साहित्य चक्र

28 March 2026

बुद्धिमान जीव क्यों नहीं बना पाया समानतामूलक समाज!


हम इंसान इस पृथ्वी के सबसे बुद्धिमान जीव हैं, जिसने लगातार विज्ञान के साथ-साथ अपने रहन-सहन और खान-पान का विकास किया है। आदिमानव से हमारी कहानी शुरू होती है और आज चंद्रमा, मंगल ग्रह तक हम पहुंच चुके हैं। विज्ञान से हमने अपनी दिनचर्या को इतना आसान बना लिया है कि हम अपना अकेलापन दूर करने के लिए विज्ञान का ही सहारा ले रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या विज्ञान हमारा विनाश का कारण तो नहीं बनेगा ?







विज्ञान में हम इंसानों का जीवन बहुत ही आसान बनाया है, मगर हमारे समाज में अमीरी-गरीबी की खाई लगातार गहरी होती जा रही है। रिश्तों में संवेदनाएं, आपसी भाईचारा और अपनापन शायद ही अब शायद ही दिखाई देता है। हम इंसान वक्त के साथ-साथ अपनी बुद्धि का विकास करते तो जा रहे हैं, मगर अपने समाज में समानता नहीं ला पा रहे हैं। आज भी अफ्रीका में क‌ई ऐसे देश हैं, जहां के नागरिक एक वक्त के खाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। वही अमेरिका और इंग्लैंड जैसे अमीर देश के लोग आराम से घर पर बैठकर खाना ऑर्डर करके खाते हैं। इतना ही नहीं बल्कि उनके पास इतना पैसा है कि उनकी 4-5 पीढ़ियां आराम से बैठकर खा सकती है।





जापान, चीन जैसे देशों में बुलेट ट्रेन चल रहे हैं जबकि अफ्रीका के कई ऐसे देश हैं जहां आज भी बिजली, पानी और यात्रा के लिए गाड़ी तक उपलब्ध नहीं है। अगर हम भारत की ही बात करें तो हमारे देश में अमीरी और गरीबी का फैसला इतना है कि गरीब, अमीर बनने का सपना तक नहीं देख सकता है क्योंकि उसके अमीर बनने के सारे रास्ते लगभग बंद है। शिक्षा जो मूलभूत अधिकारों में आती है, वह इतनी महंगी हो चुकी है कि गरीब का बच्चा सिर्फ साक्षर हो सकता है या अधिक से अधिक एक सरकारी नौकरी प्राप्त कर सकता है। देश के अधिकांश सरकारी नौकरी से एक गरीब सिर्फ अपनी रोजमर्रा की जरूरतों को दूर कर सकता है या अधिक से अधिक लोअर मिडल क्लास तक पहुंच सकता है। उसमें भी अगर उसकी आने वाली पीढ़ी को सरकारी नौकरी नहीं मिलेगी तो उसकी वह स्थिति और कमजोर हो जाएगी। ऐसे में सवाल उठता है- आखिर ऐसा क्यों हो रहा है ?




हम इंसानों द्वारा चंद्रमा और मंगल ग्रह पर जाना सब फिजूल है, जब तक हम अपने मानव समाज में समानता नहीं ला पाते हैं। आखिर हम ऐसा नियम क्यों नहीं बनाते हैं कि कोई व्यक्ति एक स्तर तक ही अमीर हो सकता है! और ऐसे में हमारे समाज में अमीर बनने की प्रतिस्पर्धा भी काम हो जाएगी। इतना ही नहीं बल्कि मानव समाज का जीवन चक्र भी बेहद आसानी से घूमता रहेगा और हम अपनी प्रकृति, नदियां और प्राकृतिक संपदा को भी इस विनाशकारी विकास के दौड़ से बचा पाएंगे। कही ऐसा ना हो कि इस विकास की दौड़ में हम स्वयं के लिए मौत का कुआं बना लें। वक्त रहते हमें बतौर बुद्धिमान मानव अपने समाज को समानता मूलक बनाने की कोशिश करनी चाहिए। हमने बहुत लड़ लिए युद्ध, बहुत बना ली संपत्ति और बहुत कमा लिया धन, मगर बतौर मनुष्य हम सभी आज भी सामान जीवन क्यों नहीं जी पा रहे हैं ?


