साहित्य चक्र

10 February 2026

आज की प्रमुख कविताएँ - 10 फरवरी 2026





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वादा

मैं वादा करती हूँ
तेरे हर मौन में,
तेरी हर उलझन में
मैं शब्द बनकर रहूँगी।

मैं वादा करती हूँ
जब दुनिया सवाल करेगी,
मैं तेरा विश्वास बनूँगी,
जब तू थक जाएगा,
मैं तेरी उम्मीद बनूँगी।

ना साथ छोड़ने का वादा,
ना हर पल मुस्कान का दावा
बस इतना कि
हर सच में, हर संघर्ष में
तेरा हाथ थामे रहूँगी।

क्योंकि वादे शब्द नहीं होते,
वो निभाए जाने वाले एहसास होते हैं
और मेरा वादा है
तेरे होने की कद्र करना
हर हाल में, हर दिन।


- डॉ. सारिका ठाकुर 'जागृति'


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हुंकार: कलम का शौर्य

उठो हिंद के नव-भगीरथ, अपनी शक्ति पहचानो तुम,
कलम हाथ में थामी है तो, खुद को योद्धा मानो तुम।
नहीं जरूरत तुझे हाथ में, अब लोहे की तलवार की,
स्याही तेरी काट बनेगी, हर दुश्मन की वार की!
मस्तक पर हो तिलक ज्ञान का, आँखों में अंगार भरो,
किताबों के हर पन्ने से, अब तुम सिंह-दहाड़ भरो।
तलवारें तो केवल बस, काया का मर्दन करती हैं,
किन्तु कलम की धारें, सदियों का सृजन करती हैं।
त्यागो निद्रा, त्यागो नशा, यह विष का प्याला भारी है,
नशे में जो डूबी जवानी, वह राष्ट्र पर भारी है।
जो अपनी सुध-बुध खो बैठा, वह क्या खाक लड़ेगा रे?
व्यसनों की बेड़ी में जकड़ा, वह क्या विजय गढ़ेगा रे?
असली वीर वही है, जो कुरीतियों का सिर काट सके,
अज्ञान के इस काले तम को, शिक्षा से जो छाँट सके।
एक वार तलवार का, केवल एक देह को मारता,
पर लेखनी का प्रहार, पूरे युग को है सुधारता!
ओ शिक्षक के लाड़लों! तुम आने वाली शान हो,
इस माटी की अस्मिता, और देश का अभिमान हो।
लिखो ऐसी अमर कहानी, कि काल स्वयं भी झुक जाए,
तुम्हारी कलम चले जिस पथ पर, बाधाएँ भी रुक जाएँ।
विजय घोष हो ज्ञान का, अब ऐसा विप्लव लाना है,
स्याही की हर एक बूँद से, नया भारत बनाना है।


- देवेश चतुर्वेदी


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सर्द मौसम था शामें रंगीन थी
झुकी पलकें तो आँखें गमगीन थी।
उतरना चाहती थी वो
मेरे दिल से आँसुओं के रास्ते,
मैं उतारता गर मेरे दिल से उसे
तो मेरी मोहब्बत की तौहीन होती।

क्या हुआ जो वो मेरे साथ न रही,
जिसके साथ रही होगी,
उसमें जरूर मुझे ढूँढती होगी।
सामने आया होगा जिक्र ए मोहब्बत का,
सहारा नाम का लेकर किसी और का,
दास्ताँ ए मोहब्बत हमारी कही होगी।
दास्ताँ न कहती हमारी मोहब्बत की
तो मेरी मोहब्बत की तौहीन होती।

लिखा जो पाता उसका नाम कहीं अगर,
प्रहर उसी में आँखों में आलिंगन करता था।
तिल तिल कर मरता था मगर,
भावना प्रेम की मन में उससे रखता था।
दौर ए बेवफाई में, मैं भी बेवफाई करता
तो मेरी मोहब्बत की तौहीन होती।


- मनोज कुमार भूपेश


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मेरी दुनियां

हंसना रोना तेरे लिए,
पाना खोना तेरे लिए,
आंख अधखुली रख,
बेचैन रातों को सोना,
जैसे चंद अपनी चांदनी से
सपनों को छूता हो।

