साहित्य चक्र

31 January 2017

स्त्रियों पर पुरुषों का अधिकार

                                





हमारे देश में स्त्रियों पर कई बहस और मुद्दें उठते रहे हैं। चाहे प्रचीन भारत की बात हो या फिर आधुनिक इंडिया की क्यों ना हो । मुद्दा यहीं नहीं, स्त्रियों के पहनाने से लेकर उनके अधिकारों तक में भी पुरुषों का अधिकार साफ देखने को मिलता है। अगर प्राचीन भारत की बात करें तो, उस समय भी स्त्रियों पर पुरुषों का अधिकार देखने को मिलता है। चाहे महाभारत हो या रामायण हर किसी में स्त्रियों पर पुरुषों का अधिकार था। वैसा ही आजकल देखने को मिलता है। आखिर कब तक हमारे समाज में स्त्रियों के अधिकारों का हनन होगा। एक तरफ देश को डिजिटल करने की बात हो रही है, तो वहीं देश की नारी अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही है। ये मैं अपने मन से नहीं सर्वे के अनुसार कह रहा हूं। आज हमारे देश में नारियों का जितना सम्मान होता है उससे कई गुना उन पर अत्याचार होते है। ये सर्वे बताते रहे है, कि हमारे देश की नारी कितनी सुरक्षित है। जहां आज भी एक नारी को अपने मन पंसद कपड़े पहने के लिए कई बार पूछना  और सोचना पड़ता है। आखिर में ये कपड़े पहनूं या नहीं पहनूं। कई सवाल उठते हैं। जहां एक बेटी को अपने मां-बाप के अधिकारों के तौर पर जीना पड़ता है। तो वहीं एक बहू को अपने सास-ससुर के अधिकारों में रहना पड़ता है। जो उनके अधिकारों का हनन है। अगर हम गांव देहात की बात करें तो ये अधिकारों का हनन दुगुना हो जाता है। गांव देहातों में तो स्त्रियों को अपने अधिकार से खाना खाने तक की इज्जत तक नहीं हैं। एक ओर देश तेज गति से आगे बढ़ रहा है तो वहीं दूसरी ओर स्त्रियां अपने अधिकारों के लिए आज भी संघर्ष कर रही है। जो एक चिंता का विषय है। आज भी हमारे देश में स्त्रियों का शोषण होता है। चाहे वह हिंदू ही क्यों या फिर मुस्लिम स्त्री ही क्यों ना हो। जहां एक ओर मुस्लिम राजनेता बड़े बड़े दावे करते नज़र आते है तो वहीं तीन तलाक मुद्दा ये साफ कर देता है कि देश में स्त्रियों का शोषण आज भी हो रहा है। वहीं अगर हिंदू धर्म की बात करें तो आज भी कई धार्मिक मंदिरों में स्त्रियों का प्रवेश वर्जित है। जिससे ये सिद्ध हो जाता है कि हिंदू धर्म में जो अधिकार पुरूषों के पास है वो स्त्रियों के पास बिल्कुल नहीं हैं। वैसे मेरा किसी धर्म के प्रति गलत सिद्ध का कोई मत नहीं है। मैं तो एक नारी के अधिकारों की बात कर रहा हूं। जो उनके लिए जरूरी है। जिससे एक नारी अपनी मर्जी से जीवन जी सके। इतना ही नहीं आज हमारे देश में एक नारी अकेली कई जाने से पहले दस बार सोचने को मजबूर होती है। यहीं नहीं आजकल एक लड़की को अकेला कई भेजने के लिए मां-बाप कई बार सोचने के लिए मजबूर है। इससे ये साबित होता है कि हमारे देश में स्त्रियां आज भी सुरक्षित नहीं है। वहीं कई लड़कियां पढ़ना तो चाहते है लेकिन अपने परिवार के फैसलों में बंधी रह जाती है। जिससे उसके अधिकार छिन्न हो जाते  है। वहीं देश के कई कोनों में स्त्रियोें का देह व्यापार चल रहा है। जिससे ये सिद्ध होता है कि हमारे देश में स्त्री की क्या दशा है। चाहे आज कोई कितना ही क्यों ना कह लें ......?  स्त्री अपने अधिकारों के लिए आज भी संर्घष कर रही है। जिसके लिए हमें मिलकर कदम उठाना होगा। आखिर क्यों हमारी देश की नारी संर्घष कर रही है। उसे भी जीने का अधिकार है। उसे भी अपने मनपंसद कपड़े पहने का अधिकार है। एक नारी से यह अधिकार कोई नहीं छिन सकता है। चाहे वह पुजारी हो या फिर मौलवी। मानव अधिकारों में साफ लिखा है, कि एक स्त्री को अपनी जिदंगी खुल कर जीने का अधिकार है। यहीं बात हमारा संविधान भी करता है।

 स्त्री सम्मान ही सबसे बड़ी पूंजी है।
स्त्री ही इस लोक की देवी है।।


                                                        संपादक- दीपक कोहली

        

