साहित्य चक्र

16 February 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 16 फरवरी 2026

 


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बोलेगी तकदीर कहीं


मेरी मंजिल पास नहीं
जाना मुझको दूर कहीं।
श्रम को तुम जीते रहना,
बोलेगी तकदीर कहीं।

चमक तुम्हारी गायब है,
चेहरा है बेनूर कहीं।
पहचानों पहले खुद को,
मिलना मुझको दूर कहीं।

यादों की दुनिया बसती,
मिलते हैं मजबूर कहीं।
चाहत का संसार सजाये,
सपने रखते दूर कहीं।
कृष्ण भक्ति में लीन रहे,
मिल जाते हैं सूर कहीं।


- वाई. वेद प्रकाश


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सब गवां दिया

देखो, तुम्हारे बिना मैने सब खो दिया,
पुरानी तस्वीरें देखते-देखते मैं रो दिया,
तुम्हे याद अब नहीं करता हु,
तुम्हारे चक्कर में मैने अपन आपको भी खो दिया।

तुम्हारे बाद मैने आलम को सब दिखा दिया,
तुम्हारे बारे में कुछ लिखा था मैने,
सिगरेट के धुएं में मैने सब कुछ उड़ा दिया,
तुम्हारे लिए मैने अपना सब कुछ लूटा दिया।


- प्रणव राज


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आखिर क्या करें

बेरोजगार आखिर क्या करें
पहले तो दिन रात एक कर,
पढ़ाई  को पूरा करें।
फिर बेरोजगारों की पंक्ति में
खड़े होकर रोजगार  का इंतजार करें।
नौकरी पाने को भारी फीस भर भरकर,
प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी करें।
एक पद पर हजारों दांव पर लगे,
पर एक ही नियुक्ति प्राप्त करें।
प्रक्रिया का दौर मुश्किल होता जाए,
कभी कभी बोरा उठाकर भी रोजगार प्राप्त करें।
वेतन शिक्षा के अनुसार न मिले
खुद तो हैं पर घरवालों को भी परेशान करें।
ज्ञान का भरा हो चाहे भंडार 
पर कद्र कोई न करें।
मां बाप  के सपनें  होते हैं बड़े 
पढ़ाई पर भी खर्च ज्यादा करें।
दुख तो तब है होता 
जब संतान रोजगार का इंतजार करें।
बेरोजगारी की  दुर्दशा 
मन को हताश बड़ा करें।


- विनोद वर्मा


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आपके शब्दों ने मुझे
इस कद्र प्रभावित कर दिया,
कहना चाहता था मैं भी बहुत कुछ
मगर खामोश कर दिया,
हल्क से नीचे ही रह गए मेरे अल्फाज़ तड़पते हुए,
मगर करता भी क्या? ज़रा आप ही बताईए
कहना चाहते थे बहुत कुछ वह भी
बंदिश ने आपकी होंठों पर ताला लगा दिया

लाख कोशिश की मैंने, उस ताले को खोलने में
खुल न पाया वह ज़ालिम, शर्मिन्दा कर दिया,
झुक गया शर्म से मेरा सर इस कद्र
देखती रही निगाहें, शर्मसार कर दिया,
कुछ कर न सका मिली तन्हाई इस कद्र
देखता रहा दूर तक, एक उम्मीद की तलाश में
नज़र नहीं आई आशा की कोई किरण
विवश और नज़रबंद कर दिया,

जब नज़र डाली मैंने
अपने तड़पते हुए अल्फाजों पर,
कांप गई रूह मेरी, लाचार कर दिया
आहें भरते रहे मेरे अल्फाज़ इस कद्र
आंसू बहाने को मजबूर कर दिया,
ज़िद पर अपनी अड़े रहे मेरे कम्बख़त अल्फाज़
न खुद कह पाए कुछ
और मुझे भी खामोश कर दिया।

- बाबू राम धीमान


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पशु मित्र से पशुओं सा व्यवहार
पशु मित्र बनाने के लिए
कौन इतनी क्रूरता है दिखा रहा
पच्चीस किलो का बोझ उठाकर
पूरे ग्राउंड में है दौड़ा रहा
बेरोजगार है हमारा युवा
मजबूर है कुछ नहीं कर पा रहा
बहुत मेहनत करता है दिन रात
लेकिन पेपर फिर भी लीक हो जा रहा
कौन है सलाहकार ऐसा
जो ऐसे नियम बना रहा
देव भूमि को कर रहा शर्मशार
ममता का गला दबा रहा
मजबूरी किसी की तू क्या जाने
क्यों इतना जुल्म नारी पर ढा रहा
पांच हजार के लिए क्या जान लेगा
क्यों इनको इतना सता रहा
पशुओं से बदतर कर रहा व्यवहार
इनको पशु मित्र बता रहा
खुद के पास गाड़ी बंगला धन दौलत नौकर और कार
क्यों जोंक बनकर इनका खून चूसे जा रहा
पॉलिसी की दे रहे दुहाई
कोई बताए यह पॉलिसी किसने है बनाई
क्या पशु मित्रों को भी बार्डर पर है लड़ना
जो पच्चीस किलो बजन वाली पॉलिसी है बनाई


