साहित्य चक्र

24 June 2022

लघुकथा: बचपन के दिन


बहुत दिनों बाद मम्मी ने आलू के पराठे बनाए थे, मैं दिल्ली से गांव गया हुआ था। दीदियां भी ससुराल से मायके आई थी। हम सभी भाई-बहन धूप में बैठकर बातचीत कर रहे थे। तभी चाचा का छोटा लड़का आया और अपने स्कूल की कहानी बताने लगा। इतने में ताऊ जी ने दादा जी से ₹500 उधार मांगे, तभी दादाजी बोले कि पहले के पैसे वापस नहीं किए अब दुबारा मांगने लग गया है। ताऊ जी गुस्से से वापस चले गए। हम सभी बच्चे बातचीत कर रहे थे कि इतने में मम्मी एक थाली में आलू के 12-15 पराठे और दही लेकर आ गई। हम सभी उस थाली में ऐसे टूटे जैसे हमने पहले कभी पराठे खाए ही नहीं है। जिसने अपना पराठा जल्दी खा लिया वह दूसरे के हाथ से छीन कर खाने लग गया। फिर क्या हम बच्चों की आपस में लड़ाई होने लग गई। 





अंदर से पापा आए और पापा ने दे दना दन हम सभी बच्चों को एक-एक करके चप्पल से पीटना शुरू कर दिया। दीदियों को शादी का फायदा हुआ कि वह पीटने से बच गई। वैसे आलू के पराठे घर में कभी कबार ही बनते थे। मम्मी के आलू के पराठे इतने स्वादिष्ट होते थे कि उनका स्वाद कभी मुंह से नहीं जाता है। डायबिटीज होने के कारण पापा आलू के पराठे नहीं खा पाते थे। हम बच्चों में मुझे सबसे अधिक पसंद थे आलू के पराठे और साथ में अपने घर की भैंस के दूध की दही। हां दही से याद आया मेरी मम्मी इतनी अच्छी दही बनाती है कि जिसे मैं अपने शब्दों में बयां नहीं कर सकता। मैंने बचपन में दही दूध खूब खाया है। आप यह भी कह सकते हैं कि मैंने दही और दूध से नहाया है। आलू के पराठे के साथ मुझे दही या फिर घी बहुत अच्छा लगता है। जब भी मम्मी आलू के पराठे बनाती थी। वह कभी भी एक पराठा पूरा नहीं खा पाती थी क्योंकि उसके लिए बच ही नहीं पाते थे। बहुत शैतान बच्चे थे हम। आज याद आती है कि आखिर वो दिन भी क्या दिन हुआ करते थे। सच कहूं तो जीवन में सबसे खुशहाली भरा समय हमारा बचपन होता है। ना किसी बात का डर, ना किसी बात की टेंशन, ना ही किसी बात की उलझन, बस खेलते रहो.. हंसते रहो.. मुस्कुराते रहो... और रोते रहो... मम्मी की डांट सुनते रहो... पापा की मार खाते रहो... यही हमारे जीवन के अनमोल पल है।

- दीपक कोहली

23 June 2022

हमारा देश बहुत अजीब है।


एक एमबीए किया हुआ व्यक्ति चाय की ठेली खोलकर चाय बेचता है। वह धीरे धीरे करोड़ों कमा लेता है तो हमारा समाज उसे बहुत अच्छा बताता है। अगर किसी घर का एक लड़का 12वीं पास करने के बाद चाय की ठेली या किसी और चीज की ठेली लगाना चाहता है तो उसके घर वाले और हमारे समाज के लोग उसे तिरस्कार भरी नजरों से देखना शुरू कर देते है। न जाने उसे क्या क्या बुरा भला कहेंगे ? पढ़ने का मन नहीं था तो चाय की ठेली खोल ली इत्यादि। 




अब मैं आपसे पूछना चाहता हूं कि एक व्यक्ति ने एमबीए किया उसके बाद उसने चाय की दुकान खोल कर उसे उसने अपने बिजनेस में बदल दिया तो उस व्यक्ति का एमबीए करने से क्या फायदा हुआ ? अगर एमबीए करने के बाद कोई व्यक्ति अपनी योग्यता से कम वाला काम करता है तो फिर उसे हमारा समाज क्यों स्वीकार नहीं करता है ? क्या हमारा समाज सिर्फ पैसा देखता है ? आजकल पैसा कमाने के क‌ई गलत तरीके है। क्या वह तरीके समाज की नजरों में सही है ? अगर वह तरीके समाज की नजरों में गलत है तो फिर यह तरीका कैसे सही हुआ कि एक व्यक्ति एमबीए करने के बाद चाय बेचता है ? क्या आप इसे उस व्यक्ति का फेलियर नहीं मानते हैं ? 