सो भी गए तो,
सपनों में तुम हो
जैसे हर नदी पानी में,
चांद का प्रतिबिंब पाती है।

आंख खुली फिर तो,
सारे जहां में तुम हो।
जैसे सारी दुनिया सुबह,
सूरज को ही देखती है।

हर कहानी का किरदार तुम हो,
मेरे हर हासिल का हिस्सेदार हो
तुम मुझमें हो मालूम है,
पर ये आंखे तुझको ढूंढती हैं।
जैसे पतझड़ के पत्ते,
सावन की बूंद ढूंढते हैं।


- रोशन कुमार झा


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बचपन की कहानी

एक बचपन का जमाना था
उसमें खुशियों का खजाना था।
चाहत चांद को पाने की थी
पर दिल तितली का दिवाना था।

खबर न थी कुछ सुबह की
न शाम का ठिकाना था।
थक कर आना स्कूल से
पर खेलने भी जाना था।

परियों को फसाना था
बारिश में कागज की नाव थी।
हर मौसम सुहाना था
एक बचपन का जमाना था।


- शिव 'सदानंद'


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भीड़ से अलग

तुम्हें जब देखती हूं,
उससे भी ज्यादा तब देखती हूं
जब तुम दिखाई नहीं देते।
फिर खुद को ढूंढती हूं...
सूखे पत्तों का जमीन पर
आलीशान घर,
बसंत भी है, और पतझड़।
रूखे टहनियों पर बसे
इंतजार की और सब्र की कहानी।
शायद सबने सुनी
कांटों के बीच मुस्कुराते
गुलाब की ज़ुबानी।
फिर यही इंतजार की कहनी,
किताबों की खिड़की खोल
जब चाहत में सच होने लगे...
तब शुरू होती है प्रेम कहानी।
आज भी उसी कहानी चौखट पर
देखा है, भीड़ से अलग ठहरा
एक गुलाब का इंतजार।


- सुतपा घोष


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बचपन

फिर से वही बचपन की तलाश में कट रही जिंदगी,
जिसमें न डर, न छल, न कपट, न झूठ, न आलस।
फिर से उल्लास, हँसी ठिठोली, और बेबाकपन,
भटक रहा हर दिन बस वही बचपन जीने को मन।

खेलने को रस्सी कूद, गिट्टियाँ और चोर सिपाही,
खो-खो, आइस पाइस, पिण्डुक और फुटबॉल।
सारा दिन स्कूल, मस्ती, लड़ना, प्यार और रुठना,
सब याद आता है कि फिर से उस दौर में जीने को।

माँ का हर दिन प्यार से पुचकारना कभी डांटना,
प्यार से पुचकारना पापा का हर चीज़ लाना।
सबकी लाड़ली होना इस बात पे इतराना रस्क करना,
सखियों की लीडर होना उनके विश्वास पे खरा उतरना।

काश वही पुराने दिन लौट आए और वही बेपरवाह
जिंदगी हो, वही सखियाँ हो, वही माँ पापा हो।
वही भाई बहन, वही सुंदर कपड़े, वही सुकून,
भरी जिंदगी हो, बेपरवाह, रोक टोक न हो।

पर अब तो जिंदगी का हर पल, हर दिन, हर साल,
खत्म हो रहा है , अब जिंदगी पानी का बुलबुला है।
बस अब जिंदगी में वही बचपन जीने को मन करता है,
और अंदर एक बच्चा अभी भी ज़िदा है और जीता है।


