दोस्ती
अश्कों की नमी सी है दोस्ती हमारी,
छलक जाये बातों बातों पर मेरी तुम्हारी ।
युगों से चलती एक प्रेम की रीत पुरानी,
सिर्फ इस रिश्तें में चलती बचपन की नादानी।
पवित्र गंगाजल सी मन में समाहित हो जाती,
संज्ञा रहित मुझे पूर्ण की अनुभूति कराती।
बचपन जवानी बुढ़ापे की कहानी है जीती,
फिर भी नहीं लगता कोई निशानी बीती।
भोर और सांझ के निःस्वार्थ मिलन सी,
न वादे, न दायरे, न उम्मीदों की चुभन सी।
प्रार्थना,श्रद्धा,जड़ी बूटी का घुला अटूट मिश्रण,
मौन चुप्पी भाषा का करती बेजोड़ चित्रण।
अलंकारों, छंदों का उजास बिखेरती,
वक्त के दीमक को है पल में समेटती।
दूरियों में भी मेरे एहसासों को बांधती,
रूठने मनाने के न जाने कितने सिलसिले लांघती।
खुशी गम दोनों में संगम सी है मिलती,
गंगा जमुना के अविरल प्रवाह सी है चलती।
- अंशिता त्रिपाठी
*****
दोस्ती
दोस्ती नही कभी आजमायी जाती,
ये तो बस आपस में निभाई जाती।
ऊंच नीच का फर्क नही है दोस्ती में
बिना भेद के दोस्ती अपनाई जाती।
सवाल जबाब से परे रहती दोस्ती,
विश्वास एक दूसरे पर कमाई जाती।
दोस्त दूर या पास रहते सदैव खास,
दूरियां दिलों की इसमें मिटाई जाती।
मुश्किल में ढाल बन जाते हैं दोस्त,
दोस्ती ऐसी मुश्किल से पाई जाती।
जीवन को बीच मंझधार में नही छोड़े,
ऐसी दोस्ती कठिनाई से बनाई जाती।
काले धूसर रंगों से भरे जीवन को भी,
सतरँगी बनाना दोस्ती को बताई जाती।
दोस्ती नही कभी आजमाई जाती,
ये तो बस आपस मे निभाई जाती।
- रूचिका राय
*****
साथी
साथी, दो जिस्म एक है जान,
साथी है तो, काम सब आसान,
मन की सारी व्यथा
साथी ही है, जो सुनता।
औरों के क्या कहने,
रहते वो सदैव, छलने,
साथी, जीवन के आन, बान शान,
साथी है तो, तू है महान।
- चुन्नू साहा
*****
जंतर-मंतर
विज्ञान के
आने से
चमत्कार तो
बंद हुए
मगर
जंतर-मंतर
अभी भी
कायम हैं
कोई माने
या न माने
जंतर-मंतर
होता
जरूर हैं
कोकरोच किसी
और ने कहा
भड़का कोई
भूखा कोई
लठ्ठ खाये कोई
झुका कोई
इस्तीफा दिया कोई
मंत्री बना कोई
सच में
जंतर-मंतर
होता है!
- डॉ. जितेन्द्र बोयल
*****
पहला मित्र
हँसी बाँटी, आँसू बाँटे,
साथ चले हर धूप-बरसात।
न कोई बंधन, न अनुबंध,
मन से मन का था संबंध।
राहें भले बदल गईं आज,
स्मृतियाँ अब भी हैं हमराज़।
दूरी चाहे जितनी आए,
स्नेह कभी कम हो न पाए।
आज मित्रता-दिवस के दिन,
याद तुम्हारी आई फिर।
जहाँ रहो, मुस्काते रहना,
जीवन-दीप जलाते रहना।
पहला मित्र न भूल सकेगा,
मन जब तक धड़कन लिखेगा।
- नरेंद्र मंघनानी
*****
बस तेरा साथ चाहिए
भले ही राहें मुश्किल हों और मंजिल दूर,
पर तेरा साथ हो तो हर सफर मंजूर।
थामे रहना तुम हाथ मेरा...
