साहित्य चक्र

11 July 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 11 जुलाई 2026





*****

अमीरी-गरीबी

अमीरी

ब्याव शादी
उछब रै माथे
नूवा रूतबा
गाड्या रो काफिलों
अमीरी रा
लखण कम
मांगत रा खाडा
घणा गिणिज्ये!

ग़रीबी

ॳक पग
चुल्हा माथे टांग
भींत लफ
चानों पकड़
छात री मुडेर
चढ़णों
ग़रीबी नीं गिणिज्ये।


- डॉ जितेन्द्र कुमार बोयल


*****


जीतेंगे हम ये वादा करो।
कोशिश हमेशा ज्यादा करो

उड़ान इतनी ऊंची रखो।
कि आसमान भी छोटा लगे

इरादा इतना बड़ा रखो।
कि हर सपना अपना लगे

परिस्थिति चाहे कितनी भी खराब क्यों ना हो,
एक न एक दिन बदल ही जाएगी,

जो तुझे गिराना चाहे,
उनसे ऊंची उड़ान भरो,

मुश्किल चाहे,कितनी भी आ जाए
हर परिस्थितियों से लड़ना सीखो।

जीतेंगे हम ये वादे करो।
कोशिश हमेशा ज्यादा करो।


- सृष्टि कौशल


*****


टूटते रिश्ते और बदलती प्राथमिकताएं

आज प्राथमिकताओं के आगे रिश्ते कहाँ हैं टिकते
अनमोल जो होते थे कभी आज कौड़ियों के भाव हैं बिकते
कभी रिश्तों में हुआ करती थी शहद से भी ज़्यादा मिठास
घाव ऐसे मिल रहे हैं रिश्तों में जो ताउम्र धीरे धीरे हैं रिसते

आज प्राथमिकता नहीं है रिश्तों को बचाना
आज आदमी का लक्ष्य है केवल पैसा कमाना
हंसते हुए किसी को देख नहीं सकते
काम रह गया है केवल दूसरों को रुलाना

एक बच्चा है परिवार में उसे रिश्तों की क्या पहचान
भाई बहन बुआ मासी चाचा चाची का नहीं है ज्ञान
नारी का सम्मान कैसे करेगा दिल से कोई
जब उसके मन में ही नहीं है नारी का सम्मान

बूढ़े माता पिता को नहीं रखना चाहता कोई साथ
संवेदनहीन हम हो गए बिगड़ रहे हालात
सिर्फ पैसे की एहमियत है सबके लिए
ज़िंदा नहीं किसी के मन में अब जज़्बात


- रवींद्र कुमार शर्मा


*****


हमारी दुआ

तुझे हमारी दुआ लग जाए, 
खुश रहे सदा तू,
तुझे सारी खुशियांँ मिल जाए। 
बेचैन है आज दिल मेरा , 
 तेरे बिन कटे न ये दिन-रात
दुआ करती हूंँ रब से, 
तेरी  मांगी मुराद पूरी हो जाए। 
तू सदा खुश रहे, 
तुझे हमारी दुआ लग जाए। 

फिक्र न करो मेरी बिटिया, 
अभी काउंसलिंग हो रही है,  
जैसे-जैसे बीटेक में ,
सीटें क्लोज होती जा रहीं हैं, 
वैसे - वैसे  तेरी चिंताएं बढ़ रही हैं
मनचाहा कोर्स न मिलने पर , 
दु:खी ना हो, 
कदम-कदम पर जिंदगी में चुनौतियांँ हैं, 
लड़ना सीख लें तू इनसे, 
तू मेरी प्यारी बिटिया है,
पढ़ोगी भी ! आगे बढ़ोगी भी
उम्मीद पर  ही दुनिया कायम है।
मांँ की दुआओं का असर हो इतना, 
तेरी सारी मुश्किलें दूर हो जाए। 

तेरे चेहरे पर मुस्कान देखने को, 
आतुर हैं मेरे नयन , 
तू सदा खुश रहे, 
तुझे हमारी दुआ लग जाए। 


- चेतना सिंह 'चितेरी'
प्रयागराज, उत्तर प्रदेश


*****


ग़म की तलब

पटक के सर हर तरीकों से,
अब मैं हार चुका हूं।
मान अपनी हार मैं,
अब कहीं जाकर झुका हूं।
जरूरत हो तुम, समझा न सका तुझे,
अब तो ग़म की तलब है मुझे...

