साहित्य चक्र

05 August 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 6 अगस्त 2026









दोस्ती

अश्कों की नमी सी है दोस्ती हमारी,
छलक जाये बातों बातों पर मेरी तुम्हारी ।

युगों से चलती एक प्रेम की रीत पुरानी,
सिर्फ इस रिश्तें में चलती बचपन की नादानी।

पवित्र गंगाजल सी मन में समाहित हो जाती,
संज्ञा रहित मुझे पूर्ण की अनुभूति कराती।

बचपन जवानी बुढ़ापे की कहानी है जीती,
फिर भी नहीं लगता कोई निशानी बीती।

भोर और सांझ के निःस्वार्थ मिलन सी,
न वादे, न दायरे, न उम्मीदों की चुभन सी।

प्रार्थना,श्रद्धा,जड़ी बूटी का घुला अटूट मिश्रण,
मौन चुप्पी भाषा का करती बेजोड़ चित्रण।

अलंकारों, छंदों का उजास बिखेरती,
वक्त के दीमक को है पल में समेटती।

दूरियों में भी मेरे एहसासों को बांधती,
रूठने मनाने के न जाने कितने सिलसिले लांघती।


खुशी गम दोनों में संगम सी है मिलती,
गंगा जमुना के अविरल प्रवाह सी है चलती।


- अंशिता त्रिपाठी


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दोस्ती

दोस्ती नही कभी आजमायी जाती,
ये तो बस आपस में निभाई जाती।

ऊंच नीच का फर्क नही है दोस्ती में
बिना भेद के दोस्ती अपनाई जाती।

सवाल जबाब से परे रहती दोस्ती,
विश्वास एक दूसरे पर कमाई जाती।

दोस्त दूर या पास रहते सदैव खास,
दूरियां दिलों की इसमें मिटाई जाती।

मुश्किल में ढाल बन जाते हैं दोस्त,
दोस्ती ऐसी मुश्किल से पाई जाती।

जीवन को बीच मंझधार में नही छोड़े,
ऐसी दोस्ती कठिनाई से बनाई जाती।


काले धूसर रंगों से भरे जीवन को भी,
सतरँगी बनाना दोस्ती को बताई जाती।

दोस्ती नही कभी आजमाई जाती,
ये तो बस आपस मे निभाई जाती।


- रूचिका राय


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साथी

साथी, दो जिस्म एक है जान,
साथी है तो, काम सब आसान,
मन की सारी व्यथा
साथी ही है, जो सुनता।

औरों के क्या कहने,
रहते वो सदैव, छलने,
साथी, जीवन के आन, बान शान,
साथी है तो, तू है महान।


- चुन्नू साहा



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जंतर-मंतर

विज्ञान के
आने से
चमत्कार तो
बंद हुए
मगर
जंतर-मंतर
अभी भी
कायम हैं
कोई माने
या न माने
जंतर-मंतर
होता
जरूर हैं
कोकरोच किसी
और ने कहा
भड़का कोई
भूखा कोई
लठ्ठ खाये कोई
झुका कोई
इस्तीफा दिया कोई
मंत्री बना कोई
सच में
जंतर-मंतर
होता है!


- डॉ. जितेन्द्र बोयल


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पहला मित्र


हँसी बाँटी, आँसू बाँटे,
साथ चले हर धूप-बरसात।

न कोई बंधन, न अनुबंध,
मन से मन का था संबंध।

राहें भले बदल गईं आज,
स्मृतियाँ अब भी हैं हमराज़।

दूरी चाहे जितनी आए,
स्नेह कभी कम हो न पाए।

आज मित्रता-दिवस के दिन,
याद तुम्हारी आई फिर।

जहाँ रहो, मुस्काते रहना,
जीवन-दीप जलाते रहना।

पहला मित्र न भूल सकेगा,
मन जब तक धड़कन लिखेगा।


- नरेंद्र मंघनानी


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बस तेरा साथ चाहिए

भले ही राहें मुश्किल हों और मंजिल दूर,
पर तेरा साथ हो तो हर सफर मंजूर।
थामे रहना तुम हाथ मेरा...
हर वक़्त साथ चाहिए तुम्हारा।

मुझे चलने के लिए कारवाँ नहीं चाहिए
लड़खड़ा जाए पावं मगर,
ए दोस्त... बस हाथ चाहिए तुम्हारा,
हर वक़्त साथ चाहिए तुम्हारा।

नाराज़गी में भी एक आस होती है,
सच्ची दोस्ती वाकई हमेशा खास होती है।
लड़खड़ाने न देंगे कभी कदम तुम्हारा,
हर वक़्त साथ चाहिए तुम्हारा।


- सूरजमल AkS


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मैं चाहता हूं

जीवन को जीना एक ख्वाब है,
मैं उस ख्वाब से जीवन जीना चाहता हूं।

मिलती है हर कदम में ना उम्मीदियां मुझे,
मैं उन ना-उम्मीदिया के संग ख्वाब सजाना चाहता हूं।

यह जग नहीं प्रपंच है भ्रमों का
मैं उन भ्रमों से परे उम्मीदों का दीपक जलाना चाहता हूं।

तुम्हारा जाना, गमों का आना
ख्वाबों का टूटना, टूटे ख्वाबों के संग आँखों का रोना।

रोती आँखों से मन का विचलित होना, होते है जीवन के संग
इन सब को एक तरफ कर मैं अपनी
सफलता का प्रकाश बिखेरना चाहता हूं।

