साहित्य चक्र

20 April 2023

लिंगायत समुदाय के बारे में आप कितना जानते हैं ?


अगर मैं आपसे बोलो कि कोई व्यक्ति शिवलिंग की पूजा करता है और शिव की मूर्ति की पूजा नहीं करता है और अपने आप को हिंदू नहीं मानता है, तो आप क्या कहेंगे ? शायद आपके पास शब्द नहीं होंगे, क्योंकि आपने आज तक ऐसा ना कभी सुना होगा, ना ही जानने का प्रयास किया होगा। चलिए आज मैं आपको कर्नाटक के एक समुदाय के बारे में बताता हूं। इस समुदाय का नाम लिंगायत है। यह समुदाय भारत के कर्नाटक राज्य में करीब 18% से अधिक जनसंख्या वाला समुदाय है।





इस समुदाय के लोग ना हिंदू मंदिरों में जाते हैं, ना ही किसी हिंदू भगवान की पूजा करते हैं। इस समुदाय का मानना है कि इनकी संस्कृति हिंदुओं से अलग है। ये अपने शरीर को ही अपना मंदिर मानते हैं और किसी भी प्रकार का कोई अंधविश्वास व कर्मकांड नहीं करते हैं। इस समुदाय में कोई जाति व्यवस्था है, जबकि हिंदू धर्म अंधविश्वास, पाखंड और जातिवाद से भरा पड़ा है। इस समुदाय के सभी लोगों की पहचान लिंगायत के रूप में होती है। लिंगायत समुदाय के लोगों का कर्नाटक की राजनीति से लेकर शासन-प्रशासन में अच्छी पकड़ है।

लिंगायत धर्म की स्थापना 12वीं सदी के महान समाज सुधारक, दार्शनिक और कवि बसवेश्वर ने की थी। यह समुदाय एक कट्टर एकेश्वरवादी और वैदिक कर्मकांड का विरोधी है। लिंगायत लोग अपने गले में एक चांदी के डब्बे में शिव लिंग धारण करते हैं। इनका मानना है कि शिव हर मनुष्य के शरीर में है। इसीलिए यह समुदाय के लोग मरने के बाद शव को जलाते नहीं है, बल्कि शव को दफनाकर उसके ऊपर शिवलिंग स्थापित करते हैं। कर्नाटक की ऊंची-ऊंची पहाड़ियों पर इस समुदाय के मठ बने हुए हैं और इन मठों में गरीब बच्चों शिक्षा की व्यवस्था से लेकर खाने-पीने इत्यादि की व्यवस्था बनी है।
लिंगायत समुदाय के लोग हर रोज शिव लिंग यानी अपने इष्टलिंग की पूजा करते हैं। पूजा के दौरान सबसे पहले अपने इष्टलिंग को दाएं हाथ की हथेली के बीच में रखते हुए उसे दोनों आंखों के बीच तक ऊपर उठाया जाता है। इस अवस्था में कुछ देर तक ध्यान लगाया जाता है। इसके बाद हथेली पर इष्टलिंग को हथेली पर रखकर जलाभिषेक किया जाता है। इस दौरान ओम नमः शिवाय का गुरु मंत्र का पाठ किया जाता है। इस पूजा में स्त्री, पुरुष सहित सभी लोग शामिल हो सकते हैं।

शिवलिंग धारण करने की आयु सीमा अलग अलग होती है। एक शिशु को 3 दिन, 5 दिन या 9 दिन में शिव लिंग धारण करवाया जा सकता है और गर्भवती महिला 8 महीने की गर्भवती होने के दौरान शिवलिंग को अपने बाजू पर धारण कर सकती है। शिशु को इष्टलिंग धारण करवाते वक्त कान में एक मंत्र बोला जाता है। अगर लड़का पैदा होता है तो उसके बाल उतारने जाते हैं। यह समुदाय पुनर्जन्म की बातों में यकीन नहीं करता है। लिंगायत समुदाय की तरह भारत में कई ऐसे समुदाय हैं जिनकी संस्कृति और सभ्यता अलग है, मगर उन्हें अभी तक धर्म की मान्यता नहीं मिल पायी है।