29 January 2017

सुर - ताल - राग

                               सुर - ताल - राग 


वैसे आज मैं भारतीय संगीत की बात करूंगा। मैं आज आपको उस संगीत के बारे में बताऊंगा जो पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। जिसके दिवाने पूरे विश्व में मिलेगें। मुख्यत: भारतीय संगीत का हिस्सा ख्याल, ठुमरी, टप्पा, ध्रुपद अादि है। ये सभी भारत की संगीत शैलियों में से एक है। जो पूरे विश्न में हमारे देश का मान बड़ती है। वैसे आपको बता दूं टप्पा भारत की प्रमुख संगीत शैलियों में से एक है। जिसकी उत्पति पंजाब और सिंध प्रांत के ऊंट चलाने वालों द्वारा की गई। इन गीतों में हीर-रांझा की प्रेम व विरह प्रसंगों को दर्शाया जाता है। वहीं ठुमरी में रस, रंग, भाव की झलक दिखाई पड़ती है। वैसे ठुमरी विभिन्न भावों को प्रकट करती है। वहीं अगर ताल की बात करें तो इसमें भारतीय व फारसी संगीत का मिश्रण नज़र आता है। वैसे संगीत भारत की प्राचीन सभ्यताओं में भी सुनने को मिलता है। जिससे यहां की संस्कृति का अंदाजा लगाया जा सकता है। वैसे रामायण में भी संगीत का जिक्र किया गया है। संगीत एक माध्यम है जिसे सुनकर हमें एक नई ऊर्जा  प्राप्त होती है। चाहे वह संगीत किसी भी भाषा में ही क्यों ना हो। संगीत की भाषा अलग हो सकती है। लेकिन सुर ताल कभी अगल नहीं हो सकते। क्योंकि संगीत एक कला औऱ संस्कृति है। जो हमें बहुत कुछ सीखाती है। जैसे ताल, सुर, राग के बिना संगीत अधूरा है, वैसे ही संगीत के बिना मानव अधूरा है। या कहे संगीत के बिना हमारा देश अधूरा है। संगीत ने ही हमें लता दी, आशा ताई, किशोर कुमार जैसे कई सितारे दिए हैं। जो आज हमारे देश की शान बने हुए है। वैसे भारत का संगीत से बहुत पुराना रिश्ता है। भारतीय संगीत वैदिक काल से भी पूर्व से चला आ रहा है। हिन्दू परंपरा के अनुसार संगीत ब्रह्मा जी ने नारद मुनि को वरदान के रूप में दिया था। वैसे गायन, वाद्य वादन और नृत्य तीनों कलाओं का समावेश संगीत को ही मान गया है। तीनों स्वत्रंत कला होते हुए भी एक - दूसरे के पूरक है। आपको बता दूं कि भारतीय संगीत दो भागों में बंटा है। 
प्रथम कर्नाटक संगीत जो दक्षिण भारत के राज्यों में प्रचलित है। वहीं दूसरा संगीत हिंदुस्तानी संगीत है। जो बाकी शेष भारत में प्रचलित है। भारत की संस्कृति में संगीत का बड़ा महत्व रहा है। वैसे भारत में धार्मिक - सामाजिक परंपराओं में संगीत का प्रचलन प्राचीन काल से चला आ रहा है। वहीं कुछ लोग संगीत को भारत की आत्मा भी मानने है। जिसके चलते आज हमारा देश संगीत में लोकप्रसिद्ध है। ताल - सुर- राग भारत के विशेष अंग है। ताल-सुर-राग के बिना ये देश हमारा अधूरा है। संगीत ही इस देश की शान थी, औऱ है, रहेगी भी..........।। 


                                                   संपादक- दीपक कोहली  


    




  

28 January 2017

काली रात

                             

जी हाँ....। ये काली रात आपातकाल की रात थी। जब श्रीमती इंदिरा गांधी ने अचानक देश में आपातकाल घोषित किया था। ये भी कहा जाता है कि विपक्ष की डर से प्रधानमंत्री इंदिरा  गांधी ने देश में आपातकाल लागू कर दिया। जिसके बाद इंदिरा को इसका हिसाब भी चुकाना पड़ा था। वैसे आपातकाल 25 जून 1975 से 21 जून 1977 तक लगा रहा। जिस बीच देश में कई असामान्य घटनाएं हुई। विपक्ष के कई नेताओं को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। मीडिया पर प्रतिबंध ( सेंसरशिप) लगा दिया गया। जिसके चलते आम लोगों तक कोई भी सूचना नहीं पहुंच सकी थी। इसी आपातकाल के दौरान इंदिरा गाधी के संजय गांधी ने नशबंदी अभियान चलाया था। जिसके चलते कई घरों की आश बुझ गई। यह आपातकाल धारा 152 के अंतर्गत लगाई गई थी। आपको बता दूं कि देश में आपातकाल कब - कब लगाया जा सकता है। धारा-  (352) देश की सुरक्षा के लिए, धारा- (356) राज्य में राष्ट्रपति शासन होने पर, धारा- (360) देश में वित्तीय संकट के दौर में आपातकाल लग सकता है। इस आपातकाल का असर मीडिया ही नहीं बालीवुड में भी देखने को मिला था। वैसे अभी तक देश में आपातकाल कुल तीन बार लगा है। 
1)- 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान।
2)- 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान। 
3)- 1975 से 1977 तक जब इंदिरा गांधी अपनी सरकार बचाने के लिए लगाया था। 
वैसे इस आपातकाल के दौरान संजय गांधी, वीसी शुक्ला, ओम मेहता की तिकड़ी पूरे देश में बहुत ही लोकप्रसिद्ध रही थी। क्योंकि संजय गांधी ने देश के लोगों  से पॉंच सूत्रीय मांग की थी- जो इस प्रकार है-
1)- वयस्क शिक्षा।
2)- देहज प्रथा का खात्मा।
3)- पेड़ लगाना।
4)- परिवार नियोजन।
5)- जाति प्रथा का उन्मूलन।

