साहित्य चक्र

28 October 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 28 अक्टूबर 2026






ए मेरे साये! तू भी तो बड़ा कमबखत है
दिन भर मेरा पीछा करता है,
और रात भर मुझे
मेरे ही सवालों में अकेला छोड़ देता है,

साया कभी साथ नहीं छोड़ता, ऐसा मैंने सुना है,
पर तू साथ कहाँ देता है?
ए साये! तू तो बस साथ होने का भ्रम देता है
और मैं उसी भ्रम में उलझा रहता हूँ,

तुम साथ छोड़ने का मौका ही नहीं देते हो
मैंने ये भी सुना था-
फिर एक रात मैंने मुड़ कर देखा-
वही साया मेरे कदमों में नहीं,
मेरे अंदर चल रहा था,

मैं थक कर रुकता हूँ तो वह भी रुकता है,
मैं भागता हूँ तो वह भी भागता है,
पर एक पल भी ऐसा नहीं,
जब वो मुझसे आगे निकल कर
मुझे मेरा ही चेहरा दिखा दे,

साया दुश्मन नहीं है ए दोस्त!
साया दोस्त भी नहीं है,
साया वह है जो हर जन्म में
बिना बोले साथ चलता है-
बिना नाम, बिना चेहरा, लिए
बस एक खामोश गवाह की तरह संग-संग चलता है।

- बाबू राम धीमान


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बारिश की छन-छन से डर के

शांत निशा का रूप सुहाना,
चाँदनी बिखरी गाँव की ओर।
कच्ची पगडंडी, बांस के झुरमुट,
छप्पर पर है दीप की पोर।
शीतल पवन मधुर सुर छेड़े,
मिट्टी में है प्यार पुराना।
रात थमी है सुकून के संग,
मन का हर दुख भूल जाओ ना।
पर जब घिरे गगन में बादल,
आंधी का जब रूप सजा,
लहरा उठे खेत के पौधे,
हवा में झूम उठे हैं शजर।
भाग रहे बच्चे पग भरते,
बारिश की छन-छन से डर के,
प्रकृति के इस खेल अनोखे,
हर दिल में उमंगें बह लें।
एक तरफ़ है असीम शांति,
दूजी ओर जीवन का उल्लास,
यह माटी की सोंधी खुशबू,
गाँव की सादगी का आभास।

- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़


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जहाँ तक राह दिखाई देती है…

क्यों सोचें अभी
उन खाइयों का,
जिन्हें हमने देखा ही नहीं…
क्यों डरें उन मोड़ों से,
जो अभी आए ही नहीं…
क्यों अपने आज की धूप में
कल की परछाइयाँ ढूँढ़ें,
और उस सफ़र की खुशी खो दें
जो अभी हमारे सामने
बिल्कुल साफ़ दिखाई दे रहा है।

आईये, पहले इस राह का आनंद लें…
जो सामने है,
उसे जी भरकर चलें।

रास्ते में जो फूल मिले,
उन्हें देखें…
जो हवाएँ छूकर जाएँ,
उन्हें महसूस करें…
जो पल मुस्कुराने को कहें,
उन्हें खुलकर जी लें।

और जब राह आगे जाकर
दुर्गम हो जाए,
जब कोई खाई सामने आ खड़ी हो,
जब कोई मोड़ अनजाना लगे,
तब देखेंगे।

तब शायद हम भी
आज जैसे नहीं होंगे…
थोड़े और अनुभवी,
थोड़े और मजबूत,
और शायद वह कठिन राह
हमें उतनी कठिन लगे ही नहीं।

जहाँ तक राह साफ़ दिखाई दे रही है,
वहाँ तक चलते चले....
हँसते चले...
जीते चले...
फिर वहाँ पहुँचकर
एक बार पीछे मुड़कर देखेंगे,
और फिर जो राह आगे खुलेगी..
उस पर भी चल पड़ेंगे।

क्योंकि ज़िंदगी का राज़ शायद इतना ही है...
पूरी यात्रा का नक्शा लेकर नहीं चलना...
बस अगला कदम दिखाई देता रहे…
और उसे पूरे मन से जीते रहना।

- नरेंद्र मंघनानी


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मधुर संगीत

जागते हुए भी नींद में रहना बिल्कुल अच्छा नहीं,
मेहनत करना है कर्म आलस हमारा गहना नहीं।

वक्त को जो पहचान गया वही वक्त का हुआ,
जिसने दरकिनार किया वक्त वो समझदार नहीं।

थोड़ा थोड़ा सा ही वक्त मिला है सबको,
वही अपना है बाकी का हमारी जागीर नहीं।

प्रकृति की हर शय जी नहीं चुराती मेहनत से,
सर्वश्रेष्ठ कृति जगत की इस रोग से अछूती नहीं।

कर्म से ही भरे जाएंगे जीवन की तस्वीर में रंग,
बेरंग तस्वीर की इस जगत में कोई कीमत नहीं।

बीज जब मिटा देता है खुद को मिट्टी की गोद में,
बिन मिटे बीज का दरख़्त बनना संभव नहीं।

वक्त के संग चलें तो हर आवाज लगती है संगीत,
वरना मधुर संगीत भी में शोर के सिवा कुछ नहीं।

- राज कुमार कौंडल


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रूस्वाई

रूस्वाई करके मुझे तुम इस तरह से,छोड़ मत जाओ
बेपनाह मुहब्बत है मेरा तुमसे, कहना तु मान जाओ
जो तुम छोड़कर मुझे चली गयी तो, सच मानो
मै तो जिन्दा रहकर भी, मरना ही तू समझ पाओ।

