साहित्य चक्र

24 March 2019

माथे पर तिलक

 प्रेम कमण्डल 




माथे पर तिलक उसूलों का
हाथों में प्रेम कमण्डल है
संयम की माला पकड़ी है
सन्तोष साधना का बल है 

ईर्ष्या का हवन किया हमने
अब द्वेष विसर्जित कर डाला
करना ये यज्ञ जरूरी था
हमने सब अर्पित कर डाला
इस मन के गंगा सागर में 
पावन संकल्पों का जल है 

जब से सन्देह मिटा मन का 
सारी दुनिया घर लगती है 
सब अपने-अपने लगते हैं 
इक ज्योति  प्रीत की  जगती  है
अनमोल खजाना ढूँढ  लिया 
मन का आबाद धरातल है 

महकेगी जीवन की बगिया
हम ऐसे फूल खिलाएँगे
आए थे खाली हाथ भले
कुछ देकर जग को जाएँगे
पल भर का सारा खेल यहाँ
क्यों ? हार-जीत का दंगल है


                                ।। सुनीता कांबोज ।।



*परछाइयां*


   परछाइयों को ,
छूने की ,
 कोशिशें  ,...
 जितनी की .....
वह ,
दूर होती गईं ....
मुझसे ......
ज्ञात था,,
 यह सब ,....
मगर ...
भ्रम   और  भुलावे में ,
जैसे ,जीता है.....
 हर कोई ....
इस संसार में।।

 वैसे ही .....
भागना ,
परछाइयों के पीछे ......
किसी असत्य,
 के उजाले से ....
भरी किरणों को ....
मुट्ठी में बंद करने.....
 जैसा ही है......
 'जो '''ठहरती नहीं है...... 
  मेरी हथेलियों में भी ....
  अथक प्रयास ,, 
      के बावजूद  .. भी।।


                             सुकेशिनी दीक्षित


आँख रोती है

दिल भर आता है
आँख रोती है
जब कोई मासूम
आबरू खोती है।

पाव में पायल
बालों में चिमटी
हाथों में छोटा
सा कंगना भी
शोर करता है।

जब कोई अधेड़
फूल सी नाजुक
बच्ची को नोचता है।

मासूम सी वो 
गुड़िया जाने क्यों
और कैसे हवस
का शिकार होती है।

आँख भर आती हैं
माँ की दूध की
छाती भी रोती है।

यकीन नही होता
मुझे पढ़कर भी
ख़बरों को रोज
कैसे कोई कुचल
सकता हैं कमजोर
कलियों को इतनी
बर्बरता से की
मानवता शरमाती है
जब दो महिने की
नन्ही गुड़िया 
लहूलुहान हो जाती हैं।।

फटा कलेजा धरती का
जब डॉक्टर भी
रो जाता हैं
हाय फूल सी 
नाजुक चिड़िया
नोंच कोई 
खा जाता है।

लिखने में आज तो
कलम भी मेरी रोती है।
यहाँ रोज कोई मासूम 
अपनी आबरू खोती हैं।।


                                          संध्या चतुर्वेदी



भारत कैसे होगा भ्रष्टाचार सेेे मुक्त

भारत कैसे हो भ्रष्टाचार से मुक्त...?

