साहित्य चक्र

07 July 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 08 जुलाई 2026






स्वार्थ
दुनिया में सिर्फ स्वार्थ ही स्वार्थ भरा है,
स्वार्थी दुनिया में और कुछ नहीं स्वार्थ के सिवा,
दोस्ती भी स्वार्थी हो गई बस स्वार्थ के लिए है।

भाई-बहनों में भी बस स्वार्थ के रिश्ते रह गए,
आज की दुनिया में सगा कोई नहीं बस किससे क्या मिले,
पड़ोसी भी बस एक-दूसरे से खार खाए बैठे है।

उस पे ये है, उस पे वो है, बस सिर्फ और सिर्फ स्वार्थ छुपा है,
कौन किसका है, इस दुनिया में ये पता ही नहीं चल रहा,
कब, कौन किसी को नीचा दिखा दे पता ही नहीं चल रहा।

कब और कैसे थमेगा, ये सब कुछ नहीं पता, कब थमेगा ये तूफ़ान,
आज रिश्तों का खून कब, कौन और कैसे कर दे स्वार्थी दुनिया में,
आज कोई किसी का सगा बचा ही नहीं, बस सिर्फ मेरा हो और मैं हूं,
स्वार्थ इतना फलीभूत है कि न कोई सगा, न अपना बस झूठ फरेबी है।


- सुमन डोभाल काला


*****


सदी और लम्हें

जिंदगी के दिन यूं गुजर गए ,
वो लम्हा और हम सदी बन गए।
उलझने ही इतनी थीं,
लम्हें कब के गुजर गए और हम
आज भी सदियों की तरह ठहरे हैं।
जिन्हें अलविदा किया वो लम्हे थे ,
सदियां आज भी दोहराई जाती है
फर्क सिर्फ इतना है कि
लम्हें गुजर जाते हैं लेकिन
सदी पर आज भी समय के पहरे हैं।
जो गुजर जाते हैं , वो यादों में रहते हैं
एक सदी है जो सदियों तक नहीं गुजरती
वो देखती है
सबका आना और जाना
देखती है आने जाने के निशान
कितने फीके और कितने गहरे हैं !
अब कैसी शिकायत समय से ?
अब कैसा गिला उन लम्हों से ?
जान लिया है इतना कि
कुछ लम्हे उम्र से बड़े होते हैं,
वो बीतते नहीं, हम में उतर जाते हैं
और हम... हम लम्हें से सदी बन जाते हैं।


- मंजू सागर


*****


प्रेम की मृत्यु: एक हुस्न का षड्यंत्र

मेरे दिल से क्या कसर रह गई,
तेरे हुस्न से प्यार निभाने में,
क्यों तेरे हुस्न ने मेरे दिल के इश्क को लिया,
अपने खंजर के निशाने पे...

अरे मेरे दिल की धड़कनें तो तेरे दिल से,
बेहिसाब मोहब्बत करती थीं...
तेरे प्यार में पागल थीं...
तेरे दिल की हर हसरत को
मेरे दिल ने अपनी मोहब्बत से,
तेरे भाग्य में लिखा था

खोल कर देख ज़रा ऐ जालिम
मेरे दिल को तू,
मैंने अपनी इश्क की वसीयत में,
अपनी एक-एक साँस पर,
तेरे हुस्न का नाम लिखा था...
और क्या चाहिए था तेरे दिल को...
मैं,, और तुम कुछ दिनों बाद
सात फेरों के पवित्र बंधन में बंध कर...
हम होने वाले थे...

जो तेरा दिल मेरे दिल से बात करता
तो,, तेरे दिल के हर नखरे को,
मैं अपने ख्वाबों में शामिल करता...
पर तेरे पत्थर दिल को तो,
मेरी कहानी का कत्ल ही करना था...

अगर मेरे दिल को मालूम होते,
तेरे दिल के जज़्बात
कि तेरा दिल मेरे दिल से
मोहब्बत करता ही नहीं है,
तब मैं अपने हाथों से,
तेरी मेहंदी से अपना नाम मिटाता
तेरे ख्वाबों की मोहब्बत से,
मैं स्वयं तुझे मिलाता
कसम से...

तेरे साथ जीवित न रह सका मैं,
पर इस बात की राहत है,, मेरे दिल को
कि अपने अंतिम समय में
तेरा चेहरा देखकर...
मृत्यु को प्राप्त कर रहा हूँ मैं,

देख एक अंतिम ख्वाहिश है,
मेरे दिल की...
यदि तेरा दिल माने तो,
तेरी रूह ने,, कभी
किसी के दिल के साथ,
प्रेम नृत्य किया था
ये,, किसी से न कहना तू...

तेरे हलक से निकली जो,
प्रेम की बात आज के बाद
तो, मेरी रूह की...
ये बद्दुआ है,,
तेरे दिल को...
इस सृष्टि से प्रेम की मृत्यु हो जाएगी,
मेरा यकीन कर तू फिर शांति
कभी कहीं न पाएगी...


- आकाश शर्मा "आज़ाद"


*****


अतीत के झरोखों में झांका जब मैंने,
खुद को इंसान से गुनहगार बनते पाया मेंने,
दिल ने पूछा-किसके गुनहगार हो तुम !
कहा दिल से-अपनी ही जिंदगी का हूं...
मगर... अब मुझे फिर इंसान बनना है...

