साहित्य चक्र

30 September 2022

कविताः मैं किताब हूं


मैं किताब हूं,
सुनाना चाहती हूं अपनी आत्मव्यथा,
मैं आज भी , गर्द में दबी हुई ,
तुम्हारी अलमारी में कराहती हूं,
एक मुद्दत हुई मुझे इसमें कैद हुए,
वो गुलाब के फूल जो तुमने,
मुझमें छुपाकर रखे थे,
उन्हें मरे हुए एक अरसा गुजर गया,
उन मुर्दों को गोद में लिए,
बैठी हुई मैं किताब हूं ।

सिसकती हूं मैं, तुम्हारी अलमारी में,
कभी तो आओ, मुझे बाहर निकालो,
जानती हूं अब  मेरी जगह,
अब आधुनिक उपकरण ने ले ली है ?
पर फिर भी मैं जानती हूं, 
तुम नहीं खा पाओगे उसकी कसम,
जैसे मेरी खा लिया करते थे, 
तुम्हारे आंसुओं को मैं बनकर सोख्ता,
अक्सर सोख लिया करती थी,
शायद तुम मुझे भूल गए,
उसी सीलन में दबी हुई मैं किताब हूं।

तुम्हारे कुछ राज,
आज भी मेरे पिछले पन्नों पर लिखें हैं,
मेरे गर्भ में छुपे हैं कुछ तुम्हारे अनमोल लम्हें 
तुम्हें अब पढ़ने की फुरसत ही कहां है  ?
सिर्फ शोकेस में सजने के लिए मैं किताब हूं ।

                                                लेखिका- मंजू सागर


29 September 2022

कविताः बिखरा हुआ शहर



मेरा प्यारा शहर
कुछ दिनों से
पाँव भारी नारी-सा लगता है।

जिंदगी अचानक कभी ठिठक जाती
सड़क पर
तो कभी रेल गाड़ी
प्लेटफार्म से निकल जाती
बगैर ह्विसिल के।

शहर की कोख में
आने वाले प्रलय के कमजोर बालपन,
चेहरे पर मासूमियत की परत,
ऊपर से सैंकड़ों मर्दों के नाखून
और दांतों की निशानियाँ,
दुष्कर्म और पाशविक रोमांच के
काले धुएँ में अब
डूब गया है मेरा प्यारा शहर।

इस बिखरे हुआ शहर की
चेतना के तट पर अकेला मैं
बाँसुरी बजा रहा हूँ
ओंकार की धून में।

                                                ओड़िआ से अनुवाद- राधू मिश्र जी


कविताः किसी ने चाहा था मुझे



कोई मुझे चाहती थी कल भी,
चाहती है आज भी,
कोई न चाहती थी कल,
न चाहती है आज।

किसीने बरसात में छाता तले
आसरा दिया था,
किसीने छाता खींच
भींगने के लिए छोड़ दिया था,
किसीने अपनी साँसों में
पनाह दी थी मेरे दिल को,
किसीने अपने दिल में
रौंद दिया था साँसों को।

दो नदियाँ आसपास
दूर-दूर लगातार
पास होकर भी कल तक जो दूर थी
आज भी बहुत दूर है,
कल जो करीब थी,
आज भी करीब है।

किसीने कहा नहीं
पेड़ में स्वप्न भी होते हैं
निषिद्ध फल भी होता है।

रास्ता अब तो खत्म होने को है
आकाश की सीमा भी दिखने लगी है
दोबारा मिलें तो ढूंढेंगे, बात करेंगे
बगीचे के उस निषिद्ध फल की।


कविताः वजह-बेवजह रूठना



वजह-बेवजह क्यों बार-बार रूठना,
छोटी-छोटी बातों पर बंधनों का टूटना,
क्यों ना जीवन में समझदारी दिखाएं,
शिष्टाचार, प्रेम और स्वाभिमान
के साथ हो हमारा उठना।