बडी ही शिद्दत से तुम मिली हो, इसी से तुम स्वीकारो
तुझे खोना ना चाहता हूं कभी, बात मेरी समझा करो
जो भी है मन मे तेरी मुझसे खटपट, उसे तो कहो
हर एक समस्या का समाधान है, इस बात का ना नकारो।

रूस्वाई होकर रहना अच्छा लगता है, क्या भला ?
मिल बैठकर बाते कर लेगे, बेवजह क्यो करे हल्ला ?
आखिर मुहब्बत है ना एक दूजे से, ये तो तू भी है माना
फिर तो हमारे जिदगी की हर मुसीबत तो टला ही टला।

चलो छोडो इधर उधर की बाते, अब साथ हो जाते है
लो जीती तुम ही मुझसे, हार मुझे तो खूब भाते है
रूस्वाई को अलविदा कहकर, मुहब्बत का पैगाम दो
हमारी जोडी सफल रहे सदा, प्रयास यही करते है।

- चुन्नू साहा


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कम खाना और ग़म पीना

अपने इस स्वास्थ्य को बेहतर सभी रखना,
खानें के लिए नही जीने के लिये है खाना।
पाचनशक्ति ठीक व वज़न को कम रखना,
सदा कम ही खाना एवं यह ग़म पी जाना।

बिना दवाईयों के सबको पेट ठीक रखना,
स्वयं समझदार बनकर सबको‌ समझाना।
स्वास्थ्य से बढ़कर संसार में कुछ भी नही,
ये पसीना बहाना एवं मेहनत करते जाना।

स्वस्थ-तन स्वस्थ-मन तो स्वस्थ ये जीवन,
आनंदित ये दसों दिशाएं घर परिवार संग।
नही देना निमंत्रण कोई इन‌ बीमारियों को,
जिनसे लड़ना पड़े व करना पड़े ऐसे जंग।

बढ़ रही है आजकल कई सारी बीमारियां,
डायबिटीज़ हार्ट अटैक शुगर और कैंसर।
किडनी बी पी एड्स और यह सोरायसिस,
इसलिए मोटापा कमकर यही है अवसर।

फिटनेस का ध्यान रखे ना ले मदिरा मांस,
करना दौड़ व व्यायाम योग और उपवास।
शामिल करे जीवन में ये रोज़‌ मार्निंगवाक,
शुद्ध स्वच्छ पानी-पीना ताज़ा लेना श्वास।

- गणपत लाल उदय


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गज़ल

लगाकर आग महफ़िल में शराफ़त आज़माते हैं।
सनम रुस्वा मुझे करके सियासत आज़माते हैं।।

छुपा कर ज़ख़्म दिल का वो बड़ी मासूमियत सेअब।
भरोसा जीत कर सबका हुकूमत आज़माते हैं।।

कभी उल्फ़त की बातें थीं कभी तल्ख़ी भी छाई थी।
वो मतलब के लिए हर रोज़ चाहत आज़माते हैं।।

हवा का रुख़ बदलने की अदा जिन में निराली हो।
वही अपनी अना के बल बग़ावत आज़माते हैं।।

सँजो कर ख़्वाब आँखों में चले थे साथ जिनके हम।
वही ग़ैरों की बाँहों में मुहब्बत आज़माते हैं।।

वफ़ा की बात करते हैं वफ़ा से जो रहे ग़ाफ़िल।
नए इल्ज़ाम देकर वो नज़ाकत आज़माते हैं।।

किसे अपना कहोगी ‘रति’ यहाँ हर शख़्स बेगाना।
वफ़ा की राह में सब लोग क़िस्मत आज़माते हैं।।

- रति सिंह (रिंकी)


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बेटी

जब बेटियां बड़ी हो जाती हैं
तो मां के सपनो को सजाती हैं।

मां को उड़ना सिखाती हैं,
जब बेटियां कमाने लगती है।

तो मां को उड़ना सिखाती हैं,
बेटी मां को पँख लगाती हैं।

जब बेटियां बड़ी होती हैं तो
मां को जीना सिखाती हैं।

जब बेटियां बड़ी हो जाती हैं,
तो दरिन्दों से बचाती हैं ।

जब बेटियां समझने लगती हैं,
मां को हर ग़म से दूर करती हैं।

बेटियां अपना फ़र्ज़ निभा जाती हैं,
बेटियां कब मां की मां बन जाती हैं।

बेटी मां के लिए आकाश बन जाती हैं,
बेटी मां की, बारिश और पानी बन जाती है।

बेटी मां का दर्द और आँसू,
पल में छू मन्तर भगाती है।

बेटी मां के सपनों को पल में सजाती है,
बेटी मां को पग-पग पर उठाती हैं।

बेटी से ही सारा घर आंगन आबाद है,
बेटी ही तो सारा घर परिवार की शान है।


- सुमन डोभाल काला


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प्रश्नपत्र है ज़िंदगी, उत्तर अपने कर्म।
सच की स्याही से लिखो, जीवन का तुम मर्म॥

