मेरा सूरज मेरे पिता
मेरा सूरज मेरे पिता,
उनसे मेरा अस्तित्व आया।
जिम्मेदारी अपने कंधे ली,
कभी लगी न धूप,
हमेशा पसीने की बारिश
कर दी,खड़े रहे बनकर छाया।
सपने त्यागे, समझौता किया
हर वादा जो किया निभाया।
हमेशा अपने को मुझमें पाया,
हौसला दिया जब जब डगमगाया।
अब भी पूछते खैर मेरी,
जब हमें उनकी पूछनी थी।
करते फिक्र लगता उनको
अब भी मैं उनका खिलौना।
उम्र हुए उनको अपना सब
भूल जाते।
लेकिन खाने से पूछते पहले
जरूर घर आओगे कब
चलो साथ में खाते।
मेरे सूरज है,उनसे ही है उजाला,
उनके बिन सब अंधेरा है,
ऐसे लगता मेरा छीन जायेगा
जीवन का उजाला।
- रोशन कुमार झा
*****
गरीबी देखना है तो,
ट्रैन के जनरल डिब्बा
मे बैठ कर देखिए।
गरीबी देखना है तो,
फुटपाथ पर सो कर देखिए।
गरीबी देखना है तो,
सरकारी स्कूल मे जा
कर देखिए।
गरीबी देखना है तो,
सरकारी अस्पताल मे
इलाज करा कर देखिए।
गरीबी देखना है तो,
कड़ी धुप,लू मे काम
कर के देखिए।
भूख देखनी है तो,
एक रोटी मे दस परिवार
को खाना खिला कर देखिए।
प्यास देखनी है तो रेगिस्तान मे
रास्ता भटक कर देखिए।
नीद हराम देखनी है तो,
टूटे हुए मचान पर सो कर देखिए।
खतरा देक्गनी है तो समंदर मे काम
करबे वाले मजदूरों को देखिए।
- सदानंद गाज़ीपुरी
*****
लफ़्ज़ों की तरह तुझे किताबों में मिलेंगे
बन कर महक तुझे गुलाबों में मिलेंगे
हम तो कायल हैं, तेरे ख्वाबों के ऐ दोस्त!
बन कर स्वप्न तुझे नींद में मिलेंगे,
माना के तुम एक बहुत बड़े शायर हो
पढ़कर तेरे कलाम का एक-एक लफ़्ज़
तुझे तेरी कविता में मिलेंगे,
वैसे हम भी तो कलम के सिपाही है, ऐ दोस्त!
किसी महफ़िल में नहीं तो काव्य गोष्ठी में मिलेंगे,
कोई अफ़सोस नहीं,के तुम बिछुड़ गए हम से
साया बन तेरा, तेरे साथ-साथ चलेंगे,
मिलाएंगे कदम से कदम,तेरे साथ ऐ दोस्त!
जिधर तुम मुड़ोगे, उधर हम भी मुड़ेंगे,
सीने में हम भी दो दिल रखते हैं ऐ दोस्त!
जज़्बात फौलादी रख, तेरी ढाल बनेंगे,
खाकर पवित्र गीता की कसम ऐ दोस्त!
सच कहा है,सच के सिवा कुछ नहीं कहेंगे,
एक अजीब सी खुशी मिलती थी, हमें ऐ दोस्त!
तुम्हारी मीठी बातों को सुनकर ,
तुम शब्द नहीं, एक अंदाज़ थे हमारे लिए ऐ दोस्त!