ख्यालों में बचपन से लड़कपन तक गया मैं,
देखा लड़कपन के बाद वो कांटों का मंजर,
जहां बेरहम दुनिया के तिलिस्म में,
उलझा किस कदर अपनी ही भावनाओं से खेलकर...
मगर... अब मुझे फिर इंसान बनना है.....

क्या दिलकश थे वो मयखाने के रास्ते,
भूला जहां खुद को..... बस दो घूंट के वास्ते,
वो मौज, वो मस्ती, वो बेपरवाही के दिन,
जाओ ! आजाद किया आज इन्हें, रह लूंगा इनके बिन...
क्यूंकि... अब मुझे फिर इंसान बनना है...

पसार बाहें खड़ी है खुबसुरत जिंदगी,
बस खुदा से यही है अब मेरी बंदगी,
ना धुंध कर देना, ये हसरतों के रास्ते,
सुबह का भूला... लौटा हूं इस शाम, जिंदगी जीने के वास्ते...
हौसले हैं फौलादी कि... अब मुझे फिर इंसान बनना है...


- कुणाल


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उलझन में हूँ

कुछ ख्वाब हैं मेरे, न जाने कब होगे पूरे ?
प्रयास तो है जारी, फिर भी है अधुरी।

अपने ही लगा दिये हैं अड़ंगा,
बने हैं वो सियार रंगा।
साथ मे रहकर दिया है घाव,
छिपकर दिखाया है अपना स्वभाव।

सच कहते हैं लोग यहाँ,
चेहरा रंगकर अपने बैठा है जहां तहाँ।
सोच समझकर ही कदम उठाना,
नहीं तो कसर नहीं छोड़ेगे जमीन छीनना।

मर गया है सबका यहाँ जमीर,
भूखे नंगे है फिर भी कहता है खुद को अमीर।
चुन्नू कवि है हताश और निराश,
किस पर करे भरोसा और किसपर विश्वास ?


- चुन्नू साहा


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दोहे

बच्चों सा निश्छल अगर हो अपना व्यवहार,
प्रेम-प्यार की हर समय हों हम पर बौछार।
जब जीवन की नाव पर लदता ज़्यादा भार,
रहती डावाँडोल वो नहीं पहुँचती पार।

धन दौलत को देखकर गढ़ते जो अनुबंध,
होते फ़़ौरन ही वहाँ तार-तार संबंध।
सुख दुख मान अपमान हो नफ्ऱत पीड़ा प्यार,
आता है सब लौटकर देते जो हर बार।

जीवन-झरने से अगर सुनना है संगीत,
राग-द्वेष का आयतन कम कर दे तू मीत।
अच्छे रिश्तों के लिए रखना इतना ध्यान,
इक दूजे को दीजिए, पूरा पूरा स्थान।

संबंधों को चाहिए, देखभाल की खाद,
उदासीनता से सदा होते ये बरबाद।
संबंधों के बीच में जो आ गई दरार,
बिना गँवाए ही समय उसको करिए पार।

संबंधों की नींव को मत कर तू कमज़ोर,
जो कहना चुपचाप कह बिना मचाए शोर।
योगदान की सभी के चर्चा कर दिल खोल,
अच्छे रिश्तों के लिए, मीठे मीठे बोल।

मित्रों से जो भूल हों मत दो उनको तूल,
योगदान उनका सदा मन से करो क़बूल।
छोटी मोटी ग़लतियाँ करो नज़रअंदाज़,
कोई भी इससे नहीं होता है नाराज़।

घर में तेरे साथ जो रख उनका तू ध्यान,
उजड़ गया घरबार तो है बेकार मकान।
मिला आपका साथ जो प्रेम प्यार विश्वास,
मुझको तो आने लगा जीवन अब कुछ रास।


- सीताराम गुप्ता


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सदियों के संघर्ष को भी
भूल गए लालच के कारण
राम सेवा की शपथ लेकर
बन गये तुम क्यूं कर रावण।
कितने दिए बलिदान
मान की हानि झेली
भूले गये थे जो रंगों को
खून की होली खेली।
सदियां आई चली गई पर
जन्मभूमि की दशा ना बदली
पर अब बदली तो क्या बदली
तुम ने कर दी अदला-बदली।
पहले सोचा षड़यंत्र होगा
कुछ राजनीतिक हठधर्मियों का
पर ये तो सच में सच निकला
मंदिर बैठे कुछ कुकर्मियों का।
दान की चोरी मान की चोरी
यूं विश्वास की चोरी कर डाली
राममंदिर धर्मध्वज है अपना
ये कुत्सित मंशा क्यूं पाली।
सरकार सजा तो देगी ही
भगवान भी सजा तुमको देंगे
धर्म-द्रोहियों पापियों दुष्टों
सब भक्त श्राप तुमको देंगे।
मंदिर को भी ना छोड़ा
अपने कुत्सित कर्मों से
कलम बंद करता हूं अब
क्या कहना इन बेशर्मों से।