सबको खुश कर आज तक, कौन हुआ खुशहाल।
अपने मन से पूछना, क्या है तेरा हाल॥

सुख-दुख दोनों साथ हैं, जीवन के अध्याय।
हँसकर उनको जो पढ़े, समझदार कहलाय॥

हर प्रश्नों का हल नहीं, मिलता इस संसार।
कुछ उत्तर स्वीकार कर, बढ़ना है हर बार॥

जीवन की हर राह पर, मिलते प्रश्न अनेक।
हिम्मत जिसका साथ दे, जीत उसी की नेक॥

भाग्य भरोसे मत रहो, कर्मों पर हो काम।
मेहनत से ही लिख सको, जीवन का परिणाम॥

जो चाहा वह सब मिले, ऐसा नहीं विधान।
जो मिलता स्वीकार कर, रखना ऊँची शान॥

समय परीक्षा ले रहा, धीरज रखना मित्र।
आज कठिन जो प्रश्न है, कल देगा नव चित्र॥

हर मुश्किल को देखकर, मत होना लाचार।
पत्थर से ही फूटता, जलधारा का द्वार॥

जीवन कोई खेल ना, नहीं आसान राह।
जिनके बुलंद हौसले, पूरी होती चाह॥

कुछ प्रश्नों के उत्तरों, छिपा हुआ है सार।
मौन स्वयं कहता कभी, जो न कहे संसार॥

जीवन के हर मोड़ पर, मिलता नया सवाल।

अनुभव जिसकी ढाल है, ढूँढे हल हर हाल॥

हार-जीत जीवन रहे, दो पहलू पहचान।
हार सिखाती सीख जो, जीत बढ़ाती मान॥

सुख आए तो मत उछल, दुख में मत घबराय।
समय चक्र की चाल को, कोई रोक न पाय॥

प्रश्न कठिन हों सामने, मन में रखना आस।
अंधियारे के पार ही, मिलता नया प्रकाश॥

जो बीता सो सीख है, जो आए वो मर्म।
वर्तमान को जी सखे, यही श्रेष्ठ है कर्म॥

जीवन की इस दौड़ में, मत खोना सद्भाव।
जीत वही जो बाँट दे, औरों के भी घाव॥

हर उत्तर के बाद भी, प्रश्न खड़े सौ बार।
जीवन चलता सीख से, खुलते नए विचार॥

किस्मत को मत कोसना, कर्मों का कर मान।
मेहनत से ही बदलता, जीवन का प्रतिमान॥

- डॉ. सत्यवान सौरभ


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तन पर चोला साधु का, मन में भरा विकार।
कैसे होगा मुक्त वह, मन में हो संसार॥

लिप्त रहे निर्लिप्त बन, ओढ़े धर्म लिबास।
मन से मोह न मिट सके, कैसा फिर संन्यास॥

वस्त्र बदलने से भला, बदल सके क्या चित्त।
मन में लोभ-विकार हों, कैसे हो वह निर्लिप्त॥

माला लेकर हाथ में, मन में भरा विकार।
कैसे भव से पार हो, अगर हो छल अपार॥

त्याग दिखावा कर रहे, मन में भरा ममत्व।
कैसे संभव हो भला, निर्मल आत्मतत्त्व॥

काया पर वैराग्य है, मन में भोग-विलास।
ऐसे झूठे त्याग से, कैसे मिटे पिपास॥

धर्म ध्वजा लेकर चलें, मन में भेद हजार।
कैसे मानवता बचे, जब मन ही बीमार॥

बाहर से निर्मल दिखें, भीतर मैला भाव।
ऐसे पाखंडों तले, दम तोड़े सद्भाव॥

वाणी में उपदेश हैं, आचरण में दोष।
कैसे जग को राह दें, जिनमें भरा हो रोष॥

त्याग किया पर नाम का, चाह रहे सम्मान।

मोह-मुक्त कैसे कहें, जो माँगें यशगान॥

देह सजाकर क्या मिला, मन का मैल न जाय।

अंतर निर्मल हो तभी, सच्चा योग कमाय॥

नग्न विचारों से बढ़े, समाजों में विकार।
संयम की मर्याद से, होता शुद्ध विचार॥

आडंबर की ओट में, पलता रहे अहंकार।
कैसे सच्चा त्याग हो, मन में हो व्यापार॥

साधन बदले, वेश भी, बदला नहीं स्वभाव।
कैसे नव निर्माण हो, जब मन में दुर्भाव॥

संयम केवल वेश ना, संयम मन का सार।
जिसने मन को जीत लिया, उसका बेड़ा पार॥

भोग-विलास हृदय बसा, मुख पर त्याग-विचार।

दोहरी जीव-रीति से, बढ़ता अत्याचार॥

मन की नग्न विकारिता, होती तन पर भार।
भीतर शुचिता हो तभी, जीवन में उजियार॥

मोह मिटे, ममता घटे, निर्मल हो अहसास।
तभी सार्थक साधना, तभी सच्चा संन्यास॥

- डॉ. प्रियंका सौरभ

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शराब की दुकान

शराब की दुकान,
एक शख्स बैठा वहां,
प्याला लिए,
ढलते सूरज को देख रहा है,
उसे कल की चिंता नहीं है,
हर एक घूंट में ग़म भुला रहा है,
बस भुला रहा है,
मिटाने की उसमें इच्छा नहीं,
पैसे न होने पर, कर्ज़ लेकर,
कर्ज न मिलने पर, ज़ेवर बेच कर,
वह मदिरालय में बर्बाद हो रहा है,
उसे खाली पेट की चिंता नहीं है,
चिता है तो प्यास की,
सब दुख दर्द भूल कर वह,
धर को चलता है,
इस सोच में कि वह सुखी है,
पर, घर में पत्नी और बच्चे,
उसकी राह नहीं देखते है,
वे लोग खाट पर लेते हैं,
थाली खाली पड़ी है,
चूल्हा आज रात भी न जल पाया।

- प्रणव राज


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ग़ज़ल

मुझे कोई यहाँ अपनी रजा़ देना नहीं चाहता।
बुझी इस आग को थोड़ी हवा देना नहीं चाहता।

चला हूँ मैं हमेशा ही सभी को साथ में लेकर,
मगर कोई मुझे अपनी वफ़ा देना नहीं चाहता।

