साहित्य चक्र

05 November 2026

आक्रामकता से परिपक्वता तक का विराट सफर

आज के आधुनिक क्रिकेट के कोलाहल के बीच, जहाँ किक्रेट अब विशुद्ध मनोरंजन और व्यापार की धुरी बन चुका है। वही विराट कोहली जैसे महान खिलाड़ी ने अपनी तपस्या से इस खेल के प्रति लोगों के प्रेम को जिंदा रखा है। जब भी विराट कोहली खेल के मैदान में उतरते हैं तो टीवी स्क्रीन से लेकर मोबाइल में मैच को देखने वालों की संख्या करोड़ों में पहुंच जाती है। वर्तमान समय में विराट कोहली अब अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के सिर्फ एक ही फॉर्मेट यानी वनडे क्रिकेट मैच खेलते हैं।




विराट कोहली का क्रिकेट करियर उनके पिता की अंतिम विदाई का असहनीय दर्द के साथ शुरू हुआ था। विराट कोहली ने अपनी‌ मेहनत और लगन से किक्रेट में वह मुकाम हासिल कर लिया है, जो हर क्रिकेटर का सपना होता है। चाहे वह विश्व कप जितना हो या फिर चैंपियन ट्रॉफी व एशिया कप या फिर बल्लेबाजी रैंकिंग में नंबर वन बनना हो। वनडे क्रिकेट में सबसे अधिक शतक बनाने का रिकॉर्ड हो या फिर सबसे तेज 13000 रन बनाना हो। विराट कोहली की किक्रेट विरासत उनके नाम की तरह विराट और अटूट है।

दिल्ली की गलियों से निकाल कर पूरे विश्व में भारत का नाम रोशन करने के बात हो या फिर टेस्ट क्रिकेट को अपनी आक्रामकता से दिलचस्प बनाने की बात हो विराट कोहली हर जगह सबसे आगे नजर आते हैं। कभी भारतीय क्रिकेट टीम अपनी फिटनेस के कारण मैच हार जाया करती थी। मगर विराट कोहली ने फिटनेस का ऐसा मंत्र दिया कि आज भारतीय क्रिकेट टीम की फिटनेस दुनिया में सबसे बेहतर मानी जाती है। 38 साल के हो चुके विराट कोहली आज भी क्रिकेट मैदान में ऐसे दौड़ते हैं जैसे 18 साल के युवा हो। सिंगल रन को डबल में कन्वर्ट कर लेते हैं और डबल रन को ट्रिपल में कन्वर्ट कर लेते हैं और टीम को हर जगह सपोर्ट करने की कोशिश करते हैं।

भारतीय क्रिकेट टीम का नेतृत्व करने का मौका भी विराट कोहली को मिला। मगर अपने नेतृत्व में विराट कोहली उतना अच्छा नहीं कर पाए, जितना बतौर बल्लेबाज उन्होंने भारतीय क्रिकेट टीम के लिए किया है। जब भी भारतीय क्रिकेट टीम संकट में आती है तो विराट कोहली शक्तिशाली सेनापति के तौर पर खड़े नजर आते हैं। अपनी आक्रामकता से विराट कोहली विपक्षीय क्रिकेट टीम का हौसला तोड़ देते हैं। मौजूदा क्रिकेट में विराट कोहली एकमात्र खिलाड़ी हैं, जिनका अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में 100 शतक पूरे करने के लिए मात्र 14 शतकों की जरूरत है। आने वाला भविष्य ही बता पाएगा विराट कोहली 100 शतक बना पाते हैं या फिर नहीं!

- दीपक कोहली


आज की प्रमुख रचनाएँ- 06 नवंबर 2026




नक्शा

दुनिया के नक्शे में सब दिखता है,
जैसे देश... शहर और बस्तियाँ।
नहीं नजर आते तो कटे हुए जंगल,
बिल्डिंग बने खेत और मलबे से भरी नदियाँ।
वैसे ही,
जनगणना बता देती है आबादी के आंकड़े,
मगर नहीं बता पाती भूखे-नंगे मजदूर,
बेरोजगार युवक
और यौन शोषण सहती बच्चियाँ।
सवाल तो सब पर उठेंगे,
कि आखिर किसने दिए पढ़ने की उम्र में
मासूम बच्चों के हाथों में औजार?
क्यों करती है माँ, बच्चों की भूख से तंग आकर
अपनी देह का व्यापार?
माप ली जाती हैं भूकंप और तूफानों
की गतिविधियाँ,
लेकिन कोई ऐसा यंत्र नहीं जो माप सके
बुजुर्गों की आँखों की नमी!
स्त्री के नाम पर दी गई गालियाँ,
हाथों में डिग्री लेकर भटकते हुए युवाओं का दर्द
और सरहद पर खड़े जवानों की तकलीफ!
हाँ नक्शे में सब दिखता है,
दिखते हैं पहाड़, झरने और हरियाली,
मगर नहीं दिखता उनके हनन होने का डर,
सड़कों पर कूड़ा बीनते हुए बच्चे
और उसी कूड़े में मुँह मारते हुए पशु!
पशुओं से ज्यादा हैवानियत दिखाते मर्द ,
और मर्दों की हस्ती पर वार करती हुई महिलाएं!
ये भी अच्छा है कि ये सब ,
नक्शे में नजर नहीं आता ,
नक्शा तो नक्शा ही है ,
भला इतना ज्वार-भाटा उसके अंदर कैसे समाता!

- मंजू सागर


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आहट सुनाई देने लगी है मुझे दीपावली की
महकने लगा है मेरे दिल का घर-आँगन,

सदियों से जो अँधेरा पसरा था सूनी आँखों में
उस अँधेरे को भी अब जाने का मन है,

बहुत जी लिया,अँधेरों से समझौता करके
अब रौशनी से इश्क़ करने का वक़्त आया है,

इस बार सिर्फ़ दीये नहीं जलाऊँगा मैं
जलाऊँगा उन ख़्वाबों को,जो बरसों से दफ़न हैं,

जिन चिराग़ों को ज़माने ने बुझा दिया था
उन्हें फिर से जलाने का वक़्त आया है,

तेल से नहीं, अपने अश्कों से दीये भरूँगा मैं,
बाती से नहीं, अपनी साँसों को उजाला करूँगा मैं,

दीपावली सिर्फ़ दीयों की लौ का पर्व नहीं
सदियों के गहरे ज़ख़्मों पर मरहम लगाने का पर्व है,

बाज़ार में बिकते दीयों में मुझे,ऐ मेरे दोस्त!
कुम्हार के हाथों की दुआ दिखती है,

पटाखों के शोर में नहीं,
माँ के चूल्हे की मीठी हँसी सुनाई देती है,
बिछड़ गए थे जो कभी अँधेरों में,
उन अपनों को फिर से पुकारने का मौसम है,

