साहित्य चक्र

08 November 2020

आप और हम क्या सोचते हैं..?




क्या कभी आपने सोचा आप जो सोच रहे हैं वह किसके लिए सोच रहे हैं..? हमारे सोचने से हमें क्या फायदा होगा..? उसके ना सोचने से और सोचने से हमें क्या फायदा होगा..? आज हमारी सोच ही हमारे देश और समाज का विकास कर सकती है। जैसा हम सोचेंगे वैसे ही हमारे समाज का निर्माण होगा और जो समाज हम अपने आने वाली पीढ़ी को देंगे उसी समाज से वह आगे बढ़ेंगे। यह बात मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि हमारे पूर्वजों ने हमें जाति व्यवस्था में बांटा और इस कुप्रथा को पीढ़ी दर पीढ़ी हमारे ऊपर थोपता रहे। जिसके कारण आज हमारे समाज में दरारें पड़ रही हैं। इन सब के लिए वह लोग भी जिम्मेदार हैं जो समाज में पढ़े लिखे थे और जिन्होंने समाज की हकीकत को सही से नहीं लिखा और समान दृष्टि से समाज के बारे में नहीं सोचा। अगर वह लोग समान दृष्टि से सोचते तो आज हमारे समाज में अलग-अलग जाति और मजहब देखने को नहीं मिलते। हमें खुद अंदाजा लगाना चाहिए जब गाय, बकरी, भैंस जैसे जानवरों में ऊंच-नीच का भेद नहीं है तो फिर इंसान तो इन सभी से काफी बुद्धिजीवी है। क्यों ना हमें आज और अभी से समानता की बात करनी चाहिए..? हो सकता है आज आपकी आर्थिक स्थिति अच्छी हो, मगर कल आपके आने वाली पीढ़ी की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होगी तो तब आप समानता की बात पर पूर्ण रूप से सहमत होंगे। इंसान की फितरत है जब वह किसी ऊंचे पद पर बैठा होता है, तब वह अन्य निचले गरीब लोगों को अपनी बराबरी करने से रोकता है। इसीलिए हमारे समाज के लिए यह महत्वपूर्ण है हम और आप क्या सोचते हैं..? इस बात को याद रख लीजिए समय का चक्र कभी भी किसी का इंतजार नहीं करता और कोई भी इंसान हमेशा सुख और अमीर नहीं रह सकता है। भले ही आप मेरी बातों को अन्य तरीकों से काटने का प्रयास करेंगे, मगर जो मैंने बोला है वह हकीकत है। जब हमारे घर में किसी की तबीयत खराब होती है तो तब हमें लगता है कि दुनिया का पूरा दुख हमारे परिवार के ऊपर टूटा है। मगर ऐसा नहीं होता है। दुख हर इंसान के ऊपर आते हैं। कोई इंसान हिम्मत से सामना करता है तो कोई अपना धैर्य खो बैठता है।

हर इंसान के लिए उसकी सोच बहुत ही मायने रखती है। आपकी सोच आपको दुनिया का सबसे सर्वशक्तिमान इंसान बना सकती है और आपकी सोच आपको एक भिखारी भी बना सकती है। मगर यह आप पर निर्भर करता है। हां मैं मानता हूं सोच से ज्यादा पैसा मायने रखता है, मगर पैसा वही तक काम आ सकता है जहां तक उसकी जरूरत हो। मगर उस पैसे को भी सही दिशा और मार्ग देने के लिए एक अच्छी सोच की जरूरत होती है। इसीलिए एक बेहतर समाज, प्रदेश, राष्ट्र और राज्य बनाने के लिए हमें एक बेहतर सोच को प्रवाह करने की जरूरत है। जिस सोच में समानता हो, सभी के अधिकार हो, सभी के लिए भाव हो और सभी का समान हो। मुझे व्यक्तिगत तौर पर ऐसा लगता है कि हमारे सोच से यह सभी चीजें समाप्त हो रहे हैं। जिसके कारण हम आज कभी-कभी गलत के साथ भी खड़े हो जाते हैं, मगर हमें वह दिखाई नहीं देता है। इसके पीछे हमारे ऊपर थोपी जा रही एक ऐसी विचारधारा और सोच हैं जो हमें मानसिक रूप से विकलांग बना रही है।

याद रखिए आपका मानसिक रूप से विकलांग होना देश के लिए बहुत हानिकारक है। यूं ही पूरा समाज मानसिक रूप से विकलांग बनता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब हमारे ऊपर किसी अन्य देश व साम्राज्य का शासन होगा या फिर ग्रह युद्ध जैसे हालात पैदा हो जाएंगे। हमें अपनी शासन व्यवस्था, कृषि व्यवस्था, कानून व्यवस्था सहित अन्य को बेहतर बनाने के लिए सोचना चाहिए। अब आप यहां पर सवाल खड़ा कर सकते हैं कि हम कैसे सोचें क्योंकि हम कुछ कर नहीं सकते हैं। आप कुछ कर सकते हैं या नहीं वह बात की बात है। अगर आप अच्छा सोचेंगे तो आपके परिवार के अन्य सदस्य भी अच्छा ही सोचने का प्रयास करेंगे। जिससे सामाज का मानसिक विकास होगा। हम और आप क्या सोचते हैं इसी पर हमारे देश का वर्तमान और भविष्य निर्भर करता है। आज हम बेहतर सोचेंगे तभी हम अपने आने वाली पीढ़ी को एक बेहतर राष्ट्र दे पाएंगे अन्यथा यूं ही जाति धर्म मजहब उच्च नीच की लड़ाई में मरते रहेंगे। बाकी आपके हाथ में है आपको इसी लड़ाई में मरना है या फिर एक बेहतर इंसान बनकर समाज की कमियों को उसके सामने रखना है यानी समाज को आइना दिखाना है।

@दीपक_कोहली




कलम...



वो लिखती है जो में चुनती हूं
कुछ लम्हे कलम संग बुनती हूं
ये मेरी सासे मेरी कलम से है,
दोस्त है मेरी ये मुझे समझती है
कलम पर जोर नहीं किसी का भी
ये सिर्फ हालत को लिखती है।।

ख़ुशी हो या गम हो 
कलम तो कलम है वो कहा रूकती ,
धूप - छांव इस जिंदगी की 
कलम खूब समझती है ।।

हर लम्हा मेरा मेरी कलम 
कागज़ पर बुनती है ,
मैं कहा हूं अकेली, कलम है
 मेरी पक्की सहेली 
ना थकती ना रूकती कभी 
मेरी भावनाओं को समझती है।।

कुछ तो है कलम की तागत 
जो चुपचाप काम करती है
तलवार जो ना कर सके 
इसकी स्याही बार करती है।।

ना समझना कम कीमत का इसे
ये हर किसी को कहा मिलती है
राजनेताओं की किस्मत भी
रोज कलम ही बदलती है।।

भाव यह मेरा है मेरी कलम ही
मेरी शक्ति है , पहचान है कलम से
 यह   मेरे ह्रदय में बसती है।।
प्रतिभा दुबे की कलम से....

                                      प्रतिभा दुबे "अभिलाषी"


वो कहेगी नहीं यकीनन



उसके चेहरे से पढ़ना तुम, तबियत ए हाल उसका
वो कहेगी नहीं यकीनन
पर समझना खामोशियों में छिपे उदासीन ख़्याल उसका..
सुनो, देने हो गऱ तोहफे उसे
महंगें तोहफ़ों के बदले ले आना वक्त ज़रा
बैठना साथ में उसके फुरसत बेहिसाब लिए
बदले में माँग लेना उससे,
जो मुस्कुराहट के पीछे दबायी है वो दर्द खरा...
बस तारीफ़ों के पुल बांधना, कमियाँ उसकी,
उसके दीवार के क़िलों पर ना टाँगना..
अगर करना ही है कुछ उसके लिये,
बस सच कह देना , जो भी हो सवाल उसका...
उसके चेहरे से पढ़ना तुम, तबियत ए हाल उसका...