रवायत को शराफ़त से निभाता ही रहा हूँ मैं,
कभी लेकिन कोई इसका सिला देना नहीं चाहता।

यहाँ मालूम है सबको खयाली मर्ज़ का कारण,
मगर कोई मुझे इसकी दवा देना नहीं चाहता।

दिखाता है हमेशा ही समन्दर जलजला यूँ की,
अचानक कश्तियों को वो दग़ा देना नहीं चाहता।

- नवीन माथुर पंचोली


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गज़ल

जिंदगी में ज़िंदगानी ढूँढते हैं
प्यासे हो लोग तो पानी ढूंढते हैं

गर मिट गई हो पेट की भूख
तो जीवन में रवानी ढूँढ़ते हैं

मिलते हैं नहीं है लोग अच्छे
अब तो दोस्त खानदानी ढूंढ़ते हैं

बड़े लोगों से नजरें बचाकर रखना
दरिया समुद्र में मिला तो नहीं ढूंढ़ते हैं।


- मनोज कौशल


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बोलना बहुत आता था,
मगर अब निःशब्द हूं....

दूर आसमान के अंतहीन क्षितिज का,
भ्रम था उन्मुक्त परिंदा हूं।
पंख टूटे और गिरा जमीं पर,
हालात की बेड़ियों में अब प्रकब्ध हूं।

बोलना बहुत आता था,
मगर अब निःशब्द हूं....

ख्यालों की दुनिया ही अलग थी,
मानो कोई शहंशाह हूं।
ख़्वाब से बाहर निकल देखा,
पाकर ख़ुद को "मंगता" स्तब्ध हूं।

बोलना बहुत आता था,
मगर अब निःशब्द हूं....

सुनने वाले कभी मुझे उत्कृष्ट थे,
या कौशल ही मैं खो बैठा हूं।
वज़ह जो भी हो मतलब नहीं,
चुप रहने के लिए अब प्रतिबद्ध हूं।

बोलना बहुत आता था,
मगर अब निःशब्द हूं....

- कुणाल


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फिर से

अब तो भरी जेठ की दुपहरी में
तपना अच्छा लगता है,
बारिश में तर-बतर हो जाना
अच्छा लगता है।

पहले मेवे भी नहीं भाते थे अपने हाथों से,
अब तो करेला भी मीठा लगता है।

मेला अच्छा लगता था,
मंदिर जाना अच्छा लगता था,
हर पल यूँ ही मुस्कुराना अच्छा लगता था।

अब खुद के साथ रहते हैं अकेले,
बाहर न जाने का बहाना बनाना अच्छा लगता है।

तुम साथ थे,
तो सब कुछ कितना ठीक था,
तुम्हें दूर किया अपने वास्ते,
ज़िंदगी तेरी सँवारने के लिए।

इंतज़ार है उस दिन का,
जब फिर मिलेंगे,
मेवे होंगे, मंदिर होगा,
फिर साथ घूमना होगा।

फिलहाल दोनों दूर हैं,
परिस्थितियों से मजबूर हैं।

पर दिल में एक आस अब भी बाकी है,
फिर साथ बैठेंगे, फिर मुस्कुराएँगे,
जो पल अधूरे रह गए हैं,
उन्हें मिलकर दोबारा जी जाएँगे।

क्योंकि तुम्हारे साथ ही तो
ज़िंदगी जीना अच्छा लगता है।
फिर से साथ अच्छा लगेगा…

- रोशन कुमार झा


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घन सजना

जब-जब नभ पर बदरा छाएँ,
याद तुम्हारी आती है ,
सूने मन के आँगन को फिर,
प्रेम प्रीत दहकाती है

सावन की भीगी बूँदों में,
आहट लगती है तेरी,
सूखे मन की हर डाली को,
मेघ सींच दो तुम मेरी ।
शीतल मन्द सुगन्ध पवन नित,
हिय हिल्लोर उठाती है।।
सूनें मन के आँगन को फिर
प्रेम प्रीत दहकाती है।

मैं भी तो इन घन के जैसी,
पीर संग ही रखती हूँ,
ऊपर से मैं हँसती रहती,
भीतर गुमशुम रहती हूँ।
चंदा की ये शीतल छाया
रह-रह अंग जलाती है।
सूनें मन के आँगन को फिर
प्रेम प्रीत दहकाती है।

मन भर आया,नयन न बरसे,
कैसी यह मजबूरी है,
तुम बिन मेरे जीवन की ऋतु,
लगती सखे अधूरी है।
नभ पर घन की उमड़ घुमड़ ये,
धरती को तड़पाती है।
सूनें मन के आँगन को फिर
प्रेम प्रीत दहकाती है।

आओ प्रिय! भीगी बेला में,
बातें सारी कह डालें ,
प्रीत भरा दो चार दिनों का,
जीवन जी लें मतवाले।
आने वाली मधुरिम बेला
आंखें सोच लजाती है
सूनें मन के आँगन को फिर
प्रेम प्रीत दहकाती है।

- सविता सिंह मीरा


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भगवान के घर देर

भगवान के घर देर है अंधेर नहीं
वह समय पर ही करता है सब काम
बड़े बड़ों की छुट्टी कर दे दिखा दे ताकत
जिसका चाहे चमका दे नाम

माध्यम वही है करवाता है वही सब काम
किसी की इज़्ज़त बढ़ा दे किसी को कर दे बदनाम
किसी को मेहनत का भी भरपूर फल नहीं मिलता
मिलता है किसी को मुफ्त में करता नहीं कोई काम