- रवींद्र कुमार शर्मा


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बांस हूं मैं
बैंहज गलांदे मिंजो बांस गलांदे,
ओ बजे मेरी मुरलियां,
ओ बजदी बांसुरियां-२
खड़ा रैंहंदा सीना ताणी,
आईजाओ झक्खनेहरी,
अकड़ी रे बड्डे,बड्डे,हूंदे टुकड़े-२
अऊ छूंदा पैर धरतिया अम्मा रे।
कुछ नी बिगाड़ी सकदी
बड्डी -२ आंधियां!
ओ बजे मेरी मुरलियां
इक था जमाना घरें मेरा ही राज था,
महलां री छत बणे मेरे सहारे,
गरीबां री झोंपड़ियां।
ओ बजे मेरी बांसुरियां
पशुआं रा चारा मैं,
कुल्फी आइसक्रीमां बिच मैं,
मंजे मंजोलू मेरे,
फल-सब्जी अन्ना जो
सजांदियां मेरी टोकरियां।
ओ बजे मेरी बांसुरियां
वेदिका च मैं तोरणद्वारा
बिच मैं,
ओ पालकियां सजदे लाड़े लाड़ियां
ओ बजे मेरी बांसुरियां
तांजे लक्क लगो झुकणे,
सहारा बणे मेरी लाठियां,
मोक्षधामा जाणेजो,
चार कंधयां पर बांस सजाए अर्थियां,
सद्गति करने जो-२
छेदूं मैं खोपड़ियां।
ओ बजदी बांसुरियां
मैं सिक्खया घाअ ते,
तूं सिख माहते,
निक्की -2 जड़ां मेरियां ,
जड़ीरी टबरा रे सहारे,
ओ सीना ताणी कने चलीरा छूणे,
अंबर होर तारे,
चुम्मी लैंदा धरती रे चरण प्यारे,
तांहि मेरे अग्गे हारे नेहरी आंधियां।
ओ बजदी बांसुरियां


- बृजलाल लखनपाल


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प्रेम

प्रेम किसी ख़ास दिन का मोहताज़ नहीं,
यह तो हर रोज़ हृदय में अंकुरित होता है,
और परिपक्व होकर निखरता जाता है,
इसके पोषक तत्व हैं सम्मान व विश्वास,
जब किसी से बेतहाशा स्नेह हो जाए,
तो समझ लेना वो ही सच्चा प्रेम है,
इस संसार में सुकून से जीने के लिए,
प्रेम का होना अत्यंत ही आवश्यक है,
बशर्ते इसमें अपनापन और सच्चाई हो,
हर वक़्त किसी का स्मरण करना,
उसकी यादों को दिल में समेटे हुए,
उसके मुस्कुराने की वजह ढूंढना,
ख़ुद कष्ट में रहकर भी उससे ना कहना,
उसके लिए हर वो मुमकिन कार्य करना,
जिसकी वजह से उसे ख़ुशी मिलती हो,
हमेशा उसकी सलामती की दुआएं करना,
उससे वक़्त के सिवा कुछ ना मांगना और,
बातों का कभी ना रुकने वाला सिलसिला,
ये सभी उस अथाह प्रेम की निशानी है,
जिसके लिए दिल इंतज़ार करता है,
एक ऐसा इंसान जो मन को भाए,
जिसके होने का अहसास तब भी हो,
जब वह हमारे पास नही होता है,
जिसकी मौजूदगी साँसों में समाई हो,
ये वो क्षण हैं जो सुखद अनुभूति देते हैं,
प्यार का इज़हार तो रोज़ होना चाहिए,
इसके लिए किसी ख़ास दिन का,
इंतज़ार करने की ज़रूरत नहीं है,
इस प्रेम के बदले में मांगना है तो,
सिर्फ़ और सिर्फ़ उसका हाथ और साथ,
तब जाकर इस उमड़ते हुए प्यार की,
पराकाष्ठा पूर्ण होती है और मिलता है,
हमें एक नेक इंसान बनने का अवसर।


- आनन्द कुमार


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भारत की अनुपम ऋतुएँ
भारतीय संस्कृति और जीवन दर्शन में
विभिन्न भावों को दर्शाती हैं ऋतुएँ
भारत की मनभावन ऋतुएँ
प्रकृति से सीधा होकर आबद्ध
करती हैं मानव तन-मन को प्रभावित
अत्यंत मनोरम हैं ,भारत की ऋतुएँ
भारत का श्रृंगार हैं ,ये ऋतुएँ
नवउल्लास का, नवस्फूर्ति का
उन्नति का, विकास का प्रतीक है
मौसम बहारों का है ,ऋतुराज बसंत
हमारे हयात में जोश का, संघर्ष का
तप का, श्रम का प्रतीक है
गरमाहट से, तपिस से
भरपूर है ग्रीष्म ऋतु
जीवन के पुनरुत्थान का,
हरियाली का
प्रकृति के सृजन का प्रतीक है
ऋतुओं की रानी, वर्षा ऋतु
विविधता से,नवीनता से
प्राकृतिक सौंदर्य से हैं परिपूर्ण
भारत की मनोरम ऋतुएँ
भारत का श्रृंगार हैं, ये ऋतुएँ
सर्दी की ऋतु है आराम का
शक्तिसंचय का, स्वर्णिम अवसर
इसमें करें आंतरिक-विकास एवं
आत्म-प्रेम की ओर बढ़ाएँ कदम
हेमंत शांति से, अविचलता से
जीवन जीना सिखाए
शिशिर सहनशील होना
विनम्रता से जीना हमें बताए
भारत की ये मनोरम ऋतुएं
भारत का श्रृंगार हैं ये ऋतुएँ
निरंतर परिवर्तित होती ये ऋतुएं
अस्थिरता को दर्शाती हैं ये ऋतुएँ
जीवन में कभी खुशी होगी
कभी होगा गम,
यह बात बताती हैं, ये ऋतुएँ
हमें जीवन में मुस्कुराते हुए
हर स्थिति में आगे, बढ़ते जाना है,
यही संदेश देती हैं, ये ऋतुएँ
भारत की ये अनुपम ऋतुएं
भारत का श्रृंगार हैं ये ऋतुएँ


