साहित्य चक्र

15 March 2026

आज की विशेष रचनाएँ- 15 मार्च 2026




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ये पृथ्वी है घर सभी का

चलती हुई ट्रेन में बेटिकट
मैं देखता हूॅं अपने समय के दृश्य में
गॅंगातीरे शहनाई फूॅंक रहे हैं बिस्मिल्लाह
अमज़द अली खोज रहे हैं भैरवी के रॅंग
और पूछ रही हैं उमराव जान पूछ रही हैं
दरवाज़े खोलते हुए,खोजते हुए बचपन
ये क्या जगह है दोस्तों,कौन-सा मुक़ाम है
कि जगह-जगह,ग़र्दो-ग़ुबार ही गुबार है
बताते हैं,समझाते हैं भीमसेन जोशी
किशोरी अमोणकर को स्मृतियों में
ज़रा भी अपराध नहीं है सपने देखना
देखना सपने सबूत है आदमी होने का
सपने नहीं तो आदमी भी कहीं नहीं
सपनों का होना,आदमी होने का सपना है
किसी को भी घटाने से घटता है ख़ुद ही
सच्चा-झूठा नहीं होता है देश कोई भी करते हैं
होड़ काल से और मरते हैं बेमौत
हथियारों की होड़ ही बनाती है पागल
और पागल आदमी देश नहीं,दुश्मन है
किसी भी देश में,किसी भी देश का
भूल जाता है आदमी कि आदमी है वह
नहीं किसी दूसरी दुनिया का दूसरा प्राणी
हाथ हैं दो ही उसके भी,जैसेकि अन्य
पाॅंव हैं दो ही उसके भी,जैसेकि अन्य
कान हैं दो ही उसके भी,जैसेकि अन्य
और है एक खोपड़ी भी सभी के जैसी ही
फिर क्यों घृणा,क्यों ईर्ष्या,युद्ध क्यों
फिर क्यों ध्वस्त बारहखड़ी फिर-फिर
फिर क्यों मटियामेट पानी के संकल्प
क्यों क़त्ल किये जाते हैं फिर उड़ते पक्षी
अपनी-अपनी हद के बेहद में हैं सभी
और अपनी-अपनी ध्वनियों के ताप में भी
अपनी-अपनी स्वतंत्रताओं सहित निर्मल
है नहीं जगह कम किसी की भी,कहीं भी
ज़रा-सा वक़्त,ज़रा-सी जगह है सभी की
ज़रा-ज़रा मिट्टी,ज़रा-ज़रा आग,है सभी में
ये पृथ्वी है घर सभी का।


- राजकुमार कुम्भज


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यू टर्न

जब देखो आजकल लोग यू टर्न लेते हैं मार
अपने कंधों से जिम्मेवारी एकदम देते हैं उतार
सोचता रह जाता है कोई कि यह क्या हो गया
झूठ बोलते है फिर मुकर जाते हैं लेते है पल्ला झाड़

सबसे ज्यादा यू टर्न लेते हैं नेता छोटा हो या बड़ा
कड़वे बचनों का तीर रहता है इनके तरकश में पड़ा
चिकना घड़ा होते हैं इनको परवाह नहीं किसी की
वक्त पड़ने पर होता नहीं किसी के साथ खड़ा

अभी कहते हैं कुछ थोड़ी देर में हैं मुकर जाते
जुबान इनकी चलती है दोष मीडिया पर हैं मढ़ आते
आका को खुश करने से बिल्कुल नहीं हैं घबराते
असर इन पर कोई नहीं चिकने घड़े हैं बन जाते

सड़क पर जब आगे हैं निकल जाते
तब यू टर्न लेकर फिर हैं लौट आते
यू टर्न लेना भी कई बार होता है जरूरी
वरना अपनी मंजिल तक कभी नहीं पहुंच पाते

बॉस अपने मातहत से करवाता है बहुत काम
न करे तो फिर फंस जाती है आफत में जान
लिखित में होता नहीं धौंस से है करवाता
उसकी यू टर्न से फंस जाता है कोई,
आता नहीं उसका नाम


- रवींद्र कुमार शर्मा


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आज भी याद है वह किताब,
खोलूँ तो महके जनाब,
उड़ते हैं पन्नों से अलसाए ख़्वाब,
भीग उठे मन का शबाब।

बीच पन्नों में सूखा गुलाब,
दबा हुआ कोई अनकहा जवाब,
हल्की सी खुशबू, हल्का सा हिसाब,
और धड़कनें बेहिसाब।

कहीं शार्पनर से छिली पेंसिल की कुरचन,
कोनों में अटकी बचपन की धड़कन,
स्याही के धब्बे, आधी सी रचना,
जैसे समय की कोई अटकी कम्पन।

कभी नाम लिखा था चुपके से,
कभी आँसू गिरे थे पन्नों पे,
कभी हँसी छिपी थी लफ़्ज़ों में
सब दर्ज है उस किताब में।