जब हम किसी चीज की तैयारी करते हैं तो हमें अपना लक्ष्य पता होता है। एमबीए करने के बाद चाय बेचना कितना उचित है ? अगर उसे चाय ही बेचनी थी तो एमबीए करने से पहले भी तो बेच सकता था और उसके स्थान पर किसी दूसरे व्यक्ति को एमबीए करने का मौका मिलता। क्या यह गलत नहीं है ? अगर यह गलत है तो फिर आप लोग उस एमबीए चाय वाले से इतने प्रभावित क्यों हो ? सोचो! क्या उसने एमबीए चाय बेचने के लिए की होगी ? उसने कभी भी चाय बेचने के लिए एमबीए नहीं की होगी क्योंकि चाय बेचने के लिए किसी डिग्री की जरूरत नहीं होती है। 

आप खुद अपने आसपास के चाय बेचने वालों से पूछिए उनकी क्या डिग्री है ? शायद ही कोई 10वीं या 12वीं पास होगा। हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था कितनी लचर हो गई है यह सोचने वाली बात है। कल्पना कीजिए एमबीए करने के बाद भी एक युवा को उसके मन मुताबिक रोजगार नहीं मिल पा रहा है। हम सभी को अपने अजीबो-गरीब विचारों से बाहर आना होगा। और हर उस व्यक्ति की मेहनत और काम को सराहना होगा जो दिन-रात कड़ी मेहनत करता है। काम के पेशे में उच्च नीच के भेद को खत्म करना होगा क्योंकि आज हम आधुनिक युग में आधुनिक भारत की कल्पना कर रहे हैं। आधुनिक भारत तभी संभव है जब हम मेहनत करने वालों को एक समान दृष्टि से देखेंगे। 

हम यह नहीं कहते कि एमबीए चाय वाले ने अपना बिजनेस इसलिए बेहतर बना लिया क्योंकि उसने एमबी किया था। उसकी कहानी को अगर आप जानने का प्रयास करेंगे तो आपको मालूम पड़ेगा कि वह व्यक्ति ने अपना यह व्यापार कैसे शुरू किया ? हां आपकी जानकारी के लिए बता दूं उस व्यक्ति ने एमबीए नहीं किया है। बल्कि एमबीए में एडमिशन लेने के बाद वह एमबी छोड़ कर आ गया। उसने कई जगह प्राइवेट नौकरी की और सरकारी नौकरियों की तैयारी की, मगर वह सरकारी नौकरी का एग्जाम निकालने में असफल रहा। हां एमबीए चाय वाला लाखों करोड़ों में एक ही व्यक्ति बन सकता है। हमारे यहां के मां बाप अपने बच्चे को कपड़े तक नहीं धोने देते है‌। चाय, सब्जी, रेस्टोरेंट्स, ढाबा खुला तो दूर की बात है। एमबीए चाय वाले की तारीफ आप और हम सभी इसलिए कर रहे हैं क्योंकि वह एक सरकारी नौकरी करने वाले से कई गुना आगे पहुंच चुका है। उसी के कई साथी आज भी मुखर्जी नगर जैसे शहरों में ठोकर खा रहे होंगे। हमें एमबी चाय वाले की तारीफ तो करनी चाहिए, मगर अपने बच्चों को भी बिजनेस इत्यादि के लिए भी प्रेरित करना चाहिए और अपने बच्चों के ऊपर जबरदस्ती किसी चीज को नहीं थोपना चाहिए। 

                                    - दीपक कोहली

22 June 2022

द्रौपदी मुर्मू कौन है ?


इन दिनों द्रौपदी मुर्मू जी का नाम पूरे देशभर में सुर्खियों में है। द्रौपदी मुर्मू को एनडीए ने इस बार अपना राष्ट्रपति उम्मीदवार घोषित किया है। जब से द्रौपदी जी राष्ट्रपति उम्मीदवार घोषित हुई है। तब से समस्त देशवासी सोशल मीडिया के जरिए उनके बारे में जानकारी प्राप्त करना चाहते है। 




चलिए हम आपको बताते हैं कि द्रोपदी मुर्मू जी कौन है ?

द्रौपदी मुर्मू जी का जन्म 20 जून 1958 में मयूरभंज, ओड़िशा में हुआ था। द्रौपदी जी आदिवासी समाज से संबंध रखती है। राजनीति में आने से पहले इन्होंने बेहद संघर्षमय जीवन जिया है। द्रौपदी जी ने अपनी राजनीतिक जीवन की शुरुआत पार्षद पद से आरंभ किया है। भुवनेश्वर के रमा देवी कॉलेज से इन्होंने स्नातक की डिग्री प्राप्त की है। रैरंगपुर के श्री अरबिंदो इंटीग्रल एजुकेशन सेंटर में इन्होंने बिना वेतन अध्यापन का कार्य किया है। द्रौपदी जी ने अपना राजनीतिक कैरियर रैरंगपुर के एनआईसी के वाइस चेयरमैन के तौर पर शुरू किया। इतना ही नहीं बल्कि ओड़िशा के सिंचाई और बिजली विभाग में यह एक कनिष्ठ सहायक पद पर अपनी सेवा दे चुके है। सन 2013 में यह बीजेपी में एसटी मोर्चा की सदस्य रही और 2015 में झारखंड की पहली महिला और देश की पहली आदिवासी राज्यपाल बनी। 