                                                  - दीपक कोहली



बिख़री हुई ज़िंदगी, एक अंतहीन तलाश

मानवीय जीवन की विडंबना यह है कि हम इसे हमेशा सहेजने और समेटने की कोशिश में लगे रहते हैं, जबकि इसकी फि़तरत ही बिखर जाना है। ये पंक्तियाँ मेरे दिल को छू गईं,"कहाँ कहाँ से इकट्ठा करूँ तुझे, ऐ ज़िंदगी? जहाँ भी देखता हूँ, तू बिखरी हुई नज़र आती है"केवल शब्द नहीं, बल्कि उस अस्तित्वगत थकान की चीख-पुकार हैं, जो हर इंसान अपने भीतर महसूस करता है। जीवन कोई ऐसी वस्तु नहीं जिसे किसी संदूक में बंद किया जा सके, यह तो समय की बहती धारा है, जो अपने साथ यादों की किरचें, अधूरे ख़्वाबों के मलबे और रिश्तों की कतरनें छोड़ती जाती है। एक इंसान अपनी पूरी उम्र इस कोशिश में लगा देता है कि वह ख़ुद को "मुकम्मल" या पूर्ण कर सके, लेकिन सच्चाई यह है कि जिसे हम 'पूर्णता' समझते हैं, वह केवल एक मृगतृष्णा है।







​जीवन का यह बिखराव दरअसल उसकी व्यापकता का प्रमाण है। जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो हमें बचपन की बेफ़िक्री कहीं और बिख़री मिलती है, जवानी के जोश के निशान किसी और मोड़ पर छूटे होते हैं, और बुढ़ापे की संजीदगी किसी अलग कोने में बैठी नज़र आती है। हमारे दुःख, सुख, सफलताएँ और असफ़लताएँ,,ये सब अलग-अलग दिशाओं में फैले हुए हैं। शायर की यह बेचैनी कि वह इसे कहाँ-कहाँ से इकट्ठा करे, उस जद्दोजहद को दर्शाती है जहाँ मनुष्य अपनी बिखरी हुई पहचान को एक सूत्र में पिरोना चाहता है। हम चाहते हैं कि हमारे सभी प्रियजन एक साथ हों, हमारी सारी उपलब्धियाँ एक ही जगह दिखाई दें और हमारे मन की शांति अखंड बनी रहे, परंतु क़ुदरत का नियम हमें बिखेरता रहता है ताकि हम नए साँचों में ढल सकें।


​अंततः जीवन की सार्थकता इसे समेटने में नहीं, बल्कि इसके बिखराव को स्वीकार करने में है। जिस प्रकार आकाश में बिखरे हुए सितारे ही रात को सुंदर बनाते हैं, उसी प्रकार जीवन के ये बिखरे हुए अनुभव ही हमारी शख्सियत को गहराई और रंगत प्रदान करते हैं। यदि ज़िंदगी एक जगह सिमट कर रह जाती, तो इसमें न तो कोई खोज होती और न ही कोई नयापन। यह बिखराव ही हमें यह सिखाता है कि हम हर पल एक नई शुरुआत कर सकते हैं। इन शब्दों में यह संदेश छिपा है कि जीवन को उसकी संपूर्णता में जीने का अर्थ यह नहीं है कि उसे मुट्ठी में क़ैद किया जाए, बल्कि यह है कि उसके हर बिखरे हुए अंश में छिपी सुंदरता और सबक़ को महसूस किया जाए।


- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह





मेहनत का सम्मान करें: अगर खरीदने का इरादा नहीं है, तो किसी का समय बर्बाद न करें


आज के तेज़ रफ्तार जीवन में समय सबसे कीमती चीज़ों में से एक बन चुका है। फिर भी, हैरानी की बात है कि कई लोग दूसरों के समय और मेहनत की कद्र नहीं करते- खासकर दुकानों और शोरूम में। एक आम लेकिन अनदेखी आदत यह है कि लोग दुकानों में जाते हैं, स्टाफ से कई सामान निकलवाते हैं, सब कुछ बिखेर देते हैं और फिर बिना कुछ खरीदे चले जाते हैं। पहली नज़र में यह सामान्य लग सकता है। आखिरकार, चीज़ें देखना भी खरीदारी का एक हिस्सा है। लेकिन असली और बेवजह की गतिविधि के बीच एक बारीक अंतर होता है। जब ग्राहक बिना खरीदने की मंशा के दुकानदार से ढेर सारे कपड़े निकलवाते हैं, ज्वेलरी दिखवाते हैं या कई प्रोडक्ट्स दिखाने को कहते हैं, तो यह उनके प्रति असम्मान को दर्शाता है।






हर एक सामान के पीछे मेहनत छिपी होती है। दुकानदार और उनका स्टाफ घंटों लगाकर सामान को व्यवस्थित रखते हैं, ताकि ग्राहकों को एक अच्छा अनुभव मिल सके। जब बिना वजह सब कुछ अस्त-व्यस्त कर दिया जाता है, तो इससे उनका समय और मेहनत दोनों बर्बाद होते हैं- जो वे किसी वास्तविक ग्राहक की मदद में लगा सकते थे। इसके अलावा, यह व्यवहार शारीरिक और मानसिक रूप से भी थका देने वाला होता है। बार-बार कपड़े तह करना, शेल्फ़ ठीक करना और पूरे दिन बिखराव संभालना काफी मुश्किल हो जाता है। खासकर छोटे व्यापारियों के लिए, हर मिनट और हर संभावित ग्राहक बहुत महत्वपूर्ण होता है।






एक जिम्मेदार और समझदार ग्राहक बनना बहुत आसान है। अगर आप सच में कुछ खरीदना चाहते हैं, तो बेझिझक देखें, सवाल पूछें और समय लें। लेकिन अगर आपका खरीदने का कोई इरादा नहीं है, तो बेहतर है कि आप स्टाफ को बेवजह परेशान न करें। उनकी मेहनत का सम्मान करें, उनके समय की कद्र करें और उनके काम की गरिमा बनाए रखें। अच्छे संस्कार केवल शब्दों में नहीं, बल्कि हमारे व्यवहार में दिखते हैं। एक छोटी सी समझदारी किसी के दिन को बेहतर बना सकती है।

अंत में, सम्मान दो-तरफा होता है। जब हम दूसरों के समय और मेहनत की कद्र करते हैं, तो हम एक अधिक संवेदनशील, सभ्य और जिम्मेदार समाज की ओर कदम बढ़ाते हैं। “एक छोटा सा कदम- दूसरों के समय और मेहनत का सम्मान- पूरी दुनिया में बड़ा बदलाव ला सकता है। आज से शुरुआत करें, क्योंकि बदलाव हमेशा हमसे ही शुरू होता है।”



- डॉ. माधवी बोरसे सिंह इंसा



इच्छा मृत्यु: जीवन का नहीं, बल्कि पीड़ा का अंत करने की प्रक्रिया


सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद के युवक हरीश राणा की स्थिति को देखते हुए उसके माता-पिता को उसके लिए पैसिव यूथेनेशिया का विकल्प चुनने की अनुमति दी है। दिल्ली के एम्स में हरीश राणा को इच्छा मृत्यु देने की प्रक्रिया शुरू की गई है। उल्लेखनीय है कि पैसिव यूथेनेशिया एक चिकित्सा प्रक्रिया है, जो एक्टिव यूथेनेशिया से अलग होती है।

