साहित्य चक्र

15 July 2026

लघुकथा- "याद का बहाना"






"मम्मी, अभी नहीं... शाम को ले आएँगे।"

मेरे इतना कहते ही माँ की आँखें कहीं दूर टिक गईं। धीमे स्वर में बोलीं, "तुम्हारे पापा होते, तो मेरी बात टालते नहीं। धनिया पत्ता भी कहना पड़ता, तो उसी वक्त ले आते।"

घर में एक पल को सन्नाटा छा गया। हम भाई-बहन एक-दूसरे का चेहरा देखते रह गए। शब्द किसी के पास नहीं थे, केवल एक अनकहा अपराधबोध था।

तभी मन ने समझाया- माँ को शिकायत धनिया पत्ते की नहीं थी; वह तो बस यादों का एक बहाना था। दरअसल, उन्हें आज भी उस व्यक्ति की कमी खलती है, जिसने जीवन भर उनकी हर छोटी-बड़ी इच्छा को अपने प्रेम का सम्मान समझा।

सविता सिंह मीरा 
जमशेदपुर

 

जीवन का 'शून्य' और हमारी भागदौड़ का अर्थ


जीवन की पूरी यात्रा एक ऐसे अंतहीन राजमार्ग की तरह है, जहाँ हम अनगिनत पड़ावों को पार करते हुए एक मंज़िल की तलाश में जुटे रहते हैं, पर क्या हमने कभी ठहरकर यह सोचा है कि इस आपाधापी, इस अथक श्रम और भौतिक संसाधनों के संचय के अंत में हमारे हाथ क्या लगेगा? हम 'कर लूँ जमा दौलत-ओ-ज़र, उसके बाद क्या?' के उस बुनियादी सवाल को अक्सर अपनी व्यस्तताओं के शोर में दबा देते हैं, जबकि यही वह प्रश्न है जो हमें इंसान होने की सच्ची परिभाषा से रूबरू कराता है।





दरअसल, हमारी तमाम उपलब्धियां, सजे-धजे आशियाने और दुनियावी शोहरत का गुमान, वक्त की रेत पर बनी उन लकीरों की तरह है जो पहली लहर के साथ ही अपना अस्तित्व खो देती हैं। साहित्य और शेर-ओ-शायरी केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि उस रूहानी ठहराव का आईना हैं, जहाँ हम अपनी रूह से मिलते हैं, और जब हम अपनी भावनाओं को ग़ज़ल के सांचे में ढालते हैं, तो हम केवल शब्द नहीं गढ़ते, बल्कि उन अनकहे सच को कागज़ पर उतारते हैं जो भीड़ में कहीं खो गए थे।

जीवन का शाश्वत सत्य तो वही है कि 'उठी थी ख़ाक, ख़ाक से मिल जाएगी वहीं', यह एक ऐसा दर्शन है जो हमारे भीतर के अहंकार को गलाकर करुणा की खाद बनता है, क्योंकि यदि हम यह हृदय से स्वीकार कर लें कि मिट्टी से बने इस पुतले को अंततः उसी मिट्टी में विलीन होना है, तो फ़िर नफ़रत, द्वेष और पद-प्रतिष्ठा के मोह का कोई औचित्य शेष नहीं रह जाता। हमारा जीवन महज़ एक सांख्यिकीय डेटा या संपत्तियों का लेखा-जोखा नहीं है, बल्कि यह उन निश्छल पलों का समूह है जो हमने किसी के दुःख को साझा करके, किसी के चेहरे पर मुस्कान बिखेरकर या अपनों की आँखों में प्रेम बनकर जिए हैं।

अंततः, जब ज़िंदगी का चिराग़ बुझने को होगा, तब दौलत और पद की रसीदें नहीं, बल्कि हमारे द्वारा किए गए परोपकार और प्रेम की ख़ुशबू ही हमारे साथ जाएगी, इसलिए इस यात्रा के दौरान उस 'शून्य' को पहचानना आवश्यक है जहाँ हम सब एक समान हैं, ताकि अंत में जब यह सवाल ज़हन में उठे कि 'उसके बाद क्या ?', तो हमारे पास उत्तर में पछतावे की जगह एक संतुष्ट मुस्कान हो।


- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़



आज की प्रमुख रचनाएँ- 15 जुलाई 2026





अपने-अपने कामों सब व्यस्त
किसके पास वक्त है साकी ?
मकड़जाल में ऐसे फंसे
नज़र रखना नहीं है बाकी,

पहले चाय पर घंटों बातें
अब मैसेज का ज़बाब नहीं है साकी,
दिल के रिश्ते रूक से गये हैं सब,
बस लाईक-कमेन्ट की जंग है बाकी,

फ़िर भी कोई पूछ ले-"कैसे हो" ?
तो लगता है दुनियां बची है अभी,
एक फ़ोन, एक मुलाकात से
मकड़जाल के तार कट जाते हैं सभी,