जीवन में बहुत से कार्य और कर्म है,
जिम्मेदारियों के साथ जी रहे हम हैं,
क्यों हर बात पर शिकायत जताए,
यह जिंदगी तो सिर्फ एक भ्रम है।


खफा ना रहे हर वक्त अपनों के साथ,
आक्रोश में ना करें हर वक्त बात,
हर एक से शिकवा गिला रखकर
क्यों बिगाड़े हर पल के हालात।


बार-बार नाराजगी जताना बंद करें,
स्वयं की मानसिक तनाव से थोड़ा लड़े,
हर वक्त लोग और हालात बुरे नहीं होते,
कभी-कभी हम होते हैं खुशहाली से परे।


स्वीकृति अपने जीवन में लाएं,
सभी को दिल खोलकर अपनाएं,
कभी कभी रूठना मनाना चलता है,
हर बात पर आंसू ना बहाए
और बात बात पर आवेश में ना आए।


                                 लेखिका- डॉ. माध्वी बोरसे जी


हिंदी कविताः ठंडी हवाएँ



ठंडी हवाओं में सिकुड़ता हुए नंगा बदन ,
तन पर मैला कुचला सा कुर्ता ,
नंगे पैर , ठिठुरती हुई अभिलाषाएं ,
उसकी खामोशी कुछ कहकर चली जाती है …..

और मैं खोई सी कहीं उसे समझने की कोशिश करती हूं
सड़क पर गाड़ी साफ करता हुआ बचपन ,
मुठ्ठी में लिए कुछ उम्मीदों के सिक्के ,
फिर भी एक गुब्बारे के लिए तरसती आंखें ,
कितना मासूम सा है वो ,
बिना कहे समझा देता है अपना दर्द ,
बेशक वह खामोश है , पर उसके दिल का शोर ,
हजारों सवाल पैदा करता है ।

खाने के एक कौर के लिए वह , ना जाने कितनी बार
हथेलियां फैलाता है ,
रोज एक सपना लेकर फुटपाथ पर सोता है ,
उसी को ओढ़ता है और उसी को बिछाता है ।
वह फिर भी खामोश है ……

उसे उम्मीद है कि जल्दी ही सर्दियां गुजर जाएंगी
गर्मी तो बिना कपड़ों के भी कट ही जायेंगी ,
लेकिन कुछ पैसे बचे तो मैं गुब्बारे खरीदूंगा !
अपने बचपन को थोड़ा सा मैं भी जी लूंगा ।

जीवन शून्य लगता है , जब सपना टूट जाता है ,
किस तरह अभावों में रहकर
एक बचपन का दम घुट जाता है

                                       लेखिका- मंजू सागर 


हिंदी कविताः कहीं किसी रोज



मुझे यकीन है तुम आओगे कहीं किसी रोज़,
मुझे भी मनाओगे दिल से कहीं किसी रोज़।
उम्मीदों के साथ जी रही हूँ तुम्हारी यादों में,
कभी तो मुझे मिल जाओगे कहीं किसी रोज़।

भूल कर तुम मुझे खो गए कहीं वीराने में
एक दिन मुझे ढूंढ़ते आओगे कहीं किसी रोज़ ।
तुमसे लगी है प्रीत मन की सुन लो तुम आवाज
मेरे लब पर मुस्कान आएगी कहीं किसी रोज़ ।

याद करती हूँ तुमसे पहली बार मिलना,
किताबों में रख कर तुम्हारें खत पढ़ना।
भूलती नहीं तुम्हारें किए वादों को मैं,
तुम मुझे याद करते आओगे कहीं किसी रोज़।

मुझे याद आता है तुम्हारा रूठना मनाना अक्सर,
मुझे मनाने तो आओगे तुम कहीं किसी रोज़।
मेरे पसंद के गुलाबों को चुन कर लाते थे तुम,
अंतिम गुलाब देने तो आओगे कहीं किसी रोज़।

