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वादा
मैं वादा करती हूँ
तेरे हर मौन में,
तेरी हर उलझन में
मैं शब्द बनकर रहूँगी।
मैं वादा करती हूँ
जब दुनिया सवाल करेगी,
मैं तेरा विश्वास बनूँगी,
जब तू थक जाएगा,
मैं तेरी उम्मीद बनूँगी।
ना साथ छोड़ने का वादा,
ना हर पल मुस्कान का दावा
बस इतना कि
हर सच में, हर संघर्ष में
तेरा हाथ थामे रहूँगी।
क्योंकि वादे शब्द नहीं होते,
वो निभाए जाने वाले एहसास होते हैं
और मेरा वादा है
तेरे होने की कद्र करना
हर हाल में, हर दिन।
- डॉ. सारिका ठाकुर 'जागृति'
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हुंकार: कलम का शौर्य
उठो हिंद के नव-भगीरथ, अपनी शक्ति पहचानो तुम,
कलम हाथ में थामी है तो, खुद को योद्धा मानो तुम।
नहीं जरूरत तुझे हाथ में, अब लोहे की तलवार की,
स्याही तेरी काट बनेगी, हर दुश्मन की वार की!
मस्तक पर हो तिलक ज्ञान का, आँखों में अंगार भरो,
किताबों के हर पन्ने से, अब तुम सिंह-दहाड़ भरो।
तलवारें तो केवल बस, काया का मर्दन करती हैं,
किन्तु कलम की धारें, सदियों का सृजन करती हैं।
त्यागो निद्रा, त्यागो नशा, यह विष का प्याला भारी है,
नशे में जो डूबी जवानी, वह राष्ट्र पर भारी है।
जो अपनी सुध-बुध खो बैठा, वह क्या खाक लड़ेगा रे?
व्यसनों की बेड़ी में जकड़ा, वह क्या विजय गढ़ेगा रे?
असली वीर वही है, जो कुरीतियों का सिर काट सके,
अज्ञान के इस काले तम को, शिक्षा से जो छाँट सके।
एक वार तलवार का, केवल एक देह को मारता,
पर लेखनी का प्रहार, पूरे युग को है सुधारता!
ओ शिक्षक के लाड़लों! तुम आने वाली शान हो,
इस माटी की अस्मिता, और देश का अभिमान हो।
लिखो ऐसी अमर कहानी, कि काल स्वयं भी झुक जाए,
तुम्हारी कलम चले जिस पथ पर, बाधाएँ भी रुक जाएँ।
विजय घोष हो ज्ञान का, अब ऐसा विप्लव लाना है,
स्याही की हर एक बूँद से, नया भारत बनाना है।
- देवेश चतुर्वेदी
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सर्द मौसम था शामें रंगीन थी
झुकी पलकें तो आँखें गमगीन थी।
उतरना चाहती थी वो
मेरे दिल से आँसुओं के रास्ते,
मैं उतारता गर मेरे दिल से उसे
तो मेरी मोहब्बत की तौहीन होती।
क्या हुआ जो वो मेरे साथ न रही,
जिसके साथ रही होगी,
उसमें जरूर मुझे ढूँढती होगी।
सामने आया होगा जिक्र ए मोहब्बत का,
सहारा नाम का लेकर किसी और का,
दास्ताँ ए मोहब्बत हमारी कही होगी।
दास्ताँ न कहती हमारी मोहब्बत की
तो मेरी मोहब्बत की तौहीन होती।
लिखा जो पाता उसका नाम कहीं अगर,
प्रहर उसी में आँखों में आलिंगन करता था।
तिल तिल कर मरता था मगर,
भावना प्रेम की मन में उससे रखता था।
दौर ए बेवफाई में, मैं भी बेवफाई करता
तो मेरी मोहब्बत की तौहीन होती।