दोस्तों हम और आप सभी ने भ्रष्टाचार के बारे में पढ़ा और सुना है।सभी जानते हैं कि भ्रष्टाचार नाम की बीमारी से हमारा देश बुरी तरह से ग्रसित हो चुका है।
यूँ तो भारत एक मात्र देश नही जहाँ भ्रष्टाचार अपनी चरम सीमा पर है।
पर दुःख इस बात का है कि कभी सच्चाई और ईमानदारी के लिए जाना जाने वाला मुल्क आज पूर्णतः भ्रष्ट हो चुका है।ऐसा हम कह सकते हैं।अगर आप को किसी भी सरकारी विभाग में कोई छोटा या बड़ा कैसा भी काम करवाना है तो या तो किसी की जान-पहचान जरूरी है, या फिर आप को रिश्वत देनी होगी और अगर आप इन दोनों में से कोई भी विकल्प नही चुनना चाहते तो आप को लम्बा इंतजार करना होगा।फिर भी काम हो जाएगा या नही इस बात की कोई गारण्टी नही है।
आज भाग दौड़ का युग हैं, इतना समय किसी के पास नही की इतना सिरदर्द कोई ले।तो अभी सोचते हैं कि कोई शार्टकट मिल जाए और ये शार्टकट की तलाश ही जन्म देती है भ्रष्टाचार को तो सिर्फ नेताओं को कोस कर हाथ झाड़ देने मात्र से काम नही चलेगा। आज भ्रष्टाचार देश मे कैंसर की भांति जड़ रूप में फैल चुका है।जिसके ईलाज के लिए हमें सर्वप्रथम खुद को मजबूत करना होगा। हम सब को अपने आप से करना होगा एक वादा कि चाहे कुछ भी हो जाए, मैं शार्टकट नही अपनाऊंगा ।चाहे काम देर से हो पर करवाना व्यवस्थित तरीके से ही है।
अगर हम और आप मे से कोई भी रिश्वत देने को तैयार ही नही होंगे ,तो अपने आप ही भ्रष्टाचार के पैर कमजोर पड़ जाऐंगे। हमें प्रशासन पर करना होगा भरोसा कि अभी भी कार्य प्रणाली से ही काम करवाया जाए तो होगा पूरा । कागजी कार्रवाई पुरी और व्यवस्थित हो इसकी  कर लें पुष्टि।
चलानी होगी मुहिम भ्रष्टाचार के विरुद्ध और युवा पीढ़ी को करना होगा सजग इस मुहिम में सहयोग के लिए ज्यादा से ज्यादा हो सभी कार्यों  को करने में ले, इंटरनेट की मदद और कागजी कार्य ऑनलाइन ही भरे,जिससे सबूत भी रहेगा और शार्टकट से भी बचेंगे। काम ना होने की दशा में शिकायत की करनी होगी पहल। अगर हम और आप सभी मिलकर ये छोटी-छोटी बातों पर ध्यान देते हैं तो निश्चित रूप से भ्रष्टाचार में आएगी कमी और कोई भी नेता,सरकारी अफसर या मंत्री रिश्वत लेने के नाम से डरेगा,कि कहीं बात निकल गयी तो जेल की हवा खानी होगी, तो भ्रष्टाचार में सहयोग ना करें, देश को बनाये भ्रष्टाचार से मुक्त।

                                                         संध्या चतुर्वेदी


हर कदम पर

*पितृत्व *
********

हर कदम पर ,,
विषमताऐं ,,....
जीवन की ,,
और.....
विपरीत धार.....!!

" आजीवन ''
एक ही पथ, पर....
निरंतर....
गमन ।।
असत्य के ,
कुहासे में ...
सत्य की खोज ।।

चले वह .........
लड़खड़ाते हुए ......
कभी नहीं........******
सदा ऊर्ध्व,,
शिखरों के जैसे ....
*अटल *
पितृत्व की
पोटली में .....थी..
इतनी सुगंध ....
कि परम भी ......
नत था ..........
उनके सम्मुख...।।
असीमित भार.......
से पितृत्व संपन्न ........
लुटाते रहे ......
सदा एक
*विशेष पिता*
बन ..........
दुआएं ,,
प्रार्थनाएं ,,
और उनके आशीर्वचन.....
निरंतर बहते रहे .......
उनकी *संतति* की ओर....
गंगा की अविरल,,,,
मूक धार ...
बन।।।।।

सुकेशिनी


** चुनावी कविता **


सरकार बने बिंदास

बंदर जैसे उछल रहे, कुछ लोग टिकट के वास्ते, 
बदल रहे हैं रंग अपना, और बदल रहे हैं रास्ते |
कोई रिझाए भाषण देकर, कोई रिझाए धन से, 
देखो कैसे ये चरण चूम रहे, हे भगवन! बेमन से ||


चेहरे का ये बदल मुखौटा, भक्ति करे है राम की, 
छेड़े तो फिर पूर्ण करे, जो बात करे संग्राम की |
ना मंदिर का निर्माण हुआ, ना अत्याचार पर रोक लगी,
नारी की रक्षा के लिए, किस आंदोलन की अलख जगी ||


