साहित्य चक्र

31 July 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 01 अगस्त 2026





भानु, धरती, गगन, पवन
जिसका करते सादर सम्मान 
ऐसे ही गुरु की महिमा का
करती हूँ मैं गुणगान।

गुरु की जिसके समदा झुकते 
ब्रह्मा विष्णु महेश्वर 
कीर्ति जिसकी प्रतिबिंबित करते 
अचल शिखि रत्नाकार 
किंकखत् रहते हैं जिसके 
महाद्वीप -अनन्य,महान 
ऐसे ही गुरु की महिमा का
करती हूँ मैं गुणगान।

शिक्षा संस्कार देकर जिसने
जीवन पथ सुगम बनाया 
प्रगति लक्ष्य परिभाषित कर 
मानवता का अंश बढ़ाया
गुरु-मूल पर ही अवलंबित
हमारी उन्नति का अभिमान 
ऐसे ही गुरु की महिमा का
करती हूँ मैं गुणगान।

चारु चरित्र उदारु प्रवृत्ति 
सतोगुण करें निवास
पदिन्दु हस्त-चंद्रिका रूपी
वाणी गत कोमल कंजा भास
गुरु दक्षिणा और सेवा हेतु 
प्रतिपल उत्सुक है मेरे प्राण
ऐसे ही गुरु की महिमा का
करती हूँ मैं गुणगान।


                               - अंशिता त्रिपाठी


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गुरु चरणों का प्रकाश

पूर्णिमा की शीतल चाँदनी में,
गुरु का तेज़ निखर आया है।
झुका हुआ यह शीश नहीं केवल,
जीवन ने खुद को अपनाया है।

गुरु के चरणों में जो झुकता है,
वह कभी पराजित नहीं होता।
उनके आशीष का एक स्पर्श,
मन का हर संशय हर लेता।

वे शब्द नहीं, संस्कार गढ़ते हैं,
अंधकार में दीप जलाते हैं।
भटके हुए हर पथिक को,
सत्य की राह दिखाते हैं।

आओ गुरु पूर्णिमा पर प्रण करें,
अहंकार का हर बंधन तोड़ेंगे।
गुरु के बताए प्रेम, ज्ञान और विनय से,
अपने जीवन को प्रकाश से जोड़ेंगे।


- डॉ. सारिका ठाकुर 'जागृति'


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मुझे अच्छे लगते हैं!

मुझे अच्छे लगते हैं
मेहनतकश स्त्रियाँ
और खाता बनाते पुरुष

अच्छे लगते हैं
उनके किए गए
अपने हिस्से का काम
वर्षों की बनाई रीति
परम्परा
नियम और कानून
को मात देना

दोनों खुश रहते हैं
अपने काम को
करते हुए
दोनों को विश्वास है
अपने कर्मों पर
सच में,
मुझे बहुत अच्छे लगते हैं
मेहनत स्त्रियां और
खाना बनाते पुरुष


- मनोज कौशल


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हर कर्म का होता है अपना विधान,
हर साधन का होता है सम्मान।

दर्जी को नाप, पुजारी को जाप,
संगीत को सुर, यज्ञ को प्रताप।

नेता भी यदि भूलें अपना धर्म,
जनसेवा से हो जाएँ वे विमुख कर्म।

तब जनता का जागृत प्रताप ज़रूरी है,
मत की चोट और जवाब ज़रूरी है।

लोकतंत्र की यही सच्ची पहचान,
जनमत ही है सबसे बड़ा विधान।

सत्ता का मद क्षणभर में ढह जाता है,
जब मतदाता अपना निर्णय सुनाता है।


- नरेंद्र मंघनानी


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गुरु की महिमा
हम गुरु को प्रणाम करते है,
हमको जो सही रास्ता दिखाएं,
वही सच्चा गुरु होता है,
भगवान से पहले गुरु ही,
हमे रास्ता दिखाते है,
जीवन के अंधेरों से,
उजाला की ओर लाते है,
जीवन के संघर्षों से हमे,
जीना सिखाते हैं,
सही गलत हम क्या कर रहे,
हमको वह बतलाते है,
शिष्यों के खुशी में,
खुद ही खुश हो जाते है,
हम कही भटक रहे हो,
रास्ता वही दिखाते हैं,
गुरु का कितना बखान करु,
भगवान से वह मिलाते हैं,
समस्त गुरु को मेरा शत शत नमन।


- गरिमा लखनवी


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दूध नहाए हैं सभी, फिर क्यों बिगड़े हाल ?
जो बोया सो काटते, फिर क्यों करे बवाल॥

