साहित्य चक्र

22 August 2026

दिमाग़ी-नक्सल के जुमले में...


दिमाग़ी-नक्सल के जुमले में सुविधाओं और पूर्वाग्रहों की पहचान का मुद्दा भी खोजा जा सकता है। इसे बराऐख़ास सत्ता-पक्ष और विपक्ष के वरिष्ठ-बुद्धिमान अपने-अपने नज़रिए से देखने में कुछ दूसरे ही ख़ास आग्रहों-दुराग्रहों का इस्तेमाल कर सकते हैं, बल्कि करेंगे और कर ही रहे हैं।

रोटी-रोज़गार मिले,नहीं मिले,संसद में गर्मागर्म स्वादिष्ट-मसालेदार बहस का तमाशा मिलता रहना चाहिए। तीस पर तुर्रा कहिए कि अख़बार तो हैं ही। कहीं किसी एक लोकोक्ति में कहा भी गया है कि मनोरंजन से भूख मर जाती है ?





किसी भी लोकतांत्रिक-व्यवस्था में तलवार अथवा बंदूक की बजाय संवाद ही कारग़र हथियार साबित होता रहा है और उम्मीद की जा सकती है कि होता रहेगा। तमाम-तमाम दबावों और संदर्भों के बावजूद स्मरण रखा जा सकता है कि अप्प दीपो भव: ! बुद्ध ने भी असंभव को संभव तक ले आने का यही रवैया तथा रास्ता प्रतिपादित किया है।

मानाकि बुद्ध के देश में इस वक़्त,न तो कहीं बुद्ध का बुद्धत्व है और न कहीं देश-काल.फिर भी नागरिकों की पहली और आख़िरी ख़्वाहिश यही है कि सभी जन सुख-शांति का जीवन पाऍं.क्या ये संभव नहीं?एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों! कलाओं का जादू,अपने नित-नित बदलते जाते अभिप्रायों के रहते,अपनी स्थापनाऍं एक हद तक ही बरक़रार रख पाता है।

बाद मुद्दत के आज़ादी पाई है। पुरखों ने कोड़े खाए हैं, भूखे रहे हैं, सज़ाऍं काटी हैं। आज फिर से विदेशी पूॅंजीगत-शक्तियों ने देशभर में अनचाहा-मनचाहा अतिक्रमण कर लिया है। विदेशी कर्ज़ की जकड़न कुछ इस हद तक त्रस्तता-आग्रही हो गई है कि चारों ओर प्रतिबंध ही प्रतिबंध उपलब्ध हैं।


स्वतंत्र-विकलताऍं बढ़ रही हैं और स्वतंत्र-मान्यताऍं घट रही हैं। विश्वास और अविश्वास के परंपरागत पैमानों ने दम तोड़ दिया है। हर कोई शक़ के दायरे में है। हर किसी पर चाहते,न चाहते हुए भी शक़ चस्पा कर दिया गया है। निठल्लों की चाॅंदी हो रही है और मौज़ूदा सरकार अपने नागरिकों को पानी में चाॅंद देखने के लिए विशेषतः विवश कर रही है।

धर्म-कर्म के स्थानों पर भीड़ बढ़ती जा रही है और उसी अनुपात में भगदड़ तथा गंदगी का महा-सडाॅंधभरा साम्राज्य भी। दिक़्क़त और आपत्ति की बात यही है कि इस भीड़ में वह zen-z और zen-alfa भी तन-मन-धन सहित जोशोख़रोश से शामिल है, जो अभी-अभी अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर आंदोलनरत है ?

कहना कठिन नहीं है कि दिल्ली अमी अस्तो, अमी अस्तो,अमी अस्त...?