हर वक़्त साथ चाहिए तुम्हारा।
मुझे चलने के लिए कारवाँ नहीं चाहिए
लड़खड़ा जाए पावं मगर,
ए दोस्त... बस हाथ चाहिए तुम्हारा,
हर वक़्त साथ चाहिए तुम्हारा।
नाराज़गी में भी एक आस होती है,
सच्ची दोस्ती वाकई हमेशा खास होती है।
लड़खड़ाने न देंगे कभी कदम तुम्हारा,
हर वक़्त साथ चाहिए तुम्हारा।
- सूरजमल AkS
*****
मैं चाहता हूं
जीवन को जीना एक ख्वाब है,
मैं उस ख्वाब से जीवन जीना चाहता हूं।
मिलती है हर कदम में ना उम्मीदियां मुझे,
मैं उन ना-उम्मीदिया के संग ख्वाब सजाना चाहता हूं।
यह जग नहीं प्रपंच है भ्रमों का
मैं उन भ्रमों से परे उम्मीदों का दीपक जलाना चाहता हूं।
तुम्हारा जाना, गमों का आना
ख्वाबों का टूटना, टूटे ख्वाबों के संग आँखों का रोना।
रोती आँखों से मन का विचलित होना, होते है जीवन के संग
इन सब को एक तरफ कर मैं अपनी
सफलता का प्रकाश बिखेरना चाहता हूं।
जीवन को जीना एक ख्वाब है,
मैं उस ख्वाब के संग जीवन जीना चाहता हूं।
- कमल जोशी
*****
डायरी की कहानी
वो डायरी,
जो महीनों से खाली थी।
खुलती रोज थी,
ओर वैसे ही बंद हो जाती थी।
फिर एक दिन आया,
जो शब्दों का सैलाब लाया।
जो बातें दिल तक नहीं रुकी,
वो डायरी में समा गई।
आज पन्नों पर स्याही है,
स्याही में शब्द हैं,
शब्दों में गहराई है,
और डायरी बोल रही हैं।
अब वो डायरी,
जो कभी खाली थी,
मुझसे बात करती है।
मैं उसे , वो मुझे,
अपने किस्से बताया करती है।
- दीपा पाण्डे
*****
"ताजा ताजा है"
उम्र पर धूल जमी वक्त की आंधियों की,
पर याद तुम्हारी आज भी ताज़ा-ताज़ा है
न शिकवा न कोई गिला है ज़माने से,
पर आज भी ये घाव मेरा ताज़ा-ताज़ा है
भुलाने की कोशिश में सावन भी गुज़र गया,
पर प्यार की बारिश आज भी ताज़ा-ताज़ा है
दफ़न कर दिए कई पन्ने खतों के,
पर उनकी खुशबू आज भी ताज़ा-ताज़ा है
रिश्तों के कई फूल मुरझा कर गिर गए,
पर उनकी चुभन आज भी ताज़ा-ताज़ा है
- रत्ना बापुली
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प्रेम-डोर जब थाम ली, जुड़ते सकल जहान।
अहं तनिक जो बीच में, उजड़े सब उद्यान॥
धागे के दो छोर हैं, दो जीवन के द्वार।
एक सँभाले याद को, दूजा दे विस्तार॥
कंपन-कंपन कह रहा, जीवन रचा विधान-
प्रेम-डोर जब थाम ली, जुड़ते सकल जहान॥
खींचा यदि अहंकार ने, टूटी हर पहचान।
जीत गए शब्दों मगर, हार गया इंसान॥
झुककर जिसने बाँध ली, वही रहता महान-
प्रेम-डोर जब थाम ली, जुड़ते सकल जहान॥
प्रेम न केवल भाव है, जीवन का आधार।
सूखे मन में भी जगा, हरियाला संसार॥
बाँट सका जो नेह को, पाया अमृत-दान-
प्रेम-डोर जब थाम ली, जुड़ते सकल जहान॥
विश्वासों की उँगलियाँ, थामे जब विश्वास।
अदृश्यों में दिखने लगे, सृष्टि-हृदय के पास॥
ब्रह्मांडों की डोर भी, प्रेममयी पहचान-
प्रेम-डोर जब थाम ली, जुड़ते सकल जहान॥
- डॉ. प्रियंका सौरभ
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निश्चल संवेदना
बदलते वक्त के साथ
बहुत कुछ बदलता देखा
मित्र को शत्रु बनते
शत्रु को मित्र बनते देखा।
जानता भी नहीं था जिनको