जीवन को जीना एक ख्वाब है,
मैं उस ख्वाब के संग जीवन जीना चाहता हूं।


- कमल जोशी


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डायरी की कहानी

वो डायरी,
जो महीनों से खाली थी।
खुलती रोज थी,
ओर वैसे ही बंद हो जाती थी।

फिर एक दिन आया,
जो शब्दों का सैलाब लाया।
जो बातें दिल तक नहीं रुकी,
वो डायरी में समा गई।

आज पन्नों पर स्याही है,
स्याही में शब्द हैं,
शब्दों में गहराई है,
और डायरी बोल रही हैं।

अब वो डायरी,
जो कभी खाली थी,
मुझसे बात करती है।
मैं उसे , वो मुझे,
अपने किस्से बताया करती है।


- दीपा पाण्डे


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"ताजा ताजा है"

उम्र पर धूल जमी वक्त की आंधियों की,
पर याद तुम्हारी आज भी ताज़ा-ताज़ा है

न शिकवा न कोई गिला है ज़माने से,
पर आज भी ये घाव मेरा ताज़ा-ताज़ा है

भुलाने की कोशिश में सावन भी गुज़र गया,
पर प्यार की बारिश आज भी ताज़ा-ताज़ा है

दफ़न कर दिए कई पन्ने खतों के,
पर उनकी खुशबू आज भी ताज़ा-ताज़ा है

रिश्तों के कई फूल मुरझा कर गिर गए,
पर उनकी चुभन आज भी ताज़ा-ताज़ा है


- रत्ना बापुली


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प्रेम-डोर जब थाम ली, जुड़ते सकल जहान।
अहं तनिक जो बीच में, उजड़े सब उद्यान॥

धागे के दो छोर हैं, दो जीवन के द्वार।
एक सँभाले याद को, दूजा दे विस्तार॥
कंपन-कंपन कह रहा, जीवन रचा विधान-
प्रेम-डोर जब थाम ली, जुड़ते सकल जहान॥

खींचा यदि अहंकार ने, टूटी हर पहचान।
जीत गए शब्दों मगर, हार गया इंसान॥
झुककर जिसने बाँध ली, वही रहता महान-
प्रेम-डोर जब थाम ली, जुड़ते सकल जहान॥

प्रेम न केवल भाव है, जीवन का आधार।
सूखे मन में भी जगा, हरियाला संसार॥
बाँट सका जो नेह को, पाया अमृत-दान-
प्रेम-डोर जब थाम ली, जुड़ते सकल जहान॥

विश्वासों की उँगलियाँ, थामे जब विश्वास।
अदृश्यों में दिखने लगे, सृष्टि-हृदय के पास॥
ब्रह्मांडों की डोर भी, प्रेममयी पहचान-
प्रेम-डोर जब थाम ली, जुड़ते सकल जहान॥


- डॉ. प्रियंका सौरभ


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निश्चल संवेदना

बदलते वक्त के साथ
बहुत कुछ बदलता देखा
मित्र को शत्रु बनते
शत्रु को मित्र बनते देखा।
जानता भी नहीं था जिनको
उनको अपना बनते देखा
और जानता था जिनको
उनको पराया होते देखा।
भागता रहा हमेशा ही
अपनों की तलाश में
खोजता रहा भावनाओं के द्वार
हर किसी के हृदय में।
अन्वेषण करता रहा
विचारों को समझने वालों की
खोजता रहा मन के मीतों को
जो समझ जाए मेरे हृदय की
हर निश्चल संवेदनाओं को।


- डॉ.राजीव डोगरा


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चूहे जो मिली सुंडी री गठी
सै पण्सारी बणी गया,
सुंडी री गठी रा खोली कन्ने पण्सारखाना
सै अमर हुई गया,
गल्ला कत्थी कन्ने लोक बणादें ख्वाणे,
बराक आई कन्ने जीभा ज़बानी पर
सै अमर हुई गया,
चूहे जो मिली सुंडी री गठी
सै पण्सारी बणी गया,
छड्डी दित्ते कुतरने लेफ रजाईयाँ
छड्डी दित्ता कड्डणा मस्सकेर,
पण्सारखाने रे चक्करा बिच पई कन्ने
भूली गया बिला रा बी फेर,
भूली गया बिला रा बी फेर,
देखी कन्ने बिल्ली मिंजो
तुनकणे लगी कानाओं अपणे
बणने लगी गई शेर,
तिस्सा जो देखी कन्ने, सोचा बिच पई गया चूहा
चार-चफेरे नज़रां घुमाईयाँ,करदा सोच-विचार -
सुंडी री गठी जे नईं मिली हुंदी
न आऊँदी आफ़त, न बणदा पण्सारी,
खरा था सै बिल, खरा था सै मस्सकेरा रा ढेर
न तुनकणे थे कान बिल्लिया, न तिस्सा बणना था शेर।


- बाबू राम धीमान


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फकीरों की संसार

ये है फकीरों की अद्भूत संसार
यहाँ नहीं लगती दौलत की बाजार
हर जन मस्ती में यहाँ है चूर
चिन्ता फिक्र है जहाँ से कोसों दूर

दिल से है हर जन जन धनवान
लुट खसोट की नहीं कहीं है दुकान
हर शख्स अपने में है यहाँ मगरूर
वैमनस्यता को ना जगह है हुजूर

