साहित्य चक्र

24 September 2026

छायाचित्र आधारित पंक्तियाँ- 25 सितंबर 2026







सुख-दुःख का ताना-बाना बिनते जुलाहा दम्पत्ति।
कातते सूत बनाते वस्त्र यही उनकी पूर्ण सम्पत्ति।

- डॉ. उपासना पाण्डेय


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कपड़ा बुनने वाले जुलाहा हम, दोनों मेहनत करते मिलकर
जब कोई धागा टूट गया तो, एक छोर से बाँध जोड़ कर,
फिर से सूत पिरो कर हम, नए-नए वस्त्र बनाने हम।

- सुमन डोभाल काला


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कमाई

लाखों धागें जोड़ एक कपड़ा बुनते,
कितने सपनें कितने उम्मीदें साथ पिरोते।
उम्र का ताना-बाना, धागों की आवाजाही,
एक दूसरे का साथ ही जिंदगी की सच्ची कमाई।

- सुतपा घोष


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साथी का हाथ पकड़ कर चलना इसी को कहते हैं।
साथी धागे का एक सिरा है पकड़े, तो दूसरा सिरा स्वयं भी पकड़ ले।
जिंदगी की राह कितनी भी कठिन हो।
इस तरह साथ चलने से सफर जिंदगी का कट जाएगा।
- अनुरोध त्रिपाठी


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श्रम की डोर से जीवन संवारते, ताना-बाना रोज़ सजाते।
हुनर की अपनी सुंदर कहानी, बुनकर हैं संस्कृति की निशानी।

- बीना सेमवाल


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मिट्टी से बने घर में कला और संस्कृति देख रहा हूँ।
पगड़ी और माथे पर आँचल में अपना भारत देख रहा हूँ।

- राघवेंद्र प्रकाश 'रघु'


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ना महल, ना जाह-ओ-हशम , बस मिट्टी और हुनर का रिश्ता,
इस छोटे से बरामदे में भारत की असली विरासत देख रहा हूं।

- तौसीफ़ अहमद


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अपनी संस्कृति,अपना पहनावा, अपने प्राचीन रीति रिवाज
यहां है सादगी, मधुरता और रिश्तों की अनुपम मिठास

- प्रवीण कुमार


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धागे नहीं रिश्ते बुन रहे हम,
हो साथ तुम तो क्या है गम।।

- कुणाल


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बांस से बनी वस्तुएं का करता हूं निर्माण, रोजमर्रा के जीवन में आते जो काम।
मेहनत इसमें है बहुत लो जान, फिर भी ना मिलता है हमें उचित दाम।

- चुन्नू साह


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जो कर्म को जीते हैं, आखिर वो कब थकते हैं।
उम्र तो महज़ पड़ाव है, बुजुर्ग ही असल जुड़ाव हैं।

- डॉ. जितेन्द्र बोयल


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अपने जीवन के संघर्षों को धागों में पिरोकर,
हमारी आबरू के सुंदर वस्त्र बुनते हैं बुनकर।

- सूरजमल AkS


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जीवन के धागे सुलझा, संवार कर सजा रहा हूं-
ना थका हूं, ना हार मानी, बस खुद को बुनता जा रहा हूं।

- रोशन कुमार झा


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माटी की दीवारों में बसी है पुरखों की कहानी,
हाथों के हुनर से चलती चरखे की रवानी।
रंग-बिरंगी पगड़ी, लाल चुनर की छांव में,
राजस्थान की माटी बसी है हर एक गांव में।

- नरेंद्र मंघनानी


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हाथ में धागा

धूप-छाँव में बैठा, कर-कर हाथ में धागा,
आँगन में है पल रहा, युगों पुराना ढाँचा।

- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह


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खड्डी बुनकर पेट पालते हैं, अजीब कहानी है भाग्य की,
हाथों में छाले, आँखों में सपने, यही निशानी है भाग्य की।
रेशम औरों के तन पर सजता, हम तो धागों में ही उम्र बिता देते हैं।

- बाबू राम धीमान


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आज की प्रमुख रचनाएँ- 25 सितंबर 2026





देखा है

मैंने देखा है-
बचपन को कुम्हलाते हुए,
भूख से बिलबिलाते हुए।
कूड़े में अपने हिस्से की
जूठन चुनते हुए।

तुम बात करते हो
बस अपने मन की,
उन्हें झूठे दिलासे देते हुए।

मैंने देखा है-
बच्चियों को तन पर,
चिथड़े लपेटे हुए,
खेलने की उम्र में
खिलौने के भाव बिकते हुए।

तुम बात करते हो
आधी आबादी की,
पर सच से मुँह मोड़ते हुए।

मैंने देखा है-
बुढ़ापे को कल की लड़ाई
आज हारते हुए,
सपनों के टिमटिमाते दीप
खुद ही बुझाते हुए।

दवा की खातिर
ज़िंदगी दाँव पर लगाते हुए।

तुम क्या बात करते हो-
उनका हक़ मारकर
खुद पर लुटाते हुए।

मैंने देखा है-
कतारों में खड़ी भीड़ को,
जेबें जिनकी खाली हैं।
कल भी हालत पतली थी,
आज भी वही बदहाली है।

पहले था राम भरोसा,
फिर दिया तुमने दिलासा।
अब बस बातें करते हो,
खुद की जेबें भरते हो-
और कहते हो- सब अच्छा है!

