साहित्य चक्र

21 October 2022

कविताः घर पे मानते हैं




हफ्तों पहले से साफ़-सफाई में जुट जाते हैं
चूने के कनिस्तर में थोड़ी नील मिलाते हैं
अलमारी खिसका खोयी चीज़ वापस पाते हैं
दोछत्ती का कबाड़ बेच कुछ पैसे कमाते हैं
चलो इस दफ़े दिवाली घर पे मनाते हैं ....

दौड़-भाग के घर का हर सामान लाते हैं
चवन्नी -अठन्नी पटाखों के लिए बचाते हैं
सजी बाज़ार की रौनक देखने जाते हैं
सिर्फ दाम पूछने के लिए चीजों को उठाते हैं
चलो इस दफ़े दिवाली घर पे मनाते हैं ....

बिजली की झालर छत से लटकाते हैं
कुछ में मास्टर बल्ब भी लगाते हैं
टेस्टर लिए पूरे इलेक्ट्रीशियन बन जाते हैं
दो-चार बिजली के झटके भी खाते हैं
चलो इस दफ़े दिवाली घर पे मनाते हैं ....

दूर थोक की दुकान से पटाखे लाते है
मुर्गा ब्रांड हर पैकेट में खोजते जाते है
दो दिन तक उन्हें छत की धूप में सुखाते हैं
बार-बार बस गिनते जाते है
चलो इस दफ़े दिवाली घर पे मनाते हैं ....

धनतेरस के दिन कटोरदान लाते है
छत के जंगले से कंडील लटकाते हैं
मिठाई के ऊपर लगे काजू-बादाम खाते हैं
प्रसाद की थाली पड़ोस में देने जाते हैं
चलो इस दफ़े दिवाली घर पे मनाते हैं ....

अन्नकूट के लिए सब्जियों का ढेर लगाते है
भैया-दूज के दिन दीदी से आशीर्वाद पाते हैं
चलो इस दफ़े दिवाली घर पे मनाते हैं ....

दिवाली बीत जाने पे दुखी हो जाते हैं
कुछ न फूटे पटाखों का बारूद जलाते हैं
घर की छत पे दगे हुए राकेट पाते हैं
बुझे दीयों को मुंडेर से हटाते हैं
चलो इस दफ़े दिवाली घर पे मनाते हैं ....

बूढ़े माँ-बाप का एकाकीपन मिटाते हैं
वहीँ पुरानी रौनक फिर से लाते हैं
सामान से नहीं, समय देकर सम्मान जताते हैं
उनके पुराने सुने किस्से फिर से सुनते जाते हैं
*चलो इस दफ़े दिवाली घर पे मनाते हैं...


                                                    - डॉ.रीतेश झारिया


लेख- ध्यान रखें खंडित न हो भाईचारे का भाव क्योंकि चुनाव है

 कोई भी चुनाव आखरी नहीं होता है। और रिश्तों से बढ़कर तो कतई नहीं। हम पद पाने की होड़ में ये भूल जाते है कि हमसे पहले भी चुनाव हुए है और आगे भी होंगे। इसलिए कुछ वोटों के लिए परिवार के लोगों, मित्रों, सगे-सम्बन्धियों, पड़ोसियों और अन्य से दुश्मनी के भाव से पेश आना सही नहीं है। क्योंकि चुनाव की रात ढलते ही हमें अपने आगे के दिन इन्ही लोगों के साथ व्यतीत करने है।  चुनाव में कुछ लोगों द्वारा इसे आपसी साख का प्रश्न बना लिया जाता है जो धीरे-धीरे जहर का रूप ले लेता है। बढ़ती प्रतिद्धंद्विता रिश्तों का क़त्ल करने लगती है। अगर कोई ऐसे समय साथ न दे तो मित्र भी दुश्मन लगने लग जाते है। मगर यह हमारी भूल है।







'एकता' और 'भाईचारा' किसी प्रगतिशील समाज की मूलभूत ज़रूरत है। लेकिन सामाज विभिन्न जातियों और समुदायों में बंटा हुआ है, कई बार ये वजहें कड़ुवाहट पैदा करती हैं। ऐसी स्थितियों में ही सजग रहने की ज़रूरत होती है। शायरों ने 'एकता' और 'भाईचारा' जैसे बुनियादी इंसानी जज़्बातों को ख़ूबसूरत अल्फ़ाज़ों से नवाजा है। हमारे देश में चुनाव जहाँ लोकतंत्र के लिए पर्व का रूप लेकर आते है वही ये हमारे समाज में आपसी भाईचारे और एकता को खत्म करने में किसी यम से कम नहीं है। सत्ता का नशा ऐसे समय चरम पर होता है जो हमारे आपसी प्यार को निगल जाता है और दीखते है तो सिर्फ वोट।


