साहित्य चक्र

11 February 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 11 फरवरी 2026



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अनुभवों की उत्तर पुस्तिका

ज़िंदगी भी किसी परीक्षा से कम नहीं,
हर सुबह एक नया प्रश्न सामने रख देती है।
कहीं विकल्प होते हैं ,सही या सरल के बीच,
तो कहीं बिना विकल्प के उत्तर माँग लेती है।

यहाँ समय ही परीक्षक है,
जो न अतिरिक्त समय देता है, न दुबारा मौका।
गलतियाँ उत्तर-पुस्तिका में नहीं कटतीं,
सीधे अनुभव बनकर जीवन में जुड़ जाती हैं।

कुछ प्रश्न रिश्तों के होते हैं
जहाँ समझदारी से लिखना पड़ता है उत्तर।
कुछ प्रश्न संघर्ष के
जहाँ आँसू स्याही बन जाते हैं।

जो धैर्य से हर प्रश्न हल करता चलता है,
वही अंत में सफल कहलाता है।
क्योंकि इस प्रश्न-पत्र में अंकों से अधिक
इंसानियत और साहस का मूल्य आँका जाता है।

ज़िंदगी का प्रश्न-पत्र कठिन जरूर है,
पर उत्तर लिखने का साहस हमारे भीतर है।
जो सीखते हुए आगे बढ़ जाए,
वही जीवन की परीक्षा में उत्तीर्ण है।


- डॉ. सारिका ठाकुर 'जागृति'


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जीवन-सांझ

जीवन के अंतिम क्षणों में ,
हर कोई अपना-बेगाना लगने लगता है।
जैसे - जैसे उम्र ढलती जाती है,
आँखों से मोह का पर्दा उठने लगता है।

दिन के उजाले में जो संग चलते हैं,
शाम होते ही अपने-अपने घर लौट जाते हैं।
सारी उम्र जिनके लिए दौड़ते रहे,
वही चेहरे अनजाने-से लगने लगते हैं।


- चेतना सिंह ‘चितेरी’


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जीवन में कुछ आप करें,
कुछ होने दें


कुछ राहें हम चुन लें खुद,
कुछ को छोड़ दें।

कुछ दीप जलें हमारे हाथों,
कुछ को हवा से मोड़ दें।

कुछ सपने मेहनत से गढ़ लें,
कुछ को समय पर छोड़ दें।

कुछ बोझ अपने मन के उतारें,
कुछ को मौन में तोड़ दें।

जहाँ प्रयास की सीमा टूटे,
वहाँ विश्वास को जोड़ दें।

जीवन तब सरल हो जाता है,
जब “मैं” कम, “वो” ज़्यादा हो जाए।


- नरेंद्र मंघनानी


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टेडी डे, दस फरवरी
फूल दिये, इज़हार किये
चॉकलेट लिये, प्यार किये
नये संसार का इरादे किये
संग संग चलना स्वीकार किये
एक-दूजे में विश्वास किये
लोगों में भी विश्वास दिलाये
फिर ये सुनहरा जीवन को
टेडी नहीं बनाना है
टेडी तो सिर्फ खिलौना है
हमें प्रेम से ही खेलना है
प्रेम देना है, प्रेम पाना है
ये बातें, ना भूलना है
दस फरवरी का ये दिवस
हो भले, टेडी दिवस
लेकिन टेडी-सा, ये जीवन
ना बिताये, कभी हम
जो सिर्फ मनोरंजन के है वास्ते
ये प्रेम नहीं है, सस्ते
हाँ, टेडी दिवस की बधाई
प्रेम मे ना करो, जग हंसाई


- चुन्नू साहा


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सच्चा जीवनसाथी

तुम्हारे लिए मेरा प्यार निःशर्त और अटूट है।
मैं तुम्हें हमेशा आश्वस्त करने का वादा करता हूँ।

मेरा प्रेम तुम्हारे लिए रक्षा करता है और सम्माननीय है।
मैं तुमसे वादा करता हूँ कि मैं हमेशा वफादार रहूँगा।

तुम्हारे प्रति मेरा प्रेम समझ और भावुकता से भरा है।
मैं तुमसे वादा करता हूँ कि
मैं हमेशा तुम्हारे प्रति दयालु रहूँगा।

