साहित्य चक्र

31 January 2023

दोस्ती के महल को यूं न गिराओ




बन गए हो दोस्त से दुश्मन अगर 
तो दुश्मनी का भी कायदा निभाओ
सामने से आकर वार करो
न पीठ पर यूं खंजर चलाओ

करते हो जो निंदा हर महफ़िल में हमारी
क्या हुआ था वह कहानी भी बताओ
तुम भी कसूरवार कम तो नहीं थे
इन हरकतों से अब बाज आ जाओ

कच्ची दीवारों पर खड़े कर दिए थे 
जो दोस्ती के महल उनको यूं न गिराओ
कुछ तो भरोसा रहने देना बचा कर
कि मिलो तो नज़र मिला पाओ

धोखा देने की आदत नहीं गई तुम्हारी
सामने बात करो नज़रों से नज़रें मत चुराओ
बेबफाई का जिक्र हम नहीं करेंगे किसी से
गिर के संभल जाएंगे हम जितना चाहे गिराओ

प्यार मोहब्बत से जलते है रिश्तों के दीपक
नफरत की आग से मत इनको बुझाओ
जाना चाहते हैं जो अपनी कश्ती से दरिया के किनारे
कश्ती को उनकी बीच दरिया में न डुबाओ


                                              रवींद्र कुमार शर्मा


एक लड़की और अपनों का साथ




वो एक लड़की
पैदा हुई
पलने लगी 
बड़े नाजों से
सबने पलकों में अपनी 
सजाया उसे
प्यार से, दुलार से
घर के हर कोने की
बन बैठी
चहकती चिड़िया
हर हाथ बढ़े
उसे सम्भालने को
पर जब
हुई कुछ बड़ी
ये प्यार, स्नेह
ये ममता, ये दुलार
सुरक्षा के लिए
बढ़ते हाथ
लगने लगे भारी
हर बात लगने लगी बुरी
माँ की डांट 
मानो चुभने लगी
पिता का गुस्सा 
खटकने लगा
अनगिनत रिश्ते
और उनके नियम
कुछ चीजों पर लगी रोक 
बुरी लगने लगी
उनका हर पल ख्याल रखना
बोझ लगने लगा
पर क्यूँ... 
क्यूँ ये सब... 
कुछ समझ
माँ की डांट में
तेरी सुरक्षा की चाह
जो है नहीं बुरी
पिता के गुस्से में
तेरा छिपा
आत्मसम्मान है
जो है नहीं गलत
हर रिश्ते ने
जिसने तुझे देखा है
पलते-बढ़ते 
गोद में अपनी
हर उस रिश्ते को
परवाह है तेरी
कांटा तुझे चुभे
दर्द उन्हें होता है
गिर जाये 
गर तू
हाथ उठाने को
उनका बढ़ता है
ना रोका कभी तुझे
पंखों को फैलाने से
ना टोका तुझे कभी
खुली हवा को थामने से
ना बांधी कभी बेड़ियाँ
तेरे आगे बढ़ने पर
फिर क्यूँ  समझ नहीं पाती
अच्छे- बुरे को
क्यूँ दुनियाँ की चकाचौंध
तेरे कदम है डगमगा देती
क्यूँ अपनों को नजरअंदाज कर
लगती है तू चलने
गर्त की राह पर
जहाँ कभी तेरी 
लूटी जाती है अस्मत
कभी जाती है तू बेची
कभी हत्या तो कभी आत्महत्या
कभी जलती हुई
कभी एसिड की शिकार
बनती चली जाती है
गिर जाती है 
खुद की नज़रों में ही
और अंत में
अपने ही आते हैं तुझे याद
वही थामते हैं तुझे
वही संवारते हैं
फिर से तुझे
फिर क्यूँ नहीं समझ पाती तू उन्हें
तेरे और तेरे भविष्य की
उनकी चिन्ता को
बस बहुत हो चुका
खुद को समझ
खुद की महत्ता को समझ
अच्छे- बुरे की पहचान कर
दिखावे से बाहर निकल
अपनों का हाथ थामें
अपने आत्मसम्मान को 
साथ रख
बढ़ ले आगे
जी ले अपनी खुशियाँ
थाम ले अपने 
जीवन की डोर l

                                      - तनूजा पंत


30 January 2023

बच्चे अपंग (आलसी) हो जाएं, इतनी भी सुविधा न दें

सुबह-सुबह स्कूल जाने का समय होते ही ऋषि और रिया में झगड़ा शुरू हो जाता। रीमा एक ओर किचन संभालती, दूसरी ओर राज और बच्चों को नाश्ता कराती। तीसरी ओर मशीन में कपड़े डालती, बर्तन सिंक में डाल कर अपना लंच पैक करती और भागते हुए नौकरी पर जाती। इसमें बच्चों का यह झगड़ा। राज कभी बच्चों के झगड़े में पड़ता ही नहीं था। रीमा कभी इस बारे में राज से कुछ कहती तो उसके पास एक ही जवाब होता था, "मुझे गुस्सा आ जाता है। मार देता हूं तो कहती हो कि बच्चों पर हाथ नहीं उठाना चाहिए।"




उस दिन सुबह से ही ऋषि रिया को परेशान कर रहा था। 'रिया मेरा स्कूल बैग ले आओ। रिया तुम ने मेरा लंच बाक्स क्यों नहीं रखा? रिया तुम ने अपनी वाटर बोटल भर ली, मेरी वाटर बोटल क्यों नहीं भरी?" रिया चिढ़ जाती और मम्मी से शिकायत करती, "मम्मी, भइया को रोको न, मुझे क्यों हैरान करता है ?"