- राजकुमार कुम्भज




कच्चा मकान


बहुत समय पहले किसी गांव में शंकर नाम का एक किसान रहता था। वह बहुत ईमानदार पर आलसी था। साथ ही उसकी एक बुरी आदत थी वह अपनी गलती दूसरों पर थोप देता था और खुद अपनी गलती को स्वीकार करने से कतराता था। वह उस गांव में एक कच्चे घर में रहता था। वह एक ऐसे परिवार से आता था जिसमें सब गरीब थे। उसके पिता जी ने उसके लिए विरासत में केवल यही एक कच्चा मकान छोड़ा था।





गांव में ज्यादातर घर पक्की ईटों के बने थे जो एक-दो कच्चे थे उनके मालिकों ने अपने घर के सामने ईंटे गिरवा शुरू भी कर दिया था। अब गांव में बस शंकर का परिवार ही था जो अभी तक कच्ची मिट्टी के घर में रहता था। शंकर के पास एक जमीन थी, जो उसके पूर्वजों की थी। उसी पर परिवार का सारा बोझ था, पर वह जमीन भी अब बूढी हो चुकी थी। खेती उतनी खास होती नहीं थी। एक दिन शंकर तमतमाते हुए घर में घुसा।

“मेरे पिता ने मुझे पैदा ही क्यों किया?”

शंकर ने खाट पर बैठते हुए कहा- “क्या हुआ जी ऐसा क्यों बोल रहे हैं?”

पत्नी ने पूछा- “अरे! कम से कम इस मिट्टी के घर में तो नहीं रहना पड़ता, बरसात भी आने वाली है पता नहीं इस घर का अब क्या होगा? अब तो खेती भी बंद हो रही है। नहीं तो पैसों से मैं भी ईंटे गिरवा लेता।”

“तो इसमें आपकी बाबूजी की क्या गलती है?” “उन्हीं की तो गलती है, इतना सम्मान पाकर क्या मिला? यह कच्चा घर और बंजर होती जमीन!”

शंकर चाहता तो मेहनत मजदूरी करके कुछ पैसे इकट्ठे कर लेता, पर वह अपने पिता की हार चढ़ी तस्वीर की ओर देखकर तमतमाते हुए कुछ बुदबुदाने लगा।

शंकर ने उसकी गरीबी का जिम्मेदार अपने पिता को ठहराया। वह पहले कुछ काम किया भी करता था। अब तो वह भी बंद हो गया। सुबह देर से उठता था, दोपहर को खेत पर बिना मन के जाता और अगर धूप तेज होती तो जाता ही नहीं था। फसल हुई या नहीं, गायों ने चरा या बिना पानी के सुख गई, इसकी उसको कोई परवाह नहीं थी। उससे कोई पूछता की खेती आजकल नहीं तो रही है क्या? तो कहता- “अरे भाई मेरे पिता की बदकिस्मती मेरे सर आ गई है, झेलना ही पड़ेगा”




एक दिन ऐसा आया कि रात के चूल्हे के लिए पड़ोसी से अनाज मांगना पड़ा। घर तो कमजोर था ही और इस कमजोरी में सुई चुभाने के लिए बरसात भी हो गई और इतनी की शंकर का घर मिट्टी में मिल गया। शंकर और उसकी पत्नी जमीन पर बैठे कुछ सामान संदूक में रख रहे थे ताकि वह भीग ना जाए। तभी ऊपर बची हुई छत के खपड़े से कुछ, शंकर के सिर पर गिरा।

“हाय! सिर फोड़ डाला” शंकर चिल्लाया। जब नीचे देखा तो एक गंदा और पुराना झोला पड़ा था।

“अरे! यह क्या है?” उसकी पत्नी ने हैरान होकर पूछा।

“क्या मालूम?”