मैंने देखा है-
ललक पढ़ाई की,
चाहत सिंचाई की,
मार महँगाई की।

तुम तो आसानी से
मुँह मोड़ जाते हो,
हर सवाल को टाल जाते हो,
और बात करते हो
बस ढिठाई की।

- रोशन कुमार झा


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भय

जब जब तू पास है आता
इंसान को भीरू है बनाता।
मन में छाई रहती नकारात्मकता
जीवन को मृत्यु की ओर है धकेलता।
हर पल घबराया घबराया सा रहता 
किसी भी कार्य को मन नहीं करता।
शिथिलता, अकेलापन से सामना होता 
आत्मविश्वास भी खोया जाता।
जोर की आवाज जब कहीं से आती
मन में भय की बदली छा जाती।
किसी से बात करने में घबराहट होती
जिंदगी बस एकांतपन को ही ढूंडती।
भय है कुछ ऐसी ही बीमारी
जो सारी खुशियां छीन लेता है हमारी।
भय को स्वयं पर हावी न होने देना
इसके विरुद्ध अभियान जरूर चला लेना।
जहां जहां आत्मविश्वास हुआ नीचा 
भय ने अपनी जड़ों को वहां है सींचा।
जीवन को व्यस्त और खुशनुमा बनाए रखना 
फिर भय जैसे राक्षस को नहीं पड़ेगा देखना।

- विनोद वर्मा


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पहले खुद को खोज

मिल ही जाएँगे तेरे जवाब तुझे,
पहले तू खोज... तुझे जानना क्या है।

दुनिया के सवालों में उलझा है क्यों,
एक बार पूछ..तुझे पाना क्या है।

राहें तो बहुत हैं इस जीवन-पथ पर,
हर राह का अपना ही अफसाना है।

किस ओर चलेगा, यह तय कर पहले,
फिर मंज़िल को भी तो आना है।

दूसरों के आईने में खुद को न देख,
तेरा चेहरा तेरा ही तराना है।

जो भीतर बैठा चुपचाप तुझे देख रहा,
उससे मिलना ही असली खजाना है।

- नरेंद्र मंघनानी


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छोटा हूँ तो क्या हुआ, मन में बड़ा विचार।
बूँद-बूँद से भर रहा, सागर का भंडार।।

नन्हा दीपक क्या करे, पूछे जग संसार।
अँधियारा छँटता वही, जब जले एक बार।।

कद छोटा हो तो रहे, हौसला आसमान।
पर्वत भी झुकता कभी, देखे दृढ़ इंसान।।

कण-कण मिलकर बन गया, धरती का आकार।
छोटा कोई भी नहीं, यदि भीतर है सार।।

बूँद अकेली क्या करे, हँसे अगर संसार।
बूँद-बूँद मिलकर बने, सागर देख अपार।।

चींटी छोटी है मगर, चढ़ती ऊँचा शैल।
मेहनत जिसके साथ हो, जीत उसी का खेल।।

नन्हा बीज दिखे मगर, भीतर वन का राज।
समय मिले तो दे सके, धरती को नव साज।।

छोटी सी मुस्कान में, छिपा बड़ा संसार।
जिसने दिल से दे दिया, उसका ऊँचा प्यार।।

शब्द भले हों चार ही, रखते गहरा मोल।
सच्चे मन से निकलकर, खोलें मन के बोल।।

छोटी सी कोशिश करे, बदल सके हालात।
एक कदम ही खोलता, मंजिल तक की बात।।

नन्ही किरणें भोर की, हरती तम हर बार।
छोटा होकर भी बने, सूरज का आधार।।

माटी का कण क्या करे, सोच रहा हर हाल।
मिलकर वही बना सके, सुंदर भवन विशाल।।

छोटी नाव भँवर फँसी, रखती अपना मान।
जिसके भीतर साहस हो, पार करे तूफान।।

छोटी गलती मानकर, बड़ा बने इंसान।
झुकने वाला ही सदा, पाता सच्चा मान।।

कम साधन से भी रचे, सपनों का संसार।
हिम्मत जिसके पास हो, उसको क्या दरकार।।

नन्हे पंखों से उड़ें, सपने लेकर साथ।
आकाशों की दूरियाँ, बन जाती दो हाथ।।

छोटा हूँ तो क्या हुआ, भीतर मेरा मान।
कर्मों से पहचान हो, यही बड़ी पहचान।।

- डॉ. प्रियंका सौरभ

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पहले गांव था अब है नदी

प्रकृति से करने चला था मुकाबला
बड़ा सा घर रेत की तरह ढह गया
अब तो केवल नदी नज़र आती है वहां
गांव तो तिनके की तरह बह गया

तिनके की तरह उड़ गया टिक नहीं पाया
प्रकृति ने मानव को बहुत समझाया
फिर भी कर रहा अपनी मनमानी
जानबूझ कर सब का कर रहा सफाया

प्रकृति जब लगी अब लेने इंतक़ाम
तब लगा याद आने भगवान का नाम
कल तक जो समझता था खुद को बड़ा
थर थर कांप रहा जब आफत में फंसी है जान

