साहित्य चक्र

27 August 2022

"मेरे बच्चे का प्रथम शब्द"



प्रथम बच्चे का पाँच महीने का गर्भपात टूट गई थी मेरे मन की आस, 
तब तू दोबारा आया मेरी गोद भराई हुई मन हर्षाया।

रातों को जागना नन्हें नन्हें पैरों और हाथो को हिलाना, 
मेरी गोद को झूला समझ कर तुम्हारा प्यार से सो जाना। 

तुम मासूम से हमेशा तुम्हारी नज़रे मुझे ढूंढती थी जब ओझल होती थी। 
इंतजार करती थी कब तुम्हारें कंठ से माँ शब्द निकले, 
जब तुमने मुझे पहली बार मम्म म करके संबोधित किया। 

तब अविरल धारा आँसू की बह निकली थी खुशी से, 
तुमने मुझे पूरा कर दिया था मेरे जीवन में आकर मेरे बच्चे। 

बलैया लेना, चौक बधावा, नानी दादी दादा का प्यार, 
सब धूमधाम से मनाया गया था तुम्हारा जन्मदिन का कार्य। 

तुम्हें पीठ पर लाद कर लोरी सुनाना तुम्हारा पल भर का सोना जागना, 
तुम आये मेरे जीवन का एक नया अध्याय शुरू हुआ। 

तुम्हारी परवरिश में कोई कमी ना हो इसलिए मैंने सोना छोड़ दिया, 
तुम्हारे साथ खेलती तुम संग मैं भी बच्चा बन जाती थी। 

देखो तुम तो अब बड़े हो गए हों पर मेरा मन बच्चा रह गया, 
अब तुम करना मेरी परवरिश तुम्हारें सहारे टिकी है मेरी जिंदगी।


                                                          लेखिका- पूजा गुप्ता


कविताः स्पर्श


एक रोज की बात जब
मेरी दांयी हथेली ने
तुम्हारी बांयी हथेली की
कनिष्ठा, अनामिका, मध्यमा
तीन उंगलियों का स्पर्श महसूसा था,
सिर्फ हथेलियां महसूसतीं
तब तलक ठीक था,
पर रूह तक भीग गयी उसमें
महसूस कर लिया रूह ने भी:
वो स्पर्श,
बस गया है वो स्पर्श,
निष्प्राण होने तक भुलाया नहीं जा सकेगा।
नम कुछ गीला सा- गुदगुदाता हुआ
जिसने छुआ तो हथेली को था,
पर अहसास बन भिगो गया मेरा पूरा वजू़द!
जो दे जाता है अब भी कभी
मेरी यादों में दस्तक
दिल में मीठी चुभन
वो तुम्हारा स्पर्श

लेखिका- अनीता मैठाणी


25 August 2022

कविताः शब्दों के बादल






*एक*

पागल हो जाना
इतना आसान नहीं है
हो गये तो उबरना
और भी मुश्किल है।

*दो*

सब कुछ उड़ जाता हवा में
पर हवा भी देखो कैसी विचित्र है
सभी को तितर बितर कर देती
खुद बैठी रहती चुपचाप।

*तीन*

उस दिन गया था वह
फिर लौटा नहीं,

मैंने लौट कर ऐसा
कौन-सा तीर मार दिया?
इस बार जो जाऊंगा
फिर लौटूंगा नहीं।

*चार*

डर किस बात का?
तेरा अब बचा क्या बेटा
जो समंदर की प्यास लिए
आकाश की ओर मुँह बाये बैठा है?

*पाँच*

था तो बहुत कुछ
पर सब कुछ बिखर गया
सब कुछ उजड़ गया,
बचा सका जो थोड़ा
उसे भी भोग नहीं पाया।


.                                                          अनुवाद: राधू मिश्र


सत्ता का झुनझुना ( व्यंग्य)


   राजनीति में पद की भूख व लालसा नहीं हो तो , राजनीति में फिर लोग क्यों आएंगे ? आज कल राजनीति में आने के लिए  कब्जे धारी, दो नंबर के व्यापारी, गुंडे बदमाश लैंडलॉर्ड ,अनैतिक काम में लिप्त लोग व अन्य कैटेगरी के लोग अपने सुरक्षा कवच के लिए राजनीति में प्रवेश कर नेताओं के कमाऊ बन जाते हैं फिर धीरे धीरे पद लालसा बढ़ती है। 





जुगाड़ बनाना, चापलूसी व छोटे मोटे कार्यक्रमों का खर्च वहन करने की जोखिम के सहारे नेताओं की आवभगत कर ब्लाक, जिले व राज्य स्तर के संगठन में विभिन्न पदों पर जगह बनने के बाद नेताओं के साथ के फोटो आदि से बायोडेटा तैयार कर जयपुर दिल्ली के रास्ते जान कर गोटियां बिठाते है फिर सता का झुनझना बजता है ,झुनझुने की आवाज होते ही सता में बैठे लोग जब चुनाव में डेढ़ दो साल बचते हैं तब सोचते हैं चुनावी चोसर में कार्यकर्ताओं  की नब्ज टटोलते है, सरकार तबादलों में छूट देकर कार्यकर्ता व नेताओं की झुग्गियों के आगे अजीब नजारे  अभिष्नशा से ले जोइनिग तक पेट भराई सता के झुन्नझुने के सहारे से होने के समाचार दबी आवाज में सभी विभागों में सुनने में आते हैं इस झुनझुने से सता के लोगों को पता चलता है कि चुनावी जमीन की जाजम तैयार हो रही है। फिर सता के विभिन्न बोर्डों/आयोगों के गठन का झुनझुना  बजता है ,अब इस झुनझुने की आवाज से पार्टी के आकाओं की परख में उन चेहरों के ( वोट नोट सोट व जनता के बीच छबी के ) पिटारे खुलते हैं। 

यह झुनझुना( सता का झुनझुना) पाने की जुगाड़ में जाति / धर्म / 36 कोम के  तराजू से तोल मोल के गलियारों के पापड़ बेलने पर सता का झुनझुना  देकर चुनाव की जमीन में खाद पानी देने की कवायद शुरू होती है यह सता की भागीदारी का झुनझुना कई चरणों में बजता है , इसके लिए जातियों की बैशाखियां के सहारे कई झरे - कुड़छै अपनी किस्मत आजमाते हैं । कुछ आश्वासनों के झुनझुने से खुश तो कुछ संगठन के पदों के झनझुने पाकर खुश हो  जाते हैं। ये सब अख़बारों में अपने गीत  विज्ञापन से जनता में सता व संगठन के ढोल पीटने लगते  हैं  । इतने में आचार संहिता लागू  हो जाती है सता का सुख भोगने से पहले ही चुनावी माहौल पार्टी को जिताने के झुनझुने को बजाते घूमो।  अब सता में आने के लिए पार्टी के आकाओं से टिकट रूपी झुनझुना प्राप्त करने की बड़ी रेस के बड़े झुनझुने को पाने की दौड़ के घोड़े दौड़ते हैं । 

