साहित्य चक्र

25 February 2019

ऊंचा सरदार


किसने बनाया विश्व का सबसे ऊंचा सरदार


राम वी सुतार वो शख्स है। जिसने विश्व का सबसे अच्छा ऊंचा सरदार बनाया है। जी हां आपने सही सुना और पढ़ा। शिल्पकला के क्षेत्र में राम वी सुतार का नाम जितना पुराना है। सुतार अपने कला के लिए उतने ही प्रसिद्ध है। सुतार की उम्र की बात करें तो सुतार जीवन के अंतिम पड़ाव पर है। जिस उम्र में इंसान के हाथ-पैर काम करना बंद कर देते हैं। उस उम्र में सुतार ने विश्व की सबसे ऊंची मूर्ति बनाकर इतिहास के पन्नों में अपना नाम लिखा स्वर्ण अक्षरों में दर्ज कर लिया है। सुतार वो शख्स है जो कभी महात्मा गांधी के साथ तो कभी अंबेडकर के साथ में नजर आया करते थे। आपको बता दें, सुतार ने सबसे पहले अपने स्कूल समय में महात्मा गांधी की मूर्ति बनाई थी। जिसके बाद सुतार की कला को धीरे धीरे पहचान मिलने लगी। राम वी सुतार का जन्म महाराष्ट्र के एक छोटे-से गांव गोडूंर में 1925 में हुआ। सुतार ने अपने स्कूल के दिनों में पहली बार हंसते हुए गांधी की मूर्ति बनाई थी। जब भी राम वी अपनी पुरानी बातों को याद करते है। तो उनके चेहरे पर एक अलग ही आत्मविश्वास नजर आता है। अपने स्कूल के दिनों में गांधी की मूर्ति बनाने पर सुतार को 300 रूपये मिले थे। जिसके बाद सुतार मुबंई के जेजे स्कूल ऑफ आर्ट में मूर्ति शिल्प की पढ़ाई के लिए चले गए। पढ़ाई के बाद एलोरा पुरात्व विभाग में नौकरी करने लगे। नौकरी के बाद लगभग 1959 में सुतार दिल्ली आ गए। सुतार गाँधी से काफी प्रभावित रहे है।

गांधी को देखने और समझने की इच्छा ने सुतार को शिल्प कला में एक विशेष दर्जा दिया।

महात्मा गांधी के बिना सत्य और अहिंसा का जिक्र करना गलत है’- राम वी सुतार। मुझे गांधी के बिना अहिंसा मंत्र ने बहुत प्रभावित किया। गांधी के दर्शन में हर समस्या का हल है। महात्मा गांधी बेहद प्रैक्टिकल थे। गांधी को आकारों में ढालते समय मेरे दिमाग में कई सवाल पैदा होते है। अगर सच कहूं तो गांधी को आकारों में ढालना मेरे लिए एक तपस्या जैसी है। जब भी मैंने गांधी की मूर्ति बनाई पूरी निष्ठा और आस्था से बनाई हैः- सुतार।

राम वी सुतार मानते है, जिस तरह बिना आस्था आपकी कला में पूरी नहीं हो सकती है। उसी तरह गांधी हम सब की जरूरत है। देश को यहां तक लाने में गांधी के विचारों का बहुत ही बड़ा योगदान रहा है। गांधी की जगह कोई नहीं ले सकता है। गांधी को हम उनके विचारों और मूर्तियों से जिंदा रख सकते है। हमारा देश चाहे कितने भी आगे क्यों ना बढ़ जाए पर हम गांधी को नहीं नकार सकते। राम वी सुतार ने कई सारी मूर्तियां बनाई है। जिनमें से एक हाल ही में विश्व की सबसे ऊंची लौह पुरूष सरदार बल्लभ भाई की मूर्ति भी है। इस बार सुतार ने सरदार जी की विशाल मूर्ति बनाकर पूरे देश का दिल जीता है। राम वी सुतार को सरदार जी की विशाल मूर्ति को आकार देने लिए ढेरों शुभकामनाएं।   


