*****
नारी शक्ति, स्वाभिमान और संस्कार
तुम में अदिति का धैर्य, और सती सा पावन तेज है,
तुम दुर्गा की हुंकार हो, जिसमें अधर्म का परहेज है।
कभी सीता बन तुमने प्रेम की कठिन अग्नि को झेला,
कभी काली बन अकेले ही असुरों के दल को धकेला।
आज के इस युग में, तुम फिर वही हुंकार भरो,
अन्याय अगर हो खुद के साथ, तो तुम न जरा डरो।
दबना नहीं, झुकना नहीं, खुद की पहचान बचानी है,
अहिल्या की पाषाण चेतना, अब फिर से जगानी है।
गर पा लिया है ऊँचा कद, और धन की तुम अधिकारी हो,
आधुनिकता की दौड़ में, तुम अगर सबसे भारी हो-
पर याद रहे, अनुसूया ने भी मर्यादा को पाला था,
त्याग और सेवा से ही, घर का आंगन उजाला था।
पति अगर हो कमतर तुमसे, फिर भी मान न घटने देना,
अहंकार के विष से अपने, मधुर रिश्तों को न कटने देना।
सास-ससुर भी माता-पिता हैं, उनका तुम सम्मान करो,
बेवजह तंग कर किसी को, न अपना घर श्मशान करो।
शक्ति भी तुम, भक्ति भी तुम, तुम ही प्रेम की मूरत हो,
मर्यादा और स्वाभिमान की, तुम सबसे सुंदर सूरत हो।
बधाई हो तुम्हें आज, इस नारी शक्ति के उत्सव की,
तुम आधार हो इस सृष्टि का, और गरिमा हो भविष्य की।
- देवेश चतुर्वेदी
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शक्ति, समर्पण, शौर्य की परिभाषा हो
हे नारी! तुम चीर बचा लो,
हे नारी! तुम आंखों का नीर बचा लो,
करे जो कोई दुस्साहस
तुम्हारी गरिमा को चोट पहुंचाने का,
तुम निज आंचल का क्षीर बचा लो,
हां, तुम हकदार हो चूड़ी की खन-खन की,
हां, तुम हकदार हो पायल की छम-छम की,
चूल्हा-चौका, ड्योढ़ी,
आंगन सब तुम संसार का आधार हो ,
तुम ग्रहणी, तुम अध्यापिका, तुम सैनिक,
तुम पायलट, नहीं तुम कभी भी लाचार हो,
ममता का अभियान भी तुम,
श्रद्धा शौर्य का गान भी तुम,
हे नारी! तुमने तो मुरलीधर तक को भी नाच नचाया है,
जब-जब पड़ी विपदा धरा पर तुमने शक्ति रूप दिखाया है,
इंसानों की तो बात ही छोड़ो,
तुमने तो ब्रह्मा, विष्णु, महेश को भी गोदी खिलाया है,
तुम्हारे बिना अधूरा यह ब्रह्मांड है,
तुमसे ही तो युगों की शान है,
संस्कार व अधिकारों की अभिलाषा हो,
हां तुम, शक्ति, समर्पण, शौर्य की परिभाषा हो।
- रचना चंदेल 'माही'
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दुर्गा सी तलवार उठाए, राक्षसों का संहार करे।
नारी शक्ति, ज्योति जलाए जो दीप अंधेरों में,
माँ की गोद सी सहलाए, हर दर्द के घाव भरे।
सीता सी त्याग सिखाए, वनवास में भी मुस्काए,
दुर्गा सी तलवार उठाए, राक्षसों का संहार करे।
खेतों में बहाए पसीना, घर को स्वर्ग बनाए जो,
स्कूल में सपने संवारे, बेटियों संग उड़ान भरे।
थके नहीं वो दौड़ दौड़ कर घर का सारा कम करे,
छुट्टी हो या इतवार बेचारी न फ़िर भी विश्राम करे।
"इंदिरा" सी अडिग रहे, विश्व पटल पर झुक न पाए,
"लता"सी स्वरों को बाँध ले,करोड़ों दिल पर राज करे।
होली रंगों में बने राधिका ,गरबे में संग संग नृत्य करे,
योग आसन सिखलाए,आयुर्वेद का अमृत पान करे।
संघर्ष की अग्नि में तपे,बने जो सोना शक्ति अपार करे,
जहाँ नारियों की पूजा होती, वहाँ देव भी निवास करे।
नारी शक्ति शाश्वत,अमर रहे प्रण ये मुश्ताक करे,
भारत माँ की कोख से जन्मी, ज्योति, चारों ओर करे।
- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह
*****
हे मानव!