                                                  शेजल झा

मेरा दिल कहता है


अनुराग बहुत याद आओगे
 एक हंसता हुआ चेहरा था,
 जो सब के दुख दर्द को समझा था,
 अपनी परवाह कभी न कि उसने,
 दूसरे के दर्द को अपना समझता था,
 तुम क्या गए जग रूठ गया,
 सबके होठों की हंसी सूख गई,
 सबकी आंखें नम है,
ढूंढ रही हैं तुम्हें  यहां वहां,
पर तुम हो कहां अब,
 पर मेरा दिल कहता है,
 तुम सब के दिल में रहते हो,
 वहां से तुम्हें कोई निकाल नहीं सकता,
 सच कहती हो अनुराग,
 तुम बहुत याद आओगे।
 भाभी की वह सूनी मांग,
 दिल को दुखाती है,
 बच्चों की परेशानियां भी,
 दिल में आग लगाती हैं, 
पापा तुम कहां चले गए,
 कैसे समझाएं उनको,
 पापा कहीं गए नहीं,
 जो सबके दिलों में रहते हैं,
 नहीं सहा जाता है अब इतना दर्द,
आ जाओ तुम फिर से वापस,
 पर सच यही है,
 जो गया वह वापस नहीं आएगा,
 अनुराग तुम बहुत याद आओगे।।

                              गरिमा लखनवी

याद रखना

उठूंगा एक दिन
तूफान बन कर
मुझे याद रखना।

बहूँगा एक दिन
आंखों का आंसू बनकर
याद रखना।

दूंगा दर्द सीने में
याद बनकर
याद रखना।

ढूंढो गए मुझे तुम
अपने और परायो में
याद रखना।

चीख उठोगे
अपनी नासमझी पर एक दिन
याद रखना।

बड़ा भरोसा है तुम्हें जिन पर
छोड़ जाएंगे वो एक दिन
याद रखना।

बहुत तड़फोगे एक दिन
मेरे लिए तुम
याद रखना।

                                         राजीव डोगरा 'विमल'


लिखना एक कहानी


शुरू किया था 
मैंने भी 
लिखना एक कहानी 
बहुत पहले 
बहुत बहुत पहले 
जब नई नई 
आई थी जवानी 
वो कहानी अभी तक 
लिखी जा रही है 
लगातार लिखी जा रही है 
लगातार लम्बी होती जा रही है 
जब भी नजदीक आता है 
कहानी का अंत 
फिर कही से निकल आता है 
उसका कोई पात्र 
किसी नए घटनाक्रम के साथ 
जिससे फिर से चल पड़ती है कहानी 
नए घटनाक्रम को लेकर 
उसे  पात्रों के साथ बुनते हुए 
जरूरी मोड़ों को चुनते हुए 
बरसों से लिख रहा हूँ 
जानता हूँ कि इस कहानी का 
पूरा होना जरूरी है 
फिर भी मेरी ये कहानी 
अभी तक हुई न पूरी  है 
क्योंकि मेरी भी ये मजबूरी है 
कि ज़िन्दगी अभी तक अधूरी है


                                                  डॉ. शैलेश शुक्ला, राजभाषा अधिकारी 


07 November 2020

कोमल की कुण्डलियाँ



प्यारे,समझो प्यार से, बँधे सदा यह डोर।
रिस्तों की इस डोर को, करें नहीं कमजोर।
करें नहीं कमजोर, प्यार की रेशम डोरी।
एक बार बँध जाय, जाय ना फिर यह छोरी।
कह 'कोमल' कविराय, जतन से रहो सँवारे।
रिस्तों की यह डोर, बड़ी नाजुक है प्यारे।


रखना हरदम प्यार से, सम्बन्धों की डोर।
झूठ,स्वार्थ,अभिमान से, होती है कमजोर।
होती है कमजोर, जोर मत इस पर डालो।
करके हरदम त्याग, प्रेम से इसे सम्हालो।
कह 'कोमल' कविराय, स्वाद रिस्तों का चखना।
हमीं-गमीं का भाव, सदा रिस्तों में रखना।


                                      श्याम सुन्दर श्रीवास्तव 'कोमल'


मोबाइल छात्रों के भविष्य निर्माण में समस्या या समाधान




वैश्विक महामारी के इस विषम काल के चलते विद्यार्थी जीवन की शैक्षणिक प्रक्रिया पर विराम सा लग गया। सरकार द्वारा लॉक डाउन के चलते छात्रों के भविष्य की चिंता करते हुए चलाई गई है ऑनलाइन क्लासें जो कि छात्र छात्राओं से सीधे संवाद करते हुए अध्यापकों वे अध्यापिकाओं द्वारा वीडियो कॉल के माध्यम से कराई जाएगी छात्र-छात्राओं की पढ़ाई जबकि अब से पूर्व में छात्र-छात्राओं के हाथ में मोबाइल देना गलत माना जाता था तो वही कोरोनावायरस के चलते छात्र छात्राओं के लिए भी मोबाइल की हुई अहम भूमिका, साथ ही आपको बता दें कि अब से पूर्व अध्यापकों द्वारा खुद छात्रों को पढ़ते वक्त मोबाइल का इस्तेमाल करने के लिए मना किया जाता था तो वहीं अब अध्यापकों द्वारा छात्र छात्राओं से खुद मोबाइल की मांग की जा रही है अगर मोबाइल नहीं होगा तो नहीं होगी छात्र-छात्राओं की पढ़ाई, साथ ही आपको बता दें कि सरकारी विद्यालय में पढ़ने वाले छात्र छात्राओं (जो कि गरीब परिवार से हैं) के पास अगर मोबाइल नहीं होगा तो शायद छात्र-छात्राओं का भविष्य हो सकता है बर्बाद, अगर सरकारी विद्यालय में पढ़ने वाले छात्र छात्राओं के परिवार के पास ज्यादा पैसा होता तो वह अपने बच्चों को सरकारी विद्यालय में क्यों कराते शिक्षा ग्रहण, अगर सही मायने में देखा जाए तो कहीं ना कहीं आज बच्चों के भविष्य की चिंता करते हुए परिजनों को मजबूरी मे फोन दिलाना हुआ जरूरी। अगर सही ढंग से देखा जाए तो जिन लोगों के पास दो वक्त के खाने के पैसे भी नहीं हो पाते वह लोग किस प्रकार से अपने बच्चे के भविष्य की चिंता करते हुए दिला सकेंगे फोन, सोचने का विषय क्या ऐसा परिवारों के बच्चे शिक्षा ग्रहण कर पाएंगे या इतनी मेहनत के बाद भी रहमत शिक्षा से वंचित।

नवीन आंकड़ों के अनुसार यह पता चला कि 4 से 5 घंटे लगातार छात्र मोबाइल में पढ़ाई करने पर हो रहे मजबूर जिससे कहीं ना कहीं छात्र-छात्राओं के स्वास्थ्य की भी परिजनों को सता रही चिंता परिजनों का कहना है कि लगातार चार से 5 घंटे मोबाइल या लैपटॉप में ध्यान देने से बच्चों की आंखों की रोशनी पर पड़ सकता है असर, साथ ही ऑनलाइन क्लासेज के जरिए छात्र छात्राओं के मन से अध्यापक अध्यापिका ओं का डर हो रहा खत्म तो वहीं दूसरी तरफ परिजनों का कहना है कि ऑनलाइन क्लासेज का समय निश्चित ना होने के कारण रात्रि 8:00 से 9:00 बजे तक भी करना पड़ता है अध्यापकों का इंतजार अगर किसी भी वक्त कोई जरूरी कार्य के चलते बाहर जाना चाहे या किसी को मजबूरी के चलते बाहर जाना पड़े तो कैसे बने बात।