कैसे भूलें वह किताब,
जिसमें उम्र का हर पड़ाव,
कुछ यादें थीं बेहद ख़ास,
और कुछ सपने… बेहिसाब।


- सविता सिंह मीरा


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इल्जाम

एक इल्जाम
मेरे नाम आया है
न होते हुए भी मोहब्बत
सरेआम
मेरा नाम आया है।

मैं ढूंढता रहा
हर जगह खुद को ही
न जाने क्यों
फिर भी मेरा नाम
किसी ओर के साथ आया है।

लोग पूछते रहे मुझे
मेरे गम का कारण
और मैं हर गम में
खुदा तेरा नाम
हर बार लेता आये हूँ।


- डॉ. राजीव डोगरा


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सभ्यता

सुनो सभ्यता!
पूर्णता को तरसती तुम्हारी परिभाषा
विचलित करती है मुझे
कितनी बदरंग हो गयी है
तुम्हारी प्रकृति
तुम्हारी रक्त-नलिका में बहने वाला लहू
संवेदनशीलता से दूर
क्यों होता जा रहा है
देखने को बाध्य क्यों है
आज का मनुष्य
अपने समाज में एक भीषण युद्ध
सभ्यता का
सभ्यता के विरुद्ध ?


- अनिल कुमार मिश्र


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मातृ भाषा हिंदी दिवस

आज बनी त्योहार है हिंदी,
आज बड़ी खाश है हिंदी।
मिट रहा जिसका अस्तित्व,
पहन कर ताज खड़ी हिंदी।

पाती थी सम्मान जो हिंदी,
आहत सी ताकती वो हिंदी।
नहीं क्यों रोज देते सम्मान,
आज ही सिर्फ बोलते हिंदी।

चमकी बिंदिया सी हिंदी,
बन प्रश्नचिह्न सी खड़ी हिंदी।
लेकर उपहास की थैली,
कहते हमारी मैया है हिंदी।

दंश उपहास का झेलती,
अपमानित होती रहती हिंदी
सीमित वेद उपनिषद भाषा
सूर तुलसी,मीरा की हिंदी।

खोखली रस्मों का पहना ताज,
बनाते है महान हम हिंदी।
पढ़ा बच्चों को हम अंग्रेजी,
कहते हमारी शान है हिंदी।


- मीना तिवारी

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गांव में एक घर

सड़क के उस छोर पर
छोटे से गांव में,
नीम की छांव में
घर के आंगन में एक नल हुआ करता था
गांव में मेरा भी एक घर हुआ करता था।
मिल जाती थी अक्सर
बाट जोहती अम्मा, हुक्का पीते बाऊजी,
शाम से ही ताक में जलता,
एक दिया हुआ करता था,
गांव में मेरा भी एक घर हुआ करता था।
मिट्टी का एक चूल्हा,
खूंटे से बंधे चौपाए,
आंगन में बिछाकर खाट,
हमारा बिस्तर हुआ करता था,
गांव में मेरा भी एक घर हुआ करता था।
चूल्हे पर हांडी में पकता हुआ साग,
आंगन में मिट्टी से लीपने की खुशबू,
कोने पर चटनी बनाने को,
सिल पर पत्थर हुआ करता था,
गांव में मेरा भी एक घर हुआ करता था।
छत पर नाचता मोर,
गली के बाहर पहरेदारी करता कुत्ता,
पेड़ पर गौरैया का घर,
गुटर गूं करता कबूतर हुआ करता था,
मेरा भी गांव में एक घर हुआ करता था।
हरे भरे खेत , खेतों में बहता ताजा पानी
पानी में गोते लगाते बगुले,
गेहूं और बाजरे की बाल,
मीठा मीठा मटर हुआ करता था,
गांव में मेरा भी एक घर हुआ करता था।


- मंजू सागर



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समंदर मे चीनी घोलना सीखिए
हो सके त मीठ बोलना सीखिए

अगर पूर्णिमा देखना चाहते है,
दिल के दराज़ खोलना सीखिए

ज़ब चराग जलाए है आसियानो मे
तूफान जैसा भी हो संभालना ‘सीखिए

जिनगी को आराम से चलने दीजिये
मधुमक्खी के छाता मे हाथ न डालना सीखिए

बिना मेहनत के घी नही निकता
मन लगा के दही मोहना सीखिए

दुनिया बस मे हो या ना हो लेकिन
परिवार के बाट खोजना सीखिए

घर आंगन मे घास पुस लग जाए तो
मुहब्बत के खुरपी से सोहना सीखिए

मछलीं पानी मे नहांने से शुद्ध नहीं होंगी
ईमानदारी के साबुन से दाग धोना सीखिए

जिस कश्ती मे मुसाफिर बैठे हुए है ‘सदानंद’
एक इलतेज़ा है नाव मत डुबोना सीखिए


- सदानंद गाज़ीपुरी


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हिसाब

लाशों पर बने महलों में क्या चैन से रह पाओगे,
छीनी जो सांसे उनका हिसाब क्या दे पाओगे ?