उनको अपना बनते देखा
और जानता था जिनको
उनको पराया होते देखा।
भागता रहा हमेशा ही
अपनों की तलाश में
खोजता रहा भावनाओं के द्वार
हर किसी के हृदय में।
अन्वेषण करता रहा
विचारों को समझने वालों की
खोजता रहा मन के मीतों को
जो समझ जाए मेरे हृदय की
हर निश्चल संवेदनाओं को।
- डॉ.राजीव डोगरा
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चूहे जो मिली सुंडी री गठी
सै पण्सारी बणी गया,
सुंडी री गठी रा खोली कन्ने पण्सारखाना
सै अमर हुई गया,
गल्ला कत्थी कन्ने लोक बणादें ख्वाणे,
बराक आई कन्ने जीभा ज़बानी पर
सै अमर हुई गया,
चूहे जो मिली सुंडी री गठी
सै पण्सारी बणी गया,
छड्डी दित्ते कुतरने लेफ रजाईयाँ
छड्डी दित्ता कड्डणा मस्सकेर,
पण्सारखाने रे चक्करा बिच पई कन्ने
भूली गया बिला रा बी फेर,
भूली गया बिला रा बी फेर,
देखी कन्ने बिल्ली मिंजो
तुनकणे लगी कानाओं अपणे
बणने लगी गई शेर,
तिस्सा जो देखी कन्ने, सोचा बिच पई गया चूहा
चार-चफेरे नज़रां घुमाईयाँ,करदा सोच-विचार -
सुंडी री गठी जे नईं मिली हुंदी
न आऊँदी आफ़त, न बणदा पण्सारी,
खरा था सै बिल, खरा था सै मस्सकेरा रा ढेर
न तुनकणे थे कान बिल्लिया, न तिस्सा बणना था शेर।
- बाबू राम धीमान
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फकीरों की संसार
ये है फकीरों की अद्भूत संसार
यहाँ नहीं लगती दौलत की बाजार
हर जन मस्ती में यहाँ है चूर
चिन्ता फिक्र है जहाँ से कोसों दूर
दिल से है हर जन जन धनवान
लुट खसोट की नहीं कहीं है दुकान
हर शख्स अपने में है यहाँ मगरूर
वैमनस्यता को ना जगह है हुजूर
हर मन में बसा है शांति की अरमान
सब ग्रामीणों पे रब है यहाँ मेहरवान
हर चेहरे पे झलकता यहाँ पे नूर
खुदा को भी है ये नगर मंजूर
भाईचारा की सबका जहाँ कारीबार
बेईमानों की ना है कोई भी व्यापार
ईमानदारी की है जहाँ रस्म। दस्तूर
हर जन जन पे छाई है हँसी की सरूर
काश ! इस जगत सा होता ये संसार
दुश्मन भी शर्म से हो जाता शर्मसार
दोस्ती के लिये हर मानव होता मजबूर
मस्ती में झूमता कण कण में मजकूर
- उदय किशोर साह
ये है फकीरों की अद्भूत संसार
यहाँ नहीं लगती दौलत की बाजार
हर जन मस्ती में यहाँ है चूर
चिन्ता फिक्र है जहाँ से कोसों दूर
दिल से है हर जन जन धनवान
लुट खसोट की नहीं कहीं है दुकान
हर शख्स अपने में है यहाँ मगरूर
वैमनस्यता को ना जगह है हुजूर
हर मन में बसा है शांति की अरमान
सब ग्रामीणों पे रब है यहाँ मेहरवान
हर चेहरे पे झलकता यहाँ पे नूर
खुदा को भी है ये नगर मंजूर
भाईचारा की सबका जहाँ कारीबार
बेईमानों की ना है कोई भी व्यापार
ईमानदारी की है जहाँ रस्म। दस्तूर
हर जन जन पे छाई है हँसी की सरूर
काश ! इस जगत सा होता ये संसार
दुश्मन भी शर्म से हो जाता शर्मसार
दोस्ती के लिये हर मानव होता मजबूर
मस्ती में झूमता कण कण में मजकूर
- उदय किशोर साह
*****
आना-जाना लिखते हो।
खोना- पाना लिखते हो।
चुन-चुन कर अल्फ़ाज़ सही,
हाल ज़माना लिखते हो।
लिखते हो बातें अपनी,
सच बेगाना लिखते हो।