अँधेरे के बाद ही रोशनी
आखिरी उम्मीद बची है अभी बाकी,
दिल का चिराग़ जलाकर
चलना भी एक इबादत है साकी।


- बाबू राम धीमान


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मातृभूमि

मातृभूमि में होता मार्मिक शक्ति
कई जाती धर्मों की अपार भक्ति
भिन्नत्व में एकत्व का महान शक्ति
सब केलिए आवश्यक देश भक्ति।

मातृभूमि से मिला है पदार्थ
बहू मूल्य संपदा है यदार्थ
इसको बचाना है निस्वार्थ
हम को मिला है परमार्थ।

मातृभूमि पर होता मंदिर
प्रभू केलिए जाता अंदर
लोक पूजा करता प्यार
इसे मिला भक्ति अपार।

नदियां बहती निरंतर निर्मल
पेड़ पौधों देता है परिमल
प्रकृति शोभा बढ़ता बेमिसाल
स्वच्छ पर्यावरण बदलता सरल।

मातृभूमि हमारेलिए कर्मभूमि
मातृभूमि हमारेलिए शक्तिभूमि
मातृभूमि हमारेलिए स्वर्ग भूमि
मातृभूमि हमारेलिए पुण्यभूमि
इसे मातृभूमि का सम्मान करना।


- श्रीनिवास एन
आंध्रप्रदेश

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बरगी डैम को समर्पित

जंग लड़ रही हूँ, हारी तो तेरे साथ
जीती तो भी तेरे साथ
कोशिश सर से पाँव तक करूँगी
अपनी हर साँस तुझमें भरूँगी
जरूरत पड़ी तो खुद डूब जाऊँगी
पर तुझे अकेले नहीं छोड़ पाऊँगी
लड़ूँगी किस्मत से, भगवान से
जब तक हूँ तेरे साथ हूँ
लड़ूँगी इस तूफान से
नहीं हूँ तो मुझे माफ करना
एक माँ हार जायेगी,
फिर भगवान से...


- नंदिनी


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​अब शौक़ क्या बाकी, क़लम-ए-बे-असर लिखने का,
खून ए जिगर से जो लिखा मैंने,उसने पढ़ा ही नहीं।

​किताब-ए-इश्क़ में शामिल था मेरा ज़िक्र भी शायद,
उसे इतनी फ़ुर्सत ही कहां सफ़ा वो पलटा ही नहीं।

​सीने में दबी ख़ामोशियाँ वो भी शोर से कम न थीं,
उसने कभी ग़ौर से उन लफ़्ज़ों को सुना ही नहीं।

​बिख़र कर रह गए हम आईना-ए-दिल की तरह ऐसे,
कोशिश तो की, मगर टूटा जो दिल वो जुड़ा ही नहीं।

हजूम-ए-शहर में गुमनाम हम ऐसे हुए ,'मुश्ताक़'
न हुई ढूँढने की कोशिश और मैं मिला भी नहीं।


- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह


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उर्दू दोहे

इतना ग़ुरुर मत करो, कौन यहाॅं है साथ,
सब मरने के बाद में, छूकर धोते हाथ।

जीवन तो इक वहम है, कर्मों का है खेल,
सच तो है बस मौत ये, दुनिया है इक जेल।

कर्म सही तो सब सही, पटरी पर है रेल,
बुरा भला कोई नहीं, क़ुदरत का सब खेल।

वैद्य डॉक्टर को यहाॅं, सब कहते भगवान,
कुछ सौदागर लाश के, बेच रहे ईमान।

हिम्मत सब में है नहीं, सच कहने की बात,
सच को सच कहता वही, जो सच पर दिन रात।

आज यहाॅं तो कल वहाॅं, जग में फिरे फ़क़ीर,
अच्छे दिन के आस में, नैनन बरसे नीर।

सच से फ़ुर्सत है नहीं, कैसे बोले झूठ,
उसकी दुकान झूठ की, धन्था है मत रूठ।

भाग गया सलवार में, डर की ऐसी पीर,
सबको योग सीखा रहा, कहता खुद को वीर।

फ़रियादी अब कर रहे, क़ातिल से फ़रियाद,
बुज़दिल इतना मत बनो, सब कुछ हो बर्बाद।

राजा अच्छा है वही, कर जो करे मुआफ़,
भेद-भाव भी मत करे, सही करे इंसाफ़।

सजा ज़िना-बिल-जब्र की, फाॅंसी मिले कठोर,
मौत डरे जब मौत से, देख मौत का शोर।


- निज़ाम फतेहपुरी


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उम्र-सीमा

सबकी अपनी-अपनी सीमाएँ हैं,
पर, कवि की कल्पना की कोई सीमा नहीं है।
नौकरी में भी उम्र-सीमा है,
प्रतियोगिता कविता लिखने में भी उम्र-सीमा है,
लेकिन, लाचार , बेबस, बेसहारा
बेरोज़गार व्यक्ति की कोई उम्र-सीमा नहीं है।


- चेतना सिंह 'चितेरी'


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ऐ गुजरा जमाना तेरा शुकराना
तुझे मैंने जिया, तेरा शुकराना
तूने मुझे सीखों का समंदर दिया
मैं अदना सा मानुष,
तेरे एहसानों को कैसे चुकाऊं ?
बस लफ्जों से बार-बार, हर बार
तेरा शुकराना करूं...