द्रौपदी मुर्मू जी को वर्ष 2007 में ओड़िशा सरकार द्वारा सर्वश्रेष्ठ विधायक के तौर पर नीलकंठ अवार्ड से सम्मानित किया गया है। यह करीब दो दशक से लंबा राजनीतिक और सामाजिक अनुभव रखती है। ओड़िशा के रायरंगपुर से यह दो बार विधायक रही है। बीजेपी-बीजेडी की गठबंधन सरकार में यह वाणिज्य, मछली पालन, पशुपालन जैसे कई विभाग संभाल चुकी है। बीजेपी ने एक बार इन्हें एनडीए का राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाकर सभी को चौंकाया है। द्रौपदी मुरमू जी के पति का नाम श्याम चरण मुर्मू और इनके दो बेटे और एक बेटी है। इनका व्यक्तिगत जीवन त्रासदियों से भरा रहा है क्योंकि इन्होंने अपने पति और दो बेटों को खो दिया है।‌ यह बेहद साधारण परिवार से संबंध रखती है। देश में यह पहली बार होगा जब एक साधारण भारत के सबसे पिछड़े समाज यानी आदिवासी समाज की महिला को देश के सर्वोच्च पद पर बैठने का मौका मिलेगा। हम आशा करते हैं कि द्रौपदी मुर्मू जी भारतीय राष्ट्रपति चुनाव जीतने में कामयाब होगी और भारतीय आदिवासी समाज के लिए लगातार कार्य करती रहेगी। समस्त देश उनका बतौर भारतीय राष्ट्रपति नियुक्त होने पर स्वागत के लिए तैयार बैठा है। 

लेखक- दीपक कोहली

09 June 2022

हम गाँव के लोग



दरअसल हम "गांव" के लोग जितने खुशहाल दिखते हैं उतने हैं नहीं। जमीनों के केस, पानी के केस, खेत-मेढ के केस, रास्ते के केस, मुआवजे के केस,बंजर तालाब के झगड़े, ब्याह शादी के झगड़े, दीवार के केस,आपसी मनमुटाव, चुनावी रंजिशों ने समाज को खोखला कर दिया है।





अब "गांव" वो नहीं रहे कि "बस" या अन्य 'वाहनो' में गांव की लडकी को देखते ही सीट खाली कर देते थे बच्चे। दो चार "थप्पड" गलती पर किसी बड़े बुजुर्ग या ताऊ ने ठोंक दिए तो इश्यू नहीं बनता था तब। लेकिन अब..आप सब जानते ही है।

अब हम पूरी तरह बंटे हुए लोग हैं। "गांव" में अब एक दूसरे के उपलब्धियों का सम्मान करने वाले, प्यार से सिर पर हाथ रखने वाले लोग संभवतः अब मिलने मुश्किल हैं।वह लगभग गायब से हो गये हैं।

हालात इस कदर "खराब" है कि अगर पडोसी फलां व्यक्ति को वोट देगा तो हम नहीं देंगे। इतनी नफरत कहां से आई है लोगों में ये सोचने और चिंतन का विषय है। गांवों में कितने "मर्डर" होते हैं, कितने "झगड़े" होते हैं और कितने केस अदालतों व संवैधानिक संस्थाओं में लंबित है इसकी कल्पना भी भयावह है।

संयुक्त परिवार अब "गांवों" में शायद एक आध ही हैं, "लस्सी-दूध" की जगह यहां भी अब ड्यू, कोकाकोला, पेप्सी पिलाई जाने लगी है। बंटवारा केवल भारत का नहीं हुआ था, आजादी के बाद हमारा समाज भी बंटा है और शायद अब हम भरपाई की सीमाओं से भी अब बहुत दूर आ गए हैं। अब तो वक्त ही तय करेगा कि हम और कितना बंटेंगे।

यूँ लगने लगा है जैसे हर आदमी के मन मे ईर्ष्या भरा हुआ है। कन सफुसाहट ..जहां लोग झप्पर छान उठाने को हंसी हंसी में सैकड़ो जुट जाया करते थे वहां अब इकठ्ठे होने का नाम तक नहीं लेते। एक दिन यूं ही बातचीत में एक मित्र ने कहा कि जितना हम "पढे" हैं दरअसल हम उतने ही बेईमान व संकीर्ण बने हैं। "गहराई" से सोचें तो ये बात सही लगती है कि "पढे लिखे" लोग हर चीज को मुनाफे से तोलते हैं और यही बात "समाज" को तोड़ रही है।