                  ।।संपादन- दीपक कोहली।।       


पहाड़ आओ







आओ हमारे पहाड़ आओ।
सौन्दर्य का आनंद ले जाओ।।


आत्मा को शांति दो।
मन को मान लो।।
तन को आराम दो।
धन को दान दो।।


आओ हमारे पहाड़ आओ।
सौन्दर्य का आनंद ले जाओ।।



                     कवि- दीपक कोहली



22 February 2019

साहित्य निष्प्राण हो जाएगा अगर जन सरोकार से दूर किया गया





साहित्य को समाज का दर्पण होना चाहिए अर्थात् समाज के चेहरे को हूबहू दिखाने के सामर्थ्य से सम्पन्न। सिर्फ इतना ही नहीं अपितु समाज को उन्नतशील और नवीन राह देना भी साहित्य का दायित्व है। इसलिए एक साहित्यकार को ग्राह्य हृदयी होने के साथ - साथ दूरदर्शी भी होना चाहिए जिससे वह समाज को समझ सके और सही दिशा दे सके। बहुत अफ़सोस के साथ इस सत्य को स्वीकार करना पड़ रहा है कि आज का साहित्यकार तटस्थ रहने का दिखावा करके 'सेफ जोन' का आदी होता जा रहा है।
 
साहित्यिक सम्मान और उपाधियाँ ज्यादातर राजनीतिक गलियारे में पैदा होती हैं इसलिए आज के दौर का तथाकथित साहित्यकार 'नेताजी चालीसा' रचने का हुनर सीखना चाहता है। ज्यों ही वह नुक्कड़, हाट और चलते- फिरते कवि सम्मेलन एवं गोष्ठी से वरिष्ठ  साहित्यकार होने का तमगा झटक लेता है, दौड़ पड़ता है राजभवन के जगमगाते चौपाल की ओर। सत्यासत्य से दूर, उचितानुचित से परे किसी तथाकथित सामर्थ्यवान के पीछे चिपककर अतिशयोक्ति को भी मात देता हुआ बगुल ध्यान से वांछित खिताब को उड़ा लेता है अपनी झोली में और फिर तटस्थ मुद्रा में परमहंस बन जाता है अगले अवसर आने तक के लिए। 

तथाकथित बुर्जी साहित्यकार साहित्य को इतना जटिल बनाकर परिभाषित करते हैं कि साहित्य के पारलौकिक होने का भान होने लगता है। समाज से दूर, सामाजिक सरोकार से दूर, सेठ की तिजोरी और गरीब की झोली से दूर, भूख और रसूख से दूर, विज्ञान और आध्यात्म से दूर, एक वाक्य में कहें तो जन गण मन से दूर। देश की दशा और दिशा पर बात करना इनके लिए अछूत - सा है। गिरते सामाजिक मू्ल्य पर लिखने से इनहें परहेज है। राजनीतिक हलचल का दाग माथे पर लेना नहीं चाहते। धर्म निरपेक्ष होने की आड़ में अधर्म पथ अनुगामी हो रहे हैं। बामपंथ - दक्षिणपंथ से बचने के लिए मानव पंथ से पृथक राह चुन रहे हैं। पंजा, फूल, हाथी, हथौड़ा आदि को काजल मानकर उजले दामन को बचाये रखने की जुगत में पूर्ण सजगता अपना रहे हैं। 

मुद्दों को पार्टियाँ पैदा करती हैं और फिर उनकी छीना - झपटी करती हैं। सभी अपने पक्ष में उन मुद्दों को लाना चाहते हैं जिनसे उनका वोट बढ़े और दूसरों का नुकसान हो। जो मुद्दे विरोधियों के गले में फाँस बन सकते हों, उनको बड़े चाव से लपककर भुनाते हैं। सब मिलाकर ये सारे ज्वलन्त मुद्दे जनता के हित अथवा अहित से जुड़े होते हैं और इन्हीं परिवेश में जनता द्वारा समाज की रूप रेखा तय होती है। फिर जब साहित्यकार जन सरोकार के मुद्दों को छूने से डरेगा तो उसके द्वारा विरचित साहित्य उस समाज का दर्पण नहीं हो सकेगा। ऐच्छिक बिम्ब लेकर प्रायोजित प्रतिबिम्ब दिखाने वाला दर्पण कभी भी असल नहीं हो सकता। 'दर्पण कभी झूठ नहीं बोलता' की विशेषता को झुठलाने वाला दर्पण त्याज्य होना चाहिए। अतएव वह साहित्य और उसके सर्जक साहित्यकार भी त्याज्य होने चाहिए जो समाज के वास्तविक बिम्ब को दिखाने का हौसला और इरादा नहीं रखते। सत्ता के उठापटक से स्वयं के हानि - लाभ का गणित लगाते हैं। जब इनका हौसला और इरादा ही नेक नहीं होगा तब ये समाज को उचित दिशा दे ही नहीं सकते बल्कि अनुचित राह दिखाएँगे या दिशाहीन छोड़ देंगे। 