आदमी का कुछ ऐसा ही बन गया है स्वभाव
अपने आपको समझने लगा है नबाब
कुदरत को तो कुछ मानता ही नहीं
जमीन अच्छी नहीं लगती उड़ने के देखता रहता ख्वाब

पहाड़ खोदे,पेड़ काटे सड़कें बनवाई
बैठे बिठाए ले ली प्रकृति से लड़ाई
प्रकृति से मत करो खिलवाड़ सबने समझाया
पर यह बात एहंकारी की समझ में न आई

प्रकृति देती है सबको भरपूर प्यार
बिना बात के नहीं करती कभी किसी से तकरार
लेकिन जब कोई लगे सिर पर बैठकर नाचने
तो देरी नहीं करती झट से देती है उसका भूत उतार

- रवींद्र कुमार शर्मा


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विलय

चंचल बारिश अब आकर
टीस दिल में जगा गई
बिरहन फिर से मचल उठी
नीर भी आग लगा गई।

बैठी नदी के कूल पर
कंधे तेरे रखकर सर
बूँदे झट से बरस पड़ी
कुछ बूँद ठहरी अधर पर।
सन गई अब तो प्रीत से
बूँदे मुझको रिझा गई,
बिरहन फिर से मचल उठी
नीर भी आग लगा गई।

छुआ जो बूँद को तुमने
देख दहके ये तन बदन
नटखट बारिश रह रहकर
बढ़ा रही दिल की धड़कन।
मन पर काबू कैसे हो
रीत मीत को सीखा गई
बिरहन फिर से मचल उठी
नीर भी आग लगा गई।

तेरे वलय में सिमट कर
भीग रही थी बारिश में
प्रेम पयोधि उमड़ पड़ा
बादल की ही साजिश में।
नमी ने बूंदों की मन में
बीज प्रणय की उगा गई।
बिरहन फिर से मचल उठी
नीर भी आग लगा गई।

अब रक्तिम आनन हो गया
काया भी कंचन हो गई
मैं कहाँ रह गई थी मैं
सखे वक्ष वलय में खो गई।
आँचल में लम्हों को रख
जीवन अपना सजा गईं
बिरहन फिर से मचल उठी
नीर भी आग लगा गई।

- सविता सिंह मीरा


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वो कदरदान दोस्ती के हैं।
जो मददगार हर किसी के हैं।

वो हमेशा मिलेंगे मुस्काते,
जो तलबगार हर ख़ुशी के हैं।

टिमटिमाते रहेंगे वो हरदम,
राहबर जो यहाँ सभी के हैं।

आँख से वास्ते निभाते हैं,
अक्स जो दूर रोशनी के हैं।

हैे सभी के लिए दुआ उनकी,
जो निगहबान ज़िंदगी के हैं ।

नाज़ रखते हैं सोचपर अपनी,
वो जिन्हें बात के सलीके हैं।

- नवीन माथुर पंचोली

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हस्ताक्षर

परिणय की मधुर रात्रि में,
दिखाना अपना पौरुष बल
प्रथम मिलन से पहले,
तुम अपने हाथों से उतार देना
मेरी नथ.... मेरा टीका
मेरे कंगन और झुमके
कर देना मुक्त मुझे मंगलसूत्र से,
उतार लेना मेरी गर्दन से
गजरों का भार...
त्यागकर सब मान मर्यादा,
मेरे हाथ में सौंप देना तुम
सिर्फ एक कलम, डायरी
और कुछ किताबें।
थोड़ी सी रोशनी और
ढेर सारा साहस।
डायरी के प्रथम पृष्ठ पर
मैं लिखूंगी अपना भविष्य,
वह भविष्य जहां
मैं अपने पैरों पर खड़ी हो सकूँ!
खुद को एक ऐसी मशाल बना सकूं
जिससे तुम्हारी
कई पीढ़ियां रोशन हों।
द्वितीय पृष्ठ पर लिखूंगी
एक ऐसी परंपरा,
जिसमें मैं बेटी होकर
तुम्हारी तरह,
बिना किसी प्रश्न उत्तर के,
अपने माता पिता की
जिम्मेदारी निर्वाहन कर सकूं।
तृतीय पृष्ठ पर लिखूंगी
कर्तव्य और समर्पण,
जीवन का वह ठहराव,
जहां सिर्फ मैं और तुम
और सिर्फ हम हों।
चतुर्थ पृष्ठ मेरे
प्रेम और धैर्य का प्रत्यक्ष प्रमाण होंगे,
सिंदूर, मंगलसूत्र और बिछिया
ये मेरे किसी अध्याय का हिस्सा नहीं होंगे।
हमारा रिश्ता
इन सब बंधनों का मोहताज नहीं होगा।
उन पृष्ठों पर मुझे केवल
सम्मान लिखना है।
मुझे लिखना है
हर पृष्ठ पर
तुम्हारा अटूट प्रेम और विश्वास...
मुझे पढ़ना है उन्मुक्तता का पाठ,
सामाजिक संस्कृति
में लिपटी हुई स्त्री की पीड़ा
और न्याय,
मुझे पढ़ना है वह हर अध्याय
जहां समर्पित स्त्री
भावनाओं के जाल से निकलकर
खुद का जीवन
खुद के लिए स्थापित करती है।
मुझे लिखने हैं कुछ पन्नो पर
इंद्रधनुष के रंग,
उंगलियों के पोरों पर,
तितलियों के छूटते निशान,
और अंतिम पन्ने पर लिखना है
जीवन का वह पड़ाव,
जब बालों में चांदी बिखरती है,
मैं आऊंगी दो प्याली चाय लिए
तब तुम मेरे चश्में हटाकर
मुझे सहारा देकर कुर्सी पर बिठाना
और फिर मुझे अखबार
पढ़कर सुनाना!
जब ये देह साथ छोड़ देगी
तब तुम टूटना मत!
मुस्कुराते हुए मेरे पीछे चले आना।
अगर तुम मेरे हृदय की
डायरी के इन पन्नों पर
हस्ताक्षर करोगे
तो मैं तुम्हारे साथ जीवनपथ पर
कदम बढ़ाने के लिए तैयार हूं।