हर मन में बसा है शांति की अरमान
सब ग्रामीणों पे रब है यहाँ मेहरवान
हर चेहरे पे झलकता यहाँ पे नूर
खुदा को भी है ये नगर मंजूर

भाईचारा की सबका जहाँ कारीबार
बेईमानों की ना है कोई भी व्यापार
ईमानदारी की है जहाँ रस्म। दस्तूर
हर जन जन पे छाई है हँसी की सरूर

काश ! इस जगत सा होता ये संसार
दुश्मन भी शर्म से हो जाता शर्मसार
दोस्ती के लिये हर मानव होता मजबूर
मस्ती में झूमता कण कण में मजकूर


- उदय किशोर साह


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आना-जाना लिखते हो।
खोना- पाना लिखते हो।

चुन-चुन कर अल्फ़ाज़ सही,
हाल ज़माना लिखते हो।

लिखते हो बातें अपनी,
सच बेगाना लिखते हो।

ग़ज़लों में तुम जीवन का,
ताना -बाना लिखते हो।

दिखलाकर सबको सपना,
मन समझाना लिखते हो।

मुश्किल,आसाँ हो सबका,
आबो-दाना लिखते हो।

बातों ही बातों में तुम,
तीर चलाना लिखते हो।


- नवीन माथुर पंचोली


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नारी

नारी की क्या परिभाषा दूं।
वो तो जग की एक आशा है।
उसकी शक्ति और प्रेम ही तो है जो,
इस घर को मंदिर बनाती है।

पूजा है, अर्चना है,
वो शंकर की साधना है।
कभी रीति के रिवाजमें,
वो देवी है हर लिबाज में।

ज्वाला है, पवन है,
वो बहती शीतल गंगा की धारा है।
कविता है, कहानी है,
वो हर महाकाव्य की गाथा है।
लक्ष्मी है, सरस्वती है
वो रणभूमि की महाकाली है।

भक्ति है उस नारी की,
शक्ति है उस चिंगारी की।
जितना तुम उसे दबाओगे
एक ज्वाला को भड़काओगे।

देखा तप-तप के शोलों पे,
ये जल-बन चुका ज्वाला है।
तोड़ बेड़ियाँ सदियों की,
अब नारी ने रण संभाला है।

छोड़कर शृंगार रस की बातें,
शक्ति ने उठालिया भाला है।
जीत लिया ज़मी से नभ तक,
इतिहास नया रच डाला है।
निकल के खुले गगन में,
पहनी विजय श्री माला है।

जिससे पूर्ण होता है ब्रह्मांड,
यही तो नारी की परिभाषा है।


- समृद्धि विश्वकर्मा


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आपका परिचय

आपकी परिचय है खुद आपकी व्यवहार
वार्तालाप का लहजा बताता है संस्कार
चाल चलन है नमूना तेरा तेरे का परिवार
कुछ पूछने बताने की नहीं है अब दरकार
आपकी करतूत से दिखता आपकी विचार
सूरत आपका बतलाता है आपकी संसार
संवाद दिखलाता है आपकी अहंकार
कुछ पूछने बताने की है नहीं अब दरकार
करते हो पड़ोसी से गर नित्य ही तकरार
पता चलता है आपके जेहन की कुविचार
तेरी आदत बन गई तेरी ही। सहचार
कुछ पूछने बताने की नहीं है अब दरकार
गुरूर से पता चलता है तेरी घर का द्वार
हनक दिखलाता है तेरी कितना हो समझदार
जिद बालाता है तेरी खुद की आचार विचार
कुछ पूछने बताने की नहीं है अब दरकार
घमंड की बगिया को है जो भी बयार
औछेपन की नगरी का हो तुम बाजार
बात बात पे करते है किसी के साथ र्दुव्यवहार
कुछ पूछने बताने की नहीं है अब दरकार


- उदय किशोर साह


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दो लफ़्ज़ लिखूँ माँ के लिए,
पर क्या ही लिखूँ
प्यार लिखूँ या संसार लिखूँ
या अपने जीवन का सारांश लिखूँ,
दो लफ़्ज़ लिखूँ वह भी कम
आखिर क्या ही लिखूँ,
मैं इतना कामयाब नहीं
कि माँ के बारे में कुछ लिख सकूँ,
दो लफ़्ज़ लिखूँ माँ के लिए
पर क्या ही लिखूँ,
माँ के होने से जीवन में खुशी
उन्नत प्रगति है,
दो लफ़्ज़ लिखूँ आखिर क्या ही लिखूँ,
माँ का होना क्यों जरूरी है
इसके बारे में क्या ही लिखूँ,
दो लफ़्ज़ लिखूँ माँ के लिए
पर क्या ही लिखूँ।


- प्रीत मौर्या


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अपने ज़मीर से लड़लूं, कोई अखबार हो जाऊं

​हक़ की बातें न करूं मैं सच्चाई से दूर हो जाऊं,
अपने ज़मीर से लड़लूं, कोई अख़बार हो जाऊं।

​मेरे दिल को हो गया भरम कि मैं फ़रिश्ता हूं,
मगर डर लगता है ज़माने से इंसान हो जाऊं।

​तिजारत का है बाज़ार, हर चीज़ यहां है सस्ती,
ज़माने के साथ चलूं ईश्क़ का बाज़ार हो जाऊं।

​उससे है गर मुहब्बत तुझको तो सोचना क्या है,
बेहतर है कि बस उसका ही तलबगार हो जाऊं।

​ग़लतियां मेरी नहीं हैं फ़िर भी अब बहुत सोचूं,
बड़ा हूं घर का अब मैं ही समझदार हो जाऊं।

​ईश्क़ के सभी रिश्ते यहां कच्चे धागों से बंधे हैं,
मैं भी इस खेल का मुश्ताक़, फ़नकार हो जाऊं।


- डॉ. मुश्ताक अहमद शाह "सहज़"


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तुम्हारी गलियों का कुछ और सच है,
सिर्फ चुप रहना ही तुम्हारा कवच है।

करके भरोसा नक्शे कदम पर चला,
आंख खोला तो हर कदम पर गच है।

हर चाहतें लूटा दी सिर्फ तेरे भरोसे पर,
सबकुछ पचाने वाले! ये क्यों अपच है?

