साहित्य चक्र

14 February 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 14 फरवरी 2026





आने वाला वक़्त, एक नया सवेरा,
उम्मीदों की किरण, सपनों का बसेरा।
हर पल एक नई कहानी,
हर दिन एक नई जुबानी।

आने वाला वक़्त, चुनौतियों का मेला,
हिम्मत और हौसले का खेला।
संघर्षों में तपकर निखरेंगे,
जीत की राह पर चलकर उभरेंगे।

आने वाला वक़्त, एक नया इतिहास,
हमारी मेहनत का, हमारी जीत का अहसास।
हर कदम पर नई मंजिल,
हर सपने में नई हासिल।


- बाबू राम धीमान


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गोरों का दंभ दलन करके, मारा मुगलों के मीरों को
भारत माँ का मान रखा है, नमन देश के वीरों को

झुका दिवाकर देख तपन, उन हिन्दुस्तानी लालों का
दुश्मन पर फुफकार मारते, गरल सूखता व्यालों का

बासठ में धरती डोल उठी, जब चीन आ भिड़ा शेरों से
जयचन्दों से मात खा गए, कभी ना हारे गैरों से

शिमला, करगिल, काश्मीर में नापाकी नाकाम रहे
गंगा,जमुनी तहजीबें जन, यीशु अल्लाह राम रहे

अकुलाती जननी छोड़ लाल, सरहद सेवा को जाते हैं
तरुणाई को दबा सिला से, वतन तराने गाते हैं

खुदा सलामत रखे जमी पर, उन तरकस के तीरों को
भारत माँ का मान रखा है, नमन देश के वीरों को

उठा बैग भय भोर चल पड़ा, बेटी घर में सो रही थी
तीव्र श्वास दर भीगी चुनरी, जीवसंगिनी रो रही थी

उर पत्थर सा करके बापू, नीर जलाते नैनों में
लिपट तिरंगा घर वो आया सगा भाई था बहनों में

इश्क, नेह, माशूक, मोहब्बतें सब कुछ हिन्दुस्तान है
मिली एक है अयुत जान भी भारत पे कुर्बान है

लाल चौक, पुलवामा, बस्तर कई मर्तबा शीर्ण हुए
देख हस्त, धड़, भुजा रक्त में, कोटि हृदय विदीर्ण हुए

श्वान, काग, बक करे सियासत, धता बताकर कीरों को
प्यारे बच्चों रखो जहन में, शहीदों की तस्वीरों को

'मोहन' करे अरदास खुदा से, रखे सलामत हीरों को
भारत माँ का मान रखा है, नमन देश के वीरों को


- मोहन मीणा


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जीवन संगिनी

कैसे कहूँ तुम क्या हो, कौन हो
चैन हो, शुकुन हो हमसफ़र खुशमिजाज हो

प्यार भरी पाती, तुम भूखे की चपाती
बंजर जमीन, जीवन की अचानक मिली फूल हो

बसंत जीवन की, चांद तुम शरद की
राग मेरे जीवन की, मन्नत की ताबीज हो

मेरे घर को सजाती, दुलारती बच्चों को
तुम ममता की मूरत, भगवान की सीरत हो

खिली खेत सरसों की, फूलों सी नाजुक
जुबां से हो मीठी, खूबसूरत जैसे कोई परी हो

बच्चों की स्कूल हो, अन्नपूर्णा का आशीर्वाद
मेरे छोटे घर की तुम, किचेन क्वीन हो

श्रद्धा हो, पूजा हो, भाव की दर्पण तुम
मेरे बैंक, दिल की तुम्ही जमा पूंजी हो

ज्योति हो, लक्ष्मी हो, प्रकाश निवास की
तुम घर की तिजोरी की, खनकती गुच्छ कुंजी हो

लुटाती प्यार जो अपनी, कर्मठ अदाओं से
मेरे परिवार की, तुम बेशुमार खुशी हो

नजरों में मेरे, श्रेष्ठ ही नहीं तुम
अपितु प्राण प्रिये, सदा श्रेष्ठतम हो

यूं ही साथ देती रहो, जिंदगी भर
चाहे पा जाऊं खुशी, या मिले कहीं गम हो

जीवन संगिनी तुम, अमानत हो रघु कि
फूल ही नहीं तुम, गुलदस्ता खूबसूरत फूलों की हो


- राघवेंद्र प्रकाश 'रघु'