"बेटा तुम अपनी बोटल भरती हो तो उसी के साथ भाई की भर दिया करो। इस तरह झगड़ा मत करो।" रीमा के यह कहने पर रिया तुरंत कहती, "यही बात तुम भाई से भी तो कह सकती हो। वह बड़ा है, बैग भरने में उसे मेरी मदद करनी चाहिए। उसे मेरी वाटर बोटल भर कर देनी चाहिए। हमेशा तुम मुझे ही शांत रहने और काम करने को कहती हो। भाई को तो कुछ नहीं कहती हो। कुछ दिन पहले कामवाली नहीं आई थी तो मैंने घर में झाड़ू लगया था। भाई बैठा टीवी देख रहा था। घर के काम की छोड़ो, वह अपना खुद का भी काम नहीं करता। अब मैं उसका एक भी काम नहीं करने वाली।"

राज ने उसे समझाते हुए कहा, "भाई का थोड़ा काम करने में इतना गुस्सा नहीं किया जाता। तुम दोनों को मिलजुल कर रहना चाहिए।" "पापा, यही बात आप को भाई को भी समझानी चाहिए। इसे केवल छोटी बहन पर हुकुम चलाना आता है।" "यह इतना गुस्सा क्यों कर रही है रीमा? थोड़ा सा काम करने में इतनी किचकिच ? यह सब कौन सिखाता है इसे ?"

"पापा कोई नहीं सिखाता। मैं अपनी सभी फ्रेंड्स के घरो में देखती हूं, सभी लड़कियों को ही काम करने की सलाह देते हैं। जबकि लड़को को भी बराबर काम करना चाहिए। और प्लीज, आप भी थोड़ी मम्मी की मदद किया कीजिए। बेचारी पूरा दिन काम करती रहती हैं।" इतना कह कर रिया घर से तेजी से निकल गई। पर घर का वातावरण तनावपूर्ण हो गया। राज को लगा कि रीमा यह सब सिखाती है। रीमा को लगा कि रिया की बात सच है। ऋषि भी कुछ बोले बगैर चला गया।

वैसे तो यह पूरी बात टीनएज में प्रवेश कर चुके सभी बच्चों की है। एक खास उम्र के बाद बच्चों में सोचने और अपनी मर्जी के अनुसार व्यवहार करने की लालसा तीव्र होती है। सही-गलत के निर्णय करने की समझ भी आ जाती है। ऐसी स्थिति में बच्चे थोड़ा आक्रामक हो जाते हैं। वे जिद करने लगते हैं। अपनी बात को सामने रखते हैं। पर उनकी जिद या बात बिना किसी लाॅजिक की नहीं होती। वे अपने आसपास जो देखते हैं, उसे समझते और सीखते हैं और कोई बात गलत होती है तो उसका विरोध भी करते हैं। उस समय दबाव डालने या अपनी बात जबरदस्ती मनवाने की कोशिश पर बच्चे अधिक आक्रामक हो जाते हैं। वैसे उनकी ज्यादातर बातें सच ही होती हैं और उनकी बातों के पीछे एक निश्चित वजह भी होती है।

जैसे कि रिया की बात सच थी। घर के हर आदमी को हर काम करना चाहिए। लड़का होने से किसी को काम सौंप देने या काम न करने की छूट नहीं मिल जाती। आज के जमाने में किचन का काम हो या घर का कोई अन्य काम, लड़कों को भी सीखना पड़ता है। बच्चे जब तक पढ़ते हैं, मां-बाप उनके सारे काम कर देते हैं। उसमें लड़का हुआ तो उसे तो जैसे सारे कामों से मुक्ति मिल जाती है। 

मम्मी काम करते हुए थक जाती हैं, तब भी लड़के मदद के लिए नहीं आते। घर में एक आदमी काम कर रहा हो और बाकी सब बैठे हों या आराम कर रहे हों तो बड़ा अजीब लगता है। बच्चे घर में पापा या दादा को काम करते देखें तो यह आदर्श परिस्थिति है और ऐसे घरों में लड़के अपने आप काम करने लगते हैं। परंतु जिन घरों में पुरुष यानी पापा या दादा महिलाओं की काम में मदद नहीं करते, उस घर के लड़के उन्हीं का अनुसरण करते हैं और मम्मी के साथ काम करवाने की भावना उनमें विकसित नहीं होती।

बच्चों को सुख-सुविधा देनी अच्छी बात है, पर इतनी अधिक भी नहीं देनी चाहिए कि वे अपंग यानी आलसी हो जाएं अथवा 'यह काम तो मम्मी का है, मेरा नहीं' यह बात उनके मन में बैठ जाए। यह परिस्थिति अनुचित है। बचपन से ही बच्चे को अपने काम करने आने चाहिए और किसी को अकेले काम करता देख कर दौड़ कर मदद करने की आदत होनी चाहिए। ऐसा होने पर बच्चों का उचित विकास होगा और समाज का संतुलन भी नहीं बिगड़ेगा।