मन मेरा हो बैचेन कहे, सत्ता अब कहाँ सुरक्षित है,
जनता सोच रही कि, किस सरकार में अपना हित है |
अब तो हर दल का नेता , बिन पैंदे का लौटा लगे, 
कमा नहीं सकता तो, भोली-भाली जनता को ठगे ||


जनता ने खूब करी है, बौछार तुम पर वोटों की, 
और लोकतंत्र की हत्या कर दी, देकर रिश्वत नोटों की |

अरे जरा तो शर्म करो, ओ! लोकतंत्र के हत्यारों, 
निर्दोष-सी जनता को तुम, भय दिखाकर ना मारो,

उम्मीद करें क्या, राजसिंहासन पर बैठे सम्राटों से, 
जो नोंच रहे हो जनता को, तीरों से और काँटों से |

आने वाली सरकार हो मजबूत और निष्पाप ,
करूँ मैं ऐसी आस, 
"शेलु" तो बस यही चाहे, सरकार बने बिंदास ||


                                                           सुनील पोरवाल "शेलु"


न नयनों में ऐसे जुदाई

न नयनों  में ऐसे  जुदाई  रखा कर ,
वतन के लिए कुछ वफाई रखा कर।

ये  माना  जमाना  दगा कर रहा हैं ,
मगर दिल में अपने भलाई रखा कर।

सलामत रहें  मुल्क  में सब हमेशा ,
दुआओं में  ऐसी  दवाई  रखा  कर।

तुम्हे भी कभी जायेगा मिल फलक ये ,
जिगर हौसलों  में ऊँचाई  रखा कर।

जमाना  तुम्हारा  भी होगा दीवाना ,
मुहब्बत  की ऐसी  रुबाई रखा कर।

दिखे जो नयन को हो गंगा सी पावन ,
निगाहों में  इतनी  सफाई रखा कर।

तुम्हारे  लिखें  बोल सुनने को तरसे ,
यु लफ्जो में इतनी मिठाई रखा कर।

मिले जो ख़ुशी से उसी में बसर कर ,
न हर पल लबो  में दुहाई रखा कर।

उठी हैं सदा उगलियां सच पे 'रोहित' ,
तू ईमा  की जारी  लड़ाई रखा कर।

                                               रोहित चौरसिया 


बेशर्म जोकर

जोकर

अपने ही तमाशे पर देखो वो मुस्कुरा रहा है।
बेशर्म जोकर देखो कैसे खिलखिला रहा है।।

अजीब चेहरे बनाकर सबको सर्कस में बुला रहा है।
पापी पेट की खातिर बहुत उछल खुद मचा रहा है।।

किसी के भी सामने अपना तमाशा दिखा रहा है।
बड़ा बेगैरत है अपनी बेज्जती पर मुस्कुरा रहा है।।

नाच रहा है,उछल रहा है,अपने करतब दिखा रहा है।
चेहरे पर मीठी मुस्कान लिए अपने दर्द छिपा रहा है।।

दर्द बहुत है और आँखो में आँशु भी छिपे कहीं है।
पर अपने खेल से सब से सबकुछ छिपा रहा है।।

लोग जोकर के खेल पर ठहाके लगा रहे है।
आज इसके खेल से अपना दिल बहला रहे है,
सब कहीं ना कहीं अपने दुखों को भुला रहे है।।

खेल के बाद अपना दुख मिटाने ये कहाँ जायेगा।
अपने पर हँसने वाला जोकर ये कहाँ से लाएगा।।

                                           नीरज त्यागी


भ्रष्टाचार की नगरी

भ्रष्ट नगरी 
-------------

भ्रष्टाचार की नगरी में 
लक्ष्मी लक्ष्मी हो रहा।

हर तरफ फैल रहा
फिर भी सो रहा
हर जगह उपद्रव है
हर नगर में शोर 
अपने अपनों से
देखो दूर हो रहा
भ्रष्टाचार की नगरी में 
लक्ष्मी लक्ष्मी हो रहा।


लक्ष्मी भक्त का कहर 
गरीब गाँव शहर
दिन रात रो रहा 
खुशियों के
त्योहार पर भी अब
अदालतो का चक्कर लग रहा
फिर भी देखो
लोभ क्रोध हिंसा का 
अंत नही हो रहा
भ्रष्टाचार की नगरी में 
लक्ष्मी लक्ष्मी हो रहा।