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पहाड़ी गीत- अपणा लुटाई

सबकुछ अपणा लुटाई गया
केहड़ा बुढ़ापा आईओ गया
स्याहियां बणाई ,बेची कन्ने,
पैसे चार कमाई गया,
अप्पूं पढ़ेया, होरबी पढ़ाये,
बड्डे बणाये कोई फौरना पुजाये,
अप्पूं मंगता बणी गया!
सबकुछ अपणा...

कुक्कड़ झांगां उठी-२,
सिरा पर टोकरियां चक्की-२
सब्जियां ल्यांदियां,
बेची कमाइयां करी गया,
होरनी री जिंदगी बणाई गया,
कने अपणी जालां च फंसाई गया,
मंगता मंगता हुईओ गया।
सबकुछ अपणा...

नेक बनेकी नौकरियां कित्तियाँ,
धन कमाया वजना ते ज्यादा,
लाले होरीं जो बणाई गया कने,
अप्पूं जो लाल्ले पाई गया।
अप्पूं मंगता बणी गया।
सबकुछ अपणा....

बकरे, अपणी जान गंवाई,
खाणे औल्यांजो मजा भीं नी आया,
सबनी री मौजां लाई गया,
कमाईंयां अपणी गंवाईं गया।
अप्पूं फेरी पछताईं गया।
सबकुछ अपणा...

मना रियां मना बिच रही गईयां,
हुण मंगणे ते बी डर लगदा ,
मन मंगणे जो नी करदा!
दुखदा दुखदा दुखी गया,
सुकदा सुकदा सुकी गया!
सबकुछ अपणा...

लिखदा -२ रहीओ गया,
अज्ज गांदा गांदा बी थकीओ गया।
मन अपणा मनाई लया,
सबनी रा कर्जा चुकाई गया।
सोची सोची दौड़ लगाईरी,
जीवन सफल बणाई लया,
बुढ़ापा बी मौजां लाईओ गया।
सबकुछ अपणा...


- बृज लखनपाल


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प्यार जिंदगी है,
प्यार बंदगी है।

प्रेम एक एहसास है,
प्रेम जीवन का आधार है।

मोहब्बत है तो
जीवन में जिंदादिली है।

जहांँ अनुराग है,
वही श्रद्धा है।

जहांँ विद्या प्रकाश है,
वहीं पर चेतना का उदय है।

प्रेम, ज्ञान, श्रद्धा
सजीवता के स्तंभ हैं।

- चेतना सिंह 'चितेरी'


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पुलवामा शहीदों को समर्पित

शत-शत नमन उन वीरों को,
जिसने अपने प्राण गवाएं,
मातृभूमि की रक्षा की खातिर,
माटी इसकी लहू से रंगाई।
सीना तान के डटे थे जवान,
लेकिन दुश्मनों ने घात लगाई।
फिर भी पीछे हटे नहीं वो,
हंसते हंसते अपनी जान गवाई।
वेलेंटाइन पर देश के रक्षक ने,
बलिदान देकर आशिकी निभाई।
लोग चैन से सो रहे थे उस दिन,
प्राण न्योछावर कर शहादत पाई।
बदले में क्या दे तुम्हे ए वीरों,
अंजुरी भर बस श्रद्धांजलि चढ़ाई।
14 फ़रवरी 2019 के दिन,
नम आंखों ने दी उन्हें विदाई।
जय हिंद,जय भारत।


- कांता शर्मा


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एक कविता
भावों के अवरुद्ध कंठ से
कैसे गाएं मोहक गीत।
कैसे भूलूं आज का दिन,
जो हुए हैं शहीद।
मेरे प्रियतम रहने दो न,
मत पहनाओं प्रेम जयमाल।
भावों के समुंदर में फिर से
आया है कोई भूचाल।
चलो चलें शहीदों की चिता पर,
करें अर्पित हम श्रद्धा सुमन।
जिनके लिए सुरक्षित है
हमारा देश व तन मन।


