क़रीब आओ हमारे
तुम्हारी क़ुर्बतों में फ़ासला है

खुमार इसका नहीं उतरेगा अब तो
नहीं सहबा ये उल्फ़त का नशा है

हमें बहका नहीं सकता ज़माना
मुहब्बत ही हमारा फ़ैसला है

कहाँ तक साथ देते ग़म हमारा
खुशी मंज़िल खुशी जब रास्ता है

चुराता ही रहा नज़रें वो मुझसे
मेरे हाथों में जब से आइना है

ये दिल सुनता कहाँ है बात 'मीरा'
सदा ही ज़ेहन से रूठा रहा है


*****


छठीं गज़ल

ऐ दिल तुझे जहान में उर्यां न कर सके
पर राज़-ए-आशिक़ी भी तो पिन्हाँ न कर सके

हम दिल की हसरतों का भी सामाँ न कर सके
इतने ग़रीब थे उसे मेहमाँ न कर सके

बस दिल ही दिल में करते रहे प्यार यार से
मजबूरियाँ वो थीं कि कभी हाँ न कर सके

अरमाँ तो थे कि दूर फ़लक तक उड़ा करें
अफ़सोस रेत को कभी कोहाँ न कर सके

औरों के घर में शम्अ जलाते रहे मगर
इस दिल की ज़ुल्मतों को चरागाँ न कर सके

उस दिल-शिकन से क्या करें शिकवे वफ़ा के हम
जब ख़ुद ही अपना प्यार नुमायाँ न कर सके

तन्हा ही चाँद आया था उस रोज़ बाम पर
हम फिर भी दिल की शम्अ फिरोज़ाँ न कर सके। 

ऐसा नहीं कि इश्क़-ओ-मुहब्बत नहीं हमें 
ये और बात है उसे जानाँ न कर सके

बेशक़ नहीं नसीब में बज़्म-ए-चमन रही
पर आशिक़ी को ख़ार-ए-बयाबाँ न कर सके

फिर याद आ गया वो जुदाई का हादसा
फिर हम नशात-ए-रूह का अरमाँ न कर सके 

शाही-मिजाज़ का है वो 'मीरा' इसीलिए
हम अपने दिल के दर्द को अर्ज़ां न कर सके

*****


सातवीं गज़ल

आया हूँ तेरे दर पे तुझे ख़्वार देख कर 
इकरार कर ले अब तो मेरा प्यार देख कर 

तड़पा था रात-दिन तेरी दीवार देख कर
अब हो गया हूँ मुतमइन दीदार देख कर 

हमने सुना था राह-ए-मुहब्बत है पुर-ख़तर
घबराता कौन है उसे पुर-ख़ार देख कर 

कब तक डराएँगे मुझे राह-ए-वफ़ा के ख़ार
घबरा न जाएँ ख़ुद ही मेरा प्यार देख कर

आया जो यार दर पे मेरा हाल पूछने
दिल बाग-बाग था मुझे बीमार देख कर 

जो आशिक़ी में फूल खिलाता था रात-दिन
उठता है दर्द दिल में उसे  ख़्वार देख कर 


*****


आठवीं गज़ल

आया हूँ तेरे दर पे तुझे ख़्वार देख कर 
इकरार कर ले अब तो मेरा प्यार देख कर 

तड़पा था रात-दिन तेरी दीवार देख कर
अब हो गया हूँ मुतमइन दीदार देख कर 

हमने सुना था राह-ए-मुहब्बत है पुर-ख़तर
घबराता कौन है उसे पुर-ख़ार देख कर 

कब तक डराएँगे मुझे राह-ए-वफ़ा के ख़ार
घबरा न जाएँ ख़ुद ही मेरा प्यार देख कर

आया जो यार दर पे मेरा हाल पूछने
दिल बाग-बाग था मुझे बीमार देख कर 

जो आशिक़ी में फूल खिलाता था रात-दिन
उठता है दर्द दिल में उसे  ख़्वार देख कर 


*****


नौवीं गज़ल

मुझको हुई मुहब्बत उस शोख़ दिल-सिताँ से
रहता है बे-ख़बर जो मेरे हर इक फ़ुग़ाँ से

दिखता है सीधा-सादा पर पूरा जादूगर है
मुझको चुरा है लेता मेरे ही ज़िस्म-ओ-जाँ से

पहले जरा ये देखें उस बुत के मन में क्या है
तब बात वो कहेंगे हम उस मिज़ाज-दाँ से

कैसे कहेंगे उससे हमको भी है मुहब्बत 
गुफ़्तार जो न करता अब अपनी जान-ए-जाँ से

कब से खड़ा हूँ दर पे सुनने को हाँ तुम्हारी
ख़ामोशियाँ न ओढ़ो कुछ तो कहो ज़बाँ से

हर सिम्त बेरुख़ी है हर सिम्त है अदावत
मिलता न दिल हमारा इस बे-वफ़ा जहाँ से

ख़ैरात में मिले गर लेना नहीं मुहब्बत
तुम हाथ खींच लेना उल्फ़त की दास्ताँ से

चल आजमा ले पहले 'मीरा' को हर तरह से 
फिर करना आशिक़ी तू उस हुस्न-ए-बद-गुमाँ से


*****


दसवीं गज़ल

ज़िन्दगी में वो मुकद्दर का सिकंदर निकला
