साहित्य चक्र

11 March 2026

भारतीय रेलवे की दयनीय स्थित!



अक्सर मैं इधर-उधर जाने के लिए भारतीय रेलवे की सेवाओं का अधिक इस्तेमाल करता हूं। कुछ दिन पहले मैंने जयपुर से कोलकाता और कोलकाता से जयपुर आना-जाना किया। इस दौरान मुझे भारतीय रेलवे की दयनीय स्थिति को देखकर बहुत ही दुःख हुआ। बतौर भारतीय नागरिक मेरे मन में कई विचार उत्पन्न हुए। जैसे- क्या हम भारतीयों में अभी शिक्षा की कमी है ? क्या हम भारतीय अपनी सरकारी संपत्ति को व्यक्तिगत संपत्ति के मुकाबले सम्मान और उसके रखरखाव का ध्यान नहीं दे पाते हैं ? सरकारी संपत्ति के प्रति हम भारतीयों का इतना गंदा व्यवहार क्यों होता है ?






जयपुर से ट्रेन में बैठने के बाद दिल्ली जाने तक ट्रेन के शौचालय इतने गंदे हो गए थे कि शौचालय जाने तक का मन खत्म हो गया। लोग शौचालय जाते हैं और फ्लैश तक नहीं चलते हैं। आखिर लोग ऐसा व्यवहार क्यों करते हैं मेरी समझ से परे है। जो बात मैं कह रहा हूं यह कोई स्लीपर या जनरल बोगी की बात नहीं है, बल्कि 2 एसी और थर्ड एसी बोगी के अनुभव मैं आपके साथ साझा कर रहा हूं। रेलवे के 2 एसी और थर्ड एसी में अधिकतर अपर मिडिल क्लास ज्यादा सफर करता है और इस क्लास को सबसे अधिक शिक्षित और एडवांस माना जाता है। उसके बावजूद भी सरकारी संपत्ति के प्रति इनका व्यवहार चिंतनीय है। ऐसी शिक्षा का क्या महत्व जब आपको मूलभूत सेवाओं का इस्तेमाल तक करना ही नहीं आता हो। ऐसी अमीरी का क्या जब आपको इतना भी नहीं पता कि शौचालय जाने के बाद फ्लैश चलाना होता है, जबकि यह काम आप और हम अपने घरों में हर रोज एक-दो टाइम करते ही हैं।

 इतना ही नहीं बल्कि लोग तो खाना खाकर या चाय कॉफी पी कर, नमकीन कुरकुरे खा कर, कोल्ड ड्रिंक पी कर कूड़े को सीट के नीचे या साइड में डाल देते हैं, जबकि रेलवे के हर बोगी के बाहर गेट पर डस्टबिन लगा रहता है। यह एक साधारण सी समझ है कि कूड़े को डस्टबिन में डालना है। मगर हम भारतीय जब भी सरकारी चीजों का इस्तेमाल करते हैं, इतने गंदे तरीके का व्यवहार करते हैं कि मानो उस सेवा का दोबारा हमें इस्तेमाल ही नहीं करना हो। आखिर हम भारतीयों में सरकारी संपत्ति के प्रति प्रेम और अच्छे व्यवहार की जागरूकता कब आएगी ?





भारतीय रेलवे को भी यह सुनिश्चित करना चाहिए कि ट्रेनों के अंदर अच्छी क्वालिटी का खाद्य सामग्री उपलब्ध हो सके और ट्रेनों में काम करने वाले स्टाफ का व्यवहार थोड़ी नरम व अपने काम के प्रति ईमानदार हो। जिन कंपनियों को रेलवे ठेके पर सफाई या अन्य चीजों की जिम्मेदारी देता है, उन कंपनियों के व्यवहार पर भी रेलवे को पैनी नज़र रखनी चाहिए। इतना ही नहीं बल्कि अगर संभव हो सके तो यात्रियों से कंपनी की सेवा (जिम्मेदार) के प्रति फीडबैक भी लिया जाना चाहिए। इससे रेलवे की सुविधाएं और बेहतर होंगी।

अंत में इतना ही कहना चाहूंगा कि शिक्षा का मतलब सिर्फ नौकरी प्राप्त करना नहीं होता है, बल्कि आपके व्यवहार और बोली में शिक्षा की कुशलता झलकनी चाहिए। देशभक्ति और देश प्रेम सिर्फ सेना में जाना नहीं होता बल्कि देश की संपत्ति के प्रति प्रेम और आदर का भाव भी देश प्रेम की श्रेणी में आता है। आपकी गली में लगा सरकारी स्ट्रीट लाइट हो या रेलवे और परिवहन बस सेवाएं आदि सभी सरकारी सेवाओं व संपत्ति का बतौर नागरिक हमें सुरक्षा और देखभाल करनी होगी, तभी एक बेहतर राष्ट्र का निर्माण हो पाएगा। हां! हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सरकारी संपत्तियों व सेवाओं में हम सभी नागरिकों के टैक्स का ही पैसा लगता है।



                                                                - दीपक कोहली





लेख- परमात्मा का इंतज़ाम



रोज़ाना की तरह ही आज़ भी मैं कई बार पार्सल डिलीवरी के लिए घोड़ा बाबा मंदिर के पास से गुजरा। शाम से ही हल्का-सा ध्यान ज़रूर था कि मंदिर के पास सड़क पर तकरीबन 13-14 साल की उम्र के दो लड़के लगातार मौजूद रहकर कुछ कर रहे हैं। लेकिन मैंने इस बात को उतनी गंभीरता से नहीं लिया था। शाम के करीब पौने आठ बजे होंगे। मैं आज़ की सातवीं पार्सल डिलीवरी लेकर तेज़ी से चित्रगुप्त कॉलोनी की ओर जा रहा था। चूंकि चित्रगुप्त कॉलोनी के लिए रॉन्ग साइड से होकर ही सर्विस लेन पर रास्ता कटता था सो मैं घोड़ा बाबा मंदिर की ओर बने सर्विस लेन पर ही जाना उचित समझा। अभी सरपट मंदिर के पास से गुजर ही रहा था कि अचानक आवाज़ आई-"भैया-भैया ! रुकिए !