- रत्ना बापुली


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वतन का इश्क और पुलवामा के अंगारे

तुम महबूब के खतों को लेकर, कोमल गीत सुनाते हो,
वो बारूदी रास्तों पर, अपना काल बुलाते हैं।

तुम फूलों के उपहारों पर, झूठी कसमें खाते हो,
वो तिरंगे की खातिर, अपनी देह जलाते हैं।

पुलवामा के उन शेरों ने, यमराज का जबड़ा नापा था,
जिसके पौरुष की आहट से, सारा अम्बर काँपा था।

नहीं प्रेम में गुलाब चाहिए, ना कोई कोमल धागा है,
इन बेटों के भीतर तो बस, सोया सिंह ही जागा है।

धिक्कार उन्हें जो भूल गए, उन फौलादी इंसानों को,
जो हंसते-हंसते निगल गए, तोपों के गर्म दहानों को।

गर इश्क ही करना है तुमको, तो मिट्टी से करके देखो,
जीना है तो वीर बनो, वतन की खातिर मरके देखो!


- देवेश चतुर्वेदी "ईशान"


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जब ज़िंदगी सवाल बनकर घेर ले,
हर तरफ़ शोर, तुलना और डर हो,
तब ख़ामोशी से ख़ुद को थाम लेना,
यही सबसे बड़ा हुनर हो।
हर राय सच नहीं होती,
हर आवाज़ ज़रूरी नहीं,
जो मन को कमज़ोर कर दे भीतर,
वो बात मंज़ूरी नहीं।
जीत अक्सर उन्हें मिलती है,
जो दिखते नहीं, पर चलते रहते हैं,
भीड़ से अलग, अपने रास्ते पर
बिना रुके, बिना कहते रहते हैं।
हर ठोकर रोने को नहीं होती,
कुछ हमें मज़बूत बनाती हैं,
जो आँसू बचाकर सपनों के लिए रखे,
वही ऊँचाइयाँ पाते हैं।
नज़र जब मंज़िल पर टिक जाए,
तो भटकाव ख़ुद हार जाता है,
शोर थककर चुप हो जाता है,
और सफ़र आसान हो जाता है।
दुनिया बस बातें करती रह जाती है,
नाम उन्हीं का लिखा जाता है,
जो चुपचाप मेहनत करते हैं,
और आगे बढ़ते जाते हैं।


- आरती कुमारी


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है खाली जो दिल तो शौर करें क्यूँ ?
बेमतलब बातों पर गौर करें क्यूँ?

झेले है नखरे और धोखे हजारों,
शामिल फिर उसमें इक और करे क्यूँ ?

गंवाना है सबकुछ अपने तरीके,
दुनिया सा खुद का हम तौर करे क्यूँ ?

बनजारो जैसा ना कोई ठिकाना,
मेरे जेहन में वो ठौर करे क्यूँ ?

महफ़िल से शम्मा बूझा दे चलो फिर,
अंधेरी रातों से भौर करे क्यूँ ?


- स्वाति जोशी


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होली का हुड़दंग

मची है चारों ओर होली की हुड़दंग,
मस्ती में डूबा है आज हर रंग।
फागुन का मौसम है, दिन भी सुहाना,
मन चाहे बस गाना और मुस्कुराना।
पीकर भांग का मीठा प्याला,
झूम रहा है हर दिल मतवाला।
रंगों की बौछार में सब सराबोर,
गूँज रही है खुशियों की शोर।
ओ प्रिये! इस मधुर समां में,
तू है कहाँ इस रंगीन जहाँ में?
चारों ओर बसंत ने डेरा डाला,
हवा में घुला प्रेम का उजाला।
आ भी जा अब, देर न कर,
रंग दे जीवन प्यार से भर।
ऐसा रंग लगा दे अपने प्रेम का,
जो कभी न उतरे इस नेह का।
जैसे कृष्ण ने राधा को रंगा,
वैसा ही तू मेरे मन में उमंगा।
आकर तू भी रंग दे मेरे मन को,
होली के इस पावन उपवन को।