वैसे आपातकाल एक प्रकार का असीमित अधिकार है। जिसमें जनता के अधिकार बिल्कुल खत्म हो जाते है। जिसमें जनता मूरदर्शक बन जाती है। 
बस जनता देख और सह सकती है। कई प्रकार की धाराएं लागू हो जाती है। आज देश में आपातकाल नाम आते ही इंदिरा गांधी की याद आ जाती है। जिन्होंने अपनी सरकार बचाने के लिए आपातकाल जैसे कदम उठाए है। जो ये दर्शाती है कि राजनीति पार्टियां (कांग्रेस) अपने हितों के लिए कुछ भी कर सकती है। क्या इंदिरा गांधी के लिए अपनी राजनीति पार्टी इतनी बड़ी थी।  जिससे उन्हें ऐसे कदम उठाने पड़े। इस आपातकाल या काली रात का डर आज भी लोगों के दिमाग में बैठा है। वैसे सवाल ये भी उठते है कि, क्या लोकतंत्र में अपने हितों के लिए आपातकाल लगाना सही है..? आखिर सुप्रीम कोर्ट इस विषय पर आज तक ठोस कदम क्यों नहीं उठा पायी..? क्या इस में भी कोई राजनीति मसला तो नहीं है..? इन सवालों के माध्यम से आप सोचने के लिए मजबूर जरूर होंगे। कि आखिर सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार के दवाब में तो काम नहीं करती.....क्या....?        
वैसे यह काली रात भारत के इतिहास में हर हमेशा ये याद दिलाएगीं कि सत्ता के लिए हमारे राजनेता कुछ भी कर सकते है। चाहे देश की साख दांव पर लगाने की बात ही क्यों ना हो। वैसे इस आपातकाल से देश में कुछ परिवर्तन तो जरूर आया था। लेकिन लोगों में निराशा थी। लोगों को समझ में आ गया कि ये इंदिरा का एक हिटलर रूप है। जिसके बाद इंदिरा को लोकसभा चुनावों में जोरदार हार का सामाना करना पड़ा था। बाद में इंदिरा समझ जरूर गई थी कि ये कदम उनका गलत साबित हुआ है। इस आपातकाल को इंदिरा काल का अंत भी कहां जाता है। वैसे यह इमरजेंसी हमारे देश के लिए एक घातक कदम था। जिससे हमारे देश को काफी नुकसान और परिवर्तन का सामना करना पड़ा था। जिसे कुछ लोग अच्छा भी बताते है, तो कुछ लोग इसे कालीरात का नाम देते है। इस आपातकाल के दौर में देश के राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद थे। इसे संविधान की कमजोरी भी कहते है। क्योंकि केंद्र सरकार अपनी मन मानी करती है।  



                                  संपादक- दीपक कोहली     

23 January 2017

= यूपी में चुनावी गठबंधन =

                              = यूपी में चुनावी गठबंधन =

जी हां...आपने सही सुना और सही पढ़ा...। जी हां.. मैं बात कर रहा हूं यूपी विधानसभा में सपा और कांग्रेस में गठबंधन की। जहां कुछ दिनों पहले  कांग्रेस 27 साल यूपी बेहाल का नारा देकर जनसभाओं को संबोधित कर रही थी। तो अब वही कांग्रेस सपा के साथ चुनावी मैदान में उतरेगी। इस गठबंधन को बिहार के महागठबंधन की तरह देखा जा रहा है। इस गठबंधन को प्रियंका गांधी से भी जोड़ा जा रहा है। क्योंकि इस बार प्रियंका चुनावी मैदान में उतर सकती है। वैसे कई वरिष्ठ पत्रकार ये भी कहे चुके है कि ये गठबंधन प्रियंका गांधी का यूपी की राजनीति में पर्दापण कर सकता है। तो वहीं इस गठबंधन को राहुल-अखिलेश से भी जोड़ा जा रहा है। लेकिन जो भी हो इस गठबंधन का परिणाम चुनाव के बाद ही पता चल पाएगा। आखिर ये गठबंधन कितना कारगर साबित हुआ। वहीं एक ओर बीजेपी इस गठबंधन को कांग्रेस और सपा की नई चाल मान रही है। तो वहीं कांग्रेस इसे यूपी चुनाव के लिए एक महत्वपूर्ण कदम मान रही है। वैसे इस गठबंधन को बिहार के तर्ज पर लिया गया है। एक ओर जहां कांग्रेस का इस गठबंधन का मकसद बीजेपी को हराना है, तो वहीं सपा (अखिलेश) का मकसद दुबारा यूपी में सरकार बनाना है। वहीं कांग्रेस चाहती है कि वो दुबारा अपना अस्तित्व वापस पाये। जिससे उन्हें 2019 के लोकसभा चुनाव में मदद् मिल पाये। तो वहीं सपा इस गठबंधन से यूपी की सत्ता में वापस आना चाहती है। चाहे जो भी हो इस गठबंधन से कई सवाल पैदा होती है। जैसे क्या सपा को अपने नेताओं और अपने विकास में भरोसा नहीं था...? वैसे ये भी कयास लगाए जा रहे है कि इस गठबंधन से राहुल औऱ अखिलश नजदीक जरूरी आइगें। जिससे राहुल और अखिलेश के राजनीतिक जीवन में एक नया मोड़ आ सकता है। वहीं प्रियंका गांधी भी इसे अपने राजनीति कैरियर के लिए एक सही मौका मान रही होगीं। जिससे वो अपना राजनीति जीवन की शुरुआत कर सकती है। यूपी के विधानसभा चुनावों में कयासों के दौर शुरु हो गए है। अब देखने वाली बात ये रहेगी कि आखिर ये कयासों के दौर और कब तक चलते रहेगें। यूपी चुनावों से पहले यूपी की राजनीति में कई फेर बदलाव देखने को मिले। जहां कांग्रेस के वरिष्ठ नेता बीजेपी में शामिल हुए तो वहीं सपा में परिवार वाद चर्चों में रहा। वैसे इस गठबंधन को राहुल और अखिलेश की नई चाल की कहे सकते है। क्योंकि एक ओर सपा में परिवार वाद ने सुर्खिया पकड़ी तो दूसरी तरफ गठबंधन ने सपा के टीआऱपी में रख दिया। जो यूपी विधानसभा चुनावों के लिए महत्वपूर्ण बिंदु हो सकता है। वैसे मेरा मानना है। यूपी चुनाव कोई भी पार्टी जीत सकती है, क्योंकि यूपी में बीजेपी का चेहरा मोदी ही होगें। जो बीजेपी का प्रचारक बनेगें। वही बीएसपी भी गहरी राजनीति खेल रही है। जिससे साफ हो जाता है, कि यूपी का चुनाव अभी तक किसी भी पार्टी के पक्ष में झुकता नज़र नहीं आ रहा है। हालांकि राजनीति विशेषज्ञ अपने बयान में बीजेपी को शीर्ष पर देख रहे हो। लेकिन मुझे नहीं लगता कि यूपी में पूर्ण बहुमत से बीजेपी की सरकार आएगी। इससे पहले भी बिहार के चुनावों में बीजेपी शीर्ष पर थी। लेकिन महागठबंधन ने सारे अनुमान झुठे साबित कर दिए। ऐसा ही दिल्ली के में देखने को मिला था। जिससे साफ हो जाता है कि आजकल जनता विकास के नाम पर ही वोट देती है।  क्योंकि जनता भली भांति जानती है कौन नेता कैसा है और कौन पार्टी कैसी हैं। अब जनता के हाथ में ही फैसला होगा, आखिर कौन उनकी आवाज़ सुनेगा। चलिए देखते है कौन बाजी मारता है। इस चुनावी दंगल में.....और जनता की अदालत में......।।
 