- सुमन डोभाल काला


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बर्फ के पहाड़

गिरती है जब बर्फ
चमक उठते है पहाड़
सफेद चादर से ढके
आंखे चुंधिया जाती है देख कर
पहाड़ी के लिए आम है बर्फ का गिरना
कठिनाईयों से जूझती जिंदगी
मुश्किल होता है रास्ता ढूंढना
पशुओं के लिए चारा
रोटी बनाने के लिए लकड़ी
कैसे आएगी उस गिरी बर्फ में
बीमार कोई हो जाये
कैसे पहुंचेगा हॉस्पिटल
सड़कें बन्द बिजली नहीं
पानी के नल जमे हुए
हड्डियां तक जमा देने वाली ठंड
हाथ को हाथ का पता नहीं
कैसे स्कूल भेजें बच्चों को
दूरसंचार ठप्प दुनियां से बेखबर
कहीं बर्फीला तूफान
कहीं चट्टानें खिसक रही
पहाड़ का आदमी बहुत परेशान
लेकिन हिम्मत नहीं हारता
डट कर करता है मुकाबला
सभी कठिनाईयों का
लगता है जैसे किसी हाड मांस का नहीं
बना है किसी कठोर धातु का
पहाड़ चढ़ना उतना नहीं अखरता उसको
बचपन से पला बढ़ा है पहाड़ पर
यहां रहने वाले जुड़े है अपनी संस्कृत से
कूट कूट कर भरे हैं उनमें संस्कार
फिर एक दिन आते है कुछ सैलानी
घूमने पहाड़ पर
खुश होते हैं देख कर
पहाड़ पर पड़ी बर्फ
उनके लिए खुशी है बर्फ देखना
उसमें अठखेलियाँ करना
कूड़ा कचरा फैलाना
तहस नहस करना हमारी संस्कृति को
और वापिस चले जाना
नाचते गाते है बर्फ में
रीलें बनती हैं बेशर्मी से
कपड़े उतारते हैं निर्लज्ज
शराब की बोतलों को लहराते है हवा में
हो हल्ला करते हैं हुड़दंग मचाते है
कहें कुछ पहाड़ के लोग तो
लड़ते हैं आंख दिखाते हैं
तार तार कर रहे पहाड़ की संस्कृति को
डर नहीं उनको न देवी देवताओं का
न समाज में प्रचलित मान्यताओं का
रह गया पहाड़ का आदमी
उस कचरे को साफ करता
अपने घर पहाड़ की सफाई करता
क्योंकि पहाड़ उसका अपना है
कोई घूमने की जगह नहीं
यहीं पैदा हुआ यहीं जियेगा
और एक दिन इसी पहाड़ पर
चला जायेगा दुनियां छोड़ कर
अपनों की दुनियां से मुंह मोड़ कर


- रवींद्र कुमार शर्मा


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तुम्हारी जात

ऐसे-ऐसे बोलते हैं हमें-
हमलोगों को रोज-रोज़
चमार तो कभी चमरोटा
कह कर बुलाते हैं।

ऐसे-ऐसे बोलते हैं हमें-
नाली के कीड़े जैसी
जात है तुम्हारी।
चमरा, चमरोटा कहीं का।

ऐसे-ऐसे बोलते हैं हमें-
नाली कितना भी साफ़ कर लो
साफ़ नहीं होती।
वैसी है तुम्हारी जात।

ऐसे-ऐसे बोलते हैं हमें-
अभी मारूंगा तो ,
पूरे कपड़े में हगते-मूतते
घर जाओगे अपने।


ऐसे-ऐसे बोलते हैं हमें-
तुमलोगों के ऊपर
थूकना चाहिए ,
और तुम्हारे जात पर भी।


ऐसे-ऐसे बोलते हैं हमें-
तुमलोग कभी नहीं सुधरोगे
ना ही कभी सुधरेगी,
तुम्हारी जात !


ऐसे-ऐसे कब तक बोलते रहेंगे?
कब तक इंसानियत का जनाजा निकालते रहेंगे ?
अब ज़माना जात का नहीं,
फ़ेसबुक, इंस्टा और व्हाट्सऐप का है।


- आनंद दास


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हे ! मानव

हे ! मानव तुम हो जाओ खड़े-2
खड़े कब से तू है सो रहा ।
सदियां यूं ही गुजर गईं
तूफानों में पड़े - पड़े
हे! मानव तुम हो जाओ खड़े।
इह लोक को भुला दिया तुमने
उस लोक में डूबे रहते हो।
देख नियंत्रण प्रकृति का
विस्मय में क्यों पड़ते हो ?
दुर्गुण को गले लगाते हो
सत्कर्म से पहले बड़े - बड़े।
हे! मानव तुम हो जाओ खड़े।
मध्यकाल से सोया है
अंखियां न खुलती तेरी हैं।
नहीं चेतना लौट सकी
गलती ही इसमें मेरी है।
स्वप्नों में तूने सजों लिए
हैं एश्वर्य बड़े - बड़े
हे ! मानव तुम हो जाओ खड़े- २
क्या नींद की गोली खा ली है ?
या असर पान मदिरा का है।
ऐसा प्रतीत मुझे होता है
जानें कब से तू सोता है।
भोर हुआ उठ जाओ खड़े
अधिकार छूट रहे बड़े- बड़े।
हे ! मानव तुम हो जाओ खड़े
मजहब की रोटी सेंक रहे।
वे मस्जिद और मजारों से
सत्ता का सुख भोग रहे हैं।
पर मजहब की तौहीरों से।
कट्टर और हठी बनते हैं
मजहब की तनकीदों से।
दूर जा रहे मुल्क के वो निज
कर्ण के जैसे अकीदों से।
विश्वास जीत लो तरुणों का
सिजदा कर देंगें बड़े - बड़े
हे ! मानव तुम हो जाओ खड़े।