- दीपक कोहली


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काश! मैं भी
एक पुरुष होती।
हर वो काम करती,
जो मेरा मन करता।
जहां दिल करता,
वहां घूमने जाती।
कभी अकेली तो
कभी दोस्तों के साथ
मौज करती... काश!
मैं एक पुरुष होती।


- रेखा चंदेल


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कभी जब किसी से न हारी मुहब्बत।
मज़े में रही ये हमारी मुहब्बत।

कभी मिल गए हमसफ़र रास्ते में,
कभी बस अकेले गुज़ारी मुहब्बत।

निगाहें छुपाकर, निगाहें लगाकर,
यूंँही बच-बचा कर निहारी मुहब्बत।

जहाँ पास देखा इक मौका सुनहरा,
वहाँ ठीक हमने उतारी मुहब्बत।

बुलाकर,बताकर ,मनाकर,हँसाकर,
हमेशा यूँ हमने सँवारी मुहब्बत।

जहाँ भी मिले जान पहचान वाले,
वहाँ हमने अपनी बघारी मुहब्बत।


- नवीन माथुर पंचोली


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नज़रिया

कोई सम्भलकर चला,
कोई गिरकर सम्भला है।
किसी को मालूम ही नहीं,
ये चलना क्या बला है।

क्या अच्छा, क्या बुरा—
सबका अपना पैमाना है।
जिस पर बीतती है,
उसी ने दर्द को जाना है।

कोई चाँद भी छू आया,
फिर भी ख़ुद को तन्हा पाया है।
कोई उलझनों में उलझकर भी,
हर रिश्ता दिल से निभाया है।

रूप अनेक हैं जग में,
हर चेहरे का अपना रंग है।
कोई बुरा होकर भी
किसी की दुआओँ के संग है।

सबकी नज़र अलग है,
सबका नज़रिया जुदा है।
किसी के लिए पत्थर में ख़ुदा,
तो कहीं ख़ुद ही पत्थर बना है।

इसलिए छोड़ो दुनिया की
अच्छी-बुरी सौ बातें।
बस ऐसा जीवन जी जाओ,
जो बन जाए सबकी सौग़ातें।

जब नाम तुम्हारा आए,
याद आएँ तुम्हारे कर्म।
यही रहे असली दौलत,
यही रहे जीवन का मर्म।


- रोशन कुमार झा


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बैल हूँ मैं कभी मेरा भी था ज़माना

जब निकला खाने की तलाश में इधर उधर
तो मैं आवारा हो गया
लोगों को अब मैं अच्छा नहीं लगता
मेरी शक्ल देखना भी ना गवारा हो गया

जब तक ताकत थी मुझमें
मैंने पूरा जोर लगाया
खेतों में फसलें लहलहाई
उम्मीद से ज़्यादा अन्न उगाया

कंधे मेरे दुख गए हल खींचते
फिर भी मैंने जोर लगाया
सुहागे पर बजन भी रखा खूब दबाया फिर भी
चुपचाप चलता रहा न चीखा न चिल्लाया

कभी खूब खिलाते थे मुझे
रखते थे मेरा भरपूर ख्याल
छोड़ दिया घर से अब हो गया आवारा
देखते ही दौड़ते हैं मारने ऐसा हो गया अब हाल

समय का खेल है बदल गया ज़माना
कभी सेवा की थी अब मुझ पर है सबका निशाना
ऐसा लगता है जैसे जीवन नरक बन गया
वह भी दिन थे जब मुझको मिलता था सबसे पहले खाना


- रवींद्र कुमार शर्मा


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हवा तुम कितनी कोमल हो कि तुम
लिपटी हो मेरे आसपास
चिपकी हो मेरे सीने से
बैठी हो मेरे काँधे पर
नन्ही बिटिया की तरह
पर तुम्हारे वज़न का अहसास ही नहीं होता

हवा तुम कितनी भारी हो
कि तुम्हारे वज़न से दबकर
बड़े बड़े पेड़ उखड़ जाते हैं
छोड़ देते हैं ज़मीन

हवा तुम बहुत प्यारी हो
तुम मेरे जीवन में समाई हो
तुम रूठीं तो यह जीवन रूठा
साँसों का काफ़िला यहीं छूटा


- अजय नेमा


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मैं कौन हूँ

मैं संजीदगी से
मुस्कान भरे
कुछ गीत
सुनाया करता हूँ
जो आँसू मुझको
देते हैं
मैं उनको भी
हंँसाया करता हूँ
मैं जनता का ही
सेवक हूँ
राष्ट्र निर्माण का मैं
अधिनायक हूँ
मैं सेवा में ही
निरत रहूँ
मैं सीधा सादा
अध्यापक हूँ
अभिभावक भी
कहते हैं
मैं विद्या को
महकाता हूँ और
बच्चों को
चहकाता हूँ।


- भुवनेश मालव


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11 July 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 11 जुलाई 2026





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अमीरी-गरीबी

अमीरी

ब्याव शादी
उछब रै माथे
नूवा रूतबा
गाड्या रो काफिलों
अमीरी रा
लखण कम
मांगत रा खाडा
घणा गिणिज्ये!