लेखक- अनुराग पाठक


उफ्फ! ये गर्मी मार ही डालेगी



म‌ई से जुलाई तक में भारत के सभी राज्य में लगभग सबसे अधिक गर्मी पड़ती है। अब सवाल उठता है कि गर्मी हर साल क्यों बढ़ती जा रही है ? गर्मी से बचने के लिए हमें क्या करना चाहिए ? क्या एसी, कूलर, पंखा चला लेने से ही गर्मी से राहत मिल पाएगी या फिर हम भारतीयों को हर साल बढ़ती गर्मी के लिए राष्ट्रीय स्तर पर चिंतन करने की जरूरत है ?‌ कही विकास के नाम पर हम अपने देश का विनाश तो नहीं कर रहे है ? संपूर्ण विश्व में भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जहां लगभग हर प्रकार की खेती हो सकती हैं। विश्व में सबसे अच्छा मौसम भारत में रहता है। भारत में ना अधिक गर्मी पड़ती है, ना ही अधिक सर्दी पड़ती है। वर्तमान में हर साल गर्मी बढ़ती जा रही है। जिसके कारण सामान्यतः प्रदूषण का बढ़ना, विकास ‌कार्य, आधुनिकता के चक्कर में पर्यावरण को नुकसान पहुंचाना इत्यादि हैं।




अगर हम व्यक्तिगत तौर पर सोचे कि हमें गर्मी से कैसे राहत मिलेगी तो सबसे पहले हमें अपना टाइम टेबल बदलने की जरूरत होगी। सुबह और शाम में गर्मी कम पड़ती है। इसलिए सुबह और शाम के वक्त हम बाहर का काम आसानी से कर सकते है। अगर आपको ऑफिस जाना है तो साथ में पानी की बोतल रखना चाहिए। आप ऑफिस जाने के लिए पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करते हैं तो आप को ध्यान देना चाहिए कि आपके ऑफिस जाने के लिए मेट्रो सही रहेगी या फिर कैब ? आपको ऑफिस जाने के लिए सिर्फ ऑटो, रिक्शा का इस्तेमाल करना पड़ता है तो उस दौरान आपको अपने चेहरे को सूती कपड़े से ढकने की जरूरत है और इसके अलावा आपको छाते का इस्तेमाल करना चाहिए। दफ्तर में नियमित तौर पर पानी पीते रहना चाहिए। ‌आपको दोपहर का खाना या लंच साधा करना चाहिए जैसे लस्सी, रोटी, सब्जी, चावल आदि और ज्यादा तेल वाला खाना खाने से बचना चाहिए। हमेशा एसी के नीचे नहीं बैठा रहना चाहिए।‌ सुबह और शाम के समय पार्क में टहलना चाहिए। अगर संभव हो सके तो हर दूसरे दिन जूस पीना चाहिए या फिर रोज ग्लूकोज पी सकते है। आपको जूस और ग्लूकोज अच्छा नहीं लगता है तो आप नींबू पानी का सेवन भी कर सकते है। कम से कम 2 बार स्नान करना चाहिए और स्नान के दौरान ध्यान या मेडिटेशन कर सकते है। 

अगर हम आए दिन बढ़ती गर्मी से राष्ट्रीय स्तर पर राहत की बात करते हैैं, तो हमें अपने देश के पर्यावरण पर ध्यान देने की जरूरत है। हम विकास के नाम पर अपने देश के पर्यावरण का नाश कर रहे हैं। गांव-गांव में हम सड़क पहुंचा रहे हैं। कई राज्य ऐसे हैं, जो पहाड़ी क्षेत्रों में है। वहां हम गांव-गांव में सड़क पहुंचाने के लिए कई हजार पेड़ों और पहाड़ियों को काट रहे हैं। क्या हमारे पास सड़क के अलावा कोई और योजना नहीं है गांव को विकसित करने और बनाने के लिए ? हम सभी सुनते आ रहे हैं कि असली भारत गांवों में बसता है। सिर्फ एक मामूली सी सड़क के लिए अगर हम अपने गांव के पर्यावरण और प्रकृति से खेल रहे हैं तो यह हमारे देश के लिए कितना उचित है ? जिस सड़क के बदले हम हजारों पेड़ काट देते हैं क्या उन पेड़ों के बदले हम नए पेड़ लगाते हैं ? आज वैश्विक स्तर पर पर्यावरण संरक्षण की बात की जा रही है। विश्व के शीर्ष-20 प्रदूषण वाले शहरों में भारत के सबसे अधिक शहर शामिल है।‌ क्या यह भारत के लिए शर्म की बात नहीं है ? हमारे राजनेता और शासन प्रशासन में बैठे अधिकारी लोग सिर्फ अपने स्वार्थ के बारे में क्यों सोचते हैं ? बताइए कितने अधिकारियों और राजनेताओं ने अपने अपने क्षेत्र में वृक्षारोपण करवाया और वृक्षारोपण करवाया तो कितने पौधे पेड़ बने क्या आपके पास कोई आंकड़ा है ? 