जब तुमने मानवता
की परिभाषा गढी होगी
तो जरूर
तुम्हारे सामने मुस्कुराती
कोई स्त्री भी खड़ी होगी।
प्रकृति ने
जब रखी होगी
जीवन गति की आधारशिलाएं
निश्चित रूप
से बराबर खड़ी
होगी महिलाएं।
रचे
जब तुमने
अनेक सभ्यताएं
व संस्कृतियाँ
फिर
आज क्यों हैं
स्त्री पुरुष के बीच
अनेक विकृतियाँ?
प्रत्येक
पुरुष अधूरा है
स्त्री के बिन
बिन
पुरुष के कहाँ
पूरे होते स्त्री के भी दिन
सिर्फ
दो नस्ले हैं
नर और मादा।
कितना भी प्रयास
कर लो रहोगे
एक दूसरे के बिन आधा
जीवन
समर में बराबर की
सहभागी है स्त्री
पुरुषत्व
तभी पूर्ण हुआ है
जब जागी है स्त्री
सृष्टि का
सिंगार पुरुष अकेले
नहीं कर सकता.
स्त्री के बिना एक
ढेले नहीं धर सकता।
कवि
ने भी नहीं लिखा
केवल सोहन मोहन
सब हँसने लगते
देख कर राजू राधा
का सम्मोहन.
जब तक नर
भारी रहेगा नारी पर
समता के बीज
कहाँ रोपोगे
जीवन क्यारी पर.
पुरुष
जब जब लौटा है
जीवन से थक हार कर।
थकान भी
लहालोट हुई है
उसकी एक मुस्कान पर.
स्त्री की
मुस्कान के साथ
पुरुष जब घर से
निकला है
काम पर.
खुद को
पाया है सदैव
सबसे ऊँचे
मुकाम पर.
ना तो
स्त्री केवल आँगन है
और
न केवल
पुरुष सिवान
एक दूजे
के बिन जीवन
बना रहता है
वियावान।
मिटा कर
हर लैंगिक भेद
करो हर यात्रा आरंभ
न स्त्री
अहंकार में डूबे
ना पुरुष
भरे पुरुषत्व का दम्भ
जीवन पर
जितना पुरुष का
उतना ही
स्त्री का अधिकार।
हिमालय सँग
सागर भी मुस्कुराए
देख कर
स्त्री और पुरुष का
सह अस्तित्व और प्यार.
हे मानव
हर भेद भस्म करो,
करो हर चट्टान चूर्ण।
विकास तभी
होगी मानवता की
परिभाषा पूर्ण।
- राधेश विकास
*****
“नारी- ज्वाला, जयी, जागृति”
वह अबला नहीं, वह ज्वाला है,
वह केवल कथा नहीं, वह हाला है।
अन्यायों के दुर्ग गिरा दे,
वह प्रलय नाद की ज्वाला है!
जिसने जग को जन्म दिया है,
वह क्यों भय से सिर झुकाए?
जिसकी रग-रग में दुर्गा बहती,
वह क्यों आँसू आँख सजाए?
वह दुर्गा बन रण में उतरे तो
असुरों का अस्तित्व मिटे,
वह रानी लक्ष्मीबाई बनकर गरजे तो
साम्राज्यों के सिंहासन हिलें!
वह श्रम है, वह शक्ति है,
वह संकल्पों की भक्ति है,
वह नभ छूने का साहस है,
वह इतिहासों की सृष्टि है!
