साहित्य चक्र

26 April 2024

लघुकथाः अदला-बदली

सरिता जब भी श्रेया को देखती, उसके ईर्ष्या भरे मन में सवाल उठता, एक इसका नसीब है और एक उसका। क्या उसका नसीब उसे नहीं मिल सकता ?

सरिता के छोटे से फ्लैट की बालकनी से श्रेया का भव्य बंगला बहुत सुंदर दिखाई देता था। वह जब भी पति के साथ मोटरसाइकिल से निकलती, श्रेया के बंगले की पार्किंग एरिया में खड़ी बीएमडब्ल्यू पर नजर उसकी नजरें चिपक जातीं। 





अपनी खूबसूरती को निखारने के लिए श्रेया खुले हाथों से पैसे खर्च करती थी। ट्रिम किए बाल, नियमित फेशियल, पेडिक्योर, मेनिक्योर, सब कुछ संपूर्ण। सिर से ले कर पैरों तक सब कुछ व्यवस्थित और सुंदर। जबकि सरिता के मर्यादित बजट में यह सब कहां से हो पाता। उसके बिखरे बाल, उसमें बीच-बीच में सफेद बाल। वह मेहंदी तो लगाती थी, पर कभी समय न मिलता तो काले बालों के बीच सफेद बाल झांकने में बिलकुल पीछे नहीं रहते थे। 

साग-सब्जी काटते-काटते हाथों की अंगुलियो की चमड़ी खुरदुरी हो गई थी। खुद बर्तन मांजने से नाखूनों का रंग और आकार अजीब हो गया था। अगर श्रेया के यहां की तरह उसके यहां भी नौकरों की फौज होती तो उसका भी सिर से ले कर पैरों तक अलग ही नक्शा होता। पर उसके भाग्य में तो कुछ और ही था।

कहां श्रेया के डिजाइनर कपड़े और कहां उसके साधारण कपड़े, इस्त्री किए कपड़े पहनने का आनंद ही कुछ और होता है, घंटो इस्त्री पकड़ने वाले सरिता के हाथ उससे कहते। रविवार को किसी ठेलिया पर चाट-पकौड़ी या समोसे-कचौड़ी खा कर लौटते हुए सरिता यही सोचते हुए अपार्टमेंट की सीढ़ियां चढ़ रही होती कि बीएमडब्ल्यू में फाइवस्टार होटल की लज्जत ही कुछ और होती है।

श्रेया का शरीर हमेशा सोने और हीरों के गहनों से सजा होता था। समय समय पर वे बदलते रहते थे। जैसे कपड़े, वैसे आभूषण। जबकि सरिता को विवाह के समय जो मंगलसूत्र मिला था, वही एक महत्वपूर्ण गहना था। सोना खरीदने की औकात नहीं थी, इसलिए चांदी पर सोना चढ़वा कर दिल को संतोष मिल जाता था।

पर श्रेया को देख कर सरिता के दिल का संतोष लुप्त हो जाता और मन ईश्वर से एक ही सवाल पूछता, 'श्रेया का भाग्य उसे नहीं मिल सकता क्या ?'

और अगर मिल जाए तो... 

तमाम मेघधनुषी सपने आंखों में तैरने लगते। शाम को जब पड़ोस में रहने वाली हिमांशी ने बताया कि सामने वाले बंगले में रहने वाली श्रेया को ब्लड कैंसर है और लास्ट स्टेज में है। तब से सरिता भगवान से यही प्रार्थना कर रही है कि उसके भाग्य में जो है, वही ठीक है। प्लीज अदला-बदली मत कीजिएगा।


                                                             - वीरेंद्र बहादुर सिंह 


बर्बाद समय को हम रिसाइकल नहीं कर सकते


बर्बाद समय का अर्थ है बर्बाद जीवन
या
मोबाइल हमारे समय के सबसे बड़े शत्रु





             आज औद्योगिक युग के बाद फैक्ट्री, ऑफिस और नौकरी का जो दौर शुरू हुआ, उसने मनुष्य को घड़ी का गुलाम बनाकर रख दिया। आधुनिक अविष्करांे ने हमारे जीवन की गति बढ़ा दी है। इनकी बदौलत हम दुनिया से तो जुड़ गए हैं, लेकिन शायद खुद से दूर हो गए हैं। मोबाइल हमारे समय के सबसे बड़े शत्रुओं में से एक है, क्योंकि वह हमें महत्वहीन कामों में उलझा देता है। मोबाइल से दो तरह से समय बर्बाद होता है या तो हम खुद ही अपना समय बर्बाद करते हैं या फिर अब इसके माध्यम से दूसरे हमारा समय बर्बाद करते हैं। जिन लोगों के पास खाली समय होता है, वह हमेशा काम करने वाले लोगों का समय बर्बाद करेंगे। बर्बाद समय का अर्थ है बर्बाद जीवन। 