कई प्रत्याशी (सभी नहीं)  इन दिनों चुनावी लाभ के लिए मुद्दे उठाते हैं और एक-दूसरे पर आरोप लगाते हैं, जिसका कारण है कि पक्ष और विपक्ष के बीच रिश्तों में कमी आ गई है। सभी लोग एक-दूसरे पर बयानों के जरिए आक्रामक प्रहार करते रहते हैं और आपस में उलझते रहते हैं, जिसके कारण समस्याओं का तार्किक रिश्ता ही जैसे रुक गया है। सुधार के पक्ष में जो काम होने चाहिए वो नहीं हो पा रहे हैं। विकास की दिशा में भी ठोस कदम उठाना और ऐसी कई सारी चर्चाएं उठने ही नहीं पाती है और बात वहीं की वहीं धरी रह जाती है। चुनाव धार्मिक युद्ध बन जाते हैं, हिन्दू-मुस्लिम और जाति -पाति में फूट डाल देते हैं, प्रत्याशी नेता। चुनाव तो खत्म हो जाते हैं लेकिन वह फूट आजीवन चलती रहती है।


 चुनाव में कुछ लोगों द्वारा इसे आपसी साख का प्रश्न बना लिया जाता है जो धीरे-धीरे जहर का रूप ले लेता है। बढ़ती प्रतिद्धंद्विता रिश्तों का क़त्ल करने लगती है। अगर कोई ऐसे समय साथ न दे तो मित्र भी दुश्मन लगने लग जाते है। मगर यह हमारी भूल है। कोई भी चुनाव आखरी नहीं होता है। और रिश्तों से बढ़कर तो कतई नहीं। हम पद पाने की होड़ में ये भूल जाते है कि हमसे पहले भी चुनाव हुए है और आगे भी होंगे। इसलिए कुछ वोटों के लिए परिवार के लोगों, मित्रों, सगे-सम्बन्धियों, पड़ोसियों और अन्य से दुश्मनी के भाव से पेश आना सही नहीं है। क्योंकि चुनाव की रात ढलते ही हमें अपने आगे के दिन इन्ही लोगों के साथ व्यतीत करने है।


ऐसा भी देखने में आता है कि कई प्रतिद्वंदी ऐसे समय अपनी पिछली हारों का बदला लेने को आतुर रहते है। और इस बदले कि आग में गाँवों में आपसी दंगे-फसाद शुरू हो जाते है। जो गाँव का वातावरण ख़राब ही नहीं करते; कई बार गाँव की पावन भूमि को लहूलुहान कर देते है। जो लम्बे तनाव का कारण बनती है। ऐसे समय हमें सोचना चाहिए कि चुनाव खेल कि तरह है और इसमें खेल भावना का महत्व है। हार-जीत जीवन में चलती रहती है। इसे अपनी अपनी साख का विषय न बनाये। हार को भूलकर एक समझदार नागरिक होने का परिचय दे और सहनशील बने।


दूसरी ओर जीते उम्मीदवार की जिम्मेवारी ऐसे समय और बढ़ जाती है। वह उसे वोट न करने वालों को भी अपना समझे। क्योंकि अब वो सभी के प्रतिनधि है। मगर दुर्भाग्य से कुछ जीते हुए उम्मीदवार इस बात को नहीं समझ पाते और वो बदलें की भावना से हारे हुए पक्ष को चिढ़ाते है। जिससे भाईचारे और आपसी तालमेल को ठेस पहुँचती है। जो आस-पास के वातावरण को ख़राब करती हुई पूरे गाँव को अपनी चपेट में ले लेती है। कई बार तो ऐसी छोटी-छोटी बातें भयानक मुद्दे बन जाती है। जो अंतत थानों और कोर्ट कचहरी तक पहुँच जाती है। जहाँ दोनों पक्षों को नुक्सान के अलावा कुछ नसीब नहीं होता।

इसलिए चुनाव के समय एक समझदार नागरिक होने का परिचय दे। चुनावी राजनीति में भाईचारे को बचाकर रखे। वोट का सम्मान तभी होगा जब हम एक दूसरे का सम्मान करेंगे। योग्य व्यक्ति को वोट देंगे तो साख के प्रश्न ही नहीं उठेंगे। प्रश्न नहीं उठेंगे तो शांति होगी। शांति होगी तो उचित तरीके से मतदान होंगे और सही प्रतिनिधि चुने जायेंगे और सही प्रतिनिधि ही जनहित के काम कर  सकते है। इसलिए ऐसे समय चुनावी लाभ के लिए साम्प्रदायिक सद्भाव, भाईचारे के शांतिपूर्ण माहौल को बिगाडऩे का प्रयत्न नहीं करना चाहिए।