- मंजू सागर


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स्मृतियों का मकड़जाल

स्मृतियों के मकड़जाल में फँसा रहता है मानव,
मौत के बाद भी,
जिस्म तो ख़ाक हो जाता है,
पर नाम अटका रहता है यादों में भी,

लोग कहते हैं मरने के बाद सुकून मिलता है,
मगर, सच तो ये है कि वो यहीं भटकता है,
कभी किस्सों में, कभी बातों में भी
और कभी ख्यालों में भी,

उलझ कर रह जाता है मानव
अपनी ही स्मृतियों में,
जैसे कोई परिंदा फँस जाए
कभी कहीं बेरहम हवाओं में,

निकलना भी चाहे तो निकल न पाए,
और उम्र तमाम हो जाती है इन्हीं ख्यालों में,
कचोटती हैं यादें स्मृतियों के झरोखे से,
न सोने देती हैं, न रोने देती हैं,

न आहें और न ही सिसकियाँ भरने देती हैं,
हाथ रख देती है अपना दुखती रग पर
जैसे कोई सूखे ज़ख्मों को फिर से कुरेद दे,
याद आती है तो,ये तस्वीरें जीने नहीं देती,

मौत आती है तो सिर्फ़ साँसें छूटती हैं,
मोह नहीं छूटता,
आदमी तो चला जाता है दुनिया से,
पर दुनिया से उसका नाम कभी नहीं छूटता
- बाबू राम धीमान


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किताबों से दोस्ती

किताबों की दुनिया में खोना चाहता था मैं,
धीरे-धीरे उन्हीं का होना चाहता था मैं।

पर इस डिजिटल दुनिया ने ऐसा जोर दिखाया,
किताबों के पन्नों को दूर भगाया।

पर अब किताबों से कभी जुदा न हूँगा मैं,
हर लम्हा इन्हीं के साए में रहूँगा मैं।

छोड़कर ये चमकती screens की दुनिया,
अब सिर्फ इन पन्नों से ही दोस्ती करूँगा मैं।

पन्नों की इस दुनिया से नया कल बनाऊँगा,
किताबों को चुनकर मैं अपना रास्ता सजाऊँगा।

- साहिल पांचाल


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सूरज की सपने

तुम्हारी मुस्कान आज़ादी से बहती है
तुम्हारी ज़िंदगी आज़ादी से बहती है।
तुम्हारे शब्द गुलाब फैलाते हैं,
और प्यार की खुशबू।
तुम्हारे बगीचे के आसमान से शांति गिरती है
तुम्हारे दिल की बेचैनी हवा
तुम पर वार करती है।
लेकिन देखो,
उस बदमाश का सिर कहाँ है,
वह जलकर राख हो गया है।
वह एक
काला आदमी बन गया है।
उसकी फितरत जलन वाली है दिन-रात,
उसके सिर पर ज़ुल्म
इधर-उधर उड़ता रहता है।
उसकी ज़िंदगी बह जाती है
तुम्हारी मुस्कान से वह डरती है,
तुम्हारी खुशी उसके दिल में डर फैलता है
जब से तुम्हें देखकर उसका दिल कांपता है।
जो तुम्हें फिर से मारेगा,
उसमें बहुत हिम्मत है?
उसे यह देखने दो।
अगर कभी कोई टेढ़ा इंसान
ज़हर फैलाए,
दोनों हाथों से,
हथियार उठा ले।
हरे खेत के आखिर में,
चावल के छोटे दानों से भरा,
लाल शालूक की लाल परछाई
तालाब के पानी में मिल जाए।
जैसे तुम सपने में देखते हो
उस तालाब का पानी,
जैसे सूरज
तुम्हारी आँखों में चमक ला दे।

- निर्मल रॉय


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ज़िंदगी

ज़िंदगी से बड़ा कोई सफ़र नहीं होता,
हर किसी को यहाँ ख़ुद की ख़बर नहीं होता।

भीड़ में उम्र गुज़रती है मुसाफ़िर की तरह,
हर किसी पर किसी चेहरे का असर नहीं होता।