रँगत देख महफ़िल की जरूर मिलेंगे।
- बाबू राम धीमान
*****
दिल के कोने में थोड़ा मलाल रखें
सोंच गहरी और हृदय विशाल रखें
दिल के कोने में थोड़ा मलाल रखें
एक मैं ही नहीं और भी हैं जिंदगी
हम अपना औरों का ख्याल रखें
सोंच गहरी और हृदय विशाल रखें
तेरा मेरा भले न जन्मों का नाता सही
मौजूदा रिश्तो को ज़रा संभाल रखें
दिल के कोने में थोड़ा मलाल रखें
आरज़ू हसरतें भले ही छोटी सही
दिल में करुणा दया और उदार रखें
दिल के कोने में थोड़ा मलाल रखें
हर श्वांस संगीत सी धुन पर थिरकते रहें
मदमस्त जिंदगी खास ओ कमाल रखें
सोंच गहरी और हृदय विशाल रखें
आते जाते रहे वक्त, कितने ही सुरमा
हो याद किसी की कौन ख्याल रखे
दिल के कोने में थोड़ा मलाल रखें
पार जाओ समुन्दर खुदके दम, ठीक
डूब जाओ 'नरेन्द्र' कौन ख्याल रखें
दिल के कोने में थोड़ा मलाल रखें
सोंच गहरी और हृदय विशाल रखें
- नरेन्द्र सोनकर बरेली
*****
कहानी कहेंगे
इक रोज़ तेरी कहानी कहेंगे,
कितनी हो तुम सयानी कहेंगे!
सितम की इंतहा बहुत हो गई,
तुझे फ़िर भी अपनी दीवानी कहेंगे।
मार दिया जो खंज़र पीठ पर मेरी,
हम बहते हुए लहु को पानी कहेंगे!
शातिर हो तुम ये जान लिया मैंने,
यकीनन हम इसे तेरी नादानी कहेंगे।
अब ख़ुशी दो या ग़म तुम्हारी मर्ज़ी,
बामुक़द्दर तेरे प्यार की निशानी कहेंगे!
छाई हो इस क़दर ख्यालों में मेरे,
कि तुम्हारी हर बात को ज़ुबानी कहेंगे।
वो तेरी बातें और मासूम सी बेक़रारी,
अब तो इन्हें यादों की रवानी कहेंगे!
साथ हो हमसफ़र तुम जब भी मेरे,
तब अपनी किस्मत को सुहानी कहेंगे।
वक़्त की कमी होती है तेरे पास,
कैसे तुमसे अपनी परेशानी कहेंगे!
पसंद है मुझे उसी दौर की मोहब्बत,
बेशक कहने वाले इसे पुरानी कहेंगे।
- आनन्द कुमार
*****
भूलना कहाँ है आसान
रंग बिरंगी की इस दुनिया में
तुम्हारी रंग क्या है ?
क्या रंग मिल गया जो तुझमें
हो गयी बे-रंग...
मगर इसका एहसास नही है।
ईप्सा, भावना और उमंग
सकल विस्मृत हो गया मन,
दूर हूँ तुझसे दूर ही रहूँ मैं
अब तो...
दूर से भी दूरी बना रहा हूँ मैं।
परंतु...
उन चेहरे को भूलना कहाँ है आसान
जिनसे जुड़ा है ये तन-मन,
वो हंसी, वो आंसू, वो प्यार के मोती
दिल के किताब के जैसे खूबसूरत साथी।
- सूरजमल AKs
*****
ले डूबते हैं मांझी भी
सादगी को बदलते समय में तार तार होना पड़ता है,
ये जिंदगी है साहिब यहां होशियार होना पड़ता है।
कितना भी बचकर चलो ठोकरें मिल ही जाती हैं,
कभी कभी मंजिलों को भी लाचार होना पड़ता है।
यूं तो दिल है बड़ा मासूम चालाकियों से बहुत दूर,
यहां खुद को बचाने के लिए तलवार होना पड़ता है।
यूं तो छोड़ दें सल्तनत भी ऐशो आराम भी जमाने के
लेकिन लूट मची हो तो हकदार होना पड़ता है।
समझाने को जब कोई सूरत ही ना बचे तो करें क्या ?