ग़रीबी

ॳक पग
चुल्हा माथे टांग
भींत लफ
चानों पकड़
छात री मुडेर
चढ़णों
ग़रीबी नीं गिणिज्ये।


- डॉ जितेन्द्र कुमार बोयल


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जीतेंगे हम ये वादा करो।
कोशिश हमेशा ज्यादा करो

उड़ान इतनी ऊंची रखो।
कि आसमान भी छोटा लगे

इरादा इतना बड़ा रखो।
कि हर सपना अपना लगे

परिस्थिति चाहे कितनी भी खराब क्यों ना हो,
एक न एक दिन बदल ही जाएगी,

जो तुझे गिराना चाहे,
उनसे ऊंची उड़ान भरो,

मुश्किल चाहे,कितनी भी आ जाए
हर परिस्थितियों से लड़ना सीखो।

जीतेंगे हम ये वादे करो।
कोशिश हमेशा ज्यादा करो।


- सृष्टि कौशल


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टूटते रिश्ते और बदलती प्राथमिकताएं

आज प्राथमिकताओं के आगे रिश्ते कहाँ हैं टिकते
अनमोल जो होते थे कभी आज कौड़ियों के भाव हैं बिकते
कभी रिश्तों में हुआ करती थी शहद से भी ज़्यादा मिठास
घाव ऐसे मिल रहे हैं रिश्तों में जो ताउम्र धीरे धीरे हैं रिसते

आज प्राथमिकता नहीं है रिश्तों को बचाना
आज आदमी का लक्ष्य है केवल पैसा कमाना
हंसते हुए किसी को देख नहीं सकते
काम रह गया है केवल दूसरों को रुलाना

एक बच्चा है परिवार में उसे रिश्तों की क्या पहचान
भाई बहन बुआ मासी चाचा चाची का नहीं है ज्ञान
नारी का सम्मान कैसे करेगा दिल से कोई
जब उसके मन में ही नहीं है नारी का सम्मान

बूढ़े माता पिता को नहीं रखना चाहता कोई साथ
संवेदनहीन हम हो गए बिगड़ रहे हालात
सिर्फ पैसे की एहमियत है सबके लिए
ज़िंदा नहीं किसी के मन में अब जज़्बात


- रवींद्र कुमार शर्मा


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हमारी दुआ

तुझे हमारी दुआ लग जाए, 
खुश रहे सदा तू,
तुझे सारी खुशियांँ मिल जाए। 
बेचैन है आज दिल मेरा , 
 तेरे बिन कटे न ये दिन-रात
दुआ करती हूंँ रब से, 
तेरी  मांगी मुराद पूरी हो जाए। 
तू सदा खुश रहे, 
तुझे हमारी दुआ लग जाए। 

फिक्र न करो मेरी बिटिया, 
अभी काउंसलिंग हो रही है,  
जैसे-जैसे बीटेक में ,
सीटें क्लोज होती जा रहीं हैं, 
वैसे - वैसे  तेरी चिंताएं बढ़ रही हैं
मनचाहा कोर्स न मिलने पर , 
दु:खी ना हो, 
कदम-कदम पर जिंदगी में चुनौतियांँ हैं, 
लड़ना सीख लें तू इनसे, 
तू मेरी प्यारी बिटिया है,
पढ़ोगी भी ! आगे बढ़ोगी भी
उम्मीद पर  ही दुनिया कायम है।
मांँ की दुआओं का असर हो इतना, 
तेरी सारी मुश्किलें दूर हो जाए। 

तेरे चेहरे पर मुस्कान देखने को, 
आतुर हैं मेरे नयन , 
तू सदा खुश रहे, 
तुझे हमारी दुआ लग जाए। 


- चेतना सिंह 'चितेरी'
प्रयागराज, उत्तर प्रदेश


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ग़म की तलब

पटक के सर हर तरीकों से,
अब मैं हार चुका हूं।
मान अपनी हार मैं,
अब कहीं जाकर झुका हूं।
जरूरत हो तुम, समझा न सका तुझे,
अब तो ग़म की तलब है मुझे...

