साहित्य चक्र

28 May 2022

नैतिकता और सेक्स संतुष्टि का रिलेशनशिप क्या है ?


सेक्स संतुष्टि के लिए नैतिकता की बात करना गलत है। जब आप अपना जीवन साथी खोजते हैं, उस समय आपको इन बातों का ध्यान देना होता है। आप अपने जीवनसाथी से सेक्स संतुष्टि को लेकर बातचीत करिए और किसी डॉक्टर से सलाह लीजिए। अगर आप अपने जीवन साथी से अपनी सेक्स संतुष्टि की बात नहीं करते हैं और कहीं बाहर अपनी सेक्स संतुष्टि खोज रहे हैं तो यह आपकी व्यक्तिगत समस्या है।






जब हम किसी रिश्ते से जुड़ते हैं तो तब नैतिकता की जिम्मेदारी हम दोनों की हो जाती है। यह कहना भी गलत होगा कि हर पुरुष अपनी सेक्स संतुष्टि के लिए इधर उधर मुंह मारता फिरता है। मेरा व्यक्तिगत मानना है कि भारतीय महिला समाज ही नहीं बल्कि पुरुष समाज में भी सेक्स को लेकर जागरूकता बहुत कम है। इसका मुख्य कारण भारतीय परंपरा का पुरुष प्रधान होना है। हमने बचपन से ही पढ़ा है कि हमारे यहां के राजा महाराजाओं ने अनेक शादियां की। मगर हम उन चीजों को हंसते-हंसते स्वीकार करते हैं। कभी हमने अपनी संस्कृति और सभ्यता पर सवाल ही खड़े नहीं किए।


सेक्स संतुष्टि किसी व्यक्ति का व्यक्तिगत भाव होता है। हम सिर्फ कुछ लोगों से सवाल पूछ कर आंकड़े दिखा दे यह सही नहीं है। भारतीय समाज में जब लड़का, लड़की शादी करते हैं तब वह जाति, धर्म, मजहब और धन देखते हैं। आप सोचेंगे की गुड़ भी मीठा और दही भी मीठा तो आप से बड़ा मूर्ख कोई नहीं होगा। आपको गुड़ और दही को मिलाकर खाने का प्रयास करना चाहिए। यानी जब आप शादी करे होते हैं तो आपको सेक्स से संबंधित बातों को भी स्पष्ट करना चाहिए।


अगर आपको लगता है कि आप अपनी सेक्स संतुष्टि को रोकर नैतिकता निभा रहे हैं तो इसका मतलब आप नैतिकता का अर्थ जानते ही नहीं है। सबसे पहले आपको नैतिकता का अर्थ जानना चाहिए और उसके बाद भारतीय संस्कृति को करीब से देखने की कोशिश करनी चाहिए। आजकल तो संविधान में भी कई प्रकार की छूट दे दी है। इसके बावजूद भी आप अपनी सेक्स संतुष्टि को नैतिकता कह रहे हैं तो शायद आप भारतीय संस्कृति की बेड़ियों में बंधे हुए हैं।

आप ही की संस्कृति में एक स्त्री के पांच पति होने के भी सबूत है और तो और शादी से पहले बच्चा पैदा करने तक के भी सबूत मिलते हैं। इसके बावजूद भी अगर आप अपनी सेक्सी संतुष्टि को नैतिकता से जोड़ रहे हैं तो शायद आप सिर्फ आप अपने मन की पीड़ा लिख रहे हैं परन्तु आपके अंदर हिम्मत नहीं है किसी प्रकार का ठोस कदम उठाने की। अगर आप अपनी शादी के बंधन में सेक्स संतुष्टि नहीं पा पा रहे हैं तो आपके पास तलाक का ऑप्शन है। आप तलाक देकर अपनी सेक्स संतुष्टि कहीं दूसरी जगह तलाश सकते हैं।


लेखक- दीपक कोहली

कविताः किये जाता है





अश्क़ मेरा फ़र्क को अब राख़ किये जाता है 
ये   माहौल   और भी  बेबाक किये जाता है

मैंने अपनी बात की,  तिलमिला उठा है वो 
सदियों से हक़ मेरे जो हलाक़ किये जाता है 

अगर सीधी हुई  जंग तो  हम जीत जायेंगे 
इसलिये वो छुप के ज़ेहन चाक़ किये जाता है 

उनके मन को छूना चाहा था वो समझाने लगे 
किसका छूना किसको यहां नापाक किये जाता है 

मैं हर शब एक रिश्ता क्यों उससे जोड़ लेता हूँ 
वो शख़्स जो हर सुबह ही तलाक़ लिये जाता है 

हम शहद की मक्खी, मिठास हमसे लो मगर 
छत्तों पे पत्थर हमें ख़तरनाक किये जाता है

ख़ाक ही असल है,'लाख' है कब्ज़े की निशानी
ख़ाक से बना वजूद ,ख़ुद को ख़ाक किये जाता है

मेरी आहों से नहीं खामोशियों से भरा आसमाँ 
चुप मेरा देखना ज़मीं को अफ़लाक किये जाता है 

'मुक्त' तुम पागल हो या  मासूम हो  सच  में 
हमने तो सुना था दग़ा चालाक किये जाता है

'मुक्त' बूढ़ा हो गया  मगर वो चूमा नहीं  गया 
कहता हूँ तो कहते हैं कि मज़ाक किये जाता है


कवि- मोहन मुक्त

अब भारत में वेश्यावृत्ति पेशा माना जाएगा!