सत्य छोड़कर चल दिए, छल की लेकर चाल।
फिर क्यों रोते घूमते, लेकर मन में ज्वाल॥
कर्मों का प्रतिफल मिला, कैसा फिरे मलाल
जो बोया सो काटते, फिर क्यों करे बवाल॥

नफ़रत के बीजों से कहाँ, उगते प्रेम-गुलाब।
काँटे ही काँटे मिले, सूख गए सब ख़्वाब॥
जैसी जिसकी सोच है, वैसा उसका हाल
जो बोया सो काटते, फिर क्यों करे बवाल॥

लोभ-मोह की आग में, जलते रहे उसूल।
स्वार्थों की आँधी चली, बिखर गए सब फूल॥
अपनों से ही दूर हो, कैसा यह भूचाल
जो बोया सो काटते, फिर क्यों करे बवाल॥

झूठ अगर सम्मान हो, सच हो जाए मौन।
फिर मत पूछो देश में, दोषी होगा कौन॥
नीति बिना समाज का, डगमग हर इक ताल
जो बोया सो काटते, फिर क्यों करे बवाल॥

'सौरभ' कर्मों का सदा, रहता सच्चा लेख।
समय कभी करता नहीं, पक्षपात या भेद॥
सत्य, दया, सद्कर्म से, सँवरें सबके हाल
दूध नहाए हैं सभी, फिर क्यों बिगड़े हाल?
जो बोया सो काटते, फिर क्यों करे बवाल॥


- डॉ. प्रियंका सौरभ


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प्रकृति:सृजन और संहार

प्रकृति, तेरी शक्ति असीमित है,
बारिश बन अमृत बरसाती है,
धरा पर जीवन मुस्काता है,
हर प्राणी तुझसे ही पलता है।
तू अपनी ही गति से चलती है।

कभी-कभी लगती है निष्ठुर-सी,
मानव के कर्मों का फल दे जाती।
कहीं सूखा, कहीं बाढ़ का प्रकोप,
अपना भीषण तांडव दिखलाती।

पानी के बिना भी जीवन मरता,
पानी से भी जीवन हार जाता।
कौन तुझ पर काबू कर पाया?
आज तक कौन तुझसे जीत पाया,
जो आज तुझे हराने की ठाने?

जब मानव तुझसे दूर हुआ,
स्वार्थ में खुद ही चूर हुआ।
तुझे भुलाकर प्रकृति का मान खोया,
फिर क्यों न आए सूखा और विपदा,
क्यों छोड़ दे तू उसके कर्मों का लेखा?

तेरा रूप जब विकराल बनता,
मानो साक्षात काल उतर आता।
बाढ़ के वे भयावह नज़ारे,
सावन-आषाढ़ के बेचारे।

तब इंसान को याद आती अपनी औकात,
धन-दौलत, शक्ति सब हो जाती मात।
न नौका साथ निभा पाती,
न कोई कश्ती पार लगा पाती।

प्रकृति का सम्मान करो मानव,
सामना तो कर सकते नहीं।
तू खुद खिलौना है,
तू किसी से खेल सकते नहीं।


- रोशन कुमार झा


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असम की व्यथा

घिर-घिर आये नभ में बादल , बरस रहे पुरजोर,
जलराशि संभाली न जाए, ब्रह्मपुत्र मचा रही है शोर,
गाँव डूबे, शहर डूबे, घर, पथ, आँगन सब डूबा जाए,
आंसू ही आंसू है असम में, हाल किसे दिल का सुनाए ?

जल समाधि ले रही हैं फसलें, किसान नयन जलधार,
मेहनत और पसीने की कमाई, बह जाती है क्यूँ हर बार ,
बच्चे ,बूढ़े सब तड़फ रहे हैं, रो रही है धरती माता,
दिले हाल अब किसे सुनाएं, नहीं समझ कुछ आता।

भूखे पेट, सूखे गाल, मजदूर की छिन गई रोज-रोटी,
सूने हुए बाज़ार, गलियाँ, हो गई गायब बिजली की जोती,
टूट रही छत्त, बह रहा घर, कर न सके कुछ हैं लाचार,
आ जाती है ये विपदा कहाँ से, रह-रह फिर करती प्रहार।

व्याकुल हैं सब पशु और पक्षी, मिल नहीं रहा कोई ठौर,
नदी ले गई घोंसले, घरौंदे, ठिकाना रहा नहीं अब और,
बछड़े, गायें, खरगोश, हिरन, है सब में ख़ामोशी छाई,
क्रूर प्रकृति क्यूँ इतनी हो गई, बात ये इनकी समझ न आई।