- व्यग्र पाण्डे


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आसार

मुझे नफ़रत ज़रा
सोच समझ कर करना
मोहब्बत होने के
आसार होते हैं।

मेरी बात औरों से ज़रा
सोच समझ कर करना
इश्क होने पर
सब कुर्बान होते हैं।

दिल की बात
सोच समझ कर करना
अपनों में भी कई
गद्दार होते हैं।

हमराही को हमसफर
सोच समझकर बनाना
धोखा मिलने के भी
आसार होते हैं।


- डॉ. राजीव डोगरा


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मन आकाशगंगा

हृदय के भीतर
न जाने कितने ब्रह्मांड बसते हैं।
विचार कभी ग्रह बनकर
परिक्रमा करते हैं,
कभी टूटते तारों-से
बिखर जाते हैं।

कुछ स्मृतियाँ चाँद की
शीतलता बनकर ठहरती हैं,
तो कुछ इच्छाएँ
सूर्य-सी दहकती रहती हैं।

और मन इन्हीं अनगिनत
आकाशगंगाओं में भटकता है।

और जो शब्दों में उतर आता है,
आपके पास चला आता है।
आपके स्नेह और दुलार के लिए।


- सविता सिंह मीरा


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नन्हीं चिड़िया

एक नन्ही चिड़िया थी,
पहली बार बाहर निकली,
उड़कर एक खेत में पहुंची,
खेत में एक पेड़ था।
उसने साहस करके तिनके चुने
पेड़ पर एक घोंसला बनाया।
एक पेड़, एक घोंसला...
एक चिड़िया, शिकारी अनेक...
गिद्ध, कौवे, चील
सबकी नजर उस पर थी ,
वह डरी नहीं...
और फिर... फिर क्या...?
चिड़िया ने उड़ना सीख लिया।


- मंजू सागर


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अनकहे फासले
निस्वार्थ भाव से जुड़ा था
मेरा दिल तुमसे,
गलती हुई कि समझ बैठे
सब कुछ तुमको।
​क्या पता था
इस भोले दिल को,
कि तुम दिल देने नहीं,
बस मन बहलाने आए थे,
अपना बनाने नहीं,
मेरा दिल तुड़वाने आए थे,
साथ ले चलने नहीं,
मुझे मेरी औकात
दिखाने आए थे।
​क्या कम्बख्त चीज़ है वो पैसा,
जिसके लिए आज
छोड़ गए तुम हमको!
इतनी भी क्या
मजबूरी थी तुम्हारी,
कि तुमने मेरा दिल नहीं,
उस पैसे को चुन लिया...
कि तुमने हमें नहीं,
उसे चुन लिया।


- वैभवी मिश्रा


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म्याना रे ध्याड़े

म्याना रे ध्याड़े लगी गए औणें
सबणी ते पैहले डोहरूआ जो हाल पौणा लाणें।
फेरी बरखा रा टैम लगया औणें
लोका री दौड़ डोहरूआ खा लगी पौणें।
बरखा ते बाद डोहरू पाणी ने भरी जाणें।
मैड़ा देणे ते बाद धाना रे डाल दूर दूर लगाणें।
धान लगांदें लगांदें कांडे पीड़ पई जाणी
एहड़ा लगां के जांघा पई गया पाणी।
जे डोहरिया भूख लगी जाओ
तां खसरे, त्याम्बल कने आम्ब पेट भरी ने खाओ।
धूपे री चलकोर तांजे लगी जांदी
तां खाडा नहाई ने ही चैन औंदी।
सांझा  मुश्कल हुई जां  घरा पूजणां
बुझो डोहरिया ही सई जाणां।
रोटी खांदे खांदे नींद्र लगी जाई पौणां
पर हाली भांडे भी पौणे धोणां ।
मांजे पर पूजदे ही स्याणें पीड़ा ने करलांदे
कने जवान खर्राटे मारी ने सई जांदे।
ता एहड़े हुंए म्याना रे ध्याड़े 
चौल खाणे जो ता हुएं
बांके पर कमाणें जो हुएं माड़े।


- विनोद वर्मा


*****


आत्मीयता

मौन हृदय के कोमल उपवन में
कुछ भाव सहज मुस्काते हैं,
बिन कहे, बिन कुछ चाहे ही
अपनेपन के दीप जलाते हैं।

न कोई परिचय, न कोई बंधन,
न संबंधों का कोई विधान,
फिर भी मन के सूने आँगन में
भर देते मधुरिम मुस्कान।

स्नेह जहाँ निस्वार्थ बहता हो,
विश्वास जहाँ आधार बने,
वहाँ शब्दों की आवश्यकता क्या,
मौन स्वयं ही उद्गार बने।

समय, दूरी, परिस्थिति चाहे
कितनी ही परीक्षा ले लें,
सच्चे भावों की दृढ़ डोरी
हर विघ्न सहज ही सह ले।

कुछ रिश्ते नाम नहीं माँगते,
वे केवल हृदय का सम्मान हैं।
जो आत्मा से आत्मा तक पहुँचें,
वही जीवन का सच्चा वरदान हैं।


- डॉ. सारिका ठाकुर 'जागृति'


*****


घोगड़ा रिया धारा डैणा री लड़ाई

आई गई डगवांस हुण घोगड़ा
रिया धारा हुणी बड़ी लड़ाई
जे डैणा जितियाँ तां औणी विपदा
जे जीते देवते तां समझो खुशहाली आई

इस दिन सारियाँ डैणा कठी हुई कने
घोगड़ा रिया ताहरा जांदियाँ थी
अपणे जादू टोणे रा लोहा
दुज्यां ते मनवांदियाँ थी