पुरानी यादों की निशानियाँ आज भीं रखी है,
तुम्हारा दिए गुलाब किताबों के बीच रखे है।
याद हैं जब तुम खत लिखा करते थे मुझे,
और एक ताजा गुलाब लेकर खड़े रहते थे।
मेरे इंतजार में कि मैं कब निकलूँ उन राहों से,
और तुम राहों में कई गुलाब बिखेर देते थें।
मेरा परिसर में आना तुम्हारा मुझे देख कर,
नज़रे घुमा लेना और फिर से मुझे निहारना।
बड़े दिलकश थे तुम और तुम्हारें हर गुलाब,

आज जब उम्र के अंतिम पड़ाव में हूँ तो,
तुम्हारें दिए गए गुलाब के साथ तुम्हारीं यादें हैं।
मेरे पास बस यही एक पूँजी है तुम्हारीं,
इंतजार रहता है तुम्हारें कदमों की आहट का।

सुनो! जब मैं ना रहूँ तो आना मेरे लिए तुम,
और उस अलमारी में रखे गुलाब की किताब को
रख देना मेरी दाह संस्कार वाली जगह से,
क्यूँकी मैं तुम्हारीं निशानी को ले जाना चाहती हूँ
उस अनंत सफर में जहाँ मैं और सूखे गुलाब हो।


लेखिका- पूजा गुप्ता जी


26 September 2022

लड़कियों को अधिक पोषण की जरूरत क्यों होती है ?




लड़के और लड़कियों दोनों के कुपोषित होने की संभावना लगभग समान रूप से होती है। लड़कियों के लिए, पोषण की मात्रा गुणवत्ता और मात्रा दोनों के मामले में अपेक्षाकृत कम है। जल्दी और कई गर्भधारण से अतिरिक्त बोझ के कारण लड़कियों का स्वास्थ्य भी प्रभावित होता है। पितृसत्तात्मक समाज के कारण, लड़कों को अपेक्षाकृत अधिक पौष्टिक भोजन दिया जाता है क्योंकि उन्हें परिवार का कमाने वाला समझा जाता है, खासकर यदि परिवार गरीब है और सभी बच्चों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने की स्थिति में नहीं है। प्रजनन काल के दौरान महिलाओं की खराब पोषण स्थिति बच्चों के अल्प पोषण के लिए जिम्मेदार है।



कई अध्ययनों के अनुसार, किशोरावस्था जीवन का एक पोषण की मांग वाला चरण है। यद्यपि इस अवधि के दौरान किशोर लड़के और लड़कियों दोनों को भावनात्मक परिवर्तनों का सामना करना पड़ता है, लड़कियों को लड़कों की तुलना में अधिक शारीरिक मांगों का सामना करना पड़ता है और इस प्रकार मैक्रो और सूक्ष्म पोषक तत्वों के अधिक सेवन की आवश्यकता होती है। महिलाओं के कुपोषण को सुधारने के कई सकारात्मक प्रभाव हैं क्योंकि स्वस्थ महिलाएं अपनी कई भूमिकाओं को पूरा कर सकती हैं - आय पैदा करना, अपने परिवार का पोषण सुनिश्चित करना, और स्वस्थ बच्चे पैदा करना - और अधिक प्रभावी ढंग से सभी कार्य करना और इस तरह देशों के सामाजिक आर्थिक विकास को आगे बढ़ाने में मदद करना।


हालाँकि, समाज में, महिलाओं के साथ पारंपरिक रूप से भेदभाव किया जाता है और उन्हें राजनीतिक और परिवार से संबंधित निर्णयों से बाहर रखा जाता है। अपने परिवारों का समर्थन करने और उनके दैनिक योगदान के बावजूद, उनकी राय को शायद ही कभी स्वीकार किया जाता है, और उनके अधिकार सीमित हैं। समाज वास्तव में महिलाओं के अधिकारों को मान्यता देता है, जिसमें राजनीतिक भागीदारी, परिवार भत्ता और व्यवसाय स्थापित करने के अधिकार शामिल हैं। फिर भी, ग्रामीण क्षेत्रों में, गरीबी और जानकारी की कमी महिलाओं की स्वतंत्रता और सशक्तिकरण के लिए वास्तविक बाधाओं का प्रतिनिधित्व करती है।