तुम्हारे प्रति मेरा प्रेम गहरा और स्नेहपूर्ण है।
मैं तुमसे वादा करता हूँ कि
मैं हमेशा समर्पित और स्नेहपूर्ण रहूँगा।

तुम्हारे लिए मेरा प्यार धैर्यवान और दयालु है।
मैं तुमसे वादा करता हूँ कि
यह प्रेम अनंत काल तक बना रहेगा।

तुम्हारे प्रति मेरा प्रेम निस्वार्थ और क्षमाशील है।
मैं तुमसे यह वादा करता हूँ, जीवन भर के लिए।

तुम्हारे प्रति मेरा प्रेम अटूट और उत्साहवर्धक है।
मैं तुमसे वादा करता हूँ कि मैं हमेशा तुम्हारी बात
सुनूंगा और कभी भी भटकूंगा नहीं।

मैं वादा करता हूँ, मेरी पत्नी,
कि मैं अपने हर काम में तुम्हें अपना प्यार दिखाऊँगा।
मैं ये वादे इसलिए कर सकता हूँ क्योंकि
मैं तुम्हें पूरे दिल से प्यार करता हूँ।


- रवि कुमार वर्मा


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फैशन

अपने घर के बड़े बुजुर्ग को मारना
पीटना तथा अंत में वृद्धा
आश्रम में भेजने और कुत्तों को
घर में रखने का फैशन चल रहा है।
स्त्रियों द्वारा भाई- भाई में फूट
डालने तथा अलग थलग करने
का,फैशन चल रहा है।
बहुओं द्वारा घर के बुजुर्गों पर
अत्याचार करने का ,
फैशन चल रहा है।
अपनी से न लगाव रख…दूसरों
से ज्यादा लगाव रखने का ,
फैशन चल रहा है ।
अपने से बड़ों का पैर न छूना
तथा उनका सम्मान न करने का ,
फैशन चल रहा है
रिश्तेदारों के घर न जा कर
Whatapp से न्यौता भेजने का
फैशन चल रहा है।
किसी रिश्तेदार के घर खाली हाथ
जाने का फैशन चल रहा है
छोटी मोटी बात पर तलाक दे
देने का फैशन चल रहा है।
प्रेम मुहब्बत में धोखा देने का,
फैशन चल रहा है।
ज्यादा से ज्यादा दिखावा करने
का फैशन चल रहा है।
झूठ बोल बोल कर रिश्तों में
जहर घोलने का फैशन चल रहा है।
हर वक्त दूसरों को नीचा और अपने
को सर्वश्रेष्ठ दिखाने का,
फैशन चल रहा है।
शादी समारोह में
पंगत में न बैठ कर,खड़े होकर
भिखारियों जैसे प्लेट में खाना
खाने का फैशन चल रहा है।
त्यौहारों में बहन बेटियों के घर
पाहुर पुरिया न ले कर जाना
फैशन चल रहा है।
बारात में खाना खाते ही तुरन्त
फुर्र हो जाने का ,
फैशन चल रहा है।
बिना दुपट्टा स्कूल,कॉलेज मार्केट
जाने का फैशन चल रहा है।


- सदानंद गाजीपुरी



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तेरे पन्नों में मैं!

अलमारी में सहेजी किताब हो,
जिसे रोज थोड़ा पलटू,
थोड़ा पढूं।
जब पूरी हो,
फिर वही से शुरू करूं।

हर पन्ने का हर्फ
समझूं जरूरी नहीं,
जरूरी है बस पढ़ता जाऊं।
कुछ को स्याही से रंग दूं, कुछ
को बस तह कर दूं।

किसी पन्ने में छुपा दूं
एक तस्वीर तेरी,
तेरी खुशबू पा लूं उसी
धवल पन्नों के साए में।

संग ले चलूं छत पर,
बाग बगीचे, चाय पर,
कभी मुशायरे, कभी खेत।
तेरे पन्नों पर मेरा नाम,
जो औरों को बताए,
मेरी पहचान।

तेरी जिल्द बदल दूं,
सिरहाने रख दूं।
छाती पर लगाए सो जाऊं,
फिर उठकर तुझे देखूं।

कभी ढूंढना हो खुद को,
तो तेरे पन्नों में खो
कर खुद को पा जाऊं।
छोड़कर मेज पर,
कभी अलमारी में सहेज लूं।