कोई झाड़ूये पर कोई पेड़ूये पर
कोई सुपा छज्जा पर जांदियाँ थी
कोई बौंक्रिया पर सवार हुई कने
घोगड़ा रिया धारा रा फेरा पांदियां थी

माहणु जादू टोणे जो बड़ा भारी मनदा था
चेलेयां रे धूनी धागे ने ई कम्म चलदा था
चब्बाटे पर जाई कने हुँदा था लाज
सारी सारी रात चब्बाटे पर दिवा जलदा था

टूणे टोटके जंतर मन्त्रा कने हुँदा था बमारिया रा लाज
टिहडा सिरा जंगें पीड़ तां ओपरा दसदे थे
अस्पताल हुंदे थे बौहत दूर
चेलेयां रे चकरा च झट फसदे थे

चेलेयां री तां काल़े मिहने हुंदी थी नंद
खेलदेयाँ खेलदेयाँ हुई जांदा था सवेर
कुक्कडां कने छेलुआं रा
बड्डी बड्डी कने लांदे थे ढेर


- रवींद्र कुमार शर्मा


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पुराना घर

पुराना घर और उसका दरवाजा...
सब लोग छोड़कर चले गए,
लेकिन वो अब भी वहीं खड़ा है।
उदास, खामोश और लाचार
सदियों से खड़ा,
उसमें बूढ़ा पेड़...
महसूस करता है उसकी तकलीफ
उसकी रीढ़ की हड्डी का दर्द।
उसकी टूटती हुई हिम्मत
गुम होती हुई रौनक...
कैसे हो गया है वह बंजर...?
दीमक खा चुकी है...
जर्जर हो चुका है फिर भी
वहीं खड़ा है...
पुराना घर और उसका दरवाजा...
अब कभी नहीं खुलता किसी के लिए
ना कोई आता...
ना कुत्ते... ना जोगी...
ना भूखी गाय...
ना मनिहारी और ना ही  बिसाती
आती है तो हवा
लेकिन उनसे टकराकर लौट जाती है।
कितना मातम रखता है!
पुराना घर और उसका दरवाजा...
घर में है यादों का मलबा
खोखली हुई अलमारी
झड़ती हुई छत...
झींगुर और कीटक का शोर
चिपचिपी दीवारें
कपड़ों की खूटीं, जंग लगा लालटेन
बूढ़ा पेड़ कहता है... गिर जा...
यहां की रौनके शहर में चहकती हैं।
लेकिन प्रतीक्षा में खड़ा है
पुराना घर और उसका दरवाजा...


- मंजू सागर


*****


फूल

हे ईश्वर
हो सके तो मुझे
मत बनाना इंसान

आजकल
इस धरती पर
इंसान बदल गए हैं
शैतानों के शक्ल में

अगर बनाना ही है मुझे
तो एक फूल बना देना
और भेज देना
उस शैतान के बगीचे में
शायद किसी दिन
उसकी नजर मुझ पर पड़े
और मुझे तोड़ने की बजाए
हौले से मुझे सहलाए

बस उसी पल
समझ लेना
बदल रहा है शैतान
इंसान के शक्ल में।


- मोतीलाल दास


*****


जो ज़रूरी नहीं रोज़ व्यवहार में,
हम निभाया किए अपने किरदार में।

सब वहाँ की फिज़ा में ज़हर बन गए,
जो उड़ाए गए रंग बाजार में।

वो रहेंगे इधर न रहेंगे उधर,
जिनको कश्ती डुबोनी है मझधार में।

अब सलीका,शराफ़त,वफ़ा न हया,
रह गई बस शरारत ही आचार में।

वोट देकर नतीज़ा यूँ हासिल हुआ,
आ गए लोग केैसे भी सरकार में।

लोग कह न सके,आप कर न सके,
लूट चलती रही राम दरबार में।

है जुबां आपकी, सोच भी आपकी,
चुप्पियाँ ले गई जीत तकरार में।

हाल अपने बताएं , सुनाएं किसे,
साथ देते नहीं लोग इज़हार में।


- नवीन माथुर पंचोली


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बढ़ती जनसंख्या

जनसंख्या में देश हमारा,विश्व में अव्वल होगा,
हम दो हमारे दो से इस समस्या का हल होगा।

बेटा-बेटी दोनों को समान शिक्षा व अधिकार दो,
हर परिवार का हो एक ही नारा हम दो हमारे दो।

बेटा की चाहत में अपने परिवार को ना बढ़ने दो,
शिक्षा,और संस्कार के लिए बच्चों को खूब पढ़ने दो।

भुखमरी और बेरोजगारी से लोगों की जान बचायेंगे,
छोटा परिवार के नारे को सच कर हम दिखायेंगे।

छोटा सा परिवार हमारा,खुशियाँ का आधार हैं,
मिल जुल कर हम रहते है यही हमारा प्यार है।

शिक्षा-दीक्षा देकर बच्चों को काबिल हम बनायेंगे,
अशिक्षा को दूर भगाकर,शिक्षा की अलख जगायेंगे।

बेटा-बेटी दोनों अच्छा उसमें ना तुम भेद करो,
बेटियाँ, बेटों से कम नहीं यह सच स्वीकार करो।