                                                    - स्नेहा सिंह 


कविताः आया बसंत




हर तरफ छाया है बसंत की खुमार,
चारों ओर फैला है खुशियों का वातावरण, 
जाड़े से गर्मी की और प्रकृति जा रही हैं,
हर तरफ सरसों का पीला वातावरण है,
मानो धरती माँ ने धानी चुनर ओढ़ रखी है,
बागों में चिड़िया चहक रही हैं,
आम की बोर की खुशबु चारो ओर बिखरी है,
 कलियों  ने भी आखे खोली ,
नई उमंग के साथ प्रकृति इठलाते,
सूरज ने भी गर्मी दे दी ,
हर जगह लाल पीले फूलो की चादर 
बिछी हुई  लगती है ,
मौसम भी मजे ले रहा है, 
हर तरफ उजाला हो रहा है, 
बसंत के मौसम में हर कोई, 
प्रक्रति में खो जाना चाहता है,   
हर कोई उल्लासित है, 
बसंत के मौसम में ,
चारो ओर धुन्ध हट रही हैं,
वैसे ही सबके दिलों से ,
नफरत की धुन्ध हट जाए,
सबके दिलों में प्यार की बरसात हो,
बसंत आया मदमस्त समा लाया।

                                     - गरिमा लखनवी


शीर्षक:- "ये मेरे वतन के लोगों सुनों"




ये मेरे वतन के लोगों सुनों
मैं तुम्हें सुनाऊँ एक कहानी.... 
जो मिट गया भारत माता पर
क्या इसलिए ही थी उसकी जवानी.... 

अपनी माँ के दिल का था वो राजा.... 
देखों कैसे फिर उसके तन पर तिरंगा सजा.... 

तोड़ दी सारी हदें उसनें वतन को चाहने की.... 
नहीं बचीं थी कोई भी जगह गोली खाने की.... 

टूटी होगी चूडियाँ, तो टूटने दो ना.... 
रूठी होगी बहना, तो रूठने दो ना.... 
उन आंसुओं की ममता में मुझे बहनें देना.... 
पिता जो कहें मेरा तो मुझे वही रहने देना.... 

ये मेरे वतन के लोगों सुनों
आओं मैं तुम्हें सुनाऊँ एक कहानी.... 
रक्त बड़ा ईमानदार था उसका
नही था उसमें जरा भी पानी.....

बन के मुस्कान मैं तेरी ये प्रिये, 
तेरे होंठो पर हरदम रहूँगा.....
तुम मुझे पुकार लेना अपने नैनों से
मैं तुम्हारी आवाज बन जाऊंगा.... 

देखों कैसी बोली वह वीर बोल गया.... 
अपना सारा दर्द वह मिट्टी में घोल गया.... 

बहुत शांत था गगन सारा, थी सहमी हुई धरती.... 
चल अब उठ भी जा ये वीर, तुझे तेरी माँ है पुकारती.... 

ये मेरे वतन के लोगों सुनों
आओं मैं तुम्हें सुनाऊँ एक कहानी.... 
वह जीता था वतन के लिए
थी वतन के लिए ही उसकी जवानी.... 


                           आरती सुधाकर सिरसाट


बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी कैसे करें ?






भारतीय शिक्षा प्रणाली में कक्षा 10वीं और 12वीं की बोर्ड परीक्षाएंँ छात्रों के भविष्य के लिए काफी महत्वपूर्ण होती है। कोरोनावायरस महामारी के बीच देश में बोर्ड परीक्षा के बच्चों पर बोझ कम करने के लिए सीबीएसई और बिहार समेत कई बोर्ड परीक्षा का सिलेबस कम कर चुके हैं। बोर्ड एग्जाम डेट शीट और डमी एडमिट कार्ड जारी होने के बाद छात्रों ने बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी शुरू कर दी है। ऐसे में कोरोनावायरस महामारी के बीच बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी कैसे करें ? छात्रों को इसकी जानकारी होना जरूरी है।

इन परीक्षाओं के पैटर्न और मूल्यांकन मानदंड में व्यापक उच्च शिक्षा के लिए छात्रों को तैयार करने के लिए फिर से समय और परिवर्तन किया जा रहा है। हालांकि, वर्ष 2023 में बोर्ड के लिए उपस्थित होने वाले छात्र इतिहास बनाने जा रहे हैं, हाल के वर्षों में एकमात्र बैच होने के लिए, जिन्होंने ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों अध्ययन सामग्री की उपलब्धता और उनके साथ सीमित सामाजिक संपर्क के साथ ऑनलाइन सीखने के कौशल में महारत हासिल की है।

 कोरोना महामारी के साथ, यह आधिकारिक तौर पर 2022 की बोर्ड परीक्षाओं के लिए 2023 के बोर्ड परीक्षाओं को बाधित करने से लेकर सीमा तक निर्धारित है। जबकि बोर्ड की तैयारी में सेल्फ स्टडी को सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया माना जाता है, लेकिन ग्रुप असेसमेंट शीट, स्कूलों और कोचिंग संस्थानों में मॉक टेस्ट देने का श्रेय शायद ही किसी को दिया जाता है।

यह छात्रों को न केवल अंतिम परीक्षाओं, पेपर पैटर्न, प्रत्येक सेक्शन के लिए दिए गए वेटेज का अवलोकन देता है, बल्कि यह उन 3 घंटों के लिए मन की स्थिति में रहने के लिए अनुशासित करता है, जो आसपास मंडराते हैं। अब, सामाजिक गड़बड़ी के साथ, अपनी तैयारी के लिए एकमात्र न्यायाधीश के रूप में नया आदर्श और ऑनलाइन टेस्ट श्रृंखला होने के कारण, इस वर्ष की बोर्ड परीक्षाएं समय, ज्ञान और प्रत्येक छात्र की वृत्ति के बीच एक अनिश्चित विजय होगी।