इसमें जीवनरक्षक और कृत्रिम उपचार बंद कर दिए जाते हैं और धीरे-धीरे मरीज का शरीर शांतिपूर्वक मृत्यु की ओर बढ़ता है। सामान्यतः भारत में इच्छा मृत्यु को अवैध माना जाता है और सुप्रीम कोर्ट भी इसे सामान्य रूप से अनुमति नहीं देता। यह एक अनोखा मामला है, जिसमें मानवीय आधार पर मरीज को जीवन से नहीं, बल्कि पीड़ा से मुक्ति दिलाने के लिए यह निर्णय लिया गया है।

गाजियाबाद के 31 वर्षीय हरीश राणा वर्ष 2013 से पर्सिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट यानी कोमा में हैं। 13 वर्ष पहले सिर में लगी गंभीर चोट के बाद से उन्हें होश नहीं आया और उनके मस्तिष्क की कार्यक्षमता भी सामान्य नहीं हो सकी। डाक्टरों का मानना था कि उनके ठीक होने की संभावना अत्यंत कम है।

परिवार ने लंबे समय तक उनकी देखभाल की, लेकिन लगातार 13 वर्षों के संघर्ष के बाद हरीश के साथ-साथ उनके माता-पिता और परिवार को भी शारीरिक, मानसिक और आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था। मरीज और उसके परिवार की इस पीड़ा को समाप्त करने के लिए यह निर्णय लिया गया।




सामान्यतः लोग इच्छा मृत्यु को जीवन समाप्त करने का अधिकार समझ लेते हैं, जिससे इस मुद्दे पर विवाद बढ़ जाता है। एक्टिव यूथेनेशिया यानी इंजेक्शन देकर जीवन समाप्त करना भारत में गैरकानूनी है। इसके विरोध में यह तर्क भी दिया जाता है कि भारत में इसकी अनुमति मिलने पर इसका व्यापक दुरुपयोग हो सकता है।

हालांकि कुछ देशों, जैसे नीदरलैंड, बेल्जियम, लक्जमबर्ग, स्विट्जरलैंड और ऑस्ट्रेलिया में एक्टिव यूथेनेशिया को कानूनी मान्यता दी गई है। वहां असहनीय पीड़ा से ग्रस्त मरीज इंजेक्शन लेकर अपने जीवन का अंत कर सकते हैं।

दूसरी ओर पैसिव यूथेनेशिया एक अलग प्रक्रिया है, जो डाक्टरों की निगरानी में ही होती है। इसमें लाइफ सपोर्ट सिस्टम या कृत्रिम पोषण व्यवस्था को हटा दिया जाता है। इसके बाद धीरे-धीरे मरीज की मृत्यु हो जाती है।

यह प्रक्रिया आसान नहीं होती। इसके लिए अदालत की अनुमति आवश्यक होती है और डाक्टरों की टीम मरीज की पूरी जांच के बाद अस्पताल में यह प्रक्रिया शुरू करती है। विशेषज्ञों के अनुसार इसमें हर कदम अत्यंत सावधानी से उठाया जाता है।





डाक्टर पहले मरीज की स्थिति का आकलन करके अदालत में रिपोर्ट प्रस्तुत करते हैं और उसके आधार पर अदालत आदेश देती है। देश में ऐसे हजारों मामले हैं, जिनमें सिर में चोट लगने के बाद मरीज लंबे समय तक बेहोश रहते हैं, लेकिन हर मामले में पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति नहीं दी जाती।