इसी क्रम में कुछ परिजनों का कहना है कि सरकार द्वारा भले हो तीन माह की ऑनलाइन क्लासेज की फीस माफ करने का दावा किया गया था लेकिन स्कूल संचालकों के अध्यापकों द्वारा चलाई जा रही है अपनी मनमानी के चलते परिजनों को योगदान के नियमों को तोड़ते हुए भी बैंक में फीस जमा करने के लिए पड़ रहा है। अगर किसी छात्र या छात्रा की फीस नहीं हो सकी जमा तो परिजनों को एस एम एस या कॉल के माध्यम से बार-बार अवगत करा कर किया जा रहा परेशान।

मानक सूत्रों के अनुसार विद्यालय में पढ़ रहे छात्र छात्राओं के लिए सुबह 10 से दोपहर 01 बजे तक का समय निर्धारित किया गया है और प्रत्येक विषय की बाद करीब 10 मिनट का ब्रेक छात्र छात्राओं को दिया जाता है साथ ही छात्र-छात्राओं द्वारा अपने बैठने की स्वयं (व्यवस्था जैसी जिसके पास है) कर सकते हैं जिसके लिए किसी पर किसी प्रकार का कोई दबाव नहीं है और साथ ही जानकारी देते हुए बताया कि उनके विद्यालय के किसी भी स्टाफ मेंबर या विद्यालय संचालक द्वारा परिजनों पर फीस जमा करने का कोई दबाव नहीं दिया जा रहा है क्योंकि सभी इस वक्त कोरोनावायरस के संकट से जूझ रहे हैं और इस वक्त लोग ना जाने किस प्रकार से अपने दो वक्त के भोजन की व्यवस्था कर पा रहे हैं या नहीं भी कर पा रहे हैं इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए परिजनों पर छात्र-छात्राओं की फीस का कोई दबाव नहीं है साथ ही कहा कि अभी तक विद्यालय समिति द्वारा डेट निश्चित नहीं है जबकि इतना तय हो चुका है कि छात्र छात्राओं को 20 मई से और 1 जुलाई तक मिलने वाले अवकाश के बदले जून के प्रथम सप्ताह से अवकाश घोषित कर दिया गया था, जिससे किसी भी छात्र या छात्रा को किसी भी प्रकार की परेशानी न हो।


                                                                                        प्रफुल्ल सिंह "बेचैन कलम"


ममता का दूसरा नाम माँ



 
ममता का दूसरा नाम माँ है। 
चारों धाम सुबहो शाम माँ है। 

जो गीत गज़लो का बोध कराती 
मात्राओ की लगती लगाम माँ है। 

शब्दो का संचार होता मुझमे 
किताबों का होती सार माँ है। 

जीवन की इस आपाधापी मे 
सबसे सच्चा लगती प्यार माँ है। 

जिसके होने से घर घर लगता 
होती बच्चों का संसार माँ है। 

धड़कन होते बच्चे जिसकी 
साँसो की लगती तार माँ है। 

सागर की उठती लहर माँ है। 
गज़ल की होती बहर माँ है। 

जिधर देखो उधर मिलजाए 
बसी हर तरफ गाँव शहर माँ है। 

                                          मनन तिवारी 


 

"पाखंड"



अब पृष्ठ्भूमि कर कुप्रथा, लिखता  मुक्तक खूब!
राज  धरम  नित   डूबता,  लोग कहेै  कवि मूढ़!

सब  कहे कवि  मूढ़ महा,  है कलयुग कि  रीती,
राज  कहत  साँच  बिना, जग की   कैसी बीती!

काम  क्रोध  उर लोभ धरि, मठ पूजा करि आड़,
गरल  पान  दुरजन करै , करत  साँच  निष्प्राण!

कहहि  राज  साहब  सुनो,     दूर  करो  पाखंड,
मन  मंदिर  सच  फाग करो,   नेह करो  नित रंग!

सत्य वचन और ज्ञान सब,  सज्जन  को है प्यारा,
लेकिन  इनसे  दूर  है,     मठ  मस्जिद  गुरुद्वारा!

राज    कहत  संसार   की,     बातें   मानो   जब,
स्व विवेक   से   पुस्ट   होवे,     बातें  मानो  तब!


                                                  राजकुमार मिश्रा

इतिहासी की आँखों से संसद भवन की झलक



पद-प्रतिष्ठा के लिए याद किया जाने वाला प्रयास बहुत मानवीय गुण है। उम्र और सभ्यताओं के शासकों ने स्मारकों और वास्तव में इस कारण से शहरों का निर्माण किया है।यह अस्थिर रूप से ब्रिटिशों के लिए नई राजधानी, नई दिल्ली के निर्माण का कारण था, लेकिन बहुत कम ही वे जानते थे कि ब्रिटिश शासन कुछ दशकों से भी कम समय में समाप्त हो जाएगा। फिर भी, वे भारत में निर्माण के संदर्भ में सचेत थे और पारंपरिक भारतीय वास्तुकला के समावेश और समामेलन में सशक्त थे। यह उन मुख्य कारणों में से एक है, जिनके कारण भवन और पूंजी को उस देश द्वारा स्वीकार, अवशोषित और विनियोजित किया जाता है जिसे उन्होंने पीछे छोड़ दिया है।इस स्मारकीय प्रयास की मुख्य इमारतों में से एक पूर्व की काउन्सिल भवन है, जो अब संसद भवन है। संसद भवन का डिजाइन मध्य प्रदेश के मुरैना में चौंसठ योगिनी मंदिर से प्रेरित है।

भारत में चार ऐसे मंदिर स्थित हैं, जिन्हें चौसठ योगिनी मंदिर कहा जाता है। इनमें से दो मंदिर उड़ीसा और दो मध्य प्रदेश में स्थित हैं। लेकिन मध्य प्रदेश के मुरैना में स्थित चौसठ योगिनी मंदिर सबसे प्रमुख और प्राचीन मंदिर है। यह भारत के उन चौसठ योगिनी मंदिरों में से एक है, जो अभी भी अच्छी दशा में बचे हैं। यह मंदिर तंत्र-मंत्र के लिए काफी प्रसिद्ध था इसलिए इस मंदिर को तांत्रिक यूनिवर्सिटी भी कहा जाता था। शानदार वास्तुकला और बेहद खूबसूरती से बनाए गए इस मंदिर तक पहुंचने के लिए करीब 200 सीढ़ियां चढ़नी होती हैं। यह मंदिर एक वृत्तीय आधार पर निर्मित है और इसमें 64 कमरे हैं। हर कमरे में एक-एक शिवलिंग बना हुआ है। मंदिर के मध्य में एक खुला हुआ मण्डप है, जिसमें एक विशाल शिवलिंग है। यह मंदिर 1323 ई में बना था। इस मंदिर का निर्माण क्षत्रिय राजाओं ने कराया था।हर कमरे में शिवलिंग के साथ देवी योगिनी की मूर्तियां स्थापित थीं और इन्हीं मूर्तियों की के चलते इस मंदिर का नाम चौसठ योगिनी मंदिर पड़ा। लेकिन कुछ मूर्तियां चोरी हो गई और अब बची हुई मूर्तियों को दिल्ली के संग्राहलय में रखा गया है। यह मंदिर में 101 खंभों पर टिका हुआ है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इस मंदिर को प्राचीन ऐतिहसिक स्मारक घोषित किया है।