                      
                                       संपादक- दीपक कोहली                                

22 January 2017

= जल्लीकटटू खेल फिर शुरु =

                                                         
                  

                      


जल्लीकटटू को लेकर देशभर से अलग - अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कोई इसे धर्म से जोड़ रहा है, तो कोई इसे खेल बता रहा है। आखिर ये खेल है क्या...?  इससे पहले हमें आपको इस खेल के संबंध में कुछ विशेष जानकारी दे दें। वैसे यह खेल तमिलनाडु में पोंगल त्योहार के मौके पर खेला जाता है। जो 400 साल पुराना पांरपारिक खेल है। जो फसल कटाई के अवसर पर आयोजित किया जाता है। वैसे जल्लीकटटू एक पुरानी प्रथा है। जो इन दिनों विवादोंं में है। जहां सुप्रीम कोर्ट इस प्रथा पर अंतरिम रोक लगा चुका है, तो वहीं तमिलनाडु की जनता इसे अपनी संस्कृति का एक हिस्सा मानती है। जिसके चलते तमिलनाडु में पिछले लंबे समय से आंदोलन चल रहा था। इसी के चलते पिछले  पांच दिनों से तमिलनाडु में जनजीवन अस्त-व्यस्त चल रहा था। जिसके बाद राज्यपाल विद्यासागर राव ने अध्यादेश जारी करते हुए इस खेल से प्रतिबंध हटा दिया है। वहीं रविवार से इस खेल की शुरुआत तीन साल बाद एक बार फिर हो गई है।  जिससे तमिलनाडु वासियों में खुशी की लहर दौैड़ी है। वैसे आपको बता दूं, कि इस खेल को तीन साल पहले ही प्रतिबंध कर दिया गया था। कई विवादों के चलते एक बार इसे फिर इस खेल को मान्यता मिली है। इस खेल में बैलों को काबू किया जाता है। इस खेल में सांडों को शराब पिलाकर और उनकी आंखों में मिर्च डालकर फिर उन्हें  दौड़ाया जाता है। जिसके बाद उन्हें काबू किया जाता है। यह जानलेवा खेल का मेला तमिलनाडु के मदुरै में लगता है। जिसकी तुलना स्पेन की बुलफाइटिंग से भी की जाती है। लेकिन इस खेल में बैलों को मारा नहीं जाता है और ना ही काबू करने वाले युवकों के पास कोई हथियार होता है। वैसे इस खेल से पहले यहां के लोग अपने बैलों को इसका अभ्यास भी करते है। जिससे बैल इस खेल के लिए तैयार हो। वैसे इस खेल की एक और विशेषता है। इस खेल के योध्दाओं से प्राचीन काल में महिलाएं स्वयंवर भी किया करती थी। इस खेल में बैलों के सींगों में पैसे बांधे जाते है। जिन्हें प्रतियोगिता में भाग लिए योध्दा निकालते है या कहे जीतते है। यह खेल लगातार तीन दिनों तक खेला जाता है। जिसके बाद योध्दाओं को सम्मानित किया जाता है। इसी प्रकार यह खेल खेला जाता है।
प्रचीन सभ्यताओं और रोमांच से भरपूर होती है ये जल्लीकटटू का खेल...।।



                        संपादक- दीपक कोहली     


21 January 2017

- ट्रम्प के हाथों में अमेरिका -

                    