मोहब्बत का एक ऐसा चिराग़ जलाऊँगा मैं
सात आसमानों तक जाए जिसकी रोशनी,

लक्ष्मी आए न आए, मुझे कोई परवाह ही नहीं,
पहले अपने भीतर के अंधकार को मिटाऊँगा मैं,

"धीमान" इस दीवाली ये ठान बैठा है
नफ़रतों के हर दीये को बुझा कर ही रहूँगा मैं

- बाबू राम धीमान


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लुप्त हुए मिट्टी के कद्रदान

कहाँ गई मिट्टी के वो बर्तन
कहाँ गई खपरैल की मकान
कहाँ गई पेय जल की सुराही
कहाँ गई मिट्टी के वो दीवान

कहाँ गई मिट्टी की सोंधी खुशबू
कहाँ गये मिट्टी के वो कद्रदान
कहाँ गई हॉड़ी की। वो चावल
कहाँ गई मिट्टी के कोठे मकान

कहाँ गई मिट्टी की दूध की कड़ाही
कहाँ गये मिट्टी चुल्हे में पके पकवान
कहाँ गई कबूतर की मिट्टी की भाँड़ी
कहाँ गये मिट्टी के पूजन की धुपदान

कहाँ गई मिट्टी की मोटी दीवारें
कहाँ गई मिट्टी के वर्तन निर्माण
कहाँ गई मिट्टी की गुल्लक हमारी
कहाँ गये मिट्टी के खेल मैदान

कहाँ गई मिट्टी की गाँव की पगडंडी
कहाँ गये मिट्टी के ग्लास की जहान
कहाँ गई मिट्टी के बने चबूतरे
कहाँ गई मिट्टी से लीपे खलिहान

- उदय कशोर साह


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झूठ सजा दरबार में, सच खड़ा लाचार।
न्याय माँगता रह गया, पीड़ित बारंबार।।

मंजिल पाने की धुन में, भूला जग व्यवहार।
जीत मिली तो खो दिया, अपनों का संसार।।

समय बदलता जा रहा, बदले सबके रंग।
सुख में अपने साथ हैं, दुख में छूटे संग।।

कर्म किए निष्काम जो, उन्हें मिला सम्मान।
स्वार्थों में जो खो गए, खो बैठे पहचान।।

जीवन की हर राह में, मिलते कई सवाल।
हिम्मत जिसका साथ दे, उसका हो उजियाल।।

मजबूरी की बेड़ियाँ, बाँधें बारंबार।
फिर भी मन में पालिए, सपनों का संसार।

भूखे पेट नसीब में, श्रम का मिला उपहार।
मेहनत फिर भी झेलती, किस्मत की मार।।

निर्धन की आवाज को, सुने नहीं सरकार।
धनवानों के नाम पर, सजता हर दरबार।।

विपदा से मत हारना, रख मन में विश्वास।
रात भले ही हो कठिन, होगा नया प्रकाश।।

मानवता जब रो पड़ी, मौन हुआ संसार।
पत्थर दिल के सामने, रोया प्रेम अपार।।

लाचारी को तोड़कर, बढ़ता वही महान।
ठोकर खाकर जो उठे, जग में उसकी शान।।

- डॉ. प्रियंका सौरभ


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छुक-छुल की आवाज़
रेल का इंजन करता है

मंजिल तक ले जाती सबको
हर स्टेशन पर रुकती जाती

हम भी बैठे ठिठुरती ठंड में
अपना चद्दर, झोला साथ लिए

कब आएगी रेल हमारी
पल-पल है इंतज़ार हमें

सरपट-सरपट दौड़ लगाकर
छुक-छुक करती रेल यहां

- डॉ सुमन काला


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जिंदगी के सफर की धूप जब काटी जाती है,
हर पड़ाव पर जिंदगी मंजिल पाती है।
थकान भरे सफर में जब हमसफर हो साथ,
हर मुश्किल तब मिलकर बांटी जाती है।

- स्वाति जोशी


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एक ही चादर में लिपटा, पूरा ज़माना देखा,
न महल की चाह, न गहने का बहाना देखा।
प्लेटफार्म की जमीन पर भी घर बना लिया,
तेरे साथ मैंने हर सफर सुहाना देखा।

- दिलीप कुमार


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जो वर्तमान में जीता है
उसका कोई भविष्य
कोई अतीत नहीं होता।
उसका हर मौसम सदाबहार
होता है,उष्ण नहीं होता
शीत नहीं होता।
जिसे संघर्षो ने पाला हो
हर भूख पर अभाव
निवाला हो, वो
जीवन पथ पर
काँटों की आगवानी से
कभी भयभीत नहीं होता।

- राधेश विकास


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दस्तक दो इस बार सखे
तुम बिन सूना मन का आँगन,
बन जाओ झंकार सखे
साँसें तुमको ढूँढ रही हैं,
कर लो अब स्वीकार सखे

मौन समर्पण की यह बेला,
तुमको ही आवाज़ लगाती,
जैसे चातक की व्याकुलता,
स्वाति-बूंद का राह ताकती,

सूखे मरुथल पर चाहत की,
कर दो तुम बौछार पसखे

साँसें तुमको ढूँढ रही हैं...
कर लो अब स्वीकार सखे

- सविता सिंह मीरा


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दिव्य लिपि

जब अंधा हिस्सा कट जाता है
टकराव का लेवल टूटकर बिखर जाता है
गुफा की दीवार पर
आयताकार रंग का ड्रम साफ़ हो जाता है।
आसमान दिव्य अक्षरों की माला से सजा हुआ है।
इसके दोनों किनारों पर
एक-एक करके,
अनगिनत चौकोर तस्वीरें,
गर्म लाल चमक,
पीले, बैंगनी, लाल रंग के रिफ्लेक्शन
गर्म और ठंडे त्रिकोण लिखे हुए हैं।
जब चाँद डूबता है और चुपचाप निकलता है
खामोश तारे बातचीत कर रहे होते हैं
एक अनजान साइन लैंग्वेज का निशान छोड़ते हुए।

- निर्मल रॉय


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बड़ा लम्बा सफ़र है।
हमें इसकी ख़बर है।

यहाँ चलते , ठहरते,
हुई शामों -सहर है।

पले हैं हौसले तो,
शिकायत बेअसर है।

भले दुनियां बड़ी हैे,
ठिकाना मुख्तसर है।

मिला हैे काम जैसा,
रही वैसी गुज़र है ।

इरादे जान लेगी,
लगी पैनी नज़र हैे।

नया क्या है जहाँ में,
इधर जैसा उधर है।

- नवीन माथुर पंचोली


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आजादी के मायने

अरे!अब तुम क्या करोगे
देश को आजाद
तुम तो ढूंढते हो
इंस्टा और फेसबुक पर
सच्चा प्यार।