जिसको खोने का हमें उम्रभर डर रहता है,
वक़्त आने पर वही दिल में अगर नहीं होता।

आईना रोज़ हमें चेहरा दिखाता है मगर,
आदमी ख़ुद की हक़ीक़त से बसर नहीं होता।

दर्द चुपचाप सिखाता है ज़माने के सबक़,
हर कोई दर्द में इतना भी हुनर नहीं होता।

मंज़िलें दूर नहीं होतीं कभी राहों से,
आदमी थक के जो रुक जाए, सफ़र नहीं होता।

हमने रिश्तों को बचाया है बहुत कुछ खोकर,
हर कोई रिश्तों में इतना बेख़बर नहीं होता।

जिसको दुनिया ने समझा था कमज़ोर बहुत,
उसके अंदर से कोई इतना कमतर नहीं होता।

वक़्त छीन लेता है सब कुछ मगर ये सच है,
वक़्त से बढ़कर कोई दूसरा रहबर नहीं होता।

मौत आए तो सभी फ़र्क़ मिटा देती है,
कोई अमीर वहाँ, कोई दरिद्र नहीं होता।

ज़िंदगी रोज़ नया रूप दिखाती है हमें,
इससे गहरा कोई आईना मगर नहीं होता।

'शशि', जीना है तो बस इतना समझकर जीना,
हर मिला शख़्स हमेशा हमसफ़र नहीं होता।

- शशि धर कुमार


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जिंदगी

जिंदगी एक सफर है
बस चलते जाना है
किसी पल मिलेगी खुशी
किसी पल मिलेगा गम
हंसते -हंसते जिंदगी का
हर लम्हा जिए जाना है
जिंदगी के सफर में
बस चलते जाना है
कभी यहां मिलेंगे फूल
तो कभी मिलेंगे कांटे
कांटों की चुभन भुला,
तुम्हें हर पल मुस्कुराना है
जिंदगी के सफर में
बस चलते जाना है
रुदन है मरण समान,
हास्य ही जीवन है
अतः मुस्कुराते - मुस्कुराते
जीवन का हर पल बिताना है
जिंदगी के सफर को
जिंदादिली से जिए जाना है

- प्रवीण कुमार


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किसी की याद

हमें किसी की याद आ रही है,
उनकी बातें हमें खुश करती जा रही हैं।
हमें किसी की याद आ रही है।

हर पल ख्याल बस उन्हीं का आ रहा है,
दिल उनसे मिलने को बेताब हुआ जा रहा है।

मजबूरी है कि चाहकर भी मिल नहीं पा रहे,
पर सच तो यह है कि वो बहुत याद आ रहे।

कम से कम एक बार फोन पर तो बात करना चाहते हैं,
सिर्फ आवाज़ ही नहीं, हम तो उन्हें देखना
और मिलना भी चाहते हैं।

यह याद हमें बहुत तड़पा रही है,
हमें उनकी याद बहुत आ रही है।

- साहिल पांचाल


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जीवन की कलाकृति

जीवन भर रिश्तों को साधते रहे,
परिस्थितियों को सँवारते रहे,
कभी स्वयं को थोड़ा पीछे रखा,
कभी अपनों को आगे करते रहे।

कभी समय के साथ झुके,
कभी हालातों से लड़े,
कभी मौन रहकर बहुत कुछ कह गए,
कभी मुस्कुराकर आँसू सह गए।

यूँ ही संतुलन बनाते-बनाते,
जिंदगी की राह कटती गई,
और जब सफ़र का अंतिम छोर आया,
तब समझ आया...
जीवन कोई सीधी रेखा नहीं,
यह तो रिश्तों, त्याग, संघर्ष और प्रेम से
धीरे-धीरे बनती हुई
एक सुंदर कलाकृति है।

जिसमें हर चोट एक रेखा है,
हर रिश्ता एक रंग,
शायद जीवन का सार यही है...
न कुछ व्यर्थ, न कुछ बेकार

- नरेंद्र मंघनानी


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सितंबर की शाम

सितंबर की एक शाम थी,
चन्द्रमा झांक रहा था ठीक मेरे सिर के ऊपर से,
न ज्यादा रोशन, न ज्यादा धुंधला
बिल्कुल तुम्हारी ही याद जैसा,

हवा रुकी हुई थी,
पत्ते भी जैसे सांस रोके सुन रहे थे,
और मैं, उस चाँद में कोई चेहरा ढूंढ रहा था।

शीतलता मिल रही थी मुझे ए चाँद! तेरे दीदार से
जैसे सुकून मिले किसी अपने के प्यार से,
तू भी तो रोज़ उसे देखता होगा न ऊपर से
कहता होगा-कोई मर रहा है तेरे इंतज़ार से,

आँखें पत्थरा गई मेरी ए चाँद! तुझे देखते-देखते
रात ढल गई मेरी तुझमें खोते-खोते,
तू तो हर रात चमकता है किसी और के लिए
और मैं बुझ सा गया तुझे ही देखते-देखते,

देखता रहा मैं तुझे ए चाँद! रात भर,
तेरी रोशनी में बड़े-बड़े पर्वत भी बौने लग रहे थे,
तू इतना ऊँचा, इतना अकेला और इतना विशाल
सारी दुनिया को, फिर भी अपना लग रहा था ,

नज़र आ रहा था मुझे ए चाँद ! शिव-शक्ति बिंदु
तेरे ही माथे पर सजा था जैसे कोई दिव्य सिन्धु,
आधा शिव, आधी शक्ति, तू पूरा हो गया
और मैं तुझे देख के,देख के, खुद में ही खो गया,