समय के साथ-साथ, लोगों की सोच-विचार करने की शक्ति भी बदलती है। चाहे वो अमेरिकन राष्ट्रपति ही क्यों ना हो। हर किसी का समय आता भी है, और जाता भी है। इसी क्रम में हम आज अमेरिका के 45वें राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बात करेगें । डोनाल्ड ट्रंप वो शख्स है जो हाल ही में अमेरिका के नए राष्ट्रपति बने है। वैसे नये राष्ट्रपति मिलने से अमेरिकी नागरिकों में एक नया उत्साह देखने को मिल रहा हैं। वहीं ट्रंप ने अपने शपथ ग्रहण समारोह के दौरान आंतकवाद पर जोरदार हमला बोलते हुए कहा कि आंतकवाद पूरे दुनिया के लिए सबसे बड़ा खतरा है। जिसका अंत करना बहुत जरूरी  है। वहीं ट्रंप ने ट्वीट के जरिए अपने समर्थकों का धन्यवाद किया। जहां एक ओर ट्रंप ने अपने भाषण में कई मुद्दों पर बात की। जिसमें युवाओं को रोजगार देने से लेकर फार्ट अमेरिका जैसे मुख्य बिंदु रहे। वहीं एक ओर ये भी कयास लगाए जा रहे है कि ट्रंप के राष्ट्रपति बनने से दुनिया में इस्लामिक देशों का दबदबा कम होगा। जिससे इस्लामिक प्रचार पर रोक लगेगी। वैसे भारत भी अपने रिश्तों को मजबूत बनाने की कोशश में लगा हुआ है। जिससे ये कयास लगाए जा रहे कि भारत अमेरिका अपने रिश्तों को एक नया मोड़ दे सकते है। जहां राष्ट्रपति ट्रंप अपने हर काम में मोदी को कापी करते दिख रहे है। वैसे ये भी माना जा रहा है कि बराक ओबामा और ट्रंप  की नीतियों में काफी बदलाव है। जहां ओबामा मुस्लीम समर्थक थे । तो वहीं ट्रंप इस्लामिक विरोधी है। ट्रंप अमेरिका को और शक्तिशाली बनाना  चाहते है। युवाओं को रोजगार देना चाहते है। अमेरिका में रोजगार पैदा करना चाहते है। कंपनियों को निवेश के लिए आमंत्रित करना  चाहते है। जिससे अमेरिका में रोजगार पैदा हो सके। वैसे ट्रंप ने अपने भाषणों से ये साफ कर दिया कि अब अांतक की खैर नहीं। जिससे पाक की नींद जरूरी गायब हुई होगी। 


एक नज़र डोनाल्ड ट्रंप के परिवार पर-

डोनाल्ड ट्रंप - 1) पहली पत्नी- इवाना ट्रंप - बच्चे- 1)  डोनाल्ड ट्रंप जूनियर
                                                                       2) इवांका ट्रंप
                                                                       3) एरिक ट्रंप

2) दूसरी पत्नी-  मार्ला मेपल्स
      बच्चे- 1) टिफनी ट्रंप

3) तीसरी पत्नी-  मेलानिया
       बच्चे- 1)  बेरॉन ट्रंप

डोनाल्ड ट्रंप की तीन शादियां और पांच बच्चे है। 

वैसे डोनाल्ड अपने कमेंटों के लिए भी जाने जाते है। ट्रंप ने उसी बाइबल में हाथ रखकर शपथ ग्रहण प्राप्त की जिसमें अब्राहम लिंकन ने हाथ रख कर शपथ ली थी। जिससे ट्रंप का कद औऱ भी ऊंचा हो जाता है। वैसे अब देखना होगा कि अमेरिका का रुख भारत के प्रति कैसा रहता है। सवाल तो कई उठते है। लेकिन उनका हल समय ही बात पाएंगा। ट्रंप को उनके नये पद के लिए मेरे तरफ से शुभकामनाएं।।

                          संपादक- दीपक कोहली



      

19 January 2017

*ओबामा की छुट्टी*

                                   *ओबामा की छुट्टी*

ओबामा वो शख्स है...जहाँ पहुंचने में या जहाँ पहुंचने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ती है। या कहे उस पोस्ट पर रहना हर किसी का सपना होता है। दुनिया का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति अमेरिकन राष्ट्रपति को माना जाता है।जिस पोस्ट पर ओबामा दो बार लगातार रहे है। वैसे ओबामा का पुरा नाम बराक हुसैन ओबामा II है। ओबामा एक अश्वेत अमेरिकी परिवार से संबंध रखते है। ओबामा अमेरिका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति रहे है। जिनका जन्म 4 अगस्त 1961 में हुआ था। ओबामा एक सामान्य परिवार से है। इतना ही नहीं ओबामा पेशे से वकील भी है। ओबामा ही वो शख्स है जिनके कार्यकाल में अमेरिका ने अपना खूंखार दुश्मन ओसामा बिन लादेन को भी मार गिराया था। ओबामा लगातार आठ सालों तक अमेरिका के राष्ट्रपति पद पर बने रहे। ओबामा अमेरिका के 44वें राष्ट्रपति रहे है। बराक पहली बार 2008 में इस पद के लिए चुने गए। 20 जनवरी 2009 को बराक ने अमेरिका के राष्ट्रपति पद की शपथ ली। वैसे बराक ओबामा डेमोक्रैटिक पार्टी से संबंध रखते है। साल 2012 में एक बार फिर ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति पद के लिए चुने गए। वैसे आपके बता दूं बराक ओबामा ऐसे पहले अफ्रीकी अमेरिकन है। जो पहली बार अमेरिका के राष्ट्रपति पद पर विराजमान रहे है। वो इस पद पर लगातार 8 सालों तक बनें रहे। वैसे आपको एक और बात समझा दूं, कि अमेरिका में एक व्यक्ति लगातार 8 सालों तक और अधिक से अधिक दो बार ही राष्ट्रपति बन सकते है। जो बराक ओबामा रह चुके है। वैसे अमेरिका के इतिहास में 8 साल से ज्यादा फ्रेंकलिन रोज़वेल्ट ही लगातार तीन 12 साल तक राष्ट्रपति पद पर रहे। जिसके बाद उनकी राष्ट्रपति पद पर ही मृत्यु हो गई। वहीं सबसे कम कार्यकाल 31 दिन विलियम हेनरी हैरिसन का रहा है। वैसे अभी तक अमेरिका को 44 राष्ट्रपति मिल चुके हैं। 20 जनवरी 2017 को बराक ओबामा का कार्यकाल पूरा हो गया है। वहीं इस दिन नये राष्ट्रपति डोनांल्ड ट्रम्प शपथ ग्रहण लेंगे। जहां एक ओर बराक व्हाइट हाउस छोड़ चले आइगें तो, वहीं व्हाइट हाउस अब ट्रम्प का हो जाएगा। ओबामा की हो की हो जाएगीं छुट्टी।।