ये तो आप सब जानते हैं यह झुनझुना बहुत बड़े मोल तोल का होता है , ये झुनझुना पाकर छोटे मोटे पुराने झुनझुने , वोटों के  सौदागरों के झुंझलाए चेहरों को रोंनक  प्रदान करने व  फिर कई प्रलोभनों के झुनझुने गांव /गली /शहर के कोन कोने में कार्यकर्ता रूपी लोगों के हाथों में थमाए जाता है ।ये सता का झुनझुना सता व विपक्ष दोनों के हाथ में बजता है ,जिसका झुनझुना जनता की समझ में आ जाए वह झुनझुना सता के गलियारों तक पहुंचने से पहले ही बाड़े बन्दी में झुनझुना जोड़तोड़ से सरकार बनने तक अनमोल ही रहता है । सता का नशा विष घोलने व कल्याण कारी कामों के झुनझुने भी सुविधानुसार इस्तेमाल करते हैं। हर स्तर पर झुनझुना बजता है चाहे सामाजिक ,धार्मिक  व अन्य संस्थाओं में भी सता के लिए झुनझुना बजाना पड़ता है ।वाह री सता ,वाह रे झुनझुना ।

आजकल तो मत दाता भी ठगा जा रहा है एम एल ए , एम पी जिनको गला फ़ाड़ फ़ाड़ रात दिन एक कर जिताते हैं ,वे भी करोड़ो में बिक सरकार गिराते हैं ।ये सता का झुनझुना सी एम , पी एम भी गला फाड़ कर फेंकते हैं ,जनता जाए भाड़ में रोजगार ,बेरोजगारी , महंगाई न जाने जनता के मुधे किसी को प्रवाह नही अपने धना सेठों को माला माल करने में लिप्त  छोटे मोटे झुन्झूनो को ऐसे बयान देने व देश में अराजकता फैलाने पार्टी के लिए भौंकने का झुनझुना थमा देते हैं, कुछ बड़े झुनझुने स्वागत   विज्ञापनों के सहारे नजदीकियां बनाकर नेताओं के फोन से वारे न्यारे करते हैं ये झुनझुना फिर स्वार्थी ,चापलूस हाजरिए ,दलाल , चमचे ,बिचौलिए व चाटुकारआदि रूपों में  देखने को मिलते हैं । ये नीचे स्तर से ऊपर तक पाए जाते हैं जो सता में हो चाहे विरोध तक के लोग सुख भोग भरिष्टाचार में गहरे डूब जाते हैं । वाह वाह सता के झुनझुने तेरा क्या कहना ।


                                                           लेखक- मईनुदीन कोहरी


मानव समाज को धर्म की जरूरत क्यों है ?



समस्त संसार में मानव ही एक ऐसा प्राणी है, जो इस पृथ्वी के जन्म से लेकर अब तक सबसे अधिक बदला है। मानव ने अन्य प्राणियों के मुकाबले अपना रहन-सहन बदला, खानपान बदला, बोली भाषा बदली और तो और इस पृथ्वी को भी अपने ऐशो आराम के लिए बदल दिया। कभी ऊंची ऊंची इमारतें बनाई तो कभी जमीन को खोदकर खनिज पदार्थ निकाले, कभी समुंद्र में पाइप लाइनें बिछाई तो कभी अंतरिक्ष में सैटेलाइट लॉन्च किए। इतना ही नहीं मानव अन्य जीवों की तरह एक जीव है, इसके बावजूद भी मानव समाज अलग-अलग देश, अलग-अलग धर्म और अलग-अलग जाति में बटा हुआ है। मानव समाज में अनेकों प्रकार कि मानव हैं कोई कमजोर, कोई ज्ञानी, कोई पागल, कोई बुद्धिहीन, कोई लड़ाकू इत्यादि।






धर्म का निर्माण मानव ने स्वयं किया है। इसके कई सबूत मौजूद है, उदाहरण के लिए सिख धर्म, जिसे बना ज्यादा समय नहीं हुआ है। अब सवाल उत्पन्न होता है मानव समाज में धर्म की जरूरत क्यों पड़ी ? धर्म एक प्रकार से किसी स्थान पर जीवों की रहने की व्यवस्था है। जंगल के जानवरों में भी एक व्यवस्था बनी हुई है। शेर को जंगल का राजा यूं ही नहीं कहा जाता है बल्कि शेर के अपने कुछ वसूल होते हैं। जिसमें से एक वसूल है शेर कभी भी दूसरे जानवरों द्वारा मारे गए शिकार को नहीं खाता है और जिस शिकार के पीछे वह भागता है, उसे मार कर ही दम लेता है। जंगल के जानवर भी एक दूसरे जानवरों को मान सम्मान देते हैं। कहीं जानवर तो दूसरे जानवर की सुगंध सूंघकर ही अपना रास्ता बदल लेते हैं। अगर आप करीब से देखेंगे तो व्यवस्था ही आपको धर्म का रूप दिखाई देगी। धर्म ने हम इंसानों को अन्य जीवों से अलग बनाया है। हम इंसान अन्य जीवों के मुकाबले अधिक बुद्धिमान और अधिक ताकतवर है। प्राकृतिक तौर पर कई जीवों से हम कम ताकतवर भी है। आज हम इंसानों ने इतनी शक्ति प्राप्त कर ली है कि हम मंगल ग्रह, चंद्रमा, अंतरिक्ष में भी अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर रहे हैं।


धर्म मानव समाज को अच्छाई-बुराई, अपना-पराया, सही-गलत इत्यादि चीजों का अंतर बताता है। धर्म हमें मां-बाप, भाई-बहन, पत्नी, बेटा-बेटी इत्यादि का रिश्ता देता है। सोचिए अगर धर्म नहीं होता तो क्या मानव समाज में रिश्ते होते ? शायद नहीं। हमें यह तक पता नहीं होता कि हमारे पिता कौन है, भाई कौन है, बुआ कौन है ? धर्म यानी व्यवस्था ने ही हम मानव समाज को इतना आधुनिक बनाया है। धर्म ने ही हमें शिक्षा प्रणाली, स्वास्थ्य प्रणाली, न्याय प्रणाली इत्यादि दी हैं। अगर धर्म नहीं होंगे तो फिर भी हमें ऐसी व्यवस्था की जरूरत होगी जो धर्म जैसी होगी। धर्म और आस्था मानव समाज को कई प्रकार से सहारा देती है।

कल्पना कीजिए दुनिया के सभी धर्म खत्म हो जाए तो मानव समाज कैसा होगा ? अगर दुनिया से सभी धर्म खत्म होते हैं तो मानव समाज एक प्रकार से आदिमानव वाला समाज बन जाएगा। जहां ना कोई रिश्ता होगा, ना कोई त्यौहार होगा, ना कोई शर्म होगी, ना लिहाज होगी। धर्म के बगैर मानव समाज का अस्तित्व खतरे में आ जाएगा। समाज में कई प्रकार की हिंसात्मक गतिविधियां उत्पन्न हो जाएंगे। इसलिए मानव समाज के लिए धर्म कई जगहों पर जरूरी और अहम हो जाता है। हॉं..!धर्म के नाम पर कुछ लोगों ने मानव समाज को भड़काने का काम अवश्य किया है, मगर यह तर्क देना कही ना कही गलत होगा कि धर्म की जरूरत मानव समाज में नहीं है। हमारे मानव समाज को हर उस अच्छाई की जरूरत है, जिससे मानव समाज का विकास और कल्याण हो सकें। धर्म यानी एक व्यवस्था समाज के लिए जरूरी है, पाखंड और अंधविश्वास धर्म और समाज के लिए कैंसर है।


                                                               लेखक- दीपक कोहली


24 August 2022

बेरोजगारी में नंबर वन हरियाणा !