छोड़ दी सारी बदमाशियां अब,
लौटूंगा नहीं अब उस ओर कभी फिर।
मजबूरियां हैं कि सांसें चलाए जा रहा हूं,
जीता नहीं हूं अब ख़ुद की खातिर।
हैं ख़्वाहिशों के हर शमां दिल के बुझे,
अब तो ग़म की तलब है मुझे...

न जीतने की ज़िद बची है,
न हार जाने का कोई डर।
लंबी उड़ान का परिंदा था कभी,
अब ख़ुद ही पंख लिए अपने कतर।
न दिन की खबर अब न रात सूझे,
अब तो ग़म की तलब है मुझे...

डूबा रहता हूं नशे में हरदम,
कि तेरी यादें छू न पाए।
दर्द तेरे खालीपन का कभी,
मुझे अब ना रुलाए।
होगा नहीं पर कोशिश है भुलाने की तुझे,
अब तो बस ग़म की तलब है मुझे...


- कुणाल


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भीतर का वृक्ष

मन की धरती पर
एक वृक्ष उग आता है,
जब पीड़ाएँ
शब्दों का साथ छोड़ देती हैं।
उसकी हर शाख पर
अनकहे दिनों का इतिहास टंगा होता है।

भीतर सिकुड़ा हुआ मन
जब स्वयं को बाँहों में भर लेता है,
तब समझ आता है
सबसे कठिन यात्रा
दुनिया से नहीं,
अपने ही भीतर से होकर गुज़रती है।

जड़ों की तरह
कुछ स्मृतियाँ बहुत गहरी होती हैं,
वे दिखाई नहीं देतीं,
पर जीवन का हर कंपन
उन्हीं से जन्म लेता है।
उन्हें काटना नहीं,
समझना पड़ता है।

सूखी डालियाँ भी
हर बार मृत्यु का संकेत नहीं होतीं,
कभी-कभी वे
नई हरियाली के लिए
पुराने दर्दों का त्याग होती हैं।

इसलिए
जब भी मन उजाड़ लगे,
अपने भीतर उगे उस वृक्ष से मिलना
वही सिखाएगा कि
सबसे गहरे अँधेरों में भी
जीवन, जड़ों से फिर जन्म लेना जानता है।


- डॉ. सारिका ठाकुर 'जागृति'
ग्वालियर, मध्य प्रदेश


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थोड़ा थक गया हूं काम करते-करते,
तुम थोड़ी मुस्कुरा दोगी क्या ?

यह शीशा बहुत उदास लग रहा है,
कुछ देर तुम इसके सामने आ जाओगी क्या ?

आसमान के सारे तारे, हमारे घर को क्यों घूर रहे हैं,
कही तुम फिर वही ड्रेस पहन कर छत पर आ गयी क्या ?

आज मेरा मन बार-बार तुझे ही क्यों देखना चाह रहा हैं,
कही तुमने फिर से वही बिंदी लगा ली क्या ?

मेरी किताबों से आज इतनी महक क्यों आ रही हैं,
कही तुमनें इन्हें फिर से छू लिया क्या ?


- दीपक बारुपाल


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अंतहीन सफर

इतनी डोर से बंधा हूँ,
कुछ पता नहीं।
सजा उसमें भी मिली,
जिसमें मेरी खता नही।

अंतहीन सफर पर चला हूं,
मंज़िल का कुछ पता नहीं।
नागफणी सा हो गया हूं,
गले लगाने को कोई लता नहीं।

एक तरफ कायनात सारी,
दूसरी ओर मैं अकेला।
फिर भी देखता हूं,
नियति का खेल,
कब तक चलता है।

ना उम्मीदी का मौसम ठहरा,
या किस्मत का मिजाज़ बदलता है।


- रोशन कुमार झा


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सबर

लक्ष्य हासिल करना है तो सबर रखो
फिर तू परिणाम देखो।
जिसने भी संघर्ष किया, मेहनत किया
सबर रखे तो परिणाम अनुकूल पाया।
समझना हो सबर के परिणाम तो
अपने आस-पास के लोगों को अनुकरण देखो।
माली बगीचे में, किसान खेते में,
पल नहीं दिन नहीं, महीनों है बिताते,
सबर है रखते, फिर उसे उचित परिणाम है मिलते।
अतः कुल मिलाकर चुन्नू कवि यही है समझाते,
कि जीवन में लक्ष्य प्राप्ति वास्ते,
सबर रखना जरूरी है होते।
हालांकि सबर करना थोड़ी कठिन है भले,
लेकिन शनै-शनै वक्त कट ही जाता है
अंत समय में सबर का परिणाम मिलने पर
मन प्रफुल्लित हो ही जाते है।


- चुन्नू साहा


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फिर जग में न आऊंगी

हवस के भूखे दरिंदो,
हवस की ये तुम्हारी भूख,
कब और कैसे शांत होगी ?

जिसका जीवन किया बर्बाद,
उसकी सांसों की डोर तोड़कर,
क्या तुम्हारे मन में रही होगी ?