- मनोज कुमार भूपेश
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मेरी दुनियां
हंसना रोना तेरे लिए,
पाना खोना तेरे लिए,
आंख अधखुली रख,
बेचैन रातों को सोना,
जैसे चंद अपनी चांदनी से
सपनों को छूता हो।
सो भी गए तो,
सपनों में तुम हो
जैसे हर नदी पानी में,
चांद का प्रतिबिंब पाती है।
आंख खुली फिर तो,
सारे जहां में तुम हो।
जैसे सारी दुनिया सुबह,
सूरज को ही देखती है।
हर कहानी का किरदार तुम हो,
मेरे हर हासिल का हिस्सेदार हो
तुम मुझमें हो मालूम है,
पर ये आंखे तुझको ढूंढती हैं।
जैसे पतझड़ के पत्ते,
सावन की बूंद ढूंढते हैं।
- रोशन कुमार झा
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बचपन की कहानी
एक बचपन का जमाना था
उसमें खुशियों का खजाना था।
चाहत चांद को पाने की थी
पर दिल तितली का दिवाना था।
खबर न थी कुछ सुबह की
न शाम का ठिकाना था।
थक कर आना स्कूल से
पर खेलने भी जाना था।
परियों को फसाना था
बारिश में कागज की नाव थी।
हर मौसम सुहाना था
एक बचपन का जमाना था।
- शिव 'सदानंद'
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भीड़ से अलग
तुम्हें जब देखती हूं,
उससे भी ज्यादा तब देखती हूं
जब तुम दिखाई नहीं देते।
फिर खुद को ढूंढती हूं...
सूखे पत्तों का जमीन पर
आलीशान घर,
बसंत भी है, और पतझड़।
रूखे टहनियों पर बसे
इंतजार की और सब्र की कहानी।
शायद सबने सुनी
कांटों के बीच मुस्कुराते
गुलाब की ज़ुबानी।
फिर यही इंतजार की कहनी,
किताबों की खिड़की खोल
जब चाहत में सच होने लगे...
तब शुरू होती है प्रेम कहानी।
आज भी उसी कहानी चौखट पर
देखा है, भीड़ से अलग ठहरा
एक गुलाब का इंतजार।
- सुतपा घोष
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बचपन
फिर से वही बचपन की तलाश में कट रही जिंदगी,
जिसमें न डर, न छल, न कपट, न झूठ, न आलस।
फिर से उल्लास, हँसी ठिठोली, और बेबाकपन,
भटक रहा हर दिन बस वही बचपन जीने को मन।
खेलने को रस्सी कूद, गिट्टियाँ और चोर सिपाही,
खो-खो, आइस पाइस, पिण्डुक और फुटबॉल।
सारा दिन स्कूल, मस्ती, लड़ना, प्यार और रुठना,
सब याद आता है कि फिर से उस दौर में जीने को।
माँ का हर दिन प्यार से पुचकारना कभी डांटना,
प्यार से पुचकारना पापा का हर चीज़ लाना।
सबकी लाड़ली होना इस बात पे इतराना रस्क करना,
सखियों की लीडर होना उनके विश्वास पे खरा उतरना।
काश वही पुराने दिन लौट आए और वही बेपरवाह
जिंदगी हो, वही सखियाँ हो, वही माँ पापा हो।
वही भाई बहन, वही सुंदर कपड़े, वही सुकून,
भरी जिंदगी हो, बेपरवाह, रोक टोक न हो।
पर अब तो जिंदगी का हर पल, हर दिन, हर साल,
खत्म हो रहा है , अब जिंदगी पानी का बुलबुला है।
बस अब जिंदगी में वही बचपन जीने को मन करता है,