आजकल राजनीतिक प्रत्याशियों में मानवीयता विलोपित हो चुकी है। येन-केन-प्रकारेण वोट प्राप्ति ही लक्ष्य रह गया है। इसे रोका जाना चाहिए व राजनीतिक सुचिता का बीजारोपण करना चाहिए। धन-बल का प्रयोग कर क्षेत्र में माहौल खराब किया जाता है, बूथ कैप्चरिंग किया जाता है और मतदान दलों को बंधक बनाया जाता है। इस समस्या को दूर करने के लिए विशेष रूप से कानून में प्रावधान किया जाना चाहिए। कानून का उल्लंघन करने वाले संबंधित दलों के प्रत्याशी व कार्यकर्ताओं पर कड़ा जुर्माना लगाया जाना चाहिए और प्रत्याशी के चुनाव लडऩे पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए और जो भी नियमों का उल्लंघन करते पाए जाते हैं। ऐसे लोगों पर मुकदमा भी दर्ज किया जाना चाहिए।


जब भी चुनाव घोषणा होती है, नेता लोग जनता को प्रलोभन, वादे, संप्रदायिकता, जाति के नाम पर लोगो में द्वेष पैदा करके चुनावी लाभ लेते नजर आते है।  चुनावी लाभ के लिए एक-दूसरे पर कीचड़ उछालते हैं, विवादास्पद बयानबाजी करते हैं और अपना वोट बैंक बढ़ाने की कोशिश करते रहते हैं। इसी प्रयास में वे जनता को गुमराह करते हैं और माहौल को खराब करते हैं। राजनीतिक लाभ के लिए वर्तमान में राजनीति का स्तर बहुत अधिक गिर गया है। सत्ता के लालच और विभिन्न पद पाने के लिए आजकल के नेता धर्म और जाति का सहारा लेकर अलग-अलग धर्म के लोगों को आपस में लड़वाने में कोई गुरेज नहीं कर रहे हैं। भड़काऊ भाषणों में शब्दों का चयन और मुद्दे ऐसे उठाए जाते हैं, जिससे आम जनता भड़कती है। अनर्गल बातें देश के शांतिप्रिय माहौल को बिगाड़ रही हैं। चुनावी लाभ के लिए होने वाले असंयमित और अमर्यादित बोल और भाषा पर लगाम लगाए जाने की सख्त आवश्यकता है।


                                                          लेखिका- प्रियंका सौरभ


सुंदर गज़ल- ऐसा लगता है



खाली  दिल का कोना लगता है,
हंसना  अपना  रोना  लगता  है।

क्यों  लगते हो मृगतृष्णा से तुम,
खो कर उनका  होना  लगता है।

दावत - पंगत की बात करो मत,
खाना   पत्तल - दोना  लगता है।

कितना  मुश्किल होता है जीवन,
ख़ुद  को  हरदम खोना पड़ता है।

तुमने  कंकड़  फेंका  जो जल में,
वो  पत्थर अब  सोना  लगता है।

आती  है  याद  तुम्हारी जब-जब,
तब-तब  चांद  सलोना लगता है।

रहती है मन  में  हरदम   दुविधा,
कोई   जादू  - टोना   लगता  है।


                                       लेखक- नागेन्द्र नाथ गुप्ता


कविताः आसार




नफ़रत सोच समझ कर करना
मोहब्बत होने के
आसार होते हैं।

बात सोच समझ कर करना
इश्क से सब
नासार होते हैं।

दिल की बात सोच समझ कर करना
अपनों में भी कई
गद्दार होते हैं।

हमराही को हमसफर 

सोच समझकर 

बनाना धोखा मिलने के
आसार होते हैं।


लेखक- राजीव डोगरा



17 October 2022

कविताः कितना अच्छा होता





        
बचपन के वो दिन काश लौट आते तो कितना अच्छा होता ।
बीते हुए पल फिर से जी पाते तो कितना अच्छा होता।।

पहले के जैसे सब एक समान होते तो एक दूजे के साथ होते,  
मिट्टी के खिलौने से बच्चे खुश हो जाते कितना अच्छा होता ।

नफरत की आंधियाँ सी थम जाती प्यार की हवाएं बहने लगती ।
हर तरफ काश प्यार ही प्यार होता तो कितना अच्छा होता ।।

हर रिश्ते में विश्वास होता एक अटूट प्यार का बंधन होता ।
सब सुख _ दुख में एक दूजे के साथ होते तो कितना अच्छा होता।।

ना किसी को अपनी अमीरी का घमंड होता न गरीबी का दुख:
हर एक दूसरे को सम्मान देते तो कितना अच्छा होता ।।