                         
                     संपादक- दीपक कोहली

   

शुरू हुआ विराट युग

                         शुरू हुआ विराट युग

भारतीय क्रिकेट में रविवार को जैसे ही विराट कोहली टॉस के लिए मैदान पर उतरे वैसे ही भारतीय क्रिकेट में विराट युग की शुरुआत हो गई। अब ना सचिन युग रहा, ना गागुली युग, ना ही धोनी युग..रहा। अब तो शुरु हो गया कोहली युग। मेरा किसी खिलाड़ी या किसी व्यक्ति विशेष पर कोई कमेंट नहीं है। मैं भारतीय क्रिकेट के नये युग की बात कर रहा हूं, जो 15 जनवरी से शुरु हुआ है। वैसे भारतीय क्रिकेट में कई युग आए और खत्म हो गए। चाहे कपिल युग हो या गागुली युग...।  वैसे अब भारतीय क्रिकेट का विराट युग शुरु हो चुका है। जो विराट पहले भारतीय टैस्ट टीम के कप्तान थे और वहीं कोहली अब तीनों फोर्मेट का कप्तान बन गया है। जिससे देश के युवाओं में एक नया जोश देखने को मिल रहा है। वैसे विराट ने अपनी कप्तानी का पहला मैच एक विराट जीत के साथ की। मुझे लगता है कि ये भारतीय क्रिकेट के लिए एक नई ऊर्जा होगी। वैसे विराट कोहली एक उम्दा खिलाड़ी ही नहीं एक जिम्मेदार क्रिकेटर भी है। आपको बात दूं कि, विराट भारतीय क्रिकेट के उन क्रिकेटरों में गिने जाते है। जो इतिहास के पन्नों में बार - बार याद किए जाते है। जैसे कपिल देव, सुनिल गावस्कर, रवि शास्त्री, सचिन....आदि। वैसे भारतीय क्रिकेट का इतिहास अपने आप में बहुत ही रोचक रहा है। कभी कपिल देव का जमाना रहा तो , कभी धोनी का। लेकिन अब  भारतीय क्रिकेट में विराट का जमाना शुरू हो गया है। 
अभी विराट भारतीय क्रिकेट की रीढ़ हड्डी है। क्रिकेट में वक्त सबसे बड़ा होता है। चाहे खिलाड़ी कितना ही महान क्यों ना हो, जब उसका वक्त खराब चलता है तो उसके सितारे जमीं पर आ जाते है। वक्त साथ छोड़ते ही दिग्गजों की भी आलोचना शुरू हो जाती है। चाहे वो सचिन क्यों ना हो। इसी प्रकार किस्मत के धनी कहे जाने वाले धोनी का भी वक्त खत्म हो चला है। अभी भारतीय क्रिकेट की बागडोर विराट कोहली के मजबूत कंधों पर है। अब देखने वाली बात ये रहे कि विराट किस अंदाज में भारतीय क्रिकेट की कमान संभालते है। वैसे विराट अपने आक्रमक तेवरों के लिए क्रिकेट जगत में जाने जाते है। लेकिन जब से उन्हें भारतीय टीम का टैस्ट कप्तान बनाया गया है, तब से विराट के खेल में और आक्रमक तेवर देखने को मिल  है। अब देखने वाली बात ये भी रहेगी कि तीनों फोर्मेट में कप्तानी मिलने के बाद विराट का क्या अंदाज रहेगा। वहीं धोनी की बल्लेबाजी पर भी सबकी नजर टिकी रहेगी। वो किस अंदाज में खेलते है, और ये पहला मौका होगा जब धोनी अपने से जूनियर खिलाड़ी की कप्तानी में खेलेगें। 