अन्तत: आज के साहित्यकारों से आग्रह है कि कर्त्तव्य बोध से विमुख न हों। कबीर, भारतेन्दु व प्रेमचंद द्वारा स्थापित मानक से पल्ला न झाड़ें। जन साधारण की समस्या व अपेक्षा को ध्यान में रखते हुए जन सरोकार से सम्बंधित सामयिक साहित्य सृजन करें जो समाज का सही मूल्यांकन करे और उचित दिशा दे सके। यदि ऐसा करना सम्भव न हो तो मिथ्या कलम चलाने से अच्छा है कलम को रख देना। हर साहित्यकार को एक बार स्वयं की भूमिका के सम्बंध में स्वयं से सवाल करना चाहिए और मन दृढ़ता से सकारात्मक गवाही दे तो आगे बढ़ना चाहिए। दिनकर जी की अपेक्षा कि 'जब जब राजनीति लड़खड़ाती है, साहित्य सम्हाल लेता है' को भी ठोस आधार के साथ पूरा करने का दायित्व निभाना होगा।

                                                  डॉ. अवधेश कुमार 'अवध'



19 February 2019

शिक्षा की भाषा





आधुनिक युग में शिक्षा की भाषा:- मुद्दा राजनीति का हो या फिर शिक्षा का। सब मुद्दे एक बराबर क्यों नहीं..? हमारा देश अपनी संस्कृति से साथ-साथ अपनी भाषा को भी खोता जा रहा है। इससे भी दुखद घटना यह है कि हमारे यहां के नेता-अभिनेता इन मुद्दों पर मौन धारण किए हुए है। अगर ऐसा ही रहा तो हमारी संस्कृति के साथ-साथ हमारी शिक्षा व्यवस्था भी बहुत जल्द चौपट होने के कगार पर रह जाएगी। जिस तरीके से आजकल की शिक्षा व्यवस्था हो गई है। उसे देख कर यह लगता है कि आजकल के बच्चे सिर्फ पढ़ाई की एक मशीन के अलावा कुछ नहीं है। आजकल के बच्चे तो अपनी संस्कृति-सभ्यता को भी नहीं पहचान पाते है। आजकल की इस शिक्षा को अगर आधुनिक शिक्षा या फिर डिजिटल एजुकेशन कहे तो गलत नहीं होगा। आज की शिक्षा से बच्चा सिर्फ नौकरी पाने तक की ही शिक्षा प्राप्त करता है। आखिर ऐसा क्यों क्या इस पर हमें सोचना चाहिए।              


                  संपादन- दीपक कोहली

      

मेरी अंतिम यात्रा

मेरी अंतिम यात्रा



मैं गहरी नींद में था।
मेेरा पूरा घर रो रहा था।

मेरा पूरा गांव इकट्ठा था।
हर कोई मुझे तांक रहा था।
मुझए नहलाया-सजाया जा रहा था।

मुझेे नहीं पता..!
मेरेे साथ यह कौन सा,
अजीब-गरीब खेेल खेला जा रहा था।

मैं हैरान था।
मेरे सब अपने मेरे पास थे।
मालूम  नहीं क्यों..?
मेरे अपने एक-दूसरों के ,
कंधों पर रो रहे थे।
जो कभी मेरे दुश्मन हुआ करते थे।
आज वो भी मुझसे मोहब्बत कर रहे थे।

मुझे बार-बार जगाया जा रहा था।
मैं मजबूर था।
जो बार-बार जगानेे से,
नहीं उठ पा रहा था।
मेरी रूह कांप रही थी।
मैंने जब देखा ऐसा मंजर, कि
मुझे आज हमेशा के लिए 
सुलाया जा रहा है।

जिन दिलों में मेरे लिए,
कभी मोहब्बत-प्रेम हुआ करती थी।
आज मैं उन्हीं के हाथों जलाया जा रहा था।