खुशी के पल फिर से जी पाते अपनो से जब चाहें मिल पाते 
किसी को खोने का कभी गम नही होता तो कितना अच्छा होता।।

सबको दो वक्त की रोटी नसीब होती न कोई प्यासे सोता ।
न किसी को भूख से तड़पना होता तो कितना अच्छा होता।।

न किसी से कोई बैर होता न कोई साजिश करते ।
ना किसी बेगुनाह की खून होती तो कितना अच्छा होता ।।

केवल पानी की प्यास होती , लक्ष्य पाने की आश होती 
मेहनत से सब कमाते आगे बढ़ते तो कितना अच्छा होता।।

संघर्ष से ज़िंदगी जीते ना कभी किसी से छल करते । 
ईमानदारी की एक दुनियां होती तो कितना अच्छा होता।।


                                         कवियत्री- मनीषा झा


आइए डिजिटल उपवास की ओर बढ़ते हैं!


हम और आप में से ज्यादातर लोग सोशल मीडिया के आदि हो रहे हैं। आज सोशल मीडिया का इस्तेमाल कुछ लोग दोस्त और रिश्तेदारों से जुड़ने के लिए कर रहे हैं, तो कुछ लोग वीडियो देखने के लिए। सोशल मीडिया हम सभी के लिए एक जाना पहचाना व लोकप्रिय माध्यम है। टेक्नोलॉजी और स्मार्ट उपकरणों के युग में आज नेटफ्लिक्स, अमेजॉन प्राइम और हॉटस्टार जैसे माध्यमों में फिल्म, वेब सीरीज आदि देखना और फेसबुक, टि्वटर पर स्क्रॉल करना हर उम्र के लिए एक आम बात हो गई है। यह इंसानी सभ्यता और अस्तित्व के लिए गंभीर चिंता का विषय है।






जबसे सोशल मीडिया आया है तब से हम अपने परिवार के साथ रहते हुए भी अलग-थलग महसूस करते हैं। सोशल मीडिया से युवाओं में अवसाद और डिप्रेशन का खतरा बढ़ रहा है, इसके साथ-साथ चिड़चिड़ापन भी दिखाई दे रहा है। हमारे समाज में सोशल मीडिया के आने के बाद लोगों में मोटापा, अनिद्रा और आलस्य की समस्या भी सामने आ रही है। कुछ रिसर्च बताते हैं कि सोशल मीडिया के आने के बाद से सुसाइड के मामले में बढ़ोतरी हुई है। सोशल मीडिया चेक और स्क्रोल करना, पिछले एक दशक के मुकाबले तेजी से लोकप्रिय गतिविधि बन गई है। सोशल मीडिया आज सभी देशों के लिए एक व्यावहारिक लत बन गई है।

आज फोन बड़े से लेकर बच्चों तक के लिए जरूरी हो गया है। जहां बच्चों की पढ़ाई ऑनलाइन हो रही है तो वही‌ बड़ों को अपडेट रखने के लिए फोन का इस्तेमाल करना पड़ रहा है। फोन का ज्यादा इस्तेमाल करने से लोगों में सोशल मीडिया की लत लग रही है। जिससे लोगों की नींद पर असर पड़ रहा है और नजरें तेजी से कमजोर हो रही है। नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ हेल्थ की एक रिपोर्ट के अनुसार अगर कोई व्यक्ति एक हफ्ते तक लगातार सोशल मीडिया का प्रयोग करता है, तो वह अपनी एक रात की नींद खो चुका होता है।

इसके अलावा हमारे युवाओं में ऑनलाइन सट्टेबाजी और ऑनलाइन खेलों में पैसा लगाने की लत भी सामने आ रही है। सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग से हमारे युवाओं में ना सिर्फ आत्मविश्वास की कमी आ रही है, बल्कि अकेलेपन का भी आभास लगातार बढ़ता जा रहा है। सोशल मीडिया से सबसे अधिक प्रभावित हमारा युवा वर्ग हो रहा है। सोशल मीडिया के कारण आज कई युवा आत्महत्या कर रहे हैं तो कई युवा मानसिक अस्वस्थ का शिकार हो रहे हैं। यह समस्या आने वाले समय में और बढ़ने की ओर इशारा करती है।

लोग घंटों ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर फिल्म, वेब सीरीज, कॉमेडी इत्यादि चीजें देख रहे हैं। जिससे लोग अपने समय का सही से इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं। एक व्यक्ति तभी स्वस्थ होगा, जब उसे पर्याप्त आहार और नींद मिलेगी। हम सभी के सामने एक प्रश्न है- सोशल मीडिया से होने वाली समस्याओं से कैसे निपटा जाए ? जवाब- आज हमें कम से कम सप्ताह में एक या दो बार सोशल मीडिया फ्री दिवस या डिजिटल उपवास करने की जरूरत है।

