साहित्य चक्र

07 February 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 08 फरवरी 2026




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सियासतों में फ़रेब छुपकर, अमन की बातें भी हो रही है,
लहू से भीगी है ज़मीं पर, वफ़ा की कसमें बड़ी नई हैं।

ग़रीब बस्ती में भूख गहरी, महल में दावतें हो रही है,
कफ़न भी मुश्किल हुआ है लेना, मगर इमारत बड़ी नई है।

कहीं पे बच्चा किताब ढूँढे, कहीं पे हथियार बाँटे जा रहे,
ग़ुलाम क़ौमें बता रही हैं, ये सल्तनत भी बड़ी नई हैं।

जो सच कहेगा, वो रद्द होगा, जो झूठ बोले, सर बिठाया जाए
जहाँ की रीतें बता रही हैं, रवायतें सब बड़ी नई हैं।

यहां हर इंसा लहू से रंजित, मगर तिजारत बड़ी हँसी है,
जहाँ के सौदागर अब दिखाएँ, अमन की क़ीमत बड़ी नई है।


- मधु शुभम पाण्डे


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थकी हुई सी ज़िंदगी

थकी हुई सी ज़िंदगी
हर मोड़ पर ठहर जाती है,
चलना चाहो भी तो अक्सर
ख़ामोशी साथ आ जाती है।

दिन उजाले में कट जाते हैं
रात सवालों में ढलती है,
किसने छीना अपने सपने
ये बात समझ न पलती है।

कंधों पर लदे फ़र्ज़ों ने
मन को धीरे झुका दिया,
खुद के लिए जो पल थे कभी
वक़्त ने सब चुरा लिया।

फिर भी दिल के किसी कोने में
एक सिसकी सी पलती है,
कहती है - “मैं ज़िंदा हूँ”
बस हालात से जलती है।

जिस दिन इस सिसकी को
आवाज़ मिल जाएगी,
थकी हुई सी ये ज़िंदगी
फिर से मुस्कुराएगी।


- रेखा चंदेल

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चलते रहना

जीवन की उलझी पहेलियाँ
धैर्य से सुलझाते रहना,
उत्तर न भी मिलें तुरंत
तो प्रश्न सँजोते रहना।

पथ यदि काँटों से भरा हो
तो भी पग न ठहराना,
राह कठिन हो-
बस चलते रहना।

बाहर के शोर में न खोकर
अंतर में दीप जलाते रहना,
ओठ चुप हों यदि कभी
मन से मुस्कराते रहना।

जब मन अपने ही बोझ से
थककर बैठना चाहे,
तब कुछ आदतें, कुछ सोचें
धीरे-धीरे बदलते रहना।

यदि भीतर कहीं
रिक्तता, अभाव,
सूनापन दिखे-
तो शिकायत नहीं
सृजन से भरते रहना।

हार, विराम नहीं होती
यह याद रखते रहना,
जीवन साधना है मित्र-
राह कठिन हो
तुम चलते रहना।


- नरेंद्र मंघनानी


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मां भारती की शान

गीत वह महान है मां भारती की शान है
रोम- रोम में वसा हिंदोस्ता की जान है।
गा-गा के जिसको चल पड़े फिरंगियों से लड़ पड़े।
देखी थी शक्ति गीत की उम्मीद फिर थी जीत की।
गीत की इस शक्ति ने चूल को हिला दिया,
वस कुछ समय के और हो उनको सही बता दिया।
वृत्तांत सुन उनके मस्तिष्क में अवसान था।
गीत वह महान है मां भारती की था।

जिसने बनाया हिंद की आजादी का था रास्ता,
मिलकर हुए सभी खड़े दे स्वाधीनता का वास्ता।
कोशिश करी थी तोड़नें की एकता निज हिन्द की
वैरियों की चाल जिसमें न सफल है हो सकी।
भंग हुआ विच्छेद फिर बंगालियों की भक्ति से
हो गये सफल तभी इस गीत की शक्ति से,
एकीकृत बंगाल का त्याग निज महान था।
गीत वह महान है मां भारती की शान था।

बंगाल के जुड़ाव से ये यात्रा बढ़ने लगी
जन- जन के मुख पर गीत से वह शक्तियां हिलनें लगी।
भानू न अस्त होता था जिसके शासनकाल में,
वो फिरंगी फंस गये थे मातरम् के जाल में।
गीत ये जाल जो आजादी की मशाल था
गीत वह महान है मां भारती की शान था।