भारत की सर्वोच्च न्यायालय सुप्रीम कोर्ट ने वेश्यावृत्ति को अब पेशा मान लिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने साफ साफ शब्दों में कहा है कि अब पुलिस इस में दखलंदाजी नहीं कर सकती और ना ही अपनी सहमति से कार्य करने वाले सेक्स वर्करों के ऊपर कोई कार्रवाई कर सकती है। माननीय सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी राज्यों की पुलिस को वेश्यावृत्ति के क्षेत्र में कार्य करने वाले लोगों और उनके बच्चों के साथ सम्मान पूर्वक व्यवहार करने के निर्देश जारी किए हैं। 



सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अब पुलिस इनके साथ गरिमा पूर्ण तरीके से पेश आएं और इन लोगों के खिलाफ अभद्र भाषा का प्रयोग ना करें। मीडिया सेक्स वर्करों और उनके क्लाइंट की तस्वीर ना ही दिखाएं और ना ही छापें। भारतीय दंड संहिता धारा 354-सी के तहत सेक्स वर्करों को भी सुरक्षा मिली हुई है। इसके तहत प्रावधान है कि किसी की निजी तस्वीर ना ही ली जा सकती है और ना ही छापी जा सकती है। सेक्स वर्करों और उनके बच्चों की बुनियादी मानवीय मर्यादा और गरिमा की रक्षा की जानी चाहिए। 





सुप्रीम कोर्ट ने अन्य सिफारिश पर केंद्र और राज्य से जवाब दाखिल करने को कहा है। 8 हफ्ते में उन सिफारिशों पर जवाब दें, जिनमें कहा गया है कि सेक्स वर्करों को क्रिमिनल लॉ में समान अधिकार मिले हुए हैं। उम्र के हिसाब से सहमति का मामला है और ऐसे में पुलिस आपराधिक कार्रवाई से परहेज करे। उन्हें गिरफ्तार नहीं किया जाना चाहिए।




यौन उत्पीड़न की शिकार सेक्स वर्करों को सहूलियतें के साथ-साथ मेडिकल से लेकर कानूनी सहायता दी जाए। राज्य सरकार आईटीपीए प्रॉटेक्टिव होम का सर्वे करवाए। यह देखें कि वहां कितनी बालिग महिलाएं हैं, जो अपनी मर्जी के बिना रखी गई हैंऔर उन सभी को समयबद्ध तरीके से रिहा किया जाए। पुलिस के रवैये से ऐसा लगता है कि सेक्स वर्करों का कोई अधिकार ही नहीं होता। पुलिस और अन्य जांच एजेंसियों को संवेदनशील बनाया जाए। 



जस्टिस एल नागेश्वर राव की अध्यक्षता वाली जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस एएस बोपन्ना की तीन जजों की बेंच ने कहा, "वेश्यावृत्ति एक पेशा है और सेक्स वर्कर्स कानून के तहत सम्मान और समान सुरक्षा के हकदार हैं।"


कोर्ट ने कहा- ''सेक्स वर्कर्स कानून के समान संरक्षण के हकदार हैं। जब यह स्पष्ट हो जाए कि सेक्स वर्कर एडल्ट है और सहमति से वेश्यावृत्ति में है, तो पुलिस को इसमें हस्तक्षेप करने या उसके खिलाफ कोई आपराधिक कार्रवाई करने से बचना चाहिए। इस देश के प्रत्येक व्यक्ति को संविधान के आर्टिकल 21 के तहत सम्मानजनक जीवन का अधिकार है।"




सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए-



सेर्क्स वर्कर्स को सहमति से यौन संबंध बनाने के लिए अरेस्ट, दंडित, परेशान या छापेमारी के जरिए पीड़ित नहीं किया जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि वेश्यालयों पर छापे के दौरान सेक्स वर्कर्स को अरेस्ट, परेशान नहीं करना चाहिए और जुर्माना नहीं लगाना चाहिए, क्योंकि स्वैच्छिक रूप से सेक्स वर्क अवैध नहीं है, केवल वेश्यालय चलाना गैरकानूनी है। सेक्स वर्कर्स की उनके खिलाफ यौन उत्पीड़न की शिकायतों पर पुलिस को सेक्स वर्कर्स के साथ भेदभाव नहीं करना चाहिए। यौन उत्पीड़न के शिकार सेक्स वर्कर्स को हर सहायता उपलब्ध कराई जानी चाहिए, जिनमें तुरंत मेडिकल और कानूनी सहायता उपलब्ध कराना शामिल है।



सेक्स वर्कर के बच्चे को उसकी मां की देखभाल से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। अगर किसी नाबालिग को वेश्यालय या सेक्स वर्कर्स के साथ रहते हुए पाया जाता है तो ये नहीं माना जाना चाहिए कि उसकी तस्करी की गई है। अगर सेक्स वर्कर ये दावा करे कि नाबालिग उसका बेटा/बेटी है, तो इसे सुनिश्चित करने के लिए टेस्ट कराया जा सकता है। अगर दावा सही है तो नाबालिग को जबर्दस्ती अलग नहीं करना चाहिए। अरेस्ट, रेड और रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान मीडिया को सेक्स वर्कर्स की पहचान उजागर नहीं करनी चाहिए। पुलिस को कंडोम के इस्तेमाल को सेक्स वर्कर्स के अपराध का सबूत नहीं समझना चाहिए। बचाए गए सेक्स वर्कर्स को कम से कम 2-3 सालों के लिए सुधार गृहों में भेजा जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि अगर मजिस्ट्रेट फैसला करता है कि सेक्स वर्कर ने अपनी सहमति दी है, तो उन्हें सुधार गृहों से जाने दिया जा सकता है।


केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को सेक्स वर्कर्स को उनसे जुड़े किसी भी पॉलिसी या प्रोग्राम को लागू करने या सेक्स वर्क से जुड़े किसी कानून/सुधार को बनाने समेत सभी डिसिजन मेकिंग प्रोसेस में शामिल करना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण आदेश में कहा है कि वेश्यावृत्ति भी एक प्रोफेशन है, ऐसे में अपनी मर्जी से पेशा अपनाने वाले सेक्स वर्कर्स को सम्मानीय जीवन जीने का हक है, इसलिए पुलिस ऐसे लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई न करे। शीर्ष अदालत ने इस मामले को लेकर केंद्र और राज्य सरकारों के साथ पुलिस को भी कई दिशा-निर्देश जारी किए हैं। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश का मतलब है कि अब पुलिस सेक्स वर्कर्स के काम में साधारण परिस्थितियों में बाधा नहीं डाल सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार को अपना जवाब देने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 27 जुलाई को होनी है।




यह फैसला सुप्रीम कोर्ट ने क्यों दिया ?


भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है, जहां वेश्यावृत्ति वैध है, बशर्ते वो सेक्स वर्कर की रजामंदी से हो। दुनिया के टॉप-100 देशों में से जिन 53 देशों में वेश्यावृत्ति वैध है, भारत भी उनमें से एक है। भारत में सेक्स वर्कर्स के साथ आमतौर पर पुलिस का रवैया बेहद क्रूर रहता है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में भी इसका जिक्र करते हुए कहा, ‘’ये देखा गया है कि सेक्स वर्कर्स के प्रति पुलिस का रवैया बेहद निर्दयी और हिंसक रहता है। ये ऐसा है जैसे ये एक ऐसा वर्ग है, जिनके अधिकारों को मान्यता नहीं है।’’


कोर्ट ने साफ किया कि सेक्स वर्कर्स को भी संविधान में सभी नागरिकों को मिले बुनियादी मानवाधिकार और अन्य अधिकार प्राप्त हैं। कोर्ट ने साफ किया है पुलिस को सभी सेक्स वर्कर्स के साथ सम्मानजनक व्यवहार करना चाहिए और उन्हें मौखिक या शारीरिक रूप से प्रताड़ित, उनके साथ हिंसा या उन्हें जबरन सेक्शुअल एक्टिविटी में शामिल होने के लिए मजबूर नहीं करना चाहिए।




निम्न देशों में वेश्यावृत्ति को कानूनी दर्जा-


जर्मनी में भी वेश्यावृति एक कानूनी पेशा है। यहां पर सभी यौनकर्मियों के पास टैक्स आईडी नंबर होना जरूरी है, क्योंकि किसी भी अन्य कर्मचारी की तरह उन्हें भी अपनी आय पर टैक्स देना पड़ता है। हालांकि वेश्यावृत्ति को नियंत्रित करने के लिए कड़े नियम हैं। जर्मनी के कुछ शहरों में यौनकर्मियों को सड़कों पर ग्राहक खोजने के लिए खड़े होने की अनुमति नहीं है। फ्रांस में वेश्यावृत्ति कानूनी है। हालांकि 2014 में नया कानून लागू किया गया जिसके तहत सेक्स के लिए पैसे देना अपराध है। ऐसा करने पर ग्राहको पर 2 से 4 लाख रुपए तक का जुमार्ना लगाया जा सकता है। ग्रीस में भी वेश्यावृति एक कानूनी पेशा है। अन्य लोगों की तरह यौनकर्मियों को अपना मेडिकल बीमा भी कराना होता है। यहां पर भी वेश्यावृत्ति कानूनी पेशा है। यहां पर यौनकर्मियों के लिए खुद को पंजीकृत कराना और आईडी कार्ड बनवाना अनिवार्य है। ब्रिटेन में भी यौनकर्मियों के पास अधिकार हैं। गैर सरकारी संगठनों के विरोध के चलते वक्त के साथ कुछ नियम बदले गए हैं। मिसाल के तौर पर किसी यौनकर्मी की तलाश में रेड लाइट इलाके में धीमी गति पर गाड़ी चलाने की इजाजत नहीं है। स्पेन में किसी अन्य व्यक्ति को देह व्यापार में धकेलना या उससे मुनाफा कमाना अपराध है। व्यक्ति अपनी इच्छा से इस पेशे से जुड़ सकता है। यहां भी वेश्यावृत्ति कानूनी पेशा है।


लगभग सभी लैटिन अमेरिकी देशों में देह व्यापार की अनुमति है। हालांकि सुनियोजित रूप से सेक्स रैकेट चलाना अपराध है लेकिन फिर भी यहां ऐसा आम है। जहां पूरे न्यूजीलैंड में देह व्यापार की अनुमति है, वहीं पड़ोसी ऑस्ट्रेलिया के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग कानून हैं। न्यूजीलैंड में 2003 में बदले गए कानून के बाद से बालिगों के लिए यह व्यापार कानूनी हो गया है। देह व्यापार में एम्सटर्डम का रेड लाइट एरिया शायद दुनिया का सबसे मशहूर हिस्सा है। अन्य देशों से विपरीत, जहां लोग छिप छिपा कर रेड लाइट एरिया में जाते हैं, एम्सटर्डम में टूरिस्ट खास तौर से इस इलाके को देखने पहुंचते हैं। अमेरिका के नेवादा को छोड़कर ज्यादातर राज्यों में वेश्यावृत्ति गैरकानूनी है। नेवादा अमेरिका का इकलौता ऐसा राज्य है, जहां वेश्यावृत्ति को कानूनी मान्यता दी गई है। हालांकि नेवादा की ही कई काउंटी में वेश्यावृत्ति गैरकानूनी भी है।




26 May 2022

कविताः परिवार




क्यूं टूट रहा परिवार,
क्यूं एक दूसरे की हो
रही दो बाते नहीं बर्दाश्त,
रिश्ते नाते जिंदगी खूब सारा
प्यार, क्यूं टूट रहा परिवार,
थोड़ा गम खा लो नहीं करो 
टकरार,मत तोड़ो परिवार,
मत बदलों मन भाव को,
प्रेम रखो मन में,खुद से ना 
अलगाओ करो,मत तोड़ो परिवार,
मत तोड़ो परिवार,
नहीं कलंकित खून करो,ना भूलो संस्कार,
कांटे मत तुम बोओ सुंदर हो परिवार,
रहिए सबके बीच में,ना छोड़ो घर द्वार,
डाली से शोभा रहे रहे घर संसार,
मत तोड़ो परिवार,
छोड़ दिया परिवार तुम्हें तो, मत होना उदास,
मान नहीं होता कभी छूट अकेले आस,
सावधान दुश्मन रहे,जो बांटे परिवार,
समझो तुम इस बात को रहना उनसे दूर ही यार,
मत तोड़ो परिवार,
बाग ना सूखे प्रेम का,रखो खूब तुम स्नेह,
रिश्ते हो विश्वास से कैसे बरसे नेह,
घर की सूखी रोटी खा कर भी रहे परिवार उमंग,
उसी भरोसे आदमी,जाता लड़ हर जंग, 
मत तोड़ो परिवार,
आंगन को आंगन रखो,ना करना बर्बाद,
मत बांटो खिड़की यहां रहने दो आबाद,
रहो कलह से बचके, मत तोड़ो परिवार,
हंसे पड़ोसी जब खड़ा हो घर में दीवार,
मत तोड़ो परिवार, मिलकर रहो साथ साथ


लेखिका- मनीषा झा
स्थान- सिद्धार्थनगर, उत्तरप्रदेश




लेखः ताजमहल पर विवाद और उसकी हक़ीकत



ताजमहल पर दायर पीआईएल इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने खारिज कर दी है। कानूनी जानकार, इस अजीबोगरीब जनहित याचिका का परिणाम जानते थे। अदालत ने याचिकाकर्ता को, इतिहास का अध्ययन करने, अकादमिक शोध के लिए निर्धारित शैक्षणिक प्रक्रिया जो विश्वविद्यालयों में उच्चतर अध्ययन के लिए स्वीकृत है अपनाने की सलाह भी दी है।