- रोशन कुमार झा


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एक रात
पढ़ रहा था
मुक्तिबोध की रचना
चांद का मुंह टेढ़ा है!
शीतल रात में
बाहर निकल कर
चांद का
किया अवलोकन
चांद था दूर!
न हो सका आंकलन!
मेंने ज्ञान चक्षु दौड़ाए
अद्भुत नज़ारा पाया
बाजार में
चाट पकौड़ी पुचकों के
ठेले नज़र आए
भीड़ का जमघट
गोलगप्पे गटक रहें फटाफट!
चाट कों भी
चाट रहे थे
लग रहा था
सबका मुंह टेढ़ा है।


- जितेंद्र बोयल


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इज़्ज़त

इज़्ज़त भी अजीब चीज़ है,
ख़ामोशी से दी जाए तो गहना बन जाती है,
और माँगी जाए तो
कर्ज़ जैसी लगने लगती है।

जिसने खुद को गिराकर
ऊँचाई पाई हो,
उसकी इज़्ज़त भी
अक्सर उधार की होती है।

इज़्ज़त शब्दों से नहीं,
नियत से झलकती है,
वरना हर ज़ालिम
“जनाब” कहलाना जानता है।

इज़्ज़त का सबसे बड़ा दुश्मन
अहंकार नहीं,
डर होता है-
सच बोल देने का डर।


- शशि धर कुमार


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क्रंदन से चंदन तक
संघर्ष की अनंत यात्रा:

मेरे जीवन के पन्नों में
हार के गीत लिखे हैं,
जो मेरे दिल को छूते हैं.
पीड़ा की छाया है,
जो मेरे मन को ढकती है.
कष्ट के आँसू हैं,
जो मेरे दिल को दर्द देते हैं.
क्रोध की ज्वाला है,
जो मेरे अंदर जलती है.
और क्रंदन की ध्वनि है
जो मेरे दिल को रोने पर
मजबूर करती है.

परन्तु मैं हार नहीं मानूंगा!
मैं लड़ूंगा, संघर्ष करूंगा,
डटकर मुकाबला करूंगा,
जीत का परचम लाऊंगा!

और जब मैं जीतूंगा,
मेरे हिस्से में चंदन होगा,
वंदन होगा, अभिनंदन होगा,
जीत की कहानी होगी,
सफलता की बयानी होगी।


- अर्जुन कोहली


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रविवार की सुबह 

मोबाइल में अलार्म बजता
पर उठने को मन नहीं करता।
अलार्म बंद करते
थोड़ी देर और सो लेते।
नींद फिर से करीब आती
उतने में चिड़िया की
चहचहाहट सुनाई देती।
जैसे ही नजर बाहर जाती
उतने में धूप खिली खिली नजर आती।
मन में डयूटी जाने की बात नहीं आती
भूख भी आज दूरी जताती।
आज  योग भी नहीं होता 
मन बस यूं ही हल्का हल्का लगता।
न चाय की याद आती 
न ही  नहाने  की वो चिंता सताती।
घर पर ही समय बीतता 
खेत खलिहान भी घूम आता।
खेतों की हरियाली मन मोहक लगती
ऐसे ही सुबह दिन में बदल जाती।


- विनोद वर्मा


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सूरत बदली, सीरत बदली, बदल गया आईने भी
शौहरत मिलते ही किरदार भी बदल गया।

घर बदला, गांव बदला, बदल गया शहर भी
सरकारी नौकरी मिलते ही  रुतबा भी बदल गया।

मंदिर बदले, मस्जिद बदली, बदल गये गुरुद्वारे भी
मज़हब नाम की चिनगारी से मुल्क भी बदल गया।

सबूत बदले,गवाह बदले, बदल गये वकील भी
गुहार लगायी इंसाफ की तो पैसे से कानून भी बदल गया।

भेष बदला, देश बदला, बदल गये इंसान भी
शादी के बाद तो औरत का घर भी बदल गया।

सास बदला,महबूब बदला, बदल गया ससुराल भी
जहेज ना मिलने पर शादी का दुपट्टा ही फंदे में बदल गया।

तालीम बदली,दोस्त बदले, बदल गये हमदर्द भी
चालबाजी ऐसी हुई पलभर में ख्वाब ही बदल गये।

तुम बदले, हम बदले, बदल गयी ख्वाहिशें भी
जिम्मेवारियों में घर का चिराग़ मुसाफ़िर में बदल गया।