भारत जितना बड़ा देश है, इतने बड़े देश को हर चीज और हर क्षेत्र को एक साथ लेकर चलने की जरूरत होती है। अगर हम सोचेंगे कि सिर्फ आईटी सेक्टर को या आधुनिकता के चक्कर में हम अपने देश की नदियों को और जंगलों को प्रदूषित करते रहे तो यह हमारा मूर्खतापूर्ण कदम होगा। हमारी सरकार ने देश को चलाने के लिए कई मंत्रालय बनाए हैं। पर्यावरण मंत्रालय जिनमें से एक है। क्या आप बता सकते हैं पर्यावरण मंत्रालय क्या करता है ? हमारे देश में पर्यावरण मंत्रालय सिर्फ विज्ञापन बनाने और चलाने तक ही सीमित रहता है। क्या पर्यावरण मंत्रालय का यह काम नहीं है कि वह हर राज्य में जिला स्तर पर कार्य करें ? हर साल उत्तराखंड सहित कई राज्यों के जंगलों में आग लग जाती है और हमारा पर्यावरण मंत्रालय कुंभकरण की नींद में सोया रहता है। एक-दो साल पहले जब कोरोना महामारी ने दस्तक दी तो समस्त भारतवर्ष में त्राहि-त्राहि मची हुई थी। नदियों के किनारे लाशों का अंबार लगा था। उस वक्त हमारा पर्यावरण मंत्रालय नदी संरक्षण के नाम पर घंटी, थाली और शंख बजा रहा था। इसके अलावा धार्मिक आस्था और मोक्ष के नाम पर गंगा नदी में हर साल सैंकड़ों लाशें फेंक दी जाती है‌ और पूजा-पाठ के नाम पर नदियों में प्रतिदिन सैकड़ों की तादात में जलते दिए, फूल मालाएं और इत्यादि चीजें फेंकी जाती है। आखिर आस्था के नाम पर हम अपने देश की नदियों और जंगलों को प्रदूषित क्यों कर रहे हैं ?

वर्तमान से अगर हम सीख नहीं लेते हैं तो वह दिन दूर नहीं जब भारत के कई शहरों में मई-जून-जुलाई के महीने में रहना दुश्वार हो जाएगा। जिस तेजी से हमारे शहरों में एसी, कूलर का चलन चल रहा है। उस तेजी से भारत में बहुत ही जल्द पर्यावरण विस्फोट होने जा रहा है। हमें वक्त रहते अपने देश के पर्यावरण के बारे में गंभीर और ठोस कदम उठाने की जरूरत है। आइए आप और हम अपने घर से शुरुआत करते हैं। कम से कम पॉलीथिन का इस्तेमाल करते हैं। बिजली, पानी का इस्तेमाल जरूरत के अनुसार करते हैं और हर वर्ष 2 पौधे लगाकर उन्हें पेड़ बनाते हैं। 


लेखक- दीपक कोहली


शीर्षक- ग्लोबल वार्मिंग




मानव विज्ञान से खेल गया,
कार्बनडाई ऑक्साइड,
नाइट्रस ऑक्साइड और मेथेन
में वृद्धि कर अब तक गर्मी झेल गया।।

बडा खुश हैं मानव अपने कारनामों से,
आविष्कारों जैसे सुई से वायुयानो से।।

झेल न सकेगा गर्मी और अब मानव,
भविष्य में बनेगी जब यह दानव।।

दानव लेगा अनेक रुप,
मानव हो जायेगा कुरूप।।

प्रथम होगा ऑक्सीजन की कमी,
लगेगा उसको कि साँस अभी थमी।।

द्वितीय होगा ओजोन छिद्र,
पराबैंगनी करेंगी मानव को दरिद्र।।

होंगे कैंसर और त्वचा रोग,
मिलेगा अपने कर्मों का भोग।।

तृतीय होगा फसल उत्पादन गिरावट,
कैसे करेगा मानव अन्न में मिलावट।।

मिलावट का फल एक दिन पाएगा,
बिन अनाज भूखा ही मर जाएगा।।

चतुर्थ होगा हिमखंड पिघलाव,
जम जायेगे पृथ्वी पर बाढ़ के पद पॉंव।।

पृथ्वी जलमग्न हो जाएगी,
मानवता पछता भी ना पाएगी।।

जब ये मुसीबत एक साथ आएगी,
पृथ्वी को यमलोक ले जाएगी।।
पशु-पक्षी और पेड़-पौधों की मुफ्त में जान जाएगी,
एक दिन मानवता ही पृथ्वी का अन्त कर जाएगी।।

कवि-नितिन राघव
बुलंदशहर, उत्तर प्रदेश

03 June 2022

कविताः आईना एक नजर






हिम्मत है तो आईने से नजर मिला तो सही,

कहीं एक भय छुपा बैठा है, बाहर ला तो सही।


कभी किसी के हृदय को दुखाकर, हंसा बहुत होगा,

किसी रोते हुए इंसान को तू हंसा तो सही।


उम्र सारी गुजारता रहा है तू धन कमाने में,

समय हो मुश्किल किसी का तो, तू काम आ तो सही।


बड़े गुरुर में बैठा है, रूठकर अपनों से,

आज अकेला है तो गुरुर कैसा ? ये बता तो सही।


नहीं होता कोई सम्पूर्ण कभी अपने में ,कमी तो होती है,

कमी के साथ रिश्तों को, तू  निभा तो सही।


ऐसी दौलत भी क्या ? इंसान को जो मगरुर करे ,

किसी गरीब के घर का चूल्हा तू जला तो सही।


टूटते देखा है क्या किसी ने उम्मीद को आइने की तरह ,

जिन्होंने खोएं हैं अपने, उनसे मिलकर आ तो सही।


जिंदगी मिलती है एक बार, फिर शिकवा कैसा ?