- प्रवीण कुमार


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मेरी गुड़िया
नन्हीं सी, फूल सी, मिसरी सी,
तितली सी, शीशे सी।
मेरा खिलौना, मेरी हंसी,
मेरी खुशी, मेरी परी।
मैं उससे खेलता,
वह मुझसे खेलती,
नन्हे हाथ उसके
मुझको थामते,
नन्हे पांव उसके
मुझे पीछे भगाते।
उसकी हंसी मुझे गुदगुदाए,
मैं उसको, वो मुझे किस्से सुनाए।
आंखे उसकी मुझको देखती,
दिल को छू जाए,
मेरे हर ज़ख्म पर,
उसकी प्यारी मुस्कान
शीतल मरहम बन जाए।
दुआ है,गुड़िया खूब पढ़े
आगे बढ़ती जाए।
किसी की नजर न लगे उसको
शादी हो आबाद रहे।
एक दिन वो भी
गुड्डा गुड़ियों की प्यारी
बने एक हस्ती बुलंद,
करे सब उसको पसंद
सबों का प्यार बरसे उसपर,
एक शीतल छांव बन जाए।


- रोशन कुमार झा


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आओ वृक्ष को लगायें

अय हवा तुम पर क्या मैं कोई झुठा इल्जाम लगाऊँ
अपनी ही गलती को हम किस किस से नजर छिपाऊँ
प्रदुषण की हमने जग में कर दी है पैदा आज भरमार
प्राणवायु की किल्लत से अब जूझ रहा सारा संसार
वाहन की जहरीली धुआँ बन गई है जान की दुश्मन
कल कारखाने की प्रदुषित गैस कैसे करे आचमन
जानलेवा गैस का वायुमंडल में हो रहा नित्य, सेवा
गली मुहल्ले की गंदा पानी कर रहा है सबपे धावा
पेड़ पौधे से मानव मात्र हो गये हैं इनके जॉनी दुश्मन
विकास के नाम पे देखो उजाड़ रहे हैं वन व उपवन
प्राण वायु के बगैर सोंच कैसे बचा पायेगा जीवन
जंगल काट उजाड़ रहे हैं अपने ही खुशी का ऑंगन
बरगद पीपल व तुलसी हो रहे है मानचित्र से गायब
पेड़ पौधे की सज गई है चित्र में शोभा सजा अजायब
हर कोई अब तो बैठ कर सोंचों कैसे होगी वायु सफाई
बंजर परती भूमि पे हो जाये पुनः जंगल की रोपाई
आओं हम सब बुद्धिजीवी करें एक साथ ये अब प्रण
जंगल की रक्षा करेगें ना काटेगें जंगल को आगे हम
जंगल है तो हमारा जीवन है प्राणों से बढ़कर हो रक्षा
प्रर्यावरण को बचाने की प्रण लो ताकि हो जीव सुरक्षा


- उदय किशोर साह


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हुंकार: ज्ञान के रणक्षेत्र में

उठो हिंद के वीर पुत्रों, आलस का परित्याग करो,
कलम हाथ में ढाल बनी है, अज्ञानता पर घात करो।
ये पाठशाला युद्ध क्षेत्र है, पुस्तकें अस्त्र तुम्हारी हैं,
विजय उसी की होगी जिसकी, तैयारी सबसे भारी है।

मत भूलो तुम उन हाथों को, जो खेत-धूप में जलते हैं,
पिता तुम्हारे पत्थर ढोकर, घर का चूल्हा बलते हैं।
माँ की आँखों के सपनों को, तुमको सच कर दिखलाना है,
पसीने की हर एक बूँद का, कर्ज तुम्हें चुकाना है।

गणित चक्रव्यूह सा खड़ा अगर, तो तुम अभिमन्यु बन जाओ,
सूत्रों के बाणों से बच्चों, मुश्किल को मार गिराओ।
संख्याओं के इस दंगल में, जो जूझ गया वो जीतेगा,
मेधावी वही बनेगा जो, बाधाओं को चीरेगा।

आराम हराम है वीरों अब, रातों की नींदें वार दो,
बनकर मेधा की मशाल तुम, जग को नया आकार दो।
तुम्हारे शौर्य की गाथाएँ, कल पूरा अंबर गाएगा,
जो आज तपेगा पढ़ने में, वो कल लोहा कहलाएगा।


- देवेश चतुर्वेदी "ईशान"


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दुर्गुणों से दूर रहा कैसे जाएं
मानव से देव बना कैसे जाएं।

ईश भी है इसके शिकार जब,
तब ईष्र्या द्वेष छोड़ा कैसे जाएं ।

स्वार्थ की प्रीति करे सब कोई,
अमर कथन को भुलाया कैसे जाएं।

औरों की बुराई आंखों में खलती ,
खुद को आईना दिखाया कैसे जाए।

गर दुर्योधन इतना ही बुरा होता ,
तो स्वर्ग वह भला पा कैसे जाए।

दुनिया है बुराइयों का एक गढ़,
इससे बचकर रहा कैसे जाएं।

कर्म का फल भोग रही है तू रत्न,
दूसरों पे यह पाप मढ़ा कैसे जाएं।


- रत्ना बापुली


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15 February 2026

वर्तमान में बाजार की समस्याओं से जूझता मानव!


आज जैसे-जैसे हम आधुनिकता की ओर बढ़ते जा रहे हैं और हमारे बाजारों की हालत उतनी ही खराब और चिंताजनक होती जा रही है। एक वक्त था जब खाद्य पदार्थों के मूल्य इतनी जल्दी उतार-चढ़ाव नहीं करते थे, मगर आज 1 घंटे बाद खाद्य पदार्थों के मूल्य बदल जाते हैं। इतना ही नहीं बल्कि मिलावट और गुणवत्ता की कमी खाद्य पदार्थों के सेवन में हमें चिंतित कर रही है। बाजार की दिखावे वाली अर्थव्यवस्था ने हमें चारों तरफ से घेर रखा है।