अपने बदले, पराये बदले, बदल गये कनस्तर भी
फ़कीर-ए-आलम में हर तालुकदार भी बदल गया।

मकां जो था मेरा पुश्तैनी 'नूर'
वो खण्डहर हुआ तो लगा वाकई में "जमाना बदल गया"।


- नितेश पालीवाल 'नूर'


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प्रेम को कोई नहीं समझ सका,
प्रेम मुरझाने वाला फूल नहीं है।
यह शांत नदी है,
जो सदा मंद–मंद बहती है।
यह हवा का कोमल झोंका है,
जो हर मन को शीतल करता है।
प्रेम बारिश की बूंदें है,
जो तन–मन को भिगोती हैं।
प्रेम एक मीठा नशा है,
जो राधा को कृष्ण से था।
प्रेम है एक पवित्र मंदिर,
जहाँ एक है दिया और बाती।
प्रेम को समझना कठिन है,
प्रेम तो सभी करते हैं।
पर इसे निभाते बहुत कम,
यही इसकी सच्ची परीक्षा है।
प्रेम है गहरा समुंदर,
जिसकी थाह कोई न पाए।
प्रेम है ऐसी मधुर खुशबू,
जो हर दिल को महका जाए।


- गरिमा लखनवी


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दिल की एक पुकार

तुम आओ कभी नदी किनारे,
आकर बैठो थोड़ी देर साथ हमारे,
हो जाओ मेरी तो यह बात मै न कहूं,
अगर हो जाओ मेरी तो यह दर्द मै न सहूं।

इस लम्हे को ऐसे ज़ाया मत करो,
मैं तुम्हारे साथ हूं, तो फिर तुम न डरो,
तुम नहीं आई मेरे बाहो में,
पर, अब आ गई हो अफसानों में।


- प्रणव राज


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मुश्किलें

माना कि मुश्किलें बड़ी हैं,
पर मेरे होंसलों से तो बड़ी नहीं।
जिंदगी है तो मुश्किलें भी होंगी,
मुश्किलें नहीं तो जिंदगी नहीं।

मुश्किलें आज तक कहाँ, मुझे रोक पाई हैं।
क्योंकि मेरे होंसलों से जो उनकी लड़ाई है।।

कौन है अपना, कौन पराया,यही हमें बताती हैं।
जीवन का असली फ़लसफ़ा यही हमें सिखाती हैं।।

माना कि जीवन के अंधेरों ने मुझे बहुत सताया है।
पर सच यह भी है कि मुझे लड़ना भी सिखाया है।

खड़ा हूँ खुद पर यकीन लिए,इन मुश्किलों का असर हूँ।
तोड़ न पाए तूफ़ान जिसे, मैं ताड़ का वो शजर हूँ।


- मनोज कुमार भूपेश


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दोस्त क़िताबें

चीख़ती नहीं हैं,बोलती हैं क़िताबें
थोड़ा धीमे-धीमे बोलती हैं तो क्या हुआ
साफ़-साफ़ और सच-सच ही बोलती हैं
देखकर चेहरा बदल नहीं देती हैं बात
चापलूसी नहीं करती हैं
झुकती नहीं हैं सज़दे में ज़रा भी
सजने-संवरने से दूर ही रहती हैं मगन
बदलती नहीं हैं अपना रॅंग, रॅंगत अपनी
पवित्र हैं,क़ायम हैं आचरण में क़िताबें
ईश्वर अगर है कहीं भी पृथ्वी पर तो है यहीं
क़िताबों की शक़्ल में ही है वह हर कहीं
जैसे हद-बेहद-अनहद,निराकार-निरापद
वे परम पारदर्शी भी होती हैं हिम्मतों जैसी
क़िताबों में घनी गहरी छुपी होती है आग
आशय भी आग का समझाती हैं क़िताबें ही
आग नहीं बाग़ लगाती हैं दोस्त क़िताबें
और करती हैं मुक्त सभी को...