उसने पत्थर भी छुआ गर तो वो गौहर निकला

बर्ग-ए-गुल बिखरी हैं राहों में फिज़ा महकी है
कौन दिलदार मुहब्बत के सफ़र पर निकला

आज इस दिल में ख़लिश सी कोई महसूस हुई
आज महबूब मेरा घर से सँवर कर निकला

यूँ हर इक गहना मेरे यार पे फबता था मगर
जो बनाता था हसीं प्यार का ज़ेवर निकला

मैंने बस प्यार ही मांगा था वफ़ा के बदले
दे गया हिज्र वो उम्मीद से बढ़कर निकला

मैं जिसे ढूँढती रहती थी पराए दर पर
वो सुकूँ जिसमें समाया था मेरा घर निकला

वो नदी प्यास बुझाकर भी रही मीठी ही
आब पीता रहा जो खारा समंदर निकला

अब रुलाएगा नहीं तर्क-ए-मुहब्बत 'मीरा'
दर्द इस बार मेरे ज़ेहन से डरकर निकला

*****



                                           लेखिका- मनजीत शर्मा 'मीरा'



कविताः लिखना चाहती हूँ



मैं नहीं लिखना चाहती हूँ
कविता का एक भी शब्द! 
हमेशा लगता है कि 
इतने अँधेरे में, 
इतनी घुटन में, 
इस क़दर क़त्ल-ओ-गारत के माहौल में
कविता भला कर भी क्या सकेगी! 
फिर गले में कुछ अटक सा जाता है I
शायद एक चीख I
मैं साँस लेने के लिए उसे बाहर लाना चाहती हूँ
और गले से निकले ख़ून सने शब्दों को, 
घुटती हुई साँसों को, 
दिल को निचोड़ देने वाले दर्द को, 
अपनी सारी अनिद्रा और बेचैनी को
बयान कर देना चाहती हूँ
इस उम्मीद के साथ कि शायद
कुछ लोग हों जो समझ सकते हों
इन तमाम परेशानियों को I
और आलोचकों से तो बस इतना ही
कहना काफ़ी होगा कि
काव्यशास्त्र से नहीं जन्म लेती है कविता
बल्कि कविता से काव्यशास्त्र है
और कविता से नहीं है जीवन
बल्कि जीवन से कविता है I
और कवि के जीवन में अगर नहीं हैं
मुक्ति की दुर्निवार चाहत,
और जीवन को उसकी गरिमा वापस दिलाने के लिए
अंतिम साँस तक जूझने का हठ,
तो उसे फ़ौरन चले जाना चाहिए
किसी साहित्य महोत्सव में
और मोलतोल करके
अच्छी क़ीमत पर
ख़ुद को बेच आना चाहिए!

                                                  - कात्यायनी


कविताः कैसी ऊब



यह कैसी ऊब है
लद्धड़ धूप में रेत पर निकल 
आए घड़ियाल की तरह
भयावह और निश्चिंत
टसकने का नाम ही नहीं लेती

दर्द की गति इतनी धीमी है 
कि पता ही नहीं चलता
यह बढ़ रहा है या घट रहा है

उफ! यह फूल पिछले कई दिनों से
इसी तरह खिला है

एक के बाद एक
बेजान मौसमों को
 कैसे झेलती जा रही है धरती

न पीछे का कुछ याद आता है
न आगे का कुछ सूझता है
बस यह समय है और इसे काटना है

कोई फर्क नहीं
एक अतिप्राचीन हठीले ठहराव
और पदार्थहीन बना देने वाली 
इस तेज रफ्तार में

यहाँ क्रिया ही क्रिया है
पर कर्ता गायब
और कर्म का तो कोई ठिकाना ही नहीं
हर वह आदमी तेज-तेज भाग रहा है
जिसे कहीं नहीं जाना है!

लेखक- मदन कश्यप 

कविताः घस्यारियाँ



पहाड़ों से अक्सर ही,
दिखता है हिमालय
और दिखाई देती हैं अनेकों घस्यारियां

हिमालय का
पहाड़ों से दिखना 
बहुत आम है
लेकिन आम नहीं है
घस्यारिओं का नज़र आना

घस्यारियाँ जो उपमाओं में 
कठोर नज़र आती हैं,
हिमालय सी,
लेकिन वास्तव में 
घस्यारियां बर्फ़ सी होती हैं
जो पहाड़ नापते हुए
पिघल कर पानी हो जाती हैं
घस्यारियों का पिघलना,
गिरकर लहूलुहान होना होता है

घस्यारियां जो
संघर्ष करती आ रही हैं
कभी घर से, 
कभी समाज से 
और अब पहाड़ की
चढ़ाई के कच्चे रास्तों से

घस्यारियां‌, 
जिन्हें रोका गया शिक्षा से
घस्यारियां, 
जिन्हें बांधा गया 
समाज की बेड़ियों से
घस्यारियां,
जिन्हें केंद्रित कर दिया
जंगलों में

