साहित्य चक्र

31 December 2022

मुश्ताक़ शाह जी की 13 रचनाएँ






नींद अब नहीं आती ,
नींद अब नहीं आती ,
दिल में उतर गया कोई ,
चांद है मद्धम मद्धम ,
आज संवर गया कोई ,
दिल धड़कता है , शब ए ,
हिज्र का मुआमला  है ,
आया नहीं अब तलक ,
वादा , कर गया कोई ,
आंखों से पी पी कर ,
मैं , मदहोश हो गया यारों ,
पूरा जिस्म ही महकता  है ,
छु कर चला गया कोई ,
बहुत शौक़ था , हो जाये ,
उनसे मुहब्बत मुझको ,
रंज और ग़म का तमाशा ,
सरे आम कर गया कोई ,
मारते हैं पत्थर मुझको ,
लोग दीवाना कह करके ,
सारी दुनिया से बेगाना  सच ,
मुझको तो कर गया कोई ,
यह ज़िन्दगी आख़िर किसी ,
तरह तो गुजर ही जाएगी ,
वादों से अपने खुद ही दग़ा ,
यारब फिर कर गया कोई,
दरियाए इश्क़ की लहरों में ,
मुझको , फंसा कर " मुश्ताक़ "
देखिये किनारा अब मुझसे ,
किस अंदाज़ से कर गया कोई ,

*****


वो तुम न  थे  तो कौन  था,
दिल की गहराईयों में था जो उतर गया,
वो तुम न थे तो कौन  था,
मेरी सुबह और शाम भी, जिसके  नाम थी,
वो तुम न थे तो कौन  था,

मुझसे इंतज़ार का वादा करके चला  गया ,
वो तुम न थे तो कौन  था,
वजूद है आज भी ज़ख़्मी ज़ख्मी,क़ातिल,
वो तुम न थे तो कौन  था,

राह तकते जिसकी आंखें, मेरी पत्थर हो गईं,
वो तुम न थे तो कौन  था,
सारी दुनिया से जो बेगाना कर गया मुझको,
वो तुम न थे तो कौन  था,

आंखों में आज भी अक्स  फिरा करता है ,
वो तुम न थे तो कौन  था,
पेड़ों पे जिसने नाम मेरा लिखा था,साथ में,
वो तुम न थे तो कौन  था,

देखे थे हंसी ख्वाब,अक्सर जिसके बोलो न,
वो तुम न थे तो कौन  था,

*****


चल रहा था ज़िक्र बेवफ़ाई का

सखियों ने जो तेरी पूछा तो बताना पड़ा मुझे ।
कई थे खत तेरे पास मेरे दिखाना पड़ा मुझे ।

रहगुज़र पर दिल की उसका था आना जाना ।
न जाने क्यों फिर ज़मीन पर आना पड़ा मुझे ।

अफ़साने के किरदार वजूद जिनका नहीं रहा ।
मंज़र करके वो ही याद तन्हा रोना पड़ा मुझे ।

बेवफ़ाई का सितम हां कब तलक सहा जाता ।
शहर से उसके दूर बहुत दूर जाना पड़ा मुझे ।

बज़्म में रात चल रहा था ज़िक्र बेवफ़ाई का ।
नाम " मुश्ताक " तेरा फिर बताना पड़ा मुझे ।


*****


तस्वीर तेरी अब भी मेरी आंखों में फिरा करती है,

जागना क़िस्मत, नीन्द अांखों से दूर रहा  करती है,
तस्वीर तेरी अब भी मेरी आंखों में फिरा करती है,

कोई  तो मसीहा आए दिल का ईलाज कर  जाए,
दिल से आज कल मेरी अन बन ही  रहा करती है,

शै़ौक़ पीने का नहीं  था, तेरी  अांखों से पी गया,
अब हर वक़्त तबियत मेरी बीमार  रहा करती है,

  मुसलसल भी तुझे मैं अब देखा करूं तो क्या,
  तिश्नगी मेरीआंखों में फिर भी बनी  रहती  है,