बहारें आयेंगी जरूर, तू मुस्कुरा तो सही।



लेखिका- मंजू सागर 
अम्बेडकर नगर, गाजियाबाद
उत्तरप्रदेश

कहाँ गया बड़ों के नाम के आगे का "श्री" ?



भारत विश्व भर में अपनी संस्कृति एवं सभ्यता के लिए विख्यात है परन्तु आधुनिकता इतनी तेजी से अपने पैर पसार रही है कि उसका प्रभाव सम्पूर्ण भारत पर, भारतीय संस्कृति पर एवं भारत की सभ्यता पर साफ़ देखा जा सकता है। वर्तमान में चल रहे मेरे एक शोध में (जो कि सोशल मीडिया से सम्बन्धित है) एक ऐसा दृश्य सामने आया जो वास्तव में आश्चर्यचकित करने वाला है जिस पर हमारी दृष्टि या तो पड़ नहीं  रही है या फिर हम ऑंखें बन्द किये हुए हैं। 





मेरे चल रहे शोध में विद्यार्थियों ( विश्वविद्यालय स्तर के १२० विद्यार्थी पर किया गया ) से कुछ व्यक्तिगत जानकारी भी ली गयी जैसे पिता का नाम। आश्चर्य करने वाला तथ्य यह है कि किसी भी विद्यार्थी ने अपने पिता का नाम भरते समय पिता के नाम के आगे "श्री" नहीं लगाया जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। वर्तमान में भारत की साक्षरता दर लगभग ७४% है लेकिन नैतिक शिक्षा का पहला पाठ ही हमारी युवा पीढ़ी भूलती जा रही है। भारतीय समाज में यह परम्परा रही है कि जब भी कोई बच्चा अपने पिता, अपनी माता या अपने बड़ो का परिचय देता है तब श्री, श्रीमती अवश्य लगाना चाहिए। गाँवों तक में किसी बच्चे के द्वारा अपने बड़ों का परिचय देने पर यदि श्री नहीं लगाया जाता था तब गाँव के अशिक्षित लोग तक टोंक देते थे कि बेटा बड़ों के नाम से पहले "श्री" लगाते हैं। फिर वर्तमान में युवा पीढ़ी अपने संस्कारों में पिछड़ क्यों रही है?

मैंने इसके कारण के बारे में जानने का प्रयास किया और विश्लेषण किया तब यह पाया कि अधिकांशतः किसी भी प्रकार का ऑनलाइन फॉर्म (चाहें सरकारी फॉर्म हो या फिर किसी भी प्राइवेट संस्था का फॉर्म  ) भरते समय वहाँ पिता के नाम आगे का श्री नहीं भरवाते हैं यहाँ तक कि साफ़ मना कर देते हैं कि श्री, श्रीमती न लगाएँ। क्या यह सभ्यता, संस्कारों का हनन नहीं है ? क्या यह संस्कारों के पहले पाठ की मृत्यु नहीं है ?
 
फेसबुक, ट्विटर एवं यूट्यूब आदि जैसी सोशल मीडिया वेबसाइट पूरी दुनिया का डेटा व्यवस्थित कर रहीं हैं तो क्या "श्री" को व्यवस्थित करने में इतनी समस्या आती है कि उसको सभी फॉर्म से हटा दिया गया है। हमें ऐसी असहनीय त्रुटियों के लिए आवाज उठानी चाहिए। यदि ऐसे ही संस्कारों के पहले पाठ में ही फ़ेरबदल होते रहे फिर आगामी पीढ़ी को नैतिक शिक्षा के अर्थ को समझाना बहुत जटिल हो जायेगा। यदि वास्तव में हम अपनी संस्कृति, अपने बच्चों में संस्कारों को बचाये रखना चाहते हैं तब हमें ऐसी भूल सुधारनी होगी तथा किसी भी सरकारी एवं प्राइवेट संस्था के फॉर्म में अपने बड़ों के नाम के आगे "श्री" लगाने के कॉलम की माँग करनी होगी।



गौरव हिन्दुस्तानी
बरेली, उत्तर प्रदेश


मानव शरीर में आयरन क्यों जरूरी है ?