- राजकुमार कुम्भज


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वेलेंटाइन डे
सुनो सीधी सादी लड़कियों,
उसी से लेना प्रेम का ये फूल,
जो निकाल सके तुम्हारे जीवन पथ पर
आने वाला हर शूल।
जिसकी आंखों में विश्वास की गहराई हो,
तुम्हारा उदास चेहरा देखकर
जिसकी आंखें भर आई हो।
जो तुम्हारे मौन से भी संवाद करे,
सिर्फ एक दिन नहीं,
हर दिन तुमसे प्यार करे।
लड़के भी प्रेम का बस इतना सम्मान करें,
विश्वास ना टूटे कभी,
बस इतना ध्यान करें।
रिश्तों में अगर इस खूबसूरती का एहसास है,
यकीन मानिये,
हर दिन वेलेंटाइन डे से भी खास है।


- आकाश आरसी शर्मा


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चेहरा देखना चाहते थे करीब से
दिल में उमड़ रही थी चाहत,
चल रही थी बात सगाई की अभी
बिन चित्र दिल था आहत,
मधु मास का था ये पावन मास
कोई नहीं था अभी दिल के पास,
कैसा होगा रूप प्रिया का,
कैसा करती होगा श्रृंगार,
यक्ष प्रश्न ये मन में उठता
प्यार हमारे दिल में खटकता,

प्यार मुहब्बत की जब बातें चलतीं
कईयों के चेहरे पर कुछ ज्यादा फबती,
बातें प्यार की जब हम सुनते,
कभी लोट-पोट तो कभी शर्मिन्दा होते,
बजुर्गों की जब सुनते कहावतें,
प्यार का मतलब तब क्या ही समझते
उल-जलूल ये बातें लगती,
मन में हमारे बहुत खटकती,

बचपन गया, देखो जबानी आई
मधु मास की बेला आई,
प्यार का लड्डू फूटा मन में
कैडबरी के विज्ञापन की याद आई,
"शादी का लड्डू देखो बड़ा प्यारा"
"जो खाए वो भी पछताए,न खाए वो भी पछताए"
बात पक्की हुई सगाई की,
होने वाली प्रिया एक दिन पहले कॉल आई,
कैसे शुरुआत हो बातों की,आफत नई ये सामने आई,

डरते-डरते बातें करते,
मन की बातें होंठों पर आई
धुक-धुकी बढ़ी दिल में,
मिलन की जब बारी आई,
देखा जब एक-दूसरे को,
खुल कर बातें सामने आई
माता-पिता बने समधी,पक्की हुई देखो सगाई
मधु मास के मदन महीने में
आंगन में बजी शहनाई,
शादी के बंधन में बंधे एक-दूसरे से,
शक्ले फ़िर वही याद आई,
शक्ले फ़िर वही याद आई ।


- बाबू राम धीमान


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10 February 2026

आज की प्रमुख कविताएँ - 10 फरवरी 2026





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वादा

मैं वादा करती हूँ
तेरे हर मौन में,
तेरी हर उलझन में
मैं शब्द बनकर रहूँगी।

मैं वादा करती हूँ
जब दुनिया सवाल करेगी,
मैं तेरा विश्वास बनूँगी,
जब तू थक जाएगा,
मैं तेरी उम्मीद बनूँगी।

ना साथ छोड़ने का वादा,
ना हर पल मुस्कान का दावा
बस इतना कि
हर सच में, हर संघर्ष में
तेरा हाथ थामे रहूँगी।

क्योंकि वादे शब्द नहीं होते,
वो निभाए जाने वाले एहसास होते हैं
और मेरा वादा है
तेरे होने की कद्र करना
हर हाल में, हर दिन।


- डॉ. सारिका ठाकुर 'जागृति'