महिलाएं अक्सर घर के लिए भोजन बनाने और तैयार करने के लिए जिम्मेदार होती हैं, इसलिए पोषण के बारे में उनका ज्ञान या इसकी कमी पूरे परिवार के स्वास्थ्य और पोषण की स्थिति को प्रभावित कर सकता है। संसाधनों पर महिलाओं का नियंत्रण बढ़ाना और निर्णय लेने की उनकी क्षमता सहित अधिक से अधिक लैंगिक समानता को बढ़ावा देना महत्वपूर्ण है। महिलाओं के पोषण में सुधार से राष्ट्रों को तीन सहस्राब्दि विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद मिल सकती है, जिन्हें आमतौर पर विकास प्रगति को मापने के लिए एक रूपरेखा के रूप में स्वीकार किया जाता है।


लड़के और लड़कियों दोनों के कुपोषित होने की संभावना लगभग समान रूप से होती है। लड़कियों के लिए, पोषण की मात्रा गुणवत्ता और मात्रा दोनों के मामले में अपेक्षाकृत कम है। जल्दी और कई गर्भधारण से अतिरिक्त बोझ के कारण लड़कियों का स्वास्थ्य भी प्रभावित होता है। पितृसत्तात्मक समाज के कारण, लड़कों को अपेक्षाकृत अधिक पौष्टिक भोजन दिया जाता है क्योंकि उन्हें परिवार का कमाने वाला समझा जाता है, खासकर यदि परिवार गरीब है और सभी बच्चों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने की स्थिति में नहीं है। प्रजनन काल के दौरान महिलाओं की खराब पोषण स्थिति बच्चों के अल्प पोषण के लिए जिम्मेदार है।


राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण किशोर लड़कियों में एनीमिया में 5% की वृद्धि दर्शाता है। व्यापक राष्ट्रीय पोषण सर्वेक्षण 2019 से पता चलता है कि महामारी से पहले भी, किशोरों के बीच विविध खाद्य समूहों की खपत कम थी। कोविड -19 के नतीजों ने विशेष रूप से महिलाओं, किशोरों और बच्चों के बीच आहार विविधता को और खराब कर दिया है। टाटा-कॉर्नेल इंस्टीट्यूट फॉर एग्रीकल्चर एंड न्यूट्रिशन के एक अध्ययन के अनुसार, कोविड -19 लॉकडाउन के दौरान भारत में महिलाओं की आहार विविधता में 42% की गिरावट आई क्योंकि उन्होंने कम फल, सब्जियां और अंडे का सेवन किया। 

लॉकडाउन के कारण मध्याह्न भोजन का नुकसान हुआ और किशोर लड़कियों के लिए स्कूलों में साप्ताहिक आयरन फोलिक एसिड सप्लीमेंट और पोषण शिक्षा में रुकावट आई। यह स्कूल न जाने वाली किशोरियों को पोषण सेवाएं प्रदान करने में चुनौतियों से जटिल हो गया, जिससे खराब पोषण परिणामों के प्रति उनकी संवेदनशीलता और बढ़ गई। किशोरावस्था अवसर की खिड़की है जहां पोषण संबंधी कमियों को ठीक करने के लिए आहार विविधता की प्रथाओं का निर्माण किया जा सकता है और विशेष रूप से लड़कियों के लिए बहुत आवश्यक पोषक तत्वों के साथ शरीर को फिर से भरने के लिए बनाया जा सकता है। 