धरम मिलकर सब हाथ बढ़ाओ,इनकी मदद का बनो आधार,
दुःख की इस विकराल घड़ी में , बाँट लो उनसे प्यार अपार,
करो प्रार्थना मुस्काएं सभी, हो खुशहाली हर खेत, घर द्वार,
जीतेगा जीवन फिर से असम में, जीतता है ज्यूँ हर बार।


- धरम चंद धीमान


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सृष्टि हो या प्रलय,
दोनों जीवन का लय।
प्रकृति की आपदा,
है जीवन की सम्पदा।
देती है वह प्रेरणा,
जीने की एषणा।

सावन करता जलमग्न
तब भी देखो जीवन,
चलता रहता अविरल
क्षण क्षण पल पल।

व्यवस्था का रोना
क्यो रोएं हर वर्ष,
सच्चा जीवन वही
जो मनाता है हर्ष।

हर साल होता जल भरांव
यही तो है अपना गांव।
फिर भी जीवन मस्त है।
नित कर्म में व्यस्त हैं।

कर साईकिल की सवारी,
पानी में भी चलता है।
भाई को भी साथ बैठा,
बाढ़ को चुनौती देता है।

यही जीवन का अंदाज ,
समझ ले अगर कोई।
कभी न घिर पाए घटा,
दुःखों का यहां कोई।


- रत्ना बापुली लखनऊ


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बाढ़

काले काले मेघ घन आए,
शहर गाँव सब पानी पानी।

बिज़ली कौंधी पानी बरसा,
घर आंगन सब पानी पानी।

खेत खलिहान सब पानी पानी,
बहा ले गया सब बाढ़ का पानी।

गरज-गरज के पानी बरसा,
घर आंगन , बाज़ार गौशाला डूबे।

ज़ार ज़ार कर इंसा रोये,
पशु-पछी भी प्राण गंवाए।

गाँव गलियाँ स्कूल सब कुछ डूबे,
काले घन जब भी आते अंदर से सब थर थर कांपे।

असम में जो प्रकृति रूठी हुई,
ब्रह्मपुत्र का विकराल स्वरूप।

गलती किसकी ? भुक्त भोगी कौन,
गरीब ही जान गंवाए गरीब ही मारा जाए।


- सुमन डोभाल


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कहीं ठंडी हवाओं का मधुर अहसास,
कहीं बाढ़ ने छीन लिए जीवन के विश्वास।

कोई प्रकृति का सौंदर्य निहार रहा,
कोई अपनों का आशियाना पुकार रहा।

उफनती लहरों ने सब कुछ बहा दिया,
निर्धनों का हर सपना रुला दिया।

आओ बढ़ाएँ मानवता का हाथ,
असम के संग चले सारा देश आज।


- बीना सेमवाल


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तोड़कर
भी तुम तोड़
नहीं पाओगे।
चाहकर
भी अंगूठा
काट नहीं पाओगे।
अगर
एकलव्य अपनी
पर आ ही जाएगा,
तो
याद रखना कोई भी
अर्जुन समर में उतार नहीं पाओगे।

पल
भर में साफ
सारा अपशिष्ट हो जाएगा।
ये
वो दौर नहीं
कि एकलव्य शिष्ट हो जाएगा।

समर
तुमने जरूर
जीत लिए हैं छल बल से,
मगर
तुम्हारे मन माफिक
कहाँ अभिष्ट हो जायेगा?
बदलते
दौर में तुम
खुद को बदल नहीं पाए।

जैसा
जुबां पे है वैसा
दिल से ढल नहीं पाए।
बातों
में तुम तो
बड़े-बड़े किले ढहा दिए,
सच
के समर में
एक कदम भी नहीं निकल पाए।

आज के
एकलव्य को
हर चुनौती स्वीकार है
हर वार झेल जाएंगे,
पहना
तू चाहे जितना
तोड़ हर नकेल जाएंगे,
पानी
जब सर से ऊपर
निकलने लगे तो समझ लेना,
विकास
आज के एकलव्य
खुला खेल फर्रुखाबादी खेल जाएंगे।


- राधेश विकास


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जीवन का रंग

हम धरा पर जन्म एक बार लेंगे,
लाख कठिनाई आयी चाहे।

जगत में अपना नाम करेंगे,
लाख हस्तियाँ आयी चाहे।

बिना नाम किए गुजर गए होंगे
लाख बुराई मिली चाहे।

समझकर कुछ हस्तियाँ जी जान लगा दिए होंगे।
लाख ठोकरे खाई चाहे।

उन्ही हस्तियों का स्वर्णाक्षरों में नाम मिलेंगे।


- ओम प्रकाश साह


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समय
चुपचाप
चौखट पर बैठा रहा,
हम
बीते कल की धूल
झाड़ते रहे।