इस इमारत के निर्माण में कई ट्विस्ट और टर्न देखने को मिले, जो एक रेसी थ्रिलर के समान थे। ब्रिटिश वास्तुकार, हर्बर्ट बेकर के द्वारा शुरू में प्रस्तावित किया प्लान , त्रिकोणीय भूखंड पर तीन विंग वाला एक प्लान था। हालांकि, लुटियन ने बेकर के डिजाइन को अस्वीकार कर दिया और इसके बजाय एक परिपत्र, कोलोसियम जैसी योजना प्रस्तावित की। लुटियन की जीत हुई और बेकर को अपने मूल डिजाइन को फिर से बनाना पड़ा।संसद भवन की योजना एक वृत्त पर आधारित है जिसका बाहरी व्यास 174 मीटर है। तीन कक्ष विधान सभा, चैंबर ऑफ प्रिंसेस और राज्य परिषद के सदन के लिए थे। ये इस परिपत्र योजना के भीतर स्थित हैं और उनके बीच मध्यवर्ती संरचनाओं के साथ 120 डिग्री का अलगाव है।इमारत एक तकनीकी चमत्कार थी और इसमें भारतीय वास्तुकला के कई तत्व शामिल थे। चैंबर्स को अच्छी तरह से डिज़ाइन किया गया था और यहां तक कि ध्वनिक टाइलें भी थीं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि घर में हर किसी के द्वारा किसी भी स्पीकर को सुना जाए। तब से संसद भवन में कई बदलाव और उन्नयन किए गए हैं। बदलती आवश्यकताओं को समायोजित करने के लिए संसद भवन और संसद भवन एनेक्सी के विस्तार के लिए एक भवन भी बनाया गया है।स्वतंत्रता के बाद, काउंसिल हाउस का नाम बदलकर संसद भवन गया और तीन मुख्य कक्ष अर्थात् विधानसभा, प्रिंसेस और राज्यों की परिषद को लोकसभा, राज्यसभा और पुस्तकालय के रूप में पुनर्निर्मित किया गया। सेंट्रल हॉल का उपयोग संयुक्त बैठक के लिए किया गया था। संसद भवन एक जीवित विरासत स्थल है और कई ऐतिहासिक क्षणों का गवाह रहा है, जिसमें जवाहरलाल नेहरू की  ट्राइस्ट विद डेस्टिनी ’और बी.आर. अंबेडकर के अराजकता के व्याकरण के भाषण उल्लेखनीय हैं। सेंट्रल हॉल ने भारतीय संविधान के प्रारूपण के दौरान गहन बहस और चर्चा की है। बड़े पैमाने पर सुशोभित पोर्टलों में प्रतिष्ठित सांसदों की कई पीढ़ियां रही हैं। कुछ प्रमुख राष्ट्रीय आकृतियाँ भी यहाँ बस्ट, मूर्तियों और चित्रों के रूप में अमर हैं।

वर्तमान संसद भवन की रूपरेखा

संसद भवन का केन्द्रीय तथा प्रमुख भाग उसका विशाल वृत्ताकार केन्द्रीय कक्ष है । इसके तीन ओर तीन कक्ष लोक सभा, राज्य सभा और पूर्ववर्ती ग्रंथालय कक्ष (जिसे पहले प्रिंसेस चैम्बर कहा जाता था) हैं और इनके मध्य उद्यान प्रांगण है । इन तीनों कक्षों के चारों ओर एक चार मंजिला वृत्ताकार भवन है, जिसमें मंत्रियों, संसदीय समितियों के सभापतियों के कक्ष, दलों के कार्यालय, लोक सभा तथा राज्य सभा सचिवालयों के महत्वपूर्ण कार्यालय और साथ ही संसदीय कार्य मंत्रालय के कार्यालय हैं । प्रथम तल पर तीन समिति कक्ष संसदीय समितियों की बैठकों के लिए प्रयोग किए जाते हैं । इसी तल पर तीन अन्य कक्षों का प्रयोग प्रेस संवाददाता करते हैं जो लोक सभा और राज्य सभा की प्रेस दीर्घाओं में आते हैं । भवन में छह लिफ्ट प्रचालनरत हैं जो कक्षों के प्रवेशद्वारों के दोनों ओर एक-एक हैं । केन्द्रीय कक्ष शीतल वायुयुक्त है और कक्ष (चैम्बर) वातानुकूलित हैं ।भवन के भूमि तल पर गलियारे की बाहरी दीवार प्राचीन भारत के इतिहास और अपने पड़ोसी देशों से भारत के सांस्कृतिक संबंधों को दर्शाने वाली चित्रमालाओं से सुसज्जित है। संसद भवन परिसर हमारे संसदीय लोकतंत्र के प्रादुर्भाव का साक्षी रहा है । संसद भवन परिसर में हमारे इतिहास की उन निम्नलिखित विभूतियों की प्रतिमाएं और आवक्षमूर्तियां हैं जिन्होंने राष्ट्र हित के लिए महान योगदान दिया है:-

(एक) चन्द्रगुप्त मौर्य

(दो) पंडित मोतीलाल नेहरू

(तीन) गोपाल कृष्ण गोखले

(चार) डा0 भीम राव अम्बेडकर

(पांच) श्री अरबिन्द घोष

(छह) महात्मा गाँधी

(सात) वाई.बी. चव्हाण

(आठ) पंडित जवाहर लाल नेहरू

(नौ) पंडित गोविन्द वल्लभ पन्त

(दस) बाबू जगजीवन राम

(ग्यारह) पंडित रवि शंकर शुक्ल

(बारह) श्रीमती इंदिरा गांधी

(तेरह) मौलाना अबुल कलाम आजाद

(चौदह) नेताजी सुभाष चन्द्र बोस

(पन्द्रह) के. कामराज

(सोलह) प्रो0 एन.जी. रंगा

(सत्रह) सरदार पटेल

(अठारह) बिरसा मुण्डा

(उन्नीस) आंध्र केसरी तंगुतुरी प्रकाशम

(बीस) जयप्रकाश नारायण

(इक्कीस) एस. सत्यमूर्ति

(बाईस) सी.एन. अन्नादुरै

(तेइस) लोकप्रिय गोपीनाथ बारदोली

(चौबीस) पी. मुथुरामालिंगा थेवर

(पच्चीस) छत्रपति शिवाजी महाराज

(छब्बीस) महात्मा बसवेश्वर

(सत्ताइस) महाराजा रणजीत सिंह

(अठाइस) शहीद हेमू कलानी

(उनतीस) चौधरी देवी लाल

(तीस) महात्मा ज्योतिराव फुले


केन्द्रीय कक्ष गोलाकार है और इसका गुम्बद जिसका व्यास 98 फुट (29.87 मीटर) है, को विश्व के भव्यतम गुम्बदों में से एक माना जाता है ।केन्द्रीय कक्ष ऐतिहासिक महत्व का स्थान है । 15 अगस्त, 1947 को ब्रिटिश शासन द्वारा भारत को सत्ता का हस्तान्तरण इसी कक्ष में हुआ था । भारतीय संविधान की रचना भी केन्द्रीय कक्ष में ही हुई थी ।शुरू में केन्द्रीय कक्ष का उपयोग पूर्ववर्ती केन्द्रीय विधान सभा और राज्य सभा के ग्रन्थागार के रूप में किया जाता था । 1946 में इसका स्वरूप परिवर्तित कर इसे संविधान सभा कक्ष में बदल दिया गया । 9 दिसम्बर, 1946 से 24 जनवरी, 1950 तक वहां संविधान सभा की बैठकें हुईं । वर्तमान में, केन्द्रीय कक्ष का उपयोग दोनों सभाओं की संयुक्त बैठकें आयोजित करने के लिए किया जाता है । लोक सभा के प्रत्येक आम चुनाव के बाद प्रथम सत्र के आरंभ होने पर और प्रत्येक वर्ष पहला सत्र आरंभ होने पर राष्ट्रपति केंद्रीय कक्ष में समवेत संसद की दोनों सभाओं को संबोधित करते हैं । जब दोनों सभाओं का सत्र चल रहा हो, केन्द्रीय कक्ष का उपयोग सदस्यों द्वारा आपस में अनौपचारिक बातें करने के लिए किया जाता है । केन्द्रीय कक्ष का उपयोग विदेशी गण्यमान्य राष्ट्राध्यक्षों द्वारा संसद सदस्यों को संबोधन के लिए भी किया जाता है । कक्ष में समानांतर भाषान्तरण प्रणाली की सुविधा भी उपलब्ध है ।