चूंकि मैं जल्दबाजी में था इसलिए बिना रुके आगे बढ़ गया। कुछ ही दूर गया था कि मन में कुछ खटका। शाम से ही ये बच्चे आखिर यहां कर क्या रहे हैं ? क्या आते-जाते राहगीरों से कुछ मांग रहे हैं ? शाम से लेकर अबतक वहीं पर हैं तो क्या अबतक किसी राहगीर ने उनकी बात नहीं सुनी होगी ? क्या वे बच्चे भूखे हैं ? कौन हैं,क्या हैं एक क्षण में अनगिनत प्रश्न दिल में उमड़ पड़े। अचानक मैंने अपनी असमंजस तोड़ते हुए क्लीयर कट तय किया कि भले ही आज़ और डिलीवरी नहीं करूंगा। लेकिन अभी का पार्सल डिलीवर करने के बाद तुरंत लौटकर उन बच्चों से मिलकर बातें करूंगा। वैसे भी आज़ लगभग चार सौ रुपए आ चुके हैं तो और ना भी हो तो कोई बात नहीं।

घोड़ा बाबा मंदिर के पास ही एक छोटा-सा रेस्टोरेंट है-"बेरोजगार ढाबा"। मैं अक्सर वहां अपनी फैमिली के साथ आया करता हूं। पूरे शहर में सबसे अच्छी और सस्ती बिरयानी यहीं मिलती है। मैं फैसला कर चुका था कि आज़ की शाम,उन दो बच्चों के नाम। आज़ उन्हीं के साथ बिरयानी पार्टी होगी। पार्सल डिलीवर करने के बाद मैं उल्लासित होकर तेज़ी से घोड़ा बाबा मंदिर की ओर चल पड़ा। दिल के किसी कोने में यह भी बातें चल रही थीं कि क्या वे बच्चे सचमुच बेसहारा हैं ? क्या उनके मां-बाप गैर ज़िम्मेदार हैं इसलिए वे इतनी रात सड़क पर भटक रहे हैं ? या मां-बाप हैं भी या नहीं ?






फिर मन के अपराध को वहीं पर रोकते हुए अगले ही पल तय किया कि मुझे ये सब कुछ नहीं सोचना है। कौन,क्या, कैसे भाड़ में जाए। आज़ बिरयानी पार्टी होकर रहेगी उन बच्चों के साथ। महज़ 180 रुपए में तीनों खा लेंगे। इतने रुपए तो न जाने कितने उड़ जाते हैं अक्सर। इन्हीं ख्यालों में खोया जैसे ही मैं मंदिर के पास पहुंचा, बच्चे नदारद। रात के लगभग नौ बज रहे थे।

उन बच्चों को न देखकर मेरा सारा उल्लास काफूर हो गया। मैं अंदर ही अंदर बेचैन हो उठा कि काश ! जाते वक्त ही थोड़ा-सा रुककर बातें कर लेता और उनसे दस मिनट वहीं इंतज़ार करने कहता। मुझे खुद पर बेतहाशा गुस्सा आ रहा था और दमभर खुद को कोस भी रहा था। ब्लॉक गेट से लेकर टीचर ट्रेनिंग मोड़ तक मैं उन बच्चों की तलाश में लगभग चार-पांच राउंड मारा। पर वो बच्चे कहीं नज़र नहीं आए।

शाय़द अपने घर चले गए होंगे या उनका जहां ठिकाना है वहीं चले गए होंगे। मैं भारी मन से वापस स्टोर की ओर चल पड़ा। मन में कसक ज़रूर थी कि उन बच्चों को कुछ खिला नहीं पाया। लेकिन मुझे हमेशा से एक तथ्य का भान है कि परमात्मा सबकुछ पहले से तय रखते हैं। वे सबके लिए ज़रूरत के हिसाब से इंतज़ाम करके रखते हैं। वो माध्यम क्या होगा ये बस वही जानते हैं और इसकी अनुभूति मैंने अपने जीवन में अनगिनत बार किया है।

मेरी भावना सकारात्मक ज़रूर थी लेकिन मुझे परमात्मा पर पूरा भरोसा है कि शायद वो आज़ उन बच्चों का इंतजाम मेरे हाथों नहीं कराना चाहते होंगे, कोई बात नहीं नेक्स्ट टाइम मौका न चूकूं इसका ध्यान रखने की कोशिश करूंगा। लेकिन हां ! उनकी व्यवस्था किसी के हाथों ज़रूर करा दिए होंगे इतना मुझे परमात्मा के इंतज़ाम पर संपूर्ण विश्वास है। बस इसी तसल्ली के साथ वापस अपने काम पर लग गया।


-कुणाल




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आज की प्रमुख रचनाएँ- 11 मार्च 2026