मैं गहरी नींद में था।
मेरा पूरा घर रो रहा था।


                                      ।।कवि- दीपक कोहली।।




18 February 2019

लौह पुरूष सरदार भाई


लौह पुरूष सरदार भाई


कोई कहें सरदार...कोई कहें भाई...कोई कहे पटेल..। मैं कहूं भारत का लौह पुरूष सरदार पटेल। सरदार पटेल को लौह पुरूष के नाम से जाना जाता है। पटेल वो शख्स है। जो अपने फैसलों और साहस के लिए जाने जाते है। देश की आजादी में पटेल का जो योगदान रहा है वो कभी नहीं भूलने वाला है। पटेल ने देश की राजनीति में वो साहस भर है। जिसे कोई और नहीं भर सका। चाहे आजादी के बाद देशी रियासतों का संपूर्ण भारत में विलय हो या फिर 1948 का पाक युद्ध। पटेल ने अपने साहस और विवेक से देश को कई महत्वपूर्ण उपलब्धियां दी। पटेल देश के वो महानपुरूषों में से एक है। जिन्होंने देश के लिए अपना पूरा जीवन कुर्बान कर दिया। भारत को एक मजबूत राष्ट्र बनाने में पटेल का जो योगदान रहा है। उसे कभी भूलाया नहीं जा सकता है। आजादी के बाद पटेल को देश का पहला गृहमंत्री बनाया गया। गृहमंत्री रहते हुए पटेल ने जो काम दिए, वो आज भी याद आते है। पटेल हमेशा से एक जमीनी राजनेता के तौर पर पहचान रखने वाले नेता रहे है। सरदार को देश में एकता का पाठ पढाने के लिए भी जाना जाता है। पटेल आज भी उन महापुरूषों में गिने जाते है। जो युवाओं के दिलों में राज करते है। सरदार की सोच और शक्ति आज भी हमारे देश के युवाओं के प्ररेणा प्रदान करती है।

                                   लेखकः दीपक कोहली  



‘सोच’


सोच


सोच हर इंसान की अलग-अलग होती है। जो किसी के बस में नहीं होती है। बस हर इंसान अपनी सोच के अनुसार चलता तो जरूर है। लेकिन हर पल उसकी सोच बलती रहती है। सोच ही इंसान को एक बेहतर इंसान की राह पर ले जाती है। सोच इंसान का आधा परिचय दे देती है। सोच का कर्मों से कोई लेना देना नहीं है। यह जरूरी नहीं की एक चोर के मस्तिष्क में हर पल चोरी के ख्याल ही आते हो। एक बुद्धहीन इंसान के मस्तिष्क में भी कभी-कभी अच्छे विचार आ जाते है। क्योंकि हमारा मस्तिष्क ब्रह्मांड की तरह है। जिसे कोई पकड़ नहीं सकता, जिसे कोई रोक नहीं सकता है। इसलिए हमारा मस्तिष्क सदैव आजाद होता है। सोच ही हमारी एक पहचान बनाती है। जिस इंसान की जैसी सोच वहीं इंसान वैसे ही अपनी परिचय देगा। क्योंकि वह अपनी सोच पर सीमित होगा।


वैसे हमारी सोच सीमित तो नहीं है। लेकिन हमारी सोचने की शक्ति सीमित है। क्योंकि इंसानी जीवन बहुत ही कठिनमयी है। इंसान होना बड़ा नहीं है। इंसानी जीवन जीना कठिनमयी है। जिसे जीने के लिए इंसान दिन-रात मेहनत करता है।  


                    लेखकः-दीपक कोहली    

17 February 2019

वह जन्म भूमि मेरी


वह जन्मभूमि मेरी, वह मातृभूमि मेरी।

ऊंचा खंड़ा हिमालय, आकाश चूमता है,
नीचे चरण तले पर, नित सिंधु झूमती है।

गंगा, यमुना, त्रिवेदी नदियांं लहर रही हैं,
जममग छटा निराली, पग-पग छहर रही है।

वह पुण्यभूमि मेरी, वह स्वर्गभूमि मेरी।
वह जन्मभूमि मेरी, वह मातृभूमि मेरी।

झरने अनेक झरते, जिसकी पहाड़ियों में,
चिड़ियां चहक रही हो वो मस्त झाड़ियों में।

अमराइयां घनी हैं, कोयल पुकारती है,
बहती पलय-पवन है, तन-मन संवारती है।

वह धर्मभूमि मेरी, वह कर्मभूमि मेरी,
वह जन्मभूमि मेरी, वह मातृभूमि मेरी।

जन्मे जहांं थे रघुपति, जन्मी जहां थी सीता,
श्रीकृष्ण ने सुनाई, बंशी, पुनित गीता।



गौतम ने जन्म लेकर, जिसका सुयश बढ़ाया,
जग को दया दिखाई, जग को दिया दिखाया।

वह युद्धभूमि मेरी, वह बुद्धभूमि मेरी,
वह जन्मभूमि मेरी, वह मातृभूमि मेरी।


लला किले की चोटी पर

लाल किले की चोटी पर, तिरंगा झंडा  लहराता है।
बिछड़ गए जो साथी हमसे, उनकी याद दिलाता है।।


कहां गए भगत सिंह, सुखदेव, रादगुरु जो आजादी के मतवाले थे।

कहां गई दुर्गा लक्ष्मी, जो शत्रु रक्त की प्यासी थी।


कहां गए शिव-प्रताप-गोविंद, जिसने जीवन का पथ दिखलाया था।

देश धर्म की बलि वेदी पर, भेंट चढ़ाकर हो गए अमर।
बता गए तुम ही रक्षक, तुम ही मेरी आशा हो।