समय
रास्ते बिछाता रहा,
हम
पगचिह्नों की गिनती में
अटके रहे।

समय
हर सुबह
नई दस्तक लाया,
हम
बंद खिड़कियों से
रोशनी का हिसाब पूछते रहे।

जब तक
कुंडी खुली,
समय
मुस्कुराकर
अगली चौखट पर
जा चुका था।


- नरेंद्र मंघनानी


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मीठी चूं-चूं

सुबह उठ कर रात बची रोटी को तोड़कर,
घर की छत पर प्यार से चारों ओर बिखरा दिया।

अभी रोटी के टुकड़ों को बिखराया ही था,
पंछियों ने आकर चीं-चीं का राग सुना दिया।

गौरैया मैना छोटे बड़े पंछी सब आए थे,
जो पहुंचे न थे उन्हें भी चूं चूं कर बुला लिया।

सब अपने अपने बच्चों का ख्याल रख रहे थे,
और नन्हे परिंदों ने आसमान सर पर उठा लिया।

कोई झगड़ा नहीं कोई परेशानी कहीं नहीं,
खाने से पहले निवाला बच्चों को दिया।

मिलजुल कर सब बांट कर खा रहे थे,
मिलवर्तन का इक नया जहां बसा दिया।

जहां हम सभी बंटे है दुनिया के तंग दायरों में,
वहीं प्रेम से रहना पंछियों ने हमें सिखा दिया।

जो प्रेम सबक हम पढ़ लिख कर न सीख पाए,
वो इन परिंदों की मीठी चूं-चूं ने सिखा दिया।


- राज कुमार कौंडल


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देहाती इलाक़े में
भूख, गरीबी, बेबसी से
तंग आकर
एक अधेड़
पेड़ पर लटक गया?
सरकारी अमले ने
लाश कों
मुर्दाघर पहुंचाया
पोस्टमॉर्टम कमेटी बनीं
जनता दबी जूबां
बतिया रही थी
भूख से मर गया!
पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट
कह रही थी
कुछ खा कर मरा हैं
वो भी फांसी!
यह तो कायरता हैं।
एक सच ओर था
लाश एक नहीं
दो बरामद हुई थीं
एक कों पोस्टमॉर्टम
हेतु भेजा गया
दुसरे किसी पेड़ कों
मुर्दे को जलाने के लिए
मरघट भेजा गया।


- जितेंद्र बोयल


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दर्द-ए-ला-दवा

​जो ज़ख़्म दिल को मिले, हम छुपाए बैठे हैं,
ज़ीस्त अपनी तमाम महफ़िलमें लुटाए बैठे हैं।

​वो आ के पूछ रहे हैं  हाले दिलअब मेरा,
ख़ुद ही दाग़ दामन में  जो लगाए  बैठे हैं।

​मंजिलों को चाहत में कहां से कहां पहुंचे,
सफ़र के मोड़ पे सब कुछ गँवाए बैठे हैं।

​न कोई ख़्वाब बचा है, न अब आरज़ू कोई ,
हम अपनी राख में  चिंगारी छुपा के बैठे हैं।

नसीब मेरा तुम्हारी हसरतों में खोया है,
हाथों की लकीरों में सजा के बैठे हैं।

​ग़म-ए-हयात के पत्थर रास्तों से मेरे हट जाओ,
ज़ख्मों पर'मुश्ताक़' हम तो नमक लगाके बैठे हैं।


- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़


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साथियां तेरे बिन

साथियां तेरे बिन जी ना पायेंगे,
कसम से कहता हूँ, अब ना जीयेंगे
जब तुम ही नहीं, मेरे जिंदगी में तो
अब इस दुनिया मेंं जी कर क्या करेंगे ?

तुम्हीं से तो मेरी ये दुनिया बसी है,
तुमसे ही तो मुझे गम और खुशी है,
सुख-दुःख में तुम ही मेरे साथ रही है,
फिर अचानक मन में ये जुदाई कैसी है ?

जो भी हो गिले शिकवे सब मैं स्वीकारा,
सुधरने का तो साथियां मौका दो दोबारा,
शिकायत का अब ना कोई मौका देंगे,
साथियां सात जन्मों का बंधन है हमारा।


- चुन्नू साहा


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"अंधेरे से उजाले तक"

ढलती शामों की हवा ये बताती है कि,
रातें कभी-कभी कितनी काली हो जाती हैं।

जब जीवन की हर राह अचानक अनजानी हो जाए,
और अपने ही कदम अपना बोझ उठाने से थक जाएँ।
जब चाहकर भी कुछ बदल पाना संभव न रहे,
और समय हर उत्तर अपने भीतर छिपा ले।

जब आँखों में सपने नहीं,सिर्फ़ जागती हुई रातें रह जाएँ,
और मुस्कान का अर्थ चेहरे से बहुत दूर चला जाए।

