सुगंधा एक गृहिणी थी। सुबह से लेकर शाम तक वह घर के कामों में इतनी व्यस्त रहती कि उसे अपने लिए समय निकालना तो दूर, दिन, तारीख़ और वार का भी ध्यान नहीं रहता था।
सुबह उसकी दिनचर्या सबसे पहले शुरू होती और रात में सबसे बाद में समाप्त होती। कभी बच्चों के लिए उनकी पसंद का अलग नाश्ता बनाना होता, कभी सास-ससुर की सेवा करनी होती, तो कभी पति की फरमाइशें पूरी करनी होतीं। इन सबके बीच कब सुबह से शाम हो जाती, उसे स्वयं भी पता नहीं चलता था।
ऐसा नहीं था कि सुगंधा के जीवन में कोई दुख नहीं था। यदि किसी काम में थोड़ी-सी भी देर हो जाती, तो पति की ऊँची आवाज़ सुननी पड़ती। यदि सास-ससुर की किसी अपेक्षा में थोड़ी-सी भी कमी रह जाती, तो उनके उलाहने मिलते। बच्चों की शिकायतें भी समय-समय पर उसके हिस्से में आती ही रहती थीं।
सुगंधा हर संभव प्रयास करती कि उसके कारण पति, सास-ससुर या बच्चों को शिकायत का कोई अवसर न मिले। वह अपनी क्षमता से बढ़कर सबकी अपेक्षाएँ पूरी करने की कोशिश करती। फिर भी यदि कभी किसी को समझाना पड़ता, तो वह अपने बच्चों को ही समझा देती। उसे लगता था कि शायद यही सबसे आसान रास्ता है।
लेकिन इतना सब करने के बाद भी वह सबको खुश नहीं रख सकी। धीरे-धीरे वह ऐसी गृहिणी बनती जा रही थी, जो दूसरों की खुशियों के लिए तो दिन-रात लगी रहती थी, लेकिन अपनी खुशी का उसे स्वयं भी पता नहीं था। उसका पूरा जीवन पति, बच्चों, सास-ससुर और घर की जिम्मेदारियों तक सीमित होकर रह गया था।
यदि कभी वह अपनी कोई छोटी-सी इच्छा या फरमाइश ज़ाहिर भी कर देती, तो अक्सर उसे यही सुनने को मिलता- "तुझे जाना ही कहाँ है? तुम तो सारा दिन घर पर आराम ही करती हो।"
यह सुनकर वह हर बार मुस्कुरा देती, जबकि वह जानती थी कि जिसे लोग आराम कह रहे हैं, वह वास्तव में बिना रुके चलने वाला एक अंतहीन सफर था। एक दिन अचानक सुगंधा की तबीयत इतनी खराब हो गई कि उसमें खड़े होने तक की शक्ति नहीं बची।
डॉक्टर ने उसे कुछ दिनों तक पूर्ण विश्राम करने की सलाह दी। अब घर की सारी जिम्मेदारियों के साथ-साथ उसकी देखभाल की जिम्मेदारी भी परिवार पर आ गई। कुछ ही दिनों में घर का पूरा संतुलन बिगड़ गया। तब सुगंधा के ससुर ने उससे कहा, "कुछ दिन तुम अपने मायके चली जाओ। वहाँ तुम्हारी अच्छी तरह देखभाल हो जाएगी और तुम जल्दी ठीक हो जाओगी।"
यह सुनकर सुगंधा हैरान रह गई। आज तक जब भी उसने कहीं जाने की बात की थी, उसे यही कहा जाता था- "तुम्हारे बिना इस घर का कोई काम नहीं चल सकता।" लेकिन आज उसके बीमार पड़ते ही उसे मायके जाने की अनुमति भी मिल गई।
कुछ समय मायके में रहकर जब वह पूरी तरह स्वस्थ होकर वापस लौटी, तो उसने घर का बदला हुआ रूप देखा। घर में एक पूर्णकालिक नौकरानी रख ली गई थी। सास-ससुर अपनी क्षमता के अनुसार अपने छोटे-मोटे काम स्वयं करने लगे थे। बच्चे अपनी चीज़ें अपनी जगह रखने लगे थे और उसके पति भी हर छोटी-बड़ी बात के लिए उस पर निर्भर नहीं रहते थे।