चहल-कदमी कर रहा था मैं तेरे पर्वत पर ए चाँद!
लग रहा था जैसे चल रहा हूँ तेरे दिल के करीब,
नीचे दुनिया सो रही थी गहरी नींद में,
और मैं जाग रहा था ए चांद! सिर्फ तेरे नसीब में,

सुन रहा था मैं ए चाँद ! तेरे पानी की छल-छल
जैसे शिव की जटा गुनगुना रही हो कोई ग़ज़ल
हर बूँद में मुझे तेरा ही नूर नज़र आया था
और हर लहर में मेरा ही कसूर था,

हर बूँद में मुझे तेरा ही नूर नज़र आया ए चाँद!
जैसे अंधेरों को फिर से कोई सुरूर नज़र आया,
पानी नहीं था वह, तेरी रोशनी बह रही थी
और मैं प्यासा, उसी में खुद को पा रहा था

मुझे अजनबी समझ के देख रहे थे एस्किमो, ए चाँद!
अपने इग्लू से-कभी देखते, कभी छुप जाते थे,
जैसे तू भी मुझे देखता है-
कभी पूरा, कभी अधूरा, कभी बादलों में छुपा हुआ।

- बाबू राम धीमान


*****


​मिली है उम्र बहुत कम, संभाल कर रखो,
दिलों में बुग़्ज़ ना यूँ पाल पाल कर रखो।

​सफ़र ये एक पल का है, रास्ता भी कठिन,
मोहब्बतों को ज़ाद-ए-सफ़र बना कर रखो।

​अजीब लोग हैं जो  यूं उम्र ज़ाया करते हैं,
दूसरों के दामन पे न मिट्टी उछाल के रखो।

​फ़ेंकोगे कीचड़  हाथ हो जाएंगे गंदे आपके,
कभी तो ख़ुलूस की सूरत सँवार कर रखो।

​किसी को गिराने से तुम बुलंद हो जाओगे बोलो,
अपने क़दम भी तो सीधी राह पे  चला कर रखो।

​ये ज़िंदगी है अमानत, इसे नेकियों में ढालो तुम,
यही चराग़-ए-वफ़ा अपने साथ जला कर रखो।

मुश्ताक़' इन नफ़रतों से कुछ न होगा हासिल,
दिलों में शम्मा मुहब्बत की अपने जला कर रखो।

- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह


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बाजों से वह क्यों डरे, चिड़िया रखती पंख।
हिम्मत जिसके खून में, टूटे हर इक दंभ।।

गिरने का डर छोड़ दे, गिरकर उठना सीख।
ठोकर को हथियार कर, खींच जीत की लीक।।

झूठी ताकत मत दिखा, सच की अपनी धार।
एक अकेला सत्य भी, भारी पड़े हजार।।

मंजिल उनको ही मिले, जो लड़ते हर हाल।
किस्मत बैठी देखती, कर्म बदलते चाल।।

भाग्य भरोसे बैठकर, मत करना अभिमान।
कर्मों से जो जीतता, उसका ऊँचा मान।।

संकट जितना चीखता, उतना बढ़ता जोर।
हिम्मत वाला चुप रहे, फिर करता है भोर।।

दुश्मन चाहे सामने, मन में रखना धीर।
साहस की हुंकार से, काँपे हर जंजीर।।

चिड़िया छोटी देखकर, बाज न करना गर्व।
पंखों में जब आग हो, उड़ान बनती पर्व।।

चिड़ियों से सीखो जरा, पंख नहीं तलवार।
फिर भी रखती आसमां, पूरा वो अधिकार।।

- डॉ. प्रियंका सौरभ


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लज्जा भी हो रही शर्मसार

नफरत की इस भरी बाजार में
फितरत की खुल गई है दुकान
घृणा द्वेष बंद डब्बे में बिक रहा
फिर भी जग में है आज महान

भेंड़चाल क़ी इस कायनात में
लुप्त हो रहे आज सभ्य इन्सान
शराफत बैठ डेवढी में रोता है
लफंगे पाते इस जग में सम्मान

जलालत की इस गंदी नाला में
लम्पट बन बैठा है ढोंगी गुणवाण
मूरख की महफिल में मेरे भाई
धोखेबाज बन बैठा है धनवान

जरायमपेशा की इस दुनियां में
असलेह बना ईमानदार जहान
ईमानदारी आँधी में ढ़ह गई
ईमान का तन हुआ लहू लुहान

बेशरमी की इस संसार में
लज्जा भी हो गई है शर्मसार
कैसे कैसे रंग चेहरे पे हैं आये
फिर भी ये है इस जग में महान

- उदय किशोर साह


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21 September 2026

जयदीप पत्रिका के 10 साल बेमिसाल!