तब मन किसी सूने चौराहे पर खड़ा होता है-
न लौटने का साहस, न आगे बढ़ने का विश्वास।
बस चारों ओर घना, निःशब्द अँधकार...
जो धीरे-धीरे मन की हर रोशनी को निगलने लगता है।

ऐसे समय में कोई आँसू भी साथ नहीं देते,
क्योंकि वे भी आँखों में ही पत्थर बन जाते हैं।

और तब समझ आता है-
सबसे कठिन युद्ध दुनिया से नहीं,
अपने ही भीतर फैले उस अँधेरे से होता है
जो हर पल कहता है-
"अब और नहीं..."

फिर भी... कहीं बहुत भीतर, राख के नीचे दबी
एक नन्ही-सी चिंगारी चुपचाप साँस लेती रहती है।
शायद वही चिंगारी एक दिन फिर से
जीवन का सूरज बने...

क्योंकि सबसे गहरा अँधेरा भी,
प्रकाश की संभावना को कभी समाप्त नहीं कर पाता।


- आरती कुमारी


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मंत्री जी का दौरा

पूरे शहर भर पोस्टर लगाया जाएगा,
आधे अधूरे कामों को,
पूरा दिखाया जाएगा।
जाम नालियां, टूटी सड़के,
जर्जर विद्यालय,
लोगों की बदहाली का,
कहीं भी जिक्र ना आएगा।
महंगाई, बेरोजगारी, गरीबी,
भुखमरी और शहर भर की गंदगी पर,
फिलहाल पर्दा डाला जाएगा।
हर चौक चौराहे पर,
चमकता पोस्टर, पोस्टर में सरकार की,
बस तारीफ नजर आएगा।
जब जब शहर में
मंत्री जी का दौरा कराया जाएगा।


- बाबू लाल



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सब रिश्ते सोच समझकर नहीं बनाए जाते,
कुछ रिश्ते यूं हीं बन जाते हैं चलते-चलते,
दो-चार मुलाकातों में,
कुछ एक हंसी ठहाकों में,
कुछ अपनी,
कुछ दूसरों की सुनने-सुनाने में,
किसी का दुःख,
अपने दुःख जैसा महसूस होने पर,
किसी की बातों में,
अपनापन महसूस होने पर,
किसी की बातों में अपने लिए,
अपनापन महसूस होने पर,
किसी को थोड़ी ज्यादा ,
तवज्जो मिल जाने पर,
कोई दे जरा हौंसला जो
नई उड़ान भरने को,
जो थाम ले हाथ कोई ,
ठोकर लग गिर जाने से पहले ही,
जब कोई जान ले अक्सर हाल,
बिना कुछ बोले ही...!
बस इन्ही छोटे छोटे किस्सों से,
नजदीकियां बढ़ जाती हैं अक्सर,
प्यार चाहे हो न हो,
हां मगर...
एक एहसासों की डोर
जुड़ जाती है अक्सर... ख़ैर!


- सुमन डोभाल काला


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28 July 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 28 जुलाई 2026






हरियाली

घनघोर घटा चहुंओर अब छा गई,
छम-छम कर नाचती देखो वर्षा आ गई।

पंछियों की डार भी पीहू-पीहू कर नाचने लग गई,
छाई थी जो काली बदरी वो पानी बन बरस गई।

बेरहम गर्मी जो सबके हाल बेहाल कर गई,
शीतल बूंदें बारिश की सुकून पहुंचाने आ गई।

बच्चों की टोलियाँ वर्षा में मस्ती करने निकल गई,
वो कागज की किश्तियां भी दूर तक निकल गई।

सूखा चारा खाते पशुओं में भी ऊब सी आ गई,
फिर हरी घास से उनके मनों में रौनक छा गई।

हर कली डाली मुस्कराते गीत खुशी के गा गई,
सबके जीवन में वर्षा से नवबहार सी छा गई।

मिट्टी के हर कण में नई उमंग सी छा गई,
देखो अब के वर्ष धरा पर फिर हरियाली छा गई।


- राज कुमार कौंडल


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इस ग़म से कोई कैसे निजात पाए,
इश्क़ हो और फिर भी कह ना पाए।

उनकी नज़रों में बहती गहराई है इतनी,
वो बस देखें आह भर तो डूब जाए।

कैसे मानूँ कि बस दुनियादारी निभाती है!,
जो मिलते ही छोटे बच्चे की तरह लिपट जाए।

इस इंतज़ार में आँखों में सपने लिए बैठा है कोई,
कि सुबह का भूला शाम होते ही लौट आए।