आजादी के संघर्ष में वस गीत ही आस था
हर श्वास में ऐसा लगा मां भारती का साथ था।
मां की ममता पाने को सब लामबंद हो गये,
हो गया आजाद हिंद आजाद सब हैं हो गये।
आजाद हिंद हो गया यह गीत स्वाभिमान है
गीत वह महान है मां भारती की शान है।


- करन सिंह "करुण"


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हरारत नहीं रही

कभी भी सच कहने से हमें डर नहीं लगता।
जी हुज़ूरी इल्म का मेरे हिस्सा नहीं रही।

ज़मीं-आसमां से कभी मिलती ही नहीं है।
जुगनूओं की शोलों से कभी यारी नहीं रही।

हिन्दू-मुसलमां के बीच अब दीवार आ गई।
अलगू और जुम्मन में पहली सी यारी नहीं रही।

तारीफें हुस्न-इश्क की अब तब्दील हो गईं।
बाज़ार-ए-हुस्न में कोई चीज़ महंगी नहीं रही।

मंज़िल पर निगाह तो कोई रोक नहीं सकता।
कहता हूँ तुझमें जोश व हिम्मत नहीं रही।

चाँद भी वही चांदनी भी वो ही है मुश्ताक।
रिश्तों में मगर वो पहली सी हरारत नहीं रही।

- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह


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बात ख़त्म

तुम बोलो या ना बोलो,
हमको सुनना है बात ख़त्म।

हो चाहे जिसके भी तुम ,
तुम बस मेरे बात ख़त्म।

चाहा बहुत, न चाहे तुमको,
पर ये हो गया बात ख़त्म।

बिना छुए ही छुए हृदय को,
दिल में बस तुम हो बात ख़त्म।

दूरी, उम्र, बचकानी बातें
भर दिए बचपना बात ख़त्म।

जो कहना था, कह चुका मन,
अब क्या कहना बात ख़त्म।


- सविता सिंह मीरा


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अगर मेरे हिस्से भी कभी
ज़माने की रंगतें आई होतीं,
जवानी के शौक़,
खुलकर हँसने की इजाज़त,
और सपनों को जीने की
आज़ादी मिली होती…
तो इस रंगीन दुनिया में
यूँ ख़ामोश, बेरंग रहना
मुझे कभी रास न आता।
मैं भी चाहती
हवा के साथ उड़ना,
भीड़ में खोकर खुद को पाना,
हर रंग को बिना डर के अपनाना।
पर हालातों ने मेरे हाथों में
ज़िम्मेदारियों की स्याही थमा दी,
और मैंने
ख़्वाहिशों के रंग दिल में ही सहेज लिए।
लोग कहते हैं,
तुम सादा सी रहती हो,
पर क्या किसी ने पूछा कि ये सादगी
चुनाव थीया मजबूरी?
मैं बेरंग नहीं हूँ,
बस वो रंग जो मुझे मिलने थे,
किसी और के हिस्से चले गए…


- आरती कुमारी


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संख्याओं का मेला

आओ बच्चों तुम्हें सुनाएँ, एक अनोखी बात,
संख्याओं की दुनिया से, करवाएँ मुलाक़ात।
रेखा पर जो सजती हैं, सबको साथ बुलाती हैं,
"वास्तविक संख्याएँ" वो, जग में जानी जाती हैं।
एक, दो, तीन से गिनती शुरू, "प्राकृतिक" इनका नाम,
शून्य (0) को जब जोड़ लिया, तो बना "पूर्ण" का धाम।
सीधी-सादी, प्यारी-प्यारी, गिनती में ये आती हैं,
वास्तविक संख्याओं का, ये आधार बनाती हैं।

प्लस (+) की दुनिया दाईं ओर, माइनस (-) बाईं ओर जाए,
शून्य खड़ा है बीच में, सबको राह दिखाए।
ये सब मिलकर कहलाते, "पूर्णांक" प्यारे भाई,
घटने और बढ़ने की, इन्होंने रीत बनाई।

बटे (p/q) में जो लिख जाएँ, "परिमेय" नाम कमाएँ,
जैसे आधा (1/2) या हो पूरा, सब इसमें मिल जाएँ।
लेकिन जो न रुक पाएँ, जैसे पाई (π) या रूट (√2),
"अपरिमेय" हैं वे संख्याएँ, जो चलतीं बेछूट।

चाहे दशमलव शांत हो, या हो वो अशांत,
वास्तविक संख्या के घर में, सब रहते हैं शांत।
संख्या रेखा इनका घर है, यही इनकी पहचान,
गणित की इस दुनिया का, ये ही हैं सम्मान!