- दीपक कोहली


कविताः हिचकियों का सिलसिला






हिचकियों के सिलसिले थमने का नाम नहीं लेते,
शायद आज भी कोई शिद्दत से याद करते है। 

जिसकी हर सांँस में, एहसास बनकर घुली थी मैं, 
शायद आज वह मोहब्बत की बात कर  रहे हैं। 

यकीन है मेरा जिक्र कर, आज भी वह दिल से मुस्कुरातें होंगे,
पैमाने की गर बात करूंँ, घूंट पानी की ही लगाते होंगे। 

हमारी कमी का एहसास, कभी फुर्सत में याद कीजिएगा, 
हम तो हर पल याद करेंगे, हिचकियाँ आए तो माफ कीजिएगा।

सिर्फ लफ्जों की नहीं, तेरी रूह से रूह तक, रिश्ता है
हर लम्हें, हर हाल में आएगी तुझे हिचकियाँ, 
तू जिंदगी का एक अहम हिस्सा है मेरा। 


                       लेखिका- रत्ना मजूमदार

कविताः अपने अपने रंग




सबके अपने-अपने रंग हैं 
सबके अपने-अपने ढंग हैं 
वो अकेला खड़ा वहाँ पर 
इसके देखो कितने संग हैं।

रंग के रंग में रंग रहे सारे
चेहरे लग रहे न्यारे न्यारे 
थाप चंग पर गा रहे होरी
रंगन के बह रहे परनारे।

भेदभाव तनाव मिटाती
घर घर में खुशियाँ लाती 
फागुन की शक्ल में होली 
महीनों पहले ठाठ जमाती।

सब पर उच्छृंखलता छाई
कर रहे हैं मन की भरपाई
लाल हरे पीले का संगम
भर रहा सब में तरुणाई।

द्वेष की होली जलाकर
प्रेम का प्रहलाद बचाकर
भूल जाएं सब बीती बातें 
आपस में अबीर लगाकर।

हिलमिल करके सभी मनाएं
गले मिलें गुलाल लगाएं 
होली बन जाये हेली सी 
रंगोली जीवन बन जाएं।


                               लेखक- व्यग्र पाण्डे 



कहानीः भारती

 प्राची  दिशा में सूरज जब उदय होता है और जब पश्चिम में अस्त होता है। उस दृश्य को मनोहारी रूप में कवियों ने अनेक वर्णन किये हैं।

              प्रयागराज की उस धरती में जहाँ गंगा - यमुना और अदृश्य सरस्वती का संगम लोगों का मन मोहित करता है। लेकिन श्याम बिहारी का मन तो बहुत ही व्यथित था।





          स्वरूप रानी अस्पताल के गैस्टर्रो वार्ड के बेड क्रमांक 25 पर लेटी महिला और कोई नहीं श्याम बिहारी की जीवन संगिनी है, भारती! जो कभी हल्का श्रृंगार करके भी किसी देवी से कम नहीं हुआ करती थी।

          आज उसी प्राची दिशा में यह उगता सूरज श्याम बिहारी को बहुत नीरस, भयावह और क्रूर लग रहा था, जिसका वर्णन करना संभव नहीं है। स्वरूप रानी अस्पताल के हर वार्ड को निहारता, उसे यह सूरज किसी यम के काल दण्ड से कम नहीं लग रहा था।
          सूरज की लालिमा उस रक्त की तरह लग रही थी जो, किसी वहशी भेड़िया के शिकार से बहती रक्तधार जैसी लग रही थी। पूरे अस्पताल प्रांगण में कोई हंसता - मुस्काता चेहरा नहीं था। सिर्फ एक गहरा दर्द समेटे लोग थे।