छोड़ दी सारी बदमाशियां अब,
लौटूंगा नहीं अब उस ओर कभी फिर।
मजबूरियां हैं कि सांसें चलाए जा रहा हूं,
जीता नहीं हूं अब ख़ुद की खातिर।
हैं ख़्वाहिशों के हर शमां दिल के बुझे,
अब तो ग़म की तलब है मुझे...

न जीतने की ज़िद बची है,
न हार जाने का कोई डर।
लंबी उड़ान का परिंदा था कभी,
अब ख़ुद ही पंख लिए अपने कतर।
न दिन की खबर अब न रात सूझे,
अब तो ग़म की तलब है मुझे...

डूबा रहता हूं नशे में हरदम,
कि तेरी यादें छू न पाए।
दर्द तेरे खालीपन का कभी,
मुझे अब ना रुलाए।
होगा नहीं पर कोशिश है भुलाने की तुझे,
अब तो बस ग़म की तलब है मुझे...


- कुणाल


*****


भीतर का वृक्ष

मन की धरती पर
एक वृक्ष उग आता है,
जब पीड़ाएँ
शब्दों का साथ छोड़ देती हैं।
उसकी हर शाख पर
अनकहे दिनों का इतिहास टंगा होता है।

भीतर सिकुड़ा हुआ मन
जब स्वयं को बाँहों में भर लेता है,
तब समझ आता है
सबसे कठिन यात्रा
दुनिया से नहीं,
अपने ही भीतर से होकर गुज़रती है।

जड़ों की तरह
कुछ स्मृतियाँ बहुत गहरी होती हैं,
वे दिखाई नहीं देतीं,
पर जीवन का हर कंपन
उन्हीं से जन्म लेता है।
उन्हें काटना नहीं,
समझना पड़ता है।

सूखी डालियाँ भी
हर बार मृत्यु का संकेत नहीं होतीं,
कभी-कभी वे
नई हरियाली के लिए
पुराने दर्दों का त्याग होती हैं।

इसलिए
जब भी मन उजाड़ लगे,
अपने भीतर उगे उस वृक्ष से मिलना
वही सिखाएगा कि
सबसे गहरे अँधेरों में भी
जीवन, जड़ों से फिर जन्म लेना जानता है।


- डॉ. सारिका ठाकुर 'जागृति'
ग्वालियर, मध्य प्रदेश


*****


थोड़ा थक गया हूं काम करते-करते,
तुम थोड़ी मुस्कुरा दोगी क्या ?

यह शीशा बहुत उदास लग रहा है,
कुछ देर तुम इसके सामने आ जाओगी क्या ?

आसमान के सारे तारे, हमारे घर को क्यों घूर रहे हैं,
कही तुम फिर वही ड्रेस पहन कर छत पर आ गयी क्या ?

आज मेरा मन बार-बार तुझे ही क्यों देखना चाह रहा हैं,
कही तुमने फिर से वही बिंदी लगा ली क्या ?

मेरी किताबों से आज इतनी महक क्यों आ रही हैं,
कही तुमनें इन्हें फिर से छू लिया क्या ?