मंच के ऊपर मेहराब में महात्मा गांधी का चित्र लगा हुआ है जिसकी नक्काशी सर ओस्वाल्ड बर्ले द्वारा की गयी थी और जिसे भारतीय संविधान सभा के एक सदस्य श्री ए.पी. पट्टानी द्वारा राष्ट्र को उपहार स्वरूप दिया गया था । मंच के बायीं तथा दायीं ओर दीवार और मेहराबों पर निम्नलिखित गण्यमान्य राष्ट्रीय नेताओं के चित्र लगे हुए हैं :-

(एक) मदन मोहन मालवीय

(दो) दादाभाई नौरोजी

(तीन) लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक

(चार) लाला लाजपत राय

(पांच) मोतीलाल नेहरू

(छह) सरदार वल्लभभाई पटेल

(सात) देशबंधु चित्तरंजन दास

(आठ) रवीन्द्रनाथ टैगोर

(नौ) श्रीमती सरोजनी नायडू

(दस) मौलाना अबुल कलाम आजाद

(ग्यारह) डा0 राजेन्द्र प्रसाद

(बारह) जवाहरलाल नेहरू

(तेरह) सुभाष चन्द्र बोस

(चौदह) सी0 राजगोपालाचारी

(पन्द्रह) श्रीमती इन्दिरा गाँधी

(सोलह) डा0 बी.आर. अम्बेडकर

(सत्रह) डा0 राम मनोहर लोहिया

(अठारह) डा0 श्यामा प्रसाद मुखर्जी

(उन्नीस) राजीव गाँधी

(बीस) लाल बहादुर शास्त्री

(इक्कीस) चौधरी चरण सिंह

(बाईस) मोरारजी देसाई

(तेईस) स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर

कक्ष की दीवार पर अविभाजित भारत के 12 प्रांतों को दर्शाते हुए 12 स्वर्ण रंजित प्रतीक भी लगे हैं । केन्द्रीय कक्ष के चारों तरफ छह लॉबी हैं जहां गलीचे लगे हैं और वे सुसज्जित हैं । एक लाउंज केवल महिला सदस्यों के अनन्य उपयोग के लिए, एक प्राथमिक उपचार केन्द्र के लिए, एक लोक सभा के सभापति पैनल के लिए तथा एक संसद सदस्यों के लिए कंप्यूटर पूछताछ बूथ के लिए आरक्षित है । केन्द्रीय कक्ष की पहली मंजिल पर छह दीर्घाएं हैं । जब दोनों सभाओं की संयुक्त बैठकें होती हैं तो मंच के दायीं ओर की दो दीर्घाओं में प्रेस संवाददाता बैठते हैं, मंच के सामने की दीर्घा विशिष्ट दर्शकों के लिए रखी जाती है और बाकी तीन दीर्घाओं में दोनों सभाओं के सदस्यों के अतिथि बैठते हैं । लोक सभा कक्ष का आकार अर्द्ध-वृत्ताकार है जिसका फ्लोर एरिया लगभग 4800 वर्गफुट (446 वर्गमीटर) है ।अध्यक्षपीठ डायमीटर के केन्द्र में ऊँचे प्लेटफार्म पर बनाया गया है जो अर्द्ध-वृत्त के दोनों छोरों से जुड़े हैं । अध्यक्ष की पीठ के ठीक ऊपर लकड़ी से बने पैनल पर जिसका मूल अभिकल्प एक प्रसिद्ध वास्तुकार सर इरबर्ट बेकर द्वारा तैयार किया गया था, बिजली की रोशनी से युक्त संस्कृत भाषा में लिखित आदर्श वाक्य अंकित है । अध्यक्षपीठ की दाहिनी ओर आधिकारिक दीर्घा है जो उन अधिकारियों के उपयोग के लिए होता है जिन्हें सभा की कार्यवाही के संबंध में मंत्रियों के साथ उपस्थित होना पड़ता है । अध्यक्षपीठ के बायीं ओर एक विशेष बॉक्स होता है जो राष्ट्रपति, राज्यों के राज्यपाल, विदेशी राष्ट्रों के राष्ट्राध्यक्षों और प्रधानमंत्रियों के परिवार के सदस्यों व अतिथिगण एवं अध्यक्ष के विवेकाधीन अन्य गण्यमान्य व्यक्तियों के लिए आरक्षित होता है । अध्यक्षपीठ के ठीक नीचे सभा के महासचिव की मेज होती है । उसके सामने एक बड़ा पटल होता है जो सभा का पटल होता है जिस पर मंत्रियों द्वारा औपचारिक तौर पर पत्र रखे जाते हैं, सभा के अधिकारीगण तथा सरकारी रिपोर्टर इस पटल के साथ बैठते हैं । कक्ष में 550 सदस्यों के बैठने की व्यवस्था है । सीटें छह खंडों में बंटे होते हैं, प्रत्येक खंड में ग्यारह कतारें हैं । अध्यक्षपीठ के दाहिनी ओर खंड संख्या 1 और बायीं ओर खंड संख्या 6 में प्रत्येक में 97 सीटें हैं । शेष प्रत्येक 4 खंडों में 89 सीटें हैं । कक्ष में प्रत्येक सदस्य, जिसमें मंत्रिगण जो लोक सभा के सदस्य हैं, एक सीट आवंटित किया जाता है । अध्यक्षपीठ की दाहिनी तरफ सत्ता पक्ष के सदस्य और बायीं तरफ विपक्षी दल/समूहों के सदस्य स्थान ग्रहण करते हैं । उपाध्यक्ष बायीं तरफ अगली पंक्ति में स्थान ग्रहण करते हैं । अध्यक्ष के आसन के ठीक सामने जहां लकड़ी की कलापूर्ण नक्काशी है, भारतीय विधायी सभा के प्रथम निर्वाचित अध्यक्ष श्री विट्ठल भाई पटेल का चित्र लगा हुआ है । लोक सभा कक्ष के चारों ओर की लकड़ी के 35 सुनहरे डिजाइन हैं । जो अविभाजित भारत के विभिन्न प्रांतों, शासित क्षेत्रों और कतिपय अन्य ब्रिटिश उपनिवेशों का प्रतिनिधित्व करते हैं । चैम्बर से सटे और इसकी दीवारों से संलग्न दो कवर्ड गलियारे हैं जिन्हें भीतरी लॉबी और बाह्य लॉबी कहा जाता है । ये लॉबियां पूर्णतः सुसज्जित हैं और सदस्यों के बैठने और आपस में अनौपचारिक चर्चा करने के लिए सुविधाजनक स्थल है । लोक सभा चैम्बर के पहले तल में कई सार्वजनिक दीर्घाएं और प्रेस दीर्घा है । प्रेस दीर्घा आसन के ठीक ऊपर है और इसके बायीं ओर अध्यक्ष दीर्घा (अध्यक्ष के अतिथियों के लिए) राज्य सभा दीर्घा (राज्य सभा के सदस्यों के लिए) और विशेष दीर्घा है । सार्वजनिक दीर्घा प्रेस दीर्घा के सम्मुख है । प्रेस गैलरी के दायीं ओर राजनयिक और गण्यमान्य आगंतुकों की विशिष्ट दीर्घा है ।