घस्यारियां हिमालय की,
श्रृंखलाओं की तरह हैं
जिनमें दवाब होते रहता है
जो संरचना परिवर्तित करता है
लेकिन फिर भी 
घस्यारियां हिमालय सी नहीं हैं
हाड़, मांस की औरतें हैं घस्यारियां
जो बोझ तले दब कर
ख़त्म हो जाती हैं एक दिन।


- भावना पांडे

26 November 2022

व्यंग्य कविताः इसीलिए शासन से हेराफेरी करना आसान है।




जनता का राज है जनता महान है 
उपर तक हमारी मिली भगत है 
हमारा नीचे से ऊपर तक अंडरस्टैंडिंग है 
इसलिए शासन से हेराफेरी करना आसान है 

हम पर कार्रवाई होना सिर्फ प्रक्रिया दिखावा है 
हमारा निलंबित होना सिर्फ दिखावा है 
जनता कुछ करती नहीं महान है 
इसलिए शासन से हेराफेरी करना आसान है 

प्राइवेट नहीं शासन है इसीलिए आसान है 
शासन के हम दामाद हैं स्पेशल मेहमान हैं 
हमारा संगठन है कब्जा और कमांड है 
इसीलिए शासन से हेराफेरी करना आसान है 

ऑफिस में भाड़े से अपने आदमी बिठाए हैं 
बिचौलियों से पूरी सेटिंग हरे गुलाबी ख़ान है 
घूस ब्लैक मनी को प्रॉपर्टी में इनवेस्ट आसान है 
इसलिए शासन से हेराफेरी करना आसान है 

समझते हैं घूसखोरी पद और कुर्सी का अपमान है 
इसके भरोसे ठसके से जीना आसान है 
शासन से बेईमानी करना आदत का वरदान है 
इसीलिए शासन से हेराफेरी करना आसान है 

            लेखक- किशन सनमुख़दास भावनानी


25 November 2022

विश्व में अद्भुत है हमारा संविधान



देश का संविधान राष्ट्र का आईना ही नहीं बल्कि एक राष्ट्र का प्रकाश है। जो राष्ट्र को मार्गदर्शक बन कर गतिमान करता है सब को एक सूत्र में बांधकर एकत्व के भाव में पिरोने का काम करता है।एक संविधान राजनीतिक व्यवस्था का बुनियादी ढांचा ही नहीं बल्कि राष्ट्र की शक्ति को एकता में पिरोहित करते हुए राष्ट्रीय की जनता में एकत्व भाव से एकता का पाठ पढ़ाता है। मानवता, स्वतंत्रता, नैतिकता के साथ और बंधुता से जीना सिखाता है।





एक आदर्श संविधान राष्ट्र की निधि होता है। मनुष्य-मनुष्य के बीच में भेद को मिटा कर। समानता, आदर्शों ,मूल्यों के साथ व्यक्ति, समाज और राष्ट्र को खड़ा करने का काम करता है। एक संविधान न्याय पूर्ण समाज की व्यवस्था कर व्यक्ति, समाज और राष्ट्र का विकास करने का महत्वपूर्ण कार्य करता है। हमारा संविधान देश के प्रत्येक व्यक्ति को जोड़ने का काम ही नहीं करता बल्कि एकता के सूत्र में बांधे रखता है। एक राष्ट्र का एहसास भी कराता है। दुनिया में भारतीय संविधान बेजोड़ है। विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान है। भारतीय संविधान राष्ट्र रुपी देवता का मस्तिष्क है। हमारे देश का संविधान कठोर और लचीला है। हर परिस्थितियों में खरा साबित होने वाला संविधान है। भारतीय संविधान एक ऐसे गुलदस्ते की तरह जिसमें सभी प्रकार के फूल खिले हुए हैं। हमारे संविधान को एक धागे में सुंदर मोतियों की तरह पिरोया गया है। हर प्रकार की परिस्थिति में जोड़ने का काम करता है। हर राष्ट्र को विकास की गति प्रदान करने हेतु एवं विधिवत रूप से चलाने हेतु एक संविधान की आवश्यकता होती है। जो जनता के माध्यम से सरकार को सुशासन प्रदान करने का कार्य करता है। एक उत्कृष्ट कोटि का संविधान उस राष्ट्र के लोकतंत्र में नव प्राण भरकर गतिमान करता है। 