कभी ढूंढ लेते
तुम उन विचारों को
जो जगा देते
तुम्हारी सोइ हुई
अंतर आत्मा को।

कभी जला लेते
सीने में दफन
दहकते अंगारों को
शायद दिख जाती
स्वतंत्रता की पक्की नींव।

- डॉ. राजीव डोगरा


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मौन रहना तुम

मौन रहना तुम,
तुझे पढ़ना है मुझे।

चाँद-सा ये चेहरा,
ज़रा सोचना है मुझे।
ज़ुल्फ़ों का है पहरा,
ज़रा बिखेरना है मुझे।

होंठों की लालियाँ,
बस छूना है मुझे।
कजरारी ये अँखियाँ,
बस डूबना है मुझे।

ये दूधिया गोराई,
बस परखना है मुझे।
परियों की परछाईं,
बस खेलना है मुझे।

ये सुंदर-सी काया,
महसूस करना है मुझे।
ये नज़रों की माया,
एहसास करना है मुझे।

पास बैठी रहो,
सुकून पाना है मुझे।
ख़ामोश हैं गलियाँ,
तेरा हाल जानना है मुझे।

मौन रहना तुम,
तुझे पढ़ना है मुझे।
तुझे पढ़ना है मुझे।

- राघवेंद्र प्रकाश 'रघु'


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"मत बाँधो हमें सीमाओं में"

मत बाँधो हमें सीमाओं में
वरना खिंच जाएगी लक्ष्मण रेखाएँ,
सिर्फ़ ज़मीन पर नहीं खिंचतीं,ये रेखाएँ
खिंचती हैं ये दिलों पर, रिश्तों पर और ख़्वाबों पर,
एक बार खिंच गईं तो,वनवास शुरू होता है
सीता को भी होता है बनवास और राम को भी,

मुझे मत बाँधो
क्योंकि मैं बंधा तो मेरे शब्द बंधेंगे,
मेरे शब्द बंधे तो मेरी सोच बंधेगी
और अगर सोच बंधी तो पूरा युग बंध जाएगा,
जहाँ कवि चुप हो जाए
वहाँ लक्ष्मण रेखाएँ नहीं,कब्रें खिंचती हैं,

हमें खुला छोड़ो
बादलों की तरह, नदियों की तरह,
क्योंकि मैं जानता हूँ -
परिंदों के लिए जहाँ आसमान छोटा पड़ जाए,
तो वह आसमान को भी बदल देते हैं
मगर सीमाएं नहीं मानते,

मुझे मत बाँधो
मैं शब्द नहीं हूँ, जो कोष में समा जाऊँ,
अर्थ हूँ मैं वह,जो कोष से बाहर निकलता है
अब मैं खुद ही बनूँगा,लक्ष्मण रेखा ,
न बाहर की दुनिया के लिए
अपने ही भीतर के डर के लिए,

मैं खींचूँगा एक रेखा-
मेरी आत्मा और मेरी आदतों के बीच,
मेरे मौन और मेरे शब्दों के बीच
मेरे ज़िंदा होने और ज़िंदा दिखने के बीच,
नफ़रत और मोहब्बत के बीच
झूठ और सच के बीच,
मैं और मेरे "मैं" के बीच

- बाबू राम धीमान


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दीप से दीप जले

चहुं ओर दिवाली को दीप जले,
मन का अंधियारा अब दूर टले।

हर घर दीप हर्ष के जले,
हर आनन खुशी से खिले।

जैसे दीप घर में वैसे मन में भी जले,
हर मन से अंधियारे का राज टले।

हर घर आंगन में रंगों के पुष्प खिले,
बुराई से सबके कदम बचकर चलें।

नव उपहारों से सबके हृदय खिलें,
देवपूजन का दर्ज़ा मात पिता को भी मिले।

वचन मात पिता का मान दर्जा प्रभु का मिले,
तभी राम प्रेम में युगों से घर घर में दीप जले।

हर स्थिति में सत्य मन में ढले,
जग चाहे संग हो या विपरीत चले।

प्रभु राम के आदर्श जीवन में ढले,
हर मन राम नाम के पथ पर चले।

जैसे दिवाली को दीप से दीप जले,
वैसे ही हम सबमें प्रेम बाँटते चलें।

- राज कुमार कौंडल


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बेनूर

जिसे थामना चाहा, दूर होते गए,
अपनी ख़्वाहिशों के आगे मजबूर होते गए।

रेत के घरौंदे बनाता रहा मैं,
बारिश में न जाने कितने आशियाने काफ़ूर हो गए।

जिस पर भरोसा था अपनों-सा,
मेरी ख़ुशी देखकर वो भी मगरूर हो गए।

मेरे नाम को बदनाम करके,
ख़ुद मेरे ही नाम से मशहूर हो गए।

देखे थे आज जो भी सपने हमने,
ख़ैरियत रही कि उन्हें सच होने का वहम न रहा,
पल भर में ही वो चकनाचूर हो गए।

ऐ ज़िंदगी! तेरे रंग तुझे मुबारक,
हम तो बस जीने की चाह में बेनूर हो गए।

- रोशन कुमार झा


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वक़्त कहाँ?

झाँकते हैं चुपचाप झरोखे से,
दरवाज़े को ताकते हैं, निकलने का वक़्त कहाँ?

अपनों के ख़ातिर ही अपनों से हैं दूर,
अपनों से मिलने, अपनापन जताने का वक़्त कहाँ?

रोज़-रोज़ ही तो कदम ज़मीन पर पड़ते,
ख़ुद गिरते, ख़ुद सँभलते,
पूनम के चाँद के दीदार को वक़्त कहाँ?

हमें वक़्त नहीं मिलता, या फिर
वक़्त को हम नहीं मिलते,
दोनों एक-दूजे से हैं इतर,
ये समझने का वक़्त कहाँ?

लगे रहते बाग़ को सींचने, सँवारने में,
जब गुल खिलें, तो निहारने का वक़्त कहाँ?