इसके अलावा हमें सोशल मीडिया का उपयोग उतना ही करना है, जितना वह हमारे लिए जरूरी है। अपने बच्चों को भी हमें सोशल मीडिया के खतरों व समस्याओं से रूबरू करवाना होगा और सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग से रोकना होगा। कंपनियों, स्कूलों और सरकारी संस्थानों को भी हफ्ते में एक दिन मोबाइल फ्री डे मनाने की जरूरत है।

लेखक- दीपक कोहली


कविताः हमें लगता था



अच्छाई के आगे बुराई की
जीत होती हैं,असत्य के आगे

सत्य की हमेशा जीत होती पर
मानो अब लगता,श्री कृष्ण की

बाते कहीं झूठी तो नहीं गीता का
सार अर्थ विहीन तो नहीं,कौन

कहता हैं कमबख्त अच्छाई के
आगे बुराई झुकती हैं,जिस्म तो

जिस्म भी रोज लुटती हैं,मां बाप
ने तो ब्याह कर के घर से निकाल

दिया,फिर मूड कर कौन देखता हैं,
की बेटी रोज मरती हैं या जीती हैं,

रोती हैं बिलखती हैं पर उसकी आवाज
उन तक कहां पहुंचती हैं,जो कभी छोटी

सी चीख पर उनकी जान निकल जाती थी,
आज उस बेटी की मुस्कान के
पीछे की दर्द भी दिखती हैं,

लेखिका- मनीषा झा जी

कविताः भावनाओं को व्यक्त



क्यों होते हैं हम स्वयं के साथ सख्त,
चलो करें, अपनी भावनाओं को व्यक्त,
चिकित्सक भी होता है कभी बीमार,
उसको भी जरूरत पड़ता है एक चिकित्सक

हां हम सभी को है हक,
तो किस बात का है मन में शक,
एक बालक की तरह कर दे सब बयां,
स्वयं पर और अपनों पर भी भरोसा रख

चल स्वयं को हृदय से परख,
जन्नत सी जिंदगी को क्यों बनाए नरक,
समझदारी में अपनी मासूमियत कहीं ना खोदे,
ना रहे, स्वयं के अंदर कोई कसक

क्यों होते हैं हम स्वयं के साथ सख्त,
चलो करें, अपनी भावनाओं को व्यक्त,
चिकित्सक भी होता है कभी बीमार,
उसको भी जरूरत पड़ता है एक चिकित्सक

लेखक- डॉ. माध्वी बोरसे


लेखः विश्व का हर सातवां व्यक्ति हर दिन भूखा सोता है।


एक तरफ भूखमरी तो दूसरी ओर महंगी दावतों और धनाढ्य वर्ग की विलासिताओं के अम्बार, बड़ी-बड़ी दावतों में जूठन की बहुतायत मानवीयता पर एक बदनुमा दाग है। इस तरह व्यर्थ होने वाले भोजन पर अंकुश लगाया जाए, विज्ञापन कंपनियों को भी दिशा निर्देश दिए जाएं, होटलों और शैक्षिक संस्थानों, दफ्तरों, कैंटिनों, बैठकों, शादी और अन्य समारोहों और अन्य संस्थाओं में खाना बेकार न किया जाए। इस भोजन का हम अपने समाज की बदहाली, भूखमरी और कुपोषण से छुटकारे के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। सरकार के भरोसे ही नहीं, बल्कि जन-जागृति के माध्यम से ऐसा माहौल बनाना चाहिए।





भारतीय संस्कृति पूरे विश्व के लिए मिसाल है। यहां सदियों से अन्न को ब्रह्म माना जाता रहा है। मगर आज आधुनिकता के दौर में लोग इतने अंधे होते जा हैं कि अन्न को पूजने के बजाय थाली में भोजन छोड़ना एक फैशन मानने लगे हैं। शायद इन लोगों को भोजन के अभाव में भूखे मरने वालों की जानकारी नहीं है। भोजन की बर्बादी से न केवल सरकार, बल्कि सामाजिक संगठन भी चिंतित हैं। दुनिया भर में हर वर्ष जितना भोजन तैयार होता है, उसका एक तिहाई यानी लगभग एक अरब तीस करोड़ टन बर्बाद चला जाता है। बर्बाद जाने वाला भोजन इतना होता है कि उससे दो अरब लोगों के खाने की जरूरत पूरी हो सकती है।

"व्यक्तिगत हित के लिए न करें ऐसा कोई काम,
कि अन्न की कमी हो जाये और भूखा रहे इंसान।"