भूख से बिलबिला रहे हैं जो बेबस मजबूरी में,
उन लोगों को कभी अपना मुख दिखा पाओगे ?

इंसान है खुदा की बनाई बेशकीमती रचना,
उस कीमत को कैसे सिद्ध कर पाओगे ?

कीड़े मकोड़े की तरह मसल देते हो इंसानों को,
उनका इंसान होने का दर्द कब समझ पाओगे ?

हर मसला नहीं होता बम गोली बारूद से हल,
इस छोटी सी बात को दिमाग में कब बिठाओगे ?

माना की आप जैसी समझ नहीं है हम लोगों की,
इंसा को इंसा समझने की समझ कब लाओगे ?

खुदगर्जी में फंसकर मत खेलो होली रक्त की,
रक्त के हर कतरे का हिसाब कैसे दे पाओगे ?


- राज कुमार कौंडल



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तेरी दोस्ती

तेरी दोस्ती ने हमको
जीवन जीना सिखा दिया
उदास रहता था मेरा चेहरा
उसको मुस्कुराना सिखा दिया।

न मिली मोहब्बत जीवन में
इसका अब कोई गम नहीं रहा
तेरी दोस्ती ने मुझको
हर लम्हा जीना सिखा दिया।

रब करे तू हमेशा खुश रहे
मेरी हर दुआ में शामिल रहे
तेरी दोस्ती ने मुझको
जीवन का बदलाव सिखा दिया।

मेरी रिद्धियां मेरी सिद्धियां
तुमको सदा सलामत रखें
तेरी दोस्ती ने मुझको
मानव से महामानव बना दिया।


- डॉ. राजीव डोगरा


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अब चलते हैं...

जिंदगी के इस रंगमंच पर सब
अपना किरदार निभा जाते हैं।
कुछ लोग कठपुतली बन जाते है
कुछ लोग मेहनत करते जाते हैं।

बहुत हुआ एहसान ए जिंदगी मुझ पर...
अब चलते है बस अब चलते हैं।
सुबह सुबह जब आँखें
खुलती मंज़िल ही दिख जाती हैं।

लिए बोझ सर पर जिंदगी की
मेहनत करते जाते हैं।
बहुत हुआ एहसान ए जिंदगी मुझ पर..
अब चलते है बस अब चलते हैं।

मदद किया अपनो का अपना दर्द भुलाकर।
अपनो ने मुँह ऐसा मोड़ा कि गिरगये हम जमी पर।
बहुत हुआ एहसान ए जिंदगी मुझ पर...
अब चलते है बस अब चलते है।


- अजीत कुमार सिंह



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काश! मैं, आपको अपनी कमाई से
एक छोटा सा तोहफा दे पाता...
मेरा सारा कर्जा उतर जाता...
आपकी दी गई ज्ञान की तिजोरी
मैंने आज भी संभाल कर रखी है...
चाहे पांच पीढ़ी पहले का इतिहास हो
या समाज को आईना दिखाते हुए
आपका विधवा से शादी कर लेना हो
आप हमारे बरगद के वृक्ष हो...
जिसकी छाया हमेशा हमारे और
आने वाले पीढ़ी के ऊपर रहेगी...
आपका परिश्रम, संघर्ष की कहानी,
मजबूत दृढ़ संकल्प.. और
अपनी बातों से लोगों को जीतने की कला...
मुझे हमेशा आपकी याद दिला देती है।
काश! मैं आपको अपनी कमाई से
एक तोहफा दे पाता...


- दीपक कोहली



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11 March 2026

भारतीय रेलवे की दयनीय स्थित!



अक्सर मैं इधर-उधर जाने के लिए भारतीय रेलवे की सेवाओं का अधिक इस्तेमाल करता हूं। कुछ दिन पहले मैंने जयपुर से कोलकाता और कोलकाता से जयपुर आना-जाना किया। इस दौरान मुझे भारतीय रेलवे की दयनीय स्थिति को देखकर बहुत ही दुःख हुआ। बतौर भारतीय नागरिक मेरे मन में कई विचार उत्पन्न हुए। जैसे- क्या हम भारतीयों में अभी शिक्षा की कमी है ? क्या हम भारतीय अपनी सरकारी संपत्ति को व्यक्तिगत संपत्ति के मुकाबले सम्मान और उसके रखरखाव का ध्यान नहीं दे पाते हैं ? सरकारी संपत्ति के प्रति हम भारतीयों का इतना गंदा व्यवहार क्यों होता है ?