नए संसद भवन की आवश्यकता

अगस्त 2019 में, लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति ने सरकार से औपनिवेशिक युग के संसद भवन के विस्तार और आधुनिकीकरण का आग्रह किया।दोनों अध्यक्षों ने बताया कि संसद भवन 92 वर्ष पुराना था और इसे तत्काल मरम्मत की आवश्यकता थी। सरकार ने पिछले सप्ताह संसद को सूचित किया था कि यह जिस भवन से बाहर निकलती है वह "संकट और अधिक उपयोग के संकेत दिखा रहा है", जो एक नए संसद भवन के प्रस्तावित निर्माण का एक कारण है। कांग्रेस सांसद आनंद शर्मा ने सरकार से राष्ट्रपति भवन से इंडिया गेट तक तीन किलोमीटर लंबे सेंट्रल विस्टा के प्रस्तावित पुनर्विकास का कारण पूछा था, और एक नई संसद भवन और एक सामान्य केंद्रीय सचिवालय का निर्माण, जिसकी घोषणा पिछले अक्टूबर में की गई थी। साल। उन्होंने परियोजना के कुल खर्च को भी जानना चाहा।

4 मार्च को इस सवाल का जवाब देते हुए, केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने राज्य सभा को सूचित किया कि संसद भवन का निर्माण 1921 में शुरू हुआ था और इसे 1927 में चालू किया गया था। "वर्षों से, संसदीय गतिविधियाँ और संख्या इसमें काम करने वाले लोगों और आगंतुकों में कई गुना वृद्धि हुई है। इसलिए, इमारत संकट और अधिक उपयोग के संकेत दे रही है। इसके अलावा, निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्गठन के साथ, लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ने की संभावना है और वर्तमान भवन में किसी भी अतिरिक्त सदस्य को रखने के लिए कोई स्थान नहीं है, ” मंत्री महोदय ने प्रश्न का उपरोक्त जवाब दिया।

उन्होंने कहा कि नवनिर्मित संसद एनेक्सी और पुस्तकालय भवन में अतिरिक्त कार्यालय स्थान "आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अपर्याप्त" था।देश के नए संसद भवन के निर्माण के लिए भारत के सबसे बड़े समूह टाटा को चुना गया है, जिसकी लागत 117 मिलियन डॉलर है और 21 महीने में पूरा होने की संभावना है। नए बनने वाले संसद भवन में भारतीयता की छाप भरपूर रखने की वकालत बैठक में की गई साथ ही कहा गया कि भवन निर्माण में भारतीय वास्तुकला, भारतीय शिल्प कला को ही प्रमुखता दी जानी चाहिए और जिस तरह मौजूदा संसद भवन में वेदों और उपनिषदों के श्लोक लिखे हुए हैं उससे ज्यादा नए भवन में उकेरे जाने चाहिए। तर्क यह दिया गया कि जब अंग्रेजों ने संसद भवन में वेदों और उपनिषदों को इतना महत्वपूर्ण स्थान दिया तो अब आजाद भारत में भारतीयों के द्वारा नए संसद भवन का निर्माण हो रहा है तो इसे और भी बढ़ा देना चाहिए। साथ ही बैठक में यह मांग भी रखी गई कि भारतीय संस्कृति, लोकाचार, भारतीय परंपरा को भी भरपूर स्थान संसद भवन में दिया जाना चाहिए। यही नहीं, बोर्ड बैठक में यह मांग भी रखी गई कि नए भवन में आध्यात्मिक केंद्र भी बनाया जाना चाहिए जिसमें सर्व धर्म प्रार्थना स्थल भी हो। संसद भवन में स्वदेशी कलाकृतियां को भी भरपूर स्थान दिए जाने की सदस्यों ने भरपूर वकालत की।

नए संसद भवन का निर्माण और रूपरेखा

एक नया लोकसभा केंद्रीय हॉल जो संसद के 900 सदस्यों (सांसदों) के लिए पर्याप्त बड़ा है, और संयुक्त संसद सत्र के लिए 1,350 सांसदों के लिए पर्याप्त लचीला है, यह सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास योजना का केंद्रबिंदु होगा, जिसकी समय सीमा 2024 है। एक उभरती हुई योजना का वर्तमान डिजाइन एक त्रिकोणीय परिसर की कल्पना करता है, जिसमें एक तिरछा बीम प्रकाश ऊपर आकाश में प्रकाश करता है। और अधिक सांसारिक स्तर पर, सांसद दोनों ओर से सुलभ, व्यापक दो सीटों वाले बेंच में आराम से बैठेंगे, ताकि किसी को भी इसके माध्यम से निचोड़ना न पड़े - और जो संयुक्त सत्र आयोजित होने पर, तीन को समायोजित कर सके।

पुनर्विकास उत्तर और दक्षिण ब्लॉक को भी देखेगा, जो घर मंत्रालयों, संग्रहालय बन रहे हैं; एक केंद्रीय सचिवालय का निर्माण, और एक नया राजपथ।अहमदाबाद स्थित एचसीपी डिज़ाइन द्वारा प्रस्तुत प्रस्तुतियों के अनुसार, नया त्रिकोणीय संसद भवन मौजूदा परिसर के बगल में आएगा, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र को कुछ नए सरकारी भवनों के साथ स्थानांतरित किया जाएगा जहां यह स्थित है, और राष्ट्रीय अभिलेखागार को फिर से तैयार किया जाएगा। प्रधान मंत्री का निवास मौजूदा दक्षिण ब्लॉक परिसर के पीछे स्थानांतरित किया जाएगा, जबकि उपराष्ट्रपति का निवास उत्तरी ब्लॉक के पीछे चलेगा।

सबसे पहले ब्लॉक नए संसद परिसर और IGNCA में सरकारी कार्यालय होंगे। पूर्व मौजूदा संसद परिसर के भीतर 13 एकड़ जमीन पर आएगा। और यह वर्तमान की तुलना में बहुत बड़ा होगा, जहां लोकसभा हॉल किसी भी अधिक सांसद को फिट नहीं कर सकता है। और जल्द ही जरूरत पड़ सकती है।संवैधानिक संशोधन पर रोक लगाते हुए, भारत 2026 में लोकसभा के आकार पर एक निर्णय लेगा। मार्च 2019 में हिंदुस्तान टाइम्स के एक लेख में, राजनीतिक वैज्ञानिकों मिलन वैष्णव और जेमी हेंसन ने अनुमान लगाया कि लोकसभा को 2026 तक 848 सदस्यों की आवश्यकता हो सकती है। आनुपातिक प्रतिनिधित्व की भावना रखना। तुलना, नए परिसर में 900 सांसदों को रखने का लक्ष्य है। दिसंबर 2019 में, पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने लोकसभा की ताकत को मौजूदा 545 से 1,000 सांसदों को दोगुना करने का आहान किया।

सेंट्रल विस्टा के रीडिजाइन के आर्किटेक्ट प्रभारी बिमल पटेल के अनुसार, योजना एक अलग लाउंज बनाने की भी है। वर्तमान में, सेंट्रल हॉल एक के रूप में कार्य करता है, हालांकि यह उद्देश्य के लिए डिज़ाइन नहीं किया गया है। यहां तक कि सांसदों के लिए कार्यालय स्थान भी हो सकता है।