सनद रहे चोरी सीनाजोरी सदा नहीं चलती,
बाहर मौन है मगर अंदर रहा शोर मच है।

विकास उसके सर से पगड़ी उतरेगी एकदिन जरूर,
सर छुपा के जिन्दा है भला बताओ कैसा सरपंच है ?


- राधेश विकास


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सावन की बूँदे

मुझे सावन की बूंदों से
बहुत सी बातें करनी है,
बहुत कुछ पूछना है...
जब तुम मोती बनकर
ठहर जाती हो पत्तों पर,
क्या भय नहीं होता
अपने अस्तित्व के अंत होने पर ?
जब गिरती हो किसी की
कोमल हथेली पर,
सच सच कहना...
क्या जी लेती हो जी भर ?
तुम हमेशा बिछड़ जाती हो
अपने बादलों से ,
फिर उनसे मिलन कब होता है ?
क्या तुमसे बिछड़कर
तुम्हारी तरह बादल भी रोता है ?
कर देती हो ये धरा हरी भरी
लेकिन तुम पगली प्यासी सी
किसी ओस के पत्ते पर पड़ी,
निहारती हो धूप को,
खुद का अंत होने तक
सावन की बूंदों मुझे तुमसे
बहुत कुछ पूछना है ...
आखिर इतना धैर्य तुम कहां से लाती हो ?
समुंदर में गिरो तो सीप का मोती
मिट्टी में गिरो तो खुशबू बन जाती हो।


- मंजू सागर


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02 August 2026

विकास और पर्यावरण पर लेखकों की विशेष लेखमाला पढ़िए






विकास के नाम पर पेड़ों का काटना कितना सही ?


पेड़ हमारे जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।पेड़ों के बिना इंसान का अस्तित्व बिल्कुल शून्य है। पेड़ों को विकास के नाम पर काटना बिल्कुल भी सही नहीं है।परंतु इनके काटने के बिना जीवन में कई आवश्यक वस्तुओं का अभाव हो जाएगा।ग्रामीण क्षेत्रों में अभी अधिकतर लोग रसोई घर में ईंधन के रूप में लकड़ी का इस्तेमाल करते हैं,पशुओं के लिए चारा इमारती लकड़ी,भूमि अपरदन से रोकते हैं और सबसे महत्वपूर्ण ये कि पेड़ हमें सांस लेने के लिए ऑक्सीजन देते हैं और हमारी छोड़ी हुई कार्बनडाक्साइड गैस को ग्रहण करते हैं।


पृथ्वी पर सभी प्राणियों का जीवन मुख्यत:पेड़ों पर ही टिका है।विकास के नाम पर पेड़ों को हम काट तो रहे हैं परंतु ये भी सोचने का विषय है जिस अनुपात में पेड़ काट रहे हैं क्या उस अनुपात में नए पौधे लगा भी रहे हैं कि नहीं।अक्सर हम देखते हैं कई बड़े बड़े फलदार पेड़ जिन्हें हमारे पूर्वजों ने लगाया था उनके फल और उनसे कई प्रकार के लाभ हम उठा रहे हैं।क्या हम भी अपनी आने वाली पीढ़ियों के बारे में सोच रहे हैं या नहीं।


सरकार द्वारा अक्सर पेड़ों के महत्व को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय स्तर की योजनाएं चलाकर रखी हैं।जैसे कि एक पेड़ मां के नाम परन्तु हर बार पेड़ लगाने ही नहीं हैं अपितु जो पेड़ लगाए हैं क्या उनकी हम देखभाल भी कर रहे हैं या नहीं।हमारे पूर्वजों यूँ ही पेड़ों की पूजा नहीं करते थे जैसे पीपल की पूजा करना।वे इस बात से भली भांति परिचित थे कि पेड़ सभी प्राणियों में प्राण वायु का संचार करते हैं बल्कि पीपल तो दिन रात हम सभी को ऑक्सीजन देता था।वे तो यहां तक कहते थे शाम या रात के समय किसी प्रकार का पत्ता फूल फल सब्जी नहीं तोड़ी जाती  क्योंकि ये पौधे भी रात का सोए होते हैं।


प्रोजेक्ट जैसे सड़कों व रेलवे लाइन का विस्तारीकरण बड़े  बड़े भवन जो विकास की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं पर उनकी महत्वता के कारण पेड़ों के काटने को भी बढ़ावा नहीं दिया जा सकता। हम पर्वतीय राज्यों में कई वर्षों से बरसात के दिनों इस बेतरतीब दोहन के परिणाम भयंकर बाढ़ बादल फटने जैसी घटनाओं के रूप में देख चुके हैं। अत:इस पावन कार्य की शुरुआत के लिए हमे सरकारों की तरफ ताकना बंद करना होगा जितना राज्य करता हमे भी राज्य के साथ कंधे से कंधा मिला कर पेड़ों की रक्षा कर पर्यावरण को बचाकर देश सेवा में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी।


                                                                           - राज कुमार कौंडल


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विकास के नाम पर पेड़ों को काटना कितना सही है ?