शंकर ने झोले को धीरे से खोला, वह झोला नोटों से भरा हुआ था। यह देख दोनों की आंखें फटी रह गईं। उस नोटों के साथ एक पुराना कागज़ का टुकड़ा भी था। जब शंकर ने उस कागज को खोला तो उसमें उसके पिता की लिखावट थी। और उसमें लिखा था

प्रिय शंकर,
मुझे पता है कि यदि तुम्हें यह पत्र मिला है तो तुम्हारा मिट्टी का कच्चा घर बरसात में ढह चुका है। मैने इस झोले में पैसे रखे हैं, जो मैने अपने जीवन भर में कमाए हैं। जिसे तुम अपने पक्के घर की कामना पूरी कर सकते हो। मैं चाहता था कि तुम अपनी मेहनत से एक नया घर बनवाओ। पर, ये पैसे तुम्हारी विरासत हैं। मेरा आशीर्वाद तो हमेशा तुम्हारे साथ है।

- तुम्हारे पिता

यह पढ़कर शंकर की आंखों में आंसू आ गए।
पिता के लिए उसके दिल में जो खराब तस्वीर बनी हुई थी, वह साफ हो जाती है। उसे अपनी गलती का भी पता चलता है। वह उन पैसों से एक नया पक्का घर बनावत है और एक नई उपजाऊ जमीन भी खरीदता है। उस जमीन पे वह बैल की तरह काम करके काफी तरक्की करता है।


- प्रणव राज, बिहार



उत्तराखण्ड की जनजातियाँ: कठिन परिस्थितियों में जीवन और संस्कृति की मिसाल


हमारा राज्य उत्तराखण्ड 9 नवंबर 2000 को उत्तर प्रदेश से अलग होकर एक पृथक राज्य बना। राज्य गठन के इतने वर्षों बाद भी उत्तराखण्ड की स्थायी राजधानी का प्रश्न पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाया है। वर्तमान में देहरादून राज्य की अस्थायी राजधानी है। भौगोलिक दृष्टि से उत्तराखण्ड एक महत्वपूर्ण सीमावर्ती राज्य है। इसकी सीमाएँ चीन और नेपाल से लगती हैं। उत्तरकाशी, चमोली और पिथौरागढ़ जिलों की सीमाएँ चीन-तिब्बत से लगी हुई हैं, जबकि पिथौरागढ़, चंपावत और ऊधम सिंह नगर की सीमाएँ नेपाल से जुड़ी हैं। नीति और माना जैसे सीमावर्ती क्षेत्र सामरिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।



उत्तराखण्ड में विभिन्न जनजातियाँ निवास करती हैं। इनमें भोटिया, जौनसारी, बुक्सा, थारू, राजी और अन्य जनजातीय समुदाय प्रमुख हैं। इन समुदायों की अपनी विशिष्ट संस्कृति, परंपराएँ, भाषा, वेशभूषा और जीवन-पद्धति है, जो उत्तराखण्ड की सांस्कृतिक विविधता को समृद्ध बनाती है। इन जनजातीय समुदायों की आजीविका लंबे समय से भेड़-बकरी पालन, ऊनी वस्त्र निर्माण, पशुपालन, कृषि, दुग्ध उत्पादन तथा स्थानीय उत्पादों के व्यापार पर निर्भर रही है। ऊँचे हिमालयी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों का जीवन अत्यंत कठिन परिस्थितियों से जुड़ा हुआ है। नवंबर से फरवरी तक इन क्षेत्रों में कड़ाके की ठंड पड़ती है और भारी बर्फबारी के कारण कई रास्ते बंद हो जाते हैं।

इन कठिन परिस्थितियों के बावजूद यहाँ के लोग अपने जीवन और परंपराओं को आज भी मजबूती से सँजोए हुए हैं। कई परिवार सर्दियों के आने से पहले ही कई महीनों के लिए राशन, ईंधन और अन्य आवश्यक वस्तुओं का भंडारण कर लेते हैं। अपने पशुओं के लिए भी पर्याप्त चारा और घास-पत्ती पहले से एकत्र कर ली जाती है, ताकि बर्फबारी और रास्ते बंद होने के दौरान उन्हें किसी प्रकार की परेशानी न हो।