अगर सरकार की मंशा ही है तो आखिर क्यों राज्य में लाखों पदों के खाली होने के बावजूद यहां के औद्योगिक प्रशिक्षण विभाग में आईटीआई  इंस्ट्रक्टर के पदों पर भर्ती नहीं होती? शिक्षकों के खाली पदों को क्यों नहीं भरा जाता? एचएसआईआईडीसी एवं पुलिस  के चयनित उम्मीदवारों को जॉइनिंग क्यों नहीं दी जाती? सरकार को इन बातों का युवाओं को जवाब देना चाहिए। इन सबके अलावा हजारों पद ग्रुप डी के और ग्रुप सी श्रेणी के खाली पड़े हैं और हरियाणा के करोड़ों युवा दिन रात मेहनत कर इन की तैयारियां कर रहे हैं।  सरकार क्यों उनका एग्जाम लेकर तुरंत इन भर्तियों को पूरा करती? क्यों कोर्ट और कर्मचारी चयन आयोग के बीच बार-बार इन भर्तियों को उलझा कर रखा जाता है? और युवाओं को पेंडुलम बनाकर रख दिया है। आखिर सरकार की मंशा क्या है? यहां के मुख्यमंत्री सीधे तौर पर युवाओं से संवाद क्यों नहीं करते? उनकी समस्याओं को क्यों नहीं सुनते? उनके प्रश्नों का जवाब क्यों नहीं देते ?






आज हरियाणा देशभर में बेरोजगारी में कई सालों से पहले स्थान पर है। देश और प्रदेश में बेरोजगारी और महंगाई लगातार बढ़ती जा रही है। हरियाणा बेरोजगारी में 35.1% के साथ देश में पहले स्थान पर है। प्रदेश में 18 से लेकर 40 वर्ष तक का हर दूसरा युवा बेरोजगार है। हरियाणा की इस उपलब्धि में सीधा-सा सरकार का हाथ है, कई सालों से यह छोटा-सा राज्य पहले स्थान पर काबिज है। हरियाणा में लाखों पदों की रिक्तियों के बावजूद साल 2014 से क्यों तरस रहे हैं नौकरी के लिए युवा? कौन जिम्मेदार है। क्यों विभिन्न विभागों में लाखों पदों के खाली होने के बावजूद सरकार की मंशा नहीं है कि इन पदों को भरा जाए। और न ही हरियाणा सरकार के विभिन्न विभागों को चिंता कि वह सरकार से इन पदों को भरने के लिए कहे।


दिल्ली से लगे हरियाणा राज्य में भर्तियों का हाल यह है कि साल 2014 से विज्ञापित बहुत से  पदों का परिणाम आज तक जारी नहीं हुआ। अगर कोई परिणाम जारी हो भी गया तो वह भर्तियां कोर्ट में लटकी हुई है। चयनित आवेदक जॉइनिंग को लेकर तरस रहे हैं। शिक्षा विभाग में पिछले 8 सालों में कोई भर्ती नहीं हुई है जबकि हरियाणा के लाखों युवा हर साल राज्य पात्रता परीक्षा पास करते हैं। इस आस में कि वो एक दिन अध्यापक बन कर देश के सुनहरे भविष्य का निर्माण करेंगे। मगर अब तो उनका खुद का भविष्य अंधकार में खो गया है।  हरियाणा में भर्ती प्रणाली और कर्मचारी चयन आयोग की कार्यशैली कि बानगी देखिए। पारदर्शिता के नाम पर यहां रोज नए- नए नियम बनाए जाते हैं तो कभी कॉमन भर्ती टेस्ट के नाम पर युवाओं को बहलाया जाता है। तरह-तरह के सब्जबाग दिखाए जाते हैं। बेरोजगार युवा उनका पीछा करते हैं मगर आखिर हाथ कुछ नहीं लगता।


 आज हरियाणा के युवाओं की स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि यहां के करोड़ों युवा पहले तो खाली पदों के लिए विज्ञापन के लिए सरकार से प्रार्थना करते है, बात नहीं बनती तो मजबूरी में आंदोलन करते हैं। सही समय पर पेपर नहीं होते तो फिर उनके एग्जाम के लिए आंदोलन कर सड़कों पर आते हैं। पहली बात तो एग्जाम होता ही नहीं, होता है तो बार-बार लीक होता है। अगर कोई एग्जाम पूर्ण हो भी जाता है तो उसके परिणाम के लिए आवेदक सालों तक इंतजार करते हैं या फिर राजनीतिज्ञों की कोठियों पर चक्कर लगाते हैं। अगर परिणाम जारी भी हो जाता है तो जॉइनिंग के लिए सालों तक इन बेरोजगार युवाओं को इंतजार में बैठा रहना पड़ता है या फिर वही भर्तियां ऐसे मोड़ पर लाकर कोर्ट में उलझा दी जाती है।


उदाहरण के लिए यहां के औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों में लगभग 3000 पदों की इंस्ट्रक्टर की भर्ती पिछले 9 सालों से पेंडिंग है। युवाओं के अथक प्रयासों के परिणाम स्वरुप कुछ पदों का परिणाम जारी हुआ है, मगर जॉइनिंग उनकी भी नहीं हुई । यही नहीं मुख्य ट्रेड वाली बड़ी भर्ती का परिणाम अभी भी कर्मचारी चयन विभाग ने रोका हुआ है। एक-एक, दो-दो पोस्ट वाली कैटेगरी का परिणाम जारी करके ये कह दिया कि हम लिस्ट दे रहें है।  भर्ती के नियमों में स्पष्टता के अभाव में भर्तियां कोर्ट और आयोग के बीच झूलती रहती है। आखिर क्यों आयोग विज्ञापन जारी करते हुए स्पष्ट नियम नहीं बनाता। आखिर उनकी मंशा क्या है? क्यों युवाओं को बेरोजगारी के साथ-साथ कोर्ट और आयोग के बीच पीसना पड़ रहा है ? स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि कॉमन टेस्ट के नाम पर हरियाणा के लाखों युवा एग्जाम के इंतजार में घर बैठे हैं लेकिन सरकार है कि समझती ही नहीं।