मेरे अश्कों के कुछ अशआर को पूरी कहानी ना समझना,
इश्क़ का दरिया यूँ चंद बूँदों में समेटा ना जाए।


- स्वाति जोशी


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जीने की उपहार

कल्पनाओं की पंख लगाकर हम दोनों
चलों ख्वाबों की दुनियां में। बस जायें
हवा महल सपनों में बनाकर जन्नत में
तेरी जुल्फों के साये में। हम सो जायें

ना कोई फिक्र ना कोई चिन्ता व गम
रोक ना पाये छुकर हमारे बढ़ते कदम
ना कोई विपत्त ना कोई कष्ट व दुःख
चारों तरफ मिले खुशियों का सुख

साथ जीने की व साथ मरने की जब
हमने मिलकर मंदिर में कसमें खाई
फिर क्यूं मरने की डर भय तुमको
तेरी उम्मीद के बाजू में अब दिखलाई

हमें मौत की परवाह कब है जानूँ
हम तो हैं प्यार के जाबांज मतवाले
हमें आकाश से गिरने की डर नहीं
हम हैं राही दिल के अमर दिलवाले

री पुरवाई ले चल हमें अपने संग संग
ले चल सफर मेंचन्दा के उसपार
जहाँ सुकून की बहती है एक दरिया
ला दो हमें तुम जीने की अनुपम उपहार


- उदय किशोर साह


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देखना चाहता था मैं
जिन्हें अपनी दुआओं में भी ऊँचा,
वही मुझे अपनी महफ़िल में
बौना समझ बैठे,
चले हम भी अपनी ही फितरत से
मेहनत की सीढ़ियाँ चढ़ते रहे ,
और उनके समकक्ष बन बैठे,
कल तक जो साया समझते थे
होश उड़ जाते हैं अब उनके
हम को देखकर...
आँखें झुका लेते हैं अब वह
जो सर उठा कर बात करते थे,
और हम सोचते हैं के
अरसा बीत गया उनसे भेंट हुए ,
पर दर्द ये है के
भेंट अब भी अजनबी सी लगती है ,
वह भी पूछते हैं अब हाल
जो हाल पूछने लायक न समझते थे
और हम मुस्कराकर कहते हैं
अरसा बीत गया उनसे भेंट हुए,
देखना चाहता था मैं
जिन्हें अपनी दुआओं में भी ऊँचा,
वही मुझे अपनी महफ़िल में
बौना समझ बैठे।


- बाबू राम धीमान


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महिला पुलिस

मैं पुलिस हूँ,
हाँ, महिला पुलिस हूँ!
माँ की मैं भी लाड़ली-दुलारी हूँ,
हर प्रदेश, हर क्षेत्र में अब मैं भारी हूँ।
हाँ, इस लोकतांत्रिक देश की शान हूँ,
अपने फर्ज और सम्मान की पहचान हूँ।

मैं नारी हूँ,
हाँ, अपने पापा की लाड़ली हूँ!
हर संघर्ष से लड़कर आज वर्दीधारी हूँ।
करुणा भरे हृदय और स्त्रीत्व के साथ,
फर्ज की खातिर लाठियाँ भी उठाई हैं हाथ।

मैं पली हूँ
एक ऐसी दुनिया में,
जहाँ अपनों से ज़्यादा,
रिश्तेदारों और आस-पड़ोस के ताने खाए हैं।
पर इन्हीं तानों से मैंने
अपनी मेहनत के हथियार बनाए हैं।

मैं दौड़ी हूँ,
हाँ, मैदानों में बहुत तेज भागी हूँ!
सर्दी, गर्मी और बरसात में रातों को जागी हूँ।
खुद को तपाकर लाखों प्रतिद्वंद्वियों के बीच से निकली हूँ,
कलम घिस-घिस कर, पसीने में ढलकर आगे बढ़ी हूँ।

मैं कांस्टेबल बनी हूँ,
अपनी मेहनत से यह वर्दी पाई है!
गाँव के मैदान में तैयारी के वे दिन याद हैं,
जब बेवक़्त पापियों की गंदी नज़रें मँडराई हैं।
पर मैं झुकी नहीं, किताबों में खुद को खपाया है,
तब जाकर यह मुकाम हासिल कर पाया है।

मैं SI (सब-इंस्पेक्टर) हूँ,
आज कांधे पर 'डबल स्टार' सजाए हैं!
तैयारी के लिए भेजते समय, जो माँ-बाप को कोसते थे,
जिनकी नज़रों में मैं काँटे की तरह खटकती थी,
उनकी संकीर्ण सोच को मात देकर यह रुतबा पाया है!