भोजन, आहार या खाद्य पदार्थ इसको हम चाहें कितने भी अलग-अलग नामों से पुकार लें,इससे इसकी हमारे जीवन में अहमियत जरा भी कम नहीं होती, क्योंकि भोजन और आहार से ही हमें अपने दैनिक जीवन के कार्यों को करने की शक्ति,ऊर्जा मिलती है। आपको बता दें कि पूरी दुनिया में लोग एक साल में लगभग 1.3 बिलियन टन के बराबर भोजन को बर्बाद कर देते हैं, जो दुनिया में पैदा होने वाले कुल खाद्य पादर्थों का एक तिहाई आंकड़े के बराबर होता है। जहां एक तरफ दुनिया में भुखमरी धीरे धीरे अपना विकराल रूप ले रही हैं। वहीं दूसरी तरफ भोजन की बर्बादी का इतने बड़े स्तर पर होना एक भयानक समस्या बनती जा रही है। भोजन की अत्याधिक बर्बादी जलवायु परिवर्तन में भी एक अहम भूमिका निभा रही है,क्योंकि बर्बाद भोजन को जब धरती पर बिखेरा जाता है तो उससे मीथेन गैस बनती है।

अगर आप भी खाने या भोजन की बर्बादी करते हैं तो आपको बता दें कि आप अपनी मेहनत से कमाए गए करोड़ों रूपयों को खुद ही अपनी लापरवाही से बर्बाद कर देते हैं। हम आज आपको कुछ आसान कुछ छोटे छोटे उपाय बता रहे हैं जिससे आप भोजन की बर्बादी के साथ-साथ अपनी मेहनत की कमाई को कुछ हद तक बचाया जा सकता हैं।

भोजन की बर्बादी रोकने के उपाय

1. समझदारी से खरीदें :-
जब भी आप खाने की चीजों की खरीददारी करने जाएं, तो कोशिश करे कि वही चीजें खरीदें जो लंबे समय तक ताजी रह सकें। इससे आप बेवजह की फिजूलखर्ची से भी बच जाएगें।

2. खाद्य पदार्थों को सही से रख सके:-
भोजन की सबसे ज्यादा बर्बादी उसका सही से भंडारण न करने से होती है। आलू, टमाटर,खीरा, प्याज, लहसुन आदि खाद्य पदार्थों को कभी भी ठंडा न करें, इन्हें हमेशा खुली और सूखी जगह पर ही रखें।

3. एक्सपायरी डेट को जरूर देखें :-
आजकल लोग समय की कमी वजह से लोग डिब्बा बंद खाद्य पदार्थों को खरीद लेते हैं जो कुछ समय के ही बाद खराब हो जाते हैं। ऐसे में हमेशा कोशिश करें कि जब भी आप डिब्बाबंद खाद्य पदार्थ खरीदें, तो सबसे पहले उसकी एक्सपायरी डेट जरूर देख लें। इससे आप जहां खराब खाना खाने और बीमार होने से बच जायेगें, साथ ही आप अपने पैसों और भोजन को बर्बाद होने से रोक पायेगें।
4. समय समय पर फ्रिज की करें सफाई :-
आमतौर पर सबको फ्रेश और हेल्दी फूड देखने और खाने में सबसे पहले पसंद आता है, लेकिन अगर वो ही फल और सब्जियां थोड़ा सा भी बदरंग हो जाती है,तो वो घरेलू कचरा बन जाती है। ऐसे में अगर आप भोजन की बर्बादी को रोकना चाहती हैं,तो समय समय पर फ्रिज की सफाई करती रहें।
क्योंकि इससे आपके फ्रिज में सड़ा और पुराना भोजन ज्यादा दिन तक नहीं रहेगा। इससे जहां आप अपने फ्रिज को साफ और हाईजिनिक रख पायेगीं, वहीं पुराना और बासी खाना खाने से होने वाली बीमारियों से खुद को बचा पायेगीं।

5. घर में बनाएं कंपोस्ट खाद:-
अगर आपके घर में भी भोजन बर्बाद होता है तो आप उसे कचरे में न फेंक कर एक बड़े प्लासिट्क कंटेनर में स्टोर कर, घर में ही खुद कंपोस्ट खाद बनाएं और अपने बगीचे में उस खाद का प्रयोग करें। इससे आप जहां घरेलू कचरे को फैलाने से बच सकेगें, साथ ही घर के गार्डन के लिए कुछ ही प्रयास में होममेड कंपोस्ट खाद बना सकेगें।

6 .प्लेट में जरूरत से ज्यादा न परोसें:-
खाना खाते वक्त हमेशा प्लेट में उतना ही खाना परोंसे, जितना आप खा सकें। कभी भी प्लेट में भूख से ज्यादा खाना नहीं परोसना चाहिए।