हमारे देश का संविधान आजादी के बाद जन्म लेकर एक अरब 40 करोड़ जनता को बांधे हुए हैं और दुनिया का आश्चर्य बना हुआ है। यह हमारे पूर्वजों की महान् उपलब्धि है। भारतीय संविधान सभा के गठन का विचार पहली बार एम.एन. रॉय के मन में 1934 में आया था।1935 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने प्रथम बार आधिकारिक रूप से संविधान सभा के गठन की मांग की थी और 1938 में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने घोषणा की थी कि स्वतंत्र भारत के संविधान का निर्माण संविधान सभा करेगी। 9 दिसंबर 1946 में संविधान सभा की प्रथम बैठक हुई थी। 11 दिसंबर 1946 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद को संविधान सभा का स्थाई अध्यक्ष और एससी मुखर्जी को उपाध्यक्ष चुना गया था तथा सर. बी.एन. राव को संवैधानिक सलाहकार के रूप में नियुक्त किया गया था। संविधान सभा की संविधान निर्माण से संबंधित कई कार्य समितियां बनाई गई थी। पंडित नेहरू ने भारतीय संविधान को लिखवाने के लिए इंग्लैंड के महान् विधिवेत्ता आइवर जेनिंग्स को न्योता भेजा था तब महात्मा गांधी ने पंडित नेहरू को कहा कि मैं एक ऐसे व्यक्ति को जानता हूं जो इस राष्ट्र का नागरिक है कानून का ज्ञाता है। कानून का पारखी है। वह डॉक्टर बी. आर अंबेडकर है। डॉक्टर अंबेडकर कांग्रेस के सदस्य नहीं थे। डॉक्टर अंबेडकर "रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया" पार्टी से थे।

प्रारूप समिति (Drafting Committee)
बी. आर. अंबेडकर की अध्यक्षता में गठित प्रारूप समिति जो संविधान सभा की सबसे विशिष्ट समितियों में शामिल थी। इसका गठन 29 अगस्त, 1947 को हुआ था तथा इसमें 7 सदस्य थे। इसकी प्रमुख जिम्मेदारी संविधान सभा का प्रारूप निर्धारित करना था।
संविधान सभा में डॉ. अंबेडकर का निर्वाचन बंगाल प्रांत से हुआ था, लेकिन विभाजन के कारण वह क्षेत्र पूर्वी पाकिस्तान में चला गया। इसलिये डॉ. अंबेडकर का पुनः निर्वाचन बम्बई से हुआ। प्रारूप समिति के सदस्य -(Members of Drafling Committee)
1. डॉ. बी. आर. अंबेडकर (अध्यक्ष)
2. एन. गोपालस्वामी आगर
3. अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर
4. डॉ. के. एम. मुंशी
5. सैय्यद मोहम्मद सादुल्ला
6. एन. माधव राव (इन्होंने बी. एल. मित्र को जगह ली क्योंकि उन्होंने स्वास्थ्य कारणों से त्यागपत्र दे दिया था।)
7. टी. टी. कृष्णमाचारी (1948 में डी.पी. खेतान की मृत्यु पश्चात्। इस प्रारुप समिति के 6 सदस्यों के द्वारा पूर्ण रूप से सहयोग न होने पर सारा कार्यभार डॉक्टर बी आर अंबेडकर पर आ गया और उन्होंने 2 वर्ष 11 माह 18 दिन के कठोर परिश्रम से भारतीय संविधान को तैयार किया। अत: डॉ. अंबेडकर को भारत के "संविधान के पिता", "आधुनिक मनु" की संज्ञा दी जाती है। मूल संविधान में कुल 395 अनुच्छेद 22 भाग और 8 अनुसूचियां थी। 

वर्तमान में भारतीय संविधान में 470 अनुच्छेद, 25 भाग और 12 अनुसूचियां हैं। इस संविधान में विश्व अनेक देशों के संविधान की अच्छाइयों को शामिल किया गया।जिसमें ब्रिटेन, संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, आयरलैंड,दक्षिण अफ्रीका, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया,जर्मनी, जापान, पूर्व सोवियत संघ के देशों से।

हमारे देश का संविधान 26 नवंबर 1949 को बनकर तैयार हुआ था और अंगीकृत किया गया था (पारित हुआ था) और 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया था। 15 अक्टूबर 2015 को देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संविधान के निर्माता डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की 125वीं जयंती पर घोषणा की कि भारत में 26 नवंबर को "संविधान दिवस" के रूप में मनाया जाएगा।" हमारा संविधान न्याय, समता और स्वतंत्रता की गारंटी देता है। एक संप्रभु , समाजवादी,धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणतंत्र की घोषणा करता है तथा नागरिकों के मूल अधिकार मूल सिद्धांत और कर्तव्य की रक्षा करता है। हमारा मूल संविधान हाथों से अंग्रेजी और हिंदी दोनों भाषाओं में लिखा गया था। सुलेख के रूप में संविधान को लिखने वाले उस्ताद प्रेम बिहारी नारायण रायजादा थे। जिसे उन्हें लिखने में 6 माह का समय लिया था। बिना मेहनताना लिए।भारतीय मूल संविधान पर जो चित्रकारी की थी वह आचार्य नंदलाल बोस ने की थी। संविधान के प्रस्तावना पेज को को सजाने का काम राम मनोहर सिन्हा ने किया था। संविधान की कुल 166 बैठकें हुई थी।हमारे संविधान में आपात उपबंध है- राष्ट्रीय आपात अनुच्छेद 352, राष्ट्रपति शासन अनुच्छेद 356 और वित्तीय आपात अनुच्छेद 360 । मूल भारतीय संविधान पर 284 लोगों ने हस्ताक्षर किए थे।संविधान के भाग 3 को भारत का मैग्नाकार्टा कहा जाता है क्योंकि इसमें फंडामेंटल राइट्स का उल्लेख है।संविधान के तैयार होने के बाद डॉक्टर अंबेडकर साहब ने अपने भाषण में यह कहा था कि-" संविधान कितना भी अच्छा हो लेकिन उस को मानने वाले लोग अच्छे नहीं हो तो संविधान खराब सिद्ध होगा और यदि संविधान कितना भी खराब हो और इसे मानने वाले लोग अच्छे हो तो संविधान अच्छा साबित होगा।" 