ताजमहल की यह याचिका या ताज पर अचानक उठा यह विवाद न तो कोई अकादमिक विवाद है और न ही कोई जिज्ञासु जनहित का प्रश्न। यह एक प्रकार से राजनीतिक उद्देश्यों से लिपटा हुआ विवाद है, जिसमे जानबूझकर जयपुर राजघराने की राजकुमारी और भाजपा सांसद दीया कुमारी को आगे किया गया। मेरी निजी राय यह है कि, ताज़महल विवाद मे जयपुर राजघराने को नहीं पड़ना चाहिए। जयपुर राजघराना मुगलों का सबसे वफादार राजघराना रहा है और उसने कभी भी मुगलों का विरोध नहीं किया। जयपुर राजघराना तब भी मुगलों के साथ था जब औरंगज़ेब दिल्ली की तख्त पर था। औरंगज़ेब की कट्टर धार्मिक नीति के खिलाफ जयपुर कभी खड़ा भी नहीं हुआ। आज दीया कुमारी जी कह रही हैं कि शाहजहां ने उनकी जमीन कब्जा कर ली। इसके बाद भी उनके पुरखे क्यों औरंगजेब के चहेते मनसबदार बने रहे ? वैसे भी ताज़महल पर उठाया गया विवाद कोई अकादमिक विवाद नहीं है, बल्कि यह जनहित के असल मुद्दों से भटकाने और नफ़रत फैलाने की साज़िश है।

लेकिन जब दीया कुमारी जी ने ताजमहल के बारे में यह दावा किया कि, ताजमहल की जमीन उनके पुरखो की है और उनके पास, इसके दस्तावेज हैं। तब यह ज़रूरी हो गया कि, गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर के शब्दों में, 'काल के गाल पर ढुलके हुए इस आंसू', पर बात की जाय। ताजमहल एक यूनेस्को संरक्षित इमारत है और वह एक विश्व धरोहर भी है। उस ज़मीन के कागज़ या दस्तावेज, जैसा कि दीया कुमारी दावा कर रही हैं, यदि उनके पास हैं तो यह एक अकादमिक शोध का विषय हो सकता है न कि टीवी चैनल पर भड़काऊ बयान बाजी और डिबेट का। इस भड़काऊ बयानबाजी और डिबेट से न केवल समाज मे बिखराव बढ़ेगा बल्कि दुनियाभर में भी जगहँसाई भी होगी। ताजमहल, दुनिया की सात सबसे अजूबे समझे जाने वाली धरोहरों में से एक है। भारत भ्रमण पर आने वाले हर पर्यटक की इटिनियरी में, ताज अवश्य शामिल होता है। रहा सवाल अकादमिक शोध का तो, सरकार के पास ICHR इंडियन काउंसिल ऑफ हिस्टोरिकल रिसर्च जैसी संस्था है वह उसे उन कागजों की वास्तविकता जांचने और सत्य तक पहुंचने का दायित्व सौंप सकती है।

आगरा, ASI आर्कियालोजिकल सर्वे ऑफ इंडिया का एक क्षेत्रीय मुख्यालय भी है और एक सुपरिटेंडेंट आर्कियोलॉजिस्ट वहां नियुक्त भी हैं। ताजमहल का, वह रख रखाव भी करते हैं। ताजमहल को लेकर आगरा और आसपास के प्रदूषण को लेकर अक्सर लोग सजग रहते हैं। समय समय पर दिये गए, सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसले मौजूद हैं जो ताज के बारे में सुप्रीम कोर्ट की चिंता को रेखांकित करते हैं। प्रदूषण न हो इसलिए ताज नगरी आगरा, जैसा कि आगरावासी कहते हैं, को नो पॉवर कट जोन में बहुत पहले से रखा गया है। ताकि डीजल जेनरेटर का धुंआ वातावरण को प्रदूषित न कर दे।

पड़ोस में स्थित, मथुरा रिफायनरी की चिमनी से निकल कर विषैला धुंआ, कहीं ताज की चमक न फीकी कर दे, इसलिए न सिर्फ उसकी चिमनियां ऊंची की गई बल्कि रिफाइनरी में, ऐसे आधुनिक यन्त्र लगाए गए है कि, प्रदूषण कम से कम हो और यदि विषैला उत्सर्जन हो तो भी उसकी दिशा आगरा की तरफ न हो। यही नहीं आगरा से लगे हुए अलीगढ़ रोड पर, खंदारी नामक जगह पर, भारी संख्या में फाउंड्री उद्योग हैं, उन पर भी नजर रखी जाती है। एक बार ताजमहल के पास कूड़े के ढेर में किसी ने शरारतन आग लगा दी थी, तो पूरे जिले में अफरातफरी मच गयी थी, क्योंकि, इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने, अखबार में खबर छपते ही, संज्ञान ले लिया था।

अब यदि इस थियरी को, हम मान भी लेते हैं कि, वहां कोई शिवमन्दिर था तो क्या जयपुर राज घराने ने शाहजहां को मंदिर उजाड़ने या उस पर ताज बनाने की, इजाजत दी थी या वे, बादशाह के आगे इतने बेबस थे कि, मक़बरा बनता रहा और जयपुर राजघराना अपना मनसब छोड़ने की हिम्मत नहीं जुटा सका ? यदि यह बेबसी नहीं थी तो, क्या उनमें इतनी क्लीवता थी कि वे, उसके बाद भी सालों तक मुगलों के खैरख्वाह बने रहे ? दीया कुमारी ने यह सब सोचा ही नहीं होगा कि जब वे इतिहास के गलत तथ्यों के आधार पर, साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के एक घृणित और विभाजनकारी राजनीतिक एजेंडे का उपकरण बन कर इस विवाद में पड़ेंगी तो, उन्हें बेहद असहज सवालों का सामना करना सकेगा। सोशल मीडिया पर यह सब हो भी रहा है। वे इस तमाशे के लिए इस नफरती गिरोह का एक औजार बन गई हैं।