- रोशन कुमार झा


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हर रात

देखो ये रात कितनी प्यारी है,
चांद की चांदनी कितनी न्यारी है,
मुझे डूब जाने को दिल करता है,
ये अंधेरी रात बहुत दुलारी है।

मैं कभी खिड़की खोलता हूं,
अपने आप से ये बोलता हूं,
नहीं जानता हूं उस आवाज को,
जो मैं हर रात आंगन में सुनता हूं।

सुनता हूं वो आवाज़ तुम्हारे पायलों में,
कोई तो आता है मेरे खख्यालों में,
चांद को निहारते ही सुबह हो जाती है,
मेरी भी गिनती होती है उन घायलों में।

- प्रणव राज


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वलय

नीचे पाताल लोक में अभी भी अंधेरा था,
जानवरों की खाल की गंध,
आदमी और औरत की जगह।
उस समय, रात के आसमान से
पहाड़ की चोटी पर,
तारों का एक झुंड ध्यान की जगह पर उतरा,
बहुत चमकीले रंग के आदमियों का एक झुंड,
घाटी, पहाड़ी, सख्त पत्थर की ज़मीन को छूते हुए,
करुणा की रोशनी धीमी हो गई।
शायद ज़िंदगी का मतलब है
किसी आधे-अचेतन, आधे-बेहोश
इंसान का गिरना
और उसके आगे बढ़ने की
लगातार कोशिशों का एक रोता हुआ घेरा बनना।

- निर्मल रॉय


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शुभ दीवाली आ गई, झूम रहा संसार।
माँ लक्ष्मी का आगमन, सजे सभी घर-द्वार।।

सुख-वैभव सबको मिले, मिले प्यार-उपहार।
सच में सौरभ हो तभी, दीपावली त्योहार।।

दीवाली का पर्व यह, हो सौरभ तब खास।
आँगन झोंपड़ियों के भी, महलों को दें आस।।

जिनके स्वच्छ विचार हैं, प्रेमपूर्ण व्यवहार।
उनके जीवन में सदा, दीपावली त्योहार।।

दीवाली उनकी मने, सुखी रहे परिवार।
दीप बेचकर जो करे, सौरभ घर उजियार।।

मैंने उनको भेंट की, दीपावली और ईद।
जान देश पर कर गए, जो वीर जवान शहीद।।

फीके-फीके हो गए, त्योहारों के रंग।
दीप दिवाली के बुझे, होली भी बेरंग।।

नेह भरे मोती नहीं, खाली मन का सीप।
सूख गई हैं बातियाँ, जलता कैसे दीप।।

बाती रूठी दीप से, कैसे हो प्रकाश।
बैठा मन को बाँधकर, अँधियारे का पाश।।

- डॉ. सत्यवान सौरभ


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सबके पास उजाले हो

मानवता का संदेश फैलाते,
मस्जिद और शिवाले हो।
नीर प्रेम का भरा हो सब में,
ऐसे सब के प्याले हो।

होली जैसे रंग हो बिखरे,
दीपों की बारात सजी हो,
अंधियारे का नाम न हो,
सबके पास उजाले हो।

हो श्रद्धा और विश्वास सभी में,
नैतिक मूल्य पाले हो।
संस्कृति का करे सब पूजन,
संस्कारों के रखवाले हो।

चौराहें न लुटे अस्मत,
दु:शासन न फिर बढ़ पाए,
भूख, गरीबी, आतंक मिटे,
न देश में धंधे काले हो।

सच्चाई को मिले आजादी,
लगे झूठ पर ताले हो।
तन को कपड़ा, सिर को साया,
सबके पास निवाले हो।

दर्द किसी को छू न पाए,
न किसी आंख से आंसू आए,
झोंपड़ियों के आंगन में भी,
खुशियों की फैली डाले हो।

‘जिए और जीने दे’ सब
न चलते बरछी भाले हो।
हर दिल में हो भाईचारा
नाग न पलते काले हो।

नगमों-सा हो जाए जीवन,
फूलों से भर जाए आंगन,
सुख ही सुख मिले सभी को,
एक दूजे को संभाले हो।

- डॉ. प्रियंका सौरभ


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समय का जीवन

समय बड़ी जल्दी
उम्रदराज़ हो जाता है।

भोर में वह किसी नवजात
स्वप्न की तरह आँखें खोलता है
कोमल, कमसिन,ओस में
भीगी कच्ची कली-सा।

फिर धीरे-धीरे सूरज उसके कंधों पर
जिम्मेदारियों का आकाश रख देता है।
वह चलता है तपती धूप में भी,
बिना शिकायत,जैसे कोई जवान
अपने हिस्से का युद्ध
पूरी शक्ति से लड़ रहा हो।

दोपहर तक समय के चेहरे पर
अनुभव की रेखाएँ उतरने लगती हैं।
जो सुबह तक सपना था,
वह अब जीवन का यथार्थ है।

और फिर साँझ में समय एक गृहिणी-सा
दिन भर की थकान समेटकर
देहरी पर खड़ा मिलता है
पाँव थके हुए, कंधे बोझिल,
पर होंठों पर मुस्कान।

शायद जीवन की सबसे बड़ी विडंबना
यही है कि थक जाने के बाद भी
मनुष्य मुस्कुराना नहीं छोड़ता।

और रात होते ही वही समय
अचानक बूढ़ा हो जाता है।

खामोश...निःशब्द...जैसे कोई अधेड़
अपनी खाट पर लेटा दिन भर का हिसाब
बिना किसी से कहे मन ही मन करता हो।

एक ही दिन में समय हमें
जन्म से वृद्धावस्था तक ले जाता है।
तभी तो लगता है समय गुजरता नहीं,
हम गुजरते हैं।

घड़ी की सुइयाँ केवल अपनी
जगह बदलती हैं, पर उनके साथ
हमारी उम्र, हमारे स्वप्न,हमारे संबंध
और अंततः हम स्वयं
थोड़े-थोड़े कम होते जाते हैं।

समय की सबसे बड़ी सच्चाई शायद यही है
वह कभी बूढ़ा नहीं होता, बूढ़े तो हम होते हैं;
वह केवल हर दिन हमें हमारा एक दिन
कम करके हमारी पूरी उम्र का
अर्थ समझाता रहता है।

- सविता सिंह ‘मीरा’


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28 October 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 28 अक्टूबर 2026






ए मेरे साये! तू भी तो बड़ा कमबखत है
दिन भर मेरा पीछा करता है,
और रात भर मुझे
मेरे ही सवालों में अकेला छोड़ देता है,

साया कभी साथ नहीं छोड़ता, ऐसा मैंने सुना है,
पर तू साथ कहाँ देता है?
ए साये! तू तो बस साथ होने का भ्रम देता है
और मैं उसी भ्रम में उलझा रहता हूँ,

तुम साथ छोड़ने का मौका ही नहीं देते हो
मैंने ये भी सुना था-
फिर एक रात मैंने मुड़ कर देखा-
वही साया मेरे कदमों में नहीं,
मेरे अंदर चल रहा था,

मैं थक कर रुकता हूँ तो वह भी रुकता है,
मैं भागता हूँ तो वह भी भागता है,
पर एक पल भी ऐसा नहीं,
जब वो मुझसे आगे निकल कर
मुझे मेरा ही चेहरा दिखा दे,

साया दुश्मन नहीं है ए दोस्त!
साया दोस्त भी नहीं है,
साया वह है जो हर जन्म में
बिना बोले साथ चलता है-
बिना नाम, बिना चेहरा, लिए
बस एक खामोश गवाह की तरह संग-संग चलता है।