अंबेडकर साहब ने यह सुझाव दिया था कि हमें मात्र राजनीतिक लोकतंत्र से संतुष्ट नहीं होना चाहिए बल्कि हमें समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के अंतर्निहित सिद्धांतों के साथ सामाजिक लोकतंत्र के लिए प्रयासरत रहना चाहिए।उनका स्पष्ट कहना था कि एक राजनीतिक लोकतंत्र तब तक प्रगति नहीं कर सकता जब तक कि उसका आधार सामाजिक लोकतंत्र नहीं होता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 को डॉक्टर बाबासाहेब आंबेडकर ने संविधान का 'हृदय और आत्मा' कहा है।संविधान के भाग तीन तथा चार मिलकर संविधान की आत्मा तथा चेतना कहलाते हैं। आज संविधान में मूल कर्तव्य 11 है।आज देश के नागरिकों को युवाओं को संविधान के महत्व एवं संविधान की जानकारी होनी चाहिए।संविधान का पालन करना चाहिए। संविधान के प्रति कर्तव्यनिष्ठ, ईमानदार रहकर एक आदर्श नागरिक का परिचय देना चाहिए। जब हम संविधान के कर्तव्यों का निर्वाह करते हैं तो अधिकारों की रक्षा स्वत: होगी। आज हमारा संविधान खतरे में है। 

देश का प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य ही नहीं बल्कि नैतिक जिम्मेदारी है कि वह संविधान के नियमों का पालन करें और उस पर चले। यदि संविधान के नियमों की पालना की जाए तो देश में अपराध स्वत: घट जाएंगे। मानवीय एवं नैतिक मूल्यों की अभाव में संवैधानिक मूल्यों की रक्षा तथा सम्मान करना असंभव है। आज हम अपने कर्तव्य को भूलते जा रहे हैं अपने अधिकारों का दुरुपयोग कर रहे। आज संविधान दिवस पर हम संकल्प लें। एक अच्छे नागरिक के रूप में बनकर राष्ट्र का सम्मान करें। विकास करें। सबकी भलाई में ही हमारी भलाई है।क्योंकि हमसे राष्ट्र हैं और राष्ट्र से हम हैं।
 

                                                -डॉ. कान्ति लाल यादव


कविता- महल की दीवारें



सत्य एक महसूसा मैने,
दीवारों के कान ही नहीं जुबां भी हुआ करती है,
यकीन नही?
आयी हु अभी बतिया कर मैं,
पहाड़ के शिखर पर स्थापित मजबूत किले की उन तन्हा दीवारों से,
तन्हाइयो ,चमगादड़ो का आश्रय स्थल वे दीवारें बोलती है,
राजसी अतीत के साथ बतलाती है,
अपने निर्माण के कठोर श्रम, दृढ़ निश्चय की गाथा,
रनिवास के आँगन में खड़ा कनेर का वो बूढा वृक्ष,
करता गुफ्तगू इन चमकहीन,खूबसूरत दीवारों से,
रोशन था कभी तो आशियाना उनका भी,
ये फर्श जहाँ समाहित पागचिन्हिया वीरो की,
गूँजती महल की प्रांगण में करतल ध्वनि,
रानियों की ठिठोली ,झालरों की खनक,पायलों की झंकार,
घोड़ो का हिनहिनाना, पहाड़ो का खिलखिलाना,
दफन है सब इन दीवारों के ह्रदय में,
राज खोलती है ये स्वयं का उन सरल ह्रदय पथिको पर,
हैं उत्सुक जो इनकी आत्मा तलाशने में,
इस महानता, विशालता के बावजूद क्षुब्द है ये दीवारें,
महल का हर मोड़,दरवाजा,कंगूरा,चीख रहा उत्कट वेदना में,
देखा मैंने अश्रुपूरित थी दीवारे अपनी बदहाली,तंगहाली पर,
जमी सैकड़ो वर्षो की धूल भी छुपा न सकी दर्द उनका,
महल के कोने कोने फैला गंदगी साम्राज्य,
शराब की बोतलों के ढेर,
बना रहे थे उपहास उनके स्वर्णिम अतीत का,
भित्तियों की चमड़ी कुरेदकर गोदे गए वो नाम,
कलंक थे उस भव्य महल के सौंदर्य पर,
नाम नही ख़ंजर थे,
घायल थी जिनसे वो बेबस दीवारें,
वक्त और मौसम से जूझते बिखर गए थे कुछ हिस्से,
कुछ शायद विलुप्त थे,
किन्तु पत्थर पत्थर उनका प्रतीक था अदम्य पौरुष का,
पहाड़ के शिखर पर खड़ा वो पुराना महल,
आज किसी राजा की महत्वकांक्षा का प्रतिरूप नही ,
पत्थरो की एक वीरान इमारत भर था,
जाते जहाँ चमगादड़,आवरा पशु,गन्दगी फैलाने वाले,
महल में पसरा कूड़ा, मल त्याग,कुरेदे नाम,
तमाचा है हमारे सभ्य होने पर,
सह न सकी मैं दीवारों का करुण रुदन,
जिनका हर आंसू हम तहज़ीबगारो पर व्यंग था,
बोली वे मुझसे जो तुम बना नही सकते,सवांर नही सकते,
तो हक क्या तुम्हें हमे कुरूपता देने का,
नही चाहिए ऐसे मुरीद जो हमारे अस्तित्व पर अपनी छाप छोड़ जाना चाहे,
ऐसी आवाजाही से तो नीरवता कहीं भली,
निर्जनता हमसे हमारा सौंदर्य तो नही छीनती,
बस सुन न सकी मैं और कुछ ,
लौट आयी अपमानित ,निःशब्द।