लाल किले की चोटी पर, तिरंगा झंडा लहराता है।।2।।




                              ।।जय हिंद जय भारत।।

।। मां सरस्वती प्रार्थना ।।


हे हंस वाहिनी, ज्ञान दायिनी, अंब विमल मति दें।
अंब विमल मति दें।।

जग सिर मौर बनाए भारत
वह बल विक्रम दे, वह बल विक्रम दें।।

हे हंस वाहिनी...।।2।।

साहसशील हृदय मेें भर दें।
जीवन त्याग तपोमय कर दें।।

संजय, सत्य, स्नेह कार वर दें।
स्वाभिमान भर दें, स्वाभिमान भर दें।।

हे हंस वाहिनी...।।2।।

लव-कुश, ध्रुव, प्रहलाद बने हम।
मानवता का त्रास हरे हम।।

सीता, सावित्री, दुर्गा मां,
फिर घर-घर भर दें।
फिर घर-घर भर दें।।

हे हंस वाहिनी...।।2।।



झंडा ऊंचा रहे हमारा

विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा।

सदा शक्ति बरसाने वाला, प्रेम सुधा बरसाने वाला।
वीरों को हर्षा ने वाला, मातृ-भूमि का मन-मन सारा।।

विजयी विश्व तिरंगा प्यारा...।।2।।

आओ प्यारे, वीरों आओ, देश धर्म पर बलि-बलि जाओ।
एक साथ सब मिलकर गाओ...।

"प्यारा भारत देश हमारा
झंडा ऊंचा रहे हमारा"

इसकी शान न जाने पाए, चाहे जान भले ही जाए।
विजयी करके दिखलाए, तब होवे प्रणपूर्ण हमारा।

झंडा ऊंचा रहे हमारा।

विजयी विश्व तिरंगा प्यारा...।।2।।


16 February 2019

सूर्य नमस्कार




1-     मेरी उदासी की वजह तो बहुत है। मगर मेरा बेवजह खुश रहना, मुझे एक अलग एहसास देता है।

2-     मेरे प्रभु जब तेरा नाम मेरे जुबां पर आता है। पता नहीं क्यों मेरा दिल मुस्कुराता है।

3-     मेरी निवेदन

मैं दीपक कोहली आप सभी से निवेदन करता हूं। आप हमारे इस पोस्ट को कम से कम 5 लोगों को  शेयर जरूर करें।

4-     पहले खुद को बदलो। देश अपने आप बदल जाएगा।

5-     संसार में मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है। जो दांतों से नहीं बल्कि अपने शब्दों से डंक देता है।

6-     समय-सेहत-संबंधआपका परिचय देती है।


7-     मेरी कविता मेरे शब्दों का जाल नहीं।
मेरी कविता मेरी पवित्र माला है।।
मेरी कविता मेरी प्यास नहीं,
मेरी कविता मेरा विश्वास है।।

मेरी कविता मेरी सोच नहीं,
मेरी कविता मेरा अहसास है।।
मेरी कविता मेरी जीत नहीं,
मेरी कविता मेरी हार हैं।

8-     अगर आप प्रेम की पराकाष्ठा तक पहुंचते हैं। तो आप एक भक्त बन जाते है।

9-     मेरे लफ्ज मेरी पहचान बन जाए। मेरी औकात मेरी जान बन जाए।

10-  बस अपनों का दिल जीतने का मकसद रखों। दुनिया तो सिकंदर भी नहीं जीत पाया था।

11-  हमारा सच्चा प्रयास निष्फल नहीं होता। छलांग से बेहतर है। निरंतर बढ़ते रहो। एक दिन मंजिल मिलेगी ही।

12-  मैं एक किताब हूं। चाहे कितना ही पुराना क्यों ना हो जाऊं। मेरे शब्द और मेरे अल्फाज कभी नहीं बदलेंगे।

13-  एक मात्र सुखी का खोजी इंसान है।

14-  सुख, संपति, स्वरूप, संयम, सादगी, सफलता, साधना, संस्कार, सम्मान ही हमारा परिचय है।

