बतौर भारतीय मेरे मन में एक सवाल उठता है- संस्कृत भाषा को भारत यानी हमारे देश में एक प्रतिशत लोग भी ना बोल पाते हैं और ना ही लिख पाते हैं तो फिर उस भाषा की रचनाओं को हमने अपना राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत क्यों बनाया हुआ है ? अधिकांश भारतीय ना राष्ट्रगान और ना ही राष्ट्रगीत बिना देखें गा पाते हैं। कहीं इसके पीछे का कारण संस्कृत भाषा की रचनाओं का राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत का होना तो नहीं है ?
भारत अनेक संस्कृति, सभ्यता और भाषा से मिला एक लोकतांत्रिक गणराज्य है। इसकी आज तक कोई राष्ट्रीय भाषा नहीं बन पाई है। हां! अंग्रेजी और हिंदी राजभाषा जरूर है। इतना ही नहीं बल्कि हिंदी भाषा कुछ ही क्षेत्र की मातृभाषा है। अधिकांश क्षेत्रों में लोगों की मातृभाषा वहां की स्थानीय बोली व भाषा है। उदाहरण के लिए पश्चिम बंगाल की मातृभाषा बंगाली है, महाराष्ट्र की मातृभाषा मराठी है, तमिलनाडु की मातृभाषा तमिल है, उत्तराखंड की मातृभाषा गढ़वाली, कुमाऊनी और जौनसारी है। ऐसा ही अन्य राज्यों में भी है।
संस्कृत भाषा भारत की कभी भी आम बोलचाल वाली भाषा नहीं रही है। संस्कृत और तमिल भाषा में सबसे प्राचीन भाषा को लेकर आपस में विरोधाभास दिखाई देता है। जहां दक्षिण के इतिहासकार तमिल को सबसे पुरानी भाषा मानते हैं तो वही उत्तर भारत के लोग संस्कृत को सबसे पुरानी भाषा का दर्जा देते हैं। मगर इन दोनों भाषाओं में कौन सी सबसे पुरानी भाषा है, इस पर कोई ठोस शोध नहीं हो पाया है।
संस्कृत भाषा को हिंदू धर्म की भाषा भी माना जाता है क्योंकि हिंदू धर्म के अधिकांश ग्रंथ संस्कृत भाषा में ही लिखे गए हैं। ऐसे में फिर एक सवाल और उठना है- जब भारत धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक राष्ट्र है और संस्कृत हमारी यानी भारत सरकार की राजभाषा भी नहीं है तो फिर इस भाषा की दो रचनाओं को राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत बनाना कितना सही है ?
बहुत सारे लोगों का तर्क होगा कि आजादी के समय यह फैसला लिया गया था। मगर जिस प्रकार से आज इतिहास को ठीक किया जा रहा है, उसी प्रकार से इस पर भी विचार किया जाना चाहिए कि जिस भाषा को हमारे देश की अधिकांश जनता ना बोल पाती है, ना लिख पाती है उस भाषा की रचनाओं को राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रगान बनाना सही है या फिर गलत!
- दीपक कोहली