 आयरन मानव स्वास्थ्य के लिए सबसे महत्वपूर्ण खनिजों में से एक है। जबकि सभी मानव कोशिकाओं में लोहा होता है, यह ज्यादातर लाल रक्त कोशिकाओं में पाया जाता है। आयरन के स्तर को प्रबंधित करने के स्वास्थ्य लाभों में थकान को दूर करना और इसके कई स्रोत शामिल हैं। आयरन प्रतिरक्षा प्रणाली के कार्य, एनीमिया के इलाज, हीमोग्लोबिन को बढ़ाने और बहुत कुछ करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।





 आयरन ओवरडोज दुर्लभ हैं। अधिकांश समय, यदि शरीर में आवश्यकता से अधिक आयरन होगा, तो शरीर इसे भविष्य में उपयोग के लिए सहेज लेगा। अधिकांश लोगों को अपने आहार से आवश्यक सभी आयरन प्राप्त होते हैं, लेकिन कुछ बीमारियों के कारण आयरन की खुराक का उपयोग करना आवश्यक हो सकता है। आयरन एक ऐसा खनिज है जिसकी शरीर को वृद्धि और विकास के लिए आवश्यकता होती है। 

आपका शरीर हीमोग्लोबिन बनाने के लिए लोहे का उपयोग करता है, लाल रक्त कोशिकाओं में एक प्रोटीन जो फेफड़ों से ऑक्सीजन को शरीर के सभी हिस्सों में ले जाता है, और मायोग्लोबिन, एक प्रोटीन जो मांसपेशियों को ऑक्सीजन प्रदान करता है। कुछ हार्मोन बनाने के लिए आपके शरीर को भी आयरन की आवश्यकता होती है। आयरन का उपयोग किस लिए किया जाता है? एनीमिया का इलाज करता है आयरन दुनिया में सबसे आम पोषण संबंधी कमियों में से एक, एनीमिया के इलाज के लिए सहायक है।

 एनीमिया का परिणाम तब होता है जब हीमोग्लोबिन सामान्य सीमा से नीचे होता है। एनीमिया के लक्षणों में थकान, चक्कर आना, सांस की तकलीफ, तेज हृदय गति और बीमारी की एक समग्र भावना शामिल है हीमोग्लोबिन को बढ़ाता है लोहे का मुख्य कार्य हीमोग्लोबिन बनाना है, एक लाल रक्त कोशिका प्रोटीन जिसका मुख्य उद्देश्य रक्त में ऑक्सीजन का परिवहन करना है। 

अतिरिक्त हीमोग्लोबिन महत्वपूर्ण है, क्योंकि मनुष्य कई तरह से रक्त खो देता है, खासकर चोटों से। महिलाओं के मासिक धर्म के दौरान हर महीने खून की कमी हो जाती है, जो एक कारण है कि महिलाओं को एनीमिया से पीड़ित होने की अधिक संभावना हो सकती है। 

थकान कम करता है आयरन अस्पष्टीकृत थकान को प्रबंधित करने में मदद कर सकता है, जो पुरुषों और महिलाओं दोनों को प्रभावित कर सकता है। यहां तक कि किसी ऐसे व्यक्ति में जो एनीमिक नहीं है, कम आयरन अभी भी ऊर्जा के स्तर को कम कर सकता है। यह महिलाओं में उनके प्रजनन वर्षों के दौरान विशेष रूप से आम है मांसपेशियों की सहनशक्ति में सुधार मांसपेशियों का चयापचय और कम आयरन जुड़ा हुआ है।

 आयरन का पर्याप्त स्तर मांसपेशियों के संकुचन और सहनशक्ति के लिए आवश्यक ऑक्सीजन प्रदान करने में मदद करता है। इम्यूनिटी को बूस्ट करता है आयरन इम्यून सिस्टम को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाता है। यह हीमोग्लोबिन को बढ़ावा देता है, जो क्षतिग्रस्त कोशिकाओं, ऊतकों और अंगों को ऑक्सीजन प्रदान करता है और शरीर की बीमारियों और संक्रमणों से लड़ने की क्षमता के लिए आवश्यक है।

 संभावित दुष्प्रभाव पेट की ख़राबी लोहे की खुराक का सबसे आम दुष्प्रभाव है। 

आयरन के कुछ रूपों के साथ कब्ज एक और बहुत ही सामान्य दुष्प्रभाव है। अधिकांश स्वस्थ वयस्कों में आहार में आयरन के अधिभार का जोखिम कम होता है। कुछ आनुवंशिक विकारों वाले लोगों को लोहे के अधिभार का खतरा होता है यदि उनकी स्थिति के कारण वे भोजन से अधिक लोहे को अवशोषित करते हैं। आयरन की खुराक कुछ दवाओं के प्रभाव को कम कर सकती है, जिनमें बेचैन पैर सिंड्रोम और थायराइड की समस्याओं के इलाज के लिए शामिल हैं। भाटा रोग दवाएं लोहे की मात्रा को कम कर सकती हैं जिसे शरीर भोजन और पूरक आहार से अवशोषित करता है। स्वास्थ्य सेवा प्रदाता के साथ चर्चा करना हमेशा महत्वपूर्ण होता है कि क्या आपको आयरन सप्लीमेंट लेना चाहिए, खासकर यदि आप कोई प्रिस्क्रिप्शन दवा लेते हैं।