जयपुर राजघराना, न तो बेबस था और न ही क्लीव। उस राजपरिवार के राजा मान सिंह अकबर के सेनापति थे और वे मुग़ल साम्राज्य के पहले राजपूत सेनापति बने। राजा मानसिंह ने, अकबर के लिए 22 लड़ाइयां लड़ी और सबमें उन्होंने विजय प्राप्त की। उनकी शौर्य गाथा काबुल कंधार तक फैली। बंगाल का सूबेदार उन्हे अकबर ने बनाया था। आमेर रियासत के राजा सदैव मुगलों के नजदीकी और दस हजारी मनसबदार रहे। यह सिलसिला औरंगजेब के बाद भी चलता रहा। शिवाजी को दक्षिण से हरा और मना कर मुग़ल दरबार लाने वाले मिर्जा राजा जय सिंह ही थे। पर जब शिवाजी को छोटे मनसबदारों की श्रेणी में खड़ा कर दिया गया तो उन्होंने सख्त ऐतराज किया। दरबार में मचे शोर पर जब औरंगज़ेब ने पूछा कि यह हंगामा क्यों है, तब उसे मिर्ज़ा राजा जय सिंह ने बताया कि, जहाँपनाह, वह पहाड़ी राजा है और दिल्ली की गर्मी वह बरदाश्त नहीं कर पा रहा है। काइयां औरंगज़ेब वास्तविकता समझ गया और उसी के बाद शिवाजी को वहीं दरबार मे ही गिरफ्तार कर लिया गया।

यह सब ऐतिहासिक तथ्य यह बताते है कि राजस्थान के राजघराने, मेवाड और कुछ अन्य को छोड़ कर मुग़लों के वफादार रहे। जयपुर तो मुग़लों के सबसे खास और नज़दीकी राजघराना रहा है। दोनों में, आपसी वैवाहिक संबंध भी रहे है इसका भी इतिहास में उल्लेख मिलता है। पर दो राजवंशो में आपसी वैवाहिक संबंध अधिकतर पारिवारिक ज़रूरतों की वजह से नही बल्कि राजनीतिक और कूटनीतिक उद्देश्यों के कारण होते रहे है।

मध्ययुगीन इतिहास लेखन, प्राचीन इतिहास की तुलना में दस्तावेजी स्रोतों से भरा पड़ा है। अक्सर प्राचीन भारत के इतिहास के अध्ययन और उस काल के इतिहास लेखन के समय सबसे बड़ी समस्या स्रोतों की होती है। पुराण, महाकाव्य, पुरातत्व और भाषा विज्ञान आदि के अध्ययन के बाद इतिहास के तह तक पहुंचना पड़ता है, पर मध्यकालीन इतिहास जिसका काल खंड 1205 ई से 1757 ई तक माना जाता है के लेखन और अध्ययन के समय स्रोतों के अभाव की समस्या का सामना नहीं करना पड़ता है। उस काल के दरबारी इतिहासकारों के विवरण के अतिरिक्त अनेक यात्रा वृतांत, शाही फरमान, राजाओ के आपसी पत्राचार और तत्कालीन साहित्य भी उपलब्ध हैं। इसलिए मध्यकालीन इतिहास की संस्थापनाओं पर विवाद की गुंजाइश कम ही होती है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने ताजमहल के 22 बंद कमरों और तहखानों के खोले जाने की याचिका को तो खारिज कर दिया पर जनता में ताजमहल से जुड़े ऐतिहासिक तथ्यों के जानने की जिज्ञासा जगा दी है। लोगो ने गूगल किया और उसके इतिहास के बारे में जानकारी भी ली। एक बड़ा विवाद विंदु है, ताजमहल के कभी न खुलने वाले बंद कमरे। पर, यह बात बिल्कुल सही नहीं है कि, ताज़महल के इन बंद कमरों को कभी खोला नहीं जाता है। आज ताजमहल के यही बंद कमरे और तहखाने, एक बार फिर तर्क-वितर्क के आधार बने हुये है। पर्यटकों के लिए इसे खोले जाने को लेकर कुछ लोग न्यायालय तक पहुंच गए, इससे तो यही अहसास होता है कि ये तहखाना विशेष है और कुछ छुपाए हुए है। मगर, इन तहखानों के जुड़े तथ्य कुछ अलग ही बात बताते है। आगरा से छपने वाले अखबार यह बताते हैं कि इस विवाद के मात्र तीन माह पहले ही यह तहखाना, रखरखाव और संरक्षण के लिए, एएसआई द्वारा खोला गया था और उसकी मरम्मत का काम भी हुआ था। इस काम पर एएसआई ने करीब छह लाख रुपये खर्च भी किये।

ताजमहल में दो तहखाने हैं। एक मुख्य गुंबद के नीचे, जिसमें मुमताज और शाहजहां की मुख्य कब्र है और दूसरा चमेली फर्श के नीचे। कब्र वाला तहखाना पर्यटकों के लिए विशेष अवसर पर खोला जाता है लेकिन दूसरा तहखाना लगभग 50 साल पहले पर्यटकों के लिए बंद कर दिया गया था। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई), केवल संरक्षण कार्य के लिए ही, इसे खोलता रहा है। इसी साल जनवरी-फरवरी में इसे खोला गया था। तहखाने की दीवारों पर लाइम पनिंग (चूने का पतला प्लास्टर के साथ दरारों को भरा गया था। वेंटिलेटर पर जाली लगाने के साथ अंदर के दरवाजों पर पेंट किया गया था। यह एक निर्धारित और नियमित प्रक्रिया है जो एक तयशुदा कार्यक्रम के अनुसार चलती रहती है।

अखबारों की ख़बरों के अनुसार, कमरों के रहस्य और कभी न खोले जाने के आरोपों के बारे में, सवाल करने पर, आगरा के, अधीक्षण पुरातत्वविद राजकुमार पटेल ने बताया कि ऐसा नहीं है कि स्मारक के बंद हिस्सों को कभी खोला नहीं जाता हो, सप्ताह या दस दिन में मरम्मत की जाती है और उन्हें खोला जाता है। एएसआइ के निदेशक रहे डी. दयालन ने अपनी किताब 'ताजमहल एंड इट्स कंजर्वेशन' में वर्ष 1652 से लेकर वर्ष 2006-07 तक हुए संरक्षण कार्यों का जिक्र किया है, और लिखा है कि, वर्ष 1975-76 में तहखाने की छत, मेहराब व दीवारों के खराब हुए प्लास्टर को हटाकर दोबारा चूने का प्लास्टर किया गया। वर्ष 1976-77 में भी तहखाने और कमरों की मरम्मत की गयी थी।