उसकी आत्मा को कचोटते वक्त
शरीर को बेरहमी से रौंदते वक्त,
तुम्हे अपनों की याद नहीं आई होगी ?

इक जीवन की ही नहीं,
इक पीढी की ही नहीं,
वो कितने जनों की आस रही होगी ?

मन आतंकित आशंकित जुबां दबी होगी,
डरी सहमी जब गिरफ्त में आई क्रूर पंजों की,
छटपटाती बेबस लड़की होने को कोसती होगी ?

दर्द के आगोश में डूबती निगाह,
अनंत दर्द से भरी टूटती सांस,
फिर जग में न आऊंगी ये सोचती होगी ?


- राज कुमार कौंडल


*****


कहो ना

क्यों प्रतीत होता है ऐसा,
कि वह अशरीरी
होकर भी सर्वत्र है।

प्रातः की उन
अर्द्ध-उन्मीलित पलकों में,
धूमिल सुगन्धित समीर के
उन झोंकों में,
जो देह को नहीं,
अंतर्मन को स्पर्श कर जाते हैं।

अकारण ही...
जब कोई
स्वयं को रिक्तता में पाता है,
तब एक अदृश्य स्पर्श
मौन भाव से उसे
आवेष्टित कर लेता है,
जैसे कोई परम आत्मीय
समीप होकर भी,
दृश्यमान नहीं होना चाहता।

विस्मयकारी है न ?
मौन की पराकाष्ठा में भी,
स्पंदन उस अनिवर्चनीय की
ओर मुड़ जाते हैं।

जब शब्द निद्रामग्न हो जाते हैं,
तब अंतस की गहराइयों से
कोई मृदु स्वर में उसे पुकारता है,
और चित्त व्याकुल हो उठता है
इस संशय में कि
वह 'अन्य' नहीं,
अपितु निज के ही भीतर
अधिष्ठित है।

कहो ना...
यह आसक्ति है,
वंदना है,
या पूर्वजन्म की
कोई अपूर्ण स्मृति ?

या फिर... समस्त
चराचर जगत,
इसी प्रकार किसी
गुढ़ रहस्य केअदृश्य
पाश में आबद्ध है ?

क्या तुम्हारा अपना
हृदय भी स्वयं से
यही प्रश्न करता है ?
क्या तुम भी उसी
व्याकुलता से निज के भीतर,
किसी क़ो खोजते हो ?

कहो ना! कहो ना...


- सविता सिंह मीरा
जमशेदपुर, झारखंड



*****


इनके झूठ के आगे दुनियां कुर्बान हो गई

राजनीति आजकल बदनाम हो गई
फ्री की आदत अब आम हो गई
दस बार मुकर जाते हैं सुबह से शाम तक
झूठ बोलना तो अब इनकी शान हो गई

बाणी पर नहीं रही इनके लगाम
कुछ भी बोल देना इनकी पहचान हो गई
अपने गिरेबान में झाँक कर देखते नहीं
सत्ता की कुर्सी इनकी जान हो गई

जीतते ही बन जाते हैं बादशाह
खुद बन गए स्याने जनता नादान हो गई
कहते हैं लोकतंत्र में जनता होती है सर्वोपरि
यहां तो जनता कमज़ोर और सत्ता बलवान हो गई

सत्ता के लिए कोई दीन ईमान नहीं इनका
कुर्सी तो इनके लिए भगवान हो गई
जनता को बना देते हैं हमेशा प्रश्न चिन्ह
खुद की बात आये तो पूर्ण विराम हो गई

कोई नहीं ऐसा जो सिद्धान्तों पर चले
सिद्धान्तों की बातें इनके लिए अपमान हो गई
कपड़े इनके सफेद हैं मन इनके काले
इनके झूठ के आगे दुनियां कुर्बान हो गई


- रवींद्र कुमार शर्मा


*****


ईश्वर और कविता

एक दुनिया थी ईश्वर की
ईश्वर की दुनिया में सभी सुखी थे
फिर भी कुछ दु:ख थे ईश्वर के
कुछ छोटे थे,कुछ बड़े थे दु:ख
कुछ छोटे थे,कुछ बड़े थे ईश्वर भी
एक-दूसरे के विरुद्ध खड़े थे ईश्वर
और अपने-अपने हठ लिए जीते थे
वे आपस में ही लड़ते-झगड़ते थे
ईश्वर की दुनिया में मनुष्य नहीं थे
ईश्वर कविता नहीं पढ़ते थे।

*****

असीमित है सहना

असीमित है ब्रह्माॅंड
असीमित है आकाश और क्षितिज
जल असीमित,जल में लहरें असीमित
काल असीमित,काल के हिस्से असीमित
असीमित दु:ख का आर्तनाद असीमित
प्रार्थनाऍं असीमित और असीमित ही है
सूने संंसार में प्रार्थनाओं की गूॅंजती गूॅंज
असीमित गूॅंजती गूॅंज में शताब्दियों से
कितना कुछ सहता रहता हूॅं मैं
असीमित है सहना।