वर्तमान में, 80% किशोर सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी के कारण 'छिपी हुई भूख' से पीड़ित हैं। लड़कियों में यह कमी अधिक है क्योंकि वे पहले से ही कई पोषण अभावों से पीड़ित हैं। न केवल आयरन और फोलिक एसिड, बल्कि विटामिन बी 12, विटामिन डी और जिंक की कमी को दूर करने के लिए पहल को मजबूत करने की आवश्यकता है। एनएफएचएस के निष्कर्ष लड़कियों की शिक्षा में अंतराल को बंद करने और महिलाओं की खराब स्वास्थ्य स्थिति को दूर करने की तत्काल आवश्यकता की याद दिलाते हैं। 

वर्तमान समय में इन सेवाओं को सुलभ, वहनीय और स्वीकार्य बनाने के लिए स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े सभी स्वास्थ्य संस्थानों, शिक्षाविदों और अन्य भागीदारों से एकीकृत और समन्वित प्रयासों की आवश्यकता है। विविध आहार स्रोतों और पोषण परामर्श को शामिल के साथ, सरकार की स्वास्थ्य और पोषण नीतियों को विविध आहार और शारीरिक गतिविधियों के मजबूत अनुपालन पर जोर देने की आवश्यकता है। इसमें स्थानीय रूप से खट्टे फल और सब्जियां, मौसमी आहार और बाजरा शामिल करना शामिल है।

इसे आगे बढ़ाने के लिए सामुदायिक कार्यकर्ताओं के घर के दौरे के माध्यम से किशोर लड़कियों के लिए मजबूत पोषण परामर्श, स्वस्थ आदतों और आहार को बढ़ावा देने के लिए स्कूलों में एक मजबूत पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण, आभासी परामर्श और समुदाय आधारित घटनाओं और ग्राम स्वास्थ्य के माध्यम से व्यापक पोषण परामर्श द्वारा पूरक होने की आवश्यकता है। सभी नीतियों और हस्तक्षेपों के साथ, यह सुनिश्चित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि लड़कियां स्कूल या औपचारिक शिक्षा में रहें, उनकी सुरक्षा सुनिश्चित हो और उनके स्वास्थ्य और पोषण को प्राथमिकता दी जाए। तभी इस तरह के उपाय लड़कियों को उनके पोषण और स्वास्थ्य परिणामों में सुधार के अवसर प्रदान कर सकते हैं।


                                                          लेखिका- प्रियंका सौरभ


कविता- बहती नदी सा था वो


उसका प्यार के साथ मेरे जीवन में आना।
था न मेरी खुशी का फिर कोई ठिकाना।
मन ही मन हर पल मैं मुस्कुराती रहती,
और रात रात भर उसका मेरी नींदें चुराना।



मानों था कोई जादू जैसे उसकी बातों में।
खोई सी रहती मैं सदा उसके ख्यालातों में।
गुज़ार लेती थी दिन मैं जैसे तैसे कर भी,
मगर बैचैनी बहुत बढ़ जाती थी मेरी रातों में।

मगर बहती नदी सा था वो कहाँ रुक पाया।
निकल गया आगे कहीं और जा वो समाया।
मैं ही न समझी उसकी मंज़िल कहीं और थी,
अपनी बातों से इतना जो था मुझको भरमाया।

एक छोटे से पत्थर ने कहाँ नदी से दिल लगाया,
नदी की फितरत है बहना खुद ही खुद को सताया।
वो तो न जानें कितने पत्थरों से मिलती है राह में,
मगर बहती तो सदा ही सागर से मिलने की चाह में।

मैं भी वही नदी का एक छोटा सा पत्थर निकली।
जो एक बहती नदी के प्यार में खुद ही गई छली।
न था मालूम मुझे कहाँ नदी मुड़कर देखती है पीछे,
मेरे जैसे कई पत्थरों से टकराती वो तो सदा बहती।