हरीश राणा के मामले में प्रक्रिया शुरू हो गई है, लेकिन उनकी मृत्यु कब होगी, यह निश्चित नहीं कहा जा सकता। डाक्टरों के अनुसार पोषण बंद होने के बाद मरीज कुछ घंटों, कुछ दिनों, पंद्रह दिनों या महीनों तक भी जीवित रह सकता है। धीरे-धीरे शरीर मृत्यु की ओर बढ़ता है और केवल दर्द कम करने वाली दवाएं दी जाती हैं, ताकि मरीज को पीड़ा महसूस न हो।

इस प्रकार पैसिव इच्छा मृत्यु केवल कानूनी ही नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना और नैतिकता से जुड़ा निर्णय भी है, इसलिए इसमें अत्यधिक सावधानी बरतनी पड़ती है। कुछ समय पहले कर्नाटक राज्य भी इस विषय को लेकर चर्चा में आया था। पिछले वर्ष कर्नाटक ने अपने नागरिकों को लिविंग विल बनाकर राइट टू डाई का अधिकार दिया था।

इस व्यवस्था के तहत कोई भी व्यक्ति अपनी लिविंग विल बनाकर यह लिख सकता है कि यदि वह किसी गंभीर या असाध्य बीमारी से पीड़ित हो जाए और जीवनरक्षक उपचार का कोई विकल्प न बचे, तो डाक्टर और अस्पताल उसके निर्णय का सम्मान करें।

विशेषज्ञों के अनुसार राइट टू डाई का अर्थ किसी को जीवन समाप्त करने के लिए प्रोत्साहित करना नहीं है, बल्कि असहनीय पीड़ा से जूझ रहे व्यक्ति को सम्मानपूर्वक मृत्यु का अधिकार देना है।

भारत जैसे देश में, जहां सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता है, वहां मृत्यु से जुड़े निर्णय अत्यंत संवेदनशील माने जाते हैं। कई धार्मिक मान्यताओं में मृत्यु को ईश्वर की इच्छा से जुड़ी प्रक्रिया माना जाता है। इसी कारण सरकारें और संस्थाएं इस विषय पर बहुत सावधानी से कदम उठाती हैं।

कई बार डाक्टर और परिवारजन भी ऐसे निर्णय लेने से हिचकते हैं, क्योंकि बाद में कानूनी विवाद उत्पन्न होने की आशंका रहती है। साथ ही कई अस्पतालों में इस तरह की प्रक्रिया को संभालने के लिए विशेषज्ञ और तकनीकी टीमों की भी कमी है।








पैसिव यूथेनेशिया और राइट टू डाई में अंतर-

इन दोनों अवधारणाओं को लेकर समाज में अलग-अलग मत हैं। देखने में दोनों स्थितियों में व्यक्ति का अंत होता है, इसलिए लोग इन्हें एक जैसा समझ लेते हैं। लेकिन वास्तव में दोनों में एक सूक्ष्म अंतर है। पश्चिमी देशों में कई मामलों में असहनीय बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को इंजेक्शन देकर जीवन समाप्त कर दिया जाता है, इसे एक्टिव यूथेनेशिया कहा जाता है।

जबकि राइट टू डाई में व्यक्ति पहले से ही अपने जीवन के अंतिम समय के बारे में निर्णय ले सकता है। वह लिखित रूप में बता सकता है कि भविष्य में यदि वह असाध्य बीमारी से पीड़ित हो जाए, तो वह किस प्रकार का उपचार चाहता है या नहीं चाहता। इसे ही लिविंग विल कहा जाता है। इसमें कृत्रिम मृत्यु देने की बात नहीं होती, बल्कि व्यक्ति को प्राकृतिक मृत्यु की ओर सम्मानपूर्वक जाने देने की व्यवस्था होती है।

इस स्थिति में भोजन, दवाएं या उपचार धीरे-धीरे बंद कर दिए जाते हैं और व्यक्ति को स्वाभाविक रूप से मृत्यु तक पहुंचने दिया जाता है। हालांकि आज भी भारत में यूथेनेशिया को सामान्यतः अपराध ही माना जाता है।