तुझे भूल  जाउं ये मुमकिन ही नहीं है मुश्ताक,
याद करने की मुझे तुझको बीमारी  बनी रहती है,

*****


भारत माँ की शान की...
ईविस्तृत विशाल .
अखंड हिंदुस्तान .
हिंदुस्तान प्यारा .
हिंदुस्तान हमारा ।
प्रफुल्लित करती .
ललित लताएं जिसकी ।
वीर शहीदों और .
वीरांगना  मातायें जिनकी ।
प्रकृतिक संस्कृति की .
सुखद छटाएँ ।
साथ नाचें सब
मिलकर ,
धूम मचाएं,उसकी
लहर लहर लहराये ।
देखो तिरंगा प्यारा ।
सारी दुनिया से जुदा ,
जुदा है भारत प्यारा ।
नवजवान खाएं क़समें .
भारत माँ की शान की ।
मात - पिता दादा दादी ,
सुनाएँ गाथाएँ बलिदान की ।
बढ़े चलो बढ़े चलो ।
दुश्मन को मार गिराना है ।
छाती पर दुश्मन की ,
हमको तो चढ़ जाना है ।
भारत माँ की शान बढ़ाना है ।

*****


अरमानों को दिल में  दबाकर
नहीं रखता,मुश्ताक़....

सेहत याब होने के अभी मेरे
इमकान ज़िंदा हैं,
कानों में मेरे तुम्हारे सभी
अल्फ़ाज़  ज़िंदा हैं,
बे ज़मीरों के दिल मुहब्बतों से
यक़ीनन खाली होंगे,
रिश्ते ख़ून के हुए पानी, मेरा
मगर किरदार ज़िंदा है,
क़सम है , रूबरू  मेरे बेज़मीरी
लेकर नहीँ आना,
मर  जाऊंगा, मगर बच्चों के
लिए ताक़ीद ज़िंदा है,
बिछड़ता हु मै तुमसे फिर मिलने
का वादा  करके,
आंखे वीरान सही दिल में 
मागर तूफ़ान ज़िंदा है,
अरमानों को दिल में  दबाकर
नहीं रखता,मुश्ताक़,
मेरे लहू से तुम खेलो तुम्हारा
भाई अभी ज़िंदा है.....

*****


मसीहा कई आये बाद तेरे....

शिक़वा कैसा जो उसने
मुझसे वफ़ा न की,
फ़ूल था वो उसने काँटों से
निबाह न की,
तवज्जो तो सारी थी उसी
की ज़ानिब मेरी,
मेरी तऱफ लेकिन उसने
अपनी निगाह न की,
मसीहा कई आये बाद तेरे
तेरे चले जाने के,
लेकिन इन ज़ख्मों की मैं
ने कोई दवा न की,
अदाएं उनकी सवालों सी
बन गईं आख़िर,
पहले तो कभी उसने ऐसी
मुझसे हया न की,
मजबूरी को बेवफ़ाई का नाम
देकर चला गया,
सच मुश्ताक़ हमने तो उनसे
कोई जफ़ा न की,

*****

सय्याद तू बता दिल तेरा
भी खुश है कि नहीं है....

आँखों से वो पिलाते हैं,
और में भी पीता हूँ,
मदहोश हूँ मैं कमाल
उसका है कि नहीं है,
सावन का महीना होश
किसे भी यहां  होगा,
तू भी बता दिल बेक़रार
  तेरा भी है कि नहीं है,
शाम व सहर तेरे ही ख्वाबों
ख्यालों में बसर है,
तेरा सुकून भी भी बोल मेरे
इर्दगिर्द है कि नहीं है,
मुहब्बत पर सवाल  तेरा
बजा है, मान लेता हूँ,
क़समों का अपनी , वादों
का पास है कि नहीं है,
क़फ़स रखकर मुझसे हाल
मेरा  पूछे है मुश्ताक़,
सय्याद तू बता दिल तेरा
भी खुश है कि नहीं है,

*****


रूबरू जो पहुँचे उनके....