आज मैं खुश हूँ...
संघर्ष के वो दिन याद कर आँखें ज़रूर नम हैं,
पर पापा की रुंधती मुस्कान और माँ की पुचकार में,
मेरा पूरा जहाँ और सारी खुशियाँ समाई हैं।
बदलती नज़रों के बीच, आज मैंने सबकी सच्ची प्रीति पाई है।


- राघवेंद्र प्रकाश 'रघु'


*****


गिरने लगी चट्टानें, ज़ख्म देने लगी बरसात

गिरने लगी चट्टानें, ज़ख्म देने लगी बरसात
नदी नाले ऊफान पर, बरतो सदैव एतिहात,
नदी किनारें न जाएं, मानो कविराय की बात
निठल्ले कभी न बैठिये, न धरो हाथ पर हाथ,

सेल्फ़ी लेने के चक्कर में अक्सर, जाते नदी के पास
खड़े होते बीच नदी में, बड़ी सी चट्टान पर इन्सान
वीडियो बनती रह जाती, चलता हँसी मज़ाक
ऊफान आया नदी में, पलभर में सब कुछ खाक,

सब देखते रह जाते, नदी प्रवाह बहा ले जब साथ
चीखें गूँजती रह जाती, पर हाथ नहीं आता हाथ
गलती खुद की ही होती, कोई देखता तक नहीं,
भगवान भी नहीं बचा पाते,जब बहते प्रवाह के साथ,

सैल्फी लेने के चक्कर में,उजड़ गए कीमती चिराग़
रोक पाए नदी प्रवाह को, इतना बलशाली नहीं इन्सान
राह देखती रह गई माँ, दरवाजा ताकता रह गया बाप,
जीवन दायनी नदियाँ देखो, अब बनने लगी हैअभिशाप।


- बाबू राम धीमान


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लौट कर हर जन्म में मैं हिन्दुतान आता हूं
मैं भारत का फौजी हूँ भारत के गीत मैं गाता हूँ
जो देशभक्त हैं उनके लिए मैं यह कविता सुनाता हूँ
बेशक कुर्बान हो गया मैं सरहद पर लड़ते लड़ते
लौट कर हर जन्म में मैं हिन्दुतान आता हूं
जो देशभक्त हैं उनके लिए मैं यह कविता सुनाता हूँ

नहीं मानता करता रहता शरारत वह बार बार
कर दिया था हमने बंगला देश बनाकर इसको दोफाड़
नब्बे हज़ार सैनिक गिगिड़ाये थे हमारे वीरों के आगे
चटगांव बंदरगाह पर जब मारी थी हमारे वीरों ने दहाड़
उन वीरों को नमन करें हम सबको यह समझाता हूँ
जो देशभक्त हैं उनके लिए मैं यह कविता सुनाता हूँ

दुश्मन कारगिल द्रास की चोटियों पर बैठ गया
सोच कर यह कि हिंदुस्तान को नहीं है खबर
युद्ध हुआ कारगिल में हमने दुश्मनों के छक्के छुड़ा दिए
चोटियों पर जो बैठे थे नसीब नहीं हुई उनको कब्र
कुछ लौट कर जो घर नहीं आये उनकी याद दिलाता हूं
जो देशभक्त हैं उनके लिए मैं यह कविता सुनाता हूँ

चीन भी लगा रहता है करता रहता है
सीमा का उलंघन बार बार
गलवान में ठोका हमने चालीस को
दिया मौत के घाट उतार
चीन भूल जाये 1962 को
आधुनिक भारत की मैं ताकत दिखाता हूं
जो देशभक्त हैं उनके लिए मैं यह कविता सुनाता हूँ

देश मेरा भारत है है माता भारती
उठो मेरे देशवासियो मां है पुकारती
उनका ख्याल रखो जो सीमा के है पहरेदार
उनकी बदौलत जीती हूँ हमेशा कभी नहीं मैं हारती
देश पहला प्रेम है मेरा यह सबको बतलाता हूँ
जो देशभक्त हैं उनके लिए मैं यह कविता सुनाता हूँ

बार बार पिटने के बाद भी नहीं सँभलता है
कभी आतंकी भेजता है कभी सीमा पर चालें चलता है
कुत्ते की पूंछ है कभी सीधी नही होगी
हर बार मुंह की खाता है फिर हाथ मलता है
सर्जिकल स्ट्राइक करता हूँ घर में घुस कर मार आता हूँ
जो देशभक्त हैं उनके लिए मैं यह कविता सुनाता हूँ


- रवींद्र कुमार शर्मा


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विरहन की दर्द

काली कोयलिया डाली से करती फरियाद
बेशरमी क्यूं भूल गया घर की तुम याद
गम की मारी चन्दा तेरी प्यारी अबोध चकोरी
कब समझोगो तुम प्रीत की रीत संवाद