"यदि पृथ्वी पर जीवन को सुरक्षित रखना है, तो विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना ही होगा।"

वर्तमान युग को विकास का युग कहा जाता है। नई सड़कें, चौड़ी राष्ट्रीय राजमार्ग, मेट्रो रेल, उद्योग, बहुमंजिला इमारतें, स्मार्ट सिटी और आधुनिक सुविधाएँ किसी भी देश की प्रगति के प्रतीक मानी जाती हैं। प्रत्येक राष्ट्र अपने नागरिकों को बेहतर जीवन, रोजगार और आधारभूत सुविधाएँ उपलब्ध कराने के लिए विकास कार्यों को गति दे रहा है। 

किंतु इस विकास की दौड़ में सबसे अधिक नुकसान यदि किसी का हुआ है, तो वह प्रकृति का हुआ है। विशेष रूप से पेड़ों की अंधाधुंध कटाई ने पर्यावरण के सामने गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। ऐसे में यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या विकास के नाम पर पेड़ों को काटना उचित है?

पेड़ केवल प्रकृति की सुंदरता नहीं बढ़ाते, बल्कि वे पृथ्वी पर जीवन के सबसे बड़े रक्षक हैं। वे हमें शुद्ध ऑक्सीजन प्रदान करते हैं, कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर जलवायु परिवर्तन की गति को धीमा करते हैं, वर्षा चक्र को संतुलित बनाए रखते हैं तथा मिट्टी के कटाव को रोकते हैं। जंगल असंख्य वन्य जीवों और पक्षियों का प्राकृतिक आवास हैं। 

औषधियों, फल, फूल, लकड़ी और अनेक प्राकृतिक संसाधनों का आधार भी पेड़ ही हैं। भारतीय संस्कृति में तो वृक्षों को देवतुल्य माना गया है। पीपल, बरगद, नीम और तुलसी जैसे पौधों की पूजा केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि प्रकृति संरक्षण की एक वैज्ञानिक परंपरा भी रही है।

वर्तमान समय में विकास परियोजनाओं के लिए बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई की जा रही है। इसके परिणाम अब स्पष्ट दिखाई देने लगे हैं। वैश्विक तापमान में निरंतर वृद्धि, असामान्य वर्षा, भीषण गर्मी, बाढ़, सूखा, वायु प्रदूषण और जैव विविधता का ह्रास मानव अस्तित्व के लिए गंभीर चुनौती बन चुके हैं।

बढ़ती जनसंख्या और बदलती आवश्यकताओं के अनुरूप सड़कें, विद्यालय, अस्पताल, उद्योग और परिवहन सुविधाएँ आवश्यक हैं। लेकिन विकास का अर्थ प्रकृति का विनाश नहीं होना चाहिए। वास्तविक विकास वही है जो पर्यावरण की रक्षा करते हुए मानव जीवन को बेहतर बना। 

 आधुनिक तकनीकों, हरित भवनों, शहरी वनों और पर्यावरण-अनुकूल निर्माण पद्धतियों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। केवल पौधारोपण कार्यक्रम आयोजित करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि पौधों का संरक्षण और संवर्धन भी उतना ही आवश्यक है।

इस दिशा में नागरिकों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रत्येक व्यक्ति यदि अपने जीवन में कम-से-कम एक पौधा लगाकर उसकी जिम्मेदारी ले, तो पर्यावरण संरक्षण का बड़ा अभियान सफल हो सकता है। विद्यालयों में पर्यावरण शिक्षा को व्यवहारिक रूप दिया जाए, ताकि बच्चों में प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता विकसित हो। 

महात्मा गांधी ने कहा था- "पृथ्वी हर व्यक्ति की आवश्यकता पूरी कर सकती है, लेकिन हर व्यक्ति के लालच को नहीं।"

इस प्रकार कहा जा सकता है कि विकास के नाम पर अंधाधुंध पेड़ों की कटाई किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। हमें ऐसे विकास मॉडल को अपनाना होगा जिसमें प्रकृति और प्रगति एक-दूसरे के पूरक बनें, विरोधी नहीं। यदि हम आज वृक्षों की रक्षा करेंगे, तभी आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित, समृद्ध और हरित भविष्य दे सकेंगे। इसलिए हमारा संकल्प होना चाहिए- "विकास भी, पर्यावरण भी; प्रगति भी, प्रकृति भी।"


                                                              - मनोज कौशल, शिक्षक (हिंदी)


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वृक्ष: धरती की साँस, मानवता की आशा


"यदि वृक्ष हैं, तभी भविष्य है।" यह केवल नारा नहीं, बल्कि मानव सभ्यता का शाश्वत सत्य है। भारतीय संस्कृति में प्राचीन काल से वृक्षों को देवतुल्य माना गया है। पीपल, वट, नीम और तुलसी हमारी आस्था, संस्कृति तथा जीवन के प्रतीक हैं। ऋषि-मुनियों ने वृक्षों की छाया में ज्ञान प्राप्त किया और हमारे धर्मग्रंथों ने प्रकृति संरक्षण को मानव का परम धर्म बताया है।