- दीपक बारुपाल


*****


अंतहीन सफर

इतनी डोर से बंधा हूँ,
कुछ पता नहीं।
सजा उसमें भी मिली,
जिसमें मेरी खता नही।

अंतहीन सफर पर चला हूं,
मंज़िल का कुछ पता नहीं।
नागफणी सा हो गया हूं,
गले लगाने को कोई लता नहीं।

एक तरफ कायनात सारी,
दूसरी ओर मैं अकेला।
फिर भी देखता हूं,
नियति का खेल,
कब तक चलता है।

ना उम्मीदी का मौसम ठहरा,
या किस्मत का मिजाज़ बदलता है।


- रोशन कुमार झा


*****


सबर

लक्ष्य हासिल करना है तो सबर रखो
फिर तू परिणाम देखो।
जिसने भी संघर्ष किया, मेहनत किया
सबर रखे तो परिणाम अनुकूल पाया।
समझना हो सबर के परिणाम तो
अपने आस-पास के लोगों को अनुकरण देखो।
माली बगीचे में, किसान खेते में,
पल नहीं दिन नहीं, महीनों है बिताते,
सबर है रखते, फिर उसे उचित परिणाम है मिलते।
अतः कुल मिलाकर चुन्नू कवि यही है समझाते,
कि जीवन में लक्ष्य प्राप्ति वास्ते,
सबर रखना जरूरी है होते।
हालांकि सबर करना थोड़ी कठिन है भले,
लेकिन शनै-शनै वक्त कट ही जाता है
अंत समय में सबर का परिणाम मिलने पर
मन प्रफुल्लित हो ही जाते है।


- चुन्नू साहा


*****


फिर जग में न आऊंगी

हवस के भूखे दरिंदो,
हवस की ये तुम्हारी भूख,
कब और कैसे शांत होगी ?

जिसका जीवन किया बर्बाद,
उसकी सांसों की डोर तोड़कर,
क्या तुम्हारे मन में रही होगी ?

उसकी आत्मा को कचोटते वक्त
शरीर को बेरहमी से रौंदते वक्त,
तुम्हे अपनों की याद नहीं आई होगी ?

इक जीवन की ही नहीं,
इक पीढी की ही नहीं,
वो कितने जनों की आस रही होगी ?

मन आतंकित आशंकित जुबां दबी होगी,
डरी सहमी जब गिरफ्त में आई क्रूर पंजों की,
छटपटाती बेबस लड़की होने को कोसती होगी ?

दर्द के आगोश में डूबती निगाह,
अनंत दर्द से भरी टूटती सांस,
फिर जग में न आऊंगी ये सोचती होगी ?


- राज कुमार कौंडल


*****


कहो ना

क्यों प्रतीत होता है ऐसा,
कि वह अशरीरी
होकर भी सर्वत्र है।

प्रातः की उन
अर्द्ध-उन्मीलित पलकों में,
धूमिल सुगन्धित समीर के
उन झोंकों में,
जो देह को नहीं,
अंतर्मन को स्पर्श कर जाते हैं।

अकारण ही...
जब कोई
स्वयं को रिक्तता में पाता है,
तब एक अदृश्य स्पर्श
मौन भाव से उसे
आवेष्टित कर लेता है,
जैसे कोई परम आत्मीय
समीप होकर भी,
दृश्यमान नहीं होना चाहता।

विस्मयकारी है न ?
मौन की पराकाष्ठा में भी,
स्पंदन उस अनिवर्चनीय की
ओर मुड़ जाते हैं।

जब शब्द निद्रामग्न हो जाते हैं,
तब अंतस की गहराइयों से
कोई मृदु स्वर में उसे पुकारता है,
और चित्त व्याकुल हो उठता है
इस संशय में कि
वह 'अन्य' नहीं,
अपितु निज के ही भीतर
अधिष्ठित है।

कहो ना...
यह आसक्ति है,
वंदना है,
या पूर्वजन्म की
कोई अपूर्ण स्मृति ?

या फिर... समस्त
चराचर जगत,
इसी प्रकार किसी
गुढ़ रहस्य केअदृश्य
पाश में आबद्ध है ?

क्या तुम्हारा अपना
हृदय भी स्वयं से
यही प्रश्न करता है ?
क्या तुम भी उसी
व्याकुलता से निज के भीतर,
किसी क़ो खोजते हो ?