आइए इस दिखावे की अर्थव्यवस्था ने हमें कैसे घेर कर रखा है इस पर प्रकाश डालते हैं-

आज बाजारों से मानवीय स्पर्शिता यानी आपसी व्यक्तिगत रिश्ते धीरे-धीरे समाप्ति की ओर जा रही है। पहले हम सभी अपने आस-पास की दुकानों में जाकर सामान खरीदते थे। आज हम ऑनलाइन ऑर्डर कर रहे हैं, जिसके कारण हमारा लोगों से संवाद धीरे-धीरे कम हो रहा है। ई-कॉमर्स यानी ऑनलाइन खरीदारी से न सिर्फ स्थानीय दुकानदारों की आय पर असर पड़ रहा है, बल्कि पैकेजिंग यानी बड़ी मात्रा में कचरा भी इकट्ठा हो रहा है। इसका सीधा असर हमारे पर्यावरण पर पड़ रहा है।




बाजार के दिखावे के कारण आज हम सभी का गैर जरूरी खर्चा बढ़ गया है। सोचिए ऑनलाइन खरीदारी में चप्पल भी EMI पर उपलब्ध है। विज्ञापनों ने हमें चारों तरफ से घेर रखा है। चाहे वह फेसबुक हो, इंस्टाग्राम हो, गूगल हो या फिर न्यूज़ पेपर, न्यूज़ चैनल और सड़कों पर लगे बड़े-बड़े बैनर हो। हम हर समय खरीदारी के ही मूड में रहते हैं या खरीदारी के बारे में ही सोचते रहते हैं। सोशल प्लेटफॉर्म के जरिए हमारा डाटा चोरी हो रहा है। इतना ही नहीं बल्कि अगर आप अपने मोबाइल का डेटा ऑन करके किसी वस्तु की जरूरत के बारे में बातचीत करेंगे तो आपको आपके सोशल प्लेटफॉर्म पर वही विज्ञापन देखने शुरू हो जाते हैं।




आज हर चीज की मंथली सब्सक्रिप्शन की प्रणाली लगातार बढ़ती जा रही है यानी पहले हम सीडी कैसेट के माध्यम से कोई सॉफ्टवेयर या फिल्म हमेशा के लिए खरीद सकते थे। मगर आज आप पैसा दुगना दे रहे हैं और वह वस्तु आपको सिर्फ एक महीने के लिए मिल रही है। इतना ही नहीं बल्कि बाजार में ऐसे प्रोडक्ट्स लाएं जा रहे हैं, जिनकी लाइफ बहुत छोटी है या फिर उनकी लाइफ छोटी बनाई जा रही है। पैसा देकर भी सही वस्तु नहीं मिल पा रही है यानी बाजार में नकली वस्तु या फर्स्ट कॉपी की भरमार है। बाजार के इस मकड़ जाल से बाहर निकलना हमारे लिए मुश्किल नहीं बल्कि नामुमकिन हो चुका है।





बाजार के इस दिखावे की धारा में इनफ्लुएंसर मार्केटिंग का ऐसा भ्रम जाल फैला रहे हैं कि लोग गैर जरूरी वस्तुओं को इनफ्लुएंसर के दबाव में खरीद रहे हैं। बाजार से लॉयल्टी लगातार कम होती जा रही है। ग्राहकों पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाकर डार्क पैटर्न्स यानी ऑनलाइन चालबाजी से धोखाधड़ी की जा रही है। बाजार के प्रभाव ने लोगों में इंपल्स बाइंग यानी बिना सोचे समझे वस्तु खरीदने की आदत डाल दी है। बाजारों से स्थानीय स्वाद और विविधता लगातार गायब हो रही है यानी हमारे बाजार ग्लोबल होने के चक्कर में लोकल को खो रहे हैं।




हम लोग बाजार के दिखावे में इतनी बुरी तरीके से फंस गए हैं कि अपनी प्राइवेसी को लग्जरी मानने लग गए हैं। बाजार ने हमारे दिमाग पर कब्जा कर लिया है और हम चाह कर भी बाजार के इस जाल से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। आज हमें इंस्टेंट ग्रेटिफिकेशन यानी तात्कालिक संतुष्टि की लत लग चुकी है। सामाजिक मान व मर्यादाओं का हमने अचार बना डाला है। इसलिए सोशल मीडिया पर फेमस होने के लिए शारीरिक अंगों का प्रदर्शन और गाली गलौज की हरकतें आम होती जा रही है। हमारे युवा सोशल मीडिया में ऐसा खोया है कि उसे अपने भविष्य की जरा सी भी चिंता नहीं है।




बाजार की ये समस्याएं ऐसी ही चलती रही तो वह दिन दूर नहीं जब हम सभी चांद अमीर लोगों के गुलाम बन जाएंगे। आप और हम सिर्फ नौकरी व दो वक्त के खाने को ही जीवन समझने लग जाएंगे। इसलिए वक्त रहते हम सभी को बाजार के इस प्रभाव को समझना होगा और इस पर लगाम लगानी होगी अन्यथा यह समस्या हम सभी को अपना शिकार बना लेगी और हम कुछ भी नहीं कर पाएंगे।



- दीपक कोहली


14 February 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 14 फरवरी 2026





आने वाला वक़्त, एक नया सवेरा,
उम्मीदों की किरण, सपनों का बसेरा।
हर पल एक नई कहानी,
हर दिन एक नई जुबानी।

आने वाला वक़्त, चुनौतियों का मेला,
हिम्मत और हौसले का खेला।
संघर्षों में तपकर निखरेंगे,
जीत की राह पर चलकर उभरेंगे।

आने वाला वक़्त, एक नया इतिहास,
हमारी मेहनत का, हमारी जीत का अहसास।
हर कदम पर नई मंजिल,
हर सपने में नई हासिल।


- बाबू राम धीमान


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गोरों का दंभ दलन करके, मारा मुगलों के मीरों को
भारत माँ का मान रखा है, नमन देश के वीरों को

झुका दिवाकर देख तपन, उन हिन्दुस्तानी लालों का
दुश्मन पर फुफकार मारते, गरल सूखता व्यालों का