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चिट्टा

रहता था माँ से कुछ उखड़ा-उखड़ा
तेज आवाज़ में बात करना 
छुपाते हुए मुखड़ा
मासूम सी माँ कुछ समझ ना पायी
क्यों है बाल मेरा मुझ से रुठा-रुठा
कोशिशें सब बेकार सी
दुलारने, सहलाने, पुचकारने की
शर्म लाज छोड़ जरुरतें उसकी बढ़ने लगी
जेब खर्च अब सौ से हजारों में बढ़ने लगी
पाई-पाई जोड़ पिता उसका
बेटे के समृद्ध भविष्य को जोड़ता 
पढ़ाई के खर्चे मेरे अधिक कहकर
बेटा लेकर वापिस न मोड़ता
जब तक माता-पिता, परिवार, 
समाज समझ पाता
एक नहीं अनेक नौजवानों को
इक जानलेवा नशा चिट्टा 
उनकी जान ले डूबा
एक प्यारा सा मुस्कुराता परिवार
असीम पीड़ा, वेदना और मातम से गुजरा
क्यों नहीं समय आने से पहले
हम सब लोग जान जाते
अपनी नौजवान पीढ़ी को
खत्म होने से पहले ही बचा पाते
बचपन से ही बच्चों के दोस्त हम बन जाएं
कह पाएँ हर मन की बात
उनके सखा हम  बन जाएं
एक नहीं अनेक परिवार
पूरे के पूरे उजड़ गए
चिट्टा एक दो, पांच दस नहीं
सैकड़ों परिवार ले डूबे
पुलिस, प्रशासन के जिम्मे लाद
जिम्मेदारी अपनी सब भूल गए
हो जाएं समाज, परिवार, नगर-शहर
सब एकजुट, तभी सामना कर पाएंगे
असमय-अनजान मृत्यु से हम सब
तभी जीत हासिल कर पाएंगे।
दूर नहीं वो दिन जब हम सब
बेटा-बेटी ही नहीं
एक समृद्ध परिवार भी खो देंगे
जब देश मेरा क्रांति कर
गुलामी की बेड़ियाँ तोड़
आजादी पा सकता है
क्यों नहीं अपने ही समाज की
नशे की जड़ों को तोड़ सकता है
हो जाएं सब एकजुट
क्रांतिकारी भावना से
गर बचाना है देश भविष्य अपना
नशे की गिरफ्त और लाचारी से...


                                            - मीना कुमारी शर्मा


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पहली- अक़्लमंद तो था नहीं.

अक़्लमंद तो था नहीं
जेब से भी था ख़ाली-ख़ाली ही
मगर गर्दन में ऐंठन थी थोड़ी
कि जो जाती न थी
रोना था,इसी बात का रोना था
कि ज़रा भी झुकता न था
जो झुक जाता,
थोड़ा-सा भी झुक जाता,तो पाता
फिर इतना-इतना कुछ पाता
उठाता स्वर्ण-मुद्राऍं,गिनना भूल जाता
कि ठीक से संभाल भी नहीं पाता
सिर्फ़ इतनी-सी थी ज़िद मेरी
कि नहीं हो शर्त कोई जीवन में जीने की
असहमति के लिए बची रहे जगह
जगह-जगह,हर जगह
अगर हो जाता शामिल मैं भी सहमतों में
तब न ऐंठन होती,न कविता होती,न मैं
चाहता हूॅं,यही चाहता हूॅं
कि बची रहे
ये ऐंठन बची रहे
कविता में कविता की ऐंठन बची रहे
कविता बची रहे,जीवन बचा रहे
मैं रहूॅं,न रहूॅं ज़रुरी तो नहीं
कवि बचा रहे।

दूसरी- जागेगा सच और सब में.

दु:ख,प्रेम,सपने और कविताऍं
कहने लगे कि एक दिन,किसी एक दिन
रहेंगे,सब रहेंगे साथ-साथ और यहीं
नदियों में प्रवाह और घुमाव बने रहेंगे सब
झरनों का गिरना और उछलना बना रहेगा
ऑंधियों से वृक्षों का टकराना बना रहेगा
मैं नहीं रहूॅंगा,तुम नहीं रहोगे,नहीं रहेंगे वे
बाॅंसवन रहेगा,बाॅंसुरी रहेगी,गूॅंज रहेगी
जो जगाती रहेगी आग,पकाती रहेगी अन्न
जागेगा सच और सब में।


- राजकुमार कुम्भज


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बस इत्ती सी तो....

अच्छा लगा था
जब बॉस ने बिना कहे,
बिना जताए, बिना बताए
ऑफिस की मेज़ पर
सेलिब्रेशन का एक बड़ा पैक
चुपचाप रख दिया था।
वो भावनात्मक रिश्ता
दिल से निकलकर
सीधे दिल तक पहुँच गया-
बस इतना ही तो चाहिए,
और बस…
हो गया नारी दिवस।
उफ़्फ… आज बहुत देर हो गई,
कब सुबह हो गई पता ही नहीं चला।
उन्होंने खिड़की से आती धूप को
बड़े करीने से
एक मोटी-सी चादर से ढक दिया,
ताकि मेरी नींद
ज़रा और ठहर सके।
आँखें भर आती हैं…
हम सच में
इतने से ही खुश हो जाते हैं।
कोई आडंबर नहीं,
कोई शोर नहीं—
बस इतनी-सी ही तो बात है।
आज काजल नहीं लगाया तुमने,
दो भौंहों के बीच
वो छोटी-सी बिंदी भी नहीं।
क्या हुआ उदास हो क्या?
बस इतना पूछ लेना ही
काफी होता है,
वरना हम तो
इतनी-सी केयर पर भी
पागल हो जाते हैं।
किसी राह चलती
एक स्त्री को
ससम्मान नज़र देना,
उसकी देह पर
तंज़ न कसना
बस इतना ही तो…!