इन आंखों को ही अपने हाल का अखबार होना पड़ता है।
ले डूबते हैं मांझी भी भंवर में कई बार अपनी कश्तियां,
लहरों को ही पथिक, नाव और पतवार होना पड़ता है।
मुद्दतें गुजर गईं कोई अपना हाल तो जरा पूछ ले,
इस उम्मीद में अक्सर हमको बीमार होना पड़ता है।
पिछले मौसम पतझड़ करके चले गए दरख़्तों को,
हमको उनकी खुशी के लिए बहार होना पड़ता है।
- मंजू सागर
*****
सुना था, आज भी लोगों में कुछ तो इंसानियत बाकी है,
पर यहां हर चेहरा, अब छलावा, फरेबी,
धोखेबाज सा लगता है। यकीन पर यक़ीनन,
अब यकीन करना संभव नहीं
इंसानियत अब रही नहीं। इंसानियत अब रही नहीं।
हर जगह झूठ का तांडव है,
हर जगह लोग खोटे क्यों मिलते!
अफ़सोश करें, या इन सबसे दूर रहें,
कोई भी उपाय, अब सुकून की वजह नहीं।
इंसानियत अब रही नहीं। इंसानियत अब रही नहीं।
चापडूसों का बोल बाला है,
झूठें लोगों के बीच सच्चाई दम तोड़ रही,
हम कैसे छोड़ दे अपनी सच्चाई, हमने ये सिखा नहीं।
इंसानियत अब रही नहीं। इंसानियत अब रही नहीं।
दम घूट रहा देख ऐसे ढोंगी लोगों को,
जिनमें न शर्म न लिहाज अब बाकी है,
कैसे खुद को महफूज रखें, ऐसे दानव रूपी सफेदपोशों से।
इंसानियत अब रही नहीं। इंसानियत अब रही नहीं।
- पूनम गूंजा
*****
बचपन जीना ही भूल गए
कुछ बेहतर हासिल करने की चाह में,
हम बस्ता उठाकर रोज स्कूल गए।
लेकिन उस पढ़ाई पढ़ाई के चक्कर में,
हम अपना बचपन जीना ही भूल गए।
अब वे माटी के खेल बहुत याद आते हैं,
दुबारा बचपन जीने को अपने पास बुलाते हैं।
वे कांच के कंचे, गिल्ली डंडा और छुपन छुपाई,
जिनमें नज़र आती थी दुनिया की सच्चाई।
बचपन वाली वह बरसात अब नहीं आती है,
क्योंकि कागज की नाव उसमें तैरकर जो नहीं जाती है।
सावन का मौसम भी अब मनभावन नहीं लगता है,
अब त्योहारों में बचपन जैसा रंग नहीं जमता है।
आज हमने सबकुछ पाकर भी कुछ नहीं पाया है,
क्योंकि हमने जीवन का सबसे बेहतरीन हिस्सा यूंही ही गंवाया है।
जीवन में उस बचपन से बेहतर कुछ न था,
अब समझ आया जीवन में बेहतर हासिल करना ही सबकुछ न था।
कुछ बेहतर हासिल करने की चाह में,
हम बस्ता उठाकर रोज स्कूल गए।
लेकिन उस पढ़ाई पढ़ाई के चक्कर में,
हम अपना बचपन जीना ही भूल गए।
- भुवनेश मालव
*****
इम्तिहानों में बैठकर
परिणामों की दौड़ से पिछड़ती
वेटिंग लिस्ट में नाम खंगालकर
डिप्रेशन से दोस्ती में
जान की बाजी लगाकर पंखे से झूलती
कभी गिरकर फिर संभलती
कोचिंगों से लौटकर देर रात तक
लाइब्रेरी में बैठे पन्ने पलटती