जयपुर से ट्रेन में बैठने के बाद दिल्ली जाने तक ट्रेन के शौचालय इतने गंदे हो गए थे कि शौचालय जाने तक का मन खत्म हो गया। लोग शौचालय जाते हैं और फ्लैश तक नहीं चलते हैं। आखिर लोग ऐसा व्यवहार क्यों करते हैं मेरी समझ से परे है। जो बात मैं कह रहा हूं यह कोई स्लीपर या जनरल बोगी की बात नहीं है, बल्कि 2 एसी और थर्ड एसी बोगी के अनुभव मैं आपके साथ साझा कर रहा हूं। रेलवे के 2 एसी और थर्ड एसी में अधिकतर अपर मिडिल क्लास ज्यादा सफर करता है और इस क्लास को सबसे अधिक शिक्षित और एडवांस माना जाता है। उसके बावजूद भी सरकारी संपत्ति के प्रति इनका व्यवहार चिंतनीय है। ऐसी शिक्षा का क्या महत्व जब आपको मूलभूत सेवाओं का इस्तेमाल तक करना ही नहीं आता हो। ऐसी अमीरी का क्या जब आपको इतना भी नहीं पता कि शौचालय जाने के बाद फ्लैश चलाना होता है, जबकि यह काम आप और हम अपने घरों में हर रोज एक-दो टाइम करते ही हैं।

 इतना ही नहीं बल्कि लोग तो खाना खाकर या चाय कॉफी पी कर, नमकीन कुरकुरे खा कर, कोल्ड ड्रिंक पी कर कूड़े को सीट के नीचे या साइड में डाल देते हैं, जबकि रेलवे के हर बोगी के बाहर गेट पर डस्टबिन लगा रहता है। यह एक साधारण सी समझ है कि कूड़े को डस्टबिन में डालना है। मगर हम भारतीय जब भी सरकारी चीजों का इस्तेमाल करते हैं, इतने गंदे तरीके का व्यवहार करते हैं कि मानो उस सेवा का दोबारा हमें इस्तेमाल ही नहीं करना हो। आखिर हम भारतीयों में सरकारी संपत्ति के प्रति प्रेम और अच्छे व्यवहार की जागरूकता कब आएगी ?





भारतीय रेलवे को भी यह सुनिश्चित करना चाहिए कि ट्रेनों के अंदर अच्छी क्वालिटी का खाद्य सामग्री उपलब्ध हो सके और ट्रेनों में काम करने वाले स्टाफ का व्यवहार थोड़ी नरम व अपने काम के प्रति ईमानदार हो। जिन कंपनियों को रेलवे ठेके पर सफाई या अन्य चीजों की जिम्मेदारी देता है, उन कंपनियों के व्यवहार पर भी रेलवे को पैनी नज़र रखनी चाहिए। इतना ही नहीं बल्कि अगर संभव हो सके तो यात्रियों से कंपनी की सेवा (जिम्मेदार) के प्रति फीडबैक भी लिया जाना चाहिए। इससे रेलवे की सुविधाएं और बेहतर होंगी।

अंत में इतना ही कहना चाहूंगा कि शिक्षा का मतलब सिर्फ नौकरी प्राप्त करना नहीं होता है, बल्कि आपके व्यवहार और बोली में शिक्षा की कुशलता झलकनी चाहिए। देशभक्ति और देश प्रेम सिर्फ सेना में जाना नहीं होता बल्कि देश की संपत्ति के प्रति प्रेम और आदर का भाव भी देश प्रेम की श्रेणी में आता है। आपकी गली में लगा सरकारी स्ट्रीट लाइट हो या रेलवे और परिवहन बस सेवाएं आदि सभी सरकारी सेवाओं व संपत्ति का बतौर नागरिक हमें सुरक्षा और देखभाल करनी होगी, तभी एक बेहतर राष्ट्र का निर्माण हो पाएगा। हां! हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सरकारी संपत्तियों व सेवाओं में हम सभी नागरिकों के टैक्स का ही पैसा लगता है।



                                                                - दीपक कोहली





लेख- परमात्मा का इंतज़ाम



रोज़ाना की तरह ही आज़ भी मैं कई बार पार्सल डिलीवरी के लिए घोड़ा बाबा मंदिर के पास से गुजरा। शाम से ही हल्का-सा ध्यान ज़रूर था कि मंदिर के पास सड़क पर तकरीबन 13-14 साल की उम्र के दो लड़के लगातार मौजूद रहकर कुछ कर रहे हैं। लेकिन मैंने इस बात को उतनी गंभीरता से नहीं लिया था। शाम के करीब पौने आठ बजे होंगे। मैं आज़ की सातवीं पार्सल डिलीवरी लेकर तेज़ी से चित्रगुप्त कॉलोनी की ओर जा रहा था। चूंकि चित्रगुप्त कॉलोनी के लिए रॉन्ग साइड से होकर ही सर्विस लेन पर रास्ता कटता था सो मैं घोड़ा बाबा मंदिर की ओर बने सर्विस लेन पर ही जाना उचित समझा। अभी सरपट मंदिर के पास से गुजर ही रहा था कि अचानक आवाज़ आई-"भैया-भैया ! रुकिए !