ताजमहल की हालत के बारे में साल 2005 ई में, सेंट्रल बिल्डिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (सीबीआरआइ), रुड़की ने ताजमहल का जिओ टेक्निकल एंड स्ट्रक्चरल इंवेस्टिगेशन सर्वे किया था। इसकी अंतरिम रिपोर्ट 2007 में सीबीआरआइ ने सरकार और आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया को दी थी। सीबीआरआइ के सुझावों पर एएसआई ने, यहां संरक्षण कार्य किया गया था। एएसआइ के पूर्व निदेशक डी. दयालन ने अपनी किताब 'ताजमहल एंड इट्स कंजर्वेशन' में सीबीआरआइ द्वारा दी गई इस अंतरिम रिपोर्ट को भी शामिल किया है। रिपोर्ट में सीबीआरआइ ने कहा था कि परीक्षण के बाद पता चला है कि स्मारक के लिए कोई संकट नहीं है। पत्थरों के बीच के जोड़ों को अच्छी तरह से सील कर दिया गया है। चमेली फर्श के नीचे तहखाने में कुछ जगह दीमक मिली है। स्मारक के परिवेशीय कंपन अध्ययन में स्मारक के विभिन्न हिस्सों में प्राकृतिक 1.5 हर्ट्ज पाई गई।

अतः यह कहना कि उन कमरों में कोई रहस्य छिपा है या मंदिर है या वे कमरे जानबूझकर कुछ छिपाने के लिए लगातार बंद है और कभी नहीं खोले जाते हैं, तथ्यों के विपरीत और जनता में सनसनी फैलाने के उद्देश्य से बनाये गए हैं। राजकुमारी दीया जब यह दावा करती है कि, यह जमीन उनके पुरखो की है तो वे यह बताना भूल जाती हैं कि इसके बदले में राजा जयसिंह को, शाहजहां ने, चार हवेलियां दी थीं। शाहजहां ने जिस जगह को ताजमहल के निर्माण के लिए चुना था, बिल्कुल वह राजा मानसिंह की थी। इसकी पुष्टि 16 दिसंबर, 1633 (हिजरी 1049 के माह जुमादा 11 की 26/28 तारीख) को जारी फरमान से होती है। शाहजहां द्वारा यह फरमान राजा जयसिंह को हवेली देने के लिए जारी किया गया था। फरमान में जिक्र है कि शाहजहां ने मुमताज को दफन करने के लिए राजा मानसिंह की हवेली मांगी थी। इसके बदले में राजा जयसिंह को चार हवेलियां दी गई थीं। यह फरमान आर्काइव्स में सुरक्षित है। जमीन के आदान प्रदान के बाद ताजमहल के बारे में यह विवाद स्वतः स्पष्ट हो जाता है।

यही यह बात उल्लेखनीय है कि, आगरा तो कभी जयपुर या आमेर की रियासत में रहा नहीं तो फिर आगरा जो मुगलो की राजधानी थी तो वहां जयपुर राजघराने को ज़मीन कहां से मिली?

इसका उत्तर है, अकबर ने जब राजा मान सिंह को अपना सेनापति और बड़े ओहदे वाला मनसबदार बनाया तब यह जमीन उन्हे जागीर के रूप में दी थी। वही जमीन शाहजहां ने चार हवेलियो के बदले ताजमहल के लिए ली। आमेर और मुगलों के संबंध सदियों तक रहे हैं। यहां तक कि औरंगजेब के समय में भी। अब यह बात विश्वास से परे है कि जय सिंह ने उस जमीन में बने किसी शिव मंदिर को ही चार हवेलियों के बदले दे दिया या वे इतने बेबस थे कि शाहजहां ने उनसे यह मंदिर की जमीन छीन ली और उनके सामने ही उसे तोड़ कर मक़बरा बना दिया।

यह सारा वितंडा पुरुषोत्तम नागेश ओक की किताब ताजमहल या तेजोमहालय के बाद शुरू हुआ है। ओक, अपनी किताब में जो तथ्य देते हैं, उनका कोई भी अकादमिक इतिहासकार समर्थन नहीं करता है। ताजमहल, स्थापत्य की दृष्टि से दुनियाभर में अपना विशिष्ट स्थान रखता है न कि, वह एक बादशाह और मलिका की कब्र के कारण। ताज के निर्माण, स्थापत्य की विशिष्टताओं पर अलग से एक स्वतंत्र लेख लिखा जा सकता है।



लेखक- विजय शंकर सिंह


25 May 2022

जातिगत जनगणना से कौन डर रहा है ?



पिछले दो-तीन दिनों में बिहार की राजनीति में गर्मी दिखाई दे रही है। इस गर्मी के बीच बिहार के मुख्यमंत्री माननीय नीतीश कुमार जी का जातिगत जनगणना को लेकर बयान आया है। नीतीश कुमार के इस बयान को सियासत में नए भूचाल के रूप में देखा जा रहा है। राजनीतिक पंडित कयास लगा रहे हैं कि नीतीश कुमार एक बार फिर से पाला बदलकर अपनी राजनीति को 2024 आम चुनाव से पहले और मजबूत बनाना चाहते हैं।





नीतीश कुमार जातिगत जनगणना की बात बहुत पहले से करते आ रहे हैं। बीजेपी जब सत्ता में नहीं थी, तो वह भी जातिगत जनगणना के समर्थन में खड़ी नजर आती थी। मगर वर्तमान में बीजेपी जातिगत जनगणना पर बचती नजर आ रही है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जल्दी ही जातिगत जनगणना को लेकर अनेक राजनीतिक दलों के साथ बैठक करेंगे। इस बैठक में सभी पार्टियों की बात सुनी जाएगी और जिसके बाद बिहार कैबिनेट में जातिगत जनगणना का प्रस्ताव लाया जाएगा। अब देखना होगा बिहार के माननीय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी जातिगत जनगणना को लेकर कितनी जल्द अपने कैबिनेट में प्रस्ताव लाकर अपने प्रदेश में जातिगत जनगणना करवाते है।

आपकी जानकारी के लिए बता देता हूं कि पिछली बार जातिगत जनगणना या जाति आधारित जनगणना भारत में 1931 में हुई थी। अब दुबारा फिर से मांग उठ रही है कि जातिगत या जाति आधारित जनगणना की जानी चाहिए। इस बीच राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ने भी सरकार से जाति आधारित जनगणना की सिफारिश की है। जब एससी और एसटी जातियों की गणना सरकार कर सकती है तो फिर ओबीसी सहित अन्य जातियों की गणना क्यों नहीं की जा सकती ?