- बाबू राम धीमान


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बारिश की छन-छन से डर के

शांत निशा का रूप सुहाना,
चाँदनी बिखरी गाँव की ओर।
कच्ची पगडंडी, बांस के झुरमुट,
छप्पर पर है दीप की पोर।
शीतल पवन मधुर सुर छेड़े,
मिट्टी में है प्यार पुराना।
रात थमी है सुकून के संग,
मन का हर दुख भूल जाओ ना।
पर जब घिरे गगन में बादल,
आंधी का जब रूप सजा,
लहरा उठे खेत के पौधे,
हवा में झूम उठे हैं शजर।
भाग रहे बच्चे पग भरते,
बारिश की छन-छन से डर के,
प्रकृति के इस खेल अनोखे,
हर दिल में उमंगें बह लें।
एक तरफ़ है असीम शांति,
दूजी ओर जीवन का उल्लास,
यह माटी की सोंधी खुशबू,
गाँव की सादगी का आभास।

- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़


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जहाँ तक राह दिखाई देती है…

क्यों सोचें अभी
उन खाइयों का,
जिन्हें हमने देखा ही नहीं…
क्यों डरें उन मोड़ों से,
जो अभी आए ही नहीं…
क्यों अपने आज की धूप में
कल की परछाइयाँ ढूँढ़ें,
और उस सफ़र की खुशी खो दें
जो अभी हमारे सामने
बिल्कुल साफ़ दिखाई दे रहा है।

आईये, पहले इस राह का आनंद लें…
जो सामने है,
उसे जी भरकर चलें।

रास्ते में जो फूल मिले,
उन्हें देखें…
जो हवाएँ छूकर जाएँ,
उन्हें महसूस करें…
जो पल मुस्कुराने को कहें,
उन्हें खुलकर जी लें।

और जब राह आगे जाकर
दुर्गम हो जाए,
जब कोई खाई सामने आ खड़ी हो,
जब कोई मोड़ अनजाना लगे,
तब देखेंगे।

तब शायद हम भी
आज जैसे नहीं होंगे…
थोड़े और अनुभवी,
थोड़े और मजबूत,
और शायद वह कठिन राह
हमें उतनी कठिन लगे ही नहीं।

जहाँ तक राह साफ़ दिखाई दे रही है,
वहाँ तक चलते चले....
हँसते चले...
जीते चले...
फिर वहाँ पहुँचकर
एक बार पीछे मुड़कर देखेंगे,
और फिर जो राह आगे खुलेगी..
उस पर भी चल पड़ेंगे।

क्योंकि ज़िंदगी का राज़ शायद इतना ही है...
पूरी यात्रा का नक्शा लेकर नहीं चलना...
बस अगला कदम दिखाई देता रहे…
और उसे पूरे मन से जीते रहना।

- नरेंद्र मंघनानी


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मधुर संगीत

जागते हुए भी नींद में रहना बिल्कुल अच्छा नहीं,
मेहनत करना है कर्म आलस हमारा गहना नहीं।

वक्त को जो पहचान गया वही वक्त का हुआ,
जिसने दरकिनार किया वक्त वो समझदार नहीं।

थोड़ा थोड़ा सा ही वक्त मिला है सबको,
वही अपना है बाकी का हमारी जागीर नहीं।

प्रकृति की हर शय जी नहीं चुराती मेहनत से,
सर्वश्रेष्ठ कृति जगत की इस रोग से अछूती नहीं।

कर्म से ही भरे जाएंगे जीवन की तस्वीर में रंग,
बेरंग तस्वीर की इस जगत में कोई कीमत नहीं।

बीज जब मिटा देता है खुद को मिट्टी की गोद में,
बिन मिटे बीज का दरख़्त बनना संभव नहीं।

वक्त के संग चलें तो हर आवाज लगती है संगीत,
वरना मधुर संगीत भी में शोर के सिवा कुछ नहीं।

- राज कुमार कौंडल


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रूस्वाई

रूस्वाई करके मुझे तुम इस तरह से,छोड़ मत जाओ
बेपनाह मुहब्बत है मेरा तुमसे, कहना तु मान जाओ
जो तुम छोड़कर मुझे चली गयी तो, सच मानो
मै तो जिन्दा रहकर भी, मरना ही तू समझ पाओ।

बडी ही शिद्दत से तुम मिली हो, इसी से तुम स्वीकारो
तुझे खोना ना चाहता हूं कभी, बात मेरी समझा करो
जो भी है मन मे तेरी मुझसे खटपट, उसे तो कहो
हर एक समस्या का समाधान है, इस बात का ना नकारो।

रूस्वाई होकर रहना अच्छा लगता है, क्या भला ?
मिल बैठकर बाते कर लेगे, बेवजह क्यो करे हल्ला ?
आखिर मुहब्बत है ना एक दूजे से, ये तो तू भी है माना
फिर तो हमारे जिदगी की हर मुसीबत तो टला ही टला।

चलो छोडो इधर उधर की बाते, अब साथ हो जाते है
लो जीती तुम ही मुझसे, हार मुझे तो खूब भाते है
रूस्वाई को अलविदा कहकर, मुहब्बत का पैगाम दो
हमारी जोडी सफल रहे सदा, प्रयास यही करते है।

- चुन्नू साहा


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कम खाना और ग़म पीना

अपने इस स्वास्थ्य को बेहतर सभी रखना,
खानें के लिए नही जीने के लिये है खाना।
पाचनशक्ति ठीक व वज़न को कम रखना,
सदा कम ही खाना एवं यह ग़म पी जाना।

बिना दवाईयों के सबको पेट ठीक रखना,
स्वयं समझदार बनकर सबको‌ समझाना।
स्वास्थ्य से बढ़कर संसार में कुछ भी नही,
ये पसीना बहाना एवं मेहनत करते जाना।

स्वस्थ-तन स्वस्थ-मन तो स्वस्थ ये जीवन,
आनंदित ये दसों दिशाएं घर परिवार संग।
नही देना निमंत्रण कोई इन‌ बीमारियों को,
जिनसे लड़ना पड़े व करना पड़े ऐसे जंग।

बढ़ रही है आजकल कई सारी बीमारियां,
डायबिटीज़ हार्ट अटैक शुगर और कैंसर।
किडनी बी पी एड्स और यह सोरायसिस,
इसलिए मोटापा कमकर यही है अवसर।

फिटनेस का ध्यान रखे ना ले मदिरा मांस,
करना दौड़ व व्यायाम योग और उपवास।
शामिल करे जीवन में ये रोज़‌ मार्निंगवाक,
शुद्ध स्वच्छ पानी-पीना ताज़ा लेना श्वास।

- गणपत लाल उदय


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गज़ल

लगाकर आग महफ़िल में शराफ़त आज़माते हैं।
सनम रुस्वा मुझे करके सियासत आज़माते हैं।।