- करन सिंह 'करुण'


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खर्चे बढ़ गए सभी के क्या करें इंतज़ाम
कोई चलाता खर्चों पर कैंची
कोई बढ़ाने में समझें अपनी शान,
प्रबन्ध सिखाता हमें कटौती करना
परेशान वृथा न हो इन्सान

रोना रोती रही सरकारें, त्राहिमाम करें किसान
बोझ कर्ज के तले डूब कर,
विवश हुआ था आत्महत्या को अन्नदाता
फ़िर भी क्या निकला परिणाम,
टोल प्लाजा, बैरियर घेरे,
बॉडर पर अनशन करे किसान,
बिजली पानी पर सेस लगा कर भी
सपने कहां हुए साकार
हालत किसी से छुपी नहीं थी
मंत्री नेता हुए थे परेशान

गरीब रोए सिर पर हाथ रख कर
अपना दुःख किसको बताएं ?
बताने की भी ग़र करें हिम्मत
कौन सुने फरियाद ?
बढ़ती महंगाई छुए आसमान
मालामाल होय धनवान,
कारवां गुजरता गया,गरीब देखता गया
कैसे गुजारा होगा आमजन का
मुझे बता प्रबुद्ध इन्सान


- बाबू राम धीमान


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कहानी- प्रॉमिस डे


लेखक- मोहन मीना



शिवदासपुरा वाली सवारियाँ आगे निकलें, आपका स्टैंड आ गया है। कंडक्टर की आवाज़ पर बातचीत का सिलसिला तोड़कर मानसी ने अपना बैग उठाया और मनन को बाइ बोलकर बस की गैलेरी में आगे बढ़ने लगी। रोज का सफर होने सें दोनों में अच्छी समझ हो गयी थी।




मनन का ऑफिस अगले स्टॉप पर आने वाला है। जब हम अकेले सफर कर रहे होते हैं तो सबसें ज्यादा अपने करीबी इंसान को याद कर रहे होते हैं। यह स्मृति तब और भी साफ होती है, जब पसंदीदा शख़्स हाल ही में हमसें दूर हुआ हो। मनन के मस्तिष्क में मानसी की हँसी और अधूरी बातें घूमे जा रही थी।

ज़िन्दगी भी एक बस स्टॉप की तरह ही होती है ना जाने किस मोड़ पर किससें मिला दे और किस मोड़ पर किससें बिछुड़ा दे। ऑफिस सें छूटते ही मनन ने मानसी को व्हाट्सअप मैसेज किया। हैलो! ‘यूनिक गर्ल’, मैं निकल गया हूँ। मानसी तो जैसे मनन के मैसेज का ही इंतज़ार कर रही थी, तुरंत रिप्लाई दिया- हाँ, मैं भी आ ही रही हूँ।




कुछ ही देर में 16 नंबर बस शिवदासपुरा बस स्टैंड पर दूर सें आती हुई दिखाई देती है। खचाखच भरी बस में मानसी यूँ प्रवेश करती है जैसे आर्मी की दौड़ में किसी जवान ने फ़िनिशिंग लाइन पार कर ली हो। चाहत इंसान को स्वार्थी बना देती है। बगल वाली सीट मनन सबसे ये बोलकर बचा लेता है कि यहाँ बैठी सवारी टिकट लेने गयी है। अपनी सीट पकड़ते ही मानसी इस खूबसूरत धांधली पर मनन सें कहती है कि शुक्रिया जनाब, पर अच्छे इंसान को ऐसी झूठ शोभा नहीं देती।