अगर आपको लगता है कि जातिगत जनगणना कराने से समाज में कलह पैदा होगा तो यह आपकी नादानी और मूर्खता है। संविधान निर्माता डॉ. बी आर आंबेडकर जी ने एक जरूरी लक्ष्य के रूप में 'जाति के उन्मूलन' की बात की थी। आज सच्चाई यह है कि 20% ऊंची जातियां देश की सत्ता और विशेषाधिकार के लगभग 80% पदों पर काबिज है। आखिर अन्य जातियों का हक कब तक खाते रहेंगे ? देश को आजाद हुए 75 साल से ऊपर हो गए है। इसके बावजूद भी सरकारी नौकरी और राजनीति में सिर्फ ऊंची जातियों का बोलबाला है। क्या अब समय नहीं आ गया है कि सभी जातियों को बराबरी की हिस्सेदारी मिलनी चाहिए ? जातिगत जनगणना की मांग कोई नई मांग नहीं है बल्कि यह मांग पिछले कई सालों से होती आ रही है। इसके अलावा अमेरिका भी अपने नागरिकों की जातीयता के आधार पर गणना करता है। भारत के विविधता वाले समाज में जाति आधारित जनगणना एक प्रशासनिक आवश्यकता है। इस जनगणना से सरकार महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त कर सकती है।

वैसे आपके जेहन में सवाल उत्पन्न हो रहे होंगे कि जातिगत जनगणना क्यों जरूरी है ? क्या भारतीय समाज आज भी जातियों में बंटा रहना चाहता है ? क्या हमारा मकसद जातियों का विनाश करना नहीं है ? क्या हम सभी को समतामूलक समाज बनाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए ? क्या बिना जाति भारतीय सामाजिक व्यवस्था चल सकती है ? जाति हमारे भारतीय समाज का एक कटु सत्य है। हम सभी को यह घिनौना सत्य स्वीकार करना चाहिए। जिस समाज की जनसंख्या सबसे ज्यादा हो और उन पर सबसे कम संख्या वाले लोग शासन कर रहे हो, तो जातिगत जनगणना उन्हीं लोगों के लिए खतरनाक होगी जो कम संख्या में है।

क्यों ना पूरे देश को पता चलना चाहिए कि किस जाति की जनसंख्या कितनी है और राजनीतिक व सरकारी नौकरियों में इनकी हिस्सेदारी सबसे अधिक और कम है। जब बात बराबरी और योग्यता की होती है, तो फिर सभी जातियों को उनकी जनसंख्या के आधार पर हिस्सेदारी क्यों नहीं मिलनी चाहिए ? हां कुछ लोगों को यह लगता है कि जातिगत जनगणना करवाने से भारतीय समाज में टकराव या कम जनसंख्या वाली जातियों पर अधिक जनसंख्या वाली जातियां अत्याचार और उत्पीड़न भेदभाव करेंगी। मैं उन लोगों से पूछना चाहता हूं- क्या आज भेदभाव के नाम पर लोगों का उत्पीड़न नहीं होता है ? हमारे देश में आज भी जाति के नाम पर भेदभाव होता है। कभी किसी दलित को घोड़ी पर नहीं चढ़ने दिया जाता है तो कभी किसी दलित भोजन माता के हाथों का खाना नहीं खाया जाता है। अगर आप लोगों को जातिगत जनगणना के कारण समाज में टकराव की चिंता है तो फिर सबसे पहले आपको जाति के नाम पर रोटी और बेटी का रिश्ता खत्म करना चाहिए। सभी जातियों की समान तरक्की के लिए जातिगत जनगणना बेहद जरूरी है। बिना जातिगत जनगणना से हमें यह पता नहीं चल पाएगा कि कौन सी जाति के लोगों की आर्थिक स्थिति बेहतर है और कौन सी जाति की नहीं। जब यह देश सभी जाति और समाज का है तो फिर सिर्फ एक ही समाज के लोगों का प्रतिनिधित्व हर जगह क्यों दिखाई देता है ?


लेखक- दीपक कोहली


"कुछ तो गुनाह हुआ है"





कुछ तो गुनाह बड़ा हुआ है
मनुष्य से ऐ मेरे खुदा,
वरना सड़कों पर दौड़ती मौत और
जिन्दगी घरों में यूँ कैद न होती।
अथाह सम्पत्ति ऐसो आराम कमाने के बाद भी,
चन्द साँसों के लिए इतनी जद्दोजहद न होती।
हर मुसीबत से लड़ने वाली माँ,
बच्चों की भूख पर यूँ व्याकुल न होती।
खुशियाँ सिमट कर रह गई चार दीवारों में,
कफ़न खरीदने की बाजारों में इस तरह होड़ न होती।
कुछ तो गुनाह बड़ा हुआ है मनुष्य से ऐ मेरे खुदा,
वरना इस दु:ख की घड़ी में अपने ही अपनों से यूँ दूर न होते।
खोया जिन्होंने अपनो को,
न ही दर्शन उनके अन्तिम हुए।
न अर्थी को अपनों का कांधा मिला,
न ही स्नान अन्तिम हुआ।
न खाके सपूर्त हुए कुछ,
न ही राख का मिट्टी में ही मिलन हुआ।
न जलाने को ही जगह मिली,
न ही शव ठीक से दफ़न हुआ।
ये कैसी लाचारी और बेवसी का मंजर हे! खुदा
कुछ तो गुनाह बड़ा हुआ है मनुष्य से ऐ मेरे खुदा,
वरना इंसानियत इस तरह मौन न होती।


लेखिका- शशिकला नेगी भंडारी
श्रीनगर गढ़वाल, उत्तराखंड


कविताः इंतज़ार




मेरे घर के सामने एक पेड़ है
उस पेड़ में खिले थे पीले फूल
एक पीली चादर बिछी रहती थी उसके नीचे
मैं जब भी वहाँ से गुजरता
हवा के झोंके से एक दो फूल मुझपर गिर जाते I

मुझे लगता था
इन चटख रंगों, फूल की कोमलता से
पेड़ मुझे दिखाना चाहता है
कि अभी भी दुनिया में खुशी है
वह पेड़ फूलों से ढका बहुत खुश दिखता था
उसी तरह जैसे मेरे होठों पर एक मुस्कान रहती है I

मैं अक्सर सोचता था
कि जब सारे फूल गिर जायेंगे तो ?