- गरिमा लखनवी


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रेडियो दिवस

खोल नभ के द्वार, विज्ञान ने रचा था तरंगों का नया संसार,
मार्कोनी ने नई राह दिखा, हवा में करवाया सन्देश संचार।
बिन तार, बिन आकार, आ गई थी खुशियाँ हर घर द्वार,
अनोखे इस यंत्र के आने से, जुड़ गया था ये सारा संसार।

आकाश ध्वनी गूंजी थी धरा पर, नगर-नगर और बस्ती-बस्ती,
उन्नीस सौ सत्ताईस में, चमक उठी आल इंडिया रेडियो की हस्ती।
“बहुजन हित्ताय, बहुजन सुखाय“ गाँव-गाँव आया ये सन्देश,
रेडियो की गूँज से महका, बना जन-जन का सुंदर परिवेश।

स्वतंत्रता संग्राम की ज्वाला में, रेडियो लाया जनचेतना का उजियाला,
समाचार, संगीत, नाटक, विचार संग, बन गया मनोरंजन का सहारा।
युद्ध हो या फिर हो उत्सव की बात, रखता चौकन्ना सबकों दिन-रात ,
फ़िल्मी धुनों संग आँख है लगती, और खुलती वन्देमातरम ध्वनी के साथ।

फिर टेलीविज़न और कंप्यूटर के, डिजिटल युग का दौर भी आया,
पर ये सब भी रेडियो की चमक-दमक को, फीका न कर पाया।
एफ.एम. की मधुर तरंगों ने, उड़ान में इसकी और पंख लगाए,
युवा मनों में जोश है भरता, देश प्रेम में कुर्बानी की राह दिखलाए।

आज भी आपदा में सबसे आगे, सच्चे संदेश रेडियो ही है लाता,
बिजली, मोबाइल नेटवर्क साथ छोड़ देते, पर रेडियो तोड़ता नहीं नाता।
इतिहास के उस दौर से वर्तमान के इस दौर तक,
रेडियो की है अलग पहचान,
कितनी भी तरक्की कर ले जमाना,
कम नहीं होगी रेडियो की आवाज़ और शान।


- धरम चंद धीमान


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पहला भाग- झप्पू-झप्पू पों-पों

झप्पू-झप्पू पों-पों
इसने कहा,उसने कहा,तुम भी कहो
जीवन-मृत्यु का कारण और प्रश्न है भाऊ
नहीं कहोगे तो कारण बनेगा सीधे मरो
मौक़ा मिले,न मिले मार दिए जाओगे बस
ग़लत है इल्ज़ाम कि ग़लत हैं वे सभी जन
जो जीते हैं,मरते हैं और करते हैं प्रेम
और डरते नहीं हैं किसी के भी बाप से
अच्छे हैं दिन और परेशान हैं सबके सब
सरकार करती नहीं है ज़रा भी परवाह
फटाफट क़ायम कर लेती है मौक़ा
नाता-रिश्ता बुलडोज़र ही बुलडोज़र
और सट-सटाक् झप्पू-झप्पू पों-पों
कहा मानोगे तो प्रश्र ही नहीं कहीं भी
कलंक धुल जाऍंगे,चकाचक हो जाऍंगे
उत्तर में पाओगे,पद,प्रतिष्ठा,पैसा हाॅं जी
और प्रति-नागरिक पाॅंच‌ किलो राशन
नज़र नीची,हाथ बंद,मुॅंह पर ताले लिए
अस्सी करोड़ हैं,जो लाभान्वित हैं मियाॅं
चुप-चुप झप्पी में सब झप्पू-झप्पू पों-पों
एक तुम ही हो भूतियानंदन शिरोमणि
जो वक़्त-बेवक़्त करते रहते हो भों-भों
इस भयाक्रांत समय में है नहीं कहीं अभय
और अगर है कहीं,तो है यहीं और है यही
पिंजरे में बंद बेशर्म तोताराम हो जाओ
इसने कहा,उसने कहा,तुम भी कहो
झप्पू-झप्पू पों-पों.