चूंकि मैं जल्दबाजी में था इसलिए बिना रुके आगे बढ़ गया। कुछ ही दूर गया था कि मन में कुछ खटका। शाम से ही ये बच्चे आखिर यहां कर क्या रहे हैं ? क्या आते-जाते राहगीरों से कुछ मांग रहे हैं ? शाम से लेकर अबतक वहीं पर हैं तो क्या अबतक किसी राहगीर ने उनकी बात नहीं सुनी होगी ? क्या वे बच्चे भूखे हैं ? कौन हैं,क्या हैं एक क्षण में अनगिनत प्रश्न दिल में उमड़ पड़े। अचानक मैंने अपनी असमंजस तोड़ते हुए क्लीयर कट तय किया कि भले ही आज़ और डिलीवरी नहीं करूंगा। लेकिन अभी का पार्सल डिलीवर करने के बाद तुरंत लौटकर उन बच्चों से मिलकर बातें करूंगा। वैसे भी आज़ लगभग चार सौ रुपए आ चुके हैं तो और ना भी हो तो कोई बात नहीं।

घोड़ा बाबा मंदिर के पास ही एक छोटा-सा रेस्टोरेंट है-"बेरोजगार ढाबा"। मैं अक्सर वहां अपनी फैमिली के साथ आया करता हूं। पूरे शहर में सबसे अच्छी और सस्ती बिरयानी यहीं मिलती है। मैं फैसला कर चुका था कि आज़ की शाम,उन दो बच्चों के नाम। आज़ उन्हीं के साथ बिरयानी पार्टी होगी। पार्सल डिलीवर करने के बाद मैं उल्लासित होकर तेज़ी से घोड़ा बाबा मंदिर की ओर चल पड़ा। दिल के किसी कोने में यह भी बातें चल रही थीं कि क्या वे बच्चे सचमुच बेसहारा हैं ? क्या उनके मां-बाप गैर ज़िम्मेदार हैं इसलिए वे इतनी रात सड़क पर भटक रहे हैं ? या मां-बाप हैं भी या नहीं ?






फिर मन के अपराध को वहीं पर रोकते हुए अगले ही पल तय किया कि मुझे ये सब कुछ नहीं सोचना है। कौन,क्या, कैसे भाड़ में जाए। आज़ बिरयानी पार्टी होकर रहेगी उन बच्चों के साथ। महज़ 180 रुपए में तीनों खा लेंगे। इतने रुपए तो न जाने कितने उड़ जाते हैं अक्सर। इन्हीं ख्यालों में खोया जैसे ही मैं मंदिर के पास पहुंचा, बच्चे नदारद। रात के लगभग नौ बज रहे थे।

उन बच्चों को न देखकर मेरा सारा उल्लास काफूर हो गया। मैं अंदर ही अंदर बेचैन हो उठा कि काश ! जाते वक्त ही थोड़ा-सा रुककर बातें कर लेता और उनसे दस मिनट वहीं इंतज़ार करने कहता। मुझे खुद पर बेतहाशा गुस्सा आ रहा था और दमभर खुद को कोस भी रहा था। ब्लॉक गेट से लेकर टीचर ट्रेनिंग मोड़ तक मैं उन बच्चों की तलाश में लगभग चार-पांच राउंड मारा। पर वो बच्चे कहीं नज़र नहीं आए।

शाय़द अपने घर चले गए होंगे या उनका जहां ठिकाना है वहीं चले गए होंगे। मैं भारी मन से वापस स्टोर की ओर चल पड़ा। मन में कसक ज़रूर थी कि उन बच्चों को कुछ खिला नहीं पाया। लेकिन मुझे हमेशा से एक तथ्य का भान है कि परमात्मा सबकुछ पहले से तय रखते हैं। वे सबके लिए ज़रूरत के हिसाब से इंतज़ाम करके रखते हैं। वो माध्यम क्या होगा ये बस वही जानते हैं और इसकी अनुभूति मैंने अपने जीवन में अनगिनत बार किया है।

मेरी भावना सकारात्मक ज़रूर थी लेकिन मुझे परमात्मा पर पूरा भरोसा है कि शायद वो आज़ उन बच्चों का इंतजाम मेरे हाथों नहीं कराना चाहते होंगे, कोई बात नहीं नेक्स्ट टाइम मौका न चूकूं इसका ध्यान रखने की कोशिश करूंगा। लेकिन हां ! उनकी व्यवस्था किसी के हाथों ज़रूर करा दिए होंगे इतना मुझे परमात्मा के इंतज़ाम पर संपूर्ण विश्वास है। बस इसी तसल्ली के साथ वापस अपने काम पर लग गया।