और अंदर एक बच्चा अभी भी ज़िदा है और जीता है।
- सुमन डोभाल काला
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बर्फ के पहाड़
गिरती है जब बर्फ
चमक उठते है पहाड़
सफेद चादर से ढके
आंखे चुंधिया जाती है देख कर
पहाड़ी के लिए आम है बर्फ का गिरना
कठिनाईयों से जूझती जिंदगी
मुश्किल होता है रास्ता ढूंढना
पशुओं के लिए चारा
रोटी बनाने के लिए लकड़ी
कैसे आएगी उस गिरी बर्फ में
बीमार कोई हो जाये
कैसे पहुंचेगा हॉस्पिटल
सड़कें बन्द बिजली नहीं
पानी के नल जमे हुए
हड्डियां तक जमा देने वाली ठंड
हाथ को हाथ का पता नहीं
कैसे स्कूल भेजें बच्चों को
दूरसंचार ठप्प दुनियां से बेखबर
कहीं बर्फीला तूफान
कहीं चट्टानें खिसक रही
पहाड़ का आदमी बहुत परेशान
लेकिन हिम्मत नहीं हारता
डट कर करता है मुकाबला
सभी कठिनाईयों का
लगता है जैसे किसी हाड मांस का नहीं
बना है किसी कठोर धातु का
पहाड़ चढ़ना उतना नहीं अखरता उसको
बचपन से पला बढ़ा है पहाड़ पर
यहां रहने वाले जुड़े है अपनी संस्कृत से
कूट कूट कर भरे हैं उनमें संस्कार
फिर एक दिन आते है कुछ सैलानी
घूमने पहाड़ पर
खुश होते हैं देख कर
पहाड़ पर पड़ी बर्फ
उनके लिए खुशी है बर्फ देखना
उसमें अठखेलियाँ करना
कूड़ा कचरा फैलाना
तहस नहस करना हमारी संस्कृति को
और वापिस चले जाना
नाचते गाते है बर्फ में
रीलें बनती हैं बेशर्मी से
कपड़े उतारते हैं निर्लज्ज
शराब की बोतलों को लहराते है हवा में
हो हल्ला करते हैं हुड़दंग मचाते है
कहें कुछ पहाड़ के लोग तो
लड़ते हैं आंख दिखाते हैं
तार तार कर रहे पहाड़ की संस्कृति को
डर नहीं उनको न देवी देवताओं का
न समाज में प्रचलित मान्यताओं का
रह गया पहाड़ का आदमी
उस कचरे को साफ करता
अपने घर पहाड़ की सफाई करता
क्योंकि पहाड़ उसका अपना है
कोई घूमने की जगह नहीं
यहीं पैदा हुआ यहीं जियेगा
और एक दिन इसी पहाड़ पर
चला जायेगा दुनियां छोड़ कर
अपनों की दुनियां से मुंह मोड़ कर
- रवींद्र कुमार शर्मा
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तुम्हारी जात
ऐसे-ऐसे बोलते हैं हमें-
हमलोगों को रोज-रोज़
चमार तो कभी चमरोटा
कह कर बुलाते हैं।
ऐसे-ऐसे बोलते हैं हमें-
नाली के कीड़े जैसी
जात है तुम्हारी।
चमरा, चमरोटा कहीं का।
ऐसे-ऐसे बोलते हैं हमें-
नाली कितना भी साफ़ कर लो
साफ़ नहीं होती।
वैसी है तुम्हारी जात।
ऐसे-ऐसे बोलते हैं हमें-
अभी मारूंगा तो ,
पूरे कपड़े में हगते-मूतते
घर जाओगे अपने।
ऐसे-ऐसे बोलते हैं हमें-
तुमलोगों के ऊपर
थूकना चाहिए ,
और तुम्हारे जात पर भी।
ऐसे-ऐसे बोलते हैं हमें-
तुमलोग कभी नहीं सुधरोगे
ना ही कभी सुधरेगी,
तुम्हारी जात !
ऐसे-ऐसे कब तक बोलते रहेंगे?
कब तक इंसानियत का जनाजा निकालते रहेंगे ?