जो बंधन बाँधेंगे पग में,
वह जंजीरें तोड़ देगी,
जो दृष्टि उठेगी तिरस्कार की,
वह दृष्टि भी मोड़ देगी।
अब नारी मौन नहीं रहेगी,
वह अपने अधिकार लिखेगी,
हर क्षेत्र, हर मंच, हर पथ पर
विजय-पताका स्वयं फहरेगी!
उठो, प्रखर बनो, स्वर दो!
अन्यायों को ललकार दो!
“जागृति” की ज्वाला बनकर,
सारिका सा विस्तार दो!
हे नारी! तुम स्वयं शस्त्र हो,
अब अपने सामर्थ्य का विस्तार दो!
- डॉ. सारिका ठाकुर 'जागृति'
*****
आधी आबादी को नमन
नारी, तू हो नारायणी,
माँ हो, तू हो कल्याणी।
हो तु जगत जननी,
सबो की, आनंददायिनी।
तेरे हर रूपों की कहानी,
देखे है, और है सुनी।
माँ रूप मे ममतामयी बनी,
बहन बनी तो, रक्षकवाहिनी।
सुता रूप मे आनंददायिनी।
तो बनी कभी तू, अर्द्धांगिनी।
सब रूपों में, छायी तू,
हर रूप में, भायी तू।
तेरे ही से सृष्टि बनी,
यही तेरी है, कहानी।
आधी आबादी तेरी भी है,
सभी जगह में, अब तू भी है।
गाड़ी के पहिये के समान,
तेरी बनी है, अब पहचान।
एक के बिना दूजे का काम,
रूक जाती है, ये लिये मान।
आदरणीया, पूजनीया बनी,
नमन करे, तुझे सभी ज्ञानी।
- चुन्नू साहा
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नारी साहस ही तो जग में नारी सम्मान
नहीं अबला नारी, नारी शक्ति की पहचान।
ममता की धारा है नारी, दृढ़ता की मिसाल
उसकी हिम्मत के आगे हर मुश्किल बेहाल।
कभी माँ बन कर जग को जीवन देने वाली
सृजनकर्ता हैं नारी, इस जग का आधार।
कभी बेटी बनकर हर आँगन को महकाती
बहन रूप में स्नेह के दीप सदा ही जलाती।
देकर आशीष सदा ममता लुटाने बाली स्त्री
पत्नी बनकर जीवन पथ को सरल बनाती।
अन्याय की आँधी से, संसार में छाए बदहाली
नारी ही दुर्गा बन जाए, रण में कहलाए काली।
कलम उठाए तो, नारी नया ही इतिहास रचाए
अपने साहस से हर बंधन से नारी ने मुक्ति पाली।
जिस घर में नारी का, सम्मान पुष्प खिला रहेगा
वहाँ सुख का हर दीप सदा ही, प्रज्वल होता रहेगा।
इस समाज में, नारी सशक्त हो, हो प्रतिभाशाली
तभी भविष्य भी उज्ज्वल होगा, गरिमामय होगी नारी।
- आशी प्रतिभा
*****
उदारमना नारी
ईश की सुन्दर रचना है ये,
जग का इससे पूर्ण श्रृंगार।
सारी सृष्टि की ये धूरी,
मानव हित के लिए जरूरी।
शक्ति का ये दूजा रूप,
ममता का है सहज स्वरुप।
जननी है संपूर्ण जगत की,
अखिल विश्व ब्रह्मांड सहित की।
नारायण की रचना नारी,
देखन में लागे छवि न्यारी।
धरा-धाम पर जब ये आयी,
सृष्टि में उजियारी छायी।
माँ बनकर पयपान कराती,
बने बहन संग हँसती गाती।
नानी बनकर कथा सुनाती
परीलोक की सैर कराती।
दादी बनकर प्रेम लुटाती,
अनुशासन का पाठ पढ़ाती।
बनकर ये जीवन की साथी,
हर सुख-दुःख में साथ-निभाती।
जब-जब बेटी रूप में आती,
सेवा करती है दिन-राती।
नारी में ही नर की खान है,
नारी नर का स्वाभिमान है।
नारी का हर रूप है प्यारा,