सच कहूँ,
अगर ऐसे छोटे-छोटे स्नेह
हर दिन मिलते रहें,
तो फिर किसी
महिला दिवस की
ज़रूरत ही नहीं।


- सविता सिंह मीरा


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डरना मत मेरे बच्चों

कोई जब रोके
घर से निकलने से
तुम्हें स्कूल जाने से
खुल कर जीने से
डरना मत मेरे बच्चों।

तुम हार जाओगे
जिंदगी की रेस में
तुम्हें जाना होगा स्कूल
सही गलत को जानने के लिए
फैसले लेने के लिए
डरना मत मेरे बच्चों।

तुम्हें बनना होगा
बुद्ध सा बौद्धिक
रैदास सा चिंतक
कबीर सा प्रासंगिक
तुम 21वीं सदी के बच्चे हो
डरना मत मेरे बच्चों।

तुम्हें जानना होगा
आधुनिक रीति रिवाज
माँ बाप भाई भतीजावाद
उससे भी ज्यादा संवेदना
भूलना नहीं है संस्कार
तुम्हें संचार क्रांति भी
जानना होगा
डरना मत मेरे बच्चों।


- मनोज कौशल


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वफ़ा

फैला दो हवाओं में
पैगाम मेरा
कि हम तेरे शहर में
वफ़ा बाटने आये है।

लेकर ग़म तेरे
नसीब में अपने,
तेरा नाम अपनी
तकदीर लिखने आये है।

वो जो कहते हैं लोगों से
कुछ भी न मिलता
यूँ सोचने से
उनको कह दो
हम उनको अपने
नसीब में लिखने आए हैं।


- डॉ.राजीव डोगरा

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पिता

पिता पहेली नहीं है
वह बहुत ही सहज है
उसका हृदय
हमेशा बच्चों के लिए ही धड़कता है
उसका बच्चों को समझाना,
ज्यादा बकबक करना
कभी डाँट देना
उसके हृदय को मलिन नहीं बनाता
पिता की आत्मा गंदी नहीं होती
पिता पिता है
हमेशा गंगा की तरह
पवित्र आत्मा को ढोता हुआ
एक दैवीय वरदान।


- अनिल कुमार मिश्र


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यह दुनियां न तेरी न मेरी

यह दुनियां किसी की नहीं है जागीर
कठपुतली हैं सब यहां राजा हो या फकीर
अपना किरदार निभाकर सबको है जाना
मिलेगा वही किसी को जो लिख देती है तकदीर

कोई यहां गरीब है कोई जन्म से अमीर
ईमानदार है कोई किसी का मर गया है ज़मीर
तकदीर के भरोसे मिल रहा किसी को सब कुछ
कोई बन गया है राजा और कोई बना बज़ीर

न कोई किसी के साथ आता है
न कोई किसी के साथ है जाता
मिलना भी उसी से होता है यहां
जिससे होता है कोई पिछले जन्म का नाता

किस्मत में जो होगा वह मिलकर रहेगा
उसे कोई छीन नही पायेगा
जो हमारा नहीं है वह लाख कोशिश पर भी नहीं मिलेगा
उसे हथेली पर से छीन कर भी कोई ले जाएगा

छोड़ना पड़ेगा सब कुछ एकदम जब बुलावा आएगा
आंख बंद हो जाएगी कुछ देख नहीं पाएगा
दूर खड़े देखेंगे सब तेरी अंतिम विदाई
अपना जिसको समझता रहा पास आने से भी घबराएगा


- रवींद्र कुमार शर्मा


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विचारों का मंथन

मन के सागर में गहराई है,
लहरों में छिपे तूफ़ान भी हैं,
कभी प्रश्नों का घना अँधेरा,
कभी उत्तर के अरमान भी हैं।

जब भीतर हलचल होती है,
मन स्वयं से प्रश्न करता है,
विचारों का यह मंथन ही
जीवन का पथ निर्मित करता है।

कभी निकलता विष सा संशय,
कभी अमृत सा विश्वास,
संघर्षों की इस हलचल में
जगता है जीवन में नव प्रकाश।

टूटती हैं भ्रम की दीवारें,
जाग उठती है नई चेतना,
विचारों का यह गहरा मंथन
देता जीवन को नयी दिशा।

जब मन खुद को समझ लेता है,
सत्य से जब मिलन होता है,
तभी विचारों का यह मंथन
जीवन का साधन होता है।

उलझनों के इस सागर में
यही हमारा पतवार है,
विचारों का सच्चा मंथन ही
मनुष्य का असली आधार है।


- डॉ सारिका ठाकुर 'जागृति'


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बुढ़ापा और दवाओं का डिब्बा

अब हर सुबह का पहला किस्सा दवाओं का डिब्बा है,
जीवन की बची हुई सांसों का सहारा दवाओं का डिब्बा है।

कल तक जो घर हंसी से भरता था आवाजों के मेले में,
आज तन्हाई से बातें करता दवाओं का डिब्बा है।

कांपते हाथों में यादों की धुंधली-सी गर्मी बाकी,
वरना ठंडी रातों का साथी दवाओं का डिब्बा है।

धड़कनों की चाल संभाले बैठा चुपके से सिरहाने,
वक़्त से चुराया थोड़ा लम्हा दवाओं का डिब्बा है।

बेटे-बेटियां दूर शहर में अपने सपनों में खोए,
मां-बाबा की दिनचर्या का हिस्सा दवाओं का डिब्बा है।

आईने में झुर्रियों ने जब उम्र का सच दोहराया,
जीने की जिद को फिर समझाता दवाओं का डिब्बा है।

“वीरेंद्र” दर्द लिखे तो कागज़ भी नम हो जाता है,
शब्दों के साथ-साथ अब रोता दवाओं का डिब्बा है।


- वीरेंद्र बहादुर सिंह


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कर्ण-युवा प्रतिज्ञा

उठो हिंद के ओजस्वियों, अब रणभेरी बजने दो,
शौर्य-शिखर पर युवा शक्ति का, विजय-केतु सजने दो।
तुम वंशज हो उस महाबली के, जिसने काल को ललकारा,
सूतपुत्र की पदवी तजकर, भाग्य स्वयं अपना संवारा।