अब ज़माना जात का नहीं,
फ़ेसबुक, इंस्टा और व्हाट्सऐप का है।
- आनंद दास
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हे ! मानव
हे ! मानव तुम हो जाओ खड़े-2
खड़े कब से तू है सो रहा ।
सदियां यूं ही गुजर गईं
तूफानों में पड़े - पड़े
हे! मानव तुम हो जाओ खड़े।
इह लोक को भुला दिया तुमने
उस लोक में डूबे रहते हो।
देख नियंत्रण प्रकृति का
विस्मय में क्यों पड़ते हो ?
दुर्गुण को गले लगाते हो
सत्कर्म से पहले बड़े - बड़े।
हे! मानव तुम हो जाओ खड़े।
मध्यकाल से सोया है
अंखियां न खुलती तेरी हैं।
नहीं चेतना लौट सकी
गलती ही इसमें मेरी है।
स्वप्नों में तूने सजों लिए
हैं एश्वर्य बड़े - बड़े
हे ! मानव तुम हो जाओ खड़े- २
क्या नींद की गोली खा ली है ?
या असर पान मदिरा का है।
ऐसा प्रतीत मुझे होता है
जानें कब से तू सोता है।
भोर हुआ उठ जाओ खड़े
अधिकार छूट रहे बड़े- बड़े।
हे ! मानव तुम हो जाओ खड़े
मजहब की रोटी सेंक रहे।
वे मस्जिद और मजारों से
सत्ता का सुख भोग रहे हैं।
पर मजहब की तौहीरों से।
कट्टर और हठी बनते हैं
मजहब की तनकीदों से।
दूर जा रहे मुल्क के वो निज
कर्ण के जैसे अकीदों से।
विश्वास जीत लो तरुणों का
सिजदा कर देंगें बड़े - बड़े
हे ! मानव तुम हो जाओ खड़े।
- करन सिंह 'करुण'
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खर्चे बढ़ गए सभी के क्या करें इंतज़ाम
कोई चलाता खर्चों पर कैंची
कोई बढ़ाने में समझें अपनी शान,
प्रबन्ध सिखाता हमें कटौती करना
परेशान वृथा न हो इन्सान
रोना रोती रही सरकारें, त्राहिमाम करें किसान
बोझ कर्ज के तले डूब कर,
विवश हुआ था आत्महत्या को अन्नदाता
फ़िर भी क्या निकला परिणाम,
टोल प्लाजा, बैरियर घेरे,
बॉडर पर अनशन करे किसान,
बिजली पानी पर सेस लगा कर भी
सपने कहां हुए साकार
हालत किसी से छुपी नहीं थी
मंत्री नेता हुए थे परेशान
गरीब रोए सिर पर हाथ रख कर
अपना दुःख किसको बताएं ?
बताने की भी ग़र करें हिम्मत
कौन सुने फरियाद ?
बढ़ती महंगाई छुए आसमान
मालामाल होय धनवान,
कारवां गुजरता गया,गरीब देखता गया
कैसे गुजारा होगा आमजन का
मुझे बता प्रबुद्ध इन्सान
कोई चलाता खर्चों पर कैंची
कोई बढ़ाने में समझें अपनी शान,
प्रबन्ध सिखाता हमें कटौती करना
परेशान वृथा न हो इन्सान
रोना रोती रही सरकारें, त्राहिमाम करें किसान
बोझ कर्ज के तले डूब कर,
विवश हुआ था आत्महत्या को अन्नदाता
फ़िर भी क्या निकला परिणाम,
टोल प्लाजा, बैरियर घेरे,
बॉडर पर अनशन करे किसान,
बिजली पानी पर सेस लगा कर भी
सपने कहां हुए साकार
हालत किसी से छुपी नहीं थी
मंत्री नेता हुए थे परेशान
गरीब रोए सिर पर हाथ रख कर
अपना दुःख किसको बताएं ?
बताने की भी ग़र करें हिम्मत
कौन सुने फरियाद ?
बढ़ती महंगाई छुए आसमान
मालामाल होय धनवान,
कारवां गुजरता गया,गरीब देखता गया
कैसे गुजारा होगा आमजन का
मुझे बता प्रबुद्ध इन्सान
- बाबू राम धीमान
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