-कुणाल




#साहित्य #कलम #हिंदीसाहित्य #लेखक #काव्य #HindiPoetry

आज की प्रमुख रचनाएँ- 11 मार्च 2026






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चिट्टा

रहता था माँ से कुछ उखड़ा-उखड़ा
तेज आवाज़ में बात करना 
छुपाते हुए मुखड़ा
मासूम सी माँ कुछ समझ ना पायी
क्यों है बाल मेरा मुझ से रुठा-रुठा
कोशिशें सब बेकार सी
दुलारने, सहलाने, पुचकारने की
शर्म लाज छोड़ जरुरतें उसकी बढ़ने लगी
जेब खर्च अब सौ से हजारों में बढ़ने लगी
पाई-पाई जोड़ पिता उसका
बेटे के समृद्ध भविष्य को जोड़ता 
पढ़ाई के खर्चे मेरे अधिक कहकर
बेटा लेकर वापिस न मोड़ता
जब तक माता-पिता, परिवार, 
समाज समझ पाता
एक नहीं अनेक नौजवानों को
इक जानलेवा नशा चिट्टा 
उनकी जान ले डूबा
एक प्यारा सा मुस्कुराता परिवार
असीम पीड़ा, वेदना और मातम से गुजरा
क्यों नहीं समय आने से पहले
हम सब लोग जान जाते
अपनी नौजवान पीढ़ी को
खत्म होने से पहले ही बचा पाते
बचपन से ही बच्चों के दोस्त हम बन जाएं
कह पाएँ हर मन की बात
उनके सखा हम  बन जाएं
एक नहीं अनेक परिवार
पूरे के पूरे उजड़ गए
चिट्टा एक दो, पांच दस नहीं
सैकड़ों परिवार ले डूबे
पुलिस, प्रशासन के जिम्मे लाद
जिम्मेदारी अपनी सब भूल गए
हो जाएं समाज, परिवार, नगर-शहर
सब एकजुट, तभी सामना कर पाएंगे
असमय-अनजान मृत्यु से हम सब
तभी जीत हासिल कर पाएंगे।
दूर नहीं वो दिन जब हम सब
बेटा-बेटी ही नहीं
एक समृद्ध परिवार भी खो देंगे
जब देश मेरा क्रांति कर
गुलामी की बेड़ियाँ तोड़
आजादी पा सकता है
क्यों नहीं अपने ही समाज की
नशे की जड़ों को तोड़ सकता है
हो जाएं सब एकजुट
क्रांतिकारी भावना से
गर बचाना है देश भविष्य अपना
नशे की गिरफ्त और लाचारी से...


                                            - मीना कुमारी शर्मा


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पहली- अक़्लमंद तो था नहीं.

अक़्लमंद तो था नहीं
जेब से भी था ख़ाली-ख़ाली ही
मगर गर्दन में ऐंठन थी थोड़ी
कि जो जाती न थी
रोना था,इसी बात का रोना था
कि ज़रा भी झुकता न था
जो झुक जाता,
थोड़ा-सा भी झुक जाता,तो पाता
फिर इतना-इतना कुछ पाता
उठाता स्वर्ण-मुद्राऍं,गिनना भूल जाता
कि ठीक से संभाल भी नहीं पाता
सिर्फ़ इतनी-सी थी ज़िद मेरी
कि नहीं हो शर्त कोई जीवन में जीने की
असहमति के लिए बची रहे जगह
जगह-जगह,हर जगह
अगर हो जाता शामिल मैं भी सहमतों में
तब न ऐंठन होती,न कविता होती,न मैं
चाहता हूॅं,यही चाहता हूॅं
कि बची रहे
ये ऐंठन बची रहे
कविता में कविता की ऐंठन बची रहे
कविता बची रहे,जीवन बचा रहे
मैं रहूॅं,न रहूॅं ज़रुरी तो नहीं
कवि बचा रहे।

दूसरी- जागेगा सच और सब में.

दु:ख,प्रेम,सपने और कविताऍं
कहने लगे कि एक दिन,किसी एक दिन
रहेंगे,सब रहेंगे साथ-साथ और यहीं
नदियों में प्रवाह और घुमाव बने रहेंगे सब
झरनों का गिरना और उछलना बना रहेगा
ऑंधियों से वृक्षों का टकराना बना रहेगा
मैं नहीं रहूॅंगा,तुम नहीं रहोगे,नहीं रहेंगे वे
बाॅंसवन रहेगा,बाॅंसुरी रहेगी,गूॅंज रहेगी
जो जगाती रहेगी आग,पकाती रहेगी अन्न
जागेगा सच और सब में।


- राजकुमार कुम्भज


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बस इत्ती सी तो....