मोनिका सिंह
आहार विशेषज्ञ

कविताः समाधान




तुम अब ठान लोगे
ज़िंदगी की हर उलझन को,
नया समाधान दोगे
तुम अब ठान लोगे

अपयश मिला मगर
सब खत्म नहीं हुआ है,
सफलता ने अभी भी
ना नहीं कहा है,
आँधी तूफाँ आये फिर भी
तुम भीड़ जाओगे,
परिस्थिति को निडर होकर
शह दे पाओगे

तुम अब ठान लोगे
ज़िंदगी की हर उलझन को,
नया समाधान दोगे
तुम अब ठान लोगे

तुम्हारा साथ निभाने
विवेकशक्ति साथ होगी,
सब खत्म हुआ लगेगा
मगर फिर शुरुआत होगी,
अंधेरा घना हो फिर भी
तुम जलते जाओगे,
दृढता से आत्मविश्वास
अटल रख पाओगे

तुम अब ठान लोगे
ज़िंदगी की हर उलझन को,
नया समाधान दोगे
तुम अब ठान लोगे



                                                                लेखक- गोपाल मोहन मिश्र

कविताः भाषा-अक्षर


एक दो तीन ही नहीं कई मंजिलें 
इमारतें है इस शहर में
खड़े हैं छाती तानकर
उनके दीवारों पर लिखा होता है 
परिचय उनका बिल्कुल साफ साफ
अंग्रेजी के बड़े अक्षरों में।


कहीं से नहीं आती यहां
चीखने चिल्लाने की आवाजें
शायद वाहनों के तेज आवाजों ने
दबाकर रख दिया है उन्हें
कैसे लिखें पाएंगे शिकायत वे लोग
इंग्लिश मीडियम 
की होती है सारी मंजिलें
झोपड़ी को को हिंदी का ह भी नहीं आता।


बहुत हाथ पैर मार कर भी
मौत से रोज अवकाश लेते हैं वे लोग
छन से जलते हुए पांव
वेदना ऐसे जैसे फुटता है कोई घाव
कहां है सरकारी योजनाएं गैर-सरकारी संगठन
एक बार फिर पुछने की हिम्मत जुटाई है
मैंने एक चित्र को विचित्र रुप में देखकर।


                                                                      - आलोक रंजन


कविताः कल किसी का नहीं आज हमारा है



कल की छोड़ो आज की बात करो
कल पीछे छूट गया आज नई शुरुआत करो
जिंदगी को जो अकेला छोड़ दिया था तुमने
उस जिंदगी से एक बार फिर मुलाकात करो

समय के साथ तुम भी बदलो 
पीछे मत रहो डट कर उसके साथ चलो
बड़े गहरे घावों का मरहम है इसके पास
समय के साथ तुम भी फूलो फलो

कल क्या होगा यह किसको पता है
कल की फिक्र में आज को यूं मत बर्बाद करो
क्यों कैद में डाल रहे हो अपने जीवन को
बन्धनों से खुद को तुम अज़ाद करो

जो बीत गया वह बीत गया
उस पर चिंतन इक बार करो
क्या खोया क्या पाया तुमने
इस पर तुम थोड़ा विचार करो

वक्त के थपेडों ने क्या से क्या बना दिया
समय से पहले ही पर्दा गिरा दिया
थर थर कांपती थी जिनसे धरती
उनको भी इस मिट्टी में मिला दिया

कल किसी का नहीं आज हमारा है
जो नहीं मिला उसके पछतावे में क्यों रोएं
जो भी अपने पास है उसी में ही खुश रहें
खुशी के जो कुछ पल हैं उनको भी क्यों खोएं


                                             लेखक- रवींद्र कुमार शर्मा


कविताः तंबाकू जानलेवा है



तंबाकू का सेवन करना छोड़ो!
यह जानलेवा है,


यह जानते हुए भी! 
फिर क्यों धूम्रपान करते हो ?
तुम बुद्धिजीवी हो!  
अपने भविष्य को उज्जवल बनाओ!
तुम अंधेरों में क्यों रहना पसंद करते हो ?
मैं तुमको ऐसे टूटते हुए नहीं देख सकती,

क्योंकि, मैं चेतना प्रकाश हूँ।
तुम्हारी सांसे  मुझसे  जुड़ी हुई हैं,
तुम्हारे साथ मैं भी  घुटती हूँ,
तुमसे घर, पास – पड़ोस समाज भी प्रभावित होता है,
मैं  तुम्हें तड़पते हुए नहीं देख सकती,

       क्योंकि, मैं दर्पण हूँ।
मैं तुम्हारी सच्ची दोस्त बनकर तुमको समझा रही हूँ,
तुम्हारी जिंदगी बड़ी खूबसूरत है,
एक बार लौट कर तो देखो!
तुम्हारे अपने, तुम्हारी राह देख रहे हैं,
मैं  तुम्हें मौत के मुंह में जाते हुए नहीं देख  सकती,
क्योंकि, मैं तुम्हारी अर्धांगिनी हूँ।


लेखिका- चेतना चितेरी