- राजकुमार कुम्भज


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बारिश की बूँदें

बारिश की बूँदें जब धरती पर गिरती हैं,
लगता है मानो खुशियाँ ही बिखरती हैं।

ऐसा प्रतीत होता है हर पल जैसे,
आकाश और धरती का मिलन हो रहा हो वैसे।

बारिश की बूँदों में जब मैं भीग जाती हूँ,
प्रिय की यादों में खोकर मुस्कुराती हूँ।

हर बूँद मुझे उनका एहसास दिलाती है,
दिल की धड़कनों को और बढ़ाती है।

बरसती फुहारें जैसे मुझसे कहती हैं,
जीवन की हर पीड़ा अब यहीं बहती है।

आज अपने सारे ग़म इस बारिश में धो लो,
दिल के हर दर्द को खुलकर संजो लो।

अपने प्रिय की बाँहों में सिमट जाओ,
प्रेम की बारिश में स्वयं को भिगो जाओ।

यह सावन हर दिल को यही संदेश सुनाए,
प्रेम से भरा जीवन हर पल मुस्काए।


- गरिमा लखनवी


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रात दिन थरथराती रही सरहदें।
नींद सबकी उड़ाती रही सरहदें।

आदमी-आदमी को लड़ा सामने,
ख़ूब हँसती- हँसाती रही सरहदें।

धर्म, जाति, ज़ुबाँ ,रंग के नाम पर,ये
रोज़ बंटती - बंटाती रही सरहदें।

तार, कांँटे,सलाखों से बनकर कहीं,
रास्ते सब मिटाती रही सरहदें।

पूछकर हाल दोनों तरफ के जुदा,
दर्द दिल में दबाती रही सरहदें।

रोज़ ऊँची हुई और गहरी हुई,
ख़ून जितना बहाती रही सरहदें।

गन गरजती रही,बम उगलती रही,
इस तरह ज़ुल्म ढाती रही सरहदें।


- नवीन माथुर पंचोली


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जीवन दीप

जीवन तेरा माटी के दीपक समान,
फिर क्यों करता है, हे मानव, अभिमान?
कच्ची मिट्टी से ही बना है तन-प्राण,
सत्य यह जान, हे इंसान।

उम्र है दीपक के तेल समान,
समय के साथ पल-पल घटता जाता,
होता नहीं तनिक भी आभास,
तले तक, जब तक पहुँच नहीं जाता।

संघर्षों की आँधी जब चलती प्रचंड,
मंद पड़ जाती जीवन-बाती, यह अखंड।
खुशियों की बयार जब देती झोंका,
भभक उठती लौ, फिर हो तरो-ताज़ा।

बनकर झकोरे बीमारियाँ-परेशानियाँ आएँ,
दीपक की लौ को बुझाने धाएँ।
पर प्रभु-कृपा का जब तक हो आवरण,
हो नहीं सकता जीवन-दीप का क्षरण।

माटी का है यह जीवन-दीप,
पर विधाता का अनुपम, अतीव उपहार।
सद्कर्मों से इसे सजा, सँवार
यही जीवन का सच्चा श्रृंगार।

हो भले कच्ची माटी के समान,
पर हो यदि प्रभु-कृपा का वरदान,
मुसीबतों की आँधियाँ लाख आएँ-
जीवन-दीप को बुझा न पाएँ।


- देवेंद्र भण्डारी


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सुंगला रा पाणी

पाणिये रिया सुबला ऐथी, सुंगल एथा रा नाँव,
बिच पर अ ई सड़क, ऊपर थल्ले एथी गाँव
बड्डे-बड्डे दरख्त एथी, घणी-घणी इन्हा री छाँव
शोखी लैंदी जिऊये री गर्मी, ठण्डड़ी तांजे बगदी हवा,
फेरी कदी नि बिसरदा भाईयों, एथीं रा नाँव,
शान्त हुई जांदा जिऊ म्हारा
तांजे तसल्ली कन्ने पींदे सुंगला रा पाणी

पहाड़ा ते औंदा, नालुए रिये बगदा
सुंगला रे पाणिये री, अपणी ई कहाणी,
पुख़र, सुआ कोई नी एथी,
नालुए रिये बगदा नीला पाणी,
पाणी पीणे जो रूकदियां गड्डियाँ,
सबणी अपणी प्यास भुजाणी,
तौन्दिया रे त्याड़े तांजे धुप्पा भखदी
याद आऊँदा फेरी सुंगला रा पाणी ,

पीणे जो बड़ा भारी स्वाद आ,
छैल बांका एथि रा मिट्टणु पाणी,
मिट्टणु पाणिये रिया कोई रिसा नी भाईयों,
घीयु साईं लगदा पीणे जो पाणी,
चार-चफेरे ऐथी रिय्यासी दिखदी,
जिऊये सौगी तांजे नज़र घुमाणी
आऊँदे-जांदे ऐथी रुकदे रहन्दे
पी लैन्दे एथी रा ठण्डड़ा जेया पाणी,