सत्य और पराक्रम
का उदय नही हो रहा
रोज फैल रहा अंधेरा
रोज नये रावणों का
वसेरा कयों हो रहा
भ्रष्टाचार की नगरी में 
लक्ष्मी लक्ष्मी हो रहा।


पग-पग पर हर वेश 
मे छुपा रावणो का
साम्राज्य क्यों फैल रहा
सुंदर शरीर मन मैला
जिसे देखो बना विषैला
फैशन बन रहा
भ्रष्टाचार की नगरी में 
लक्ष्मी लक्ष्मी हो रहा।

                                       "आशुतोष"


जिंदगी के रूप

जिंदगी के रूप
जिंदगी तेरा अजब ही रंग ढंग है,
किसी के पास ज्यादा तो किसी के पास कम है,
क्या क्या रंग दिखाती है जिंदगी,
बच्चे से बड़ा इंसान बनाती है जिंदगी।
मां बाप को पूछते नहीं आजकल के बच्चे,
ऐसा तजुर्बा दिखाती है जिंदगी।

भगवान को तो समझते हैं पत्थर की मूरत,
 पत्थर की मूरत को पूजती है जिंदगी।
इंसान को इंसान नहीं समझते हैं लोग,
लोगों को आइना दिखाती है जिंदगी।

मां बाप की सेवा जो करते हैं,
उन्हें भगवान का दर्शन कराती है जिंदगी।
फुटपाथ पर पड़े लोगों का कोई सहारा नहीं होता,
सहारा बनकर उन लोगों को रास्ता दिखाती है जिंदगी।

भूखे को भोजन, प्यासे को पानी,
इन सब का इंतजाम करती है जिंदगी।
जिंदगी को जिसने समझा बोझ की गठरी,
उन्हें बोझ की गठरी ढोना सिखाती है जिंदगी।
जो आया है वह जाएगा यही सच का आईना है,
मौत से सबको मिल आती है जिंदगी।।

                                           >> गरिमा <<


मनमीत......



मीत मेरा......ना जाने कहाँ खो गया?
ढ़ूंढती हैं  मेरी निगाहें  उसे यहाँ-वहाँ!
सुकूं लूटके दिल का जाने कहाँ गया?
दिल हमारा  दुखाया  करूं क्या बयाँ?
साथ उसके खुशी से  जीए जा रहे थे,
वो न रहा जिंदगी में लुटा है मेरा जहाँ!
संग उसके दुख भी, सुख ही  लगते थे,
अब सुख भी लगे  दुख करें क्या बयाँ!
बिछड़के उससे, जीवन में अँधेरा हुआ,
सच है उसी से ही था रौशन मेरा जहाँ!
उसकी  कमी से  अधूरा है  सुंदर जहाँ,
उससे ही तो था   मुकम्मल  मेरा जहाँ!
ढ़ूंढ कर  कोई ला  दो मेरे  मनमीत को,
बिना उसके जीना नही  गँवारा है यहाँ!

                                     मंजू श्रीवास्तव



दर्द

# आज फिर दर्द खरीदने चली हूंँ मैं #

बरसों दर्द की गली में पली हूं मैं
आज फिर दर्द खरीदने चली हूंँ मैं।
दर्द के समंदर में डूबकर निकली हूँ मैं
जो ना करना था खूब कर निकली हूँ मैं
तौहमते लगा कर अपने ही जहां में ,
मेहर ओ मा खोकर हुजूर निकली हूं मैं।

‌ जानती नहीं वरना क्यों कर गुजरती ,
अनजाने में ही अपना खूं कर निकली हूं मैं ।
अश्क रूकता नहीं याद जाती नहीं ,
अश्क और यादों के समुंदर में डूब कर निकली हूँ मैं।

रो सकती नहीं हँस लेती हूँ गम में ,
चीख अपने जिगर में रोक कर निकली हूं मैं।
यही गम रहेगा जीवन में साथ मेरे ,
अपनों को सफर में छोड़ कर निकली हूँ मैं।

मतलब की दुनिया के दस्तूर से " रश्मि"
हाय देखों आज कितनी भली हूं मैं।
भोली - भाली देख दुनियादारी अक्सर,
अजब-सादिक तेरे ही रंग में ढली हूँ मैं।