- देवेश चतुर्वेदी


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इज़हार-ए-मोहब्बत

​खामोशियाँ बेइंतहा हुईं, अब कुछ कहना जरूरी है,
दिल में दफन है जो अफसानें अब बताना जरूरी है।

यूँ तो हर दिन उनकी यादों की महक साथ रहती है,
मगर आज इस महक को हकीकत बनाना जरूरी है।

मोहब्बत में फिजूल के वादे-दांवे नहीं किया करते है,
प्रेम को सिर्फ मर्यादाओं के साथ निभाना जरूरी है।

इश्क में इरादा बस इतना कि उम्र भर चलना है,
​छोटी-छोटी खुशियों में प्रेम में रंग भरना जरूरी है।

इश्क में साथ चलने से मंजिलें आसां हो जाती है,
इस मोहब्बत की यादों का कारवां बनाना जरूरी है।

मोहब्बत के सफर में बिना कहे हाथ थमते हैं,
​सब रास्ते मुकम्मल होंगे, बस साथ देना जरूरी है।


- दीपक कोहली


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खिड़की खुली है

क्यों अब भी कुछ बचा है
सब कुछ कहने के बाद भी,
खिड़की खुली है,
दरवाजा बंद होने के बाद भी।

भौरों को फूलों से मिलना है
चकोर को भी राह चांद का तकना है।
कौन खींच रहा किसको_
ये मुश्किल समझना है।

नदियां खल खल लांघती,
सागर की आगोश
में सामने को।
मोर नाच रहा पंखे फैला,
बता रहा वो भी दीवाना है।

लहरें उछले पूनम की रात,
प्यारे चांद को पाने को,
परवाने भी पीछे कहां,
समा की एक झलक काफी है,
जान लुटाने को।

अधूरेपन को पूरा करने की,
अभिलाषा सबमें जागे।
सब अपने चहेतो के पीछे,
शायद इसी लिए भागे।

इस अधूरापन से ही मन बाऔराए ,
कोई अपने होश में न रह पाए।

ये अधूरापन ही प्यार है,
नहीं तो क्यों फूल खिले,
चकोर चांद को ताके
और नन्ही बुलबुल गीत गाए।


- रोशन कुमार झा


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परदे के पीछे

सिंहासन दिखता, राजा दिखता,
पर सूत्र कहीं और हिलते हैं,
जनता सोचती- हम चुनते हैं,
पर फैसले और ही बनते हैं।

काग़ज़ पर चलता लोकतंत्र,
मन में चलता व्यापार बड़ा,
सच बोलने वाला अकेला,
झूठ का मेला फैला पड़ा।

परदे के पीछे जो हाथ हिलाए,
वह दीपक नहीं- छाया बनता,
डर से चलता शासन सारा,
न्याय कहीं खोया रहता।

लेकिन सुन लो, हे मानव प्यारे,
यह अंधकार स्थायी नहीं,
जब मन सत्य से जुड़ जाता है,
भय खुद ही हार मान जाता है,
Deep State हो या झूठी सत्ता,
सब मिट जाता है।

राज न टिके, षड्यंत्र न टिके,
न टिके अहं का भारी भार,
वही सच्चा शासक, वही सरकार।


- नरेंद्र मंघनानी


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इश्क के इस दौर में
हम भी दिल दे बैठे
ज़माने की फितरत में
मन परवाज़ उड़ा बैठे
वन वीक सीरीज के दौर में
कमबख्त! हम किताबों से
जिगर लगा बैठे...
वाट्सअप यूनिवर्सिटी के भ्रमजाल में
हम नासमझ
रेफ्रेंस बुकों में माथा खफा बैठे
जंगल की आग में
बर्फ का गोला बन बैठे
यह जिगर है मानता नहीं
हम मानवता को गले लगा बैठे
बचपन में जिस कागज़ से
नाव बनाते रहे
आज उसी कागज़ पर
पेन की पतवार खै रहे
कमबख्त पेन से स्याही
क्या खलक गई
मैं लिखता मोहब्बत रहा
वो इंकलाब लिख गई


- जितेंद्र बोयल


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पूंजीवाद के प्रोपेगेंडा में फंस ग‌ए रे भैया!