- प्रीतम कुमार साहू


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बूढों का कैसा हो मौसम

कौन कहता है कि बुढ़े सपने नहीं देखते,
कौन कहता है बुढ़े इश्क नहीं करते,
आज भी मेरे सपनों में लड़कियां आती हैं 
आज भी वो अमरूद जामून तोड़ने को कहती हैं 
आज भी वो आमों पर निशाना लगाने को उकसाती हैं 
आज भी वो खेत खलिहानों में लुका छुपी को बुलाती हैं 
आज भी वो गांव के बड़े तालाब में-
बतखों वाली पनडुब्बी खेल को ललकारती हैं 
आज भी वो भूंजा चना-गुड लाने को पुचकारती हैं 
आज भी वो भोर-भिनसौर देह से चादर खींच -
महुआ चुनने चलने को पीछे से धकेलती हैं 
क्योंकि वो जानती हैं, 
यह सब आज़ के युवाओं के बस की बात नहीं है 
आज के युवा यह सब नहीं कर सकेगा 
गिफ्ट में महंगी से महंगी मोबाइल दे देगा
उसका और उसके महीने भर का रिचार्ज कर देगा
पर वो आम जामुन तोड़ लाकर नहीं देगा
कंद मूल, फल फूल, लाकर नहीं देगा
जंगली बेर,कनोद, सैंया कोइर,केन्द,भेलवा,पियार
खखसा -कुंदरी, और वन खीरा लाकर नहीं देगा
 यह सब उन्होंने कभी देखा नहीं, कभी चखा नहीं है
कभी बिहड़ जंगलों में गये नही
कभी पेड़-पर्वतों पर चढ़े नही 
और सपने में यह सब  आते नहीं
 गूगल कोई जंगल नहीं है 
गूगल कंद मूल फल उगाते नहीं 
गूगल का जंगल से कोई वास्ता नहीं 
 हकीक़त से उसका नाता नहीं।

तभी तो कहता हूं:-

"बूढों का मौसम कभी बुढ़ाता नहीं 
इश्क तो करते हैं, पर जताते नहीं"


- श्यामल बिहारी महतो


*****


हे राम! ये क्या कर रहे हैं हम?
बने हुए हैं हम कामचोर,
काम को बुलाते हैं और और।
जो कल थे हमारे प्यारे, दुलारे, पालनहारे,
कर दिए बेचारे, फिरते हैं मारे मारे और,
आज उन्हीं आवारा पशुओं से डर रहे हैं हम!
आवारा कुत्तों से भी डर रहे हैं हम!
हैवान बने इंसान से डर रहे हैं हम।
आवारा संतानों से भी डरने लगे हैं हम!
इकलौती संतानें ?
और फिर, अपना ही वंश नाश कर रहे हैं हम।
हर सांस में विदेशी भाषा
अंग्रेजी सिखाने और बोलने लगे हैं हम।
रहन सहन, ख़ान पान,भाषा बोली, वेशभूषा, आचरण में,
देखा देखी, भेड़ चाल अंधानुकरण अंगीकार कर रहे हैं हम,
आखिर जा कहां रहे हैं हम?
रोजगार हेतु योग्य को अयोग्य,
संरक्षण नहीं अंधाधुंध आरक्षण,
और फिर अयोग्य को योग्य बनाते ही जा रहे हैं हम।
हर क्षेत्र में जीवन को केवल और
केवल व्यापार ही व्यापार बना बैठे हैं हम।
मेरा मेरी, हेराफेरी, रिश्वतखोरी, कमीशनखोरी।
हाय पैसा!हाय हाय पैसा!
मेरी जाति-तेरी जाति,
मेरा श्मशान घाट- तेरा शमशान घाट,
मेरा धर्म-तेरा धर्म।
करते -2 कहां जा रहे हैं हम ?
देश को फिर से गुलामी और गृहयुद्ध में धकेल रहे हैं हम ?
जी हां सचमुच में अपनी ही मौत पास-पास बुला रहे हैं हम।
अपनी पहचान और संस्कृति का परित्याग कर रहे हैं हम।
श्रद्धा का भी श्राद्ध ही तो कर रहे हैं हम!
ना हया,ना शर्म लज्जा,
बाल बिखेरे,सभ्य कहला रहे हैं हम!
अपने-अपने स्वार्थ के लिए
प्रकृति को विकृत कर रहे हैं हम!
धरा से भी अन्याय कर रहे हैं हम!
भ्रम पाले कैसी सभ्यता अपना रहे हैं हम ?
हे राम! ये कहां जा रहे हैं हम ?
रघुपति राघव राजाराम!
सबको सन्मति दे भगवान!


- बृजलाल लखनपाल


*****


हँस रहा है सय्याद

बोझिल हो गई गम से मेरी पलकें
टुट गई जीने की मेरी जग से आस
दशो दिशा में लुट की कहर मची है
नहीं दीख रहा है कोई भी मेरे पास

बेईमानों चोरों की बस्ती में हमारी
पड़ोस में बस गये चेहरे दागदार
एक एक की परख है मेरी गजरों में
बैठा है नुक्कड़ पे चोरों का सरदार

जाहिलों की इस बेदर्द शिकंजे में
छट्पटाता है मेरे जिगर परवरदिगार
रूठ गई अरमानों का दिल का पिटारा
रो रहा है मेरी हौसला टुटा मेरा प्यार

मन की दर्द व्यथा कौन सुने अब
किस किस से करूँ मैं आज फरियाद
डूब गई जीवन ईष्या द्वैष की दलदल में
बैठ मंच पे हँस रहा है जालिम सय्याद