रोशन करने को गैर का आशियाना,
मरमरी- समा बनकर हरदम जली हूँ मैं।
हमदर्दी देख जमाने की अक्सर मुरझाई ,
सालता - दर्द देख फूली-फली हूँ मैं।

बरसों दर्द की गली में पली हूं मैं ,
आज फिर दर्द खरीदने चली हूँ मैं ।।
* मेहर ओ मा ( चांद, सूरज)

                                          रश्मि अग्निहोत्री

वीर सपूतों की कुर्बानी

देश पर हमला करने वाले कभी खुश नही रह पायेंगे।
आतंकियों पे पलटवार कर उन्हें नानी याद दिलाएंगे।


वीर सपूतों की कुर्बानी पर आँखें हुई है सबकी नम,
आक्रोश फैला हुआ जहाँ में उन गीदड़ों का रक्त बहाएंगे।

चालीस वीर सपूतों का बलिदान व्यर्थ नही जाने देंगे,
पाकिस्तानी आतंकवादी अपने किये पे बहुत पछताएंगे।


बहुत हो गया बेरहमीपन, बहुत हो गया कायरपन,
अब न रहम करेंगे तुमपर तुम्हें जरूर सबक सिखाएंगे।

उठो भारतीय आँसू पोछो अपना रौद्र रूप दिखाना है,
खून ख़ौल रहा अब सबका आतंकियों को मार गिराएंगे।


चुन-चुन कर बदला लेना है पाकिस्तानी नरपिशाचों से,
धर चंडी-काली का रूप भारत का रौद्र रूप दिखाएंगे।

फिर से जन्म लेगी दुर्गे माँ उन दुष्टों का संहार करने को,
उन राक्षसों का संहार कर देश के शहीदों का कर्ज चुकाएंगे।


                          सुमन अग्रवाल "सागरिका"


।।आह्वान।।





आह्वान है यह हमारा
सभी धर्मों के अनुयायियों से
हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई
बौद्ध जैन सभी भाईयों से
कि सब मिलकर एकता से
अनोखी सी एक रीत चला दो
बलात्कार के आरोपी को
चौराहे पर जिंदा जला दो
यह नारी के जज्बातों को
खंडित करती तलवार है
यह नारी के तन-मन पर
एक घिनौना अत्याचार है
इस अनोखे रीत को जब 
अपनाएगा पूरा देश
तब बलात्कारियों के तबके में
जाएगा एक उचित संदेश
कि नारी कोई खिलौना नहीं
वह बहन बेटी और माता है
नारी अब अबला नहीं
पुरूषों की भाग्यविधाता है
अब जाति धर्म के नाम पर
समाज को नहीं बांटना है
बस नारी पर जो हाथ उठे
उस हाथ को काटना है
क्योंकि हम यह जान चुके  हैं 
उनके कुकर्म देखकर
कि वो  इज्जतें नहीं लूटते
जाति धर्म देखकर
आओ मिलकर कसम यह खाएं
इस बात पर हम ध्यान देंगे
नारी से प्रेम करें न करें 
पर उनको सम्मान देंगे
इस संवेदनशील मुद्दे पर
कोई अपना कोई गैर नहीं
नारी का जबरन शील भंग
करने वालों की खैर नहीं

                                       ।। विक्रम कुमार ।।

हाथ कांपने लगे

होली पर गीत लिख रहा
हाथ कांपने लगे
हदय रोकर सवाल किया,
अरे शहीदों के घर पर
क्या होता होगा,
जब एक बुजुर्ग मां बाप का
हदय रोता होगा,
नन्हा सुकुमार बच्चा
जब त्यौहार पर
तैयार होकर
मां से सवाल किया"
वो मोहल्ले सब
अपने पिता के साथ
खरीदने बाजार जा रहे है,
मेरे पिता कहां है
वो कब आ रहे है,
मां क्या समझाती
खुद समझ में ना आता
बस भोले की बात सुनते
पीढा़ हदय को पहुंचाती
सामने वो मजंर जब
तिरंगा में लिपटकर
वो सदा के लिये देश का
हो गया,
अपने बच्चे को मौन
होकर क्या समझाती।।

।। अभिषेक राज शर्मा ।।