छुपा कर ज़ख़्म दिल का वो बड़ी मासूमियत सेअब।
भरोसा जीत कर सबका हुकूमत आज़माते हैं।।

कभी उल्फ़त की बातें थीं कभी तल्ख़ी भी छाई थी।
वो मतलब के लिए हर रोज़ चाहत आज़माते हैं।।

हवा का रुख़ बदलने की अदा जिन में निराली हो।
वही अपनी अना के बल बग़ावत आज़माते हैं।।

सँजो कर ख़्वाब आँखों में चले थे साथ जिनके हम।
वही ग़ैरों की बाँहों में मुहब्बत आज़माते हैं।।

वफ़ा की बात करते हैं वफ़ा से जो रहे ग़ाफ़िल।
नए इल्ज़ाम देकर वो नज़ाकत आज़माते हैं।।

किसे अपना कहोगी ‘रति’ यहाँ हर शख़्स बेगाना।
वफ़ा की राह में सब लोग क़िस्मत आज़माते हैं।।

- रति सिंह (रिंकी)


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बेटी

जब बेटियां बड़ी हो जाती हैं
तो मां के सपनो को सजाती हैं।

मां को उड़ना सिखाती हैं,
जब बेटियां कमाने लगती है।

तो मां को उड़ना सिखाती हैं,
बेटी मां को पँख लगाती हैं।

जब बेटियां बड़ी होती हैं तो
मां को जीना सिखाती हैं।

जब बेटियां बड़ी हो जाती हैं,
तो दरिन्दों से बचाती हैं ।

जब बेटियां समझने लगती हैं,
मां को हर ग़म से दूर करती हैं।

बेटियां अपना फ़र्ज़ निभा जाती हैं,
बेटियां कब मां की मां बन जाती हैं।

बेटी मां के लिए आकाश बन जाती हैं,
बेटी मां की, बारिश और पानी बन जाती है।

बेटी मां का दर्द और आँसू,
पल में छू मन्तर भगाती है।

बेटी मां के सपनों को पल में सजाती है,
बेटी मां को पग-पग पर उठाती हैं।

बेटी से ही सारा घर आंगन आबाद है,
बेटी ही तो सारा घर परिवार की शान है।


- सुमन डोभाल काला


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प्रश्नपत्र है ज़िंदगी, उत्तर अपने कर्म।
सच की स्याही से लिखो, जीवन का तुम मर्म॥

सबको खुश कर आज तक, कौन हुआ खुशहाल।
अपने मन से पूछना, क्या है तेरा हाल॥

सुख-दुख दोनों साथ हैं, जीवन के अध्याय।
हँसकर उनको जो पढ़े, समझदार कहलाय॥

हर प्रश्नों का हल नहीं, मिलता इस संसार।
कुछ उत्तर स्वीकार कर, बढ़ना है हर बार॥

जीवन की हर राह पर, मिलते प्रश्न अनेक।
हिम्मत जिसका साथ दे, जीत उसी की नेक॥

भाग्य भरोसे मत रहो, कर्मों पर हो काम।
मेहनत से ही लिख सको, जीवन का परिणाम॥

जो चाहा वह सब मिले, ऐसा नहीं विधान।
जो मिलता स्वीकार कर, रखना ऊँची शान॥

समय परीक्षा ले रहा, धीरज रखना मित्र।
आज कठिन जो प्रश्न है, कल देगा नव चित्र॥

हर मुश्किल को देखकर, मत होना लाचार।
पत्थर से ही फूटता, जलधारा का द्वार॥

जीवन कोई खेल ना, नहीं आसान राह।
जिनके बुलंद हौसले, पूरी होती चाह॥

कुछ प्रश्नों के उत्तरों, छिपा हुआ है सार।
मौन स्वयं कहता कभी, जो न कहे संसार॥

जीवन के हर मोड़ पर, मिलता नया सवाल।

अनुभव जिसकी ढाल है, ढूँढे हल हर हाल॥

हार-जीत जीवन रहे, दो पहलू पहचान।
हार सिखाती सीख जो, जीत बढ़ाती मान॥

सुख आए तो मत उछल, दुख में मत घबराय।
समय चक्र की चाल को, कोई रोक न पाय॥

प्रश्न कठिन हों सामने, मन में रखना आस।
अंधियारे के पार ही, मिलता नया प्रकाश॥

जो बीता सो सीख है, जो आए वो मर्म।
वर्तमान को जी सखे, यही श्रेष्ठ है कर्म॥

जीवन की इस दौड़ में, मत खोना सद्भाव।
जीत वही जो बाँट दे, औरों के भी घाव॥

हर उत्तर के बाद भी, प्रश्न खड़े सौ बार।
जीवन चलता सीख से, खुलते नए विचार॥

किस्मत को मत कोसना, कर्मों का कर मान।
मेहनत से ही बदलता, जीवन का प्रतिमान॥

- डॉ. सत्यवान सौरभ


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तन पर चोला साधु का, मन में भरा विकार।
कैसे होगा मुक्त वह, मन में हो संसार॥

लिप्त रहे निर्लिप्त बन, ओढ़े धर्म लिबास।
मन से मोह न मिट सके, कैसा फिर संन्यास॥

वस्त्र बदलने से भला, बदल सके क्या चित्त।
मन में लोभ-विकार हों, कैसे हो वह निर्लिप्त॥

