साहित्य चक्र

14 December 2022

शीर्षक- मेरी चाहत




ये मासूम सा चेहरा तुम्हारा होठों पर मुस्कान गजब थी,
बैठे थे हम मां के दरवार में मिला आशीर्वाद हमें था।

माथे पर चंदन था चमक कुछ गजब मनभावन थी,
जन्म जन्म का साथ मिला हमें तुमसे बेहद प्यार था।

मेरे नाम में तुम्हारा नाम पहले आया यह भी खास था,
जभी हम तुम्हारी रानी कहाये ये भी कुछ कमाल था।

हर रंग कपड़ों का बेहद खूबसूरत आप देखते थे,
जब मन बहुत खुश हो जाता जब हम तुम्हें बुलाते थे।

न धूप देखी न ठंड देखी बस प्रेम की चाह थी,
आंख भर आती है जब हमारे तुम इतने करीब थे।

कितनी अदाये थी जो हम आप पर मर मिटे थे,
कभी ना खत्म होने वालीं कहानी जो बन गये थे।

सब को एक तरफ रखकर तुमने मुझे इतना चाहा था,
पल पल याद करते वो तुम्हारे साथ जो मैंने गुजारें थे।

रख तस्वीर को प्रेम के जज्बात उतार दूं तुम्हारे,
तुम्हारे आने की चाहत कुछ अलग ही होती थीं।

- रामदेवी करौठिया


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