सुनो युवाओं! मित्रता का, अर्थ नहीं व्यापार है,
यह प्राणों की आहुति है, यह जीवन का आधार है।
कर्ण खड़ा था दुर्योधन संग, जब जग ने दुत्कारा था,
बिना लाभ की परवाह किए, उसने मित्र को संवारा था।

कवच दिया और कुंडल सौंपे, मृत्यु को भी दान किया,
केशव के मधु-प्रलोभनों का, हँसकर अपमान किया।
आज देश को चाहिए ऐसी, निस्वार्थ मित्रों की टोली,
जो राष्ट्र-धर्म की रक्षा में, हँसकर खा ले सीने पर गोली।

मिटा दो जाति-पाति के बंधन, संगठन की शक्ति बनो,
भ्रष्टाचार के सीने में, तुम जलती हुई उक्ति बनो।
क्या डरते हो बाधाओं से? तुम पर्वत के सर तोड़ो,
अन्याय खड़ा हो सम्मुख तो, तुम निर्भय होकर मुख मोड़ो।

यह देश नहीं केवल माटी, यह जागृत देव-स्वरूप है,
तुम हो इसके रक्षक वीर, तुम राष्ट्र-प्रेम का रूप हो।
स्वार्थ त्याग कर हाथ मिलाओ, कर्ण-सा अडिग विश्वास जगाओ,
भारत माँ के चरणों में, अपना सर्वस्व चढ़ाओ।

न पद की भूख, न यश का लोभ, बस विजय का विश्वास हो,
तुम्हारी रग-रग में बस, केवल हिंदुस्तान का वास हो।
उठो! कि तुम ही शक्ति हो, तुम ही कल का विधान हो,
तुम्हारे शौर्य से ही सुरक्षित, मेरा गौरवशाली महान हो।


- देवेश चतुर्वेदी 'ईशान'


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विश्वास किस पर करें 

बातें बड़ी मीठी मीठी करते
अपनेपन का ढोंग भी करते
पर दिल में दुश्मनी छुपाए रखते
किस पर विश्वास करते
इसी असमंजस में सब रहते।
हर कोई सामने कुछ नहीं कहते 
पीठ पीछे निंदा में ही समय बिताते।
आज इंसान  इंसान से ही डरते
किस को अपना समझें इसी उधेड़बुन में रहते।
हर कोई ईमानदार बनते
फिर ये बेईमानी हेराफेरी कौन है करते।
सच्चे व  निष्पक्ष उलझे से हैं रहते 
चालाक चुस्त हवा के साथ है बहते।
कुछ तो गिरगिट को भी टक्कर देते
उनके हक की बात जब  नहीं किया करते।


विनोद वर्मा



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09 March 2026

आज की विशेष कविताएँ- 09 मार्च 2026









मेरा सूरज मेरे पिता

मेरा सूरज मेरे पिता,
उनसे मेरा अस्तित्व आया।
जिम्मेदारी अपने कंधे ली,
कभी लगी न धूप,
हमेशा पसीने की बारिश
कर दी,खड़े रहे बनकर छाया।

सपने त्यागे, समझौता किया
हर वादा जो किया निभाया।
हमेशा अपने को मुझमें पाया,
हौसला दिया जब जब डगमगाया।

अब भी पूछते खैर मेरी,
जब हमें उनकी पूछनी थी।
करते फिक्र लगता उनको
अब भी मैं उनका खिलौना।

उम्र हुए उनको अपना सब
भूल जाते।
लेकिन खाने से पूछते पहले
जरूर घर आओगे कब
चलो साथ में खाते।

मेरे सूरज है,उनसे ही है उजाला,
उनके बिन सब अंधेरा है,
ऐसे लगता मेरा छीन जायेगा
जीवन का उजाला।


- रोशन कुमार झा


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गरीबी देखना है तो,
ट्रैन के जनरल डिब्बा
मे बैठ कर देखिए।
गरीबी देखना है तो,
फुटपाथ पर सो कर देखिए।
गरीबी देखना है तो,
सरकारी स्कूल मे जा
कर देखिए।
गरीबी देखना है तो,
सरकारी अस्पताल मे
इलाज करा कर देखिए।
गरीबी देखना है तो,
कड़ी धुप,लू मे काम
कर के देखिए।
भूख देखनी है तो,
एक रोटी मे दस परिवार
को खाना खिला कर देखिए।
प्यास देखनी है तो रेगिस्तान मे
रास्ता भटक कर देखिए।
नीद हराम देखनी है तो,
टूटे हुए मचान पर सो कर देखिए।
खतरा देक्गनी है तो समंदर मे काम
करबे वाले मजदूरों को देखिए।


- सदानंद गाज़ीपुरी


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लफ़्ज़ों की तरह तुझे किताबों में मिलेंगे
बन कर महक तुझे गुलाबों में मिलेंगे
हम तो कायल हैं, तेरे ख्वाबों के ऐ दोस्त!
बन कर स्वप्न तुझे नींद में मिलेंगे,

माना के तुम एक बहुत बड़े शायर हो
पढ़कर तेरे कलाम का एक-एक लफ़्ज़
तुझे तेरी कविता में मिलेंगे,
वैसे हम भी तो कलम के सिपाही है, ऐ दोस्त!
किसी महफ़िल में नहीं तो काव्य गोष्ठी में मिलेंगे,

कोई अफ़सोस नहीं,के तुम बिछुड़ गए हम से
साया बन तेरा, तेरे साथ-साथ चलेंगे,
मिलाएंगे कदम से कदम,तेरे साथ ऐ दोस्त!
जिधर तुम मुड़ोगे, उधर हम भी मुड़ेंगे,