बासठ में धरती डोल उठी, जब चीन आ भिड़ा शेरों से
जयचन्दों से मात खा गए, कभी ना हारे गैरों से

शिमला, करगिल, काश्मीर में नापाकी नाकाम रहे
गंगा,जमुनी तहजीबें जन, यीशु अल्लाह राम रहे

अकुलाती जननी छोड़ लाल, सरहद सेवा को जाते हैं
तरुणाई को दबा सिला से, वतन तराने गाते हैं

खुदा सलामत रखे जमी पर, उन तरकस के तीरों को
भारत माँ का मान रखा है, नमन देश के वीरों को

उठा बैग भय भोर चल पड़ा, बेटी घर में सो रही थी
तीव्र श्वास दर भीगी चुनरी, जीवसंगिनी रो रही थी

उर पत्थर सा करके बापू, नीर जलाते नैनों में
लिपट तिरंगा घर वो आया सगा भाई था बहनों में

इश्क, नेह, माशूक, मोहब्बतें सब कुछ हिन्दुस्तान है
मिली एक है अयुत जान भी भारत पे कुर्बान है

लाल चौक, पुलवामा, बस्तर कई मर्तबा शीर्ण हुए
देख हस्त, धड़, भुजा रक्त में, कोटि हृदय विदीर्ण हुए

श्वान, काग, बक करे सियासत, धता बताकर कीरों को
प्यारे बच्चों रखो जहन में, शहीदों की तस्वीरों को

'मोहन' करे अरदास खुदा से, रखे सलामत हीरों को
भारत माँ का मान रखा है, नमन देश के वीरों को


- मोहन मीणा


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जीवन संगिनी

कैसे कहूँ तुम क्या हो, कौन हो
चैन हो, शुकुन हो हमसफ़र खुशमिजाज हो

प्यार भरी पाती, तुम भूखे की चपाती
बंजर जमीन, जीवन की अचानक मिली फूल हो

बसंत जीवन की, चांद तुम शरद की
राग मेरे जीवन की, मन्नत की ताबीज हो

मेरे घर को सजाती, दुलारती बच्चों को
तुम ममता की मूरत, भगवान की सीरत हो

खिली खेत सरसों की, फूलों सी नाजुक
जुबां से हो मीठी, खूबसूरत जैसे कोई परी हो

बच्चों की स्कूल हो, अन्नपूर्णा का आशीर्वाद
मेरे छोटे घर की तुम, किचेन क्वीन हो

श्रद्धा हो, पूजा हो, भाव की दर्पण तुम
मेरे बैंक, दिल की तुम्ही जमा पूंजी हो

ज्योति हो, लक्ष्मी हो, प्रकाश निवास की
तुम घर की तिजोरी की, खनकती गुच्छ कुंजी हो

लुटाती प्यार जो अपनी, कर्मठ अदाओं से
मेरे परिवार की, तुम बेशुमार खुशी हो

नजरों में मेरे, श्रेष्ठ ही नहीं तुम
अपितु प्राण प्रिये, सदा श्रेष्ठतम हो

यूं ही साथ देती रहो, जिंदगी भर
चाहे पा जाऊं खुशी, या मिले कहीं गम हो

जीवन संगिनी तुम, अमानत हो रघु कि
फूल ही नहीं तुम, गुलदस्ता खूबसूरत फूलों की हो


- राघवेंद्र प्रकाश 'रघु'


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पहाड़ी गीत- अपणा लुटाई

सबकुछ अपणा लुटाई गया
केहड़ा बुढ़ापा आईओ गया
स्याहियां बणाई ,बेची कन्ने,
पैसे चार कमाई गया,
अप्पूं पढ़ेया, होरबी पढ़ाये,
बड्डे बणाये कोई फौरना पुजाये,
अप्पूं मंगता बणी गया!
सबकुछ अपणा...

कुक्कड़ झांगां उठी-२,
सिरा पर टोकरियां चक्की-२
सब्जियां ल्यांदियां,
बेची कमाइयां करी गया,
होरनी री जिंदगी बणाई गया,
कने अपणी जालां च फंसाई गया,
मंगता मंगता हुईओ गया।
सबकुछ अपणा...

नेक बनेकी नौकरियां कित्तियाँ,
धन कमाया वजना ते ज्यादा,
लाले होरीं जो बणाई गया कने,
अप्पूं जो लाल्ले पाई गया।
अप्पूं मंगता बणी गया।
सबकुछ अपणा....

बकरे, अपणी जान गंवाई,
खाणे औल्यांजो मजा भीं नी आया,
सबनी री मौजां लाई गया,
कमाईंयां अपणी गंवाईं गया।
अप्पूं फेरी पछताईं गया।
सबकुछ अपणा...

मना रियां मना बिच रही गईयां,
हुण मंगणे ते बी डर लगदा ,
मन मंगणे जो नी करदा!
दुखदा दुखदा दुखी गया,
सुकदा सुकदा सुकी गया!
सबकुछ अपणा...

लिखदा -२ रहीओ गया,
अज्ज गांदा गांदा बी थकीओ गया।
मन अपणा मनाई लया,
सबनी रा कर्जा चुकाई गया।
सोची सोची दौड़ लगाईरी,
जीवन सफल बणाई लया,
बुढ़ापा बी मौजां लाईओ गया।
सबकुछ अपणा...