लेखिका- पूजा भारद्वाज


प्रतिपल नवोन्मेष की प्रति में रमे प्रेमियों के लिए...



जब हम किसी से जुड़ते है उससे प्यार करते है सच मे खुद को जीते है खुद को ही आत्मसात करते है। हम सब अपूर्ण है मिलते है पूर्ण होने के लिए।हम अतृप्त हैं, अभिलाषा, आकांक्षा के बोधक । मन हमारा रिता रिक्त क्योंकि हम स्नेह नही प्रेम नही, भावनात्मक जुड़ाव नही समृद्धि चाहते है और समृद्धि अतिशीघ्र नई रिक्तता में बदल जाती है।





कुछ लोग ऐसे होते है जो निर्मल, अनछुए, अनभिज्ञ होते है दुनियावी प्रपंचों से । हम उनसे मिलते है , उनके कहे को सहजते है ,अपनी कहते है । वो सुरम्य, नि:सर्ग लगते है उनके बीच पहुंच कर हमें मनुष्यता का बोध होता है, लेकिन फिर कुछ दिनों बाद अपनी दुनियावी प्रपंची प्रवत्तियों से भस्मीभूत होकर फिर लौट जाते है मन के नये व्यापार को करने।

जीवन मे प्रकाशरत रहने के लिए यह जरूरी है कि किसी निर्मल, अनछुए, दुनियादारी से अनभिज्ञ व्यक्ति को धोखा न दें। बेशक आप उससे जुड़े न लेकिन अगर जुड़ें तो उस तरह से तो बिल्कुल भी नही जैसे दुनिया के कार्य- व्यापार के लिए लोगों से मिलते या क्षणिक जुड़ते है और कार्य निकल जाने पर उसकी जिंदगी से या तो खुद निकल जाते है या उसे निकाल देते है।

अगर जीवन को मधु अभिलाषा के साथ जीना है तो अपनी मन की प्रकृति के नियम को सुव्यवस्थित करें। यकीन मानिए आपके साथ, आपके पास जो होगा सिर्फ आपका होगा उम्र भर के लिए।

मानवीय संवेदनाओं को कुचालक न होने दें मन के एकांत को प्रेम स्थल बना रहने दें। प्रेम- एक असमाप्त सतत संशोधनीय कविता जैसा लेकिन कविता नही। यह याद रखना जरूरी है। प्रेम का आचमन आत्मा को पवित्र करता है !!

लेखिका- डॉ किरण मिश्रा

24 November 2022

पढ़िए मनजीत शर्मा जी की सुंदर और दिल छूने वाली 10 गज़लें



।। पहली गज़ल ।।

सिर्फ़ ज़ाहिर थी सादगी दिल की
जान पाई न साहिरी दिल की
क्यों दिखाता है सरकशी दिल की
बात सुन ले कभी दुखी दिल की
जब से तूने निगाह फेरी है
रास आई न सर-ख़ुशी दिल की
हर किसी को कहाँ मयस्सर है
हाय क्या चीज़ है ख़ुशी दिल की
कह न पाई मैं हाल-ए-दिल उनसे
बात दिल में ही रह गई दिल की
भेद मेरे सभी पता हैं उन्हें
कौन करता है मुख़बरी दिल की
कुछ तो रख आजिज़ी अदावत में
हम भी देखें कुशादगी दिल की
बज़्म है यार है समाँ भी है
आज तो छेड़ रागनी दिल की
दर्द-ए-दिल से मुझे बचाया है
याद रखूँगी मुख़्लिसी दिल की
दुश्मनों से भी दिल लगा बैठे
कितनी मासूम है लगी दिल की
उसकी महफ़िल में जाएंगे 'मीरा'
जो सुनाएगा शाइरी दिल की