कर्म जैसा करेगा कोई वैसा ही पायेगा फल
आज यदि कुछ नहीं होगा अवश्य मिलेगा कल
काटेगा तो वही जो बीजा है तूने खेत में
बीज तभी अंकुरित होगा मिट्टी से जब चलेगा हल

उस की नज़रों से कोई नहीं है बच पाता
सात परदों में भी छुप जाओ उसे सब है नज़र आता
मन को धोखा दे चुका बहुत अब संभल जा
सब खबर हैं उसको बेशक रहता है तू छुपाता

देर से ही सही मेहनत का फल अवश्य पायेगा
खून पसीना जो तूने बहाया व्यर्थ नहीं जाएगा
दुनियां की भीड़ का हिस्सा मत बन कुछ करके दिखा
जब गुम हो जाएगा दुनियां की भीड़ में फिर पछतायेगा

दूसरों को सताएगा तो खुद भी चैन नहीं पायेगा
तेरे कर्मों का लेखा जोखा तेरे सामने आएगा
इज़्ज़त शोहरत सब धरे के धरे रह जाएंगे
जितना भी बचा ले बदन तेरा खाक में मिल जाएगा

- रवींद्र कुमार शर्मा


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हार मिले आयोग गलत, जीत मिली तो वाह!

किसने किसको क्या कहा, किसने किसको घेरा,
बयानबाजी की आँधी में, 'गुम' हो गया है सवेरा।
कभी राम के नाम वोट, कभी शिवाजी की शान,
कभी मंदिर तो कभी महापुरुष, बनते अभियान।

महापुरुषों ने देश की खातिर स्वयं सर्वस्व लुटाया,
नेताओं ने उनके नाम अपना कुनबा खूब बढ़ाया!
हार मिली तो आयोग गलत, जीत मिली तो वाह!
अपनी गलती मानने की, किसे पड़ रहीं परवाह?

कुर्सी छूटी तो संविधान पर संकट नज़र हैं आता,
कुर्सी मिलते ही इन्हें वही संविधान बड़ा सुहाता!
सड़कों पे जो भीड़ दिखे, उसे बताया जाएँ खास,
विरोधी की भीड़ 'अराजक', अपना जन-विश्वास।

भई अपनी रैली तो लोकतंत्र है, उनकी रैली शोर,
सत्ता के इस खेल में, 'सत्य' हो गया है कमजोर।
रामजी भी सोच रहे होंगे, यह कैसी लीला न्यारी,
मेरे नाम पर चलती रहती, हरेक रोज़ नई तैयारी।

- संजय एम तराणेकर


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ख़ामोशी का मौक़ा भी मुनादी भी

ख़ामोशी का मौक़ा भी मुनादी भी
देश-दुनिया में ताज़ा-ताज़ा क़ब्ज़ा करता
राष्ट्राध्यक्षों का अपहरण करता
सीने पर बंदूक तानता,भीख माॅंगता
नोबेल दे दो,नोबेल दे दो
है बली बहुत मगर छली अद्वितीय
बिना बुलाये कहीं भी घुस जाता
भटकता-भटकाता... उलझता-उलझाता
हा हा करता,हाथ हिलाता,ऑंखें दिखाता
ख़ुद को अकेला पाता,सुरक्षा-घेरों में
मटक-मटककर सुरक्षित मचलता
ख़ुद ही ख़ुद के प्रिय-अप्रिय नारे लगवाता
अन्नदाता-अन्नदाता, ज़िंदाबाद-ज़िंदाबाद
वह जो तन-मन-जीवन से यौनरोगी
वेश्यागामी,कपटी,विश्व-गुंडा कौन है
बोले ढक्कनछाप विश्व-गुरू असत्यश्री
काका मेरा काका अमेरिका
ट्रम्पम् शरणम् गच्छामि
बम्बम् शरणम् गच्छामि
मौक़ा भी,मुनादी भी,ख़ामोशी भी
ओम् शांति.



झूलते हुए झूलता हूॅं झूला.

झूलते हुए झूलता हूॅं झूला
कुछ देर इधर,कुछ देर उधर हूॅं मैं
कुछ देर बीच में किन्तु ठहरता नहीं हूॅं
बीच में रहते हैं जो भी,अभी या कभी भी
ज़रा-ज़रा भी पाते नहीं हैं ठौर-ठिकाना
ठीक नहीं,दोनों तरफ़ वफ़ादारी ठीक नहीं
इस तरफ़ या उस तरफ़ हो जाना ही ठीक
युद्ध का वक़्त है यही और सही-सही
बीच युद्ध के दौरान बदलना औज़ार
और बदलना उपस्थिति ठीक नहीं
अपनों में रहने से ही होता हूॅं मुक्त
अपनों में मरने से ही मिलती है मुक्ति
मुक्तिबोध मुक्तिमार्ग संभावना है अब भी
जॅंगल-जॅंगल झरते हैं झरने झर-झर
खिलते हैं फूल भी ख़ुशबूदार

- राजकुमार कुम्भज


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रख कर तेरी चौखट पर सर देख लिया,
तेरा जलजला तेरा हर कहर देख लिया।

तेरी डरावनी साजिश से डर नहीं लगता,
हमने अपने भीतर का डर देख लिया।

वक्त का सर सहलाने का दुस्साहस बहुत कर चुके,
मारकर पलटी वक्त ने भी तेरा असर देख लिया।

बड़ी मसक्कत से हर मजमून हर मसौदा बनाया,
टूट गए हर तिलस्म, जमाना मंजर देख लिया।।

सरे महफिल तूने मेरी मौत का ऐलान किया था,
विकास जिंदा है पीकर तेरा हर जहर देख लिया।