आखिर क्यों हरियाणा सरकार को अपने द्वारा की गई एक -दो छुटपुट भर्तियों की ही जांच बार-बार करनी पड़ रही है? हरियाणा सरकार की दो ऐतिहासिक भर्तियां ग्रुप डी और क्लर्क कि आए दिन जांच बैठती है। ग्रुप डी को तो वोट बैंक का जरिया कहा जाए तो अतिश्यक्ति नहीं होगी  क्योंकि यह भर्ती पिछले चुनाव से थोड़े दिन पहले रातों-रात बिना किसी वेरिफिकेशन के आनन-फानन में की गई थी। कुछ ऐसा ही हाल क्लर्क  की 5000 पदों की भर्ती का हुआ जिसका संशोधित परिणाम अब सालों बाद जारी हो रहा है। जिसके परिणाम स्वरुप हज़ारों युवाओं का भविष्य अंधकार में खो गया है, गलती करें कोई, भरे कोई।  


हरियाणा पुलिस में हर साल हजारों पदों की भर्ती का ढिंढोरा पीटने वाली सरकार पिछले 3 साल से चल रही कॉन्स्टेबल की भर्ती को भी पूरा नहीं कर पाई है। इस भर्ती के लिए लाखों युवाओं ने मेहनत की, लेकिन यह भर्ती आज भी सरकार की मंशा के अभाव में पूर्ण नहीं हुई है। आलम यह है कि हरियाणा के हर विभाग में लाखों पद खाली है लेकिन सरकार इन पदों को भरना नहीं चाहती। तभी तो हरियाणा रोजगारी में नंबर वन है। अगर ऐसे ही चलता रहा तो वह दिन दिन दूर नहीं जब हरियाणा बेरोजगारी के साथ-साथ चोरी, लूट और अन्य आपराधिक घटनाओं में  में नंबर वन पर होगा।


हरियाणा सरकार के एचएसआईआईडीसी में निकली 200-300 पदों की विभिन्न श्रेणियों की भर्तियां आज चयन के बावजूद जॉइनिंग के लिए तरस रही है।  आखिर क्यों वहां के विभागाध्यक्ष और सरकार इन युवाओं को जॉइनिंग नहीं दे रहे। इसमें युवाओं की क्या गलती है कि वह चयन  के बाद भी सालों तक घर बैठे जॉइनिंग का इंतजार कर रहे हैं। परिणाम यह है कि आज यहां का पढ़ा लिखा युवा नौकरी के अभाव में अपना घर बसाने को तरस रहा है क्योंकि भर्तियां नहीं होने की वजह से युवा लगातार तैयारी करते रहते हैं। उम्र बढ़ती जाती है और वह रोजगार के अभाव में शादी के लिए सही समय पर सोच नहीं पाता।


हर साल हर साल प्रदेश के लाखों युवाओं को अध्यापक पात्रता परीक्षा के नाम पर लूटा आ जाता है लेकिन शिक्षकों भर्तियां नहीं निकाली जाती। भर्ती नहीं तो पात्रता परीक्षा क्यों ? आलम यह है कि आज शिक्षकों के लाखों आवेदकों की राष्ट्रीय पात्रता सर्टिफिकेट की वैधता समाप्त होने के कगार पर है, बार-बार परीक्षा पास कर वो थक चुके है, टूट चुके है।  शिक्षकों के हज़ारों पद खाली होने के बावजूद न तो यहां का शिक्षा विभाग और न ही यहां की सरकार इन पदों को भरने का सोच रही है। उल्टे यहां के हजारों सरकारी स्कूलों पर बंद होने की नौबत आ गई है। आखिर क्या होगा गरीब और निचले  तबके के बच्चों का और नौकरी की आस में बैठे  हरियाणा के मेधावी और शिक्षित युवाओं का।


देखे तो पिछले 8 सालों में यहां की सरकार के द्वारा स्वास्थ्य विभाग में नाममात्र के कुछ पदों को भरने के अलावा किसी भी विभाग में कोई भर्ती अच्छे से पूर्ण नहीं हुई है। जिससे युवाओं को संतोष हो।  स्वास्थ्य विभाग में हुई भर्तियों को वक्त का तकाजा कहे या सरकार की मजबूरी क्योंकि कोरोना काल की वजह से इनको पैरामेडिकल स्टाफ की भर्तियां मजबूरी में करनी ही पड़ी और यह भर्तियां भी आवेदकों के सड़कों पर उतरने के बाद पूर्ण हुई है। आखिर क्यों यहां के मुखिया ने युवाओं को सड़कों पर उतरने मजबूर कर दिया है?  युवा आज अपने हकों के लिए हरियाणा सरकार के विरोध में आ खड़ा हुआ है। सरकार को सोचना होगा, सोचना ही नहीं उनकी परेशानियों का हल ढूंढना होगा। तभी एक स्वर्णिम हरियाणा का निर्माण कर पाएंगे।  


                                      लेखिका-प्रियंका सौरभ 


कविताः तेरी आँखें...




तेरी ये आंखें बोलती हैं बहुत कुछ, 
दिखता है हर पल प्यार तेरा इन आँखों में, 
विश्वास की अनौखी लकीर देखकर, 
डूब जाने को मन करता है इन आँखों में l

दु:ख का साया हो या सुख की घड़ी, 
खोजती मेरा ही साथ हैं ये तेरी आँखें, 
अपनी इस अहमियत को देख, 
समा जाने को मन करता है इन आँखों में l

कितना भी छिपाना चाहूँ अपने गम,पर
खोज ही लेतीं हैं ये तेरी आँखें, 
मेरी इस परवाह को देख
वारी-वारी जाने को मन करता है इन आँखों में l

जिन्दगी की हर जद्दोजहद में
मुझसे दूर नहीं होती हैं ये तेरी आँखें
तेरी इस दिवानगी को देख
दिवाना हो जाने को मन करता है इन आँखों में l

 
                                                                    लेखिका- तनूजा पंत


सोनाली फोगाट की हत्या या हार्ट अटैक !


 देश में राजनीतिक हत्याओं का दौर नया नहीं है ?