- वीरेंद्र बहादुर सिंह


लेखः जल है तो कल है

'जलमेव जीवनम्' (जल ही जीवन है) संस्कृत की प्रचलित सूक्ति जल के महत्त्व को दर्शाती है। प्राचीन ऋषियों ने जल के महत्त्व को स्वीकार करते हुए हजारों वर्षों पूर्व ही घोषणा कर दी थी-


'जलं हि जीवनस्य मूलं, नित्यं पातव्यं सुविशुद्धम्।
विना जले न तिष्ठेतु जगत्सर्वं सजीवनम्'।"


जिसका अर्थ है कि जल ही जीवन का मूल है, हमें हमेशा शुद्ध जल पीना चाहिए। जल के बिना यह संपूर्ण संसार नहीं टिक सकता।

और भी संस्कृत श्लोक में बताया गया है-

"पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नम् सुभाषितं।
मूढ़ै: पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा विधीयते।"






पृथ्वी पर तीन रत्न पाए जाते हैं: जल, अन्न और सुंदर वचन। पुराणों में जल को रत्न के रूप में अभिहित किया गया है। पृथ्वी पर सीमित मात्रा में पेयजल उपलब्ध है। पृथ्वी का स्थलीय भाग 30% है जबकि जल की उपलब्धता 70% से अधिक है; लेकिन इस 70% जल में से पीने योग्य जल महज 3% है। जबकि 97% जल महासागरों में है, जो खारा व अपेय है।

जल के स्रोत-

(i) जल के प्राकृतिक स्रोत: जल के प्राकृतिक स्रोत में नदियाँ, हिमनद, झीलें, तालाब, झरने, समुद्र और महासागर हैं। जिनमें ताजा जल के स्रोत- नदियाँ, झीलें व हिमनद हैं। खारे जल के स्रोत - समुद्र और महासागर हैं।

(ii) मानव निर्मित जल स्रोत: जल मानव निर्मित जल स्रोतों में कुएँ, ट्यूबवेल, बाँध, जलाशय, नहरें, चैक डैम आदि हैं।

3% पीने योग्य जल में 68.7% ग्लेशियर और ध्रुवीय बर्फ से उपलब्ध होता है, 30.1% भूजल (Ground Water) और 1.2% सतही जल (नदियों, झीलों) के रूप में उपलब्ध है।

जल की वर्तमान स्थिति-

UN-INWEH (United Nations University Institute for Water, Environment and Health) के द्वारा जारी वैश्विक जल दिवालियापन रिपोर्ट के अनुसार संपूर्ण विश्व जल दिवालियापन की ओर अग्रसर है तथा वैश्विक कृषि के लिए संकटोत्तर युग का संकेत दिया गया है।

जल दिवालियापन एक ऐसी स्थिति है जहाँ किसी क्षेत्र का जल उपयोग उसकी नवीकरणीय आपूर्ति (बारिश, नदियों) से लगातार अधिक होता है, जिससे भूजल भंडारण और पारिस्थितिकी तंत्र को अपरिवर्तनीय नुकसान होता है। दुनिया की आधी से ज्यादा झीलें 1990 के दशक से सिकुड़ रही हैं। कई नदियाँ अब समुद्र तक नहीं पहुँच पातीं।

1970 के बाद से 35% प्राकृतिक आर्द्रभूमियाँ (Wetlands) नष्ट हो चुकी हैं। विश्व की प्रमुख नदियां - सालवीन नदी, गंगा नदी ( दुनिया की 8% आबादी की जीवनरेखा), सिंधु नदी, मेकांग नदी, यांगत्से नदी, डेन्यूब नदी, रियो दे ला प्लाटा बेसिन, रियो ग्रांडे नदी, नील नदी और मरे- डार्लिंग बेसिन ये विश्व की प्रमुख नदियां आज खतरे में है।