ग़ज़लों में तुम जीवन का,
ताना -बाना लिखते हो।
दिखलाकर सबको सपना,
मन समझाना लिखते हो।
मुश्किल,आसाँ हो सबका,
आबो-दाना लिखते हो।
बातों ही बातों में तुम,
तीर चलाना लिखते हो।
- नवीन माथुर पंचोली
खोना- पाना लिखते हो।
चुन-चुन कर अल्फ़ाज़ सही,
हाल ज़माना लिखते हो।
लिखते हो बातें अपनी,
सच बेगाना लिखते हो।
ग़ज़लों में तुम जीवन का,
ताना -बाना लिखते हो।
दिखलाकर सबको सपना,
मन समझाना लिखते हो।
मुश्किल,आसाँ हो सबका,
आबो-दाना लिखते हो।
बातों ही बातों में तुम,
तीर चलाना लिखते हो।
- नवीन माथुर पंचोली
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नारी
नारी की क्या परिभाषा दूं।
वो तो जग की एक आशा है।
उसकी शक्ति और प्रेम ही तो है जो,
इस घर को मंदिर बनाती है।
पूजा है, अर्चना है,
वो शंकर की साधना है।
कभी रीति के रिवाजमें,
वो देवी है हर लिबाज में।
ज्वाला है, पवन है,
वो बहती शीतल गंगा की धारा है।
कविता है, कहानी है,
वो हर महाकाव्य की गाथा है।
लक्ष्मी है, सरस्वती है
वो रणभूमि की महाकाली है।
भक्ति है उस नारी की,
शक्ति है उस चिंगारी की।
जितना तुम उसे दबाओगे
एक ज्वाला को भड़काओगे।
देखा तप-तप के शोलों पे,
ये जल-बन चुका ज्वाला है।
तोड़ बेड़ियाँ सदियों की,
अब नारी ने रण संभाला है।
छोड़कर शृंगार रस की बातें,
शक्ति ने उठालिया भाला है।
जीत लिया ज़मी से नभ तक,
इतिहास नया रच डाला है।
निकल के खुले गगन में,
पहनी विजय श्री माला है।
जिससे पूर्ण होता है ब्रह्मांड,
यही तो नारी की परिभाषा है।
- समृद्धि विश्वकर्मा
नारी की क्या परिभाषा दूं।
वो तो जग की एक आशा है।
उसकी शक्ति और प्रेम ही तो है जो,
इस घर को मंदिर बनाती है।
पूजा है, अर्चना है,
वो शंकर की साधना है।
कभी रीति के रिवाजमें,
वो देवी है हर लिबाज में।
ज्वाला है, पवन है,
वो बहती शीतल गंगा की धारा है।
कविता है, कहानी है,
वो हर महाकाव्य की गाथा है।
लक्ष्मी है, सरस्वती है
वो रणभूमि की महाकाली है।
भक्ति है उस नारी की,
शक्ति है उस चिंगारी की।
जितना तुम उसे दबाओगे
एक ज्वाला को भड़काओगे।
देखा तप-तप के शोलों पे,
ये जल-बन चुका ज्वाला है।
तोड़ बेड़ियाँ सदियों की,
अब नारी ने रण संभाला है।
छोड़कर शृंगार रस की बातें,
शक्ति ने उठालिया भाला है।
जीत लिया ज़मी से नभ तक,
इतिहास नया रच डाला है।
निकल के खुले गगन में,
पहनी विजय श्री माला है।
जिससे पूर्ण होता है ब्रह्मांड,
यही तो नारी की परिभाषा है।
- समृद्धि विश्वकर्मा
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आपका परिचय
आपकी परिचय है खुद आपकी व्यवहार
वार्तालाप का लहजा बताता है संस्कार
चाल चलन है नमूना तेरा तेरे का परिवार
कुछ पूछने बताने की नहीं है अब दरकार
आपकी करतूत से दिखता आपकी विचार
सूरत आपका बतलाता है आपकी संसार
संवाद दिखलाता है आपकी अहंकार
कुछ पूछने बताने की है नहीं अब दरकार
करते हो पड़ोसी से गर नित्य ही तकरार
पता चलता है आपके जेहन की कुविचार
तेरी आदत बन गई तेरी ही। सहचार
कुछ पूछने बताने की नहीं है अब दरकार