इन लोगों का जीवन प्रकृति के अनुकूल ढलने का एक अद्भुत उदाहरण है। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद इनके मन में जीवन के प्रति गहरा धैर्य, आत्मनिर्भरता और संतोष दिखाई देता है। परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी चुनौतीपूर्ण क्यों न हों, ये समुदाय अपनी मेहनत और परंपराओं के सहारे जीवन को आगे बढ़ाते रहे हैं।

परंपरागत रूप से कुछ जनजातीय समुदाय छह महीने ऊँचाई वाले अपने मूल क्षेत्रों में और सर्दियों के दौरान लगभग छह महीने मैदानी क्षेत्रों में बिताते हैं। वे अपने पशुओं के साथ मौसम के अनुसार स्थान परिवर्तन करते हैं। यह मौसमी प्रवास उनकी जीवन-पद्धति और आजीविका का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। समय के साथ परिस्थितियाँ बदल रही हैं। शिक्षा का प्रसार हुआ है और सरकार की विभिन्न योजनाओं का लाभ भी जनजातीय समुदायों तक पहुँच रहा है। इसके परिणामस्वरूप नई पीढ़ी शिक्षा प्राप्त कर रही है और सरकारी तथा निजी क्षेत्रों में रोजगार के अवसर तलाश रही है। आज कई युवा पारंपरिक व्यवसायों के साथ-साथ आधुनिक शिक्षा और रोजगार को भी अपना रहे हैं।

हालाँकि, आज भी अनेक परिवारों की जड़ें अपने पुश्तैनी गाँवों और पारंपरिक व्यवसायों से जुड़ी हुई हैं। उनके पूर्वजों से मिली जमीन, घर, पशुपालन और स्थानीय कारोबार आज भी उनकी सामाजिक और आर्थिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। उत्तराखण्ड केवल देवभूमि ही नहीं, बल्कि विविध संस्कृतियों, परंपराओं और समुदायों की धरती भी है। यहाँ अनेक प्रकार के लोकपर्व और त्योहार मनाए जाते हैं। यहाँ के लोग अपनी सरलता, मिलनसारिता, मेहनत और ईमानदारी के लिए जाने जाते हैं। उत्तराखण्ड की जनजातियाँ इस सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न हिस्सा हैं।

इन समुदायों ने विषम भौगोलिक परिस्थितियों में रहकर न केवल अपने अस्तित्व को बचाए रखा है, बल्कि अपनी भाषा, संस्कृति, परंपराओं और जीवन-मूल्यों को भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाया है। इसलिए उत्तराखण्ड की जनजातियाँ हमारे प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान और गौरव का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।



- सुमन डोभाल काला


लोकप्रिय रचनाकारों की लघुकथाएँ पढ़िए





लघु कथाः आशियां


एक टहनी पर दो चिड़ियां अपना घोंसला बना रहे थे। बार-बार आंधी से घोंसला टूट कर गिर रहा था। परन्तु चिड़ियों ने हार नहीं मानी।

वे बारिश में भीगे, हवा से जूझे और तिनका तिनका जोड़कर घोंसला बनाया। आखिर कड़ी मेहनत के बाद छोटा सा आशियां बनकर तैयार हो गया।

शिक्षा– हमें किसी भी परिस्थितियों में हार नहीं मानना चाहिए, बल्कि कोशिश करते रहना चाहिए। एक न एक दिन सफलता जरूर मिलती है।


- सुतपा घोष



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वृद्ध और सूखे पाकड़ के पेड़ को चारों ओर से बेतरतीब के जंगली घास व लताओं ने जकड़ रखा था। जिससे पाकड़ का ठूठ हरा भरा दिखने लगा था।

पाकड़ ने नाज करते हुए खुद से कहा- "भले ही मेरी मिट्टी में उगे ये बेतरतीब जंगली घास मेरी परवाह नहीं कर रहे हों, मगर मुझे इस बेतरतीब पर नाज है। सीख हर परिस्थितियों में मनुष्य को खुश रहना चाहिए।