माला लेकर हाथ में, मन में भरा विकार।
कैसे भव से पार हो, अगर हो छल अपार॥

त्याग दिखावा कर रहे, मन में भरा ममत्व।
कैसे संभव हो भला, निर्मल आत्मतत्त्व॥

काया पर वैराग्य है, मन में भोग-विलास।
ऐसे झूठे त्याग से, कैसे मिटे पिपास॥

धर्म ध्वजा लेकर चलें, मन में भेद हजार।
कैसे मानवता बचे, जब मन ही बीमार॥

बाहर से निर्मल दिखें, भीतर मैला भाव।
ऐसे पाखंडों तले, दम तोड़े सद्भाव॥

वाणी में उपदेश हैं, आचरण में दोष।
कैसे जग को राह दें, जिनमें भरा हो रोष॥

त्याग किया पर नाम का, चाह रहे सम्मान।

मोह-मुक्त कैसे कहें, जो माँगें यशगान॥

देह सजाकर क्या मिला, मन का मैल न जाय।

अंतर निर्मल हो तभी, सच्चा योग कमाय॥

नग्न विचारों से बढ़े, समाजों में विकार।
संयम की मर्याद से, होता शुद्ध विचार॥

आडंबर की ओट में, पलता रहे अहंकार।
कैसे सच्चा त्याग हो, मन में हो व्यापार॥

साधन बदले, वेश भी, बदला नहीं स्वभाव।
कैसे नव निर्माण हो, जब मन में दुर्भाव॥

संयम केवल वेश ना, संयम मन का सार।
जिसने मन को जीत लिया, उसका बेड़ा पार॥

भोग-विलास हृदय बसा, मुख पर त्याग-विचार।

दोहरी जीव-रीति से, बढ़ता अत्याचार॥

मन की नग्न विकारिता, होती तन पर भार।
भीतर शुचिता हो तभी, जीवन में उजियार॥

मोह मिटे, ममता घटे, निर्मल हो अहसास।
तभी सार्थक साधना, तभी सच्चा संन्यास॥

- डॉ. प्रियंका सौरभ

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शराब की दुकान

शराब की दुकान,
एक शख्स बैठा वहां,
प्याला लिए,
ढलते सूरज को देख रहा है,
उसे कल की चिंता नहीं है,
हर एक घूंट में ग़म भुला रहा है,
बस भुला रहा है,
मिटाने की उसमें इच्छा नहीं,
पैसे न होने पर, कर्ज़ लेकर,
कर्ज न मिलने पर, ज़ेवर बेच कर,
वह मदिरालय में बर्बाद हो रहा है,
उसे खाली पेट की चिंता नहीं है,
चिता है तो प्यास की,
सब दुख दर्द भूल कर वह,
धर को चलता है,
इस सोच में कि वह सुखी है,
पर, घर में पत्नी और बच्चे,
उसकी राह नहीं देखते है,
वे लोग खाट पर लेते हैं,
थाली खाली पड़ी है,
चूल्हा आज रात भी न जल पाया।

- प्रणव राज


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ग़ज़ल

मुझे कोई यहाँ अपनी रजा़ देना नहीं चाहता।
बुझी इस आग को थोड़ी हवा देना नहीं चाहता।

चला हूँ मैं हमेशा ही सभी को साथ में लेकर,
मगर कोई मुझे अपनी वफ़ा देना नहीं चाहता।

रवायत को शराफ़त से निभाता ही रहा हूँ मैं,
कभी लेकिन कोई इसका सिला देना नहीं चाहता।

यहाँ मालूम है सबको खयाली मर्ज़ का कारण,
मगर कोई मुझे इसकी दवा देना नहीं चाहता।

दिखाता है हमेशा ही समन्दर जलजला यूँ की,
अचानक कश्तियों को वो दग़ा देना नहीं चाहता।

- नवीन माथुर पंचोली


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गज़ल

जिंदगी में ज़िंदगानी ढूँढते हैं
प्यासे हो लोग तो पानी ढूंढते हैं

गर मिट गई हो पेट की भूख
तो जीवन में रवानी ढूँढ़ते हैं

मिलते हैं नहीं है लोग अच्छे
अब तो दोस्त खानदानी ढूंढ़ते हैं

बड़े लोगों से नजरें बचाकर रखना
दरिया समुद्र में मिला तो नहीं ढूंढ़ते हैं।


- मनोज कौशल


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बोलना बहुत आता था,
मगर अब निःशब्द हूं....

दूर आसमान के अंतहीन क्षितिज का,
भ्रम था उन्मुक्त परिंदा हूं।
पंख टूटे और गिरा जमीं पर,
हालात की बेड़ियों में अब प्रकब्ध हूं।

बोलना बहुत आता था,
मगर अब निःशब्द हूं....

ख्यालों की दुनिया ही अलग थी,
मानो कोई शहंशाह हूं।
ख़्वाब से बाहर निकल देखा,
पाकर ख़ुद को "मंगता" स्तब्ध हूं।

बोलना बहुत आता था,
मगर अब निःशब्द हूं....

सुनने वाले कभी मुझे उत्कृष्ट थे,
या कौशल ही मैं खो बैठा हूं।
वज़ह जो भी हो मतलब नहीं,
चुप रहने के लिए अब प्रतिबद्ध हूं।

बोलना बहुत आता था,
मगर अब निःशब्द हूं....

- कुणाल


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फिर से

अब तो भरी जेठ की दुपहरी में
तपना अच्छा लगता है,
बारिश में तर-बतर हो जाना
अच्छा लगता है।

पहले मेवे भी नहीं भाते थे अपने हाथों से,
अब तो करेला भी मीठा लगता है।

मेला अच्छा लगता था,
मंदिर जाना अच्छा लगता था,
हर पल यूँ ही मुस्कुराना अच्छा लगता था।

अब खुद के साथ रहते हैं अकेले,
बाहर न जाने का बहाना बनाना अच्छा लगता है।

तुम साथ थे,
तो सब कुछ कितना ठीक था,
तुम्हें दूर किया अपने वास्ते,
ज़िंदगी तेरी सँवारने के लिए।

इंतज़ार है उस दिन का,
जब फिर मिलेंगे,
मेवे होंगे, मंदिर होगा,
फिर साथ घूमना होगा।

फिलहाल दोनों दूर हैं,
परिस्थितियों से मजबूर हैं।

पर दिल में एक आस अब भी बाकी है,
फिर साथ बैठेंगे, फिर मुस्कुराएँगे,
जो पल अधूरे रह गए हैं,
उन्हें मिलकर दोबारा जी जाएँगे।

क्योंकि तुम्हारे साथ ही तो
ज़िंदगी जीना अच्छा लगता है।
फिर से साथ अच्छा लगेगा…

- रोशन कुमार झा


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घन सजना

जब-जब नभ पर बदरा छाएँ,
याद तुम्हारी आती है ,
सूने मन के आँगन को फिर,
प्रेम प्रीत दहकाती है

सावन की भीगी बूँदों में,
आहट लगती है तेरी,
सूखे मन की हर डाली को,
मेघ सींच दो तुम मेरी ।
शीतल मन्द सुगन्ध पवन नित,
हिय हिल्लोर उठाती है।।
सूनें मन के आँगन को फिर
प्रेम प्रीत दहकाती है।

मैं भी तो इन घन के जैसी,
पीर संग ही रखती हूँ,
ऊपर से मैं हँसती रहती,
भीतर गुमशुम रहती हूँ।
चंदा की ये शीतल छाया
रह-रह अंग जलाती है।
सूनें मन के आँगन को फिर
प्रेम प्रीत दहकाती है।

मन भर आया,नयन न बरसे,
कैसी यह मजबूरी है,
तुम बिन मेरे जीवन की ऋतु,
लगती सखे अधूरी है।
नभ पर घन की उमड़ घुमड़ ये,
धरती को तड़पाती है।
सूनें मन के आँगन को फिर
प्रेम प्रीत दहकाती है।

आओ प्रिय! भीगी बेला में,
बातें सारी कह डालें ,
प्रीत भरा दो चार दिनों का,
जीवन जी लें मतवाले।
आने वाली मधुरिम बेला
आंखें सोच लजाती है
सूनें मन के आँगन को फिर
प्रेम प्रीत दहकाती है।