सावन बीता भादो भी ना मन को है जीता
फागुन की भी क्या बीत जायेगी फुहार
लौट आ परदेशी अपने घर वापस आ जौशी
खेत खलिहान में हैं जीने की संभावना अपार

चुन्नु नित्य रोता मुन्नु भी तेरी याद में ना सोता
नित्य करता रहता है तेरी यादों की हर बात
ना चाहिये हमें निगोड़ी झुमका लौट आ दुमका
दुःख सुख सह लेगें हम दोनों झोपड़ी में साथ

मंगरू घर आया सहरु को भी परदेश ना भाया
उन सब के घर मन रही दीपावली की त्यौहार
किस बात पे रूठा तुँ बेदर्दी मेरे प्रियवर
छोड़ छाड़ के आ वापस घर आज है इतवार

ये जीवन है संग जीने की संग संग मरने की
मत कर जीवन की अरमानों को तुँ। बरबाद
ना जाने कब आ जायेगी धरती पे.. कयामत
मन की हर बातें तुम कर दो आज अबाद


- उदय किशोर साह


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ऐसे ही नहीं...

कभी कलम, कभी तलवार,
कभी मशाल थामनी पड़ती है,
ऐसे ही नहीं मिलती आज़ादी,
ऐसे ही जंग जीती जाती है।

कभी सूरज, कभी चाँद,
कभी दीप बनना पड़ता है,
ऐसे ही नहीं मिटता तिमिर,
ऐसे ही जीवन में उजाला होता है।

कभी इंतज़ार, कभी इनकार,
कभी बेवफ़ाई भी सहनी पड़ती है,
ऐसे ही जन्म लेता है सच्चा प्यार,
नहीं तो हर दिल खिलौना होता है।

कभी बारिश, कभी धूप,
कभी शिशिर की मार सहनी पड़ती है,
तभी नन्हा पौधा वृक्ष बनता है।
ऐसे ही नहीं खिलते गुल,
महकने के लिए हर मौसम में मुस्कुराना पड़ता है।

कभी गिरना, कभी संभालना,
कभी खुद से लड़ना होता है।
ऐसे नहीं मिलता मुकाम,
हर कदम इंतहान से गुजरना होता है।


- रोशन कुमार झा


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जीवन संघर्ष है

जीवन में संघर्ष नहीं किया तो फिर क्या किया ?
सुबह तो सब जागते हैं,
सांस तो सब लेते हैं,
तुमने भी लिया तो क्या किया ?
कभी अपने को नहीं कोसा तो क्या किया ?
कभी परिस्थित से नहीं लड़े तो क्या किया ?
अपने मन को मारा नहीं जिम्मेदारी के लिए तो क्या किया ?
सबकी तरह तुम भी एक समतल जीवन चाहते हो ?
पथिक को मजा नहीं आता है समतल जमीन पे,
तुमको तो पर्वत, नदी और खाई से डर लगता है,
तो तुम अपने जीवन के पथिक नहीं हो ?
तुम जीना चाहते हो एक ऐसा जीवन जो लोग देखते हैं सपनों में,
और सपने वही देखते है,
जिन्हें परिस्थित ने कभी रातों को जगाया नहीं।


- प्रणव राज


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सोच अपनी बदल नहीं पाए।
हम किसी राह चल नहीं पाए।

आजमाते रहे कभी जिनको,
उन रिवाज़ो में ढल नहीं पाए।

आस जितनी रही घटाओं से,
अब्र उतने पिघल नहीं पाए।

रात-दिन राह भर चले लेकिन,
पार हद से निकल नहीं पाए।

वक़्त के साथ-साथ रहकर भी,
चंद लम्हें संभल नहीं पाए।

बोल थे,साज़ थे,मिले सुर भी,
दिल हमारे बहल नहीं पाए।


- नवीन माथुर पंचोली


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कौन बो रहा है ऐसी फसल,
बिगड़ रही है आज की ऐसी नस्ल।

फूल से सुंदर बच्चे, काँटे हो रहे हैं,
बड़ों के मुँह पर अब चाँटे हो रहे हैं।

धीरज इनका हीमोग्लोबिन-सा घट रहा है,
गुस्सा जैसे भयानक बिलीरूबिन-सा बढ़ रहा है।

बड़ों की बातें रुकावट लग रही हैं,
बाहरी दुनिया ही सजावट लग रही है।

अपनों के लिए जीने का दौर खो गया,
ख़ून-ख़राबा, क़त्ल-ए-आम अपनों का हो गया।

न कोई पश्चाताप है, न कोई शिकन,
कैसे आ लगा यह रिश्तों को ग्रहण।


- अजय नेमा



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