पूंजीवाद यानी Capitalism एक प्रकार की आर्थिक प्रणाली है। इसमें उत्पादन के साधनों का स्वामित्व निजी कंपनियों व व्यक्तियों के हाथों में होता है। इन सब का उद्देश्य सिर्फ अधिक से अधिक लाभ कमाना होता है।  आज आप और हम सभी पूंजीवाद का शिकार हो चुके हैं। पूंजीवाद के प्रोपेगेंडा ने हमें अपना इतना आदी बना दिया है कि हम चाह कर भी इसके जाल से बाहर नहीं निकाल सकते हैं। 





जब कोई कंपनी किसी वस्तु का उत्पादन करती है तो उत्पादन के लिए कई चीजों की जरूरत पड़ती है और उत्पादन के दौरान विभिन्न तरह का पर्यावरण प्रदूषण भी होता है। उदाहरण के लिए एक सूती यानी कॉटन के शर्ट को बनाने में औसतन 2700 लीटर पानी खर्च होता है, जबकि एक व्यक्ति इतना पानी ढाई साल तक पी सकता है। ऐसे में सवाल है- पूंजीवाद का यह नशा हमें जिस बर्बादी की ओर लेकर जा रहा है, क्या हमें वह बर्बादी दिखाई दे रही है ?

एक जमाना हुआ करता था जब एक व्यक्ति के पास सीमित और साधारण कपड़े हुआ करते थे। मगर आज एक व्यक्ति एक महीने के कई जोड़ी कपड़े खरीदता और बदलता है। आखिर इतने कपड़े खरीदने और बदलने की क्या जरूरत है ? जब हमारा सीमित कपड़ों से काम चल सकता है तो फिर पूंजीवाद का फैशन नाम का नशा हमें क्यों बार-बार चटाया जा रहा है ? और कुछ अमीर लोगों की साजिश पूंजीवाद का शिकार साधारण व भोली भाली जनता को क्यों बनाया जा रहा है ?




हम सभी को पूंजीवाद नाम के कैंसर को पहचानने की जरूरत है। अगर वक्त रहते आप इस कैंसर को नहीं पहचानेंगे तो आपके पास या आपके आने वाले पीढ़ी के पास कुछ नहीं बचेगा; बस आप और आपकी आने वाली पीढ़ी पूंजीवाद की गुलाम बनकर घूमेगी।



                                                              - दीपक कोहली



बदलाव स्वयं से शुरु करें

जीवन में सिर्फ ज्ञान बांटने के लिए नहीं लिखना चाहिए हमें बदलाव के लिए भी लिखना चाहिए और यह बदलाव स्वयं से ही प्रारंभ करना चाहिए। नवीन रचनाएं लिखना यह आपको सृजनात्मक एवं कलात्मक बनता है परंतु वैचारिक रूप से लिखने पर हमें जीवन स्पष्टता से समझ में आने लगता है कई चीजों को हम मूलतः मना नहीं कर पाते या सीधे न कहना परंतु उसका प्रभाव कभी ना कभी हम पर ही पड़ता है जिस कार्य को हम अच्छी तरह कर नहीं सकते, वह हमें वास्तविक रूप से किसी को दिखाने के लिए नहीं करना चाहिए, कहने का अर्थ है हमें किसी और के लिए नहीं अपितु हमें स्वयं के दृष्टिकोण को सटीक रखते हुए, खुद में ही सुधार लाना चाहिए।






कई लोग सामाजिक भेदभाव के ऊपर लिखते हैं परंतु सत्य में क्या वह यह भेदभाव खुद भी करते हैं, तो पहले हमें यह भेदभाव स्वयं से ही मिटाना चाहिए तब हम सामाजिक रूप से कह सकेंगे कि हम भेदभाव नहीं करते ; परंतु आज कुछ सामाजिक विषय ऐसे हैं जहां सामाजिक समरसता की जगह, जाति परिवर्तन एवं भेदभाव रखना कट्टर रूप ले चुका है जो की मानवीय भावनाओं के लिए अत्यंत दुःखद है।