मनन कहता है- जानता हूँ साहब! पर इस दिल के संविधान के नियम सबके लिये अलग अलग होते हैं। मानसी समझकर भी अनसुना कर देती है और मन में चल रहे सवाल का जवाब चाहती है। वो मैं ये पूछ रही थी कि तुमने मैसेज में ‘यूनिक गर्ल’ क्यों कहा? कुछ कॉम्प्लिमेंट अनायास ही ऑक्सीटॉक्सिन हार्मोन रिलीज़ कर देते हैं। इसमें कोई बड़ी बात है क्या? आपके सिद्धांत, आपका पहनावा, आपके बात करने का लहजा, आपका व्यक्तित्व….





मनन की बात को बीच में काटते हुए मानसी ने कहा- बस.. बस जनाब! इतना भी मत चढ़ाओ मुझे। तुम लड़कियों की यही तो कमी है, सच को स्वीकारना नहीं है पर यह तो मेरे मन की आवाज़ है। मनन ने जोर देते हुए कहा। अच्छा! तो ये बात कितनी लड़कियों को बोल चुके तुम। मानसी ने तफ़री ली। मनन के पास इसका कोई प्रत्युत्तर नहीं था। बस स्टॉप आ चुका था। दोनों बस सें उतरकर अपने अपने घर की तरफ़ जाने लगे। मानसी ने कहा- शुक्रिया मनन! बेहद प्यारा कॉम्प्लिमेण्ट है। आप अपना खयाल रखना। ठीक है, आप भी अपना खयाल रखना। शाम को व्हाट्सअप पर बात करते हैं। मनन ने भारी मन सें विदा लेते हुए कहा।

हैलो! खाना खाया आपने? मानसी ने मैसेज किया। मनन तो कब से फोन हाथ में लिए मानसी के मैसेज का इंतज़ार कर रहा था। नीली टिक होते ही तुरंत जवाब आया- हाँ खा लिया। ज़्यादा वक्त ना ज़ाया करते हुए मनन ने मैसेज किया- आज प्रॉमिस डे है, तुम मुझसे कोई प्रॉमिस करोगी? हाँ मनन, बताओ क्या प्रॉमिस करूँ- मानसी ने रिप्लाई दिया। मैं मन, कर्म, वचन सें तुम्हारा सम्मान करता हूँ। प्यार की परिभाषाएँ मुझे ज़्यादा नहीं आती।




बस जो आपकी पहचान है, मेरा मतलब ‘यूनिक गर्ल’ वाली, इसको हमेशा बनाये रखना मानसी। आपसे भी ज़्यादा आपकी इस पहचान ने मुझे आकर्षित किया है। मनन ने एक ही मैसेज में अपनी संपूर्ण भावनाएँ ज़ाहिर कर दी। बहुत गहराई सें दो-तीन बार मैसेज को पढ़ने के बाद मानसी ने जवाब दिया- मैं तुमसें वादा करती हूँ मनन! मैं हमेशा अपने सिद्धांत और तुम्हारे द्वारा दिये गये ‘यूनिक गर्ल’ के कॉम्प्लिमेंट को संजोकर रखूँगी।

बस मेरी भी एक गुज़ारिश है कि कुछ कहानियाँ इसलिए ख़ूबसूरत होती है क्योंकि वो कभी पूरी नहीं होती। तुम भी वादा करो कि मेरे साथ अधूरी ख़्वाहिशों के साथ जीना स्वीकार करोगे? प्रेम, आलिंगन और मुस्कान की ईमोजी के साथ मनन ने सांकेतिक हामी भर दी। दोनों की आँखों सें अनायास आँसू निकलकर मोबाइल की स्क्रीन पर टपक रहे थे।


- मोहन मीणा, विमलपुरा (जयपुर)


07 February 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 08 फरवरी 2026




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सियासतों में फ़रेब छुपकर, अमन की बातें भी हो रही है,
लहू से भीगी है ज़मीं पर, वफ़ा की कसमें बड़ी नई हैं।

ग़रीब बस्ती में भूख गहरी, महल में दावतें हो रही है,
कफ़न भी मुश्किल हुआ है लेना, मगर इमारत बड़ी नई है।