*****


।। दूसरी गज़ल ।।

दर्द भरे जज़्बात न दे
रात के आगे रात न दे
दुनिया बैठी नमक लिए
इश्क़ के तू सदमात¹ न दे
जिनसे भड़के दर्द-ए-दिल
हाय वो नग़्मात² न दे
ज़िंदा रख उसकी हस्ती
सहरा³ को बरसात न दे
जिसके दिल में दर्द नहीं
उसको क़लम दवात न दे
कुछ बातें दिल में भी रख
काग़ज़ को हर बात न दे
कर्म का जज़्बा दे मौला
झोली में ख़ैरात⁴ न दे
जीत को जीने दे कुछ पल
इतनी जल्दी मात⁵ न दे
देनी हैं तो दे खुशियाँ
अश्कों की सौग़ात न दे
घुट-घुट मर जाए 'मीरा'
ऐसे तो हालात न दे

*****

।। तीसरी गज़ल ।।

तू मेरा है तो मुझे प्यार तो कर
मेरे दिल को कभी बीमार तो कर
ख़ार-ज़ारों¹ से घिरी रहती हूँ
मेरी हस्ती गुल-ओ-गुलज़ार तो कर
ख़ुद को परवान² समझ लूंगी सनम
इश्क़-ओ-उल्फ़त में मुझे ख़्वार³ तो कर
तेरी जानिब⁴ मैं बढ़ा दूंगी ये लब
तू मेरे सामने रुख़सार⁵ तो कर
इनके पेचों में उलझना है मुझे
ज़ुल्फ़ अपनी ज़रा ख़म-दार⁶ तो कर
मेरी उल्फ़त को समझने के लिए
पहले ख़ुद को तू समझदार तो कर
वार दूंगी मैं मुहब्बत तुझ पर
पर मुझे प्यार से ज़रदार⁷ तो कर
लाँघ आएगी समंदर 'मीरा'
पर नदी तू भी कभी पार तो कर

*****


।। चौथी गज़ल ।।

जो मेरे सुख़न¹ में नहीं रूह कोई
तो फिर इस चमन में नहीं रूह कोई
तग़ज़्ज़ुल² बिना हाल लफ़्ज़ों का वो है
कि जैसे बदन में नहीं रूह कोई
गए दौर में शम्अ जलती थी दिल की
है अब अंजुमन में नहीं रूह कोई
हुई जब से तुझको मुहब्बत से नफ़रत
रही तेरे फ़न³ में नहीं रूह कोई
अदाकारी लगती है तेरी मुहब्बत
नहीं बांकपन में नहीं रूह कोई
दिखावा किया क्यूँ तेरे पास दिल है
दिखी तेरे तन में नहीं रूह कोई
गिरा जब से बरसों पुराना शजर⁴ है
तभी से सहन में नहीं रूह कोई
वुज़ु⁵ दिल का तुमने नहीं गर किया है
तो फिर इस भजन में नहीं रूह कोई
अलग हो गई आज 'मीरा' बदन से
नहीं इस कफ़न में नहीं रूह कोई

*****


।। पांचवी गज़ल ।।

आपके साथ जो चला होगा
वो मुहब्बत का देवता होगा
इश्क़ यूँ ही नहीं हुआ होगा
देखकर हुस्न वो मिटा होगा
जो उतारे से भी न उतरे कभी
चश्म-ए-ख़ूबाँ में वो नशा होगा
तुम दिखोगी जहाँ पे सबसे हसीं
वो मेरे दिल का आइना होगा
खूबसूरत जो कहते हैं ख़ुद को
आइने ने उन्हें छला होगा
जो मेरी हर ख़ता मुआफ़ करे
वो यक़ीनन मेरा ख़ुदा होगा
नफ़रतों की सिरात क्यूँ जाएँ
प्यार का भी तो रास्ता होगा
ख़ुद की नज़रों में उठ नहीं सकता
मेरी नज़रों से जो गिरा होगा
क्यों डरेगा वो ख़ारों से 'मीरा'
इश्क़ की राह जो चला होगा

*****


।। छठी गज़ल ।।

प्यार की रिमझिम फुहारें और वफ़ाएँ हैं कहाँ
वो जो जिनसे दिल बहलता था अदाएँ हैं कहाँ
सादगी पर क्यूँ न उनकी हो रहूँ कुर्बान मैं
जो हमीं से पूछते हैं कि बलाएँ हैं कहाँ
तन-बदन तो कर दिया है ठीक ऐ चारागरो¹
मन को भी कर दें जो चंगा वो दवाएँ हैं कहाँ
छोटे से छोटे हुए जाते हैं अब तो पैरहन²
जो दुपट्टे में सिमटती थीं हयाएँ³ हैं कहाँ
ख़ाक हो पाया नहीं परवाना उसके इश्क़ में
शम्अ रखती थीं जलाकर वो हवाएँ हैं कहाँ
तेरे चेहरे पर जो आती थीं मेरा रुख़⁴ देखकर
ऐ सनम यह भी बता दे वो शुआएँ⁵ हैं कहाँ
हर बशर से यूँ ही मिल जाती थीं 'मीरा' मुफ़्त में
नफ़रतों के इस जहाँ में वो दुआएँ हैं कहाँ