जयदीप पत्रिका की साहित्य, संस्कृति और सभ्यता की खट्टी-मिठ्ठी यात्रा पर लोकप्रिय रचनाकारों की अनमोल टिप्पणियाँ-






जयदीप पत्रिका के दस वर्ष पूरे होने पर संपादक महोदय आदरणीय दीपक कोहली जी व जयदीप पत्रिका के सभी सम्मानित रचनाकारों को हार्दिक बधाई 💐

- मंजू सागर, उत्तरप्रदेश


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जयदीप पत्रिका के इस रूहानी कारवाँ के आदरणीय संस्थापक व संपादक , तमाम सरपरस्तों और सभी मु'अज़्ज़ज़ रचनाकार साथियों को पत्रिका की दसवीं सालगिरह या यूं कहे रचनाकारों की ख्वाबों की सालगिरह पर मोहब्बत-भरी मुबारकबाद।

हम सबकी यही कामना है कि यह कारवाँ यूँ ही महकता और चमकता रहे।
इस पत्रिका में महज़ रचनाओं का प्रकाशन नहीं बल्कि रूहों की सरगोशियाँ और दिलों की तर्जुमानी होती है।

और उससे भी बढ़कर मोहतरम संपादक साहब का हर रचनाकार का एहतिराम , मेरे जैसे तमाम नवरचनाकारों के हौसले को परवाज़ देता है।

पिछले कुछ साल से इस पत्रिका के साथ मेरा भी जुड़ाव रहा है इस आधार पर मैं ये कह सकता हूं कि बिना शोर-शराबे, बड़ी खामोशी से हर मौजू पर अपनी परिपक्वता हासिल की है। यह पत्रिका केवल रचनाओं का संगम नहीं, बल्कि दिलों को जोड़ने वाला वह घर है जहाँ हर नया सदस्य भी उतनी ही गरमी-ए-मोहब्बत पाता है जितने की पुराने ।

अफ़सोस बस इतना कि किसी वजह से मैं हमेशा उतना एक्टिव नहीं रह पाता, लेकिन जितना वक़्त मिलता है, उतना ही दिल से इस सफ़र का हिस्सा बनने की कोशिश करता हूँ, और सदा करता रहूंगा एक उम्मीद के साथ।
💐💐🙏🙏

- तौहिद अहमद, बिहार


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साहित्य का सजग दीप 'जयदीप पत्रिका'

समाज, सभ्यता, संस्कृति, शिक्षा और साहित्य के मार्ग को नवाचारों के साथ आमजन के लिए सर्वसुलभ बनाने वाली लोकप्रिय पत्रिका जयदीप पत्रिका अपने दस बसंत पूर्ण करने पर हृदय की गहराई से बधाई।

जयदीप पत्रिका अपने दशकीय यात्रा में मौलिकता एवं सृजनात्मकता रूपी प्राणों के साथ साहित्य साधना के प्रणपथ पर अविचल निरंतरता पत्रिका की गरिमा को श्रेष्ठता प्रदान करता है।🙏🙏🙏

- जितेंद्र बोयल, राजस्थान


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जयदीप पत्रिका परिवार को दस वर्ष पूर्ण होने पर हार्दिक बधाई एवं अनंत शुभकामनाएँ।

🥰🙏🥰

- राघवेंद्र प्रकाश, बिहार


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‘जयदीप’ पत्रिका के दस वर्ष पूर्ण होने पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ।

एक दशक की यह यात्रा केवल दस वर्षों का सफर नहीं, बल्कि बदलते समय, समाज और विचारों के साथ निरंतर संवाद की यात्रा है। इस दौरान सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, भौगोलिक और तकनीकी क्षेत्रों में व्यापक एवं क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं, जिनसे हम सभी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रभावित हुए हैं।

इन परिवर्तनों के बीच ‘जयदीप’ पत्रिका ने अपनी उल्लेखनीय और सराहनीय भूमिका निभाई है। इसने विभिन्न क्षेत्रों के बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों और विचारशील लोगों के विचारों, आदर्शों एवं अनुभूतियों को एक साझा मंच प्रदान करते हुए स्वस्थ और सार्थक वैचारिक विमर्श को आगे बढ़ाया है।

समय के साथ पत्रिका ने अपने तेवर और कलेवर में बदलाव करते हुए साहित्यिक एवं वैचारिक जगत में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है।

दसवीं वर्षगाँठ पर ‘जयदीप’ को पुनः हार्दिक बधाई एवं उज्ज्वल भविष्य के लिए ढेरों शुभकामनाएँ।

- रोशन कुमार झा, बिहार


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जयदीप पत्रिका के दस वर्ष... एक आत्मीय शुभकामना!

जयदीप पत्रिका परिवार को दस वर्ष पूर्ण होने पर हार्दिक बधाई एवं अनंत शुभकामनाएँ।

किसी पत्रिका की यात्रा केवल वर्षों की गिनती नहीं होती, बल्कि वह उन विचारों, शब्दों और रिश्तों की यात्रा होती है, जो समय के साथ पाठकों के मन में अपनी जगह बनाते हैं।

मेरा जयदीप पत्रिका से जुड़ाव अभी लगभग 7–8 माह का ही है, लेकिन इस अल्प समय में ही मैंने इसे केवल एक पत्रिका नहीं, बल्कि समाज, साहित्य और सकारात्मक विचारों को जोड़ने वाले एक आत्मीय मंच के रूप में महसूस किया है।

यह मेरे लिए भी सुखद अनुभव है कि इस यात्रा का एक छोटा-सा हिस्सा बनने का अवसर मुझे मिला।

आभार!