रे पुरवाई ले चल मुझे बहा कर साथ
जहाँ करता है संब प्रेम की संवाद
रे बदरा तेरे संग संग मैं चल जाऊंगा
ले चल कर देना मेरा जीवन को आबाद


- उदय किशोर साह


*****


शख्स

एक शख्स है
जो तुम्हारे इंतजार में बैठा है
मोहब्बत न सही
दोस्ती के इजहार में बैठा है।

एक शख्स है
जो सुनता नहीं
कभी किसी की भी
मगर तुम्हारी हर बात
सुनने के इंतजार में बैठा है।

एक शख्स है
जो सोचता नहीं
कभी किसी का भी
वो हर जगह हर लम्हा
तेरा एहसास लेकर बैठा है।


- डॉ. राजीव डोगरा


*****


उफ्फ्फ! यह चाय

आज फिर वही रस, वही तृप्ति,
युगों बाद जागी वह सुवास,
या कोई गुप्त रहस्य छिपा है,
जिसकी लगी रहती है आस।

कतिपय अनकहे शब्द मौन के,
घुल जाते चाय में हर बार,
मात्र तुम्हारी सुधि आते ही,
जीवंत हो उठता वही स्वाद।


- सविता सिंह मीरा


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05 July 2026

कहानी- आखिरी टिकट


स्टेशन उस शाम असामान्य रूप से भरा हुआ था। बरसात अभी-अभी थमी थी और प्लेटफ़ॉर्म की भीगी ज़मीन पर भागते कदमों की आवाज़ें किसी बेचैन धड़कन-सी सुनाई दे रही थीं। अनाउंसमेंट बार-बार एक ही बात दोहरा रहा था। “गाड़ी संख्या 12155, भोपाल एक्सप्रेस, कुछ ही मिनटों में प्लेटफ़ॉर्म नंबर तीन से प्रस्थान करेगी…”

टिकट खिड़की के सामने लंबी कतार लगी थी। उसी कतार के आख़िरी छोर पर खड़ी थी, नैना। उसकी उँगलियाँ भीग चुकी थीं, पर हथेली में दबा वह पुराना-सा पत्र अब भी सुरक्षित था। पत्र के कोने घिस गए थे, शब्द हल्के पड़ गए थे, पर एक पंक्ति आज भी उतनी ही साफ़ थी।


“अगर कभी लौटना चाहो, तो मैं उसी शहर,
उसी स्टेशन पर तुम्हारा इंतज़ार करूँगा।”






तुम्हारा आरव

नैना ने काँपते हाथों से पत्र मोड़ा। पंद्रह साल पहले वह इसी शहर से गई थी,बिना मुड़कर देखे, बिना कुछ कहे, बिना किसी सफ़ाई के। उसने प्रेम को ठुकराया नहीं था; बस घरवालों की इच्छा, पिता की बीमारी, और छोटे भाई-बहनों की ज़िम्मेदारियों के आगे अपने मन को चुप करा दिया था। फिर जीवन की दौड़ में इतनी उलझी कि पीछे छूटे एक चेहरे को बस यादों में रख सकी।

लेकिन तीन दिन पहले अचानक पुराने सामान के बीच उसे यह पत्र मिला। उसी के साथ एक और कागज़ एक अस्पताल की पर्ची, जिस पर किसी परिचित लिखावट में दर्ज था।

“आरव मेहरा हृदय रोग विभाग।”

बस तब से उसके भीतर एक ही बेचैनी थी,उसे जाना है। एक बार। केवल एक बार। कहने के लिए नहीं कि वह आज भी उससे प्रेम करती है; बल्कि यह पूछने के लिए कि क्या इतने वर्षों बाद भी किसी के इंतज़ार की उम्र बची रह जाती है ?

कतार धीरे-धीरे आगे बढ़ी। नैना जब खिड़की तक पहुँची, तो क्लर्क ने स्क्रीन पर नज़र डालते हुए कहा “भोपाल? … सिर्फ़ एक टिकट बची है। आख़िरी टिकट।”

नैना का दिल जैसे उछलकर गले में आ अटका।
“मुझे वही चाहिए,” उसने तुरंत कहा।
क्लर्क ने टिकट निकालकर उसकी ओर बढ़ा दी।
“जल्दी कीजिए, ट्रेन खुलने वाली है।”

नैना ने टिकट पकड़ ली। वह कागज़ का छोटा-सा टुकड़ा उसके लिए किसी अवसर, किसी प्रायश्चित, किसी अधूरे वाक्य का अंतिम शब्द बन गया था। वह भागती हुई प्लेटफ़ॉर्म की ओर बढ़ी। ट्रेन सीटी दे चुकी थी। किसी तरह डिब्बे में चढ़कर उसने राहत की साँस ली। सीट पर बैठते ही उसने खिड़की से बाहर देखा। बारिश की बूँदें शीशे पर बह रही थीं और बाहर का शहर पीछे छूटता जा रहा था वैसे ही जैसे वर्षों पहले छूटा था। फर्क बस इतना था कि तब वह भाग रही थी, और आज लौट रही थी।