मौसम बदला,
मेरे घर के सामने अब एक ठूंठ है
जब हवा चलती है
उसकी नंगी शाखें मातम मनाती हैं
रास्ते की धूल जब मुझपर गिरती है
तो मन में हाहाकार उठता है I

कितना करूँ, लगता है वह पेड़
अपनी नंगी शाखों से आसमान को देखता है
जहाँ फूल थे अब वीरानगी है
अब हवा पीली चादर नहीं बिछाती
अब उसकी फलियाँ मधुर सरगम नहीं छेड़ती
सब रीता सा लगता है
मुझे अब पता चला अकेलापन क्या है I

पर अब वह पेड़ मुझे और भी अच्छा लगता है
क्योंकि मैं उसके साथ अपना अकेलापन बाँटता हूँ
और जब वसंत आएगा
तो उसकी पत्तियों को देख कर
मेरा यकीन और पक्का होगा कि
"तुम" जरूर आओगी...


लेखक- गोपाल मोहन मिश्र
पता- दरभंगा, बिहार



कविताः आखिर क्यों ?






बचपन में ही सब सहना शुरू कर देती हैं,
आखिर क्यों ?
बेटा साईकिल चला सकता, बेटी चलाए तो
आवारा कहलाए, आखिर क्यों ?
खुलकर अगर हंस दे तो ये पवांदी लग जाए,
लड़का हो क्या लड़कीयां यूं जोर से नहीं हंसती हैं,
आखिर क्यों ?

दस साल की हुए नहीं अगर मासिक धर्म 9साल में
ही अा जाए और वो बच्चों के जैसे खुद को समझे
और पिता कंधे पे झूले तो यह कह कर हटाया जाय
अब बड़ी हुई,और कुछ ऐसा करें तो कहां जाए अभी
 तुम बच्ची,वो बच्ची क्या समझे खुद को,
 आखिर क्यों ?

शरीर की बनावट से वो12साल की उम्र में 18 साल
की दिखने लगे,स्कूल आकर घर मां बाप को बताए
की रास्ते में कुछ समस्या हो रही,तो मां बाप से डांट खा
जाए, की 12साल में कोई इसे कैसे झेड़ेगा, 
आखिर क्यों ?

वो बच्ची ना बड़ी हो पाती ना बच्ची कोई उसकी
मानसिक स्थिति क्या समझ पाता,किशोरा अवस्था
में वैसे ही बच्चे कई परेशानियों से जूझते,अगर
ऐसे में परिवार के लोग उस बच्चे को ना समझे 
आखिर क्यों ?

कम उम्र में शादी हो जाए और सब की आपेक्षा
उससे परिपक्वता वाली रहे, आखिर क्यों ?
जब वो बड़ी होती उसे रोक दिया जाता समाज
के डरावने सपने दिखा कर,उसे खुल कर जीने
की अपने सपनों को पूरा करने की इजाजत नहीं मिलती,
आखिर क्यों ?

लेकिन ये दिल कहां किसी की सुनता है उसे भी
हो जाता हैं किसी से प्यार,एक खूबसूत जिंदगी
के सपने बुनती है,उन सपनों को पूरा किए बिना
मां बाप की इज्जत के लिए वो किसी और के साथ 
घर बसा लेती, आखिर क्यों ?

अपने दर्द अपने आसूं दिल में दबा कर नए घर में
कदम रखती हैं,सब की सुनती हैं,सब को खुश
 रखने कि कोशिश करती हैं,पर अपने मन का 
दर्द कहीं ना कह पाती, आखिर क्यों ?

वक्त कहां रुकता फिर शुरु होते रोज रोज के
झगड़े ताने अपनी परवाह किए बिना सब को
सुलझाने की कोशिश करती हैं, सब की सुनकर 
भी कुछ नहीं कहती कोने में बैठ आंसु बहा लेती,
आखिर क्यों ?

सहती रहती जब सहना बहुत मुश्किल हो जाता
तो खुद में खुद को समेट लेती हैं,भूल जाती खुशी
किसे कहते बस अगर कुछ याद रहता तो एक दर्द,
आखिर क्यों ?

सहने को तो बहुत सह लेती हैं औरत जब नहीं
सहा जाता तो ख़ामोश कर लेती खुद को और दुनियां से
चली जाती, आखिर क्यों ?
चली जाती दुनियां से फिर भी लोगो की निगाह
में गुनहगार कहलाती, आखिर क्यों ? 


लेखिका- मनीषा झा
स्थान- सिद्धार्थ नगर, उत्तरप्रदेश



24 May 2022

कविताः चाँद के साथ साथ





आसमान पर खिल उठा है, 
वो पूरा चाँद आज,
बादल की कुछ परतें कर रहीं हैं
संग उसके अटखेलियाँ...

बहती हुई हवा की मस्त धीमी चाल,
छेड़ रही है चाँदनी को,
वो मुस्कुराता हुआ धीमे धीमे पूरा चाँद...

आज उसे भी क्या, किसी का ख्याल आया है,
जैसे  उठ रहे हैं मन में कई विचार,
कुछ शरमाता, कुछ सकुचाता वो चाँद...

दूर घटाओं को देख कर कभी डर रहा है उसका मन,
अपनी चाँदनी को छुपा रहा है वो ख़ुद में,
समेट रहा है अपना हर प्रकाश...

कुछ छुपा छुपा सा, लगता है जैसे,
कर रहा हो कोई खेल, या डर गया है , 
वो अपनी ही भावनाओं से...

उसके मन में चल रहा है जैसे कोई द्वंद,
कोई लड़ाई ख़ुद से ही ,
और अब झांक रहा है उस पेड़ की डाली से...

फिर भी डरते हुए, फिर भी सकुचाते हुए,
डाली डाली कभी निकलता हुआ, कभी छुपता हुआ
कभी डरपोक और कभी निर्भय वो चाँद...

उसकी चाँदनी फिर लगी है बिखरने,
फिर उसका प्रकाश लगा है जगमगाने
आसमान हुआ सुनहला,
जैसे शरमाती हुई कोई दुलहन...

पेड़ की डाली डाली झूमती, देती है उसका साथ,
बादल भी खेल रहा, चाँद के साथ साथ
जीत रहा है वो चाँद, अपनी हर सोच पर...

फिर से खिल गया वो पूरा चाँद आसमान में,
फिर से पूरी हो गई उसकी हर आस,
कदम से कदम बढ़ चले अब,
चाँद के साथ साथ...


गोपाल मोहन मिश्र
दरभंगा, बिहार