सीने में हम भी दो दिल रखते हैं ऐ दोस्त!
जज़्बात फौलादी रख, तेरी ढाल बनेंगे,
खाकर पवित्र गीता की कसम ऐ दोस्त!
सच कहा है,सच के सिवा कुछ नहीं कहेंगे,

एक अजीब सी खुशी मिलती थी, हमें ऐ दोस्त!
तुम्हारी मीठी बातों को सुनकर ,
तुम शब्द नहीं, एक अंदाज़ थे हमारे लिए ऐ दोस्त!
रँगत देख महफ़िल की जरूर मिलेंगे।


- बाबू राम धीमान


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दिल के कोने में थोड़ा मलाल रखें
सोंच गहरी और हृदय विशाल रखें
दिल के कोने में थोड़ा मलाल रखें

एक मैं ही नहीं और भी हैं जिंदगी
हम अपना औरों का ख्याल रखें
सोंच गहरी और हृदय विशाल रखें

तेरा मेरा भले न जन्मों का नाता सही
मौजूदा रिश्तो को ज़रा संभाल रखें
दिल के कोने में थोड़ा मलाल रखें

आरज़ू हसरतें भले ही छोटी सही
दिल में करुणा दया और उदार रखें
दिल के कोने में थोड़ा मलाल रखें

हर श्वांस संगीत सी धुन पर थिरकते रहें
मदमस्त जिंदगी खास ओ कमाल रखें
सोंच गहरी और हृदय विशाल रखें

आते जाते रहे वक्त, कितने ही सुरमा
हो याद किसी की कौन ख्याल रखे
दिल के कोने में थोड़ा मलाल रखें

पार जाओ समुन्दर खुदके दम, ठीक
डूब जाओ 'नरेन्द्र' कौन ख्याल रखें
दिल के कोने में थोड़ा मलाल रखें
सोंच गहरी और हृदय विशाल रखें


- नरेन्द्र सोनकर बरेली


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कहानी कहेंगे

इक रोज़ तेरी कहानी कहेंगे,
कितनी हो तुम सयानी कहेंगे!
सितम की इंतहा बहुत हो गई,
तुझे फ़िर भी अपनी दीवानी कहेंगे।

मार दिया जो खंज़र पीठ पर मेरी,
हम बहते हुए लहु को पानी कहेंगे!
शातिर हो तुम ये जान लिया मैंने,
यकीनन हम इसे तेरी नादानी कहेंगे।

अब ख़ुशी दो या ग़म तुम्हारी मर्ज़ी,
बामुक़द्दर तेरे प्यार की निशानी कहेंगे!
छाई हो इस क़दर ख्यालों में मेरे,
कि तुम्हारी हर बात को ज़ुबानी कहेंगे।

वो तेरी बातें और मासूम सी बेक़रारी,
अब तो इन्हें यादों की रवानी कहेंगे!
साथ हो हमसफ़र तुम जब भी मेरे,
तब अपनी किस्मत को सुहानी कहेंगे।

वक़्त की कमी होती है तेरे पास,
कैसे तुमसे अपनी परेशानी कहेंगे!
पसंद है मुझे उसी दौर की मोहब्बत,
बेशक कहने वाले इसे पुरानी कहेंगे।


- आनन्द कुमार


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भूलना कहाँ है आसान

रंग बिरंगी की इस दुनिया में
तुम्हारी रंग क्या है ?
क्या रंग मिल गया जो तुझमें
हो गयी बे-रंग...
मगर इसका एहसास नही है।
ईप्सा, भावना और उमंग
सकल विस्मृत हो गया मन,
दूर हूँ तुझसे दूर ही रहूँ मैं
अब तो...
दूर से भी दूरी बना रहा हूँ मैं।
परंतु...
उन चेहरे को भूलना कहाँ है आसान
जिनसे जुड़ा है ये तन-मन,
वो हंसी, वो आंसू, वो प्यार के मोती
दिल के किताब के जैसे खूबसूरत साथी।


- सूरजमल AKs


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ले डूबते हैं मांझी भी

सादगी को बदलते समय में तार तार होना पड़ता है,
ये जिंदगी है साहिब यहां होशियार होना पड़ता है।

कितना भी बचकर चलो ठोकरें मिल ही जाती हैं,
कभी कभी मंजिलों को भी लाचार होना पड़ता है।

यूं तो दिल है बड़ा मासूम चालाकियों से बहुत दूर,
यहां खुद को बचाने के लिए तलवार होना पड़ता है।

यूं तो छोड़ दें सल्तनत भी ऐशो आराम भी जमाने के
लेकिन लूट मची हो तो हकदार होना पड़ता है।

समझाने को जब  कोई सूरत ही ना बचे तो करें क्या ?
इन आंखों को ही अपने हाल का अखबार होना पड़ता है।

ले डूबते हैं मांझी भी भंवर में कई बार अपनी कश्तियां,
लहरों को ही पथिक, नाव और पतवार होना पड़ता है।

मुद्दतें गुजर गईं कोई अपना हाल तो जरा पूछ ले,
इस उम्मीद में अक्सर हमको बीमार होना पड़ता है।

पिछले मौसम पतझड़ करके चले गए दरख़्तों को,
हमको उनकी खुशी के लिए बहार होना पड़ता है।


- मंजू सागर


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सुना था, आज भी लोगों में कुछ तो इंसानियत बाकी है,
पर यहां हर चेहरा, अब छलावा, फरेबी,
धोखेबाज सा लगता है। यकीन पर यक़ीनन,
अब यकीन करना संभव नहीं
इंसानियत अब रही नहीं। इंसानियत अब रही नहीं।

हर जगह झूठ का तांडव है,
हर जगह लोग खोटे क्यों मिलते!
अफ़सोश करें, या इन सबसे दूर रहें,
कोई भी उपाय, अब सुकून की वजह नहीं।
इंसानियत अब रही नहीं। इंसानियत अब रही नहीं।