- बाबू राम धीमान


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नन्हीं सी जान

नन्हीं सी जान, लिए अरमान,
एक दिन छुएगी आसमान।

अपनों से दूर, सपनों के पास,
सफल हो उसकी आस।

बचपन भूल, शौक भूल
चली बहुत दूर गुरुकुल।

रोटी में उसको मां दिखती,
गुरु में दिखते उसके पिता।

गुरुकुल में बचपन भूल,
अपना भविष्य गढ़ रही,
सब सुख चैन छोड़,
नन्हीं बिटिया पढ़ रही।

जिंदगी का हर सबक ले रही,
खामोशी से बस मुस्कुरा रही।

आंखों में चमक देखते बनती,
उसे पता है वो सीप है
जिसमें छुपा है मोती।

क्या सुबह क्या शाम,
हर वक्त है सपनो के नाम।
क्या त्याग है,क्या लग ,
क्या चाहत क्या सफलता की अगन।

खाली बिस्तर नींद नहीं आती,
अब मां सुबह नहीं जगाती।

रातों के सपने में भाई बुलाता,
पिता बाजार ले जाते और
मां खाना खिलाती।
आंख खुलती बिस्तर पर,
ऊपर सिर्फ एक पंखा घूमता पाती।

एक चारपाई,दो बर्तन और
पास एक बस्ता है।
घर जाने को मन,
बहुत तरसता है।

रिश्ते नाते अब किताबों से,
नन्हीं सी जान पल रही,
सिर्फ अरमानों में।

एक दिन मेहनत उसकी रंग लाएगी।
नन्हीं सी चिड़िया, आकाश को छू आएगी।


- रोशन कुमार झा


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09 July 2026

डॉ. शैलेश शुक्ला की तीन गज़लें पढ़िए





गज़लें


उन्हें भुलाने की कोशिश में उन्हीं की याद आयी
हर बात से निकलकर बस उन्हीं की बात आयी।

सोने की कोशिश की, मगर हम न सो पाए रात भर
इन कोशिशों में हर दफ़ा इक और नई रात आयी।

मुस्कुराने की कोशिश की, हमने मगर हर बार
पर आँखों में फिर आँसुओं की ही सौगात आयी।

भरोसा उन पर खुद से ज़्यादा है हमें, मगर
मौसम बदलने की खबर हवा अपने साथ लायी।

वो कहते हैं कि बेवफ़ाई वफ़ा से जीत जाती है
भला कोई क्या जाने कि किसने किससे है मात खायी।

सोचा था ‘शैलेश’ उन्हें हम भुला देंगे आसानी से
मगर अब जा के याद हमें अपनी ही औक़ात आयी।


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वो तो हमें खुद से जुदा बताए बैठे हैं
हम उन्हें दिल का खुदा बनाए बैठे हैं।

वो मिलें या न मिलें, है उनकी अपनी मर्ज़ी
हम तो खुद को ही उन्हीं में समाए बैठे हैं।

वो कहते हैं कि हमसे नहीं कोई नाता
फिर भी मेरी राहों में नज़रें बिछाए बैठे हैं।

वो हमें दूर से हर रोज़ निहारा करते हैं
हम जो देखें उन्हें, तो नज़रें चुराए बैठे हैं।

अपनी चाहत से चाहे वो जिसे भी चाहें
हम तो दिल में उन्हें अपना बनाए बैठे हैं।

दूर जाएँ वो अगर हमसे, तो कोई फ़र्क नहीं
हम तो हर ज़र्रे में उनको ही बसाए बैठे हैं।

‘शैलेश’ को वो मिलें, न मिलें—पता नहीं
पर दिल से तो उन्हें हम अपनाए बैठे हैं।

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चले आते हैं इन गलियों में अक्सर दीवानों की तरह,
इस मिट्टी में अपना घर होने का एहसास होता है।

बरसों शहर में रहकर भी हम शहर के हो न सके,
गाँव और कस्बे में बिताया हर लम्हा ख़ास होता है।

तमाम साज़ो-सामान जोड़े हमने, खुश रहने की ख़ातिर,
एसी की हवा में भी बेनवा की याद से मन उदास होता है।

रिश्ते तो बहुत बने शहर में, पर स्वार्थ की दूरियाँ रहीं,
अपनों से अपनेपन का रिश्ता ही दिल के पास होता है।

भीड़ में रहकर भी अक्सर हम तन्हा ही रह जाते हैं,
हर शख़्स के चेहरे पर मुखौटों का आभास होता है।

जब लौटते हैं यादों में अपने गाँव की पगडंडियों पर,
हर कोना, हर आँगन जीता-जागता इतिहास होता है।


- डॉ. शैलेश शुक्ला


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