अच्छा लगा था
जब बॉस ने बिना कहे,
बिना जताए, बिना बताए
ऑफिस की मेज़ पर
सेलिब्रेशन का एक बड़ा पैक
चुपचाप रख दिया था।
वो भावनात्मक रिश्ता
दिल से निकलकर
सीधे दिल तक पहुँच गया-
बस इतना ही तो चाहिए,
और बस…
हो गया नारी दिवस।
उफ़्फ… आज बहुत देर हो गई,
कब सुबह हो गई पता ही नहीं चला।
उन्होंने खिड़की से आती धूप को
बड़े करीने से
एक मोटी-सी चादर से ढक दिया,
ताकि मेरी नींद
ज़रा और ठहर सके।
आँखें भर आती हैं…
हम सच में
इतने से ही खुश हो जाते हैं।
कोई आडंबर नहीं,
कोई शोर नहीं—
बस इतनी-सी ही तो बात है।
आज काजल नहीं लगाया तुमने,
दो भौंहों के बीच
वो छोटी-सी बिंदी भी नहीं।
क्या हुआ उदास हो क्या?
बस इतना पूछ लेना ही
काफी होता है,
वरना हम तो
इतनी-सी केयर पर भी
पागल हो जाते हैं।
किसी राह चलती
एक स्त्री को
ससम्मान नज़र देना,
उसकी देह पर
तंज़ न कसना
बस इतना ही तो…!

सच कहूँ,
अगर ऐसे छोटे-छोटे स्नेह
हर दिन मिलते रहें,
तो फिर किसी
महिला दिवस की
ज़रूरत ही नहीं।


- सविता सिंह मीरा


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डरना मत मेरे बच्चों

कोई जब रोके
घर से निकलने से
तुम्हें स्कूल जाने से
खुल कर जीने से
डरना मत मेरे बच्चों।

तुम हार जाओगे
जिंदगी की रेस में
तुम्हें जाना होगा स्कूल
सही गलत को जानने के लिए
फैसले लेने के लिए
डरना मत मेरे बच्चों।

तुम्हें बनना होगा
बुद्ध सा बौद्धिक
रैदास सा चिंतक
कबीर सा प्रासंगिक
तुम 21वीं सदी के बच्चे हो
डरना मत मेरे बच्चों।

तुम्हें जानना होगा
आधुनिक रीति रिवाज
माँ बाप भाई भतीजावाद
उससे भी ज्यादा संवेदना
भूलना नहीं है संस्कार
तुम्हें संचार क्रांति भी
जानना होगा
डरना मत मेरे बच्चों।


- मनोज कौशल


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वफ़ा

फैला दो हवाओं में
पैगाम मेरा
कि हम तेरे शहर में
वफ़ा बाटने आये है।

लेकर ग़म तेरे
नसीब में अपने,
तेरा नाम अपनी
तकदीर लिखने आये है।

वो जो कहते हैं लोगों से
कुछ भी न मिलता
यूँ सोचने से
उनको कह दो
हम उनको अपने
नसीब में लिखने आए हैं।


- डॉ.राजीव डोगरा

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पिता

पिता पहेली नहीं है
वह बहुत ही सहज है
उसका हृदय
हमेशा बच्चों के लिए ही धड़कता है
उसका बच्चों को समझाना,
ज्यादा बकबक करना
कभी डाँट देना
उसके हृदय को मलिन नहीं बनाता
पिता की आत्मा गंदी नहीं होती
पिता पिता है
हमेशा गंगा की तरह
पवित्र आत्मा को ढोता हुआ
एक दैवीय वरदान।


- अनिल कुमार मिश्र


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यह दुनियां न तेरी न मेरी

यह दुनियां किसी की नहीं है जागीर
कठपुतली हैं सब यहां राजा हो या फकीर
अपना किरदार निभाकर सबको है जाना
मिलेगा वही किसी को जो लिख देती है तकदीर

कोई यहां गरीब है कोई जन्म से अमीर
ईमानदार है कोई किसी का मर गया है ज़मीर
तकदीर के भरोसे मिल रहा किसी को सब कुछ
कोई बन गया है राजा और कोई बना बज़ीर

न कोई किसी के साथ आता है
न कोई किसी के साथ है जाता
मिलना भी उसी से होता है यहां
जिससे होता है कोई पिछले जन्म का नाता

किस्मत में जो होगा वह मिलकर रहेगा
उसे कोई छीन नही पायेगा
जो हमारा नहीं है वह लाख कोशिश पर भी नहीं मिलेगा
उसे हथेली पर से छीन कर भी कोई ले जाएगा

छोड़ना पड़ेगा सब कुछ एकदम जब बुलावा आएगा
आंख बंद हो जाएगी कुछ देख नहीं पाएगा
दूर खड़े देखेंगे सब तेरी अंतिम विदाई
अपना जिसको समझता रहा पास आने से भी घबराएगा


- रवींद्र कुमार शर्मा


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विचारों का मंथन

मन के सागर में गहराई है,
लहरों में छिपे तूफ़ान भी हैं,
कभी प्रश्नों का घना अँधेरा,
कभी उत्तर के अरमान भी हैं।

जब भीतर हलचल होती है,
मन स्वयं से प्रश्न करता है,
विचारों का यह मंथन ही
जीवन का पथ निर्मित करता है।

कभी निकलता विष सा संशय,
कभी अमृत सा विश्वास,
संघर्षों की इस हलचल में
जगता है जीवन में नव प्रकाश।