पटेल के अनुसार वर्तमान योजना, "लोकसभा, राज्यसभा और, एक खुला-आंगन है जिसके चारों ओर एक लाउंज होगा और बीच में एक फ़ोयर होगा।" कार्यालय भवन की परिधि के साथ होगा। ” पटेल और उनकी टीम ने क्यूबा, मिस्र, सिंगापुर और जर्मनी सहित कई देशों के संसदों में बैठने की व्यवस्था का अध्ययन किया। सांसदों ने अक्सर अंतरिक्ष की कमी की शिकायत की है, खासकर संयुक्त सत्र के दौरान। वर्तमान लोकसभा में कोई स्थान नहीं है। पटेलों ने कहा, "स्तंभों के पीछे" भी सीटें हैं। एक सांसद को घर में बैठने के लिए लगभग 40 सेमी 50 सेंटीमीटर जगह मिल जाती है। नई व्यवस्था के तहत यह बढ़कर 60 से 60 हो जाएगा।

अधिक महत्वपूर्ण बात, पटेल ने बताया, सभी को एक डेस्क मिलती है। “वर्तमान में, डेस्क केवल पहली दो पंक्तियों के लिए हैं। आप अपना आईपैड या फाइल उन पर डाल सकते हैं। ” और, ज़ाहिर है, एक बेंच के पास दो, "आपको बैठने के लिए वास्तव में कभी किसी के सामने जाने की ज़रूरत नहीं है। यह वास्तव में इसे प्रबंधित करने का सबसे आरामदायक तरीका है, ”उन्होंने कहा। संयुक्त सत्रों के लिए डेस्क दो के बजाय तीन सांसदों को समायोजित करेंगे। नए परिसर के लिए एक त्रिकोणीय संरचना चुनने के पीछे का कारण बताते हुए, पटेल ने कहा, "एक कारण कार्यात्मक है: यह त्रिकोणीय भूखंड है। त्रिकोण कुछ अर्थों में भी बहुत महत्वपूर्ण हैं। वे सभी पवित्र ज्यामिति में मनाए जाते हैं ...; नई संसद के ऊपर एक शिखर क्यों? चर्चों के बारे में सोचो, मंदिरों के बारे में सोचो आदि धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र में एक पवित्र इमारत संसद है और इसलिए प्रधान मंत्री द्वारा लोकतंत्र के मंदिर के रूप में प्रसिद्ध है। " दिलचस्प है, नया डिजाइन सेंट्रल हॉल में विभिन्न आकारों की खिड़कियों की परिकल्पना करता है। “हम ऐसी खिड़कियां बना रहे हैं जो हॉल के अंदर असमान आकार की होंगी। हम ऐसा क्यों कर रहे हैं? यह भारत की विविधता को दर्शाता है, यहां सब कुछ अलग है और इसलिए इस कमरे में एक भी खिड़की समान नहीं होनी चाहिए, ”पटेल ने कहा।
“प्रौद्योगिकी-वार हम दृश्य और ध्वनिक कारकों को देख रहे हैं। ध्वनिक वास्तव में महत्वपूर्ण है। वर्तमान में ध्वनिक टाइलों को बाद में रखा गया था। उस समय अल्पविकसित अवधारणा गूंज से बचने के लिए थी। वास्तव में एक परिष्कृत ध्वनिक डिजाइन आपके द्वारा उत्पादित ध्वनि की गुणवत्ता के बारे में है। यह ध्वनिक इंजीनियरों द्वारा सबसे अच्छी तरह से समझा जाता है ... हमारे पास एक बहुत अच्छी कंपनी है जो ऐसा करने वाले भौतिकविदों से भरी हुई है, "पटेल ने समझाया। उन्होंने कहा कि इन-बिल्ट ट्रांसलेशन सिस्टम भी होंगे।

नई परियोजना के तहत नए सचिवालय में 10 भवन बनाए जाएंगे।प्रस्तावित योजना के अनुसार, विभिन्न मंत्रालयों के लिए एक साझा केंद्रीय सचिवालय निर्माण का मार्ग प्रशस्त करने के लिए आईजीएनसीए इमारत के अलावा उद्योग भवन, निर्माण भवन, शास्त्री भवन, उपराष्ट्रपति आवास सहित नौ अन्य इमारतों को ध्वस्त किया जा सकता है। इसके अलावा राष्ट्रीय अभिलेखागार के मॉडल को भी बदला जाएगा। प्रस्तावित योजना के अनुसार, विभिन्न मंत्रालयों के लिए एक साझा केंद्रीय सचिवालय निर्माण का मार्ग प्रशस्त करने के लिए आईजीएनसीए इमारत के अलावा उद्योग भवन, निर्माण भवन, शास्त्री भवन, उपराष्ट्रपति आवास सहित नौ अन्य इमारतों को ध्वस्त किया जा सकता है। इसके अलावा राष्ट्रीय अभिलेखागार के मॉडल को भी बदला जाएगा।

नए प्रस्तावित योजना के तहत प्रधानमंत्री आवास और कार्यालय में भी परिवर्तन देखने को मिलेगा। केंद्र सरकार का कहना है कि झोपड़ियों द्वारा किए गए अतिक्रमण के कारण लगभग 90 एकड़ प्रमुख भूमि बर्बाद हो गई है। इस जगह का उपयोग साउथ ब्लॉक के पीछे प्रधानमंत्री के लिए नया आवास और ऑफिस बनाने के लिए किया जाएगा। दोनों को इस तरीके से बनाया जाएगा कि प्रधानमंत्री आवास से ऑफिस पैदल भी जा सकें। इसके अलावा उपराष्ट्रपति के आवास को भी बदला जाएगा। उपराष्ट्रपति का नया पता नार्थ ब्लॉक के उत्तर में प्रधानमंत्री के घर के ठीक सामने होगा। रायसीना हिल पर राष्ट्रपति भवन के सामने स्थिति नॉर्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक से ही प्रधानमंत्री कार्यालय, गृह मंत्रालय और वित्त मंत्रालय जैसे महत्वपूर्ण महकमे संचालित होते हैं। संसद भवन के पुनर्विकास से जुड़ी मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी योजना के तहत साउथ ब्लॉक में बनने वाले संग्रहालय में 1857 से पहले की ऐतिहासिक विरासत को संजोया जायेगा, जबकि नॉर्थ ब्लॉक में 1857 से 1947 तक जंग ए आजादी के इतिहास की यादें ताजा की जा सकेंगी।

मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि संग्रहालय में तब्दील होने के बाद नॉर्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक में भारत के आधुनिक इतिहास की जीवंत तस्वीर का लोग दीदार कर सकेंगे। फिलहाल साउथ ब्लॉक में प्रधानमंत्री कार्यालय और विदेश मंत्रालय तथा नॉर्थ ब्लॉक में गृह मंत्रालय और वित्त मंत्रालय है। मंत्रालय को सौंपे गये शुरुआती डिजायन के मुताबिक समग्र केन्द्रीय सचिवालय के लिये राजपथ के दोनों ओर दस भव्य आठ मंजिला इमारतों में सभी मंत्रालयों को स्थानांतरित किया जायेगा। लुटियन क्षेत्र स्थित विभिन्न मंत्रालयों में 25 से 32 हजार केन्द्रीय कर्मचारी कार्यरत हैं। फिलहाल ये मंत्रालय शास्त्री भवन, कृषि भवन, निर्माण भवन और उद्योग भवन में स्थित हैं। प्रस्तावित केन्द्रीय सचिवालय कार्ययोजना के तहत इन भवनों के अलावा उपराष्ट्रपति भवन और विज्ञान भवन को भी हटा कर इन्हें नये सिरे से बनाया जाना है। इसके अलावा प्रधानमंत्री कार्यालय और प्रधानमंत्री आवास को आसपास ही नॉर्थ ब्लॉक के निकट बनाये जाने का प्रस्ताव है। उल्लेखनीय है कि प्रस्तावित कार्ययोजना को अंजाम देने के लिये दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) सेंट्रल विस्टा क्षेत्र में लगभग 100 एकड़ जमीन का भू उपयोग बदलने की अधिसूचना जारी कर चुका है। इसके तहत 9.5 एकड़ का भूखंड संसद भवन की नयी इमारत के लिये 15 एकड़ जमीन आवासीय उपयोग के लिये और 76 एकड़ जमीन कार्यालय उपयोग के लिये चिन्हित की जा चुकी है।