- बृज लखनपाल


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प्यार जिंदगी है,
प्यार बंदगी है।

प्रेम एक एहसास है,
प्रेम जीवन का आधार है।

मोहब्बत है तो
जीवन में जिंदादिली है।

जहांँ अनुराग है,
वही श्रद्धा है।

जहांँ विद्या प्रकाश है,
वहीं पर चेतना का उदय है।

प्रेम, ज्ञान, श्रद्धा
सजीवता के स्तंभ हैं।

- चेतना सिंह 'चितेरी'


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पुलवामा शहीदों को समर्पित

शत-शत नमन उन वीरों को,
जिसने अपने प्राण गवाएं,
मातृभूमि की रक्षा की खातिर,
माटी इसकी लहू से रंगाई।
सीना तान के डटे थे जवान,
लेकिन दुश्मनों ने घात लगाई।
फिर भी पीछे हटे नहीं वो,
हंसते हंसते अपनी जान गवाई।
वेलेंटाइन पर देश के रक्षक ने,
बलिदान देकर आशिकी निभाई।
लोग चैन से सो रहे थे उस दिन,
प्राण न्योछावर कर शहादत पाई।
बदले में क्या दे तुम्हे ए वीरों,
अंजुरी भर बस श्रद्धांजलि चढ़ाई।
14 फ़रवरी 2019 के दिन,
नम आंखों ने दी उन्हें विदाई।
जय हिंद,जय भारत।


- कांता शर्मा


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एक कविता
भावों के अवरुद्ध कंठ से
कैसे गाएं मोहक गीत।
कैसे भूलूं आज का दिन,
जो हुए हैं शहीद।
मेरे प्रियतम रहने दो न,
मत पहनाओं प्रेम जयमाल।
भावों के समुंदर में फिर से
आया है कोई भूचाल।
चलो चलें शहीदों की चिता पर,
करें अर्पित हम श्रद्धा सुमन।
जिनके लिए सुरक्षित है
हमारा देश व तन मन।


- रत्ना बापुली


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वतन का इश्क और पुलवामा के अंगारे

तुम महबूब के खतों को लेकर, कोमल गीत सुनाते हो,
वो बारूदी रास्तों पर, अपना काल बुलाते हैं।

तुम फूलों के उपहारों पर, झूठी कसमें खाते हो,
वो तिरंगे की खातिर, अपनी देह जलाते हैं।

पुलवामा के उन शेरों ने, यमराज का जबड़ा नापा था,
जिसके पौरुष की आहट से, सारा अम्बर काँपा था।

नहीं प्रेम में गुलाब चाहिए, ना कोई कोमल धागा है,
इन बेटों के भीतर तो बस, सोया सिंह ही जागा है।

धिक्कार उन्हें जो भूल गए, उन फौलादी इंसानों को,
जो हंसते-हंसते निगल गए, तोपों के गर्म दहानों को।

गर इश्क ही करना है तुमको, तो मिट्टी से करके देखो,
जीना है तो वीर बनो, वतन की खातिर मरके देखो!


- देवेश चतुर्वेदी "ईशान"


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जब ज़िंदगी सवाल बनकर घेर ले,
हर तरफ़ शोर, तुलना और डर हो,
तब ख़ामोशी से ख़ुद को थाम लेना,
यही सबसे बड़ा हुनर हो।
हर राय सच नहीं होती,
हर आवाज़ ज़रूरी नहीं,
जो मन को कमज़ोर कर दे भीतर,
वो बात मंज़ूरी नहीं।
जीत अक्सर उन्हें मिलती है,
जो दिखते नहीं, पर चलते रहते हैं,
भीड़ से अलग, अपने रास्ते पर
बिना रुके, बिना कहते रहते हैं।
हर ठोकर रोने को नहीं होती,
कुछ हमें मज़बूत बनाती हैं,
जो आँसू बचाकर सपनों के लिए रखे,
वही ऊँचाइयाँ पाते हैं।
नज़र जब मंज़िल पर टिक जाए,
तो भटकाव ख़ुद हार जाता है,
शोर थककर चुप हो जाता है,
और सफ़र आसान हो जाता है।
दुनिया बस बातें करती रह जाती है,
नाम उन्हीं का लिखा जाता है,
जो चुपचाप मेहनत करते हैं,
और आगे बढ़ते जाते हैं।


- आरती कुमारी


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है खाली जो दिल तो शौर करें क्यूँ ?
बेमतलब बातों पर गौर करें क्यूँ?

झेले है नखरे और धोखे हजारों,
शामिल फिर उसमें इक और करे क्यूँ ?

गंवाना है सबकुछ अपने तरीके,
दुनिया सा खुद का हम तौर करे क्यूँ ?

बनजारो जैसा ना कोई ठिकाना,
मेरे जेहन में वो ठौर करे क्यूँ ?

महफ़िल से शम्मा बूझा दे चलो फिर,
अंधेरी रातों से भौर करे क्यूँ ?


- स्वाति जोशी


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होली का हुड़दंग

मची है चारों ओर होली की हुड़दंग,
मस्ती में डूबा है आज हर रंग।
फागुन का मौसम है, दिन भी सुहाना,
मन चाहे बस गाना और मुस्कुराना।
पीकर भांग का मीठा प्याला,
झूम रहा है हर दिल मतवाला।
रंगों की बौछार में सब सराबोर,
गूँज रही है खुशियों की शोर।
ओ प्रिये! इस मधुर समां में,
तू है कहाँ इस रंगीन जहाँ में?
चारों ओर बसंत ने डेरा डाला,
हवा में घुला प्रेम का उजाला।
आ भी जा अब, देर न कर,
रंग दे जीवन प्यार से भर।
ऐसा रंग लगा दे अपने प्रेम का,
जो कभी न उतरे इस नेह का।
जैसे कृष्ण ने राधा को रंगा,
वैसा ही तू मेरे मन में उमंगा।
आकर तू भी रंग दे मेरे मन को,
होली के इस पावन उपवन को।


- गरिमा लखनवी


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रेडियो दिवस

खोल नभ के द्वार, विज्ञान ने रचा था तरंगों का नया संसार,
मार्कोनी ने नई राह दिखा, हवा में करवाया सन्देश संचार।
बिन तार, बिन आकार, आ गई थी खुशियाँ हर घर द्वार,
अनोखे इस यंत्र के आने से, जुड़ गया था ये सारा संसार।