टूटती हैं भ्रम की दीवारें,
जाग उठती है नई चेतना,
विचारों का यह गहरा मंथन
देता जीवन को नयी दिशा।

जब मन खुद को समझ लेता है,
सत्य से जब मिलन होता है,
तभी विचारों का यह मंथन
जीवन का साधन होता है।

उलझनों के इस सागर में
यही हमारा पतवार है,
विचारों का सच्चा मंथन ही
मनुष्य का असली आधार है।


- डॉ सारिका ठाकुर 'जागृति'


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बुढ़ापा और दवाओं का डिब्बा

अब हर सुबह का पहला किस्सा दवाओं का डिब्बा है,
जीवन की बची हुई सांसों का सहारा दवाओं का डिब्बा है।

कल तक जो घर हंसी से भरता था आवाजों के मेले में,
आज तन्हाई से बातें करता दवाओं का डिब्बा है।

कांपते हाथों में यादों की धुंधली-सी गर्मी बाकी,
वरना ठंडी रातों का साथी दवाओं का डिब्बा है।

धड़कनों की चाल संभाले बैठा चुपके से सिरहाने,
वक़्त से चुराया थोड़ा लम्हा दवाओं का डिब्बा है।

बेटे-बेटियां दूर शहर में अपने सपनों में खोए,
मां-बाबा की दिनचर्या का हिस्सा दवाओं का डिब्बा है।

आईने में झुर्रियों ने जब उम्र का सच दोहराया,
जीने की जिद को फिर समझाता दवाओं का डिब्बा है।

“वीरेंद्र” दर्द लिखे तो कागज़ भी नम हो जाता है,
शब्दों के साथ-साथ अब रोता दवाओं का डिब्बा है।


- वीरेंद्र बहादुर सिंह


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कर्ण-युवा प्रतिज्ञा

उठो हिंद के ओजस्वियों, अब रणभेरी बजने दो,
शौर्य-शिखर पर युवा शक्ति का, विजय-केतु सजने दो।
तुम वंशज हो उस महाबली के, जिसने काल को ललकारा,
सूतपुत्र की पदवी तजकर, भाग्य स्वयं अपना संवारा।

सुनो युवाओं! मित्रता का, अर्थ नहीं व्यापार है,
यह प्राणों की आहुति है, यह जीवन का आधार है।
कर्ण खड़ा था दुर्योधन संग, जब जग ने दुत्कारा था,
बिना लाभ की परवाह किए, उसने मित्र को संवारा था।

कवच दिया और कुंडल सौंपे, मृत्यु को भी दान किया,
केशव के मधु-प्रलोभनों का, हँसकर अपमान किया।
आज देश को चाहिए ऐसी, निस्वार्थ मित्रों की टोली,
जो राष्ट्र-धर्म की रक्षा में, हँसकर खा ले सीने पर गोली।

मिटा दो जाति-पाति के बंधन, संगठन की शक्ति बनो,
भ्रष्टाचार के सीने में, तुम जलती हुई उक्ति बनो।
क्या डरते हो बाधाओं से? तुम पर्वत के सर तोड़ो,
अन्याय खड़ा हो सम्मुख तो, तुम निर्भय होकर मुख मोड़ो।

यह देश नहीं केवल माटी, यह जागृत देव-स्वरूप है,
तुम हो इसके रक्षक वीर, तुम राष्ट्र-प्रेम का रूप हो।
स्वार्थ त्याग कर हाथ मिलाओ, कर्ण-सा अडिग विश्वास जगाओ,
भारत माँ के चरणों में, अपना सर्वस्व चढ़ाओ।

न पद की भूख, न यश का लोभ, बस विजय का विश्वास हो,
तुम्हारी रग-रग में बस, केवल हिंदुस्तान का वास हो।
उठो! कि तुम ही शक्ति हो, तुम ही कल का विधान हो,
तुम्हारे शौर्य से ही सुरक्षित, मेरा गौरवशाली महान हो।


- देवेश चतुर्वेदी 'ईशान'


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विश्वास किस पर करें 

बातें बड़ी मीठी मीठी करते
अपनेपन का ढोंग भी करते
पर दिल में दुश्मनी छुपाए रखते
किस पर विश्वास करते
इसी असमंजस में सब रहते।
हर कोई सामने कुछ नहीं कहते 
पीठ पीछे निंदा में ही समय बिताते।
आज इंसान  इंसान से ही डरते
किस को अपना समझें इसी उधेड़बुन में रहते।
हर कोई ईमानदार बनते
फिर ये बेईमानी हेराफेरी कौन है करते।
सच्चे व  निष्पक्ष उलझे से हैं रहते 
चालाक चुस्त हवा के साथ है बहते।
कुछ तो गिरगिट को भी टक्कर देते
उनके हक की बात जब  नहीं किया करते।


विनोद वर्मा



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