एक आम व्यक्ति सबसे पहले अपनी आजीविका को चुनता है, जाति और समाज से पहले उसका कर्म ही उसे जीवन जीने के लिए जरूरी होता है : किसी भी धर्म या जाति का होने के बाद भी मनुष्य को जीवन हेतु अपनी व्यवसाय, अपने कर्म पर निर्भर होना पड़ता है। रोटी, कपड़ा, और मकान इंसान की प्रथम जरूरत है। जब हम धर्म का चयन करते हैं तब सनातन धर्म के अनुसार भी मानवता ही मनुष्य जाति के लिए सबसे बड़ा धर्म है।

आज हमें राम के पद चिन्ह पर चलने की आवश्यकता है क्योंकि वह एक आदर्श है पर यहां समाज में रहने के लिए हमें कृष्ण बनना ही होगा। यह एक सतत यात्रा है जो आपको आदर्श सिखाती है परंतु आपके जीवन में जब उतार चढ़ाव आते हैं तो कृष्ण की भांति हर परिस्थिति को संभालने की शक्ति भी देती है।

 
- आशी प्रतिभा



बच्चों के लिए खतरनाक बनता मोबाइल!

मोबाइल के इस युग में आपको राह चलते लोगों की अखबार पढ़ती तस्वीरें जब दिख जाती है तो लगता है कि अखबार पढ़ना इस मोबाइल के युग में कितना जरूरी है, बहुत से लोग या फिर घर में बैठे बच्चे और उनके पेरेंट्स जब कोई काम में उलझ जाते हैं तो अपने बच्चों को शांत रखने के लिए तुरंत मोबाइल फोन थमा देते हैं लो बेटा थोड़ी देर फोन देख लो, अच्छा टीवी में कार्टून देख लो इससे बच्चे के दिमाग और शरीर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता जा रहा है।





बच्चे ज्यादा देर नजर गड़ाए फोन देखते हैं वो देखते-देखते तो कई बार इंस्टाग्राम रील भी देखने लगते हैं और कई रील्स ऐसे होते हैं या फिर उसके स्क्राल करने के बाद कुछ ऐप्स के ऐड ऐसे आते हैं जिसमें दिखाया जाता है कि आप इस ऐप पर बस वीडियो देखों और हजारों रूपए कमाओं यह कहीं ना कहीं बच्चों पर पूरी तरह हावी हो जाता है।

इसलिए बच्चे को मोबाइल देते समय सोच समझकर दें देखने के लिए या फिर पेरेंट्स मोबाइल देने के बजाय उन्हें उपन्यास, कहानी की किताबें पढ़ाए या बच्चे के लायक जो अखबार आ रहे हैं जैसे बाल भास्कर उसे दिखाएं जिससे बच्चे पढ़ने की ओर कदम बढ़ाएं।

आपने हाल ही में पढ़ा और सुना भी होगा कि हमारे देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में वहां की सरकार ने सभी सरकारी स्कूलों में अखबार पढ़ना अनिवार्य कर दिया है यह इसलिए किया गया है क्योंकि बच्चा मोबाइल स्क्रीन पर नजर कम डालें और पढ़ने की आदत डालें हर दिन प्रार्थना के समय कम से कम 10 मिनट अखबार पढ़ना जरूरी है और हिंदी के साथ अंग्रेजी भाषा के अखबार को भी पढ़ने के लिए कहा गया है।





विधार्थियों में पढ़ने की रूची बढ़े और इसके साथ उनका करेंट अफेयर्स भी मजबूत हो और फेक न्यूज को पहचान सकें ऐसा नियम हर राज्य के सरकारी स्कूलों में लागू किया जाना चाहिए ताकि बच्चे मोबाइल फोन से दूरी बनाकर पूरी ध्यान पढ़ाई पर लगाएं अखबार पढ़ने उसमें चित्र देखकर बच्चे धीरे-धीरे प्रेरित होकर किताब पढ़ना भी सीख जाएंगे और मोबाइल स्क्रीन से उनकी दूरी बनती चली जाएगी। अखबार पढ़ना इसलिए भी जरूरी है कि इससे जनरल नॉलेज में भी सुधार होता है और भाषा के साथ शब्द पर भी पकड़ अच्छी हो जाती है।