- रत्ना बापुली

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सर्प का बच्चा


ओम ने अपनी जान की परवाह ना करते हुए, आग में कूद कर युग की जान बचा ली। सेठ से कहा कि मालिक मैं सर्प का बच्चा नहीं हूं, मेरे पास दिल है चूंकि ओम, भीमा डाकू का बेटा था। जिसकी बम धमाके में मौत हो गई थी, गाँव वाले भीमा से खूब डरते थे।

तब से गाँव वाले ओम को सर्प का बच्चा कहते थे और उसे शक से देखते थे। एक दिन गाँव के ही सेठ का बेटा युग आग में गिर गया तो कोई बचाने नहीं आया और सेठ का रो-रो कर बुरा हाल था।

तब ओम ने युग को आग से बचा लिया। जिससे गाँव वाले हतप्रभ थे। सीख- किसी अन्य के कार्य से किसी अन्य की तुलना करना ठीक नहीं होता है।


- चुन्नू साह


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हॉस्टल


हर्ष आज थोड़ा उदास है। क्योंकि उसकी छुट्टियां खत्म हो गई और अब उसे वापस हॉस्टल जाना पड़ेगा। सभी लोग उसके हॉस्टल जाने की तैयारी कर रहे हैं। मम्मी उसके खाने का सामान उसके बैग में रख रही है पापा उसके लिए कुछ नए कपड़े और कुछ उसकी जरूरत के सामान ले आए है।

लेकिन हर्ष अब हॉस्टल वापस नहीं जाना चाहता है । उसका मन वहां नहीं लगता है। उसे वहां पर मम्मी पापा की बहुत याद आती है। तभी पापा ने हर्ष को आवाज दी चलो हर्ष तैयार हो गए हो। हर्ष दुःखी मन से पापा के साथ चला जाता है।‍‍‍‍‍‌‌‍‌‌‍‍‌‍‍‍‌‌


- अनुरोध त्रिपाठी


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आवश्यकता


हरीश आज बड़ा ही प्रसन्न है उसका बड़े फ्लैट में आकर स्वप्न जो साकार हो गया। तोरण लगाते हुए पुत्री हिना से कहा- "क्यों बेटा! यहाँ आकर कैसा लग रहा है ? पुराने छोटे फ्लैट में तो घुटन-सी महसूस होती थी, न!

हिना अन्यमनस भाव से कहा, " पिताजी! यह फ्लैट बड़ा और सुन्दर अवश्य है परन्तु उस घर में हम सब को साझा करने की आदत थी। अब सबको इसकी आवश्यकता नहीं है।"

हिना की बातों ने हरीश को सोचने पर विवश कर दिया।


- डॉ. उपासना पाण्डेय


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इंसानियत


पेड़ से गिलहरी का बच्चा नीचे गिरा, मां गिलहरी डर गई। सोचने लगी कि आज मुझे मां कहने वाली मेरी नन्हीं गिलहरी नहीं बचेगी। इससे पहले कि वह उसे उठा पाती तब तक एक कौआ आता है और उस बच्ची को चोंच में उठा लेता है।

मां गिलहरी की आंखों के आगे अंधेरा छा गया। उसे लगा कि आज तो उसकी बच्ची की देह भी ना मिलेगी! लेकिन कौआ उसे उठाकर पेड़ पर ले जाने लगता है। नन्हीं गिलहरी बार बार उसकी चोंच से गिर जाती है और कौआ उसे बार बार उठाकर पेड़ पर ले जाने की कोशिश करता है और अंत में जीत जाता है।

गिलहरी कौवे का धन्यवाद करती है और अपनी बच्ची को गले से लगाकर कहती है- भैया मैं तो तुम्हें बुरा समझती थी लेकिन आज तुमने मेरी बच्ची को बचाकर इंसानियत दिखा दी। कौवा कहता है- मुझ मे इंसानियत मत देखो ! मैं इंसान होता तो इस बच्ची का हश्र ना जाने क्या होता ?