अब्राहम लिंकन, जॉन एफ कैनेडी, इंदिरा गांधी और बेनजीर भुट्टो की जीवन ज्योति उनके राजनीतिक जीवन के चरम पर बुझा दी गई। आजादी के बाद से राजनीतिक हत्याओं का दौर भारत के राजनीतिक जीवन को भी लहूलुहान करता आया है। भारत को आजादी मिले छह महीने भी नहीं हुए थे कि महात्मा गांधी की हत्या ने दुनिया को हिला दिया। वर्ष 1953 में कश्मीर की शेष भारत के साथ एकता का आंदोलन करने वाले डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की श्रीनगर की जेल में रहस्यमय मृत्यु हो गई थी। वंशवादिता में राजनीति का कमान मिलना वंशपरंपरा के अधीन रहता है तो दूसरी ओर संपर्कवादिता के जरिए किसी बडे राजनेता के संपर्क में आने से राजनीतिक कमान प्राप्त करने की अभिलाषा पूर्ण हो जाती है। कहावत है कि "राजनीति एक गंदा खेल है"।







हरियाणा की बीजेपी नेत्री सोनाली फोगाट की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई. डॉक्टर्स ने मौत का कारण दिल का दौरा पड़ना बताया है लेकिन परिवार ने दावा किया है कि सोनाली फोगाटकी हत्या हुई है. सोनाली की बहन रुपेश ने मीडिया से बताया है कि उन्होंने मौत से पहले ही अपनी मां से फोन में बात की थी और कहा था कि 'खाने में कुछ गड़बड़ है, जिसका असर मेरे शरीर में पड़ रहा है'  सोनाली फोगाट के परिवार का कहना है कि यह मौत नहीं बल्कि हत्या है और इसकी जांच सीबीआई को करनी चाहिए। सोनाली फोगाट का मर्डर हुआ या हार्ट अटैक से उनकी जान गई यह अब जांच का विषय बन गया है. सोनाली की बहन ने कहा है कि रविवार को ही सोनाली की उनकी माँ से बात हुई है. वह बिल्कुल ठीक थी और अपने फार्म हाउस में थीं. लेकिन माँ से उन्होंने कहा था कि उन्हें अपने शरीर में कुछ गड़बड़ लग रही है जैसे किसी ने मेरे साथ कुछ किया हो.  शाम को भी सोनाली की अपनी माँ से बात हुई थी. जिसमे उन्होंने कहा था 'मेरे खिलाफ साज़िश रची जा रही है. 22 से 25 अगस्त तक सोनाली फोगाट गोवा टूर में गई हुई थी. काम के सिलसिले में वह मुंबई से गोवा गई थीं. लेकिन जिस दिन वो वहां गईं ठीक उसी दिन की रात सोनाली की हार्ट अटैक से मौत हो गई. सोनाली की एक बेटी है जो अब अनाथ हो गई है क्योंकि कुछ सालों पहले ही सोनाली के पति की भी मौत हो चुकी है. आखिर इस नेता का क्या हुआ ये तो वक्त ही बताएगा. मगर देश में राजनीतिक हत्याओं का दौर नया नहीं है।

आज़ादी से पहले  पुणे के लोगों द्वारा उठाए गए अन्याय को समाप्त करने के लिए, चापेकर भाइयों ने 22 जून 1897 को रैंड और उनके सैन्य अनुरक्षण लेफ्टिनेंट आयर्स्ट को गोली मार दी। ऑस्ट्रिया-हंगरी के आर्कड्यूक फ्रांज फर्डिनेंड की हत्या। गैवरिलो प्रिंसिप के हाथों उनकी मृत्यु - एक सर्बियाई राष्ट्रवादी, जो गुप्त सैन्य समूह से संबंध रखता है जिसे ब्लैक हैंड के रूप में जाना जाता है - ने प्रमुख यूरोपीय सैन्य शक्तियों को लाखों और लाखों मौतों के साथ युद्ध की ओर प्रेरित किया।  टिकट मिलने या न मिलने, नेता की नजर में चढ़ने या गिरने, सत्ता में हिस्सेदारी की संभावना बनने या बिगड़ने के कारण गुस्से, इस्तीफों तथा नए आश्चर्यजनक गठबंधनों का दौर कभी खत्म नहीं होता। इन मतभेदों का एक गंभीर पक्ष है, राजनीतिक हिंसा।  शिखर नेताओं पर हुए खतरनाक हमलों से  भारत की राजनीति भी विषाक्त है। अब्राहम लिंकन, जॉन एफ कैनेडी, इंदिरा गांधी और बेनजीर भुट्टो की जीवन ज्योति उनके राजनीतिक जीवन के चरम पर बुझा दी गई। आजादी के बाद से राजनीतिक हत्याओं का दौर भारत के राजनीतिक जीवन को भी लहूलुहान करता आया है। भारत को आजादी मिले छह महीने भी नहीं हुए थे कि महात्मा गांधी की हत्या ने दुनिया को हिला दिया। वर्ष 1953 में कश्मीर की शेष भारत के साथ एकता का आंदोलन करने वाले डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की श्रीनगर की जेल में रहस्यमय मृत्यु हो गई थी।

उसे अटल बिहारी वाजपेयी ने शेख और नेहरू की दुरभिसंधि से की गई राजनीतिक हत्या बताया था। उसकी तो जांच तक नहीं की गई, जबकि श्यामा प्रसाद मुखर्जी नेहरू सरकार में पहले उद्योग मंत्री और भारतीय जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष थे। जनसंघ के दूसरे अध्यक्ष पंडित दीनदयाल उपाध्याय 1968 में मुगलसराय स्टेशन पर मृत पाए गए थे। उनकी रहस्यमय हत्या की साधारण जिला स्तरीय जांच हुई। पंजाब के ताकतवर मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरों की 1965 में रोहतक में हत्या कर दी गई और इसका कारण व्यक्तिगत दुश्मनी बताया गया। तब यह मुद्दा भी उठा था कि अधिनायकवादी तौर पर काम करने वाले कैरों के राजनीतिक शत्रुओं की क्या कमी हो सकती है। फिर नागरवाला हत्याकांड हुआ। नागरवाला ने कथित तौर पर इंदिरा गांधी की आवाज बदलकर स्टेट बैंक से 60 लाख रुपये निकलवाए थे। नागरवाला पकड़े गए और हिरासत में ही संदिग्ध परिस्थितियों में मृत पाए गए और बाद में इस मामले में जांच कर रहे अधिकारी की भी रहस्यमय मृत्यु हो गई। भारत की तीसरी प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी की 31 अक्टूबर 1984 को 09:20 पर उनके सफदरजंग रोड, नई दिल्ली स्थित आवास पर हत्या कर दी गई थी। ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद, अमृतसर में स्वर्ण मंदिर पर भारतीय सेना के जून 1984 के हमले के बाद, उसके दो अंगरक्षकों, सतवंत सिंह और बेअंत सिंह ने उसे मार डाला, जिससे सिख मंदिर को भारी नुकसान हुआ। अगले चार दिनों में, जवाबी हिंसा में हजारों सिख मारे गए।
 