वैज्ञानिक दृष्टि से वृक्ष पृथ्वी के जीवन-रक्षक हैं। एक परिपक्व वृक्ष प्रतिवर्ष लगभग 22 किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित कर वातावरण को शुद्ध करता है। संयुक्त राष्ट्र भी मानता है कि जलवायु परिवर्तन से लड़ने का सबसे प्रभावी प्राकृतिक उपाय वनों का संरक्षण है। जापान में फ़ॉरेस्ट बाथिंग को स्वास्थ्य उपचार का हिस्सा बनाया गया है, जबकि कोस्टा रिका ने अपने वनों का सफल पुनर्जीवन कर विश्व के सामने अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया है।

विडंबना यह है कि हम विकास की ऊँची इमारतें खड़ी करने की होड़ में उन्हीं जंगलों की नींव उखाड़ रहे हैं, जिन पर मानव सभ्यता टिकी है। आज पेड़ों को काटकर सड़कें चौड़ी की जा रही हैं, पर शायद हम यह भूल रहे हैं कि कल इन्हीं सड़कों पर स्वच्छ हवा की तलाश करनी पड़ सकती है।

वृक्ष केवल फल, फूल, औषधियाँ और छाया ही नहीं देते, बल्कि असंख्य जीवों का आश्रय भी हैं। यदि वृक्ष नहीं रहेंगे, तो वर्षा, स्वच्छ वायु और जीवन—तीनों संकट में पड़ जाएंगे। इसलिए आइए, संकल्प लें कि एक भी वृक्ष अनावश्यक न कटे, क्योंकि वृक्ष बचेंगे, तभी मानवता बचेगी।


- रोशन कुमार झा, जमशेदपुर


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विकास के नाम पर पेड़ों को काटना कितना सही है ?


इस लेख को लिखने से पहले मैं अपनी माननीया राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु जी के उस भाषण का ज़िक्र करूंगी, जो उन्होंने पर्यावरण राष्ट्रीय सम्मेलन 2025, विज्ञान भवन, नई दिल्ली में दिया था। इस भाषण में उन्होंने पेड़ों और धरती को नमन और क्षमा मांगने वाली बहुत सुंदर बात कही थी।

राष्ट्रपति जी ने अपने बचपन की बात बताते हुए कहा:- "मेरे पिता और माता लकड़ियां एकत्र करते थे। फिर वे उन्हें छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर जलाने लायक बनाते थे। मैं हर दिन देखती थी कि मेरे पिता लकड़ियों को काटने से पहले उनके आगे झुकते थे। मैं अपने पिता से पूछती थी, आप लकड़ियां काटने से पहले प्रार्थना क्यों करते हैं? वह मुझसे कहते थे कि वह क्षमा मांग रहे हैं।"

उन्होंने आगे कहा कि पर्यावरण संरक्षण का संदेश देते हुए राष्ट्रपति ने याद किया कि कैसे उनके पिता खाना पकाने और कृषि के लिए पेड़ों एवं धरती का उपयोग करने से पहले उनको नमन करते थे तथा उनसे क्षमा मांगते थे।

इसका मतलब क्या था ? राष्ट्रपति जी का कहना था कि हमारे पूर्वज प्रकृति को बहुत सम्मान देते थे। पेड़ काटने से पहले, धरती पर फावड़ा चलाने से पहले हम धरती माँ से नमन करके क्षमा मांगते थे। क्योंकि हम जानते थे कि हम प्रकृति से ले रहे हैं, इसलिए उसका सम्मान करना जरूरी है। उन्होंने लोगों से सवाल किया कि "क्या उन प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट करना उचित है, जिन्हें मनुष्य स्वयं नहीं बना सकता?"

यह भाषण पर्यावरण को बचाने और प्रकृति के साथ समन्वय का बहुत सुंदर संदेश है। उन्हें संरक्षित करना हमारा धर्म है। कहा भी गया है- "वृक्षो रक्षति रक्षितः" अर्थात तुम उसकी रक्षा करो, वह तुम्हारी रक्षा करेगा। अब प्रश्न यह उठता है कि यदि हम अपने वृक्षों की रक्षा नहीं करेंगे तो हमें क्या-क्या प्राकृतिक आपदा झेलनी पड़ेगी ?

शुद्ध हवा की कमी- पेड़ों के कटने से ऑक्सीजन कम होती है और प्रदूषण बढ़ता है। प्राकृतिक आपदा- जंगल उजड़ने से बाढ़ और मिट्टी खिसकने का खतरा बना रहता है। इसके कारण कभी भूस्खलन, कभी अत्यधिक वर्षा, कभी सूखा आदि की संभावना रहती है। बेघर होते जीव- पेड़ों पर या जंगल में रहने वाले पशु-पक्षियों का आशियाना छिन जाता है। भोजन की तलाश में वे बस्तियों में आ जाते हैं, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ता है। यह प्रकृति के नियम के विरुद्ध है।

बेहतर विकल्प और समाधान-

1- पेड़ों का प्रतिस्थापन: जितने पेड़ काटे जाएं, उससे कई गुना अधिक पेड़ लगाए जाएं। पर यह विधि आंशिक फलदायक है क्योंकि पौधे को पेड़ बनने में समय लगता है।

2- पेड़ों को शिफ्ट करना: काटने के बजाय पेड़ों को सुरक्षित तरीके से दूसरी जगह स्थानांतरित किया जाए।