लेखिका- कला भारद्वाज


कविताः खाली हाथ

चवन्नी, अठन्नी के पीछे भागते भागते
रुपयों की तमन्ना में झूलने लगे।




और गुम हुए इतने इसकी चकाचौंध में ,
कि जिंदगी की हैसियत भूलने लगे
ना समय है ना ,फिक्र है अपनों के बाजार में
सिर्फ पैसा ही कमाया है , रिश्तों के व्यापार में।

पैसे हैं तो रिश्ते खुद ब खुद बन जातें हैं ,
वरना अपने भी रूठ जाया करते हैं ,
बड़े नाजुक होतें है कांच की तरह रिश्ते ,
एक हल्की सी ठेस से टूट जाया करते हैं।

ना जाने ये पैसा भी क्या चीज है ?
अपनों को भी दुश्मन बना देता है।

कभी कर देता है सौदा रिश्तों का ,
कभी रिश्तों को दगा देता है।

उम्र गुजर जाती है इस तरह कमाते हैं ,
पैसे की चाह में जीने का समय कहां पातें हैं ?
एक दिन मौत इस तरह आ जाती है कि
सब यहीं रह जाता है और खाली हाथ चले जातें हैं।

लेखिका- मंजू सागर


अंकिता भंडारी की मौत के जिम्मेदार कौन ?


इन दिनों उत्तराखंड अपनी बेटी अंकिता भंडारी की निर्मम हत्या के दर्द से गुजर रहा है। सारा प्रदेश हैरान है कि आखिर आए दिन उत्तराखंड में अपराध क्यों बढ़ रहा हैं ?‌ पहले अल्मोड़ा में सरेआम दिनदहाड़े जगदीश नाम के लड़के की हत्या और अब अंकिता की हत्या का मामला सामने आया है। अंकिता का क्या जुर्म था ? बस इतना कि वह एक गरीब की बेटी थी और उसने रिजॉर्ट के गेस्ट को स्पेशल सर्विस देने से मना कर दिया। आखिर रिजॉर्ट में स्पेशल सर्विस किसे चाहिए थी ? इस रिजॉर्ट में कौन-कौन लोग आते थे और स्पेशल सर्विस में क्या-क्या चीजें उपलब्ध हुआ करती थी ? क्या इस रिजॉर्ट में देह का व्यापार तो नहीं होता था ?





अंकिता भंडारी जिस रिजॉर्ट में नौकरी करती थी, वह रिजॉर्ट आर एस एस और भाजपा नेता विनोद आर्य के पुत्र पुलकित आर्य का था। अंकिता पहले 3-4 दिन गायब रही, फिर अचानक अंकिता की लाश एक नहर में तैरती मिलती है। अंकिता के परिवार ने पुलिस में अंकिता के गायब होने की एफआईआर दर्ज करवाने की कई बार कोशिश की। मगर पुलिस वालों ने अंकिता के परिवार का साथ नहीं दिया। जब मामला मीडिया में आया तब पुलिस से लेकर पूरा प्रशासन एक्शन में आई। सरकार ने वाहवाही के चक्कर में रिजॉर्ट को रातों-रात गिरा दिया। जिससे कई सबूत मिट गए। इसके अलावा पोस्टमार्टम रिपोर्ट को भी पब्लिक करने में प्रशासन ने देरी की। इस पूरे मामले में अलग-अलग कहानियां सामने आ रही है। ऐसे में सवाल उठता है अंकिता भंडारी की हत्या के जिम्मेदार कौन ?

उत्तराखंड में बाहरी लोगों ने जमीन खरीद कर बड़े-बड़े होटल, और रिसॉर्ट, रेस्टोरेंट बनाए हैं। जहां नेता, अभिनेता और अमीर घरों के लोग घूमने आते हैं। इन होटल, रिजॉर्ट और रेस्टोरेंट में देह व्यापार से लेकर नशा, ड्रग्स इत्यादि का कारोबार पहाड़ में फल फूल रहा है। जिससे आए दिन पहाड़ों से महिलाएं, लड़कियां गायब होती जा रही है। इसके अलावा रेप, हिंसा और अपराध बढ़ रहा है। इन सभी चीजों को ध्यान में रखते हुए सवाल यह भी उठते हैं कि इन बाहरी लोगों को किन लोगों ने जमीन बेची और ये सभी लोग किन लोगों की सहायता से नशा और देह का कारोबार पहाड़ों में कर रहे हैं ? इन सभी होटल, रिजॉर्ट और रेस्टोरेंट की उच्चस्तरीय जांच होनी चाहिए।