- सविता सिंह मीरा


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भगवान के घर देर

भगवान के घर देर है अंधेर नहीं
वह समय पर ही करता है सब काम
बड़े बड़ों की छुट्टी कर दे दिखा दे ताकत
जिसका चाहे चमका दे नाम

माध्यम वही है करवाता है वही सब काम
किसी की इज़्ज़त बढ़ा दे किसी को कर दे बदनाम
किसी को मेहनत का भी भरपूर फल नहीं मिलता
मिलता है किसी को मुफ्त में करता नहीं कोई काम

कर्म जैसा करेगा कोई वैसा ही पायेगा फल
आज यदि कुछ नहीं होगा अवश्य मिलेगा कल
काटेगा तो वही जो बीजा है तूने खेत में
बीज तभी अंकुरित होगा मिट्टी से जब चलेगा हल

उस की नज़रों से कोई नहीं है बच पाता
सात परदों में भी छुप जाओ उसे सब है नज़र आता
मन को धोखा दे चुका बहुत अब संभल जा
सब खबर हैं उसको बेशक रहता है तू छुपाता

देर से ही सही मेहनत का फल अवश्य पायेगा
खून पसीना जो तूने बहाया व्यर्थ नहीं जाएगा
दुनियां की भीड़ का हिस्सा मत बन कुछ करके दिखा
जब गुम हो जाएगा दुनियां की भीड़ में फिर पछतायेगा

दूसरों को सताएगा तो खुद भी चैन नहीं पायेगा
तेरे कर्मों का लेखा जोखा तेरे सामने आएगा
इज़्ज़त शोहरत सब धरे के धरे रह जाएंगे
जितना भी बचा ले बदन तेरा खाक में मिल जाएगा

- रवींद्र कुमार शर्मा


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हार मिले आयोग गलत, जीत मिली तो वाह!

किसने किसको क्या कहा, किसने किसको घेरा,
बयानबाजी की आँधी में, 'गुम' हो गया है सवेरा।
कभी राम के नाम वोट, कभी शिवाजी की शान,
कभी मंदिर तो कभी महापुरुष, बनते अभियान।

महापुरुषों ने देश की खातिर स्वयं सर्वस्व लुटाया,
नेताओं ने उनके नाम अपना कुनबा खूब बढ़ाया!
हार मिली तो आयोग गलत, जीत मिली तो वाह!
अपनी गलती मानने की, किसे पड़ रहीं परवाह?

कुर्सी छूटी तो संविधान पर संकट नज़र हैं आता,
कुर्सी मिलते ही इन्हें वही संविधान बड़ा सुहाता!
सड़कों पे जो भीड़ दिखे, उसे बताया जाएँ खास,
विरोधी की भीड़ 'अराजक', अपना जन-विश्वास।

भई अपनी रैली तो लोकतंत्र है, उनकी रैली शोर,
सत्ता के इस खेल में, 'सत्य' हो गया है कमजोर।
रामजी भी सोच रहे होंगे, यह कैसी लीला न्यारी,
मेरे नाम पर चलती रहती, हरेक रोज़ नई तैयारी।

- संजय एम तराणेकर


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ख़ामोशी का मौक़ा भी मुनादी भी

ख़ामोशी का मौक़ा भी मुनादी भी
देश-दुनिया में ताज़ा-ताज़ा क़ब्ज़ा करता
राष्ट्राध्यक्षों का अपहरण करता
सीने पर बंदूक तानता,भीख माॅंगता
नोबेल दे दो,नोबेल दे दो
है बली बहुत मगर छली अद्वितीय
बिना बुलाये कहीं भी घुस जाता
भटकता-भटकाता... उलझता-उलझाता
हा हा करता,हाथ हिलाता,ऑंखें दिखाता
ख़ुद को अकेला पाता,सुरक्षा-घेरों में
मटक-मटककर सुरक्षित मचलता
ख़ुद ही ख़ुद के प्रिय-अप्रिय नारे लगवाता
अन्नदाता-अन्नदाता, ज़िंदाबाद-ज़िंदाबाद
वह जो तन-मन-जीवन से यौनरोगी
वेश्यागामी,कपटी,विश्व-गुंडा कौन है
बोले ढक्कनछाप विश्व-गुरू असत्यश्री
काका मेरा काका अमेरिका
ट्रम्पम् शरणम् गच्छामि
बम्बम् शरणम् गच्छामि
मौक़ा भी,मुनादी भी,ख़ामोशी भी
ओम् शांति.



झूलते हुए झूलता हूॅं झूला.

झूलते हुए झूलता हूॅं झूला
कुछ देर इधर,कुछ देर उधर हूॅं मैं
कुछ देर बीच में किन्तु ठहरता नहीं हूॅं
बीच में रहते हैं जो भी,अभी या कभी भी
ज़रा-ज़रा भी पाते नहीं हैं ठौर-ठिकाना
ठीक नहीं,दोनों तरफ़ वफ़ादारी ठीक नहीं
इस तरफ़ या उस तरफ़ हो जाना ही ठीक
युद्ध का वक़्त है यही और सही-सही
बीच युद्ध के दौरान बदलना औज़ार
और बदलना उपस्थिति ठीक नहीं
अपनों में रहने से ही होता हूॅं मुक्त
अपनों में मरने से ही मिलती है मुक्ति
मुक्तिबोध मुक्तिमार्ग संभावना है अब भी
जॅंगल-जॅंगल झरते हैं झरने झर-झर
खिलते हैं फूल भी ख़ुशबूदार

- राजकुमार कुम्भज


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रख कर तेरी चौखट पर सर देख लिया,
तेरा जलजला तेरा हर कहर देख लिया।

तेरी डरावनी साजिश से डर नहीं लगता,
हमने अपने भीतर का डर देख लिया।

वक्त का सर सहलाने का दुस्साहस बहुत कर चुके,
मारकर पलटी वक्त ने भी तेरा असर देख लिया।

बड़ी मसक्कत से हर मजमून हर मसौदा बनाया,
टूट गए हर तिलस्म, जमाना मंजर देख लिया।।

सरे महफिल तूने मेरी मौत का ऐलान किया था,
विकास जिंदा है पीकर तेरा हर जहर देख लिया।

- राधेश विकास


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सच्चा कैदी

अगर आप कभी
नहाने के पानी में
किसी अजनबी
चेहरे को बारे में सोचें
तो आप असली गहरी सुन सकते हैं।
यहां वहां कोई अज्ञानके प्रति
अपनी अजीब विस्मृतिमे
शान छोड़ जाता है
अलमंद छुपे सकते से भीतर की
कमरे में जाता है
और उसकी प्रेम का ध्वनि
प्रबल हो जाती है।

- निर्मल राय


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