समय का पाबंद बनो

समय प्रबंधन आपकी सफलता की कुंजी है। यह कथन बोर्ड परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रत्येक खंड को बोर्ड द्वारा सभी उम्मीदवारों के लिए निष्पक्षता से बनाया गया है। कुछ बातों का ध्यान रखना है कि उम्मीदवार को प्रस्तुति, उत्तर में सुसंगतता, सामग्री की प्रासंगिकता और त्वरित समझ शामिल करना है। यह समय लेने वाले वर्गों के बीच करतब दिखाने के बारे में भी है। परीक्षा हॉल में समय का प्रभावी ढंग से प्रबंधन कैसे किया जाता है, यह निर्धारित करने में ज्ञान और आत्मविश्वास बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं। छात्रों को अपने सुझावों पर सभी महत्वपूर्ण विषयों के साथ अभ्यास करने और अभ्यास और संशोधन के साथ इस पर विश्वास करने की आवश्यकता है।


रिविजन को कभी मत छोड़ो

इससे परीक्षा के बाद की चिंता को दूर करने में भी मदद मिलती है। छात्र को हमेशा पूरी उत्तर पुस्तिका के माध्यम से पढ़ने के लिए 10 मिनट का अंतर रखना चाहिए। यह उसके प्रदर्शन के प्रति उसके आत्मविश्वास को बढ़ाएगा और यदि कोई प्रश्न छूट गया तो वह दोहरी जांच के रूप में भी काम करेगा। यह अभ्यास केवल मॉक टेस्ट के दिनों से किया जाना चाहिए, इसलिए तैयारी के दौरान ऑनलाइन पेपर जमा करने से पहले, छात्रों को इसे अच्छी तरह से पढ़ना सुनिश्चित करना चाहिए।


स्थिर और शांत अध्ययन वातावरण बनाएं

एक स्थिर अध्ययन स्थान का होना वास्तव में महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह छात्र को एक सफलता प्राप्त करने में मदद करता है। कुंजी अंतरिक्ष से विकर्षणों को कम कर रही है, वे ध्वनि और दृश्य के रूप में हो सकते हैं। टीवी / संगीत प्रणाली आदि से पृष्ठभूमि शोर के पास एक अध्ययन क्षेत्र होने से बचें। ऐसे समय में जब ऑनलाइन अध्ययन सामग्री ऑफ़लाइन की तरह ही महत्वपूर्ण है, एक अध्ययन क्षेत्र होने पर जहां वाई-फाई कनेक्शन स्थिर है सबसे अच्छा विकल्प है। प्रेरक उद्धरण, प्रेरणादायक व्यक्तित्व के पोस्टर भी चिपकाए जा सकते हैं। अंतरिक्ष को सुव्यवस्थित रखें और इसके लिए संगठित और कार्यात्मक होना चाहिए ताकि दृष्टि पर तनाव को कम करने के लिए छात्रों के लिए पर्याप्त बिजली होनी चाहिए।


अच्छा स्वास्थ्य और व्यायाम जरूरी है

सामाजिक हालतो से इन दिनों की कैद और अलगाव भावनात्मक रूप से थका देने वाला है। एक खुश और स्थिर मानसिकता में रहने का पूरा श्रेय छात्रों द्वारा की जाने वाली गतिविधियों में निहित है। व्यायाम शुरुआत में उबाऊ लग सकता है, लेकिन एक बार जब छात्रों में सक्रियता और बेहतर एकाग्रता जैसे परिणाम सामने आने लगते हैं तो उन्हें स्वस्थ जीवनशैली के लिए आगे बढ़ना चाहिए। फास्ट स्नैकिंग की तुलना में पौष्टिक भोजन की खपत बेहतर है। यह जंक फूड की तरह आकर्षक और सुविधाजनक नहीं हो सकता है, लेकिन शरीर को ऊर्जा और स्थिरता के लिए ज़ोरदार अध्ययन के घंटों से गुजरना पड़ता है जो केवल पत्तेदार सब्जियां, फल, सूखे फल और दूध उत्पादों द्वारा प्रदान किया जा सकता है।


किसी की मदद लेने से डरो मत

चारों ओर हर किसी के लिए समय निस्संदेह कठिन है; हर कोई समायोजन कर रहा है और नए सामान्य में फिट होने की कोशिश कर रहा है। युवा उम्मीदवारों के लिए अपनी संभावनाओं पर संदेह करना और खुद पर संदेह करना आम है। ऐसी भेदी स्थितियों में, एक वयस्क या मित्र का समर्थन प्राप्त करना महत्वपूर्ण है। प्राथमिक कदम अपनी भावनाओं के बारे में खोलना है; कोई भी अच्छा विचार नहीं है। यह आपके शिक्षक की टिप्पणी के रूप में तुच्छ हो सकता है, या आपके प्रतिस्पर्धी मित्र के रवैये में बदलाव, दबाव जिसे आप बढ़ने के बारे में महसूस करते हैं। सब कुछ सरल संचार द्वारा हल किया जा सकता है।