- राधेश विकास


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सच्चा कैदी

अगर आप कभी
नहाने के पानी में
किसी अजनबी
चेहरे को बारे में सोचें
तो आप असली गहरी सुन सकते हैं।
यहां वहां कोई अज्ञानके प्रति
अपनी अजीब विस्मृतिमे
शान छोड़ जाता है
अलमंद छुपे सकते से भीतर की
कमरे में जाता है
और उसकी प्रेम का ध्वनि
प्रबल हो जाती है।

- निर्मल राय


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17 October 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 17 अक्टूबर 2026






मनुष्य और उसकी विराट इच्छाएं

कितना अल्प है मनुष्य,
फिर भी कितनी विराट
उसकी इच्छाएँ हैं…!
मुट्ठी भर साँसों का सफ़र,
और ख़्वाब हैं कि
आसमान से भी ऊँचे हैं।

पाँव टिके हैं धरती पर,
मगर आँखों में पूरा आकाश है,
हाथों की लकीरों में सीमित जीवन,
और मन में अनंत की प्यास है।

थोड़ा-सा सुख मिल जाए,
तो और अधिक पाने की चाह जागती है,
एक मंज़िल पर पहुँचते ही
दूसरी मंज़िल नज़र आती है।

कभी धन की चाह,
कभी यश का अभिमान,
कभी दुनिया को जीतने की ज़िद,
तो कभी अपनों से ही
अपना अस्तित्व स्वीकार करवाने का अरमान।

वह भूल जाता है अक्सर,
कि जिस जीवन को सँवारने में
सारी उम्र लगा देता है,
वही जीवन एक दिन
उसकी मुट्ठी से रेत-सा फिसल जाता है।

जिन चीज़ों को पाने के लिए
वह अपनी शांति खो देता है,
एक दिन उन्हीं चीज़ों के बीच बैठकर
वह शांति को ही खोजता है।

जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि
सब कुछ पा लेना नहीं,
बल्कि उस क्षण को पहचान लेना है,
जब मन कह उठे..
“मेरे पास जो है,
वह भी कम नहीं…
और जो नहीं है,
उसके बिना भी
मेरा जीवन अधूरा नहीं।

- नरेंद्र मंघनानी


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असत्य का भी साथ चाहिए

क्यों कीचड़ ही चाहिए,
कमल के खिलने को?

क्यों ताँबे का साथ चाहिए,
कुंदन को हार में ढलने को?

क्यों युधिष्ठिर को भी असत्य का
सहारा लेना पड़ा,
महाभारत में धर्म की विजय का
इतिहास लिखने को?

क्यों विष की जरूरत है,
विष के प्रभाव को मिटने को?

क्यों कांटा निकले कांटे से,
फिर घी निकाली जाए टेढ़ी उंगली से?

फिर सत्य और असत्य के बीच,
क्यों खिंची है ऐसी रेलमपेल?

कुछ हासिल करने के लिए,
कुछ धर्म निभाने के लिए,
कभी-कभी क्यों अंततः
असत्य का भी साथ चाहिए ?

- रोशन कुमार झा


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अध्यापक नहीं मसाल हूं मैं
अध्यापक नहीं मसाल हूं मैं
ज्ञान की लौ जलाने आया हूं
जग से अज्ञान मिटाने
जग को जगाने
भटके यौवन को राह
दिखलाने आया हूं
अध्यापक नहीं मसाल हूं मैं
सिर्फ पढ़ाना मेरा काम नहीं
जीवन जीने की कला सिखाना
छात्रों को अनुशासित बनाना
संघर्षों से हंसते-हंसते लड़ना
सिखलाने आया हूं
अध्यापक नहीं मसाल हूं मैं
छात्रों को चरित्रवान बनाने
छात्रों में आत्मविश्वास जगाने
छात्रों का विवेक कर जागृत
भौतिक जगत से
अन्तर्जगत की ओर
ले आने आया हूं
अध्यापक नहीं मशाल हूं मैं
गीता ,बाइबल और कुरान के
ज्ञान से अवगत कराऊं
वेदों - उपनिषदों के
गूढ़ रहस्यों से परिचित कराऊं
सत्य और आनंद की
वास्तविक परिभाषा बतलाऊं
सिर्फ अध्यापक नहीं बनना मुझे
अभीप्सा है कि
सच्चा गुरु बनने का गौरव पाऊं
अध्यापक नहीं मसाल हूं मैं
ज्ञान की लौ जलाने आया हूं

- प्रवीण कुमार


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सुबह की सैर का आनन्द ही कुछ और है
खत्म हो रहा पैदल चलना, मुश्किल आता दौर है

पहले चिड़ियों की चहक से खुलती थी सुबह, सबकी
अब हर तरफ प्रेशर हॉर्न और धुएँ का ज़ोर है,
आती है शरीर में देखो, चेतना और स्फूर्ति
पैदल चलने में मज़ा ही कुछ और है
साहब! जो पैदल चलता था पहले कभी शान से
आज उसे ही सब कहते हैं - ये कुछ और है,
पहले खुलकर साँस लेते थे तो जी उठते थे,
अब हर साँस में धूल और धुएँ का ही ज़ोर है,
हर कोई भाग रहा है गाड़ी-घोड़े की ओर
सुकून का अब कहाँ किसी को ठौर है,
साहब! पैसों से नापते हैं अब, इज्ज़त यहाँ,
इंसानियत का अब कहाँ दौर है?