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हुंकार: कलम का शौर्य

उठो हिंद के नव-भगीरथ, अपनी शक्ति पहचानो तुम,
कलम हाथ में थामी है तो, खुद को योद्धा मानो तुम।
नहीं जरूरत तुझे हाथ में, अब लोहे की तलवार की,
स्याही तेरी काट बनेगी, हर दुश्मन की वार की!
मस्तक पर हो तिलक ज्ञान का, आँखों में अंगार भरो,
किताबों के हर पन्ने से, अब तुम सिंह-दहाड़ भरो।
तलवारें तो केवल बस, काया का मर्दन करती हैं,
किन्तु कलम की धारें, सदियों का सृजन करती हैं।
त्यागो निद्रा, त्यागो नशा, यह विष का प्याला भारी है,
नशे में जो डूबी जवानी, वह राष्ट्र पर भारी है।
जो अपनी सुध-बुध खो बैठा, वह क्या खाक लड़ेगा रे?
व्यसनों की बेड़ी में जकड़ा, वह क्या विजय गढ़ेगा रे?
असली वीर वही है, जो कुरीतियों का सिर काट सके,
अज्ञान के इस काले तम को, शिक्षा से जो छाँट सके।
एक वार तलवार का, केवल एक देह को मारता,
पर लेखनी का प्रहार, पूरे युग को है सुधारता!
ओ शिक्षक के लाड़लों! तुम आने वाली शान हो,
इस माटी की अस्मिता, और देश का अभिमान हो।
लिखो ऐसी अमर कहानी, कि काल स्वयं भी झुक जाए,
तुम्हारी कलम चले जिस पथ पर, बाधाएँ भी रुक जाएँ।
विजय घोष हो ज्ञान का, अब ऐसा विप्लव लाना है,
स्याही की हर एक बूँद से, नया भारत बनाना है।


- देवेश चतुर्वेदी


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सर्द मौसम था शामें रंगीन थी
झुकी पलकें तो आँखें गमगीन थी।
उतरना चाहती थी वो
मेरे दिल से आँसुओं के रास्ते,
मैं उतारता गर मेरे दिल से उसे
तो मेरी मोहब्बत की तौहीन होती।

क्या हुआ जो वो मेरे साथ न रही,
जिसके साथ रही होगी,
उसमें जरूर मुझे ढूँढती होगी।
सामने आया होगा जिक्र ए मोहब्बत का,
सहारा नाम का लेकर किसी और का,
दास्ताँ ए मोहब्बत हमारी कही होगी।
दास्ताँ न कहती हमारी मोहब्बत की
तो मेरी मोहब्बत की तौहीन होती।

लिखा जो पाता उसका नाम कहीं अगर,
प्रहर उसी में आँखों में आलिंगन करता था।
तिल तिल कर मरता था मगर,
भावना प्रेम की मन में उससे रखता था।
दौर ए बेवफाई में, मैं भी बेवफाई करता
तो मेरी मोहब्बत की तौहीन होती।


- मनोज कुमार भूपेश


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मेरी दुनियां

हंसना रोना तेरे लिए,
पाना खोना तेरे लिए,
आंख अधखुली रख,
बेचैन रातों को सोना,
जैसे चंद अपनी चांदनी से
सपनों को छूता हो।

सो भी गए तो,
सपनों में तुम हो
जैसे हर नदी पानी में,
चांद का प्रतिबिंब पाती है।

आंख खुली फिर तो,
सारे जहां में तुम हो।
जैसे सारी दुनिया सुबह,
सूरज को ही देखती है।

हर कहानी का किरदार तुम हो,
मेरे हर हासिल का हिस्सेदार हो
तुम मुझमें हो मालूम है,
पर ये आंखे तुझको ढूंढती हैं।
जैसे पतझड़ के पत्ते,
सावन की बूंद ढूंढते हैं।


- रोशन कुमार झा


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बचपन की कहानी

एक बचपन का जमाना था
उसमें खुशियों का खजाना था।
चाहत चांद को पाने की थी
पर दिल तितली का दिवाना था।

खबर न थी कुछ सुबह की
न शाम का ठिकाना था।
थक कर आना स्कूल से
पर खेलने भी जाना था।

परियों को फसाना था
बारिश में कागज की नाव थी।
हर मौसम सुहाना था
एक बचपन का जमाना था।


- शिव 'सदानंद'


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भीड़ से अलग

तुम्हें जब देखती हूं,
उससे भी ज्यादा तब देखती हूं
जब तुम दिखाई नहीं देते।
फिर खुद को ढूंढती हूं...
सूखे पत्तों का जमीन पर
आलीशान घर,
बसंत भी है, और पतझड़।
रूखे टहनियों पर बसे
इंतजार की और सब्र की कहानी।
शायद सबने सुनी
कांटों के बीच मुस्कुराते
गुलाब की ज़ुबानी।
फिर यही इंतजार की कहनी,
किताबों की खिड़की खोल
जब चाहत में सच होने लगे...
तब शुरू होती है प्रेम कहानी।
आज भी उसी कहानी चौखट पर
देखा है, भीड़ से अलग ठहरा
एक गुलाब का इंतजार।