अकसर अपनों से दुत्कारी जाती
फेलियर का ठप्पा लगवाकर
दोबारा सेंटरों पर अपना रोल नम्बर ढूंढकर
ओम आर के गोलों में मंजिल तलाशती
कभी पेपरलीक को कोसकर
बंद मकानों में सिसकती
किस्मत पर रोना रोकर
पुलिस की लाठियाँ खाती
डिग्रियों का झौला लेकर
दफ्तरों के चक्कर काटती
जेठ की तपती दुपहरी में पत्थर तोड़कर
चंद रुपयों में संतोष करती
धैर्य का लिबास ओढ़कर "नूर"
मायूसी से मौन होती दो जोड़ी आँखें
जिनमें धैर्य है मौन है
और है अच्छे दिनों की 'प्रतीक्षा'।
- नितेश पालीवाल 'नूर'
*****
आज़ाद नज़्म: 'सालों बाद'
सालों बाद,
दीवारों पर काई की तरह निकल आते हैं कई हाथ,
हाथ जो आते-जाते, उठते-बैठते;
छुना चाहते हैं नितंब, उरोज और गिले रेशमी बाल।
सालों बाद,
छत से टपकने लगती हैं आँखें,
आँखें जो फर्श से रेंगते रेंगते;
कब पैरों पर चढ़ने लगती हैं; इसका नहीं रहता ख़याल।
सालों बाद,
हर रोज दिखाई-सुनाई पड़नेवाला चेहरा ,
चेहरा जो बदल लेता है अपना रूप;
और चुभने लगता है सूई की तरह तार-तार।
सालों बाद,
कुचल दी जाती है एक बात,
बात जो बिना आवाज चिल्लाती रहती है और फिर,
कोई मर जाता है ज़िंदा चलती साँसे सम्भाल।
सालों बाद,
इकलौता चश्मदीद गवाह हादसे का 'एक घर',
घर जिसे तब्दील कर दिया जाता है;
बड़े साहब की आलीशान हवेली की पहनाकर खाल।
- स्वाति जोशी
*****
पलाश के रंग
मुख और मुखौटे का
फासला कम हो रहा,
आईना अपना किरदार
खुद ही खोता जा रहा।
सच को सच की परवाह नहीं,
झूठ को सब मानने लगे सही।
दिखावा, दिल और दिमाग पर
एक नई दुनिया बसा रहा।
चुटकी भर बची इंसानियत
दम घुटता ही जा रहा।
सूरज की रोशनी रोज़ आती है,
पर उम्मीद की किरण जाने,
कहां छुपी है ?
सुनी टहनियों पर अचानक दिखे,
पलाश के फूल तभी।
मानो धैर्य की परीक्षा के बाद
बस खिले हैं अभी।
तेज उज्वल चमकते अग्नि सा रंग
जैसे कह रहे हों -
उठो, देखो, ढूंढो स्वयं को,
तुम्हारे अंदर ही छुपा है,
जिंदगी जीने का सही ढंग।
मौसम और ऋतुओं में तो
परिवर्तन ही नियम है।
जो कहते हैं-
तुम भी हो जाओ परिवर्तित।
मगर सच की ओर,
सहज झूठ से न होना आकर्षित।
आत्मविश्वासी बनो
चाहे कर्म हो या वचन।
यदि विचारों से सच्चा हो मन,
फिर घृणा नहीं प्रेम ही है जीवन।
- सुतपा घोष
*****
जीना लाज़िमी है
न सुंदरता लाज़िमी है, न सजना लाज़िमी है,
सम्मान से जीना चाहो तो पढ़ना लाज़िमी है।
ये ज़मीं भी तेरी है, ये आसमां भी तेरा,
बस इसे अपना मानना लाज़िमी है।
कौन कहता है- नहीं घर तेरा, तू बेघर है ?