          सभी दौड़ रहे थे, कोई डाक्टर के पास दौड़ लगा रहा था, कोई मैडिकल की दुकान से दवा लाने के लिए स्पीड बढ़ा रहा था। चारों ओर दर्द ही दर्द, क्योंकि वे इतना थक गए थे कि, अब दौड़ने की शक्ति ही कम हो गई थी।

           श्याम बिहारी को और देश के मैडिकल कालेजों में यह स्वरूप रानी अस्पताल अलग दिख रहा था। और जगह डाक्टरी पढ़ते छात्रों को अनुशासन और कर्तव्य के साथ यह भय भी था कि, अगर शिकायत हो गई तो अंक पत्र गड़बड़ हो जाएगा। और यहाँ सिखाया जा रहा है कि, कैसे लाचार - बेबस, बेचारे लोगों को लूटा जा सकता है, कैसे दलाली डाक्टरी से पैसा कमाया जा सकता है। शिकायत किससे करे सभी चोर - चोर मौसेरे भाई जो हैं।

            भारती का उदास चेहरा और इस प्रयागराज की धरती में निकलता इस सूरज की लाल रौशनी से साफ लग रहा था कि, डूबते - निकलते, डूबते - निकलते अब यह सूरज भी थक गया है। और रो - रो कर सूरज की यह रक्त किरणें उसकी दुनिया की पीड़ा समेटे श्याम बिहारी की आँखों जैसी लग रही थी।
           भारती की यादें, श्याम बिहारी की आँखों जैसी लग रही थी।
           भारती के साथ बिताए यादगार पल, श्याम बिहारी की आँखों को लाल कर रही थीं। और उसके बहते आँसू यमुना के जल जैसे लग रहे थे।

           श्याम बिहारी को बीती बातें याद आ रही थीं। जब भारती उसके जीवन में आई थी तब गाँव में सड़क नहीं थी। बिजली भी नहीं थी। और यह मोबाइल आदि संचार माध्यम भी नहीं थे।

           शहर की भारती को लोग देखकर कहते थे कि, "यह इतनी सुंदर शहर की, इस गांव में कहाँ रहेगी!"

           लेकिन श्याम बिहारी का प्यार पाकर भारती ने वह आदर्श कायम किया, जो एक सच्ची भारतीय नारी में होता है।

           सास - ससुर के नहीं रहने के बाद भारती और श्याम बिहारी ने बच्चों के प्रति अपना जीवन समर्पित कर दिया था। बच्चों की पढ़ाई - लिखाई और शादी - विवाह में पता ही नहीं चला कि, वह कब बूढ़े हो गए।

           भारती का वह प्यार श्याम बिहारी को याद आ रहा था। गरम भोजन के साथ, उसने एक लोटा पानी तक श्याम बिहारी को लिए खड़ी मिलती थी।
          दुख होता क्या है, भारती के रहते श्याम बिहारी ने नहीं जाना था।

           अचानक बीमारी ने श्याम बिहारी की भारती को धर दबोच लिया। क्या कहाँ, कैसा, कितने अस्पताल, झाड़ - फूँक के स्थान, श्याम बिहारी अपने दम तक भारती की दवा कराने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ा था।

           बहुत से डाक्टर उसे लूटते रहे और वह लुटता रहा। इस तरह आज एक साल से भारती ऐसी थकी कि, श्याम बिहारी का कलेजा मुँह को आ गया।
           श्याम बिहारी साठ पार कर चुका था। इंद्रियाँ शिथिल हो गई थी। उसकी रक्तिम आँखें उगते सूरज की तरह लग रही थीं। लेकिन यह भयावह थी, मनोहारी नहीं!