यदि आप राजनीति का हिस्सा बनने की आकांक्षा रखते हैं तो आपको राजनीति विज्ञान का अध्ययन करना आवश्यक है। आधुनिक दौर में राजनीति अब नौसिखियों की समझ से परे हो रही है। नतीजन राजनीति के मैदान में टिकना अब परंपरागत दिग्गजों तक सीमित रह गया है। शख्सियत का फायदा राजनीति में परंपरागत नजरिये से उचित माना जाता है। बदलावों के दौर में राजनीति करना किसी चुनौती से कम नहीं आंका जा सकता।  अब तो राजनीति करने की लालसा, वंशवादिता और संपर्कवादिता तक सीमित रह गयी है। वंशवादिता में राजनीति का कमान मिलना वंशपरंपरा के अधीन रहता है तो दूसरी ओर संपर्कवादिता के जरिए किसी बडे राजनेता के संपर्क में आने से राजनीतिक कमान प्राप्त करने की अभिलाषा पूर्ण हो जाती है। कहावत है कि "राजनीति एक गंदा खेल है"। मौजूदा समय में बड़े कारोबारी, फिल्मकार, खिलाडी, विद्वान सहित पत्रकार एवं नौकरशाह जैसे लोगों की राजनीति में न केवल रुचि बढी है अपितु वे राजनीति की महत्ता को भी समझने लगे हैं। अब राजनीति अपने अछूतपन से बरी हो चुकी है। सकारात्मक नजरिए से देखें तो नौजवानों की आवश्यकता राजनीतिक परिवेश में राष्ट्र निर्माण के लिए जरूरी है बर्शते वे नौजवान समाज और लोकतंत्र में सच्चे भाव एवं निष्ठा से राजनीति में आए और समाज को सही राह पर ले जाने की क्षमता रखें। प्रतिस्पर्धा पहले की तुलना अधिक बढ़ी है। अब राजनीति करने की लालसा रखने वालों को अपनी क्षमता और कौशल के बलबूते पर ही राजनीति में प्रवेश मिल सकता है। लेकिन नए खिलाडियों के लिए यह सोनाली की तरह जान के खतरों से कम भी नहीं है।


                                                                   लेखक- सत्यवान 'सौरभ'


तनाव और हँसी का हृदय पर प्रभाव

हमारे ह्रदय पर जिन दो चीजों का सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है व हैं--तनाव और हँसी। जहाँ एक ओर तनाव का ह्रदय के स्वास्थ्य पर कुप्रभाव पड़ता है तो वहीं दूसरी ओर हँसी ह्रदय को स्वस्थ रखने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। तनाव एक द्वंद्व है जो व्यक्ति के मन एवं भावनाओं में अस्थिरता पैदा करता है। हमारी मनःस्थिति  एवं बाहरी परिस्थिति के बीच सामंजस्य न होने के कारण तनाव उत्पन्न होता है। तनावग्रस्त  व्यक्ति काम के प्रति एकाग्र नहीं रह पाता जिससे उसकी कार्यक्षमता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। अल्प मात्रा में तनाव होना जीवन का एक हिस्सा है और कोई भी व्यक्ति इससे बचा नहीं रह सकता। जीवन में प्रगति करने के लिए नियंत्रित तनाव होना बुरा नहीं है। लेकिन जब यह तनाव  अनियंत्रित होकर हमारे भावनात्मक और शारीरिक जीवन का हिस्सा बन जाए तो यह आगे चलकर खतरनाक साबित हो सकता है।






हमारे मस्तिष्क में न्यूरोट्रांसमिटर्स होते हैं (सेरोटोनिन, डोपामाइन)

जो खुशी और आनंद की भावनाओं को प्रभावित करते हैं। लेकिन अत्यधिक तनाव की स्थिति में ये असंतुलित हो सकते हैं। इनके असंतुलित होने से व्यक्ति के मस्तिष्क में नकारात्मक विचार आते रहते हैं और उसे लगातार ऐसी चीजें सुनाई और दिखाई देती हैं जो असल में नहीं होती। ऐसे व्यक्ति के मस्तिष्क में आत्महत्या जैसे विचार आने लगते हैं। ऐसे व्यक्ति का पाचन तंत्र भी खराब रहता है उसे कब्ज जैसी समस्या का भी सामना करना पड़ता है, उसका वजन बढ़ना, उच्च रक्तचाप, मधुमेह और ह्रदय धमनी रोग आम समस्या हैं । सिकुड़ी हुई धमनियों के कारण ह्रदय तक ऑक्सीजन और पोषक तत्व नहीं पहुँच पाते हैं। इससे ह्रदय को अतिरिक्त प्रयास करना पड़ता है जिससे सीने में दर्द होने लगता है। धमनियों में ज्यादा अवरोध होने पर हार्ट अटैक हो जाता है और पूरी तरह से अवरोध होने पर हार्ट फेल्योर हो जाता है। 

हँसी जीवन की स्वस्थता का आधार है। तनाव रूपी तपते रेगिस्तान सी जिंदगी में जब हँसी रूपी सौहार्द की बरसात होती है, तो जीवन में खुशी के सुरभित पुष्प खिलने लगते हैं। हँसी एक तरह का ध्यान है जो आनंद की अनुभूति प्रदान करता है। जब नाभि से उठी हुई गुदगुदी, कंठ से हास्य में बदलकर निकलती है, तो मन को चारों ओर से हटाकर चित्त की वृत्तियों का निरोध कर देती है, जिससे आनंद की प्राप्ति होती है।

जब हम हँसते हैं तो हमारे शरीर में डोपामाइन हार्मोन्स (प्लेजर हार्मोन्स) बनने लगते हैं। ये हार्मोन्स न्यूरो ट्रांसमीटर की तरह काम करते हैं। किसी परीक्षा के उत्तीर्ण करने पर, किसी प्रतियोगिता में सफल होने पर, कोई अवार्ड मिलने पर, अपना पसंदीदा आहार खाने से, अपने पसंदीदा कपड़े पहनने से तथा अपनी मनपसंद के कार्य करने से इस प्रकार के हार्मोन्स में वृद्धि होती है। हँसने से ही सिरोटोनिन हार्मोन्स निकलते हैं। ये मूड बूस्टर का कार्य करते हैं। ये एण्टी डिप्रेसेण्ट  होते हैं अर्थात तनाव से बचाते हैं । हँसने से ही एण्डोर्फिन्स हार्मोन्स निकलते हैं जो दर्द निवारक होते हैं। ये तीनों ही हार्मोन्स हमारे ह्रदय को स्वस्थ रखने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं।
   
ह्रदय को स्वस्थ रखने के लिए हमें तनाव से बचकर रहना चाहिए और सदैव  हँसते मुस्कुराते रहना चाहिए। इसके लिए यह आवश्यक है कि हम अपनी जीवनशैली में तदनुसार परिवर्तन करें। हमें प्रचुर मात्रा में पानी पीना चाहिए तथा ऐसे फलों और सब्जियों का अधिक सेवन करना चाहिए जिनमें पानी की मात्रा अधिक हो। पोषक तत्वों से भरपूर भोजन करना चाहिए जिसमें शरीर के लिए जरूरी सभी विटामिन्स और खनिज हो। हरी पत्तेदार सब्जियाँ एवं मौसमी फलों का सेवन करना चाहिए। काजू, बेर, सेब, इलायची, नींबू का रस, ब्राह्मी का सेवन करने से तनाव में राहत मिलती है। चुकन्दर का सेवन करना चाहिए, इसमें उचित मात्रा में पोषक तत्व होते हैं जैसे विटामिन्स, फोलेट, यूराडाइन और मैग्निशिय आदि जो हमारे मस्तिष्क में न्यूरोट्रांसमिटर्स की तरह काम करते हैं जो कि मनःस्थिति को बदलने का कार्य करते हैं। अपने भोजन में तेल की मात्रा सीमित करें। विभिन्न प्रकार के तेलों (जैतून का तेल, सरसों का तेल, मूँगफली का तेल, सोयाबीन का तेल) का प्रयोग करें। जैतून के तेल में उचित मात्रा में एंटी-ऑक्सिडेट्स और मोनोसैचुरेटेड फैटी एसिड्स पाये जाते हैं जो हृदय रोग तथा तनाव को दूर करने में मददगार साबित होते हैं। 