अपने ही घर को अपना मानना लाज़िमी है।
न तू बेबस है, न लाचार कहीं से,
बस सही और ग़लत को समझना लाज़िमी है।
न गंवार है तू, न समझ की कमी तुझमें,
हाँ, थोड़ा पढ़-लिखकर संवरना लाज़िमी है।
घर की रौनक है तू, घर बनता तुझी से,
अपनी अहमियत को पहचानना लाज़िमी है।
सहेज कर रखना अपने गुणों को,
समय के साथ आगे बढ़ना लाज़िमी है।
दुर्गा भी तू, झांसी भी तू, रज़िया भी तू,
कभी आग तो कभी पानी है तू।
नहीं है तू केवल कोमल कली,
दुनिया को ये जताना भी लाज़िमी है।
कुचलना जब कोई चाहे तुझको,
नागिन-सी फन उठाना भी लाज़िमी है।
न सुंदरता लाज़िमी है, न सजना लाज़िमी है,
जीना चाहती हो तो सिर उठाना लाज़िमी है।
गुरूर है तू घर का, समाज का- नहीं कमतर,
हक़ है तुझे भी सुरक्षा और सम्मान का।
उठा शस्त्र, बना स्वयं को सक्षम,
नहीं निर्बल- बेशक तू नारी है।
दरिंदगी अब नहीं सहेगी,
दरिंदों के लिए अब तू सिर्फ़ कटारी है।
आत्मरक्षा करने में है स्वयं सक्षम,
ये आईना दिखाना भी लाज़िमी है।
नहीं जीना सिर्फ़ औरों के लिए,
खुद के लिए जीना भी लाज़िमी है।
ज़िंदगी नहीं मिलेगी फिर दुबारा,
इसलिए सुंदर स्वप्न संजोना भी लाज़िमी है।
सम्मान से जीना चाहती हो तो,
खुद की पहचान बनाना लाज़िमी है।
आगे बढ़, कदम बढ़ाना लाज़िमी है,
जीने के लिए खुद को जगाना लाज़िमी है।
- कंचन चौहान
*****
मैं अपनी माँ की लाड़ली बेटी हूँ,
अपने पिता की नाज़ुक-सी परी हूँ।
मैं अपने सास-ससुर की संस्कारी बहू हूँ,
बहन, प्रेमिका,जीवनसंगिनी,पत्नी
और अपने बच्चों की माँ हूँ।
मैं एक कर्मठ कामकाजी महिला हूँ ।
पर इन सबसे पहले,
मैं स्वयं की सच्ची सखी हूँ।
मुझमें खूबियाँ भी हैं और कमियाँ भी,
मैं पूर्ण नहीं हूँ- और होने का दावा भी नहीं करती।
गलतियाँ मुझसे भी होती हैं।
कभी गुस्सा आता है,
कभी मन रूठ जाता है,
कभी थककर बैठ जाती हूँ,
तो कभी भीतर से पूरी तरह टूट भी जाती हूँ।
ऐसे पलों में माँ की थपकी बहुत याद आती है…
माँ की गोद का वह सुकून-
जो अब मैं अपनी ही गोद में ढूँढ़ लेती हूँ।
मैं झूठ से सख़्त नफ़रत करती हूँ
और झूठ बोलने वालों से
दूरी बनाए रखना पसंद करती हूँ।
मेरी नीयत साफ़ है-
इतनी साफ़ कि मैं अपने बच्चों की आँखों में,
अपने हमसफ़र के सामने,
और सबसे बढ़कर अपने ईश्वर के
समक्ष बिना झिझक नज़रें मिला सकती हूँ।
मैं जानबूझकर किसी का दिल नहीं दुखाती,
पर सत्य के लिए अपनी आवाज़ अवश्य उठाती हूँ।
क्योंकि सच्ची खूबसूरती चेहरे के रंग-रूप में नहीं,
नीयत की पारदर्शिता में होती है।
अगर नीयत साफ़ हो तो,
उसकी सच्चाई ही उसका सबसे
चमकता हुआ श्रृंगार बन जाती है।
- निशि धल सामल
*****
बढ़ती उम्र
बढ़ती हुई उम्र,
मन में नही रहे कोई मलाल
नही जेहन में कोई सवाल
बेवज़ह की बातों से दूर रहें
खुश रहें अपने ही हाल।
बढ़ती हुई उम्र,
जिम्मेदारियों से हो मुक्ति,
जीवन ही बन जाए एक
प्रेरणादायक उक्ति,
कौन,क्या क्यों कैसे छोड़ दें,
मन कर्म वचन बनें सूक्ति।
बढ़ती हुई उम्र
झूठ ,फरेब से दूर रहें,
नही कड़वी कसैली बातें कहें
सादगी हो रहन सहन में
नहीं किसी की बुरी बातें सहें।
बढ़ती हुई उम्र,
प्रेम और स्नेह से मजबूत हो
दुख तकलीफ़ में एकजुट हो
मन में कोई गांठ न बाँधे
नहीं रिश्ते में कोई टूट हो।
- रूचिका राय
*****















No comments:
Post a Comment