हर रिश्ता लगता है न्यारा।
त्याग की देवी सीता भी है,
प्रेम की रानी राधा भी है।
पाँच पति की पंचाली है।
चक्षुबन्ध ये गन्धारी है।
सती महान अनुसूया है।
पत्थर बनी अहिल्या माँ है।
भक्ति प्रेममय मीराबाई,
हो चाहे थे लक्ष्मी बाई।
कहो इसे रजिया-सुल्तान,
या मानो कल्पना महान।
नारी का अतीत गौरवमय।
पर भविस्य है अंधकारमय।
गर्भों में यह मारी जाती।
जीवन का सुख जान न पाती।
बेटी सर का बोझ हो रही।
मात-पिता की रोग हो रही।
अपनों द्वारा जाती मारी।
मातु-पिता-दादी हत्यारी।
इन पर गर न रोक लगी तो,
सारी धरा बिलट जाएगी।
निज के हाथों ही खुद नारी,
स्वयं को ठगा हुआ पाएगी।
- प्रीतम कुमार पाठक
*****
अधिकार
नारी स्वयं का अधिकार ढूंढती है।
पूरा नहीं आधा आकाश चाहती है।
सिर्फ आधी धरती मांगती है।
हवा पानी रोशनी सब कुछ
सिर्फ आधा ही चाहती है।
अगर चाहो तो बदले में
आधा पिंजरा आधी घुटन
सबसे बांट सकती है।
नारी अधिकार के साथ साथ
आधा कर्तव्य आधी जिम्मेदारी
भी लेना चाहती है।
नारी चाहती है
केवल उतनी ही समानता,
जितनी उसे प्रकृति से मिली है।
अगर पिता नर है तो नारी मां
बेटा है तो वो बेटी
भाई है तो वो बहन
पति है तो वो पत्नि
प्रेमिक है तो वो प्रेमिका।
नर शिक्षक है तो नारी शिक्षिका।
अपनी क्षमताओं के आधार पर
नारी अधिकार ढूंढती है स्वयं का।
- सुतपा घोष
*****
मैं एक नारी हूँ,
सच में थक जाती हूँ कुछ आडंबर से,
हर व्रत, हर मन्नत, हर पकवान,
क्यों बंधे हों सिर्फ पुरुष के नाम?
क्या चाहती है ये दुनिया,
हम बन जाएं उनके "AI" समान,
जहाँ हर स्विच उनकी "हाँ" पर टिके,
हर रंग, हर विचार उन्हीं से सजे।
पर क्यों सीमित कर देते हो हमें,
उनके इर्द-गिर्द की परिधि में?
हम भी चुन सकते हैं अपना रंग,
अपना ढंग, अपनी दुनिया का संग।
हम हैं स्वच्छंद विचार,
हमारी सोच है गहरी धार,
जो परंपरा को चुनौती दे,
और सफलता की राह खुद गढ़े।
मैं नारी हूँ-
बंधन नहीं, स्वतंत्रता हूँ,
अनुकरण नहीं, सृजन हूँ
सिर्फ सहचर नहीं,
बल्कि अपनी पहचान हूँ।
- अंशिता त्रिपाठी
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नारी की जीवन-यात्रा
नन्हीं सी कली बनकर आई,
सपनों की दुनिया संग लाई।
हँसी में छुपे थे कितने डर,
फिर भी हर पल मुस्कुराई।
बचपन में सीखी सहना उसने,
हर छोटी-बड़ी कठिनाई।
पर हिम्मत उसकी दीपक जैसी,
अंधेरों में भी जगमगाई।
यौवन आया, जिम्मेदारी आई,
कंधों पर घर-परिवार सजाया।
अपने सपनों को चुपके रखकर,
सबके सपनों को सच बनाया।
कभी माँ बनकर ममता बरसाई,
कभी बेटी बनकर घर महकाया।
अपने दर्द को दिल में रखकर,
सबको खुशियों से सजाया।
समय के संग बाल हुए चाँदी,
चेहरे पर झुर्रियों की लकीरें आईं।
पर साहस उसकी पहचान रहा,
जीवन भर उसने हार न मानी।
नारी केवल एक नाम नहीं,
यह शक्ति, प्रेम और त्याग की कहानी है।