15-  धर्मसूत्रः- हमारा आचरण कर्तव्य ही हमारा धर्मसूत्र है।

16-  हमारा शरीर ही धर्म क्षेत्र है। हमारा शरीर ही कुरूक्षेत्र है।

17-  मेरा सच्चा कुरूक्षेत्र मेरा शरीर है।

18-  अधिकांश लड़ाई या युद्ध तेरा-मेरा और अपने-पराये के भेद-भाव से होती है।

19-  राग दोष ही अधर्म की जड़ है।

20-  हमारा धर्म सबसे पहले इंसानियत का है।।

                
                      दीपक कोहली




वीरगाथा


आंतक की गोली से
कब तक खून बहेगा,
हर हिन्दुस्तानी कब तक
आंतकी का दर्द सहेगा,
कायरता दिखलाते हो
पीठ पर हमला करके,
हिम्मत नही है तुझमें
सामने आ लड़ने,
बस आका की गोंद में
जाकर छिप जाते हो
अपनी कायरता का
वीरगाथा गाते हो,
हर जवान की शहादत
कभी ना खाली जायेगा
कब तक हिन्दुस्तानी
खून बहायेगा।

अभिषेक राज शर्मा

घाटी नर्क बनाकर

 
             दिल्ली बैठी पहन चूडियाँ 
                 किन्नर रोना रोती है।

      सिंहों के जिस्म कुत्ते नोच-नोच खाते 
शौर्य-वीरता के सम्मुख दीवार बना कानून 
राजनीति बंदूकों के मुख ताले लगवाती है।

                 देखो कैसे स्वार्थवश 
       दिल्ली विषधरों को दूध पिलाती है 
   मेरे देश के वीर जवानों को डसवाती है।

            संसद घिघियाना बंद करे 
     दुश्मन की छाती पर चढ़ हुंकार भरे 
        भारत माँ करुण स्वर सुनाती है।

अब नरभक्षी जल्लादों को फूल नहीं गोली दो 
    जो मांग रहे आजादी उनको आजादी दो 
                सिंहासन चुप्पी तोडो -
ये चुप्पी ही वीरों को चिथड़े-चिथड़े करवाती है।


                                    - मुकेश कुमार ऋषि वर्मा 


आतंकवाद से मुक्त करो


आतंकवाद से मुक्त करो
भारत की हर मां धन्य है,
जिन्होंने ऐसे सपूतों को जन्म दिया।
भारत माता पर कुर्बान होने को,
सब बेटे दंभ भरते हैं।
कुछ ताकतो ने भारत मां को,
फिर से ललकारा है।
कैसे चुप बैठे सपूत इनके,
जब मां पर आफत के बादल छाए हैं,
आपको देना होगा करारा जवाब,
नक्शे से नाम मिटाना है।
उठो धरा के वीर सपूतों,
काम बहुत ज्यादा है।
जिन माओ की कोख उजड़ गरी,
बहनों की राखियां बिखर गई,
कितने बच्चे अनाथ हो गए,
कितनी मांगे सुनी हो गई,
इन सब का जवाब देना होगा।
कब तक राजनीति ही करते रहेंगे,
अब तो होश में आओ सब जन,
भारत मां की बेड़ियों को आतंकवाद से,
मुक्त कराने का वक्त आ गया।।

                                                  ।।गरिमा।।


शहीदों को नमन


ना कोई शायरी और 
ना कोई नज्म लिखेंगे।
डूबा है दिल दर्द में मेरा ,
माँ आज तेरा सम्मान लिखेंगे।।

हर फौजी के दिल मे 
वंदे मातरम का जोश लिखेंगे।
आज हम कश्मीर लिखेंगे।।

कब तक बर्बरता सहेंगे हम 
कब तक सैनिकों के सर की भेंट करेंगे।
छलनी कर दुश्मन की छाती को,

नया एक इतिहास लिखेंगे।
आज हम कश्मीर लिखेंगे।।

रोती माँ ,बहनो की छाती को
दुश्मन के लहू से लाल करेंगे।
आज फिर धरती को 
तेरी हम आबाद करेंगे।।

फहरायेगे आज तिरंगा कश्मीर में।
उस पर वन्देमातरम का जोश लिखेंगे।
आज हम सिर्फ और
 सिर्फ कश्मीर लिखेंगे।

जय माँ भारती जय हिंद
वीर शहीदों को नमन

                           संध्या चतुर्वेदी


।।वीर कुर्बानी।।

वीर सपूतों की कुर्बानी आँखें हुई हैं सबकी नम।
देश पर हमला करने वाले कभी खुश नही रह पायेंगे।