शायद तुम नहीं जानती इंसान बच्चियों के साथ कितनी दरिंदगी पर उतर आए हैं ! इसलिए मैं कौवा ही ठीक हूं। इसका ख्याल रखना और इसे इंसानों से बचाकर रखना! कौवे की करुणा देखकर गिलहरी की आंखें नम हो जाती हैं और वह अपनी नन्हीं गिलहरी को अपनी बाहों में छिपा लेती है।


- मंजू सागर


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छायाचित्र आधारित पंक्तियाँ पढ़िए






छोटे घरो मे बड़े दिलवाले रहते है,
उम्र गुजर रहीं इक लाठी के सहारे मग़र,
इन्ही घरों मे प्रकृति प्रेम के मतवाले रहते है।

                                                 - राघवेंद्र प्रकाश 'रघु'


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घर छोड़ डोली पर यहां आई,
गुजरा जीवन,साथ सिर्फ यादें यहां।
आ गई सांझ की बेला,मिलूंगी फिर वहां अपनों से,
लेकर यहां अंतिम विदाई।

- रोशन कुमार झा


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रेत-हेत रो मेळ है,
घर कांई ओ हवामहळ है।
बडेरा मायता री संगत है,
अपणायत री रंगत है।
घर भला ही काच्चो है,
पण हेत घणों पाक्को है।

- डॉ. जितेन्द्र कुमार बोयल


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ये सिर्फ तस्वीर नहीं, एक कहानी है,
जिसमें मेहनत की अमिट निशानी है।

- सूरजमल AkS


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आशियाना अपना हो, भले वो जैसा हो,
महल हो या झोपड़ी हो, बस वो अपना हो।

- चुन्नू साहा


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यह घर मिट्टी का है,
मगर इसके भीतर एक पूरी ज़िंदगी दफ़्न है।
टूटी छत के नीचे न जाने कितने मौसम गुज़रे होंगे,
और यह बूढ़ी माँ-लाठी के सहारे-आज भी ज़िंदगी ढो रही है।
जिस उम्र में सिर पर सिर्फ़ सुकून की छाँव होनी चाहिए,
उस उम्र में अभाव अब भी उसका पीछा कर रहा है।
कुछ तस्वीरें गरीबी नहीं दिखातीं,
वे समाज की संवेदनहीनता का आईना बन जाती हैं।

- आरती कुशवाहा


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झोपड़ी छोटी है, मगर हौसले आसमान से ऊँचे हैं,
यही तो भारत के गाँवों के असली किस्से हैं।
मिट्टी का घर, हाथ में लाठी और आँखों में विश्वास,
यही सादगी तो है हमारे गाँव की सबसे बड़ी पहचान।

- बीना सेमवाल


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निशान

वक्त रुकता नहीं...
जाते जाते निशान छोड़ जाता है;
कभी चहरे पर, कभी दीवारों पर।
जिसकी चुप्पी साबित करतें हैं-
जिंदगी में सबसे बड़ा सहारा,
बूढ़ी मां और बूढ़ा घर।

- सुतपा घोष


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जर्जर बदन जर्जर आँगन।
जर्जर हुआ है आज ये मन।
कोई न साथी अंतिम सफर है,
बोझ लगने लगा है ये जीवन।

- कला भारद्वाज


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जरा जब जीवन में आए,
सहारा कोई नहीं।
घास फूस के अपनी झोपड़ी।
उसी में जीवन बिताएं।
जरा जब जीवन में आए।

- अनुरोध त्रिपाठी


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जीवन की हर तपिश को
सहकर जर्जर हुई है ये काया,
उस पर देखो ये कैसी है प्रभु की माया।
घास फूस का जर्जर सा घर,
और संग है हरे-भरे पेड़ों की छाया।

- रूचिका राय


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दादी मां मैं सबकी प्यारी,
छड़ी है मेरी सबसे न्यारी।
घर है मेरा घास-फूंस का,
सौंधी खुश्बू घर आंगन की।

- सुमन डोभाल काला


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