गुरूर से पता चलता है तेरी घर का द्वार
हनक दिखलाता है तेरी कितना हो समझदार
जिद बालाता है तेरी खुद की आचार विचार
कुछ पूछने बताने की नहीं है अब दरकार
घमंड की बगिया को है जो भी बयार
औछेपन की नगरी का हो तुम बाजार
बात बात पे करते है किसी के साथ र्दुव्यवहार
कुछ पूछने बताने की नहीं है अब दरकार
- उदय किशोर साह
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दो लफ़्ज़ लिखूँ माँ के लिए,
पर क्या ही लिखूँ
प्यार लिखूँ या संसार लिखूँ
या अपने जीवन का सारांश लिखूँ,
दो लफ़्ज़ लिखूँ वह भी कम
आखिर क्या ही लिखूँ,
मैं इतना कामयाब नहीं
कि माँ के बारे में कुछ लिख सकूँ,
दो लफ़्ज़ लिखूँ माँ के लिए
पर क्या ही लिखूँ,
माँ के होने से जीवन में खुशी
उन्नत प्रगति है,
दो लफ़्ज़ लिखूँ आखिर क्या ही लिखूँ,
माँ का होना क्यों जरूरी है
इसके बारे में क्या ही लिखूँ,
दो लफ़्ज़ लिखूँ माँ के लिए
पर क्या ही लिखूँ।
- प्रीत मौर्या
*****
अपने ज़मीर से लड़लूं, कोई अखबार हो जाऊं
हक़ की बातें न करूं मैं सच्चाई से दूर हो जाऊं,
अपने ज़मीर से लड़लूं, कोई अख़बार हो जाऊं।
मेरे दिल को हो गया भरम कि मैं फ़रिश्ता हूं,
मगर डर लगता है ज़माने से इंसान हो जाऊं।
तिजारत का है बाज़ार, हर चीज़ यहां है सस्ती,
ज़माने के साथ चलूं ईश्क़ का बाज़ार हो जाऊं।
उससे है गर मुहब्बत तुझको तो सोचना क्या है,
बेहतर है कि बस उसका ही तलबगार हो जाऊं।
ग़लतियां मेरी नहीं हैं फ़िर भी अब बहुत सोचूं,
बड़ा हूं घर का अब मैं ही समझदार हो जाऊं।
ईश्क़ के सभी रिश्ते यहां कच्चे धागों से बंधे हैं,
मैं भी इस खेल का मुश्ताक़, फ़नकार हो जाऊं।
- डॉ. मुश्ताक अहमद शाह "सहज़"
*****
तुम्हारी गलियों का कुछ और सच है,
सिर्फ चुप रहना ही तुम्हारा कवच है।
करके भरोसा नक्शे कदम पर चला,
आंख खोला तो हर कदम पर गच है।
हर चाहतें लूटा दी सिर्फ तेरे भरोसे पर,
सबकुछ पचाने वाले! ये क्यों अपच है?
सनद रहे चोरी सीनाजोरी सदा नहीं चलती,
बाहर मौन है मगर अंदर रहा शोर मच है।
विकास उसके सर से पगड़ी उतरेगी एकदिन जरूर,
सर छुपा के जिन्दा है भला बताओ कैसा सरपंच है ?
- राधेश विकास
*****
सावन की बूँदे
मुझे सावन की बूंदों से
बहुत सी बातें करनी है,
बहुत कुछ पूछना है...
जब तुम मोती बनकर
ठहर जाती हो पत्तों पर,
क्या भय नहीं होता
अपने अस्तित्व के अंत होने पर ?
जब गिरती हो किसी की
कोमल हथेली पर,
सच सच कहना...
क्या जी लेती हो जी भर ?
तुम हमेशा बिछड़ जाती हो
अपने बादलों से ,
फिर उनसे मिलन कब होता है ?
क्या तुमसे बिछड़कर
तुम्हारी तरह बादल भी रोता है ?
कर देती हो ये धरा हरी भरी
लेकिन तुम पगली प्यासी सी
किसी ओस के पत्ते पर पड़ी,
निहारती हो धूप को,
खुद का अंत होने तक
सावन की बूंदों मुझे तुमसे
बहुत कुछ पूछना है ...
आखिर इतना धैर्य तुम कहां से लाती हो ?
समुंदर में गिरो तो सीप का मोती
मिट्टी में गिरो तो खुशबू बन जाती हो।
- मंजू सागर
*****







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