- सुतपा घोष


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बचपन

फिर से वही बचपन की तलाश में कट रही जिंदगी,
जिसमें न डर, न छल, न कपट, न झूठ, न आलस।
फिर से उल्लास, हँसी ठिठोली, और बेबाकपन,
भटक रहा हर दिन बस वही बचपन जीने को मन।

खेलने को रस्सी कूद, गिट्टियाँ और चोर सिपाही,
खो-खो, आइस पाइस, पिण्डुक और फुटबॉल।
सारा दिन स्कूल, मस्ती, लड़ना, प्यार और रुठना,
सब याद आता है कि फिर से उस दौर में जीने को।

माँ का हर दिन प्यार से पुचकारना कभी डांटना,
प्यार से पुचकारना पापा का हर चीज़ लाना।
सबकी लाड़ली होना इस बात पे इतराना रस्क करना,
सखियों की लीडर होना उनके विश्वास पे खरा उतरना।

काश वही पुराने दिन लौट आए और वही बेपरवाह
जिंदगी हो, वही सखियाँ हो, वही माँ पापा हो।
वही भाई बहन, वही सुंदर कपड़े, वही सुकून,
भरी जिंदगी हो, बेपरवाह, रोक टोक न हो।

पर अब तो जिंदगी का हर पल, हर दिन, हर साल,
खत्म हो रहा है , अब जिंदगी पानी का बुलबुला है।
बस अब जिंदगी में वही बचपन जीने को मन करता है,
और अंदर एक बच्चा अभी भी ज़िदा है और जीता है।


- सुमन डोभाल काला


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बर्फ के पहाड़

गिरती है जब बर्फ
चमक उठते है पहाड़
सफेद चादर से ढके
आंखे चुंधिया जाती है देख कर
पहाड़ी के लिए आम है बर्फ का गिरना
कठिनाईयों से जूझती जिंदगी
मुश्किल होता है रास्ता ढूंढना
पशुओं के लिए चारा
रोटी बनाने के लिए लकड़ी
कैसे आएगी उस गिरी बर्फ में
बीमार कोई हो जाये
कैसे पहुंचेगा हॉस्पिटल
सड़कें बन्द बिजली नहीं
पानी के नल जमे हुए
हड्डियां तक जमा देने वाली ठंड
हाथ को हाथ का पता नहीं
कैसे स्कूल भेजें बच्चों को
दूरसंचार ठप्प दुनियां से बेखबर
कहीं बर्फीला तूफान
कहीं चट्टानें खिसक रही
पहाड़ का आदमी बहुत परेशान
लेकिन हिम्मत नहीं हारता
डट कर करता है मुकाबला
सभी कठिनाईयों का
लगता है जैसे किसी हाड मांस का नहीं
बना है किसी कठोर धातु का
पहाड़ चढ़ना उतना नहीं अखरता उसको
बचपन से पला बढ़ा है पहाड़ पर
यहां रहने वाले जुड़े है अपनी संस्कृत से
कूट कूट कर भरे हैं उनमें संस्कार
फिर एक दिन आते है कुछ सैलानी
घूमने पहाड़ पर
खुश होते हैं देख कर
पहाड़ पर पड़ी बर्फ
उनके लिए खुशी है बर्फ देखना
उसमें अठखेलियाँ करना
कूड़ा कचरा फैलाना
तहस नहस करना हमारी संस्कृति को
और वापिस चले जाना
नाचते गाते है बर्फ में
रीलें बनती हैं बेशर्मी से
कपड़े उतारते हैं निर्लज्ज
शराब की बोतलों को लहराते है हवा में
हो हल्ला करते हैं हुड़दंग मचाते है
कहें कुछ पहाड़ के लोग तो
लड़ते हैं आंख दिखाते हैं
तार तार कर रहे पहाड़ की संस्कृति को
डर नहीं उनको न देवी देवताओं का
न समाज में प्रचलित मान्यताओं का
रह गया पहाड़ का आदमी
उस कचरे को साफ करता
अपने घर पहाड़ की सफाई करता
क्योंकि पहाड़ उसका अपना है
कोई घूमने की जगह नहीं
यहीं पैदा हुआ यहीं जियेगा
और एक दिन इसी पहाड़ पर
चला जायेगा दुनियां छोड़ कर
अपनों की दुनियां से मुंह मोड़ कर