*****

।। सातवीं गज़ल ।।

कभी तेरी ज़ुल्फ़ों के ख़म¹ देखते हैं
कभी तेरे रुख़सार² हम देखते हैं
नज़र को बचाकर सनम देखते हैं
अजी ये न समझो कि कम देखते हैं
कभी दुश्मनों के करम देखते हैं
कभी दोस्तों के सितम देखते हैं
कभी देखते हैं तुम्हारी ख़ुशी को
कभी अपने दिल के अलम³ देखते हैं
सुखा लेते हैं अपनी आँखों के आँसू
अगर तेरे दीदा-ए-नम⁴ देखते हैं
नहीं हमने देखा किसी मह-ज़बीं⁵ को
तुझे ही सनम दम-ब-दम⁶ देखते हैं
फ़क़त देखते हैं मुहब्बत भरे दिल
नहीं कोई दैर-ओ-हरम⁷ देखते हैं
इसी ने लिखे हैं मुहब्बत भरे ख़त
मेरे हाथ में जो क़लम देखते हैं
सभी देखते हैं मेरी शान-ओ-शौकत
नहीं मेरे दिल का अदम⁸ देखते हैं
अदावत⁹ का होने लगा बोलबाला
मुहब्बत को ज़ेर-ए-क़दम¹⁰ देखते हैं
बहुत होती है दिल को तक़लीफ यारो
किसी का निकलता जो दम देखते हैं
उन्हें अब नहीं देखना हमको 'मीरा'
जो हर बात में बस रक़म देखते हैं

*****


।। आठवीं गज़ल ।।

कहने को मुहब्बत के तरफ़-दार हज़ारों
बर्बाद हैं पर इश्क़ में घर-बार हज़ारों
तू प्रेम की राहों पे क़दम सोच के रखना
मिलते हैं ज़माने में अदाकार हज़ारों
जिस बुत को तराशे था हथौड़े का हर इक वार
उस बुत की निगाहों में थे आज़ार¹ हज़ारों
बचपन से निकलकर तू जवानी में क़दम रख
आने हैं तेरे सामने संसार हज़ारों
यारी में जिसे हमने थमाए थे कभी फूल
आया है मेरे दर पे लिए ख़ार² हज़ारों
सब अपना ही दुख-दर्द सुना कर गए मुझको
कहने के लिए आए थे ग़म-ख़्वार³ हज़ारों
बस मेरी मुहब्बत पे ही लोगों की नज़र थी
दुनिया में यूँ होते हैं ख़तावार हज़ारों
इक ज़हर का प्याला ही न 'मीरा' को दिया था
लोगों ने दिए थे उसे मुर्दार⁴ हज़ारों

*****


।। नौवीं गज़ल ।।

कार-ए-जहाँ¹ से हमको फ़राग़त² नहीं मिली
किस मुँह से अब कहें कि मुहब्बत नहीं मिली
कोई भी चीज़ वक़्त-ए-ज़रूरत नहीं मिली
जब तक रहे जहान में इज़्ज़त नहीं मिली
काग़ज़ के फूल से ही मुहब्बत रही जिन्हें
उनको भी ये गिला³ रहा निकहत⁴ नहीं मिली
थी वक़्त की कमी नहीं सिंगार के लिए
पर वस्ल⁵ के लिए उन्हें फ़ुर्सत नहीं मिली
जिस इश्क़ की तलाश में हम हो गए फ़क़ीर
उस इश्क़ की हमें कभी लज़्ज़त नहीं मिली
दिल ख़ाक हो गया है तेरे हिज्र⁶ में सनम
पर अब तलक ग़रीब को तुर्बत⁷ नहीं मिली
हमने तो बारहा⁸ ही दिखाया था आइना
पर उनको उसमें एक भी ग़फ़लत⁹ नहीं मिली
यूंँ ही हुआ है हर दफ़ा अपने नसीब में
दीवार तो उठी मिली पर छत नहीं मिली
फ़ुर्क़त में ही गुज़र गए 'मीरा' के माह-ओ-साल
फिर भी उन्हें इस इश्क़ में शिद्दत¹⁰ नहीं मिली

*****


।। दसवीं गज़ल ।।

आपकी आँखों में ख़ंजर¹ हो न हो
फिर भी चल जाएगा नश्तर² हो न हो
तेरी आँखों में ही डूबेंगे सनम
चाहे चाहत का समंदर हो न हो
चल चलें ऐ दिल विसाल-ए-यार को
कौन जाने फिर वो मंज़र³ हो न हो
मैं उसे अपने से ऊपर ही कहूँ
वो मेरे क़द के बराबर हो न हो
वो बताता है बढ़ाकर ही सदा
हाल उसका मुझ से बद-तर हो न हो
ख़ून का इल्ज़ाम होगा मुझ पे ही
मेरे हाथों में वो पत्थर हो न हो
चल चलें बज़्म-ए-सुख़न⁴ में आज फिर
फिर कोई ऐसा सुख़न-वर⁵ हो न हो
जो भी कहना आज ही कह लो उसे
कल कोई 'मीरा' से बेहतर हो न हो

*****

लेखिकाः मनजीत शर्मा 'मीरा'