चापडूसों का बोल बाला है,
झूठें लोगों के बीच सच्चाई दम तोड़ रही,
हम कैसे छोड़ दे अपनी सच्चाई, हमने ये सिखा नहीं।
इंसानियत अब रही नहीं। इंसानियत अब रही नहीं।

दम घूट रहा देख ऐसे ढोंगी लोगों को,
जिनमें न शर्म न लिहाज अब बाकी है,
कैसे खुद को महफूज रखें, ऐसे दानव रूपी सफेदपोशों से।
इंसानियत अब रही नहीं। इंसानियत अब रही नहीं।


- पूनम गूंजा


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बचपन जीना ही भूल गए
कुछ बेहतर हासिल करने की चाह में,
हम बस्ता उठाकर रोज स्कूल गए।
लेकिन उस पढ़ाई पढ़ाई के चक्कर में,
हम अपना बचपन जीना ही भूल गए।

अब वे माटी के खेल बहुत याद आते हैं,
दुबारा बचपन जीने को अपने पास बुलाते हैं।
वे कांच के कंचे, गिल्ली डंडा और छुपन छुपाई,
जिनमें नज़र आती थी दुनिया की सच्चाई।
बचपन वाली वह बरसात अब नहीं आती है,
क्योंकि कागज की नाव उसमें तैरकर जो नहीं जाती है।

सावन का मौसम भी अब मनभावन नहीं लगता है,
अब त्योहारों में बचपन जैसा रंग नहीं जमता है।
आज हमने सबकुछ पाकर भी कुछ नहीं पाया है,
क्योंकि हमने जीवन का सबसे बेहतरीन हिस्सा यूंही ही गंवाया है।
जीवन में उस बचपन से बेहतर कुछ न था,
अब समझ आया जीवन में बेहतर हासिल करना ही सबकुछ न था।

कुछ बेहतर हासिल करने की चाह में,
हम बस्ता उठाकर रोज स्कूल गए।
लेकिन उस पढ़ाई पढ़ाई के चक्कर में,
हम अपना बचपन जीना ही भूल गए।


- भुवनेश मालव


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इम्तिहानों में बैठकर
परिणामों की दौड़ से पिछड़ती
वेटिंग लिस्ट में नाम खंगालकर
डिप्रेशन से दोस्ती में
जान की बाजी लगाकर पंखे से झूलती
कभी  गिरकर फिर संभलती
कोचिंगों से लौटकर देर रात तक
लाइब्रेरी में बैठे पन्ने पलटती
अकसर अपनों से दुत्कारी जाती
फेलियर का ठप्पा लगवाकर
दोबारा  सेंटरों पर अपना रोल नम्बर ढूंढकर
ओम आर के गोलों में मंजिल तलाशती 
कभी पेपरलीक को कोसकर
बंद मकानों में सिसकती
किस्मत पर रोना  रोकर
पुलिस की लाठियाँ खाती
डिग्रियों का झौला लेकर
दफ्तरों के चक्कर काटती
जेठ की तपती दुपहरी में पत्थर तोड़कर
चंद रुपयों में संतोष करती
धैर्य का लिबास ओढ़कर "नूर"
मायूसी से  मौन होती दो  जोड़ी आँखें
जिनमें धैर्य है मौन है
और है अच्छे दिनों की 'प्रतीक्षा'।


- नितेश पालीवाल 'नूर'


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आज़ाद नज़्म: 'सालों बाद'

सालों बाद, 
दीवारों पर काई की तरह निकल आते हैं कई हाथ,
हाथ जो आते-जाते, उठते-बैठते;
छुना चाहते हैं नितंब, उरोज और गिले रेशमी बाल।

सालों बाद,
छत से टपकने लगती हैं आँखें, 
आँखें जो फर्श से रेंगते रेंगते;
कब पैरों पर चढ़ने लगती हैं; इसका नहीं रहता ख़याल।

सालों बाद,
हर रोज दिखाई-सुनाई पड़नेवाला चेहरा , 
चेहरा जो बदल लेता है अपना रूप;
और चुभने लगता है सूई की तरह तार-तार।

सालों बाद, 
कुचल दी जाती है एक बात, 
बात जो बिना आवाज चिल्लाती रहती है और फिर, 
कोई मर जाता है ज़िंदा चलती साँसे सम्भाल।

सालों बाद, 
इकलौता चश्मदीद गवाह हादसे का 'एक घर', 
घर जिसे तब्दील कर दिया जाता है;
बड़े साहब की आलीशान हवेली की पहनाकर खाल।


- स्वाति जोशी


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पलाश के रंग

मुख और मुखौटे का
फासला कम हो रहा,
आईना अपना किरदार
खुद ही खोता जा रहा।
सच को सच की परवाह नहीं,
झूठ को सब मानने लगे सही।
दिखावा, दिल और दिमाग पर
एक नई दुनिया बसा रहा।
चुटकी भर बची इंसानियत
दम घुटता ही जा रहा।
सूरज की रोशनी रोज़ आती है,
पर उम्मीद की किरण जाने,
कहां छुपी है ?
सुनी टहनियों पर अचानक दिखे,
पलाश के फूल तभी।
मानो धैर्य की परीक्षा के बाद
बस खिले हैं अभी।
तेज उज्वल चमकते अग्नि सा रंग
जैसे कह रहे हों -
उठो, देखो, ढूंढो स्वयं को,
तुम्हारे अंदर ही छुपा है,
जिंदगी जीने का सही ढंग।
मौसम और ऋतुओं में तो
परिवर्तन ही नियम है।
जो कहते हैं-
तुम भी हो जाओ परिवर्तित।
मगर सच की ओर,
सहज झूठ से न होना आकर्षित।
आत्मविश्वासी बनो
चाहे कर्म हो या वचन।
यदि विचारों से सच्चा हो मन,
फिर घृणा नहीं प्रेम ही है जीवन।