नए संसद भवन की आवश्यकता पर अलग  राय

एक नया संसद भवन बनाकर इस समृद्ध जीवित विरासत को एक तरफ फेंकना अपरिहार्य है। उन्नत कारणों में से एक सीटों का परिसीमन रहा है। परिसीमन का मुद्दा अत्यंत जटिल और विवादास्पद है, क्योंकि यह बताता है कि अधिक संख्या में सीटों के साथ जनसंख्या नियंत्रण का खराब रिकॉर्ड है। यही कारण है कि, 2001 में, इसे 25 वर्षों के लिए टाल दिया गया था।रिपोर्टों के अनुसार, जनसंख्या को 2061 तक स्थिर करने और उसके बाद गिरावट का अनुमान लगाया गया है। यह घटती प्रजनन दर से भी पैदा होता है। इसका मतलब यह होगा कि संसद की बढ़ी हुई ताकत, अगर बिल्कुल भी, केवल 40 वर्षों के लिए होगी। निश्चित रूप से इस छोटी अवधि के लिए एक नया संसद भवन पूरी तरह अनावश्यक है। यह इंगित करना भी प्रासंगिक है कि एक बढ़ी हुई ताकत के साथ, सदस्यों को अपने विचार रखने के लिए उपलब्ध समय आगे तक सीमित होगा। इस और कई अन्य कारकों पर भी विचार करना होगा और इतनी बड़ी इमारत बनाने से पहले इस पर ध्यान देना चाहिए। दिए गए अन्य कारण भवन की आयु और इसकी भूकंपीय और संरचनात्मक अस्थिरता है। किसी भी ठोस डेटा या रिपोर्ट के अभाव में, इसे प्रमाणित करना कठिन है। यह और अधिक, जब कोई इस तथ्य पर विचार करता है कि इस क्षेत्र में एक समान प्रकृति और विंटेज की कई इमारतें हैं, जिनमें राष्ट्रपति भवन भी शामिल है। इसके अलावा, इसे असुरक्षित रूप में वर्गीकृत करते हुए संग्रहालय में परिवर्तित करने का मतलब होगा कि आम आगंतुक को जोखिम में डाल दिया जाएगा।

हाल ही में रिपोर्टों में सुझाए गए पुराने प्रस्ताव को पुनर्निर्मित करने के लिए एक नए संसद भवन की आवश्यकता है, जो कि विश्वास के योग्य है। एक विशाल लागत पर एक मधुमक्खी का निर्माण अनुकूली पुन: उपयोग के सिद्धांतों के खिलाफ होगा, जो कि दुनिया भर में विरासत भवनों और संसदों के संरक्षण के लिए आदर्श है। कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, फ़िनलैंड, जर्मनी और कई अन्य प्रगतिशील देशों ने अपनी विरासत संसद भवनों को पुनर्निर्मित किया है।हमारे संसद भवन के एक प्रारंभिक अध्ययन से पता चला है कि सेंट्रल हॉल को लोकसभा हॉल के रूप में पुनर्निर्मित किया जा सकता है और, आंतरिक लेआउट के पुनर्निर्माण के साथ, कम से कम आराम से 800 सदस्यों को समायोजित कर सकता है। इसी तरह राज्यसभा वर्तमान लोकसभा हॉल में जा सकती है। सेंट्रल हॉल में संसद के संयुक्त या विशेष सत्र आयोजित किए जा सकते हैं। एक नए संसद भवन का निर्माण और वर्तमान को त्यागना किसी भी परिस्थिति में उचित नहीं है। प्रस्तावित डिजाइन परिपक्व पेड़ों के साथ एक निर्दिष्ट पार्क में है और क्षेत्र के वर्तमान वास्तुशिल्प चरित्र के अनुरूप नहीं है।विभिन्न सांविधिक निकायों और एजेंसियों द्वारा इस क्षेत्र के वास्तुशिल्प और सौंदर्य चरित्र को संरक्षित करने के लिए मंजूरी दी गई है, इस परियोजना के लिए स्वीकृत किए जाने की मंजूरी के साथ, यह प्रतीत होता है कि इसके विपरीत सभी सलाह के खिलाफ परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए एक भीड़ है। इस देश के जीवित इतिहास और विरासत का परित्याग, जो संसद भवन का प्रतीक है, भारतीय लोगों की इच्छा का घोर अपमान होगा, जिसका वह प्रतिनिधित्व करता है।

बड़ा सवाल पुराने संसद भवन के भाग्य का है। पटेल ने कहा कि योजना अभी भी विकसित हो रही है। इसे पहले एक संग्रहालय में बदलने की योजना थी। वर्तमान सोच कुछ अवसरों पर इसका उपयोग करना है, उन्होंने जोड़ा, यह इंगित करते हुए कि इमारत, जबकि प्रतिष्ठित है, "जटिल" है, और उस कार्यक्षमता को ध्यान में रखते हुए डिज़ाइन किए जाने के बजाय इसमें कार्यक्षमता जोड़ी गई। "लोग जिस तरह से काम करते हैं उसका पालन करते हैं, लेकिन हमें पता चलता है कि उनमें से कई केवल एक इमारत की प्रतिक्रियाएं हैं जो कभी संसद के लिए नहीं थी, लेकिन फिर भी बन गई ...।" दिल्ली के ऐतिहासिक परिदृश्य का यह व्यापक पुनर्निर्माण किसी भी उचित हितधारक चर्चा को आयोजित करने या सार्वजनिक राय प्राप्त करने के अभाव में हो रहा है। एक क्षेत्र में इसके प्रभाव के बारे में कोई अध्ययन नहीं किया गया है, जो यूनेस्को से विश्व धरोहर का दर्जा प्राप्त करने वाला था।राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की 100 वीं वर्षगांठ के पूरे केंद्रीय विस्टा पुनर्विकास परियोजना के 2024 तक पूरा होने की उम्मीद है।जब भारत एक हताश आर्थिक स्थिति में है और एक अभूतपूर्व महामारी से पीड़ित है और जब इसकी बढ़ती आबादी को अच्छे शैक्षणिक संस्थानों, चिकित्सा सुविधाओं और सार्वजनिक परिवहन की आवश्यकता होती है, तो मोदी वास्तविकता से पूरी तरह से उदासीन रहते हुए बेतुकी भव्यता का आनंद लेते हैं।

संसद भवन भारतीय लोकतंत्र का मंदिर है और मंदिर का निर्माण और पुनर्गठन उनकी आवश्यकताओं को समझते हुए करना कितना गलत और सही है, यह भारत की सर्वोपरि जनता ही तय कर सकती है। संसद से जनता की आत्मा ही उनके प्रतिनिधियों के मुंह से बोलती है और आत्मा की आवाज़ को विस्मित करना या दिग्भ्रमित करना किसी भी लोकतान्त्रिक इतिहास में दुर्गम और दुरूह कार्य माना जाता है। देश की सारी नीतियों का गठन संसद भवन में होता है उस स्थान को भी नवीनतम तकनीकियों से लैश होना ही चाहिए और इसे अगले कम से कम 50 सालों की जरूरतों को सोच कर बनाया जाना चाहिए ताकि इस पर लगने वाले एक एक रूपए का इस्तेमाल जायज़ ठहराया जा सके। लोकतंत्र सिर्फ किसी भवन में जिन्दा नहीं रहता लेकिन किसी भवन की सुनहरी छाँव में फलता-फूलता जरूर है।

                                                                                             सलिल सरोज