शुद्ध मिलती थीं पहले प्राण वायु,
अब हर तरफ मोटर-गाड़ियों का ही शोर है,

नंगे पाँव जो पहले ओस पर चलता था
अब कांटों भरा उसका हर छोर है,

पहले सैर में मिलते थे यार- दोस्त बहुत सारे,
अब हर शख्स मोबाइल में बोर है,

जिस्म थक रहे हैं आज, दिल थक रहे हैं,
सेहत का जनाज़ा उठ रहा,कहते हैं ये तरक्की का दौर है

पहले जो सड़कें थीं अपनों से भरी,
अब वीरान पड़ा हर एक छोर है,

साहब! तरक्की तो बहुत कर ली हमने,
पर सेहत और सुकून कमज़ोर है।

कभी पीपल के नीचे बैठा करते थे शौक से
अब वहाँ भी कंक्रीट का ढेर है,

साहब! हमने बेच दिया सुकून अपना,
ये तरक्की नहीं, विनाश का दौर है।

- बाबू राम धीमान


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छोड़ दीजिए

ज़िंदगी में कोई काम ऐसा हो,
जो आपको अच्छा न लगे, उसे छोड़ दीजिए।
किसी का साथ दिल को रास न आए,
तो ऐसे रिश्ते को भी छोड़ दीजिए।
किसी चीज़ के पीछे यूँ मत भागिए,
जो वक्त पर मिलना हो, उसे वक्त पर छोड़ दीजिए।
कोई काम आपका बन नहीं रहा हो,
तो उसे भी किस्मत पर छोड़ दीजिए।
जो आपको मिलना होगा, मिलकर रहेगा,
इसलिए हर बात की फिक्र करना छोड़ दीजिए।
दूसरों की चिंता में अपनी ज़िंदगी न भूलिए,
अपने लिए भी थोड़ा जीना सीख लीजिए।
जो आपके साथ चले, उसका साथ निभाइए,
जो रास्ते में रुक जाए, उसे छोड़ दीजिए।
हर शिकायत का हिसाब रखना छोड़ दीजिए,
दिल में बोझ बनाकर कुछ भी मत रखिए।
सबके दुख को अपना समझना छोड़ दीजिए,
हर किसी का दर्द अपने दिल में न रखिए।
ज़िंदगी में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं,
जो बुरा है, उसे वहीं छोड़ दीजिए।
जिनसे भी मिलें, उनकी कमियाँ वहीं छोड़ आइए,
हर बात को दिल से लगाना छोड़ दीजिए।
ज़िंदगी बहुत खूबसूरत है, इसे यूँ न गँवाइए,
जो सुकून छीन ले- उसे बस छोड़ दीजिए।

- गरिमा लखनवी


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हे मिर्च! तुम भी बड़ी कमाल की हो
बड़े-बड़ों की सिट्टी-पिट्टी गुम कर देती हो,

छोटी सी, नाज़ुक सी दिखती हो
पर मिज़ाज तीखा रखती हो,

अगर कमाल दिखाने पर आ ही गई,
तो सी-सी करवा कर ही दम लेती हो,
थाली में आते ही, रंग दिखा जाती हो,
जुबां पर लगते ही, आग लगा जाती हो।

कोई कितना भी बने तीस मार खाँ, अपने आपको
एक कुतर में ही,सारी हेकड़ी निकाल देती हो,

दाम तो तेरा कुछ भी नहीं, पर भाव बड़े खाती हो
बिना तेरे हर सब्जी फीकी, ये राज भली भांति जानती हो,

हे मिर्च! कभी हरी, कभी लाल हो जाती हो
मौसम के संग तुम भी तो रंग बदलती हो,

पर जो भी तुझे, एक बार दिल से चख लें,
उसे तुम!उम्र भर याद आती हो,

तेरे बिना चटनी भी, अधूरी सी लगती है,
तेरे बिना हर जायका भी, अधूरा सा लगता है,

तू सबको रूला कर खुद कभी रोती ना हो,
जले तो जुबां सबकी, पर बदनाम तुम ही होती हो,

- बाबू राम धीमान


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पुकारती मधुशाला

पाठकगण की जीभ चाहेगी,
हर पल पीने को यह हाला,
पाठकगण के हाथ चाहेंगे,
पकड़ लेने को यह स्वर्ण प्याला;

कभी न थकेगा अपना साकी,
भरता रहेगा उनका प्याला,
तारीफ करेंगे पीने वाले,
रोज बुलाएगी मेरी मधुशाला।

गली से होकर कोई गुजरेगा,
कदम ठहर जाएंगे पीने को हाला,
बुलाएगा अंदर अपना साकी,
पकड़ा देगा एक नया प्याला;

कुछ लोग देख कर चले जाएंगे,
लक्ष्य महत्वपूर्ण है न कि हाला,
जो ठहर गए उन्हें पिलाएगा साकी,
आवाज देगी सबको मधुशाला।

- प्रणव राज


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ज्ञान का कुआं भरा हुआ है।
प्यासे रील की मधुशाला में डूबे हैं।
कमबख्त! जवानी भोग के सिवाय
सारा कुछ करवा रही है।
दिखावे की बकैती विद्या और
संभोग लक्ष्य (मोक्ष) बन गया है।
चोरी, डकैती सम्मान हो गया है,
सोशल मीडिया समाज हो गया है।
रिश्ते स्वार्थ की माला बन ग‌ए हैं,
जरा खींचे तो बिखर जाएंगे। आज!
इंसान टेक्नो-बिजूका बन गया है।

- दीपक कोहली


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बादलों को देखा है

मैने बदलो को देखा है,
नीले आकाश में तैरते देख है,
कभी सूर्य को छिपा कर छांव देते,
तो कभी घटाओं को काला होते देखा है।