बचपन से लेकर बुढ़ापे तक,
वह साहस की अमर निशानी है।
- बीना
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चालीस पार
हम बढ़ती उम्र की औरतें
क्या चाहती हैं,
शायद थोड़ा बेबाक़ होना चाहती हैं,
डर थोड़ा कम हो जाता हैं,
प्यार बेहिसाब चाहती हैं
सभी मरी हुई ख्वाहिशों को फिर से पूरा करना चाहती हैं,
फिर से आज़ाद घूमना चाहती हैं ,
बेपरवाह होना चाहती हैं
अपने माँझी पर पूरा एतबार चाहती हैं
हम बढ़ती उम्र की औरतें
आँखो में आँखें डालकर बात करना चाहती हैं
शर्मो हया का लबादा दूर फ़ेक
उन्मुक्त होना चाहती हैं
झूठा दिखावटी आइना और नहीं
ख़ुद की स्वतंत्रता के साथ तुम्हें भी स्वतंत्र करना चाहती हैं
फिर से वही मासूम प्यार चाहती हैं
जहाँ देह का भान ना हों
हो पूर्ण समर्पण ,हो एक विश्वास
शिकवे शिकायतें ना हों,
प्रश्नों की बौछार ना हो
शायद वो गहरी अमावस की रात चाहती हैं ॥
अंतर्मन में गहरी पैठ लगाये अवसादों
से निकलना चाहती हैं,
सबकी अपेक्षायें ना हो उससे,
कोई उसके लिए भी कुछ कर गुज़रे
एक ऐसा रिश्ता ख़ास चाहती हैं,
ज़िंदगी को मुट्ठी में समेटना चाहती हैं ,
सारे इन्द्रधनुषी रंग इनमें भरना चाहती हैं,
आँखों में बचपन की फिर से वही चमक चाहती हैं,
पचपन में भी सोलह सा दिल चाहती हैं,
हम बढ़ती उम्र की औरतें
फिर से उमंगों पर मचलना चाहती हैं
जिसे बंद कर दिया था किसी कोने में
आज फिर उसी कोने को साफ़ करना चाहती हैं।
रिमझिम बरसती बूँदों में अरगनी पर
सूखते कपड़ों को लाना नहीं चाहती,
किचन में खड़े होकर पकौड़े भी नहीं बनाना चाहती,
अब वो ख़ुद भीगना चाहती हैं
भीगे हुए कैशों को तुम लपेट दों
एक तोलियाँ में,
अब वो ख़ुद अपनी फ़िक्र करवाना चाहती हैं,
हम बढ़ती उम्र की औरतें
क्या चाहती हैं,
- डॉ. अर्चना मिश्रा
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मैं एक नारी- आस्था, विश्वास और कर्म
आस्था मेरी चुप प्रार्थना है,
जो आँखों में दीप जलाती है,
विश्वास मेरी मौन शक्ति है,
जो टूटकर भी मुस्काती है।
कर्म मेरे हाथों की रेखा नहीं,
मेरे हाथों का संकल्प है,
जो गिरकर फिर उठना सिखाए,
वही जीवन का विकल्प है।
मैं जानती हूँ प्रतीक्षा क्या है,
संघर्ष की हर एक धड़कन,
कर्म ने ही मुझे सिखाया है,
आँसू भी बन सकते हैं स्वप्नन।
विश्वास ने जब थामा साथ,
डगमग पाँव भी चल पड़े,
आस्था ने जब सिर रख दिया,
तो कांटे भी फूलों में ढल पड़े।
मैं नारी हूँ- पर कमजोर नहीं,
मेरी शक्ति मेरा श्रम है,
आस्था मेरी साँसें हैं,
विश्वास मेरी पहचान है।
मैं माँ हूँ और बेटी भी,
मैं सृजन और संस्कार हूँ,
कर्म पथ पर चलकर ही,
मैं स्वयं अपनी पहचान हूँ।
नूतन कहती है सब नारियों से-
न केवल मानो, न केवल चाहो,
अपने कर्म को पूज्य बनाओ,
आस्था रखो, विश्वास जगाओ,
और अपना भाग्य स्वयं रच जाओ।