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दूसरा भाग- झप्पू-झप्पू पों-पों

तंत्र है,मंत्र है,षड़यंत्र है
भों-भों है चारों तरफ़ कि लोकतंत्र है
नॅंग-धड़ॅंग है,पारदर्शी है सब कुछ
हाथी पर सवार होकर आ रहे हैं राजाजी
राजाजी की टूटी है टाॅंग,कटी है नाक
फिकर नाॅट जी फिकर नाॅट,कौनौ नाही
ख़बर बुरी है,ज़रा अच्छी तरह पढ़िए
नॅंगे राजाजी के साथ नॅंगे ॳॅंग-रक्षक हैं
ॳॅंग-रक्षक हैं कि रक्षक ही भक्षक हैं
बदलते हैं भेष,भूषा,भाषा और मुखौटे
झप्पू-झप्पू पों-पों करते हैं जहाॅं-तहाॅं
कुर्सी-मार्ग पर चलते हुए भूल गए वृक्ष
चेहरे की कालिख को बताते हैं काजल
पीटते हैं पानी कि पीटते हैं हर हरा विचार
चुप हैं तमाम सुधिजन अपने दड़बों में
लकवाग्रस्त लोहा है बैंड-बाजों में शामिल
सिर्फ़ एक ही गूॅंज है झप्पू-झप्पू पों-पों
मज़े ही मज़े हैं सरकारी तरकारी के
रीढ़हीन होकर सज़दा करो,झुक जाओ
नित-नित दोहराओ,नित-नित पाओ
सरकारी ठेके से,सरकारी ठेंगे़ से
झप्पू-झप्पू पों-पों...


- राजकुमार कुम्भज


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बचपन

फिर से वही बचपन की तलाश में कट रही जिंदगी
जिसमें न डर, न छल, न कपट, न झूठ, न आलस
फिर से उल्लास, हँसी ठिठोली और बेबाकपन
भटक रहा हर दिन बस वही बचपन जीने को मन
खेलने को रस्सी-कूद , गिट्टियाँ और चोर सिपाही
खो-खो, आइस-पाइस, पिण्डुक और फुटबॉल,
सारा दिन स्कूल, मस्ती, लड़ना, प्यार और रुठना
सब याद आता है कि फिर से उस दौर में जीने को

माँ का हर दिन प्यार से पुचकारना कभी डांटना
प्यार से पुचकारना पापा का हर चीज़ लाना
सबकी लाड़ली होना इस बात पे इतराना रस्क करना
सखियों की लीडर होना उनके विश्वास पे खरा उतरना
काश वही पुराने दिन लौट आए, वही बेपरवाह
जिंदगी हो, वही सखियाँ हो, वही माँ पापा हो,
वही भाई बहन, वही सुंदर कपड़े, वही सुकून
भरी जिंदगी हो, बेपरवाह, रोक टोक न हो

पर अब तो जिंदगी का हर पल, हर दिन, हर साल
खत्म हो रहा है, अब जिंदगी पानी का बुलबुला है
बस अब जिंदगी में वही बचपन जीने को मन करता है
और अंदर एक बच्चा अभी भी ज़िदा है और जीता है


- सुमन डोभाल काला


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आहट

मेरे कदमों की आहट से
वर्तमान ठहर जाएगा और
भविष्य का चुपके से आगमन होगा।

मेरे कदमों की आहट से
देवी शक्तियां मोहित होगी और
दुष्ट शक्तियों स्थानांतरण करेंगी।