निष्कर्षः इस लेख में बताये गये टिप्स को अगर आप अपने बोर्ड एग्जाम की तैयारी में आज से ही पालन करना शुरू करें तो बोर्ड एग्जाम में 90% से अधिक मार्क्स आसानी से प्राप्त कर सकते हैं, ज़रूरत है तो बस एग्जाम की तैयारी नियमित रूप से करने की और साथ ही साथ अपनी तरफ से बोर्ड एग्जाम की तैयारी में कोई कसर न छोड़ें| आलस्य में चीजों को आगे के लिए मत टालें, इससे सिर्फ नुकसान ही होगा| जो भी पढ़े उसे अच्छी तरह पढ़ें ताकि उसे बार-बार पढ़ने की आवश्यकता न पड़े और बाकि सिलेबस का नुकसान न हो| स्वस्थ आहार और व्यायाम को अपने  दिनचर्या में शामिल करें| टाइम मनेजमेंट पर खास ध्यान दें।


                                             - डॉ.सारिका ठाकुर “जागृति”


कविताः सरगम





तेरे प्यार में सजना, 
तेरी सजनी संँवर रही...

सात स्वरों से सजा है संगीत, 
सात फेरों से सजा है जीवन, 
सात जन्मों तक मिलें सजना तेरा प्यार
तेरे प्यार में सजना, तेरी सजनी सज रही, 

तेरे प्यार में सजना तेरी सजनी संँवर रही...

तेरे प्रेम के धुन में, घर आंगन चहके, 
खिल रही मेरी फुलवारी, तेरे रंग में रंग कर, 
सजना झूम-झूम कर मेरा मनवा नाचे, 

तेरे प्यार में सजना, तेरी सजनी संँवर रही...

मिला जो तेरा साथ साजन, 
जीवन हुआ मेरा सरगम जैसा, 
ना ग़म की परछाई, चारों और ख़ुशियांँ ही छाई, 
चंदन जैसा; सुगंधित पवित्र हुआ हमारा बंधन, 
सजना तेरे प्यार में, तेरी सजनी निखर रही, 

सजना तेरे प्यार में तेरी सजनी संँवर रही...


                                 - चेतना प्रकाश चितेरी


29 January 2023

शीर्षकः होली के बहाने


"दीदी, रमैया कल से काम पर नहीं आएगी अब वह 15 दिन के बाद ही वापस काम पर आएगी।"





मेरे घर में काम करने वाली 18 वर्षीय रमैया की मां सावित्री बाई ने जब मुझे यह बात बोली तो मैं हैरान हो गई ।तब मुझे यही लगा कि शायद रमैया की तबीयत खराब है या उसे कहीं जाना होगा,इसलिए उसने 15 दिन की छुट्टी के लिए कहलवाया है।

परंतु जब मैंने सावित्री बाई के मुंह से रमैया के 15 दिन काम पर ना आने का वास्तविक कारण सुना तो मैं नि:शब्द हो गई!! मुझसे कुछ बोलते नहीं बना।रमैया की मां ने बताया कि होली के दिन उनकी बस्ती में बहुत हुडदंग मचा हुआ था ,सभी बच्चे होली के रंग में सराबोर थे और खूब मौज मस्ती कर रहे थे। उसी दिन रमैया की बड़ी बहन और उसके जीजा जी भी होली खेलने के लिए उनके घर आए थे ।उनके आने से घर में सब बहुत खुश थे।

 होली की मस्ती में मोहल्ले में सब छोटे बड़े मदमस्त होकर नाच गा रहे थे।परंतु,होली खेलते खेलते अचानक रमैया दौड़ी-दौड़ी घर के भीतर आई और अंदर से दरवाजा बंद कर लिया।उसकी यह हरकत देखकर रमैया की मां घबरा गई और उसने तुरंत दरवाजा खटखटाया।परंतु, रमैया ने दरवाजा नहीं खोला। जब सब लोगों ने रमैया को दरवाजा खोलने के लिए कहा तो रमैया ने रोते-रोते दरवाजा खोला। उस वक्त वह बहुत सहमी हुई दिख रही थी और किसी से नजरें भी नहीं मिला पा रही थी ।

रमैया की मां ने उसे अकेले में ले जाकर उसके रोने का कारण जानना चाहा तो पता चला कि उसके जीजा जी ने उसके साथ रंग लगाने के बहाने बदतमीजी की और उसके बहुत मना करने के बाद भी उन्होनें उसे गलत तरीके से छुआ जिसकी वजह से उसके मन में बहुत डर बैठ गया और वह सब कुछ छोड़ कर घर के भीतर आ घुसी।

"रमैया अभी भी बहुत सहमी हुई है दीदी, वह कुछ दिन तक घर से बाहर निकलने के लिए मानसिक रूप से अभी तैयार नहीं है। इसीलिए मैं आपको बताने आई हूं कि वह अभी कुछ दिन काम पर नहीं आएगी।"

 मैंने रमैया की मां को ढांढस बंधाया और समझाया कि चाहे कोई आपका कितना भी करीबी क्यों न हो परंतु अपनी बेटियों की सुरक्षा का पूरा जिम्मा मां-बाप का होता है, इसलिए आइंदा कभी किसी पर भी जरूरत से ज्यादा भरोसा ना करें। मेरी यह बात सुनकर रमैया की मां ने अपने आंसू पोंछे और वहां से चली गई।

समाज के कुछ लोगों की विकृत मानसिकता के चलते हम त्योहारों की पवित्रता को भंग करते हैं जो कि अति शर्मनाक है। ऐसी दुष्ट प्रवृति वाले लोगों का सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए।


                                             - पिंकी सिंघल


04 January 2023

बाल कविता: जाकर करने लगे पढ़ाई





अधेड़  उम्र थी  सन्ता नाम ,
व्यर्थ  घूमना  उनका  काम ।

बच्चे  उनसे  रहते  थे  दूर ,
करते  रहता   सदा  कसूर !