होली के हुजूम ने वाकई
बड़ा कमाल किया है,
सांवले सरकार को रंगों ने
लाल लाल किया है,
रूबरू जो पहुँचे उनके ,
लाजवाब ही हो गए,
आंखों ने उनकी हमसे बस
सवाल ही किया है,
सामने जो पहुँचे ,रहा न
दुनिया का कुछ ख्याल,
रब ने सावन में सोल्वें कैसा
ये कमाल किया है,
आगये  हम खुदा ने तुमको
माला माल किया है,
शमा ने परवानों को बड़ा
ही अब बेताब किया है,
दिल न लगाते तो यूँ दीवाना
वार नहीं फ़िरा करते,
देख  तेरे इश्क़ ने मुश्ताक़ मेरा
बुरा हाल किया है,

*****

चलता हूँ मुश्ताक़ आऊँगा
हाँ दोपहर को मैं...

है दिल बेक़रार के उनसे
हो जाए गुफ़्तगू,
कैसे मिलाऊं नज़र को
उनकी नज़र से मैं,
बिजली गिराने के लिए
वो निकले हैं आज,
ख़ुदको बचाऊं या के
अपने जिगर को मैं,
पता नहीं जिसका उसे
ही मैं ढूंढता फिरूँ,
समझ कुछ नहीं आता
जाऊँ किधर को मैं,
मैं भी हूँ जल्दी में तुम्हें भी
फुर्सत ज़रा नहीं,
चलता हूँ मुश्ताक़ आऊँगा
हाँ दोपहर को मैं,

*****


किसी उदास शाम को
हो जाऊंगा ग़ुरूब...

वादा तो कर गए मगर
निभाये कौन,
जलती है आग मगर इसे
बुझाए कौन,
अमीरे शहर की सब करते
हैं हिमायत,
मुफलिसी को  सडकों से
उठाए कौन,
नाज़ुक  होते हैं फुल इंकार,
करेगा कौन,
काँटों से दूर  इन मासूमों को
हटाये कौन,
किसी उदास शाम को हो
जाऊंगा ग़ुरूब,
मर कर कौन लौटा, मुश्ताक़
बताए कौन,

*****


नहीं सोचा था ऐसा आएगा

वबाल, है ये मुहब्बत
इसमें नादां न उलझ ,
न ढूंढ पाएगा सुकून
न कभी चैन पाएगा,
नही जानता था क्या ,
शै है ये मुहब्बत ,
हर वक्त ख्याल बस
माहजबी  तेरा आएगा,
एक बर्क़ सी दौड़ गई ,
जिस्म में उनको देखकर,
सोचा था आएगा शबाब ,
नहीं सोचा था ऐसा आएगा ,
हर चीज से बेखबर हूँ,
हर शे से बेनियाज़,
पता क्या था ज़िन्दगी में ,
दौर ऐसा भी आएगा ,
शमा ने सिवा परवानो को,
जलाने के किया क्या  है,
अन्जाम यही होगा “ मुश्ताक "
जो इस महफिल में जाएगा...

*****



बात हो जाय...

रात है चांदनी कुछ
बात हो जाय •
मुलाकात   दिल की
दिल से हो जाय ,
गुन्चा गुन्चा चमन का
अब महक जाए
सारे गुलशन में
आज धूम हो जाय ,
बात कहना है जो
कहो तुम भी ,
मेरा दिल मुरली की
तान हो जाय ,
अब ऐसे शर्माओ
तुम हमसे ए जानां ,
मेरे चेहरे पर पलकों
की छओं हो जाय,
रात बरसात की और
मौसम भी सुहाना है,
नशा बढ़ कर क्यों न,
मेरा सुरूर हो जाए ,
वो भी चुप हैं,
और मेरी भी जुबां
बन्द मुश्ताक ,
वल्लाह आंखों आँखों
से ही बात हो जाय...

*****


                           लेखक- डॉ . मुश्ताक़ शाह



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