मेरे कदमों की आहट से
जीवन में प्रकाश का उदय होगा
और अंधकार का विनाश होगा।

मेरे कदमों की आहट से
हृदय में ज्ञान का उजाला होगा
और अज्ञान का ध्वंस होगा।


- डॉ. राजीव डोगरा


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वो शहर भी अनजान था
पहली मुलाकात थी जहाँ
बेदाग बन गयी है अब वहां
सच कहूं तो सारी यादें रह गयी है
जगह तो देख लेता हूँ पर तु मिलती कहाँ?
कैसे भूला दूँ, उस दिन को
जो पहली कॉल ही खास हो,
हंसी से शुरू हुई थी ये दास्ताँ...
अरमान भी था तुम हमेशा मेरे पास हो।
बातें करना और घूमना जो सिखाया तुमने
अब तक कहाँ भूल पाया हमने
अब भी हर उस जगह की पहचान होगी
जब तुम अपना हाथ मुझ पर दोगी
प्यार करना और थोड़ी लड़ना
इतना ही तो दास्तां था,
वो शहर भी अनजान था।
वो हर पल तो था हसीन
गलती मेरी हो या तेरी
आंख मेरा ही था गमगीन,
फिर भी मैं बेजुबाँ था
जब उस शहर से अनजान था।
अच्छी ख्यालों की ख्यालत हो तुम
मेरे नयनों के चैन हो तुम
मेरे जीवन के उस स्वर्ण सफर की,
हर क्यामत की इबादत हो तुम।
तुम्हारे बिना अब, बस अजनबी हूँ
तुम्हरी उस गली पर अब गुमनामी हूँ
अब उस गली में तुम्हारे जैसे हसीन कहाँ?
जाने के बाद मेरी खुशी का सीन कहाँ?
लेकिन...
तब भी तो मैं परेशान था
जब वो शहर से अनजान था।
मैं जहां हूँ वहां से तुम कोसों दूर हो
मानो अब मैं भी मजबूर हो
आयी तो थी इस कदर
जैसे साथ दोगी पूरे सफर,
सब मिल गया मिट्टी पर,जो भी पहचान था
वो शहर भी अनजान था।
वो शहर भी अनजान था।

- सूरजमल AKs


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बर्फ के बोझ तले

कोहरे की चादर लगती है बर्फ की तरह,
ठंडी हवाएं चल रही हैं, तूफ़ान की तरह।
पेड़ पौधे सब झुके हुए, बर्फ के बोझ तले,
सर्दियों का मौसम आया, ठंडक से लोग हाथ मले।

रातें लंबी और ठंडी, दिन छोटे और मंद,
कोहरे में सब कुछ लगता है जैसे सपने में बंद।
बाहर निकलना मुश्किल, घर में बैठे रहो,
गरम कप चाय का पीते रहो।

सूरज भी छिपा हुआ, बादलों की छांव में,
कोहरे की धुंध में, छुप गए सर्वोपने पड़ाव में।
सर्दियों का ये मौसम, कितना सुहाना है रंग,
गरमागरम पकौड़े, चलते अब चाय के संग।

ओस की बूंदें पत्तों पर, मोतियों जैसी गंग,
सर्दी की ठंडक, दिल को लगती है उमंग।
बर्फ की चादर में, सब कुछ है ढका हुआ संग,
सर्दियों का ये मौसम, कितना है सुहाना रंग।


- कै. डॉ. जय महलवाल अनजान


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आ गले लग जा तुम

आ गले लग जाओ तुम
कि याद बहुत आती हो तुम
हमदोनों ही एक ही है
तो फिर दूर क्यों खड़ी हो तुम?
तुम्हारे बगैर अब कोन है यहाँ, मेरा
एक तुम ही हो और तु ही सहारा
इस तरह अजनबी जैसी ना बनो तुम
अपने हो तु और दूजा ना हो तुम
खामोशी को तोडो अब तुम
दूर कर दो मन से शिकवे तुम
कह दो दिल की बाते अब,तुम
शांत रहकर मत तडपाओ मुझे तुम
एक भय सा जगा रखती हो मुझे तुम
खोने का डर जगाती हो मुझे, तुम
वक्त भी अच्छा है ये तो समझती हो तुम
आ गले लग आओ अब,तुम
कसम से,मेरे वादे को यकीन करो तुम
दूर ना जाऊंगा ,मानो मेरी बात तुम
गलती होती है सबो से, ये जानती हो तुम
लेकिन माफी भी तो होता है, ये मानती हो तुम
अब इतनी मुझे मत बैचेनी करो तुम
आ गले लग जाओ तुम


- चुन्नू साहा


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प्रेम उत्सव विशेषः लेखिका नीतू जी का पत्र पढ़िए






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Dearest vipul,

My beloved son

I m writing you this letter to invite you to become my valentine this year. As u r the most important n amazing person in my life. It's a day of love. N i love you the most in this world. I want to cherish my beautiful days I spent with you.