सबसे अधिक आश्चर्य की बात यह थी कि नौकरानी घर का काम उतनी लगन, सफाई और व्यवस्थित ढंग से नहीं करती थी, जितनी निष्ठा और बारीकी से सुगंधा किया करती थी। कई काम अधूरे रह जाते, कुछ चीज़ें इधर-उधर पड़ी रहतीं और कई बार उसकी कार्यशैली में लापरवाही भी दिखाई देती। फिर भी घर में कोई उससे शिकायत नहीं करता था।
सुगंधा को याद आया कि जब वह पूरे मन से, बिना किसी शिकायत के, दिन-रात घर के लिए लगी रहती थी, तब भी उसकी छोटी-सी भूल पर उसे सुनना पड़ता था। लेकिन आज, नौकरानी से वही काम पूरी तरह न होने पर भी सभी शांत थे। कारण केवल इतना था कि सबको डर था कि यदि वह भी काम छोड़कर चली गई, तो घर की जिम्मेदारियाँ फिर उनके कंधों पर आ जाएँगी।
उसी क्षण सुगंधा को जीवन का एक गहरा सत्य समझ में आया। आवश्यकता से अधिक दूसरों का काम करते रहने से केवल अपनी परेशानियाँ ही नहीं बढ़तीं, बल्कि हम अनजाने में अपने प्रियजनों को आत्मनिर्भर बनने का अवसर भी छीन लेते हैं। सहायता करना अच्छी बात है, लेकिन सहायता उतनी ही होनी चाहिए, जितनी वास्तव में आवश्यक हो। यदि एक ही व्यक्ति हर जिम्मेदारी अपने ऊपर ले लेगा, तो उसके पास स्वयं के लिए समय और ऊर्जा कभी नहीं बचेगी।
उधर परिवार ने भी एक महत्वपूर्ण सीख प्राप्त की। उन्हें एहसास हुआ कि यदि सुगंधा अकेले ही पूरे घर का भार उठाती रही, तो वह शारीरिक और मानसिक रूप से थक जाएगी। वह केवल एक गृहिणी नहीं, बल्कि अपनी इच्छाओं, सपनों और भावनाओं वाली एक इंसान भी है। उसका भी अपने जीवन पर उतना ही अधिकार है, जितना घर के किसी और सदस्य का।
उस दिन के बाद परिवार ने घर की छोटी-बड़ी जिम्मेदारियाँ आपस में बाँट लीं। बच्चों ने अपने काम स्वयं करने शुरू कर दिए। सास-ससुर ने अपनी क्षमता के अनुसार अपने काम स्वयं करने शुरू किए और उसके पति ने भी घर के कामों में हाथ बँटाना अपनी जिम्मेदारी समझा। सुगंधा से भी कहा गया कि अब वह अपने लिए समय निकाले, अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखे और अपने अधूरे शौक पूरे करे।
सुगंधा ने महसूस किया कि जब पूरे परिवार की जिम्मेदारियाँ केवल एक ही व्यक्ति के कंधों पर डाल दी जाती हैं, तो वह धीरे-धीरे शारीरिक और मानसिक रूप से थकने लगता है। लगातार बढ़ता हुआ बोझ उसे तनावग्रस्त
और चिड़चिड़ा बना देता है। लेकिन जब परिवार के सभी सदस्य अपनी-अपनी जिम्मेदारियाँ मिलकर निभाते हैं, तो न केवल एक व्यक्ति का भार कम होता है, बल्कि पूरे परिवार का जीवन अधिक संतुलित, सहज और सुखद बन जाता है। जिम्मेदारियों का बँटवारा केवल काम कम नहीं करता, बल्कि रिश्तों में सहयोग, सम्मान और अपनापन भी बढ़ाता है।
घर किसी एक व्यक्ति के त्याग से नहीं, बल्कि सभी सदस्यों के सहयोग से चलता है। और जो परिवार यह समझ जाता है, वहाँ केवल काम ही नहीं बँटते, बल्कि खुशियाँ भी बाँटी जाती हैं।
- कंचन चौहान, बीकानेर