संपादक- दीपक कोहली

22 September 2022

लेखक या सेल्समैन


आपको क्या लगता है कि आजकल का लेखक एक लेखक है या फिर एक सेल्समैन है ? वर्तमान की परिस्थिति को देख कर ऐसा लगता है कि आजकल एक लेखक वास्तव में लेखक ना होकर बल्कि एक सेल्समैन बन गया है। आज हर कोई अपनी पुस्तक प्रकाशित करने की होड़ में दिखाई देता है। कुछ लोग तो पुस्तक इसलिए भी प्रकाशित कर रहे हैं क्योंकि मार्केट में उनके लिए पैसा कमाने का जरिया बना रहे। ऐसे में सवाल उठते हैं क्या आज लेखक के अंदर निष्पक्षता, सद्भाव और इमानदारी जिंदा है ?





जब से सोशल मीडिया आया है, तब से कई भाषाओं को एक नई ऊर्जा मिली है। आज हर क्षेत्र के लोग अपनी मातृभाषा में लिखना पसंद कर रहे हैं। लेखक दिन-रात कविताएं, आर्टिकल, आलेख, ग़ज़ल, गीत इत्यादि लिख रहे हैं। सोशल मीडिया पर साहित्य से जुड़े कई पेज बने हुए हैं। इन पेजों के जरिए कई लेखक अपने विचारों को रखते हैं। आज लेखकों के लिए एक खुला मंच है। जिसकी लेखनी अच्छी होगी, वह अच्छी कमाई कर सकता है। आज बड़ी-बड़ी कंपनियां भी अपना विज्ञापन हिंदी और अन्य स्थानीय भाषाओं में करना चाहती है। इस कंपटीशन के दौर में लेखक एक लेखक ने रहकर एक सेल्समैन बनता जा रहा है। आज लेखक अपने को बेचने के लिए कुछ भी लिख रहा है। कई लेखक स्त्रियों को कोसते हैं तो कई लेखक पुरुषों को कोसते रहते हैं।


लेखक समाज का आईना होता है और समाज की कमियों को सामने लेकर आता है। आज लेखक सेल्समैन की तरह भाग रहा है। हर दिन एक नई रचना लेकर आ रहा है। उसे नहीं पता वह कौन से रस में लिख रहा है। उसे नहीं पता वह व्याकरणीय रूप से कितना सही और गलत है। आज के लेखकों में आलोचना सुनने तक की क्षमता नहीं है, पता नहीं क्यों! ऐसा लगता है कि वह किसी विचारधारा के आदी होते जा रहे हैं।


इतना ही नहीं बल्कि एक लेखक दूसरे लेखक को ना पढ़ना चाहता है और ना ही सुनना चाहता है। और तो और आज के युवा लेखक पुराने लेखकों को ना जानना चाहते हैं, ना ही पढ़ना चाहते हैं और ना ही समझना चाहते हैं। कभी-कभी लगता है कि लेखक को बाजार ने सेल्समैन बना दिया है। एक रचना को 10 मंचों पर प्रकाशित करना, सभी साहित्य मंचों पर गिने-चुने लोगों को स्थान देना कही ना कही लेखकों के अंदर प्रसिद्धि के भाव को दर्शाता है। आज के दौर में हर लेखक प्रसिद्ध होना चाहता है, भले ही उसकी लेखनी में कोई अर्थ हो या ना हो। इस भाव ने लेखक को सेल्समैन बना दिया है।


-दीपक कोहली