क्योंकि- नारी जब कर्म में ढल जाती है,
तो आस्था स्वर बन जाती है,
विश्वास इतिहास रचता है,
और दुनिया नई कहानी गढ़ जाती है।
- नूतन गर्ग
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नारी के बारे में
कभी फुर्सत मिले तो
पढ़ लेना
रसोई के गणित से परे
नारी के बारे में।
जो संघर्षरत जीवनपर्यंत
पढ़ लेना
बिस्तर की बायोलॉजी से परे
नारी के बारे में।
कभी इत्मीनान से
पढ़ लेना
तन के भूगोल से परे
नारी के बारे में।
कुछ तो है, जो है खास
पढ़ लेना
भीतर का खौलता इतिहास
नारी के बारे में।
कभी ठहराव के साथ
पढ़ लेना
खुली जुल्फों की हिंदी से परे
नारी के बारे में।
सहनशक्ति को परिभाषित
पढ़ लेना
संस्कृत सी संस्कृति से परे
नारी के बारे में।
अगर पढ़ पाओ तो
पढ़ लेना
माथे की बिंदी से परे
नारी के बारे में।
विभिन्न परिस्थितियों में निखरती
पढ़ लेना
हँसी के पीछे के दर्द से परे
नारी के बारे में।
तब जान पाओगे
नारी का मान-सम्मान
अगर नहीं,
तो तुम्हारी स्नातक-स्नातकोत्तर की पढ़ाई-
सब व्यर्थ है, निश्चित ही व्यर्थ है भाई।
- राघवेंद्र प्रकाश 'रघु'
*****
स्त्रियां विरोध नहीं करती
नित दिन प्रताड़ित होती हैं, खंडित होती हैं ,
हमेशा शोषित होती हैं और दंडित होती हैं ,
बांध कमर पर पट्टा जिम्मेदारियां वहन करती हैं,
फिर भी प्रताड़ना का प्रतिरोध नहीं करतीं
ये सच है कि स्त्रियां विरोध नहीं करतीं।
खुद के अस्तित्व के लिए कभी सवाल नहीं करतीं,
सिंहासन मिले या वनवास मलाल नहीं करतीं,
लक्ष्मण रेखा के अंदर खुद को समाहित किए,
अपनी आजादी के लिए कभी क्रोध नहीं करतीं,
ये सच है कि स्त्रियां विरोध नहीं करती।
अपनी तृष्णा , आकांक्षा , हृदय में ही मार लेती हैं
समस्त जीवन रिश्तों की बेड़ियों में गुजार लेती हैं ,
इज्जत और सम्मान के लिए खुद की कुर्बानी देकर
पिता के घर जाने का कभी अनुरोध नहीं करतीं,
ये सच हैं कि स्त्रियां विरोध नहीं करतीं।
सशक्त है, सबल है, आत्मनिर्भर और संस्कारी भी,
दुर्गा है, सीता है, काली है और बेचारी भी!
हाथ से कलम का शस्त्र भी चलाना जानती है,
मगर अन्याय के विरुद्ध अवरोध नहीं करतीं,
ये सच है कि स्त्रियां विरोध नहीं करतीं।
जिस दिन वो विरोध करेंगी, शोषण नहीं होगा,
अपराधों का समाज में पोषण नहीं होगा,
क्यूं अपने अधिकारों पर ये शोध नहीं करतीं ?
ये सच हैं कि स्त्रियां विरोध नहीं करतीं।
- मंजू सागर
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नकली सी मुस्कुराहट लिए
सबको बहलाती रही.
डरे सहमे से दिल को,
हिचकिचाहट में सहलाती रही.
बहुत दिया प्यार औरों को,
ख़ुद को इसी क्रम में खो सा दिया था.
ख़ुद को छोड़, बाकी सबको,
खूब सा दिलासा दिया था.
बिना makeup के भी जो अब
खूबसूरत सी लग रही हूँ,
हां ये प्यार ही है,
जो अब खुद से भी कर रही हूँ.