कहीं पे बच्चा किताब ढूँढे, कहीं पे हथियार बाँटे जा रहे,
ग़ुलाम क़ौमें बता रही हैं, ये सल्तनत भी बड़ी नई हैं।

जो सच कहेगा, वो रद्द होगा, जो झूठ बोले, सर बिठाया जाए
जहाँ की रीतें बता रही हैं, रवायतें सब बड़ी नई हैं।

यहां हर इंसा लहू से रंजित, मगर तिजारत बड़ी हँसी है,
जहाँ के सौदागर अब दिखाएँ, अमन की क़ीमत बड़ी नई है।


- मधु शुभम पाण्डे


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थकी हुई सी ज़िंदगी

थकी हुई सी ज़िंदगी
हर मोड़ पर ठहर जाती है,
चलना चाहो भी तो अक्सर
ख़ामोशी साथ आ जाती है।

दिन उजाले में कट जाते हैं
रात सवालों में ढलती है,
किसने छीना अपने सपने
ये बात समझ न पलती है।

कंधों पर लदे फ़र्ज़ों ने
मन को धीरे झुका दिया,
खुद के लिए जो पल थे कभी
वक़्त ने सब चुरा लिया।

फिर भी दिल के किसी कोने में
एक सिसकी सी पलती है,
कहती है - “मैं ज़िंदा हूँ”
बस हालात से जलती है।

जिस दिन इस सिसकी को
आवाज़ मिल जाएगी,
थकी हुई सी ये ज़िंदगी
फिर से मुस्कुराएगी।


- रेखा चंदेल

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चलते रहना

जीवन की उलझी पहेलियाँ
धैर्य से सुलझाते रहना,
उत्तर न भी मिलें तुरंत
तो प्रश्न सँजोते रहना।

पथ यदि काँटों से भरा हो
तो भी पग न ठहराना,
राह कठिन हो-
बस चलते रहना।

बाहर के शोर में न खोकर
अंतर में दीप जलाते रहना,
ओठ चुप हों यदि कभी
मन से मुस्कराते रहना।

जब मन अपने ही बोझ से
थककर बैठना चाहे,
तब कुछ आदतें, कुछ सोचें
धीरे-धीरे बदलते रहना।

यदि भीतर कहीं
रिक्तता, अभाव,
सूनापन दिखे-
तो शिकायत नहीं
सृजन से भरते रहना।

हार, विराम नहीं होती
यह याद रखते रहना,
जीवन साधना है मित्र-
राह कठिन हो
तुम चलते रहना।


- नरेंद्र मंघनानी


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मां भारती की शान

गीत वह महान है मां भारती की शान है
रोम- रोम में वसा हिंदोस्ता की जान है।
गा-गा के जिसको चल पड़े फिरंगियों से लड़ पड़े।
देखी थी शक्ति गीत की उम्मीद फिर थी जीत की।
गीत की इस शक्ति ने चूल को हिला दिया,
वस कुछ समय के और हो उनको सही बता दिया।
वृत्तांत सुन उनके मस्तिष्क में अवसान था।
गीत वह महान है मां भारती की था।

जिसने बनाया हिंद की आजादी का था रास्ता,
मिलकर हुए सभी खड़े दे स्वाधीनता का वास्ता।
कोशिश करी थी तोड़नें की एकता निज हिन्द की
वैरियों की चाल जिसमें न सफल है हो सकी।
भंग हुआ विच्छेद फिर बंगालियों की भक्ति से
हो गये सफल तभी इस गीत की शक्ति से,
एकीकृत बंगाल का त्याग निज महान था।
गीत वह महान है मां भारती की शान था।

बंगाल के जुड़ाव से ये यात्रा बढ़ने लगी
जन- जन के मुख पर गीत से वह शक्तियां हिलनें लगी।
भानू न अस्त होता था जिसके शासनकाल में,
वो फिरंगी फंस गये थे मातरम् के जाल में।
गीत ये जाल जो आजादी की मशाल था
गीत वह महान है मां भारती की शान था।

आजादी के संघर्ष में वस गीत ही आस था
हर श्वास में ऐसा लगा मां भारती का साथ था।
मां की ममता पाने को सब लामबंद हो गये,
हो गया आजाद हिंद आजाद सब हैं हो गये।
आजाद हिंद हो गया यह गीत स्वाभिमान है
गीत वह महान है मां भारती की शान है।