On this special occasion Of valentine. I pray to God almighty that we forever stay together. In the bond of love n friendship Coz u make me feel really special n wanted. I will be overwhelmed with emotions n love. To be celebrating this day with you As u complete me. 

So kindly give me the pleasure n make this special day memorable for me. You r the bestest thing happened to me. Waiting eagerly for your presence. 

Lots of love n blessings.

Your mom
Nitu


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प्रेम उत्सव विशेषः लेखक तौसीफ़ अहमद जी का पत्र पढ़िए





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मुहब्बत के हफ़्ते में एक ख़त रफ़ीका-ए-हयात के नाम


मेरी अज़ीज़ रफ़ीका-ए-हयात,


मुहब्बत का ये हफ़्ता जब कैलेंडर पर दस्तक देता है, तो एहसास होता है कि ये हफ़्ता रूह पर उतरती किसी नरम गुल की तरह है खूबसूरत, महकता और सुकून भरा। यूं तो इश्क़ किसी तारीख़ का मोहताज नहीं। पर हाँ, कुछ दिन ऐसे ज़रूर होते हैं जो इन लम्हों को और भी ख़ूबसूरत बना देते हैं।

सोचता हूँ, अगर गुलाब में ख़ुशबू न होती, चाँद में चाँदनी न होती और दुआओं में असर न होता, तो शायद हमें मोहब्बत की क़द्र यूँ महसूस न होती। जैसे बादल बरसकर अपने वजूद का सबूत देते हैं, वैसे ही इश्क़ भी एहसास बनकर रूह पर उतरता है।

कभी सोचता हूँ, अगर अल्फ़ाज़ में एहसास न होता, धड़कनों को नाम न मिलता तो मोहब्बत कैसी होती ?

तुम मेरे लिए मुकम्मल एहसास हो। तुम वो रिमझिम बारिश हो जो थकान धो देती है, वो ख़ामोश दुआ जो बिना आवाज़ असर कर जाती है। भीड़ में मेरी अचानक मुस्कान की वजह भी तुम ही हो।

इस हफ़्ते लोग गुलाब देते हैं, मैं तुम्हें अपना यक़ीन देना चाहता हूँ। लोग वादे करते हैं, मैं तुम्हें अपना सब्र और अपनी नीयत सौंपना चाहता हूँ। तुम सिर्फ़ हमसफ़र नहीं, मेरी सोच की रोशनी और हर फ़ैसले के पीछे की हिम्मत हो।

हमने एक-दूसरे की ज़िंदगी ओढ़नी है उसकी धूप भी, उसकी छाँव भी। तुम्हारा हर बार ख़ुद पर और हमारे रिश्ते पर लौट आने वाला यक़ीन मुझे सुकून और राहत देता है। यही एतमाद हमारे साथ की असली पूँजी है।

हम ज़िंदगी के आधे हिस्से के साझेदार नहीं, बल्कि एक ही दास्तान के दो सफ़्हे हैं जिन्हें साथ पढ़ा जाए तो मायने मुकम्मल होते हैं। मेरी दुआ है कि ये साझेदारी सिर्फ़ लम्हों की नहीं, उम्र भर की रफ़ाक़त बने।

अल्लाह से यही दुआ है कि हमारा ये साथ ता-दम-ए-हयात पुरसुकून, महफ़ूज़ और मुहब्बत से लबरेज़ रहे। आमीन।