भोजन में एवं सलाद के रूप में टमाटर का सेवन करें। टमाटर में लाइकोपीन नाम का एंटी-ऑक्सिडेंट पाया जाता है जो तनाव से लड़ने में मदद करता है। व्यक्ति को अपनी दिनचर्या में व्यायाम, योग एवं ध्यान को अवश्य जगह देनी चाहिए। इससे मस्तिष्क को शान्ति मिलती है तथा हार्मोनल असंतुलन ठीक होता है। व्यक्ति को सुबह उठकर सैर पर जाना चाहिए उसके बाद योगासन और प्राणायाम करना चाहिए।प्राकृतिक एवं शान्ति प्रदान करने वाली जगहों पर जाना चाहिए साथ ही मधुर संगीत एवं सकारात्मक विचारों से युक्त किताबें पढ़नी चाहिए।

धूम्रपान, मद्यसेवन या किसी भी प्रकार का नशे का सर्वथा त्याग करना चाहिए।



                                                                            लेखक- विनय बंसल


23 August 2022

जोश मलीहाबादी जी की 20 शेर









































भारतीय संसद - लोकतंत्र का मंदिर



हमारे संविधान ने हमें शासन की संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था दी है। जब भारत में इस व्यवस्था की नींव राखी गई, तो कई लोग ये सोचते थे कि भारत की भयावह गरीबी, व्यापक निरक्षरता, विशाल और बहुआयामी आबादी के साथ जाति, पंथ, धर्म और भाषा की विविधता को देखते हुए लोकतंत्र भारत के लिए उपयुक्त नहीं होगा। निराशावाद के वे सभी समर्थक गलत साबित हुए हैं। 26.01.1950 को हमारे संविधान के गठन के बाद से इन सभी वर्षों में काम करने वाला भारत का संसदीय लोकतंत्र समय की कसौटी पर खरा उतरा है और एक कार्यशील लोकतंत्र के रूप में बना हुआ है। भारतीय जनता के विशाल मतदाताओं ने जब भी आवश्यकता होती है, 'जिम्मेदारी और अदम्य ज्ञान' की भारी भावना के साथ लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति अपनी प्रतिबद्धता और समर्पण दुनिया को दिखाया है, उन्होंने अपने मत का इस्तेमाल सत्ता में एक पार्टी को उखाड़ फेंकने के लिए एक गोली की तरह किया है जो संविधान या लोकतांत्रिक संरचना या इसका धर्मनिरपेक्ष लोकाचार को कमजोर करने का उपक्रम करता है। हाल ही में एक सक्रिय नागरिक समाज के उदय और भ्रष्टाचार के खिलाफ उसके आंदोलन, जिसने लोगों की शक्ति को सबसे आगे लाया है, ने हमारे लोकतंत्र को और मजबूत और गहरा किया है। कुछ अच्छे आलोचकों ने हमारे संसदीय लोकतंत्र से अमेरिकी राष्ट्रपति प्रणाली में स्विच-ओवर की वकालत की है, जो गठबंधन सरकारों की प्रणाली में सरकारी अस्थिरता की बीमारी के उपचार के रूप में है, जो भारत में एक अपरिहार्य वास्तविकता बन गई है, खासकर 1989 से जब कोई राजनीतिक पार्टी पूर्ण बहुमत हासिल करने में सफल रही है। 


फोटो सोर्सः गूगल



हालांकि, यह भी सच है कि गठबंधन सरकारों के बावजूद, हमने अब तक काफी हद तक राजनीतिक स्थिरता का अनुभव किया है। यह ठीक ही कहा गया है कि 'सरकार में अस्थिरता का हमारा अनुभव संसदीय प्रणाली को त्यागने का पर्याप्त कारण नहीं है'। आज हमारा संसदीय लोकतंत्र जिस भी समस्याओं का सामना कर रहा है, उसमें सुधार किया जा सकता है- चाहे वह अस्थिरता सिंड्रोम हो, राजनीति का अपराधीकरण हो या संसद को जबरन व्यवधान, टकराव या जबरन स्थगन के माध्यम से निष्क्रिय कर दिया गया हो। इसके लिए दो चीजों की जरूरत है (ए) मौजूदा संसदीय प्रणाली के भीतर किए जाने वाले आवश्यक सुधार और (बी) राजनीतिक व्यवस्था में चरित्र और अखंडता के पुरुष। जैसा कि राजेंद्र प्रसाद ने ठीक ही कहा है: “यदि चुने गए लोग सक्षम और चरित्रवान और सत्यनिष्ठ व्यक्ति हैं तो वे एक दोषपूर्ण संविधान को भी सर्वश्रेष्ठ बनाने में सक्षम होंगे। अगर इनमें कमी है तो संविधान देश की मदद नहीं कर सकता। आखिर मशीन जैसा संविधान एक बेजान चीज है। यह उन लोगों के कारण जीवन प्राप्त करता है जो इसे नियंत्रित करते हैं और इसे संचालित करते हैं और भारत को आज ईमानदार पुरुषों के एक समूह के अलावा और कुछ नहीं चाहिए, जिनके सामने देश का हित होगा।


संसद को लोकतंत्र का मंदिर कहा जाता है, क्योंकि लोकतंत्र में संसद का वही स्थान है, जो कि धर्म में भगवान का। हमारे संविधान निर्माताओं ने कहा था कि लोकतंत्र में प्रत्येक विचार का केंद्र बिंदु संसद ही है। संविधान लागू हुआ, भारत गणतंत्र बना और समय बीतता गया। आज़ादी के 70 सालों में बहुत कुछ बदल गया है। यदि कुछ नहीं बदला है तो वह है भारत की संसद। संविधान निर्माताओं ने संसद को मुख्य रूप से तीन जिम्मेदारियाँ सौंपी थी;- कानून बनाने की, सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करने की और आवश्यक मुद्दों पर बहस और चर्चा करने की। लोकतंत्रीय परम्परा में संसद को लोकतंत्र के मंदिर की उपमा दी गई है। संसद का एक पवित्र मंदिर है और उसमें संविधान रूपी देवता निवास करते हैं। संविधान और संसद का संबंध आत्मा और शरीर के संबंध जैसा है। जिस प्रकार आत्मा के लिए शरीर का होना जरूरी है उसी प्रकार संविधान के लिए संसद का होना जरूरी है। संविधान लोकतंत्र का प्राण है तो संसद लोकतंत्र का मंदिर है। लोकतंत्र के इस मंदिर की शुचिता-पवित्रता बनाए रखना अत्यन्त आवश्यक है, और इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए प्रत्येक नागरिक का जागरुक होना अनिवार्य है। संसद पूरे देश की जनता की प्रतिनिधित्व करती है। पूरब हो या पश्चिम, उत्तर हो या दक्षिण, हर क्षेत्र की जनता की आवाज केन्द्र तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम है संसद। जिस प्रकार धार्मिक आस्था रखने वाले लोग मंदिर में जाते हैं, पूरी आस्था के साथ भगवान के चरणों में जाकर सुखी जीवन के लिए भगवान से प्रार्थना करते हैं उसी प्रकार देश की जनता अपने जन-प्रतिनिधियों के माध्यम से संसद रूपी मंदिर में पहुंचकर अपनी समस्याओं के निराकरण हेतु गुहार लगाती है। एक दृष्टि से संसद देश की जनता के हितों की रखवाली भी करती है, इसीलिए लोकतंत्र में संसद का स्थान अत्यंत ही गरिमापूर्ण है।