- करन सिंह "करुण"


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हरारत नहीं रही

कभी भी सच कहने से हमें डर नहीं लगता।
जी हुज़ूरी इल्म का मेरे हिस्सा नहीं रही।

ज़मीं-आसमां से कभी मिलती ही नहीं है।
जुगनूओं की शोलों से कभी यारी नहीं रही।

हिन्दू-मुसलमां के बीच अब दीवार आ गई।
अलगू और जुम्मन में पहली सी यारी नहीं रही।

तारीफें हुस्न-इश्क की अब तब्दील हो गईं।
बाज़ार-ए-हुस्न में कोई चीज़ महंगी नहीं रही।

मंज़िल पर निगाह तो कोई रोक नहीं सकता।
कहता हूँ तुझमें जोश व हिम्मत नहीं रही।

चाँद भी वही चांदनी भी वो ही है मुश्ताक।
रिश्तों में मगर वो पहली सी हरारत नहीं रही।

- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह


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बात ख़त्म

तुम बोलो या ना बोलो,
हमको सुनना है बात ख़त्म।

हो चाहे जिसके भी तुम ,
तुम बस मेरे बात ख़त्म।

चाहा बहुत, न चाहे तुमको,
पर ये हो गया बात ख़त्म।

बिना छुए ही छुए हृदय को,
दिल में बस तुम हो बात ख़त्म।

दूरी, उम्र, बचकानी बातें
भर दिए बचपना बात ख़त्म।

जो कहना था, कह चुका मन,
अब क्या कहना बात ख़त्म।


- सविता सिंह मीरा


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अगर मेरे हिस्से भी कभी
ज़माने की रंगतें आई होतीं,
जवानी के शौक़,
खुलकर हँसने की इजाज़त,
और सपनों को जीने की
आज़ादी मिली होती…
तो इस रंगीन दुनिया में
यूँ ख़ामोश, बेरंग रहना
मुझे कभी रास न आता।
मैं भी चाहती
हवा के साथ उड़ना,
भीड़ में खोकर खुद को पाना,
हर रंग को बिना डर के अपनाना।
पर हालातों ने मेरे हाथों में
ज़िम्मेदारियों की स्याही थमा दी,
और मैंने
ख़्वाहिशों के रंग दिल में ही सहेज लिए।
लोग कहते हैं,
तुम सादा सी रहती हो,
पर क्या किसी ने पूछा कि ये सादगी
चुनाव थीया मजबूरी?
मैं बेरंग नहीं हूँ,
बस वो रंग जो मुझे मिलने थे,
किसी और के हिस्से चले गए…


- आरती कुमारी


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संख्याओं का मेला

आओ बच्चों तुम्हें सुनाएँ, एक अनोखी बात,
संख्याओं की दुनिया से, करवाएँ मुलाक़ात।
रेखा पर जो सजती हैं, सबको साथ बुलाती हैं,
"वास्तविक संख्याएँ" वो, जग में जानी जाती हैं।
एक, दो, तीन से गिनती शुरू, "प्राकृतिक" इनका नाम,
शून्य (0) को जब जोड़ लिया, तो बना "पूर्ण" का धाम।
सीधी-सादी, प्यारी-प्यारी, गिनती में ये आती हैं,
वास्तविक संख्याओं का, ये आधार बनाती हैं।

प्लस (+) की दुनिया दाईं ओर, माइनस (-) बाईं ओर जाए,
शून्य खड़ा है बीच में, सबको राह दिखाए।
ये सब मिलकर कहलाते, "पूर्णांक" प्यारे भाई,
घटने और बढ़ने की, इन्होंने रीत बनाई।

बटे (p/q) में जो लिख जाएँ, "परिमेय" नाम कमाएँ,
जैसे आधा (1/2) या हो पूरा, सब इसमें मिल जाएँ।
लेकिन जो न रुक पाएँ, जैसे पाई (π) या रूट (√2),
"अपरिमेय" हैं वे संख्याएँ, जो चलतीं बेछूट।

चाहे दशमलव शांत हो, या हो वो अशांत,
वास्तविक संख्या के घर में, सब रहते हैं शांत।
संख्या रेखा इनका घर है, यही इनकी पहचान,
गणित की इस दुनिया का, ये ही हैं सम्मान!