- आशीष रंजन



एपीस्टीन फाइल्स ने दिखा दी हकीकत


नैतिकता और कानून एपीस्टीन फाइल्स






एपीस्टीन फाइल्स केवल एक अंतर्राष्ट्रीय अपराध कथा नहीं है, यह सत्ता मोह का वैश्विक दस्तावेज है। यह बताती है कि जब सत्ता सेवा नहीं, भोग बन जाती है, जब पद उत्तरदायित्व नहीं, सुरक्षा कवच बन जाता है,तब अपराध केवल होता नहीं, छिपाया भी जाता है। भारतीय परम्परा में सत्ता को कभी अंतिम लक्ष्य नहीं माना गया, इतिहास साक्षी है कि जब मर्यादा टूटी, तो सत्ता छोड़ी गई, राम का वन गमन हो या महाभारत का युद्ध,हर कथा यही कहती है, कि पद से बड़ा धर्म होता है।

आधुनिक भारत में भी लंबे समय तक यही परंपरा रही, दो दशक पहले सरकारों के दौर में ऐसे उदाहरण मिलते है, जब सिर्फ नाम आने मात्र से मंत्रियों को पद त्याग करना पड़ा। आरोप सिद्ध हुए या नहीं, यह बाद की बात थी, नैतिक जिम्मेदारी तय होती थी। अब पद छोड़ना नही,पद बचाना प्राथमिकता बन गया है। आरोपों को राजनीतिक साजिश कह कर खारिज कर देना, नैतिकता को कानूनी तकनीक में उलझा देना, और कुर्सी से चिपके रहना, सब सत्ता मोह के लक्षण है।





एपीसटीन प्रकरण इसी मानसिकता का चरम रूप है, वह सत्ता, धन और प्रभाव ने कानून को भी बंधक बना लिया। वर्षों तक गंभीर आरोपों के बावजूद प्रभावशाली लोग सुरक्षित रहे।यह केवल न्याय की विफलता नहीं, बल्कि उस व्यस्था का नैतिक दिवालीपियन है जहां मोह सर्वोपरि हो चुका है।

भारत के लिए यह चेतावनी है। लोकतन्त्र केवल चुनाव से नहीं चलता, वह त्याग से जीवित रहता है। पद छोड़ने की क्षमता ही सत्ता को वैध बनाती है। सत्ता साधन है,साध्य नहीं। पद सेवा का माध्यम है,ढाल नहीं। यदि सत्ता मोह पर नियंत्रण नहीं हुआ,तो कानून बचेगा, लेकिन न्याय नहीं, संस्थाएं रहेंगी, लेकिन विश्वास नहीं, शरीर रहेगा लेकिन आत्मा नहीं बचेगी।


- रोशन कुमार झा



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जेफरी एपस्टीन


एक अमेरिकी अरबपति फाइनेंशियर जो बहुत प्रभावशाली लोगों से जुड़ा था- राजनेता, व्यवसायी, रॉयल फैमिली के सदस्य, और सेलिब्रिटीज। उसके पास कैरेबियन में एक निजी द्वीप था! यंहा नाबालिग लड़कियों की सेक्स ट्रैफिकिंग और यौन शोषण का एक संगठित नेटवर्क चलता था। एपस्टीन एक अमेरिकी फाइनेंशियर था जो 2019 में सेक्स ट्रैफिकिंग और नाबालिगों के यौन शोषण के आरोपों में गिरफ्तार किया गया था।




एपस्टीन के मामले में कई हाई-प्रोफाइल व्यक्तियों के नाम सामने आए, जिनमें राजनेता, व्यवसायी और सेलिब्रिटीज शामिल थे। एपस्टीन फाइल्स एक विस्तृत, विवादास्पद और बेहद गहरी जांच का हिस्सा हैं जो दुनिया भर में शक्तियों, अपराधों और नेटवर्क के संबंधों पर बहस जगा रहे हैं। एपस्टीन की मृत्यु हो गई, जिसे आधिकारिक तौर पर आत्महत्या बताया गया, हालांकि इस पर कई षड्यंत्र के सिद्धांत भी सामने आए।


- नरेंद्र मंघनानी


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