आकाश ध्वनी गूंजी थी धरा पर, नगर-नगर और बस्ती-बस्ती,
उन्नीस सौ सत्ताईस में, चमक उठी आल इंडिया रेडियो की हस्ती।
“बहुजन हित्ताय, बहुजन सुखाय“ गाँव-गाँव आया ये सन्देश,
रेडियो की गूँज से महका, बना जन-जन का सुंदर परिवेश।

स्वतंत्रता संग्राम की ज्वाला में, रेडियो लाया जनचेतना का उजियाला,
समाचार, संगीत, नाटक, विचार संग, बन गया मनोरंजन का सहारा।
युद्ध हो या फिर हो उत्सव की बात, रखता चौकन्ना सबकों दिन-रात ,
फ़िल्मी धुनों संग आँख है लगती, और खुलती वन्देमातरम ध्वनी के साथ।

फिर टेलीविज़न और कंप्यूटर के, डिजिटल युग का दौर भी आया,
पर ये सब भी रेडियो की चमक-दमक को, फीका न कर पाया।
एफ.एम. की मधुर तरंगों ने, उड़ान में इसकी और पंख लगाए,
युवा मनों में जोश है भरता, देश प्रेम में कुर्बानी की राह दिखलाए।

आज भी आपदा में सबसे आगे, सच्चे संदेश रेडियो ही है लाता,
बिजली, मोबाइल नेटवर्क साथ छोड़ देते, पर रेडियो तोड़ता नहीं नाता।
इतिहास के उस दौर से वर्तमान के इस दौर तक,
रेडियो की है अलग पहचान,
कितनी भी तरक्की कर ले जमाना,
कम नहीं होगी रेडियो की आवाज़ और शान।


- धरम चंद धीमान


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पहला भाग- झप्पू-झप्पू पों-पों

झप्पू-झप्पू पों-पों
इसने कहा,उसने कहा,तुम भी कहो
जीवन-मृत्यु का कारण और प्रश्न है भाऊ
नहीं कहोगे तो कारण बनेगा सीधे मरो
मौक़ा मिले,न मिले मार दिए जाओगे बस
ग़लत है इल्ज़ाम कि ग़लत हैं वे सभी जन
जो जीते हैं,मरते हैं और करते हैं प्रेम
और डरते नहीं हैं किसी के भी बाप से
अच्छे हैं दिन और परेशान हैं सबके सब
सरकार करती नहीं है ज़रा भी परवाह
फटाफट क़ायम कर लेती है मौक़ा
नाता-रिश्ता बुलडोज़र ही बुलडोज़र
और सट-सटाक् झप्पू-झप्पू पों-पों
कहा मानोगे तो प्रश्र ही नहीं कहीं भी
कलंक धुल जाऍंगे,चकाचक हो जाऍंगे
उत्तर में पाओगे,पद,प्रतिष्ठा,पैसा हाॅं जी
और प्रति-नागरिक पाॅंच‌ किलो राशन
नज़र नीची,हाथ बंद,मुॅंह पर ताले लिए
अस्सी करोड़ हैं,जो लाभान्वित हैं मियाॅं
चुप-चुप झप्पी में सब झप्पू-झप्पू पों-पों
एक तुम ही हो भूतियानंदन शिरोमणि
जो वक़्त-बेवक़्त करते रहते हो भों-भों
इस भयाक्रांत समय में है नहीं कहीं अभय
और अगर है कहीं,तो है यहीं और है यही
पिंजरे में बंद बेशर्म तोताराम हो जाओ
इसने कहा,उसने कहा,तुम भी कहो
झप्पू-झप्पू पों-पों.

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दूसरा भाग- झप्पू-झप्पू पों-पों

तंत्र है,मंत्र है,षड़यंत्र है
भों-भों है चारों तरफ़ कि लोकतंत्र है
नॅंग-धड़ॅंग है,पारदर्शी है सब कुछ
हाथी पर सवार होकर आ रहे हैं राजाजी
राजाजी की टूटी है टाॅंग,कटी है नाक
फिकर नाॅट जी फिकर नाॅट,कौनौ नाही
ख़बर बुरी है,ज़रा अच्छी तरह पढ़िए
नॅंगे राजाजी के साथ नॅंगे ॳॅंग-रक्षक हैं
ॳॅंग-रक्षक हैं कि रक्षक ही भक्षक हैं
बदलते हैं भेष,भूषा,भाषा और मुखौटे
झप्पू-झप्पू पों-पों करते हैं जहाॅं-तहाॅं
कुर्सी-मार्ग पर चलते हुए भूल गए वृक्ष
चेहरे की कालिख को बताते हैं काजल
पीटते हैं पानी कि पीटते हैं हर हरा विचार
चुप हैं तमाम सुधिजन अपने दड़बों में
लकवाग्रस्त लोहा है बैंड-बाजों में शामिल
सिर्फ़ एक ही गूॅंज है झप्पू-झप्पू पों-पों
मज़े ही मज़े हैं सरकारी तरकारी के
रीढ़हीन होकर सज़दा करो,झुक जाओ
नित-नित दोहराओ,नित-नित पाओ
सरकारी ठेके से,सरकारी ठेंगे़ से
झप्पू-झप्पू पों-पों...