3- विकास योजना में बदलाव: ऐसी योजना बनाई जाए जिसमें कम से कम पेड़ कटें।

प्रकृति और पेड़ हमारे जीवन का आधार हैं। यदि वे नहीं होंगे तो हम जीएंगे कैसे? प्रकृति ने हमें बहुत कुछ दिया है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो प्रकृति के पास अथाह संपत्ति है हमें देने के लिए, पर यह संपत्ति भी करोड़ों वर्षों के परिश्रम से हमें प्राप्त हुई है।

वैज्ञानिकों के अनुसार लगभग 100 करोड़ वर्ष पहले पृथ्वी पर शैवालों से पौधे विकसित हुए। और 50 करोड़ साल पहले ये जलीय पौधे धीरे-धीरे जमीन पर आए और विशाल वृक्षों का रूप लिया। इस उत्पत्ति के रहस्य को जानते हुए हम कह सकते हैं कि प्रकृति एवं पेड़ हमें बहुत कठिनाई से मिले हैं।
अतः इसे संरक्षित करना हमारा कर्तव्य एवं धर्म दोनों है।

इसलिए अंधाधुंध होकर पेड़ों की कटाई करना, मात्र सौंदर्यीकरण के लिए या अनावश्यक विकास के लिए, यह उचित नहीं है। विकास के नाम पर पेड़ काटना ज़रूरी कब है ? सड़क, अस्पताल, स्कूल, पानी की लाइन... ये भी तो समाज के लिए जरूरी हैं। बिना बुनियादी चीजों के विकास रुक जाएगा। तो कुछ जगह पेड़ काटने पड़ते हैं।

जब "विकास" का मतलब सिर्फ कंक्रीट और इमारत हो जाए। एक पेड़ काटते हैं, पर 10 लगाते नहीं। शहर गर्म हो जाता है, भूजल नीचे चला जाता है, पक्षी बेघर हो जाते हैं, सांस लेने की हवा कम हो जाती है। गर्मी हर साल बढ़ रही है, उसका एक कारण यह भी है।

तो सही रास्ता क्या है ? "विकास + संरक्षण" साथ चले।

पहले सोचो: क्या पेड़ हटाए बिना काम हो सकता है? रोड का डिजाइन बदला जा सकता है? जैसे विदेशों में सड़कें पेड़ों को बचाकर बनती हैं, वैसे ही यहां भी बनें। काटो तो लगाओ: 1 पेड़ कटे तो 5 लगें। और लगाकर भूलें नहीं, उन्हें पाला भी जाए। पुराने पेड़ बचाओ: 50 साल का पीपल और नया पौधा बराबर नहीं होते। सार- पेड़ काटना अपने आप में गलत नहीं है। गलत है बिना सोचे काटना। विकास का मतलब विनाश नहीं होना चाहिए।


- रत्ना बापुली


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विकास के नाम पर पेड़ों को काटना कितना सही है ?


"यदि विकास की राह में प्रकृति का अस्तित्व ही समाप्त हो जाए, तो वह विकास नहीं विनाश कहलाता है।" आज ऊँची-ऊँची इमारतें, चौड़ी सड़कें और बड़े-बड़े उद्योग विकास के प्रतीक माने जाते हैं। लेकिन इन सबकी नींव में यदि हजारों पेड़ों का बलिदान छिपा हो, तो हमें यह सोचने की आवश्यकता है कि क्या ऐसा विकास वास्तव में उचित है ?

पेड़ केवल लकड़ी का स्रोत नहीं, बल्कि पृथ्वी के प्राण हैं। वे हमें शुद्ध वायु, वर्षा, छाया, औषधियाँ और असंख्य जीव-जंतुओं को आश्रय प्रदान करते हैं। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई से जलवायु परिवर्तन, बढ़ता तापमान, जल संकट और प्राकृतिक आपदाओं जैसी गंभीर समस्याएँ जन्म ले रही हैं। यदि यही स्थिति बनी रही, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें कभी माफ़ नहीं करेंगी।

निस्संदेह, विकास आवश्यक है, लेकिन पर्यावरण का सम्मान करते हुए। जहाँ पेड़ काटना अपरिहार्य हो, वहाँ उससे कई गुना अधिक वृक्ष लगाए जाएँ और उनका संरक्षण भी किया जाए। वास्तव में यही सच्चा और टिकाऊ विकास है।


अंत में मैं केवल इतना कहना चाहूँगी-

"पेड़ बचेंगे, तभी पृथ्वी बचेगी!
पृथ्वी बचेगी, तभी हमारा भविष्य सुरक्षित रहेगा।"


इसलिए विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखना मानव की सबसे बड़ी जिम्मेदारी होनी चाहिए।


- नूतन गर्ग, दिल्ली


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विकास के नाम पर पेड़ों को काटना कितना सही है ?