                               संपादक- दीपक कोहली

18 January 2017

- ये कैसा घूंघट-

                                      - ये कैसा घूंघट-

घूंघट का नाम लेते ही नारी शक्ति सामने आती है। वो नारी जो आज भी हर समय घूंघट में रहती हैं। आखिर इस घूंघट का क्या अर्थ है..? क्यों इसमें रहना जरूरी है। क्या ये घूंघट हमारी सभ्यता का हिस्सा है। अगर ये हमारी सभ्यता का हिस्सा है, तो वो क्या है जो हमारी शहरी क्षेत्र की स्त्रियां अपना रहीं हैं। मेरा उन स्त्रियों के पहनावे पर कोई विरोध नहीं है। लेकिन मैं उस संस्कृति देश के बारे में कहना चाहता हूं। जो अपनी संस्कृति दिन पे दिन खोता जा रहा है। वैसे हमें अपनी संस्कृति के बारे में सोचना होगा, कि इसे आगे ले जाना है या फिर पश्चिमी सभ्यताओं की आग में जलना है। वैसे मेरा ये कहना नहीं है, कि हमें पश्चिमी सभ्यताएं नहीं अपनानी चाहिए। मेरा ये कहना है, कि हमें अपने संस्कार और अपनी सभ्यता नहीं भूलनी चाहिए। हमें अपनी सभ्यताओं से उन चीजों को खत्म करना होगा, जो हमारे सामाज में हमें असहज महसूस करते हैं। जिससे किसी को कोई शिकायत नहीं हो। चाहे वो स्त्री हो या पुरूष। वैसे हमारे सामाज में अभी भी 60 फीसद स्त्रियां घूंघट में रहती है, जो महिलाओं के लिए एक सजा जैसी है। हमारे सामाज को इस बारे में ध्यान देने की जरूरत है। जिससे उन महिलाओं को आजादी मिल सके और साथ ही साथ अपनी सभ्यता, संस्कृति के बारे में भी सोचना होगा। जिससे हमारी संस्कृति भी बनी रहे और हमारी पहचान भी बनी रही। वैसे हमें पश्चिमी सभ्यताओं से बचना चाहिए, क्योंकि यह सभ्यताएं हमारे ऊपर हांवी हो रही हैं। जो हमारी संस्कृति के लिए कैंसर जैसा है। भारत की संस्कृति ही उसकी पहचान है। यहां का रहन-सहन, खान-पान, आदि यहां की पहचान है। जो खोती जा रही हैं। वैसे मेरा मुद्दा ये नहीं घूंघट पर है। आप तो जानते ही होंगे आखिर घूंघट क्या होता है। वैसे घूंघट ज्यादातर गांवों-देहात में देखने को मिलता है। मैंने कुछ ग्रामीण महिलाओं से इस घूंघट के बारे में जानने की कोशिश की, जिसमें कुछ महिलाओं का साफ कहना था कि ये हमारे लिए एक सजा जैसी है। वैसे कुछ महिलाओं का ये भी कहना था कि ये हमारे सभ्यता का हिस्सा है। लेकिन सवाल ये उठता है कि हमारा देश  21वीं सदीं में है, तो क्यों हमारे ग्रामीण महिलाएं 19वीं सदीं में जीने को मजबूर है। आखिर इसका कोई हल निकालना ही होगा। 

नारी ही इस देश की शक्ति है और हमें इस नारी की सम्मान करना है। 



                                            संपादक- दीपक कोहली                   

03 January 2017

- भारत में नोटों का प्रचलन & रुपये की शुरुआत -

                - भारत में नोटों का प्रचलन &  रुपये की शुरुआत - 

देश में नोटबंदी को लेकर घमासान मचा हुआ है। जहां एक ओऱ मोदी सरकार  इसे जनता के पक्ष में बता रही हैं। तो वहीं दूसरी तरफ विपक्ष इसे जनता के खिलाफ बता रही हैं। वैसे देखा जाए तो फैसला कोई गलत नहीं है। लेकिन व्यवस्था ठीक नहीं होने के कारण लोगों को थोड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा हैं। जिसे देश के लोग खुशी खुशी सह रहे हैं। देश में नोटबंदी ने जहां पूरे विश्व को हिला दिया है तो वहीं कालेधन रखने वालों की परेशानी दिन पे दिन बढ़ती जा रही हैं। मैं आपको नोटों का वो इतिहास बताने जा रहा हूं जिसे पढ़कर आप हैरान रह जाएगे। क्या आपको पता है देश का पहला नोट कब छपा और किस बैंक के द्वारा छापा गया। नोटों से जुड़े हर एक पहलू मैं आपको बताऊंगा। क्या है नोटो का इतिहास और कैसे शुरु हुआ नोटों का चलन। आपको बता दूं देश का पहला नोट बैंक ऑफ हिंदुस्तान ने सन् 1770 में छापा था। जिसमें 10 रू से लेकर 10 हजार रूपये तक के नोट छापे गए थे। "बैंक ऑफ हिंदुस्तान" बंगाल प्रेसिडेंसी के तहत काम करने वाला एक प्राइवेट बैंक हुआ करता था। वैसे देश में 1857 की क्रांति के बाद अग्रेजों  ने रूपये को अधिकारिक मुद्रा बनाया। जिसे पूरे भारत में लागू किया। जिससे देश में एक नई क्रांति आई और नोटों का प्रचलन शुरु हुआ। वैसे अंग्रेजों से पहले भी कई भारतीय राजाओं ने नोट जारी किये। लेकिन वो एक सीमा के अंतर्गत चलते थे। आपको बात दूं 1857 में जो नोट अंग्रेजों द्वारा चलाए गए, उन नोटों में जार्ज पंचम और क्वीन विक्टोरिया की फोटो होती थी। अगर देखा जाए तो हमारे देश में भी अंग्रेजों ने अंग्रेजी करेंसी लागू कर दी थी। इतिहास तो बहुत बड़ा है लेकिन मैं आपको वो बातों से रुबरु करा रहा हूं जो नोटों की कहानी बताती है। सन् 1938 से लेकर अब तक का सबसे बड़ा नोट दस हजार & पांच हजार & एक हजार रूपये के थे। जो 1946 से पहले चलन में थे। जिसके बाद इन्हें 1946 में बंद कर दिया गया, और 1954 में एक बार फिर इन्हें चलन में दुबारा लाया गया। जिसके बाद इन्हें एक बार फिर 1978 में बंद कर दिया गय़ा। अगर आजाद भारत की बात करें तो देश का पहला नोट 1949 में एक रूपये का नोट छापा गया। जिसमें सारनाथ के सिंहों वाले अशोक स्तम्भ की तस्वीर थी। आपको बता दूं सन् 2000 से पहले भी देश में 1000 के नोट नहीं हुआ करते थे, जिन्हें सन् 2000 में एक बार फिर दुबारा चलन में लाया गया। वैसे 1969 से पहले नोटों में महात्मा गांधी की फोटो नहीं हुआ करती थी। अब एक बार फिर मोदी सरकार ने दो हजार रू का नोट लाकर पूरे देश में एक क्रांति ला खड़ी की है। जिससे एक तरफ लोगों में आक्रोश देखने को मिल रहा है तो वहीं दूसरी तरफ एक बड़ी संख्या में जनता पीएम के इस फैसले की तारीफों की पुल बांधा रही हैं। अब आगे देखना होगा इस फैसले से देश को कितना फायदा हुआ।   