आप बर्बाद समय को रिसाइकल नहीं कर सकते है। यदि आप समय के सर्वश्रेष्ठ उपयोग को लेकर गंभीर हैं तो मोबाइल, टीवी, इंटरनेट चैटिंग आदि समय बर्बाद करने वाले आविष्कारों का इस्तेमाल कम कर दें। डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल और हृदय रोग की तरह ही समय की गति भी आज की एक समस्या है, जो आधुनिक जीवन शैली का परिणाम है। 

हम 80 प्रतिशत काम 20 प्रतिशत समय में ही पूरा कर लेते हैं और बचे हुए 20 प्रतिशत काम में 80 प्रतिशत समय बर्बाद करते हैं। इंटरनेट पर अगर आप ज्यादा काम करते हैं तो आपको ब्रॉडबैंड कनेक्शन पर काम करना चाहिए। इसकी गति तेज होती है। हर इंसान दिन में काम से कम 5 मिनट तक नीरा मूर्ख होता है। समझदारी इसमें है कि हम इस अवधि को बढ़ने न दें। अगर आप पूर्व दिशा में जाना चाहते हैं तो पश्चिम की ओर न जाए। जो दुनिया को हिलाना चाहता है, सबसे पहले उसे खुद को हिलना चाहिए। इससे ज्यादा निरर्थक कुछ नहीं है कि आप वह काम कुशलता से करें जिसे किया ही नहीं जाना चाहिए था।

           उस व्यक्ति का कितना सारा समय बच जाता है, जो इस बात पर नजर नहीं रखता है कि उसकी पड़ोसी क्या कहता, करता और सोचता है? मोबाईल, सिगरेट और शराब के अलावा भी कई बुरी लत होती है, जो सिर्फ आपका बहुत-सा समय ही बर्बाद नहीं करती बल्कि जीवन भी बर्बाद करती है। समुद्र में इतने लोग नहीं डूबे जितना कि मोबाईल, सिगरेट और शराब में डूब गए। यह मनोवैज्ञानिक आदतें होती है, जिनमें उलझ कर आप अपना समय खुद बर्बाद करते हैं। बड़़ बोलेपन से भी बहुत समय बर्बाद होता है।

              एक सुंदर युवती से रोमांटिक बातें करते समय एक घंटा एक सेकंड की तरह लगता है और सुर्ख अंगारे पर एक सेकंड बैठना भी एक घंटे की तरह लगता है। अपने बेटे को आदमी बनने में एक औरत को 20 साल लग जाते हैं और दूसरी औरत उसे 20 मिनट में मूर्ख बना देती है। जब आप शहद की तलाश में जाते हैं तो आपको यह उम्मीद रखनी चाहिए कि मधुमक्खियां आपको काटेंगी। जल तरंग के समान चंचल इस जीवन में लेस मात्र का भी सुख नहीं है। आज के समाज को आत्मावलोकन की जरूरत है। हमारे समय को चुराने वालों की पहचान करने की जरूरत है। जब तक आप अपने समय को मूल्यवान नहीं मानेंगे, तब तक आप इसके बारे में कुछ भी नहीं करेंगे। समय धन से अधिक मूल्यवान है।  


                                                                       - डॉ नन्दकिशोर साह


कविताः ऐसी क्या मजबूरी है




बिना रिश्तों के यह ज़िन्दगी अधूरी है
रिश्तों का होना ज़िन्दगी में बहुत ज़रूरी है
मर मर कर क्यों जी रहे हैं लोग विचार करो
क्यों भूल गए रिश्तों की एहमियत ऐसी क्या मजबूरी है

माता पिता ने बच्चों को पढ़ाया लिखाया
पेट अपना काट कर उनको खिलाया
उस पढ़ाई से तो थे अनपढ़ ही अच्छे
जिसने मां बाप को बृद्धाश्रम पहुंचाया

अब कहां मिलेगा पुत्र जैसे श्रवण कुमार
जिसने माता पिता पर सब कुछ दिया वार
आजकल कौन रखना चाहता है पुरानी चीजें
माया के इस चक्कर ने कई घर दिए उजाड़