पूर्व सांसद हुकुमदेव नारायण यादव अपनी किताब 'संसद में आम जन की बात' में संसद किस तरह सबसे गरीब तबके के लोगों के लिए मंदिर बन सकता है पर चर्चा करते हुए लिखते हैं - "डॉ. लोहिया ने जाति प्रथा के लिए लिखा है कि लोग कहते हैं कि मूर्ख लोगों को, सभी लोगों को वोट का सामान अधिकार दे दिया है, यह उचित नहीं है। कभी-कभी मैं भी यह सोचता हूँ कि यह उचित नहीं है, लेकिन गंभीर चिंतन के बाद मुझे लगता है कि ये निर्धन, गरीब, दलित, पिछड़ी जाति के, अनुसूचित जाति के, जनजाति के जंगल में रहनेवाले लोग एक-न-एक दिन वोट की ताकत को जानेंगे और जिस दिन वे वोट की ताकत को पहचानेंगे, उस दिन अपने वोट की ताकत से भारत की सत्ता पर कब्जा करेंगे। भारतीय लोकतंत्र का इतिहास बदलकर रख देंगे। आज वह तबका जग गया है, उसने वोट की ताकत को पहचान लिया है, वह वोट के जरिए लोकतंत्र में अपनी हिस्सेदारी चाहता है, साझेदारी चाहता है। वह आज अपनी हिस्सेदारी और साझेदारी के लिए लड़ रहा है। मैं लोकतंत्र के मंदिर में खड़ा होकर कहना चाहता हूँ कि हमें आज भी तकलीफ होती है, जब यह कहा जाता है कि अनुसूचित जाति को इतना दे दो, अनुसूचित जनजाति को इतना दे दो, ओ. बी.सी. को इतना दे दो।  


संसद में चंद्रशेखर - एक स्मारक खंड में भारतीय संसद के मंदिर होने की बात कई जगह दोहराई गई है। इसमें स्पष्ट किया गया है कि भारत का एक स्वतंत्र देश होना ही काफी नहीं है, इसे धार्मिक, सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक दृष्टि से समतावादी देश बनाना आवश्यक है। स्वराज्य शासन की एक प्रणाली है जिसमें एक व्यक्ति वास्तविक परिप्रेक्ष्य में मानवीय रूप से रह सकता है। यद्यपि हम एक स्वतंत्र देश बन गए हैं, फिर भी समानता का अभाव है। लोगों के सामाजिक और आर्थिक जीवन में बहुत असमानता है और अगर हम इसे दूर करने की स्थिति में नहीं हैं तो कड़ी मेहनत से बना लोकतंत्र का यह मंदिर ढह सकता है। हमें अपनी पूरी शक्ति का उपयोग शोषण से रहित और समानता पर आधारित "आदर्श समाज" के निर्माण के सपने का अनुवाद करने में करना चाहिए।


श्री ई पोन्नुस्वामी (चिदंबरम) नौवें सत्र (तेरहवीं लोकसभा) के दौरान राष्ट्रपति के अभिभाषण पर अपने भाषण के दौरान कहते हैं - "अपने नेता डॉ. रामदास के बलिदान के प्रति निष्ठा और प्रतिबद्धता की निस्वार्थ निस्वार्थता से, मैंने लोकतंत्र के इस प्रतिष्ठित मंदिर में प्रवेश किया, जिसमें मैंने कभी भी एक मंत्री के रूप में अपनी 62 वर्ष की आयु में प्रवेश करने का सपना नहीं देखा था। हाँ, मेरे नेता, डॉ. रामदास ने अचानक मुझे राजनीति में बुलाया, तब तक, एक सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक, लेखक, अनुवादक, आदि, और उन्होंने मुझे एक सांसद, और अधिक, हमारे श्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एक मंत्री बनाया। हमारा लोकतंत्र ऐसा अद्भुत है जो मेरे जैसे अमीर और गरीब, ऊंच-नीच दोनों को समान अवसर देता है जो इस प्रतिष्ठित सदन में आपके सामने खड़े हैं, जो शुरुआती वर्षों में भोजन, कपड़ा और किताबों के बिना चले गए थे और अछूत के रूप में जीवन की मुख्यधारा से मीलों दूर रखा गया है। मेरे प्रिय नेता डॉ. रामदास ने मुझे एक चेहरा दिया और डॉ. अम्बेडकर ने मुझे आवाज दी। मेरे नेता, महात्मा गांधी, जोतिबा फुले जैसे गैर-दलित और कई अन्य लोगों ने गरीबों और कमजोरों के कल्याण और उत्थान के लिए अपना सब कुछ दिया।"


मन में संसद का ख्याल आते ही यह भाव आता है कि यह ऐसा स्थान है जहाँ ओजस्वी वक्ताओं का जमावड़ा होगा, लेकिन पिछले कुछ दशकों से शायद ही कभी ऐसा देखने को मिला हो कि जब कोई ऐतिहासिक संसदीय चर्चा या बहस हुई हो। पहले संसदीय चर्चाएँ राष्ट्रीय और महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर केंद्रित होती थीं, लेकिन अब इनकी जगह संकीर्ण और स्थानीय मुद्दों ने ले ली है। नाममात्र की उपस्थिति, स्तरहीन चर्चाओं, सत्र के दौरान शोर-शराबे, ये भारतीय संसद के कुछ मौलिक पहचान बन गए हैं। ऐसे में हमें संसद की गरिमा और महत्त्व को बनाए रखना होगा। ध्यान रहे संसद नीतियों पर बहस और कानून निर्माण का स्थान है न कि राजनीति करने का। हमें इन सुधारों पर ध्यान देना होगा, ताकि हम भारत के जीवंत लोकतंत्र में संसद की भी जीवंतता बनाए रखे।


लेखक- सलिल सरोज
कार्यकारी अधिकारी