तौसीफ़ अहमद
ब्रह्मपुर, बक्सर


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प्रेम उत्सव विशेषः लेखिका सारिका ठाकुर जी का पत्र पढ़िए





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प्रिय सतीश जी,

मोहब्बत के इस सुगंधित सप्ताह में आपको पत्र लिखते हुए हृदय भावनाओं से भीग उठता है। जीवन की इस लंबी यात्रा में जब-जब पथ कठिन हुआ, आपका साथ मेरे लिए आश्वस्ति की छाया बनकर खड़ा रहा। आप केवल मेरे जीवनसाथी नहीं, मेरे आत्मविश्वास का आधार और मेरे मन की शांति हैं।

हमारे रिश्ते की खूबसूरती उन अनकहे क्षणों में बसती है सुबह की चाय की चुस्कियों में घुली अपनापन की मिठास, दिनभर की थकान के बाद आपकी स्नेहभरी मुस्कान, और बिना शब्दों के एक-दूसरे की धड़कनों को समझ लेना। आपका विश्वास मुझे हर चुनौती से लड़ने का साहस देता है, और आपका स्नेह मेरी हर पीड़ा को सहला देता है।

मेरे लिए प्रेम कोई क्षणिक उत्सव नहीं, बल्कि एक सतत साधना है,जहाँ सम्मान, समर्पण और विश्वास के दीप निरंतर जलते रहते हैं। आपने मुझे सिखाया कि सच्चा प्रेम जिम्मेदारियों के निर्वाह में, धैर्य में और साथ निभाने की प्रतिबद्धता में झलकता है।

इस प्रेम सप्ताह पर मैं बस इतना कहना चाहती हूँ कि आपके साथ जीवन की हर ऋतु बसंत सी लगती है। आपकी मुस्कान ही मेरी सबसे बड़ी संपदा है, और आपका साथ मेरी सबसे अनमोल शक्ति।


स्नेह सहित
आपकी जीवनसंगिनी
सरिका


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प्रेम उत्सव विशेषः लेखिका सुमन डोभाल काला जी का पत्र पढ़िए




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मेरे प्रिय बच्चों,

फ़रवरी माह का दूसरा सप्ताह में प्रेम या मोहब्बत का उत्सव चलता है। मेरा सब कुछ तुम ही हो, मैं अपना प्यार, अपना दोस्त, अपना सब कुछ तुमको ही मानती हूं तो तुमको ही पत्र लिख रही हूं।

मोहब्बत का ये सप्ताह जीवन का बहुत ही खूबसरत अनुभव है। हमारे ये रिश्ते एक जन्म नहीं हजारों जन्मों का है, मेरे अंदर जो भी आत्मविश्वास आया है, वह भी तुम्हारी ही देन है।

हर कदम पर तुम्हारा साथ पाकर अभिभूत हूँ, बच्चे भी प्यार बनकर जीवन में खुशियां लेकर आते हैं, इस बात से मन बाग़-बाग़ हो जाता है। तुम मेरी और मैं तुम्हारी हर भाषा, हर मौन, हर भाव को समझ लेते हैं। यही तो हमारे जीवन का अटूट रिश्ता है।

वैसे ये मोहब्बत का सप्ताह वाला प्यार नहीं यह आजीवन जिंदगी का अटूट रिश्ते प्यार है। यही तुम्हारा प्यार मुझे जीवन के कदम-कदम पर हर चुनौतियां व कठिनाइयों से पार करने और आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।

इस मोहब्बत के सप्ताह को आदमी भूल न जाये इस वजह से यह सप्ताह जीवन का अनमोल न भूलने वाला सप्ताह होता है। बस तुम भी अनवरत न भूलने वाला हिस्सा, धड़कनों में रचे बसे हो। हमेशा ही जन्म जन्मांतर का यह रिश्ता, तुम्हारी हर मुस्कान, तुम्हारा साथ पाकर धन्य हो उठी हूँ।

मेरे प्रिय बच्चों बहुत बहुत स्नेह और आशीर्वाद

तुम्हारी माँ सुमन डोभाल काला
देहरादून, उत्तराखंड



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