नई पीढ़ी रहने लगी है अब बुजुर्गों से दूर
खो गई जवानी नशे में रहती है हरदम चूर
संस्कार तो जैसे गुम हो गए अंधरे में कहीं
बड़ा बन गया अगर तो भी काहे का ग़रूर


                                           - रवींद्र कुमार शर्मा


पहाड़ी कविता- बदलियां गल्ला




अज्ज कल बदलना लग्गियां
तेरियां गल्लां
तेरे शहरे दे मौसमे सैंई।

अज्ज कल बदलना लग्गा।
तेरा अंदाज
गिरगिटे दे रंगे सैंई।

अज्ज कल बदलना लग्गा
तेरा प्यार
तेरे रुसदे चेहरे सैंई।

अज्ज कल बदलना लग्गा
तेरा व्यवहार
तेरियां नजरा सैंई।

अज्ज कल बदलना लग्गे
तेरे जज्बात
तेरे लफ्जां सैंई।

अज्ज कल बदलना लग्गी
मेरी अहमियत
तेरी बदलिया सोच्चा सैंई।

                                      - डॉ. राजीव डोगरा



08 April 2024

सुहागरात की कल्पनाएं!

मानव समाज में सुहागरात को लेकर इतनी सारी कल्पनाएं बनी हुई हैं, जिनको गिन पाना असंभव है। फिर भी मैं कुछ कल्पनाओं पर बात करूंगा, जो हमारे समाज में अपने पैर जमा चुके हैं। सबसे पहले लड़कों की कल्पनाओं पर बात करते हैं। अक्सर लड़कों के दिमाग में यह बैठा रहता है कि वह सुहागरात के दिन क्या करेगा ? कैसे करेगा ? कही वह पहले ही नाइट फेल तो नहीं हो जाएगा ? क्या वह अपनी पत्नी को खुश कर पाएगा ? 





आदि कल्पनाएं लड़कों के दिमाग में बैठी रहती हैं। इसके अलावा लड़कों के दोस्त लड़के को सुहागरात के दिन एक योद्धा के रूप में देखते हैं। जैसे लड़के को किसी युद्ध में जाना हो और उसे युद्ध को जीत कर आना ही होगा आदि। मगर इन कल्पनाओं से अलग सत्य कुछ और ही है। उस सत्य के बारे में हम अंतिम में बात करेंगे। अब हम बात करते हैं लड़कियों के मन में सुहागरात को लेकर चलने वाली कल्पनाओं के बारे में। लड़कियां अक्सर सुहागरात को लेकर सोचती हैं कि अगर सुहागरात के दिन उनकी योनि से ब्लड नहीं आएगा तो क्या होगा ? कही उनका होने वाला पति उनके चरित्र पर सवाल तो नहीं उठाएगा ? पहली बार सेक्स करने पर कितना दर्द होगा ? क्या वह दर्द मेरे से सहा जाएगा ? कही लड़का हवसी तो नहीं होगा ? जैसे क‌ई कल्पनाएं लड़कियों के मन में चलती हैं।


हकीकत यह है कि सुहागरात के दिन बहुत ही काम लोग ठीक से शारीरिक संबंध बना पाते हैं। इसके पीछे विभिन्न कारण हैं। जैसे- सुहागरात के दिन घर में मेहमानों की भीड़, दुल्हन और दूल्हे का सही से परिचित नहीं होना, दुल्हन-दूल्हे का थक जाना और दोनों का मानसिक रूप से शारीरिक संबंध बनाने के लिए तैयार नहीं होना आदि। वर्तमान में प्रेम विवाह की संख्या लगातार पड़ रही है और ऐसे में अधिकतर लड़के-लड़कियां शादी से पहले ही शारीरिक संबंध बना चुकी होती हैं। इसके अलावा आज शादी से पहले लगभग हर लड़का-लड़की किसी ना किसी के प्रेम संबंध में रहे होते हैं या फिर सोशल मीडिया इत्यादि प्लेटफार्म के माध्यम से सेक्स इत्यादि के बारे में जानकारी प्राप्त कर चुके होते हैं। इसकी बावजूद भी सुहागरात को लेकर हमारे मानव समाज में कई तरह की कल्पनाएं होती हैं। खैर वक्त के साथ-साथ हमारी ये कल्पनाएं भी धीरे-धीरे मर जाएंगी।


                                                                          - दीपक कोहली