आतंकियों पे पलटवार कर उन्हें नानी याद दिलाएंगे।


वीर सपूतों की कुर्बानी पर आँखें हुई है सबकी नम,

आक्रोश फैला हुआ जहाँ में उन गीदड़ों का रक्त बहाएंगे।

चालीस वीर सपूतों का बलिदान व्यर्थ नही जाने देंगे,

पाकिस्तानी आतंकवादी अपने किये पे बहुत पछताएंगे।


बहुत हो गया बेरहमीपन, बहुत हो गया कायरपन,

अब न रहम करेंगे तुमपर तुम्हें जरूर सबक सिखाएंगे।

उठो भारतीय आँसू पोछो अपना रौद्र रूप दिखाना है,

खून ख़ौल रहा अब सबका आतंकियों को मार गिराएंगे।


चुन-चुन कर बदला लेना है पाकिस्तानी नरपिशाचों से,

धर चंडी-काली का रूप भारत का रौद्र रूप दिखाएंगे।

फिर से जन्म लेगी दुर्गे माँ उन दुष्टों का संहार करने को,

उन राक्षसों का संहार कर देश के शहीदों का कर्ज चुकाएंगे।


                                 सुमन अग्रवाल "सागरिका"




धारा तीन सौ सत्तर और हमारी कुर्बानी


यह जगजाहिर है कि आर्टिकल 370 की आड़ में कश्मीर का हालात उस बेटी जैसा है जिसके पालन पोषण का दायित्व उसके मायके का होता है और उसपर समग्र अधिकार उसके ससुराल का। किसी जमाने में धरती का स्वर्ग कहा जाने वाला कश्मीर समय के थपेड़ों से लड़ते - लड़ते आतंकभूमि का पर्याय बन गया है। इस विकट और चिंताजनक परिस्थिति के पीछे पाकिस्तान से ज्यादा कश्मीर का योगदान है जिसका मायका भारत और ससुराल पाकिस्तान बना बैठा है। 

एक भारतीय कश्मीर का निवासी नहीं हो सकता। एक भारतीय पुरुष कश्मीरी लड़की से विवाह कर ले तो पति - पत्नी दोनों को कश्मीर छोड़ना पड़ता है जबकि एक पाकिस्तानी पुरुष कश्मीरी लड़की से विवाह करके कश्मीरी बन सकता है। आशय यह कि कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाला 370 भारत से अधिक पाकिस्तान के पक्ष में है। कश्मीर के बारे में जो सवाल अम्बेदकर जी ने उस समय उठाया था वह आज भी प्रासंगिक है। शेख अब्दुल्ला के मजबून को मानकर कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देना सबसे बड़ी भूल थी जिसे आज कश्मीर के साथ ही पूरा भारत भुगत रहा है। कश्मीर के लिए अलग से विशेष बजट (सर्वाधिक आर्थिक सहयोग) बनाकर जाता है जिसका उपयोग कश्मीर के विकास से अधिक बाहरी दामादों की सेवा में होता है। साधारण जनता गरीब होती जा रही है और वहाँ के पाकिस्तान परस्त देशद्रोही नेताओं की जेबें और नापाक इरादे मजबूत हो रहे हैं। हमारे सिपाही जानलेवा प्रकृति की भयावह गोद में बैठकर मौत से लड़ रहे हैं। कितनों का फौलादी शरीर गलकर बर्फ बन जाता है फिर भी देशभक्ति का जुनून देखिए कि पोजीशन पर अड़े रहते हैं। एक ओर प्राकृतिक प्रकोप जो अनियन्त्रित है तो दूसरी ओर मानव जनित आतंकी प्रकोप। कश्मीर की शान्ति परस्त आवाम प्राय: मार दी जाती है या भगा दी जाती है। इसलिए जो बचे भी हैं वो गुमनाम होकर जीते हैं मौत के साये में। आतंकियों को या आतंकवाद की पोषक वहाँ की जनता को वर्षों से कोई खतरा नहीं है। उनके हर अपराध 'गुमराह' की ओट में क्षम्य ही नहीं बल्कि बहुतों की नजर में पुरस्कार योग्य भी है। जब उनका मन करे हमारे सैनिकों को पत्थर मार सकते हैं, वर्दी फाड़ सकते हैं, बदतमीजी कर सकते हैं या हत्या कर सकते हैं क्योंकि वे विशेष राज्य का सुरक्षा कवच पहने हुए हैं। मानवाधिकार और हमारी सुप्रीम कोर्ट के कुछ वकील उन्हीं की सेवा के लिए बने हुए हैं। हर साल वे हमारे दर्जनों बेटों की हत्या कर रहे हैं और हम उनकी सुरक्षा कर रहे हैं। 