गरजते-तमतमाते हुए आते देखा है,
लोगो को खिड़कियाँ
और दरवाज़े बंद करते देख है,
वहीं, बच्चे छप-छप खेलते हैं,
फिर, बादलों को हवाओं
संग लौटते देखा है।

- प्रणव राज


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देर
भले हो जाए
मगर सच-सच देता है।
जो
पहले विश्वास लेता है
फिर गच देता है।
खुलेगी जब परतें हैं तो
जमाना परतीत नहीं करेगा?
याद
रखना भीष्म का मौन
महाभारत रच देता है।

- राधेश विकास


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हाॅं जनाब! मैं कान हूॅं

हाॅं जनाब मैं कान हूॅं लेकिन आजकल परेशान हूॅं,
मेरी समस्याऍं बहुत सारी है इसीलिए मैं हैरान हूॅं।
मुझको जिम्मेदारियाॅं सिर्फ सुनने की ही दी गई है,
इसीलिए ताली गाली अच्छा बुरा सुनता रहता हूॅं।

मैं अपना दुःख व दर्द किसी को नहीं बता सकता,
न रो सकता न हॅंस सकता न ईसारा कर सकता।
न देख सकता न चल सकता ना गलें लग सकता,
यहाॅं तक कि कोई भी अंग को छू भी ना सकता।

हम दो भाई है पर एक दूजे का मुॅंह तक ना देखा,
बनानें वाले ने भी हमारे संग किया है ऐसे धोखा।
हमारी कोई तारीफ़ नहीं करता नहीं शाबाश देता,
कोई नहीं है हमारे ख़ास और नहीं है कोई सखा।

कभी बाल-कटवाने जातें वहाॅं कान को काट देते,
कोई खूॅंटी समझकर चश्मा पेन-पेंसिल टांग देते।
कभी नर्स कान भींचे कभी शिक्षक ने कान खींचें,
कान में छेदन करके लौंग टोप्स झुमके टांग देते।

फ़ाड़ दिया मेरा पर्दा उस दिन कनपटी पे मारकर,
अब कान नहीं मुझे खूॅंटी बना दिये जानबूझकर।
बीमारी का मास्क भी रखना पड़ता है लटकाकर,
ईयर फोन भी मुझे ही रखना पड़ता सम्भालकर।

होंठों पर लिपस्टिक बालों में बादामी-तेल लगातें,
दांतों के लिए पेस्ट एवं चेहरे के फेसक्रीम लगातें।
इतनी परेशानियाें के बाद भी हम भाई ख़ुश रहते,
नेत्रों का बहुत ख़्याल रखतें उनमें काजल लगातें।

किसी से सुना है मन हल्का हो जाता दर्द बांटकर,
ऑंखें ऑंसू गिराकर नाक बहकर और छींककर।
होंठ चुम्मा लेकर दाॅंत पीसकर मुॅंह जोर से रोकर,
मैं बदनसीब कान किसको सुनाऊॅं व्यथा जाकर।

- गणपत लाल उदय


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आईने जैसी नदी

यह कैसी खींची हुई नदी है
यह कैसी आईने जैसी नदी है
जिसकी सतह पर बर्फ-सफेद चाँद झुका हुआ है।
ठीक है, नदी जिससे तुम अब बचते हो।
ओह! आईने जैसी नदी
यह चिह्नित करने के लिए कि तुम कौन सी नदी हो
मैं अब पानी में ढेला फेंकता हूँ।
नदी, तुम्हारा आईना टूट जाता है
नदी, तुम्हारे सपने को ध्वस्त कर देती है
नदी, तुम्हारा दिल इस तरह टूट जाता है
वहाँ आदमी के चेहरे को सहलाती है।
ओह नदी!दुख तुम्हारे भाग्य में है।

- निर्मल रॉय


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महकने से पहले

क्या होती है जिम्मेदारी,
समय से पहले कली को
फूल बना दे,
फूल बन जाने के बाद महकने
से पहले ही मुरझाने का
मौसम लाए।

दिन और रात का फर्क मिटाये,
हर किसी की पहचान
तुरन्त कराए।
जीने का शौख नहीं, इंसान चैन से
मरने भी न पाए।

जिम्मेदारी जिसके कंधे है,
उसकी शौख कब,
बनती लाचारी उसे नहीं मालूम।

वो बने सहारा सबका,
उसका सहारा बने कौन,
यही सोच उम्र कटी,
रह जाता अकेला, बस
खुद को हौसला देकर,
खड़ा हो मौन।

- रोशन कुमार झा


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ज़ख्म मेरा है, तुम्हारा क्या है।

नशीली नज़र उसकी मेरी जानिब,मैं मुस्कुराया था,
एक हादसा था हुआ, लोगों इसमें तुम्हारा क्या है।

उसको है मुहब्बत,मुझसे, मैं भी उससे प्यार करता हूं।
ज़माने वालों क्यूं परेशान होते हो इसमें तुम्हारा क्या है।

मेरे दर्द की शिद्दतों का अहसास उन्हें क्योंकर होगा।
इश्क़ है,हर पल,पल पल, तस्सव्वुर उसका तुम्हारा क्या है।

कुच ए जानां में जाने से क्यों रोकते हो मुझे तुम हरदम।
दिल मेरा है, मुहब्बत मेरी, ज़ख्म मेरा है, तुम्हारा क्या है।

इश्क़ वालों कब मिली हैं, मंज़िलें मुश्ताक़ मुझे बताओ तो।
अब हुआ मालूम के इश्क़ के दरिया का कनारा  क्या है।

- डॉ. मुश्ताक़ अहमद


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