          एक और खेत बेंचकर श्याम बिहारी दवा कराना चाहा था कि, लोगों ने उसे नहीं छोड़ा और लूटना शुरु कर दिया था। और जिन बेटों के लिए अपना जीवन बर्बाद कर दिया था। उन्हीं बेटों को समय नहीं था। कि, माँ के पास रह सकें।
           भारती का उदास चेहरा कुछ कहना चाह रहा था। जिसे श्याम बिहारी जान रहा था, समझ रहा था। लेकिन श्याम बिहारी जानकर भी अनजान बना रहा।

           अब प्राकृतिक पंक्षी भी नहीं रहे जो कलरव करते और कुछ सबेरा जैसा लगता। अब तो इस बड़े पूरे स्वरूप रानी अस्पताल में करूणा ने अपना डेरा डाला है। सभी उदास हैं। आँखों में आँसू और कोई आँसुओं को पीकर, इस उगते लाल सूरज की ओर से आँखें फेर ली है।

          कहीं कहीं, किसी का धैर्य का बाँध टूट रहा है और किसी - किसी वार्ड से करुण स्वर में रोना सुनाई देता है।

           भारी भीड़ है स्वरूप रानी अस्पताल में लेकिन सभी अकेले से लग रहे हैं। और श्याम बिहारी को तो बहुत ही अकेलापन लग रहा है।

           बात करने में भारती की आवाज डगमगा रही है। श्याम बिहारी छोटे बेटे को सौंपकर और पैसे बनाने के चक्कर में गाँव चला आया था।

           भारती सभी की याद कर रही थी, बहुओं की, बेटों की और पोतों की। और अपने सगे भाई - भौजाई की।

           श्याम बिहारी जानता है कि, अगर भारती नहीं रही तो वह भी नहीं रहेगा। श्याम बिहारी प्रयास में है कि, उसके बेटे - बहुएँ आ जाएं और भारती का मनोबल बढ़े।

           इस निर्दय, यमपुरी के डाक्टरों के बीच श्याम बिहारी और कर भी क्या सकता था। भारती का गोरा बदन काला पड़ता जा रहा था। और यह सूरज लाल से सफेद होता जा रहा था।

         श्याम बिहारी जानता है कि, भारती और खुद का सूरज ढलान पर है। और एक अनजाना सा डर उसे सताने लगा है।

           भारती सी आदर्श महिला गाँव में बहुत कम ही थीं। भारती और श्याम बिहारी का प्रेम बाहरी नहीं, आंतरिक इतना गहरा था कि, उसकी गहराई नापना सब के बस में नहीं है।

       "आऽह!" श्याम बिहारी को लगा भारती है और श्याम बिहारी में पता नहीं कहाँ की शक्ति आई कि, वह एक पल के अंदर भारती के बेड क्रमांक 25 के पास पहुँच गया।

         भारती का गोरा बदन काला पड़ गया था, जैसे सूर्य के अस्त होते ही रात्रि की कालिमा छा जाती है।

           श्याम बिहारी और भारती का जीवन सफर, यहाँ तक  का बहुत ही संघर्षपूर्ण था। लेकिन भारती की ताकत श्याम बिहारी के सफर में वह ताकत थी, जिसे कठिन से कठिन मार्ग को भी श्याम बिहारी आनन - फानन में तय कर लेता था।

           बीमार भारती को श्याम बिहारी सरकारी जिला अस्पताल से लेकर गया था। जहाँ से उसे रिफर कर दिया गया था, प्रयागराज के लिए।

           यूँ जल्दी आराम के चक्कर में एक प्राइवेट अस्पताल में जब श्याम बिहारी ने पता किया तो दस हजार से भी ज्यादा प्रतिदिन का उसका नर्सिंग खर्च था। खर्च देने में असमर्थ श्याम बिहारी ने सरकारी अस्पताल स्वरूप रानी में भारती को भर्ती करा दिया और इस सरकारी अस्पताल का वार्ड ब्वाय तक यमराज का दूत ही समझ में आया।

          नहीं कहते किसी मंत्री का कोई खास कुछ सुबिधाओं का हकदार बनता हो तो बनता हो। वरना यहाँ सुई से लेकर महंगी दवा तक, बाहर से लाना पड़ता है। और यहाँ भी डाक्टरों का कमीशन साफ समझ में आ रहा है।
           पढ़ा लिखा श्याम बिहारी अब हार चुका था। पैसे बना पाना उसके लिए कठिन हो गया था।

          श्याम बिहारी से अपनी जीवन संगिनी भारती की हालत देखी नहीं जा रही थी। अब क्या करूँ यही सोच रहा था, श्याम बिहारी! तभी भारती ने कहा, "श्याम, अब मुझे घर ले चलो!"