विश्व खाद्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व का हर सातवां व्यक्ति हर दिन भूखा सोता है। भारत में यह आंकड़ा हर पांचवें व्यक्ति पर स्थिर है। अगर इस अन्न बर्बादी को रोका जा सके तो बहुत सारे लोगों का पेट भरा जा सकता है। समाज के साथ साथ सरकार को ‘भोजन बचाओ भूखों को खिलाओ जैसे अन्य जागरूकता अभियान के तहत भोजन के प्रति लोगों को जागरूक करते रहने की जरूरत है, ताकि आने वाले समय में देश को किसी बड़े भुखमरी जैसे आपदा का सामना न करना पड़े। खाने की बर्बादी रोकने की दिशा में ‘निज पर शासन, फिर अनुशासन’ एवं ‘संयम ही जीवन है’ जैसे उद्घोष को जीवनशैली से जोड़ना होगा।

समाज में फिजुलखर्ची, वैभव प्रदर्शन एवं दिखावे की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने एवं भोजन केेे आइटमों को सीमित करने के लिये आन्दोलन चल रहे हैं, जिनका भोजन की बर्बादी को रोकने में महत्वपूर्ण योगदान हो सकता है। सरकार को भी शादियों में मेहमानों की संख्या के साथ ही परोसे जाने वाले व्यंजनों की संख्या सीमित करने पर विचार करना चाहिए। दिखावा, प्रदर्शन और फिजूलखर्च पर प्रतिबंध लगाना चाहिए,लेकिन यह सख्ती से लागू नहीं होता, जिसे सख्ती से लागू करने की जरूरत है। स्वयंसेवी संगठनों को भी इस दिशा में पहल करनी चाहिए।

लेखिका- डॉ. सारिका ठाकुर 'जागृति'


शीर्षक: भ्रष्टाचार और भारत का भविष्य



आचरण यदि नापाक़ हो, अशुद्ध और अस्वीकार्य हो ,तो वह भ्रष्टाचार की श्रेणी में आने लगता है। भ्रष्टाचार ,जैसा कि शब्द से ही इसका अर्थ समझ आ रहा है ,अर्थात जब हमारे व्यवहार में सच्चाई न रहे और हम झूठ ,पाखंड और दंभ का सहारा लेकर जीवन में कुछ हासिल करने की होड़ में शामिल हो जाते हैं, तो यह आचरण भ्रष्ट आचरण कहलाता है। भ्रष्टाचार किसी क्षेत्र विशेष में ही हो ,यह आवश्यक नहीं ।विभिन्न क्षेत्रों में अक्सर भ्रष्टाचार के मामले सामने आते हैं और भ्रष्टाचार साबित हो जाने के बाद भ्रष्टाचारियों को कानूनन सजा और पेनल्टी का प्रावधान भी भारतीय न्याय व्यवस्था में रखा गया है। 





किंतु, इतने सब प्रावधान के होने के बावजूद भी देश में भ्रष्टाचार अपने चरम पर है और खूब फल-फूल रहा है, पोषित हो रहा है। महंगाई की ही तरह भ्रष्टाचार भी एक संक्रामक बीमारी की भांति फैलता जा रहा है और देश की जड़ों को खोखला कर रहा है।

*उफ्फ ये बढ़ती महंगाई* 
*हाय जानलेवा ये भ्रष्टाचार*
*शरीर और दिमाग दोनों को*
*बना रहे ये कितना बीमार*

शिक्षा के क्षेत्र की यदि बात करें ,तो शिक्षण संस्थानों में दाखिले से लेकर परीक्षा परिणाम तक में भ्रष्टाचार व्याप्त है ,जहां भ्रष्टाचारी पैसे की ताकत के सामने झुकता है और अपने सभी नैतिक मूल्यों को भुला देता है। राजनीति के क्षेत्र में हमारे राजनेता देश को बेचने पर आमादा हैं।वे सभी अपने व्यक्तिगत स्वार्थों की पूर्ति करने हेतु किसी भी हद तक गिर सकते हैं क्योंकि उन्हें देश और समाज से कोई सरोकार नहीं होता। राजनीति में आने के बाद वे अपना और अपनों का घर भरने लगते हैं, और समाज व देशहित की उपेक्षा करने लगते हैं,जिसका दुष्प्रभाव अर्थव्यवस्था के गिरने के रूप में दृष्टिगत होता है। इस संदर्भ में मेरी ये पंक्तियां सार्थक प्रतीत होती हैं:


*सबको बस अपने घर भरने हैं*
*जीजा साले सब फिट करने हैं*
*स्वार्थ को इन्होंने चढ़ा आकाश में*
*अर्थव्यवस्था कर दी पूरी बेकार*


निसंदेह, भ्रष्टाचार स्लो पोइज़निंग की भांति देश की तरक्की के आड़े आ रहा है और अपना विष घोल कर देश की प्रगति में सीलन लगाने का काम कर रहा है ।भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी अधिक फैल गई हैं कि वर्तमान में देश का हर दूसरा व्यक्ति चाहे वह किसी भी तबके से संबंध रखता हो ,किसी भी कार्य को करने से पहले उसके दिमाग में अच्छाई की जगह भ्रष्टाचारी होने की तरकीबें आने लगती हैं और वह कम समय में अधिक मुनाफा कमाने की रणनीतियां बनाने लगता है,फिर चाहे इस प्रक्रिया में देश और समाज का नुकसान ही क्यों ना होता हो।   


देश में भ्रष्टाचार यदि इसी गति से बढ़ता रहा तो कहीं ऐसा ना हो कि हमारा देश विकासशील देशों से अल्प विकसित देशों की श्रेणी में आ जाए। यदि समय रहते भ्रष्टाचार पर सरकारी एजेंसियों के साथ-साथ विभिन्न गैर सरकारी संस्थाओं एवं जन कल्याणकारी संस्थाओं द्वारा लगाम नहीं कसी गई ,तो वह दिन दूर नहीं जब भारत, जिसे सदियों से सोने की चिड़िया और विश्व गुरु के नाम से पहचाना जा रहा है ,जाना जा रहा है, वही भारत बहुत जल्द विश्व के सबसे भ्रष्ट राष्ट्र के रूप में गिना जाने लगेगा।


अपने देश को विकसित, स्वस्थ,समर्थ तथा सशक्त राष्ट्र बनाने में हम सभी भारतीयों को निज संकीर्ण मानसिकता का त्याग करना होगा ,स्वार्थी और दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सोचना होगा,भ्रष्टाचार का जड़ से खात्मा करना होगा और सर्व कल्याण और विश्व बंधुत्व की भावना को तरजीह देते हुए अपने सार्थक प्रयास करने होंगे तथा भारत को प्रगति की राह पर ले जाने में अपना शत प्रतिशत योगदान देना होगा।


                                                                लेखिका- पिंकी सिंघल


कविताः बुराई हटाओ





रास्ते में पड़ा पत्थर
राहगीर के ठोकर
लगने से पहले
उठा कर हटाओ।

मवाद पड़े फोड़े को
ज्यादा फैले उससे पहले 
ऑपरेशन कर 
हटाओ।

गर रहबर
बेखबर हो तो 
ऐसे रहबर को भी
मिल कर हटाओ।

राह में 
कांटे हों तो
उन काँटों को
देखते ही हटाओ।

दोस्तों , देश में
जो लोग भी
नफरत फैलाने वाले हों
उन्हें जड़ से हटाओ।

कोई भी बुराई
कहीं भी हो
उस बुराई को ,पनपने से पहले 
मिल कर हटाओ।

दो बुराइयां हैं 
इन बुराइयों में 
जो ज्यादा खराब हो
उसे पहले हटाओ।

आओ, अपने-अपने
गिरेबां में झाँको 
तन-मन की
बुराई को भी हटाओ।


मईनुदीन कोहरी

कविताः मृत्युभोज


मृत्यभोज बहिष्कार का 
निमंत्रण मिला,
उसमें लिखा था कि 
आइये आप मृतक को 
सच्ची श्रद्धांजलि दीजिये, 
कार्ड में विचार पेश करने के लिये 
बड़े समाजसेवी का नाम छपा था! 
वैसे आज के समय में पढ़े-लिखे लोग 
मृत्यभोज जैसे कार्यक्रम से कतरा रहे हैं! 
फिलहाल कार्यक्रम स्थल पर पहुंच गया
श्रद्धांजलि का कार्यक्रम कम और 
राजनीति भाषण वाले विचार ज्यादा चल रहा था! 
भोजन के फिजूल खर्च और कुरीतियों 
पर जमकर वार किया जा रहा था.
खुशी हुआ चलो अच्छा 
मृत्यभोज जैसा कुप्रथा बंद हो
अच्छा होगा! 
कार्यक्रम जैसे समाप्त हुआ, 
तभी मृतक का भतीजा मेरे पास आकर बोला
"सर आप बिना नाश्ता किये मत जाना
पीछे टेंट में नाश्ता की व्यवस्था हैं.
देखा मृत्यभोज बहिष्कार वाले 
लोग पेट दबाकर नाश्ता कर रहे थे!

                                      लेखक- अभिषेक राज शर्मा