साहित्य चक्र

14 December 2022

कविताः गरीब व्यक्ति




मैंने देखा है दुनिया का कई कोना ,
हर जगह सबका एक ही रोना ।
 जीवन में है धन की कमी,
ज़रूरतें  है काफी बड़ी बड़ी ।

क्या करें एक गरीब इंसान ,
हर कदम पर है कोई न कोई बेईमान। 
ग़रीब की तो ग़रीबी ही है साथी,
दो वक्त की रोटी है उसके लिए काफी ।


 जानने  को तो सब कुछ जानता है,
वक़्त का पहिया सबका घूमता है ।
एक चाय वाले ने संभाला है देश ,
क्योंकि उसने देखा है ग़रीबों का परिवेश |

पैसों का कोई अभिमान न करे,
भविष्य से हैं सभी परे ।
न जाने कब वक्त का पहिया घूमे
राजा से रंक तथा रं क से राजा बने|

निर्धन को समझता है हर कोई छोटा,
उसके गुणों को कोई नहीं देखता।
न जाने कैसे लोगों का हृदय होता ,
धनी निर्धन को अपना अहंकार दिखा ही देता।


                    लेखिका- सिद्धि केसरवानी 


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