अनपढ़ और  अंगूठा  टेक ,
दया उमड़ती  उनको  देख ।

बिना  टिकट के  बैठे  रेल ,
छ: महीने की भोगी  जेल !

जेल चक्की पीसके  आये ,
लोंगों  ने  बहुत   समझाये !

मोटी  बुद्धि  के  जो  ठहरे ,
बनते  सुनकर मानों  बहरे !

बिना  मास्क  गये  बाजार , 
घुसे  जहां  थे  कई  हजार !

पुलिस की  तब  खाई मार ,
घर आकर के  पड़े  बीमार !

बार - बार  जाता  थे  दायें ,
कितनी बार उन्हें समझायें ?

सभी जगह  मिलती  टोक ,
पड़  गये  तब  गहरे  शोक !

बच्चे  उनको  ताऊ  कहते ,
बहुत  सारे   चिढ़ाते  रहते ! 

कहते निरक्षरता है कारण , 
शिक्षा को किया न धारण !

बोले  कान पकड़कर तब ,
ऐसे काम न  करूंगा अब ।

दी सबने तब  नेक सलाह ,
बोले   इसमें  बहुत  भला ।

प्रौढ़  शिक्षा   ग्रहण  करो ,
ज्ञान  से   मस्तिष्क  भरो ।

बात  यह  समझ में आई ,
जाकर  करने लगे पढ़ाई ।


                                      - डॉ.सुरेन्द्र दत्त सेमल्टी




नए साल पर बदलाव कैसे आए ?


कालचक्र के अधीन सूर्योदय होता है।  सूर्यास्त होता है , फूल खिलते हैं , मुरझा जाते हैं ,  नदियां बहती है , पहाड़ मोन खड़े हैं , हरियाली आती है , पतझड़ आता है , चारों मौसम गुजर जाते हैं.... और फिर से वापस आते हैं  सागर भी अपनी मर्यादा में रहता है ।  मगर एक इंसान ही इस पृथ्वी पर ऐसा प्राणी है ...जो अपनी मर्यादा तोड़ देता है... इंसान जब पैदा होता है ....एक कोरे कागज के समान होता है।  





कहते हैं ...हंसते हुए बच्चे में भगवान मुस्कुराते हैं... धीरे-धीरे वह बड़ा होता जाता है... परिवार से , समाज से ...कई तरह की सकारात्मक और नकारात्मक ऊर्जा ग्रहण करता जाता है। कई तरह के प्रपंच और पाखंडो में फंसता जाता है।  ऐसा माना जाता है कि " इंसान पूजे जाते हैं ...क्योंकि वह रहस्य से भरे हुए हैं ...जिस दिन सारे रहस्य समाप्त हो जाएंगे ...उस दिन से नई खोज शुरू होगी " जानवर भी अपनी  मर्यादा में रहते हैं।  


वह भी प्रकृति के अनुसार चलते हैं और अपने स्वभाव नहीं छोड़ते ...मगर इंसान इसके ठीक विपरीत है।  इंसानों में कई गुण जानवरों के समाहित हो जाते हैं । इंसान अपना भाग्य अपने कर्मों के आधार पर लिखता है। उसके कर्मों के अनुसार ही उसे सुख और दुख दोनों भोगने पड़ते हैं।  " हर दुख में उसके स्वयं  के हस्ताक्षर होते हैं " इंसानों ने अपने कर्मों के आधार पर स्वयं का जीवन नारकीय बना लिया है।  वह स्वयं अपना नरक भोग रहे हैं। " वह अपने ही गुनाहों का सताया हुआ बेजान पुतला है... लोग कहते हैं शहर दर शहर उसे सुकून नहीं "  यह कहावत इंसानों पर उपयुक्त बैठती है। आज का इंसान व्यसनों में इतना डूबा हुआ है कि... इस अनमोल जीवन को वह यूं ही रेत की तरह व्यर्थ ही बहा रहा है।  


जैसे ही नववर्ष आता है ।  अपने आपसे झूठे वादे करता है दिसंबर के बाद जनवरी तो आ जाती है और नववर्ष की शुरुआत हो जाती है प्रतिदिन की तरह नया सूर्योदय भी हो जाता है मगर वह वापस उसी पुराने ढर्रे पर चलता रहता है । इंसान बहुत ही अजीबो गरीब प्राणी है । वह स्वयं को बदलने के लिए मंदिर मस्जिदों में दुआएं मांगता है।  गुजरने वाला पल इंसान को बदलने का अवसर देता है। मगर इंसान स्वयं को बदलने के लिए नए साल पर झूठी कसमें खाता है। 