                           संपादक - दीपक कोहली

तलाक..तलाक..तलाक..?

                             तलाक..तलाक..तलाक..?

ये शब्द सुनते ही दिमाग में अलग होना या कहे किन्हीं दो शादीशुदा लोगों का अलग होना या उनकी शादी टूटना आता हैं। वैसे आजकल तीन तलाक का मामला खूब छाया हुआ है। आखिर क्या है ये तीन तलाक जो आजकल हर न्यूज़ चैनल की खब़र बनी हुई है। आखिर क्यों सुप्रीम कोर्ट में जाना पड़ा। क्या ये किसी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना हैं..? या फिर एक नारी को उसके अधिकार देना हैं। सवाल तो कई हैं। लेकिन हर सवाल का हल ढूढ़ना बेहद मुश्किल है। जहाँ एक तरफ तीन तलाक पर सर्वोच्च न्यायालय ने अपना पक्ष रखा या कहें अपना फैसला सुनाया। जिसके बाद से तीन तलाक का मुद्दा एक बार फिर चर्चा कर विषय बना हुआ है। इस देशव्यापी विषय में लगभग तमाम मुल्ले-मौलवी अपना - अपना पक्ष और तर्क दे रहे हैं। वहीं एक ओर मुसलमानों  का एक बड़ा पक्ष इसका विरोध करता दिख रहा है। तो वहीं  दूसरे पक्ष के लोग इसका समर्थन करते दिख रहे हैं। दरअसल मैं ज्यादा तो जानकार नहीं हूं लेकिन इतना जरूर कह सकता हूं, कि इस्लाम के पवित्र कुरान में तीन तलाक की व्यवस्था को गैर- कानूनी बताया गया है। कुरान में ये साफ-साफ लिखा है कि स्त्रियों की गरिमा, सम्मान, सुरक्षा को ठेस पहुंचाना एक अपराध है। वहीं कुरान में तलाक को ना करने लायक काम बताया गया है। वैसे आपको बता दूं कि इस्लाम धर्म में तीन तलाक को मान्यता तो प्राप्त है, लेकिन दोनों पक्षों के रजामंदी से। वैसे आपको पता होगा कि तीन तलाक क्या है..? अगर नहीं तो तीन तलाक का मतलब है कि अगर आपकी शादी किसी लड़की या किसी लड़के से होती हैं । तो शादी के बाद उस लड़की या लड़के से किसी बात पर आपकी नहीं बन रही है तो आप उसे तीन बार तलाक..तलाक..तलाक कहकर तलाक दे सकते है। लेकिन इसके कई नियम भी बनें हैं जो इस्लामिक धर्म के आधारित है। लेकिन स्त्रियों के लिए इसमें कोई खास तरह कि छूट नहींं है। जिसमें एक पुरुष अपने अधिकार के लिए अपनी धर्मपत्नी को तलाक दे देता है। जो नारी शक्तिों का हनन है। वैसे जब से सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया है, तब से कई धार्मिक गुरुओं के बयान सुनने को मिल रहे हैं। जो इस मुद्दे को और भी रोचक बनाते है। वैसे इतना ही नहीं इस मुद्दे पर राजनीति भी कम नहीं हो रही है। वैसे मेरा मानना है कि ये कदम मानवता से जुड़े है जिस पर राजनीति की जा रहीं है। इस विषय पर सवाल तो कई है, लेकिन उनको सही तरीके से हल किया जाए तो देश में कोई अराजकता नहीं फैलेगी। वैसे अगर इस मुद्दे पर मुस्लिम औरतों की माने तो वो पहले से ही तीन तलाक के विरोध में खड़ी नज़र आती हैं। इतना ही नहीं हिंदू धर्म में भी महिलाओं के साथ भेदभाव की खब़र आती रही है। जो देश के लिए चिंता का विषय है। सर्वोच्च न्यायालय को इन विषयों पर एक टीम का गठन कर इसकी जांच करनी चाहिए कि क्या वाकई में देश अभी भी पुरानी सदीं में जी रहा है क्या..? 


         संपादक - दीपक कोहली