हाल ही में 'विक्टोरिया झील' जो अफ्रीका की सबसे बड़ी व दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी मीठे पानी की झील है , इसके पानी में सायनोबैक्टीरिया के अत्यधिक प्रसार के कारण झील का पानी जहरीला हो रहा है जिससे लोगों के पेयजल और मछली उद्योग के लिए संकट खड़ा हो गया है। 2025 में भारत के सबसे स्वच्छ शहर 'इंदौर' (मध्य प्रदेश) में पेयजल के संदूषित होने के कारण स्वास्थ्य संकट उत्पन्न हो गया।






चिंताएँ और मुद्दे:- जल दिवालियापन के पैटर्न

(i) प्रणालीगत वैश्विक जल असुरक्षा- 4 अरब लोग प्रत्येक वर्ष कम से कम एक माह के लिए गंभीर जल अभाव का सामना करते हैं।

(ii) घटती जल भंडारण क्षमता और कृषि तनाव- वैश्विक कृषि भूमि का 50% से अधिक भाग मध्यम या गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त है जिससे मृदा की आर्द्रता धारण क्षमता घट रही है और मरुस्थलीकरण तीव्र हो रहा है।


(iii) दृश्यमान वैश्विक परिणाम:- नदियाँ महासागर तक पहुँचने से पहले ही सूख जाती हैं। झीलें और हिमनद संकुचित हो रहे हैं। अत्यधिक पंपिंग के कारण भूमि धँस रही है और भूजल स्रोत लवणीय हो रहे हैं। शहर 'डे ज़ीरो' परिदृश्य का सामना कर रहे हैं।

जल संकट के आर्थिक और मानवीय प्रभाव:- जल संकट के कारण सालाना 307 अरब डॉलर का आर्थिक नुकसान हो रहा है। लगभग 2 अरब लोग सुरक्षित पेयजल से वंचित हैं। भारत पर प्रभाव :- लगभग 60 करोड़ भारतीय 'उच्च जल तनाव' (Water Stress) का सामना कर रहे हैं। भारत के पास विश्व की 18% आबादी है, लेकिन केवल 4% मीठे जल के संसाधन हैं।

भारतीय केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय ने "गतिशील भूजल संसाधन आकलन रिपोर्ट 2025" जारी की है- गतिशील भौमजल ( Dynamic Ground Water ) संसाधन का आकलन केंद्रीय भूमिजल बोर्ड (cgwb)तथा राज्यों/ संघ राज्य क्षेत्र द्वारा संयुक्त रूप से किया गया है






रिपोर्ट एक नज़र:- वार्षिक भौमजल का पुनर्भरण (Recharge): कुल वार्षिक भौमजल पुनर्भरण 448.52 बिलियन क्यूबिक मीटर (BCM) आंका गया है। यह वर्ष 2024 के 446.9 BCM की तुलना में आंशिक वृद्धि दर्शाता है।

भौमजल का दोहन:- दोहन योग्य वार्षिक भौमजल संसाधन बढ़कर 407.75 BCM हो गए हैं। वर्ष 2024 में इसकी मात्रा 406.19 BCM थी। वर्ष 2025 के लिए देश भर में कुल वार्षिक भौमजल दोहन की मात्रा 247.22 BCM आकलित की गई है। भौमजल दोहन का स्तर: देश में दोहन योग्य उपलब्ध कुल भौमजल संसाधन में से लगभग 60.63% भौमजल का प्रत्येक वर्ष उपयोग किया जा रहा है। इसमें सभी क्षेत्रों में उपयोग शामिल है।

आकलन इकाइयों का वर्गीकरण:- देश में कुल 6746 आकलन इकाइयाँ हैं। इनका वर्गीकरण निम्न प्रकार है:-

73.4% इकाइयाँ - सुरक्षित (SAFE)
10.5% इकाइयाँ - अर्ध संकटग्रस्त (SEMI CRITICAL)
3.05% इकाइयाँ - संकटग्रस्त (CRITICAL)
11.1% इकाइयाँ - अत्यधिक दोहित (OVER-EXPLOITED)