रात लंबी थी। डिब्बे की पीली रोशनी में उसने फिर पत्र खोला। हर शब्द जैसे कोई पुराना घाव सहला रहा था। “नैना, प्रेम का अर्थ साथ पाना ही नहीं होता। कभी-कभी किसी के निर्णय का सम्मान करते हुए उसी मोड़ पर खड़े रहना भी प्रेम होता है…”

नैना की आँखें भर आईं। क्या सचमुच कोई पंद्रह साल तक उसी मोड़ पर खड़ा रह सकता है ? सुबह जब ट्रेन भोपाल पहुँची, तो उसके कदमों में अजीब-सी घबराहट थी। स्टेशन से बाहर निकलते ही उसने सीधा उसी अस्पताल का रुख किया, जिसका नाम पर्ची पर लिखा था।

अस्पताल के हृदय रोग विभाग में असामान्य शांति थी। नैना ने रिसेप्शन पर जाकर धीमे स्वर में पूछा “मुझे आरव मेहरा से मिलना है।”

रिसेप्शन पर बैठी नर्स ने कुछ क्षण उसे देखा, फिर रजिस्टर पलटते हुए पूछा “आप कौन ?”

नैना के पास इस प्रश्न का कोई सरल उत्तर नहीं था। वह कुछ पल चुप रही, फिर बोली “पुरानी पहचान हूँ… बहुत पुरानी।”


नर्स ने गहरी साँस ली। “आप देर से आई हैं।”
नैना के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। “मतलब…?”
“कल रात उनकी मृत्यु हो गई।”


शब्द बहुत साधारण थे, पर नैना के भीतर जैसे सब कुछ टूटकर बिखर गया।
उसने सामने की कुर्सी पकड़ ली। होंठ काँपे, पर आवाज़ न निकली। इतने वर्षों की दूरी, इतने बरसों का मौन, इतनी सारी अनकही बातें- सब एक ही वाक्य के नीचे दब गईं “आप देर से आई हैं।”

उसकी आँखों से आँसू ढुलक पड़े। वह किसी तरह खुद को सँभालकर मुड़ी ही थी कि नर्स ने उसे पुकारा “सुनिए…”

नैना ठिठक गई। नर्स ने दराज़ से एक छोटा-सा लिफ़ाफ़ा निकाला। “उन्होंने कहा था अगर कभी ‘नैना’ नाम की कोई स्त्री आए, तो यह उसे दे देना।”

नैना के हाथ काँप उठे। उसने लिफ़ाफ़ा खोला। भीतर एक पुरानी रेल टिकट थी पीली पड़ चुकी, किनारों से मुड़ी हुई। उसके पीछे आरव की लिखावट थी
“उस दिन तुम चली गई थीं। मैं इसी स्टेशन तक तुम्हें छोड़ने आया था। मैंने सोचा था, तुम्हें रोकूँगा… पर तुम्हारी आँखों में मजबूरी देख ली। तुम्हारी ट्रेन छूटने के बाद मैंने वापसी के लिए टिकट लिया था । आखिरी टिकट। तब समझा कि कुछ यात्राएँ साथ होकर भी अकेले पूरी करनी पड़ती हैं।

मैंने विवाह नहीं किया। इंतज़ार भी नहीं कहा उसे… बस मन ने तुम्हारे हिस्से की जगह किसी और को दी ही नहीं। यदि तुम कभी लौटो, तो अपने आपको दोष मत देना। प्रेम में देर हो सकती है, अभाव हो सकता है, विरह हो सकता है । पर शिकायत नहीं होनी चाहिए। और हाँ, यदि यह पत्र तुम्हारे हाथों तक पहुँचे, तो समझना मैंने तुम्हें अंतिम बार नहीं, आखिरी साँस तक चाहा।”

नैना के आँसू उस टिकट पर गिरते रहे। वह टिकट अब सिर्फ़ एक यात्रा का प्रमाण नहीं था; वह उन दो जीवनों का दस्तावेज़ था जो साथ चल सकते थे, पर समय की पटरियाँ उन्हें अलग दिशाओं में ले गईं। नर्स ने धीरे से कहा "उनके तकिए के नीचे यह टिकट हमेशा रहती थी। आखिरी दिनों में भी अक्सर कहते थे। ‘कुछ लोग लौटते नहीं, फिर भी उनके लिए दरवाज़ा खुला रखना चाहिए।"

नैना ने टिकट को सीने से लगा लिया। वह अस्पताल की खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गई। बाहर वही सुबह थी, वही भीगा शहर, वही भागती दुनिया पर उसके भीतर सब कुछ स्थिर हो चुका था। उसने पहली बार जाना। हर स्टेशन पर छूट जाने वाली चीज़ ट्रेन नहीं होती; कभी-कभी एक पूरा जीवन छूट जाता है।

और उस दिन उसे यह भी समझ आया कि
दुनिया में सबसे भारी कागज़ कोई वसीयत,
कोई डिग्री, कोई दस्तावेज़ नहीं होता।
सबसे भारी होता है वह “आखिरी टिकट”,
जो हमें वहाँ तो पहुँचा देती है जहाँ हमें जाना था,
पर वहाँ नहीं पहुँचा पाती जहाँ हमें समय रहते होना चाहिए था।


- डॉ. सारिका ठाकुर 'जागृति'