          श्याम बिहारी भी यही सोच रहा था।

          आखिर किसी तरह भारती को काफी मशक्कत के बाद अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। और श्याम बिहारी एक एम्बुलेंस से भारती को लेकर अपने घर की ओर चल पड़ा।

          दुनिया भर का दर्द श्याम बिहारी के चेहरे पर साफ झलक रहा था।

                                  


                                               लेखक-  सतीश बब्बा



हे ईश्वर तुझे बारंबार प्रणाम.....




कैसे रहूं भगवन तेरे बिना,
कैसे सोचूं भगवन तेरे बिना,
चलूं भी तो कैसे चलूं तेरे साथ बिना,
अब तूही बता ईश्वर कैसे जिऊ अब तेरे बिना,

हे ईश्वर तुझे करती हूं बारंबार प्रणाम...

बहुत कुछ दिया तूने मुझे भगवन 
जितना मैं सोची थी उसे लाख गुणा,
गिरते हुए को उठाया तूने भगवन,
भटके राही को राह दिखाया तूने भगवन

हे ईश्वर तुझे करती हूं बारंबार प्रणाम 

तूने जो रहमतों का बारिश किया मुझ पे,
एक अबला को सबला बनाया तूने भगवन
धूप में छाया बनके साथ दिया तूने मुझे,
जब जब पुकारी मैं मेरे पास आया तू भगवन

हे ईश्वर तुझे करती हूं बारंबार प्रणाम.....

हर एक  मेरे सपनों को पूरा किया ,
उम्मीद से ज्यादा तूने खुशियां दिया ,
कभी आखों से मेरे आंसू गिरने न दिया ,
हर पल खुशियां की तूने सौगात दिया,

हे ईश्वर तुझे करती हूं बारंबार प्रणाम...

जिंदगी में दुर्गम मार्ग को सुगम बनाया आपने,
गलत राह से ,सही राह दिखाया आपने,
निराशा को आशा में बदल दिया आपने, 
तिमिर में एक ज्योत का दीप प्रज्ज्वलित किया आपने 

हे ईश्वर तुझे करती हूं बारंबार प्रणाम....


                        - मनीषा झा


कविताः तेरा साथ अलग बात है





जब पूरी धरा भी अगर साथ दे तो अलग बात है
पर तू जो जरा भी मेरा साथ दे तो अलग बात है।

राह ए मुश्किल में जो तन्हा चलूँ तो अलग बात है
पर ग़र तू साथ चले तो राह आसान हो अलग बात है। 

वैसे तो मैं रोज ही तेरे लिए संवरती हूँ अलग बात है
पर जो तू जिस रोज नजर भर निहार ले अलग बात है।

हालातों से तो हर वक्त लड़ा करती हूँ अलग बात है
पर तू जो साथ दे तो हालात ही बदल जाए अलग बात है

खुद को महकाने के लिए रोज इत्र लगाते हैं अलग बात है
पर तुम्हारे होने से तो जीवन ही महक उठा है अलग बात है।

यूँ तो हम रोज ही हँसते खिलखिलाते है ये अलग बात है
पर जो एक बार मुस्कुरा से साथ मेरे तो ये अलग बात है।

यूँ तो हर पल हर पथ पर एक इम्तिहान है अलग बात है
पर जिस रोज तेरे इंतज़ार की इम्तिहान हो अलग बात है।

यूँ तो दोस्तों की महफिल चले साथ साथ तो अलग ही बात है 
पर ग़र तू जो चले साथ साथ मेरे वो महफिल अलग बात है। 


                                 - दुर्गेश नन्दिनी नामदेव