आज हमारा देश एक विकसित देश है, जिस पर हमें बहुत गर्व भी होता है। परन्तु इस गर्व को महसूस करने के लिए हमने बहुत बड़ी कीमत चुकाई है।हम जिसे विकास समझ रहे हैं वह विकास न होकर विनाश है। हम जिस पथ पर अग्रसर हो रहे हैं हमारे आने वाली पीढ़ी स्वच्छ वायु स्वच्छ जल और स्वच्छ वातावरण के लिए तरसेगी।

क्योंकि हम वर्तमान मे उन्नति और विकास के नाम पर पृथ्वी पर से पेड़ों को काटकर के उसे नग्न बनाते जा रहे हैं, जिसका परिणाम यह होगा कि संपूर्ण पृथ्वी सूर्य के तेज गर्मी को बर्दाश्त ना कर सकेगी जिसके कारण से ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्या अपने चरम पर होगी। इसीलिए यह आवश्यक हो गया है कि अब हम सबको एकजुट होकर के पृथ्वी पर से पेड़ों के नष्ट होने या काटे जाने का विरोध करना चाहिए।

यदि पेड़ों को काटना बहुत आवश्यक हो उन्हें काटने की बजाय उन्हें उस स्थान से निकलकर दूसरे स्थान पर लगाना चाहिए। क्योंकि उस पेड़ का जो मूल्य है वह हम नया पेड़ लगा करके उसकी भरपाई नहीं कर सकते हैं।


- अनुरोध त्रिपाठी, प्रयागराज



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विकास के नाम पर प्रकृति का विनाश कितना उचित ?


आज विकास के नाम पर जिस तेजी से पेड़ों की कटाई हो रही है, उसके दुष्परिणाम हमारे सामने हैं। बढ़ती गर्मी, अनियमित वर्षा, बाढ़, भूस्खलन, जल संकट और वायु प्रदूषण यह संकेत देते हैं कि कहीं न कहीं विकास और प्रकृति के बीच संतुलन बिगड़ रहा है।

विकास आवश्यक है। विद्यालय, अस्पताल, सड़कें और अन्य सुविधाएँ समाज की जरूरत हैं। लेकिन विकास ऐसा होना चाहिए जिससे प्रकृति को न्यूनतम क्षति पहुँचे। यदि किसी जनहित के कार्य के लिए पेड़ काटना अपरिहार्य हो, तो उसके बदले अधिक संख्या में वृक्ष लगाना भी हमारी जिम्मेदारी होनी चाहिए।

ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी लोग प्रकृति से गहरा जुड़ाव रखते हैं। वहीं आज की युवा पीढ़ी भी पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक है और जंगलों की अंधाधुंध कटाई का विरोध करती दिखाई देती है। इसके विपरीत, शहरी क्षेत्रों में सड़क चौड़ीकरण, नई कॉलोनियों और बड़े निर्माण कार्यों के नाम पर हजारों पेड़ काटे जा रहे हैं। इसका परिणाम बढ़ते तापमान, जलभराव और प्राकृतिक आपदाओं के रूप में सामने आ रहा है।

हमें ऐसा विकास चाहिए जो प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखे। सरकार के साथ-साथ प्रत्येक नागरिक का भी कर्तव्य है कि वह अधिक से अधिक वृक्ष लगाए, प्लास्टिक का कम उपयोग करे और पर्यावरण संरक्षण में अपना योगदान दे।

याद रखिए, प्रकृति हमें जीवन देती है। यदि हम उसका सम्मान करेंगे, तो वह आने वाली पीढ़ियों के लिए भी सुरक्षित रहेगी। इसलिए आइए, हम विकास के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण का भी संकल्प लें।


- सुमन डोभाल काला


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क्या विकास के लिए पेड़ों को काटना सही है ?


सामान्यतः विकास किसी क्षेत्र विशेष में उन्नति, वृद्धि या निरंतर आगे बढ़ने को कहते हैं। वर्तमान में किसी क्षेत्र, प्रदेश या देश में विकास के लिए पेड़ों को काटना आम बात है। सामान्यतः हम देखते हैं कि भवन बनाने, सड़के बनाने, खेत बनाने और उद्योग स्थापित करने के लिए जगह-जगह पेड़ काटे जा रहे हैं।

पेड़ों को काटना कभी भी उचित नहीं ठहराया जा सकता परन्तु क्षेत्र, प्रदेश या देश विशेष का विकास भी अनिवार्य हैं। अतः हमें वनों के काटने की एक निश्चित सीमा तय करनी होगी ताकि विकास भी हो जाए और पारिस्थितिक संतुलन पर भी वृक्षों के कटान का विपरीत प्रभाव ना पड़े।

हमें वनों के काटने और विकास कार्यों के मध्य एक संतुलन बनाना होगा। हर एक विकास कार्य में हमारा यह लक्ष्य होना चाहिए कि काटे गए पेड़ों के स्थान पर ,उससे अधिक संख्या में पेड़ लगाए जाएं। इसके अतिरिक्त ,इन पेड़ों की रखवाली का दायित्व उन व्यक्तियों पर होना चाहिए जो इन विकास कार्यों से लाभान्वित हो रहे हो। एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि अगर पूर्ण विकसित वृक्षों को काटा जाता है तो उनकी शीघ्र प्रतिपूर्ति करना असंभव है, इसलिए हमें पूर्ण विकसित वर्षों के काटने से बचना चाहिए।

प्रत्येक समझदार व्यक्ति का यह दायित्व है कि वह पेड़ों को कटने से बचाए एवं वृक्षारोपण में अपनी निरंतर भागीदारी सुनिश्चित करें। हमें एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में न सिर्फ स्वयं वृक्षारोपण करना चाहिए बल्कि औरों को भी इस पुनीत कार्य हेतु प्रेरित करना चाहिए। तभी हम बढ़ती हुई वैश्विक उष्णन और जलवायु परिवर्तन जैसी प्राकृतिक आपदाओं से निपट सकते हैं।


- प्रवीण कुमार


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