- रवींद्र कुमार शर्मा


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तुम्हारी जात

ऐसे-ऐसे बोलते हैं हमें-
हमलोगों को रोज-रोज़
चमार तो कभी चमरोटा
कह कर बुलाते हैं।

ऐसे-ऐसे बोलते हैं हमें-
नाली के कीड़े जैसी
जात है तुम्हारी।
चमरा, चमरोटा कहीं का।

ऐसे-ऐसे बोलते हैं हमें-
नाली कितना भी साफ़ कर लो
साफ़ नहीं होती।
वैसी है तुम्हारी जात।

ऐसे-ऐसे बोलते हैं हमें-
अभी मारूंगा तो ,
पूरे कपड़े में हगते-मूतते
घर जाओगे अपने।


ऐसे-ऐसे बोलते हैं हमें-
तुमलोगों के ऊपर
थूकना चाहिए ,
और तुम्हारे जात पर भी।


ऐसे-ऐसे बोलते हैं हमें-
तुमलोग कभी नहीं सुधरोगे
ना ही कभी सुधरेगी,
तुम्हारी जात !


ऐसे-ऐसे कब तक बोलते रहेंगे?
कब तक इंसानियत का जनाजा निकालते रहेंगे ?
अब ज़माना जात का नहीं,
फ़ेसबुक, इंस्टा और व्हाट्सऐप का है।


- आनंद दास


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हे ! मानव

हे ! मानव तुम हो जाओ खड़े-2
खड़े कब से तू है सो रहा ।
सदियां यूं ही गुजर गईं
तूफानों में पड़े - पड़े
हे! मानव तुम हो जाओ खड़े।
इह लोक को भुला दिया तुमने
उस लोक में डूबे रहते हो।
देख नियंत्रण प्रकृति का
विस्मय में क्यों पड़ते हो ?
दुर्गुण को गले लगाते हो
सत्कर्म से पहले बड़े - बड़े।
हे! मानव तुम हो जाओ खड़े।
मध्यकाल से सोया है
अंखियां न खुलती तेरी हैं।
नहीं चेतना लौट सकी
गलती ही इसमें मेरी है।
स्वप्नों में तूने सजों लिए
हैं एश्वर्य बड़े - बड़े
हे ! मानव तुम हो जाओ खड़े- २
क्या नींद की गोली खा ली है ?
या असर पान मदिरा का है।
ऐसा प्रतीत मुझे होता है
जानें कब से तू सोता है।
भोर हुआ उठ जाओ खड़े
अधिकार छूट रहे बड़े- बड़े।
हे ! मानव तुम हो जाओ खड़े
मजहब की रोटी सेंक रहे।
वे मस्जिद और मजारों से
सत्ता का सुख भोग रहे हैं।
पर मजहब की तौहीरों से।
कट्टर और हठी बनते हैं
मजहब की तनकीदों से।
दूर जा रहे मुल्क के वो निज
कर्ण के जैसे अकीदों से।
विश्वास जीत लो तरुणों का
सिजदा कर देंगें बड़े - बड़े
हे ! मानव तुम हो जाओ खड़े।


- करन सिंह 'करुण'


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खर्चे बढ़ गए सभी के क्या करें इंतज़ाम
कोई चलाता खर्चों पर कैंची
कोई बढ़ाने में समझें अपनी शान,
प्रबन्ध सिखाता हमें कटौती करना
परेशान वृथा न हो इन्सान

रोना रोती रही सरकारें, त्राहिमाम करें किसान
बोझ कर्ज के तले डूब कर,
विवश हुआ था आत्महत्या को अन्नदाता
फ़िर भी क्या निकला परिणाम,
टोल प्लाजा, बैरियर घेरे,
बॉडर पर अनशन करे किसान,
बिजली पानी पर सेस लगा कर भी
सपने कहां हुए साकार
हालत किसी से छुपी नहीं थी
मंत्री नेता हुए थे परेशान

गरीब रोए सिर पर हाथ रख कर
अपना दुःख किसको बताएं ?
बताने की भी ग़र करें हिम्मत
कौन सुने फरियाद ?
बढ़ती महंगाई छुए आसमान
मालामाल होय धनवान,
कारवां गुजरता गया,गरीब देखता गया
कैसे गुजारा होगा आमजन का
मुझे बता प्रबुद्ध इन्सान


- बाबू राम धीमान


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