अत्यधिक दोहित इकाइयों का क्षेत्रीय संकेंद्रण:-

उत्तर-पश्चिम भारत: (पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश)
पश्चिम भारत: (राजस्थान, गुजरात)
दक्षिण भारत: (कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश)
1.8% इकाइयाँ- लवणीय (Saline)

रिपोर्ट में भूजल आकलन श्रेणियों की परिभाषा:- अत्यधिक दोहित (Over-Exploited): जहाँ भूजल का दोहन स्तर वार्षिक पुनर्भरण (Recharge) से अधिक है। अर्ध संकटग्रस्त (Semi-Critical): जहाँ उपलब्ध वार्षिक भूजल दोहन योग्य संसाधनों का 70-90% उपयोग (दोहन) कर लिया जाता है।

संकटग्रस्त (Critical): जहाँ उपलब्ध वार्षिक भूजल दोहन योग्य संसाधनों का 90-100% उपयोग कर लिया जाता है। सुरक्षित (Safe): जहाँ उपलब्ध वार्षिक भूजल दोहन योग्य संसाधनों का 70% से कम उपयोग किया जाता है।

भूजल दोहन में राजस्थान की स्थिति (कुल 302 ब्लॉक):-
अति दोहित ब्लॉक- 214
संवेदनशील / संकटग्रस्त- 27
अर्ध संवेदनशील- 21
सुरक्षित ब्लॉक- 37
लवणीय ब्लॉक- 3






जल संकट का समाधान व मुख्य सुझावः- जो अमूल्य और सीमित थाती हमें हमारे पूर्वजों से मिली (जल, वन, वनस्पति) उसे हमारी भावी पीढ़ियों को सौंपना हमारा दायित्व भी बनता है और धर्म भी। उक्त रिपोर्ट के अनुसार आज विश्व 'भयंकर जल संकट' का सामना कर रहा है। अब हमें 'संकट प्रतिक्रिया' के बजाय 'जल प्रबंधन' पर ध्यान देना होगा। उपलब्ध जल का उचित उपयोग ही करना होगा, अन्यथा वे दिन दूर नहीं जब समूचा विश्व 'जल युद्ध' लड़ रहा होगा।

भूजल को सामूहिक धरोहर मानना होगा। इस पर केवल अपना ही अधिकार नहीं है, यह धरोहर उनके लिए भी सुरक्षित रखनी होगी जो अभी मौजूद ही नहीं हैं। पानी के पुनर्चक्रण (Recycling) को बढ़ाना होगा। वैश्विक स्तर पर काम कर रही संस्थाओं को न केवल रिपोर्ट जारी कर 'इतिश्री' कर लेनी होगी; बल्कि जल संरक्षण हेतु कठोर कदम उठाने होंगे, सरकारों को कड़े फैसले लेने होंगे।

हर व्यक्ति को एक जिम्मेदार नागरिक बनकर जल का अनुचित प्रयोग न करके उसका सदुपयोग करना होगा। जिसमें उसके दैनिक दिनचर्या के समस्त क्रियाकलापों से लेकर अपने दायित्व के रूप में अत्यधिक पौधारोपण, जल स्रोतों के रखरखाव संबंधी आदतों को जीवन में अनुस्यूत करना होगा। राजस्थान द्वारा जल शक्ति अभियान: कैच द रेन,रिज टू वैली जैसे जल संरक्षण प्रयासों को मॉडल के तौर पर अपनाकर जल संरक्षण किया जा सकेगा। वरना रहीम जी के अनुसार 'बिन पानी सब सून' ही रह जाएगा।


" यूं तो धरा पर जल ही जल है,
पर उसमें भी 'अपेय' प्रबल है।
बिन जल सब जीव विकल है,
सनद रहे -"जल है तो कल है।"



- वीरदत्त गुर्जर