- नरेंद्र मंघनानी, राजस्थान



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'जयदीप पत्रिका'
मेरे शब्दों का आत्मीय आकाश

साहित्य मेरे लिए केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि अपने भीतर की अनुभूतियों को शब्द देने की एक आत्मीय यात्रा है। जब मन में कोई भाव जन्म लेता है और वह शब्दों का रूप लेकर कागज़ पर उतरता है, तब मन को एक ऐसे मंच की तलाश होती है, जहाँ उन शब्दों को समझने और महसूस करने वाले पाठक मिल सकें। ‘जयदीप पत्रिका’ मेरे लिए ऐसा ही एक आत्मीय साहित्यिक मंच रहा है।

एक ऑनलाइन साहित्य पत्रिका के रूप में ‘जयदीप पत्रिका’ से मेरा जुड़ाव मेरे लिए विशेष अनुभव रहा है। समय-समय पर अपनी रचनाएँ इस पत्रिका को भेजना और फिर उन्हें प्रकाशित होते देखना मेरे लिए हमेशा प्रसन्नता और संतोष का क्षण रहा है। अपनी रचना को पाठकों तक पहुँचते देख ऐसा अनुभव होता है, जैसे मन का कोई अनकहा कोना दूसरों के हृदय से संवाद कर रहा हो।

‘जयदीप पत्रिका’ के दस वर्ष पूरे होना मेरे लिए भी व्यक्तिगत खुशी का अवसर है, क्योंकि इस यात्रा में मेरी रचनात्मक स्मृतियों का एक छोटा-सा हिस्सा भी जुड़ा हुआ है। इस पत्रिका ने केवल रचनाओं को स्थान नहीं दिया, बल्कि लेखकों के शब्दों को सम्मान और पाठकों तक पहुँचने का अवसर भी दिया है।

दस वर्षों की यह साहित्यिक यात्रा यूँ ही निरंतर प्रकाशमान रहे। ‘जयदीप पत्रिका’ वास्तव में साहित्य का वह दीप है, जिसकी लौ में अनेक रचनाकारों के सपने और संवेदनाएँ प्रकाशित हुई हैं।

'जयदीप पत्रिका' को दस वर्ष पूरे होने के शुभ अवसर पर असंख्य धन्यवाद ज्ञापन करती हूं एवं मेरी आंतरिक शुभकामनाएं 'जयदीप पत्रिका' की साहित्य यात्रा निरंतर चलती रहे।

- सुतपा घोष, दुर्गापुर, पश्चिम बंगाल


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नमस्ते आप सभी को 🙏

जयदीप पत्रिका का आरंभ करने वाले विद्वान दीपक जी को समर्पित हमारे अनुभव... हमारे शब्दों के माध्यम से मैं "जयदीप पत्रिका" के 10 वर्ष पूर्ण करने 10 वीं वर्षगांठ पर दीपक जी को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई देती हूं।

मुझे तो लिखना ही "जयदीप पत्रिका" ने सिखाया है, मैं करीब 4 या 5 साल से "जयदीप पत्रिका" से जुड़ी हूं और संपादक महोदय दीपक जी ने हमारा हौसला बढ़ाया। लिखने के लिए प्रेरित करना और उनका व्यवहार सारे रचनाकारों को बहुत ही उम्दा प्रस्तुति करने को प्रेरित करता है l

पत्रिका दिन प्रतिदिन अपनी प्रतिष्ठा पा रही है और एक से बढ़कर एक विद्वानों और विदुषी इस पत्रिका से जुड़ रहे हैं। ये बहुत ही खुशी की बात है क्योंकि पत्रिका तभी सम्मान पाती है, जब अच्छे-अच्छे इंसान अच्छे-अच्छे लेख पत्रिका के माध्यम से साहित्य प्रेमियों को पढ़ने को मिलते हैl

जयदीप पत्रिका दस वर्षों से लगातार निरंतर प्रकाशित हो रही है और इसी तरह प्रकाशमान हो यही कामना है और "जयदीप पत्रिका" की ये यात्रा निरंतर चलती रहे और इस पत्रिका को अपार सफलता मिलेl

मेरा व्यक्तिगत अनुभव तो बहुत ही खूबसूरत रहा क्योंकि मुझे पत्रिका के माध्यम से ही लिखना आया है संपादक महोदय जी ने हमें छोटे-छोटे टॉपिक दिए और फ़ोटो दिए जिसके माध्यम से ही लिखना आया इन्हीं अच्छी कामनाओं के साथ एक बार पुनः बहुत-बहुत बधाई और शुभकामनाएं देती हूं 🙏

- सुमन डोभाल, देहरादून


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जयदीप पत्रिका के दस वर्ष पूर्ण होने पर बधाई सभी को।

मैं तो शायद जयदीप पत्रिका से आरम्भ से ही जुड़ी हूं। इनकी निष्पक्षता की मैं कायल हूं। हर एक कवि को सम्मान देना, उनकी कविता को छापना बिना भेदभाव के तथा यू ट्यूब में समय-समय पर साक्षात्कार करवाना आदि की जिम्मेदारी जयदीप पत्रिका ने बखूबी निभाया है।

भविष्य के लिए शुभकामनाएं देते हुए मुझे बस इतना ही कहना है कि-

"मेरा इतना नाम न होता
अगर तुम न होते।
मैं जग में अनजान ही रहती,
अगर तुम न होते।"

- रत्ना बापुली, लखनऊ


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