अब समय आ गया है पुनर्विचार करने का। हमें कश्मीर को विशेष राज्य के कवच से बाहर निकालकर भारतीय गणराज्य में अन्य राज्यों की तरह रखना चाहिए। जिस तरह पासपोर्ट का विधान तोड़ा गया वैसे ही धारा 370 को अविलम्ब खत्म किया जाना चाहिए। पाकिस्तान परस्ती को सीधे तौर पर देशद्रोह की श्रेणी में रखा जाना चाहिए। ऐसा करते ही वहाँ की अधिकाधिक समस्याएँ फौरन समाप्त हो जाएँगी। यदि हम ऐसा करने को तैयार नहीं हैं तो विशेष बजट और सुरक्षा दोनों का बोझ हम क्यों उठाएँ! भारत की आम जनता की खून पसीने की कमाई और आम घरों के लाल की जान हम उस भूमि पर क्यों कुर्बान करें जो पूरी तरह से हमारी है ही नहीं? जब तक सैनिक सब्र खोकर ऐसे सवाल उठाने को मजबूर हों उससे पहले सियासत और संसद को ठोस कदम उठा लेने चाहिए वरना देरी देश के लिए हर मायनों में अहितकर होगी।

                                        डॉ. अवधेश कुमार 'अवध'


।।सिंहनाद।।




हर घाव से बढ़कर है ये घाव हमारे सीने का
जिनकी करनी ये उनको अधिकार नहीं है जीने का
भारत माता के वीरों का खून मिला है माटी में
अब श्वेत कबूतर नहीं हमें सिंहनाद चाहिए घाटी में
जड़ें हिलानी हैं हमको पाक चीन के पापों की
फन कुचलना है पहले आस्तीन के सापों की
यही होगा सच्चा न्याय शहीदों के परिवारों का
पहले चुन चुन कर काटा जाए सर अपने गद्दारों का
फिर उडा़नी है धज्जी आतंक के फरमान की
जडे़ काटनी हैं इस बार पाखंडी पाकिस्तान की
गद्दारों को कड़ी सजा दशहतगर्दों का कड़ा दमन
यही होगा सच्चे वीरों को देश का सच्चा नमन
ऋणि रहेगा सदा वतन यह विश्वास दिलाता हूं
सभी वीरों के चरणों में मैं श्रद्धा के फूल चढा़ता हूं
सभी वीरों के चरणों में मैं श्रद्धा के फूल चढा़ता हूं

जय हिंद जय भारत 

                                                विक्रम कुमार


वीर शहीदों को श्रंद्धाजलि

पुलवामा में शहीद हुए , 
           हर वीर को नमन करता हूँ ,
भारत की सरकार सुनो , 
            मैं हाथ जोड़कर कहता हूँ ।
कायरता के पुतले पाक को , 
                     नक्शे से मिटा डालो  ,
हर एक हिंदुस्तानी के , 
             दिल की बात मैं कहता हूँ  ।।

पीठ पीछे वार करके , 
              औकात पाक ने बता डाली ,
भारत माँ की रक्षा खातिर ,  
                 वीरों ने जान गवाँ डाली ।
बदला तो लेना ही होगा , 
             सर्जिकल स्ट्राइक कर डालो ,
आंतक को जड़ से मिटा कर , 
                  पाक को कर दो खाली ।।

वीरांगना का सिंदूर मिटा है ,
                     माँ बापू की टूटी लाठी ,
उठा साया बेटे के सर से , 
                     बहना की रूठी राखी ।
भारत माँ की माटी का , 
               कर्ज चुका कर वो चले गये ,
भारत माँ के वीर शहीदों को ,
                  इंसाफ दिलाना है बाकी ।।

दिन-रात सीमा पर सैनिक , 
                    देश के खातिर लड़ते है ,
चैन से सो सके हम सब , 
                   सैनिक रातभर जगते है ।
लेकिन जब-जब पाक , 
                 कायराना हरकत करता है ,
तब जाके भारत के सैनिक ,
                   मौत का तांडव करते है ।।

बहुत हो गया भाईचारा ,
              अब औकात उन्हें दिखाते है ,
पाक को इस भारी गलती का , 
                     सबक आज सिखाते है ।
निकाल कर अपने हथियार , 
                     नया इतिहास बना डालो ,
दुश्मन को धूल चटा कर , 
               कारगिल की याद दिलाते है ।।

सुनो सरकार करो तैयारी , 
               "जसवंत" हाथजोड़ कहता है ,
पुलवामा में शहीद वीरों के ,
                    इंसाफ की मांग करता है ।
कायरता के पुतले पाक को ,
                           नक्शे से मिटा डालो ,
हर एक हिंदुस्तानी के ,
                   दिल की बात ये कहता है ।।
             शत शत नमन ! 
                                                         जय हिन्द ! जय भारत !