- सुतपा घोष


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जीना लाज़िमी है

न सुंदरता लाज़िमी है, न सजना लाज़िमी है,
सम्मान से जीना चाहो तो पढ़ना लाज़िमी है।

ये ज़मीं भी तेरी है, ये आसमां भी तेरा,
बस इसे अपना मानना लाज़िमी है।

कौन कहता है- नहीं घर तेरा, तू बेघर है ?
अपने ही घर को अपना मानना लाज़िमी है।

न तू बेबस है, न लाचार कहीं से,
बस सही और ग़लत को समझना लाज़िमी है।

न गंवार है तू, न समझ की कमी तुझमें,
हाँ, थोड़ा पढ़-लिखकर संवरना लाज़िमी है।

घर की रौनक है तू, घर बनता तुझी से,
अपनी अहमियत को पहचानना लाज़िमी है।

सहेज कर रखना अपने गुणों को,
समय के साथ आगे बढ़ना लाज़िमी है।

दुर्गा भी तू, झांसी भी तू, रज़िया भी तू,
कभी आग तो कभी पानी है तू।
नहीं है तू केवल कोमल कली,
दुनिया को ये जताना भी लाज़िमी है।

कुचलना जब कोई चाहे तुझको,
नागिन-सी फन उठाना भी लाज़िमी है।

न सुंदरता लाज़िमी है, न सजना लाज़िमी है,
जीना चाहती हो तो सिर उठाना लाज़िमी है।

गुरूर है तू घर का, समाज का- नहीं कमतर,
हक़ है तुझे भी सुरक्षा और सम्मान का।
उठा शस्त्र, बना स्वयं को सक्षम,
नहीं निर्बल- बेशक तू नारी है।

दरिंदगी अब नहीं सहेगी,
दरिंदों के लिए अब तू सिर्फ़ कटारी है।

आत्मरक्षा करने में है स्वयं सक्षम,
ये आईना दिखाना भी लाज़िमी है।

नहीं जीना सिर्फ़ औरों के लिए,
खुद के लिए जीना भी लाज़िमी है।
ज़िंदगी नहीं मिलेगी फिर दुबारा,
इसलिए सुंदर स्वप्न संजोना भी लाज़िमी है।

सम्मान से जीना चाहती हो तो,
खुद की पहचान बनाना लाज़िमी है।
आगे बढ़, कदम बढ़ाना लाज़िमी है,
जीने के लिए खुद को जगाना लाज़िमी है।


- कंचन चौहान


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मैं अपनी माँ की लाड़ली बेटी हूँ,
अपने पिता की नाज़ुक-सी परी हूँ।
मैं अपने सास-ससुर की संस्कारी बहू हूँ,
बहन, प्रेमिका,जीवनसंगिनी,पत्नी
और अपने बच्चों की माँ हूँ।
मैं एक कर्मठ कामकाजी महिला हूँ ।

पर इन सबसे पहले,
मैं स्वयं की सच्ची सखी हूँ।
मुझमें खूबियाँ भी हैं और कमियाँ भी,
मैं पूर्ण नहीं हूँ- और होने का दावा भी नहीं करती।
गलतियाँ मुझसे भी होती हैं।

कभी गुस्सा आता है,
कभी मन रूठ जाता है,
कभी थककर बैठ जाती हूँ,
तो कभी भीतर से पूरी तरह टूट भी जाती हूँ।
ऐसे पलों में माँ की थपकी बहुत याद आती है…
माँ की गोद का वह सुकून-
जो अब मैं अपनी ही गोद में ढूँढ़ लेती हूँ।

मैं झूठ से सख़्त नफ़रत करती हूँ
और झूठ बोलने वालों से
दूरी बनाए रखना पसंद करती हूँ।

मेरी नीयत साफ़ है-
इतनी साफ़ कि मैं अपने बच्चों की आँखों में,
अपने हमसफ़र के सामने,
और सबसे बढ़कर अपने ईश्वर के
समक्ष बिना झिझक नज़रें मिला सकती हूँ।

मैं जानबूझकर किसी का दिल नहीं दुखाती,
पर सत्य के लिए अपनी आवाज़ अवश्य उठाती हूँ।
क्योंकि सच्ची खूबसूरती चेहरे के रंग-रूप में नहीं,
नीयत की पारदर्शिता में होती है।
अगर नीयत साफ़ हो तो,
उसकी सच्चाई ही उसका सबसे
चमकता हुआ श्रृंगार बन जाती है।


- निशि धल सामल


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बढ़ती उम्र


बढ़ती हुई उम्र,
मन में नही रहे कोई मलाल
नही जेहन में कोई सवाल
बेवज़ह की बातों से दूर रहें
खुश रहें अपने ही हाल।

बढ़ती हुई उम्र,
जिम्मेदारियों से हो मुक्ति,
जीवन ही बन जाए एक
प्रेरणादायक उक्ति,
कौन,क्या क्यों कैसे छोड़ दें,
मन कर्म वचन बनें सूक्ति।

बढ़ती हुई उम्र
झूठ ,फरेब से दूर रहें,
नही कड़वी कसैली बातें कहें
सादगी हो रहन सहन में
नहीं किसी की बुरी बातें सहें।

बढ़ती हुई उम्र,
प्रेम और स्नेह से मजबूत हो
दुख तकलीफ़ में एकजुट हो
मन में कोई गांठ न बाँधे
नहीं रिश्ते में कोई टूट हो।


- रूचिका राय


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