योग धर्म नहीं विज्ञान हैं, मन की शांति योग से ही संभव


यूं कहे तो योग धर्म नहीं बल्कि विज्ञान जगत हैं। योग में ये शक्ति है की ये हमारे शरीर, मन एवम आत्मा को जोड़ने का विधान है। योग सम्पूर्ण मनुष्य के शरीर, मन एवम आत्मा को ऊर्जा, तागद एवम सौंदर्य प्रदान करता है। योग से कई प्रकार की चीजे निकल कर आई है अगर मनुष्य द्वारा रोज इस मूल्यवान विधान को अपना लिया जाए तो मनुष्य को कई रोगों से छुटकारा मिल सकता है।





योग का अर्थ है अपने आप को ऊर्जा में समाहित करना, उससे जोड़ना। अगर मानव में प्रतिदिन योग करने की चाहत हो जाए तो यू मान लीजिए की वह अपने स्वास्थ्य जीवन और सौंदर्यता को प्राप्त कर ही लेगा। रोगमुक्त जीवन जीने के लिए हर व्यक्ति को इस भागदौड़ रूपी जिंदगी से कुछ समय निकालकर योग करने की आदत डालने की आवश्यकता है।

आध्यात्मिक प्रगति के तरफ मनुष्य की झुकाव हो इसके लिए योग एक अनिवार्य चीज़े बन चुकी हैं। अवसाद को दूर करने के लिए योग एक वरदान से कम नहीं है।

आत्मा से जुड़ने के लिए योग दर्शन परम आवश्यक है।स्वयं को बदलने से ही इस अलौकिक विश्व में बदलाव आएगा एवम योग से ही जीवन सुखमय होगा। जिनके शरीर और मन स्वस्थ नहीं होते हैं उनके मस्तिक में चेतना और काया में फुर्ती नाम मात्र ही होती है। अगर आप अशांत है एवम आपका किसी काम में मन नहीं लगता है तो योग जरूर अपनाएं।

सफलता तो तीन चीजों में ही आधुनिक संसार में मापी जाती रही हैं दौलत सोहरत और शांति एवम शांति हमेशा योग से ही मिलता है। अपने व्यक्तिगत कमियों पर चिंतन करना और खामियों को दूर करने के लिए योग का रास्ता तालशना होगा।


- दीपक कुमार सिंह

02 July 2026

छायाचित्राधारित पंक्तियाँ पढ़िए- 03 जुलाई 2026






अडिग खड़ा हिमालय है, भारत का मस्तक है,
जब जी चाहे घुम्मकड़, पंहुच जाते है आग़ोश में,
कितना सुकून मिलता है, सारी थकान मिट जाती है,
ताज़ी हवा वातावरण में, जब प्रकृति में घुल जाता है।

- सुमन डोभाल काला


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उच्च हिमालय के तल पर, यह कौन खड़ा छत्र उठाए।
जैसे लगता है कान्हा, अंगुली में है गोवर्धन उठाए।

- रत्ना बापुली


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हमने अपनी पूरी सम्भावनाओं के
साथ हाथ फैलाकर देख लिए,
रे कुदरत, तेरे आगे आज भी हम छोटे हैं।
देख-सदियों से अडिग खड़ा हिमालय तेरा,
हमारे क्षणिक सर्जन के भी टोटे हैं।

- स्वाति जोशी


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हिम-शिखरों ने आज फिर, साहस का संदेश सुनाया।
जो ऊँचाइयों से प्रेम करे, उसने जीवन का अर्थ पाया।

- डॉ. सारिका ठाकुर 'जागृति'


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ख्वाहिश

काश तेरी पनाहों में एक बसेरा हो,
हर रात मै कविता लिखूं...
जब तुम सुकून से पढ़ो,
तो तसल्ली से एक सबेरा हो।

- सुतपा घोष


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महफ़िल की भीड़ में भी तन्हा था, क्या अपने क्या पराये।
तन्हाइयों में भी महफ़िल जता गये, ये पर्वतों के साये।

- कुणाल


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खुशनुमा है ये धरती और आसमान ,
आच्छादित है बर्फ से घाटियां महान।

- मनोज कौशल


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बर्फ से ढके मनमोहक पहाड़, प्रकृति की अनुपम छटा देखकर,
इस निर्जन, एकाकी स्थान पर भी हृदय आनंदित हो गया।

- प्रवीण कुमार


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ऊँचाइयों पर पहुँचकर, बस इतना एहसास हुआ,
सबसे सुंदर मंज़िल, अपने ही भीतर मिली।

- नरेंद्र मंघनानी


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शहर की उदासी से, जेब की लाचारी से, भाग चलें कही दूर हम।
नदी किनारे बैठ कर, पर्वत से लग कर, छोड़ दे सारे दुःख, दर्द और गम।

- प्रणव राज


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एक दूसरे को निहार रहे,
कौन ? कितना पिघल रहे।

- जितेंद्र बोयल


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दुनियां से दूर, खुद के पास, जहां है अपनी ही तलाश।
कितना मीठा, कितना सुखद, है यह मन का एहसास।

- रोशन झा


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धवल हिमगिरी शिखर की तलहटी में पलता जीवन मोती,
गगन चुंबी तरुवर की छाया में हो प्यारी सी कुटिया।
उसके रक्त चन्दन से छत के नीचे खड़े होकर,
मैं निहारु असली मोती, मैं निहारु असली मोती,
असीम मिलती शान्ति जहां, हर वक्त विचरण करता रहूँ वहां।

- बाबू राम धीमान


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