- राजकुमार कुम्भज


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बचपन

फिर से वही बचपन की तलाश में कट रही जिंदगी
जिसमें न डर, न छल, न कपट, न झूठ, न आलस
फिर से उल्लास, हँसी ठिठोली और बेबाकपन
भटक रहा हर दिन बस वही बचपन जीने को मन
खेलने को रस्सी-कूद , गिट्टियाँ और चोर सिपाही
खो-खो, आइस-पाइस, पिण्डुक और फुटबॉल,
सारा दिन स्कूल, मस्ती, लड़ना, प्यार और रुठना
सब याद आता है कि फिर से उस दौर में जीने को

माँ का हर दिन प्यार से पुचकारना कभी डांटना
प्यार से पुचकारना पापा का हर चीज़ लाना
सबकी लाड़ली होना इस बात पे इतराना रस्क करना
सखियों की लीडर होना उनके विश्वास पे खरा उतरना
काश वही पुराने दिन लौट आए, वही बेपरवाह
जिंदगी हो, वही सखियाँ हो, वही माँ पापा हो,
वही भाई बहन, वही सुंदर कपड़े, वही सुकून
भरी जिंदगी हो, बेपरवाह, रोक टोक न हो

पर अब तो जिंदगी का हर पल, हर दिन, हर साल
खत्म हो रहा है, अब जिंदगी पानी का बुलबुला है
बस अब जिंदगी में वही बचपन जीने को मन करता है
और अंदर एक बच्चा अभी भी ज़िदा है और जीता है


- सुमन डोभाल काला


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आहट

मेरे कदमों की आहट से
वर्तमान ठहर जाएगा और
भविष्य का चुपके से आगमन होगा।

मेरे कदमों की आहट से
देवी शक्तियां मोहित होगी और
दुष्ट शक्तियों स्थानांतरण करेंगी।

मेरे कदमों की आहट से
जीवन में प्रकाश का उदय होगा
और अंधकार का विनाश होगा।

मेरे कदमों की आहट से
हृदय में ज्ञान का उजाला होगा
और अज्ञान का ध्वंस होगा।


- डॉ. राजीव डोगरा


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वो शहर भी अनजान था
पहली मुलाकात थी जहाँ
बेदाग बन गयी है अब वहां
सच कहूं तो सारी यादें रह गयी है
जगह तो देख लेता हूँ पर तु मिलती कहाँ?
कैसे भूला दूँ, उस दिन को
जो पहली कॉल ही खास हो,
हंसी से शुरू हुई थी ये दास्ताँ...
अरमान भी था तुम हमेशा मेरे पास हो।
बातें करना और घूमना जो सिखाया तुमने
अब तक कहाँ भूल पाया हमने
अब भी हर उस जगह की पहचान होगी
जब तुम अपना हाथ मुझ पर दोगी
प्यार करना और थोड़ी लड़ना
इतना ही तो दास्तां था,
वो शहर भी अनजान था।
वो हर पल तो था हसीन
गलती मेरी हो या तेरी
आंख मेरा ही था गमगीन,
फिर भी मैं बेजुबाँ था
जब उस शहर से अनजान था।
अच्छी ख्यालों की ख्यालत हो तुम
मेरे नयनों के चैन हो तुम
मेरे जीवन के उस स्वर्ण सफर की,
हर क्यामत की इबादत हो तुम।
तुम्हारे बिना अब, बस अजनबी हूँ
तुम्हरी उस गली पर अब गुमनामी हूँ
अब उस गली में तुम्हारे जैसे हसीन कहाँ?
जाने के बाद मेरी खुशी का सीन कहाँ?
लेकिन...
तब भी तो मैं परेशान था
जब वो शहर से अनजान था।
मैं जहां हूँ वहां से तुम कोसों दूर हो
मानो अब मैं भी मजबूर हो
आयी तो थी इस कदर
जैसे साथ दोगी पूरे सफर,
सब मिल गया मिट्टी पर,जो भी पहचान था
वो शहर भी अनजान था।
वो शहर भी अनजान था।

- सूरजमल AKs


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बर्फ के बोझ तले

कोहरे की चादर लगती है बर्फ की तरह,
ठंडी हवाएं चल रही हैं, तूफ़ान की तरह।
पेड़ पौधे सब झुके हुए, बर्फ के बोझ तले,
सर्दियों का मौसम आया, ठंडक से लोग हाथ मले।

रातें लंबी और ठंडी, दिन छोटे और मंद,
कोहरे में सब कुछ लगता है जैसे सपने में बंद।
बाहर निकलना मुश्किल, घर में बैठे रहो,
गरम कप चाय का पीते रहो।

सूरज भी छिपा हुआ, बादलों की छांव में,
कोहरे की धुंध में, छुप गए सर्वोपने पड़ाव में।
सर्दियों का ये मौसम, कितना सुहाना है रंग,
गरमागरम पकौड़े, चलते अब चाय के संग।

ओस की बूंदें पत्तों पर, मोतियों जैसी गंग,
सर्दी की ठंडक, दिल को लगती है उमंग।
बर्फ की चादर में, सब कुछ है ढका हुआ संग,
सर्दियों का ये मौसम, कितना है सुहाना रंग।


- कै. डॉ. जय महलवाल अनजान


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आ गले लग जा तुम

आ गले लग जाओ तुम
कि याद बहुत आती हो तुम
हमदोनों ही एक ही है
तो फिर दूर क्यों खड़ी हो तुम?
तुम्हारे बगैर अब कोन है यहाँ, मेरा
एक तुम ही हो और तु ही सहारा
इस तरह अजनबी जैसी ना बनो तुम
अपने हो तु और दूजा ना हो तुम
खामोशी को तोडो अब तुम
दूर कर दो मन से शिकवे तुम
कह दो दिल की बाते अब,तुम
शांत रहकर मत तडपाओ मुझे तुम
एक भय सा जगा रखती हो मुझे तुम
खोने का डर जगाती हो मुझे, तुम
वक्त भी अच्छा है ये तो समझती हो तुम
आ गले लग आओ अब,तुम
कसम से,मेरे वादे को यकीन करो तुम
दूर ना जाऊंगा ,मानो मेरी बात तुम
गलती होती है सबो से, ये जानती हो तुम
लेकिन माफी भी तो होता है, ये मानती हो तुम
अब इतनी मुझे मत बैचेनी करो तुम
आ गले लग जाओ तुम


- चुन्नू साहा


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