बहुत अजीब बात है वह प्रति दिन गुजरते हुए सूर्योदय से भी सबक नहीं लेता है।  ना वो सप्ताह से , ना महीने से , साल में एक बार वह कसमें खाकर सोचता है।  अब बदलाव आ जाएगा ,  मगर बदलाव तब तक नहीं आएगा जब तक हुए स्वयं दृढ़ निश्चय ना कर ले। ना किसी नीम हकीम से , ना किसी मंदिर मस्जिद से , ना संतों की वाणी से, उसमें बदलाव आ पाएगा । वह तब ही बदल पाएगा ...जब वह स्वयं निश्चय कर ले ...वही पल उसके बदलने का होगा।  मगर इंसान अपने आपका इतना गुलाम हो गया है... उसे लगता है कि वह बेड़ियों में जकड़ा हुआ है । मगर ऐसा कुछ भी नहीं है।  इंसान से बड़ी शक्ति इस पृथ्वी पर किसी में नहीं है।  इंसान में अपार शक्ति , संभावनाएं छुपी हुई है।  


इंसान के अंदर इतनी उर्जा है ...मगर वह इसका उपयोग नहीं कर पाता और राह से भटक कर गलत राह पर चला जाता है। आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में वह सिर्फ भागा जा रहा है। उसे यह भी नहीं मालूम... वह जिस दिशा में जा रहा है। वह सही है या गलत है... उसे तो फुर्सत से चिंतन करने का , मंथन करने का समय भी नहीं है।  बस भेड़ चाल की तरह चला जा रहा है भीड़ की तरफ भागा जा रहा है। जब तक इंसान दृढ़ निश्चय नहीं करेगा ...उसमें बदलाव नहीं आ पाएगा... उसको कोई भी बदल नहीं सकता , स्वयं ही उसको बदलना पड़ेगा । 


अपनी सोच को विस्तृत करें । जब भी सोचें , बड़ा सोचे ...प्रकृति के करीब जाएं... नदियों को , पहाड़ों को , पेड़ो को ,  खिलते हुए फूलों को निहारे... दूर फैले आसमान को देखें ...अपने बच्चों से , परिवार से प्रेम करें... और सबसे महत्वपूर्ण बात... अपने आप से... स्वयं से प्रेम करना सीखें।



                                 - कमल राठौर साहिल




आइये नव वर्ष में अपनी पसंद को क्षमताओं में बदले।

एक बार चुनाव किसी के दिमाग और दिल से उत्पन्न होता है और अंततः उसकी क्षमताओं में और  उसके निर्णय लेने में परिलक्षित होता है। किसी भी स्थिति के लिए प्रतिक्रिया एक विकल्प और उसके परिणाम के लिए एक आदर्श उदाहरण है। कोई भी इस दुनिया में अनुकरणीय क्षमताओं के साथ पैदा नहीं हुआ है। लेकिन किसी विशेष विषय को चुनना, पसंद से उस पर कड़ी मेहनत करना, इस विषय में दूसरों को टक्कर देना और हराना है और इसलिए यह सब उस एक सामान्य विषय या तत्व को चुनने और उसे अपनी क्षमता में स्थानांतरित करने की पसंद के बारे में है। क्षमता खुली है, अक्सर किसी कार्य को करने या पूरा करने के लिए सटीकता की गति और विधि के रूप में वर्णित किया जाता है जो अन्य की तुलना में बेहतर और तेज और अधिक सटीक होता है। एक व्यक्ति किसी भी क्षमता के साथ पैदा हो सकता है या नहीं लेकिन धीरे-धीरे किसी भी क्षमता को प्राप्त कर सकता है यदि वह उस क्षमता को प्राप्त करने के लिए आवश्यक सभी प्रयास और समय लगाकर ऐसा करना चाहता है। आइये नव वर्ष में अपनी पसंद को क्षमताओं में बदले।






किसी व्यक्ति द्वारा किया जाने वाला चुनाव उसकी निर्णय लेने की क्षमता के बारे में है जो उसके भीतर गहरे में निहित है, जबकि किसी भी समय उसके पास मौजूद क्षमता उस कौशल और विशेषज्ञता का वर्णन करती है जिसे उसने अपने विकास की प्रक्रिया के माध्यम से प्राप्त किया है। यह किसी की पसंद है जो उसकी क्षमताओं को तय कर सकती है लेकिन किसी की क्षमता कभी-कभी किसी की पसंद तय कर सकती है या नहीं। एक बार चुनाव किसी के दिमाग और दिल से उत्पन्न होता है और अंततः उसकी क्षमताओं में और  उसके निर्णय लेने में परिलक्षित होता है। किसी भी स्थिति के लिए प्रतिक्रिया एक विकल्प और उसके परिणाम के लिए एक आदर्श उदाहरण है। कोई भी इस दुनिया में अनुकरणीय क्षमताओं के साथ पैदा नहीं हुआ है। लेकिन किसी विशेष विषय को चुनना, पसंद से उस पर कड़ी मेहनत करना, इस विषय में दूसरों को टक्कर देना और हराना है और इसलिए यह सब उस एक सामान्य विषय या तत्व को चुनने और उसे अपनी क्षमता में स्थानांतरित करने की पसंद के बारे में है।