सबको समझा, बहाने दिए,
गलतियों को उनके सिरहाने दिए.
दरवाजों के पीछे, क़िताबों के नीचे,
आंसुओं को जाने दिए.
कहते थे सब, खोई खोई सी रहती हो,
अगर मन में कोई बात है,
क्यों नहीं किसी से कहती हो.
हकीक़त में तो मैं खुद भी नहीं थी,
या तो उन अनकहे बातों में,
या अनिश्चित कल में कहीं थी!
अब जो सब समझ आने लगा है,
मन मेरा आज को अपनाने लगा है.
ख़ुद पर भरोसा, और वक़्त पे यकीं,
काफ़ी अरसे के बाद फिर से गहराने लगा है...
- भाग्यश्री मिश्रा
*****
नारी दिवस की ज़रूरत नहीं
अच्छा लगा था
जब बॉस ने बिना कहे,
बिना जताए, बिना बताए
ऑफिस की मेज़ पर
सेलिब्रेशन का एक बड़ा पैक
चुपचाप रख दिया था,
ये भावनात्मक रिश्ता
दिल से निकल कर
सीधे दिल तक पहुँच गया
बस इतना ही तो चाहिए।
और बस…
हो गया नारी दिवस।
उफ़्फ… आज बहुत देर हो गई,
कब सुबह हो गई पता ही नहीं चला।
उन्होंने खिड़की से आती धूप को
बड़े करीने से
एक मोटी-सी चादर से ढक दिया,
ताकि मेरी नींद
ज़रा और ठहर सके।
आँखें भर आती हैं…
हम सच में
इतने से ही खुश हो जाते हैं।
कोई आडंबर नहीं,
कोई शोर नहीं
बस इतनी-सी ही तो बात है।
आज काजल नहीं लगाया तुमने,
दो भौंहों के बीच
वो छोटी-सी बिंदी भी नहीं।
क्या हुआ-उदास हो क्या?
बस इतना पूछ लेना ही
काफी होता है
वरना हम तो
इतनी-सी केयर पर भी
पागल हो जाते हैं।
सच कहूँ
अगर ऐसे छोटे-छोटे स्नेह
हर दिन मिलते रहें,
तो फिर किसी
महिला दिवस की
ज़रूरत ही नहीं।
स्त्री आधारशिला है सृष्टि की
उसे दिवस की जरूरत नहीं
जरूरत है बदलते हुए
भावनात्मक पर दृष्टि की।
अच्छा लगा था
जब बॉस ने बिना कहे,
बिना जताए, बिना बताए
ऑफिस की मेज़ पर
सेलिब्रेशन का एक बड़ा पैक
चुपचाप रख दिया था,
ये भावनात्मक रिश्ता
दिल से निकल कर
सीधे दिल तक पहुँच गया
बस इतना ही तो चाहिए।
और बस…
हो गया नारी दिवस।
उफ़्फ… आज बहुत देर हो गई,
कब सुबह हो गई पता ही नहीं चला।
उन्होंने खिड़की से आती धूप को
बड़े करीने से
एक मोटी-सी चादर से ढक दिया,
ताकि मेरी नींद
ज़रा और ठहर सके।
आँखें भर आती हैं…
हम सच में
इतने से ही खुश हो जाते हैं।
कोई आडंबर नहीं,
कोई शोर नहीं
बस इतनी-सी ही तो बात है।
आज काजल नहीं लगाया तुमने,
दो भौंहों के बीच
वो छोटी-सी बिंदी भी नहीं।
क्या हुआ-उदास हो क्या?
बस इतना पूछ लेना ही
काफी होता है
वरना हम तो
इतनी-सी केयर पर भी
पागल हो जाते हैं।
सच कहूँ
अगर ऐसे छोटे-छोटे स्नेह
हर दिन मिलते रहें,
तो फिर किसी
महिला दिवस की
ज़रूरत ही नहीं।
स्त्री आधारशिला है सृष्टि की
उसे दिवस की जरूरत नहीं
जरूरत है बदलते हुए
भावनात्मक पर दृष्टि की।
- सविता सिंह मीरा
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