- देवेश चतुर्वेदी


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इज़हार-ए-मोहब्बत

​खामोशियाँ बेइंतहा हुईं, अब कुछ कहना जरूरी है,
दिल में दफन है जो अफसानें अब बताना जरूरी है।

यूँ तो हर दिन उनकी यादों की महक साथ रहती है,
मगर आज इस महक को हकीकत बनाना जरूरी है।

मोहब्बत में फिजूल के वादे-दांवे नहीं किया करते है,
प्रेम को सिर्फ मर्यादाओं के साथ निभाना जरूरी है।

इश्क में इरादा बस इतना कि उम्र भर चलना है,
​छोटी-छोटी खुशियों में प्रेम में रंग भरना जरूरी है।

इश्क में साथ चलने से मंजिलें आसां हो जाती है,
इस मोहब्बत की यादों का कारवां बनाना जरूरी है।

मोहब्बत के सफर में बिना कहे हाथ थमते हैं,
​सब रास्ते मुकम्मल होंगे, बस साथ देना जरूरी है।


- दीपक कोहली


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खिड़की खुली है

क्यों अब भी कुछ बचा है
सब कुछ कहने के बाद भी,
खिड़की खुली है,
दरवाजा बंद होने के बाद भी।

भौरों को फूलों से मिलना है
चकोर को भी राह चांद का तकना है।
कौन खींच रहा किसको_
ये मुश्किल समझना है।

नदियां खल खल लांघती,
सागर की आगोश
में सामने को।
मोर नाच रहा पंखे फैला,
बता रहा वो भी दीवाना है।

लहरें उछले पूनम की रात,
प्यारे चांद को पाने को,
परवाने भी पीछे कहां,
समा की एक झलक काफी है,
जान लुटाने को।

अधूरेपन को पूरा करने की,
अभिलाषा सबमें जागे।
सब अपने चहेतो के पीछे,
शायद इसी लिए भागे।

इस अधूरापन से ही मन बाऔराए ,
कोई अपने होश में न रह पाए।

ये अधूरापन ही प्यार है,
नहीं तो क्यों फूल खिले,
चकोर चांद को ताके
और नन्ही बुलबुल गीत गाए।


- रोशन कुमार झा


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परदे के पीछे

सिंहासन दिखता, राजा दिखता,
पर सूत्र कहीं और हिलते हैं,
जनता सोचती- हम चुनते हैं,
पर फैसले और ही बनते हैं।

काग़ज़ पर चलता लोकतंत्र,
मन में चलता व्यापार बड़ा,
सच बोलने वाला अकेला,
झूठ का मेला फैला पड़ा।

परदे के पीछे जो हाथ हिलाए,
वह दीपक नहीं- छाया बनता,
डर से चलता शासन सारा,
न्याय कहीं खोया रहता।

लेकिन सुन लो, हे मानव प्यारे,
यह अंधकार स्थायी नहीं,
जब मन सत्य से जुड़ जाता है,
भय खुद ही हार मान जाता है,
Deep State हो या झूठी सत्ता,
सब मिट जाता है।

राज न टिके, षड्यंत्र न टिके,
न टिके अहं का भारी भार,
वही सच्चा शासक, वही सरकार।


- नरेंद्र मंघनानी


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इश्क के इस दौर में
हम भी दिल दे बैठे
ज़माने की फितरत में
मन परवाज़ उड़ा बैठे
वन वीक सीरीज के दौर में
कमबख्त! हम किताबों से
जिगर लगा बैठे...
वाट्सअप यूनिवर्सिटी के भ्रमजाल में
हम नासमझ
रेफ्रेंस बुकों में माथा खफा बैठे
जंगल की आग में
बर्फ का गोला बन बैठे
यह जिगर है मानता नहीं
हम मानवता को गले लगा बैठे
बचपन में जिस कागज़ से
नाव बनाते रहे
आज उसी कागज़ पर
पेन की पतवार खै रहे
कमबख्त पेन से स्याही
क्या खलक गई
मैं लिखता मोहब्बत रहा
वो इंकलाब लिख गई


- जितेंद्र बोयल


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