क्षमता खुली है अक्सर किसी कार्य को करने या पूरा करने के लिए सटीकता की गति और विधि के रूप में वर्णित किया जाता है जो अन्य की तुलना में बेहतर और तेज और अधिक सटीक होता है। एक व्यक्ति किसी भी क्षमता के साथ पैदा हो सकता है या नहीं लेकिन धीरे-धीरे किसी भी क्षमता को प्राप्त कर सकता है यदि वह उस क्षमता को प्राप्त करने के लिए आवश्यक सभी प्रयास और समय लगाकर ऐसा करना चाहता है। पृथ्वी पर जीवन के आगमन से, विभिन्न प्रकार की क्षमताओं के साथ शैलियों और प्रजातियों को जन्म से दिया गया था। जनरल 'लियो' में तेजी से दौड़ने की क्षमता थी और शिकार को जल्दी से टुकड़ों में कुचलने के लिए तेज दांत, लचीली रीढ़ की हड्डी, तेज आंखें और कान, त्वरित प्रतिवर्त क्रियाएं यानी जंगल के राजा होने के लिए वास्तव में अपरिहार्य सभी गुण थे। इसी तरह अन्य विधाएं भी थीं। 
 

लेकिन जंगल में जीवित रहने के लिए आवश्यक उपरोक्त भौतिक गुणों की कमी के बावजूद भी होमो सेपियन्स को इस पृथ्वी के शासक के रूप में क्या बनाया ? यह उनके विकास की प्रक्रिया के दौरान समय-समय पर होमो सेपियन्स द्वारा किया गया विकल्प था औजारों को तेज करना, आग लगाना, भोजन के शिकारी से कृषक बनना या सभी एक साथ हम कह सकते हैं कि संज्ञानात्मक क्रांति (दिमाग का ज्ञान और मस्तिष्क का उपयोग) कृषि क्रांति और अंत में औद्योगिक क्रांति सभी प्रजातियों द्वारा किए गए विकल्पों और निर्णयों के परिणाम  "सेपियन्स" को "समय-समय पर किये गए प्रयासों ने उन्हें अंततः इस दुनिया का शासक बना दिया। सेपियन्स ने अपनी शारीरिक क्षमताओं के बजाय अपने दिमाग को विकसित करने के एक ही विकल्प ने सभी जरूरतमंदों को पूरा किया।


किसी व्यक्ति द्वारा किए गए विकल्प क्षमताओं की प्रयोज्यता का पता लगाते हैं, पॉलिश करते हैं और निर्णय लेते हैं। यह अर्जुन (महाभारत) की पसंद थी कि वह केवल लक्ष्य यानी पक्षियों की आंखों पर ध्यान केंद्रित करे और बाकी के दृश्य को नजरअंदाज कर दे, जिसने उसे अपने अन्य साथी प्रतिस्पर्धियों से तीरंदाजी के क्षेत्र में सबसे अधिक  योग्य बना दिया। दक्षिण अफ्रीका में यूरोपीय शासकों द्वारा किए जा रहे नस्लवाद के खिलाफ और अंग्रेजों द्वारा भारतीयों पर जुर्म के खिलाफ महात्मा गांधी  द्वारा अपनाई गई अहिंसक संघर्ष की क्षमता थी, जिसने बाद में इन विकल्पों और इस तरह की क्षमताओं के आधार पर सब को जीत लिया। सामाजिक स्तर पर यह फिर से वह विकल्प है जिसने मानव के विश्व इतिहास को आकार दिया। फ्रांसीसी क्रांति का मूल स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे विकल्पों में था (ये विकल्प हैं लेकिन क्षमताएं नहीं)। रूसी क्रांति कार्ल मार्क्स के प्रेरित वर्ग संघर्ष और उनके शोषण की धारणाओं से उत्पन्न हुई। जबकि भारतीय क्रांति की जड़ें राष्ट्रवाद के उदय में थीं। राष्ट्रवाद का विकास एक विकल्प है न कि योग्यता।


विश्व इतिहास में हुई सभी प्रमुख घटनाएं जैसे साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद, औद्योगिक क्रांति, प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध (दूसरे पर अपनी जाति की श्रेष्ठता साबित करने का विकल्प) और  वैश्वीकरण के परिणाम के रूप में अर्थव्यवस्थाओं की अन्योन्याश्रय, विश्व अर्थव्यवस्था का एक एकल वैश्विक अर्थव्यवस्था में त्वरित परिवर्तन सभी विभिन्न स्तरों पर और विभिन्न समयों पर चलने वाले विकल्पों के परिणाम हैं। वर्तमान में, कोरोना वायरस कोविड की महामारी प्रदर्शित करती है कि कैसे गलत विकल्प (उदाहरण यूएसए, इटली, स्पेन) एक बार अक्षमता की ओर ले जाता है और जब विकल्प समय पर किए जाते हैं (उदाहरण भारत), क्षमताओं में परिवर्तित हो सकते हैं।

जहां क्षमताओं को विकसित करना है, प्राप्त करना है या खो देना है, चुनाव करना है। क्षमताएं केवल किसी के द्वारा किए गए विकल्पों की उपज हैं और इसलिए एक बार क्षमता अंततः किसी की पसंद को दर्शाती है जबकि किसी की पसंद किसी की क्षमता को प्रतिबिंबित कर सकती है या नहीं। क्षमता आपको एक स्थान पर रख सकती है लेकिन यह अंततः पृष्ठभूमि में किसी की पसंद है जो उस स्थान पर रहते हुए किसी व्यक्ति, समाज, समुदाय या राष्ट्र-राज्य के लिए निर्णय लेने को नियंत्रित करती है। यह हमारी पसंद है जो दिखाती है कि हम वास्तव में क्या हैं। आइये नव वर्ष में अपनी पसंद को क्षमताओं में बदले। 


                                                         - डॉ सत्यवान सौरभ