कहो ना! कहो ना...


- सविता सिंह मीरा
जमशेदपुर, झारखंड



*****


इनके झूठ के आगे दुनियां कुर्बान हो गई

राजनीति आजकल बदनाम हो गई
फ्री की आदत अब आम हो गई
दस बार मुकर जाते हैं सुबह से शाम तक
झूठ बोलना तो अब इनकी शान हो गई

बाणी पर नहीं रही इनके लगाम
कुछ भी बोल देना इनकी पहचान हो गई
अपने गिरेबान में झाँक कर देखते नहीं
सत्ता की कुर्सी इनकी जान हो गई

जीतते ही बन जाते हैं बादशाह
खुद बन गए स्याने जनता नादान हो गई
कहते हैं लोकतंत्र में जनता होती है सर्वोपरि
यहां तो जनता कमज़ोर और सत्ता बलवान हो गई

सत्ता के लिए कोई दीन ईमान नहीं इनका
कुर्सी तो इनके लिए भगवान हो गई
जनता को बना देते हैं हमेशा प्रश्न चिन्ह
खुद की बात आये तो पूर्ण विराम हो गई

कोई नहीं ऐसा जो सिद्धान्तों पर चले
सिद्धान्तों की बातें इनके लिए अपमान हो गई
कपड़े इनके सफेद हैं मन इनके काले
इनके झूठ के आगे दुनियां कुर्बान हो गई


- रवींद्र कुमार शर्मा


*****


ईश्वर और कविता

एक दुनिया थी ईश्वर की
ईश्वर की दुनिया में सभी सुखी थे
फिर भी कुछ दु:ख थे ईश्वर के
कुछ छोटे थे,कुछ बड़े थे दु:ख
कुछ छोटे थे,कुछ बड़े थे ईश्वर भी
एक-दूसरे के विरुद्ध खड़े थे ईश्वर
और अपने-अपने हठ लिए जीते थे
वे आपस में ही लड़ते-झगड़ते थे
ईश्वर की दुनिया में मनुष्य नहीं थे
ईश्वर कविता नहीं पढ़ते थे।

*****

असीमित है सहना

असीमित है ब्रह्माॅंड
असीमित है आकाश और क्षितिज
जल असीमित,जल में लहरें असीमित
काल असीमित,काल के हिस्से असीमित
असीमित दु:ख का आर्तनाद असीमित
प्रार्थनाऍं असीमित और असीमित ही है
सूने संंसार में प्रार्थनाओं की गूॅंजती गूॅंज
असीमित गूॅंजती गूॅंज में शताब्दियों से
कितना कुछ सहता रहता हूॅं मैं
असीमित है सहना।


- राजकुमार कुम्भज


*****


बारिश की बूँदें

बारिश की बूँदें जब धरती पर गिरती हैं,
लगता है मानो खुशियाँ ही बिखरती हैं।

ऐसा प्रतीत होता है हर पल जैसे,
आकाश और धरती का मिलन हो रहा हो वैसे।

बारिश की बूँदों में जब मैं भीग जाती हूँ,
प्रिय की यादों में खोकर मुस्कुराती हूँ।

हर बूँद मुझे उनका एहसास दिलाती है,
दिल की धड़कनों को और बढ़ाती है।

बरसती फुहारें जैसे मुझसे कहती हैं,
जीवन की हर पीड़ा अब यहीं बहती है।

आज अपने सारे ग़म इस बारिश में धो लो,
दिल के हर दर्द को खुलकर संजो लो।

अपने प्रिय की बाँहों में सिमट जाओ,
प्रेम की बारिश में स्वयं को भिगो जाओ।

यह सावन हर दिल को यही संदेश सुनाए,
प्रेम से भरा जीवन हर पल मुस्काए।


- गरिमा लखनवी


*****


रात दिन थरथराती रही सरहदें।
नींद सबकी उड़ाती रही सरहदें।

आदमी-आदमी को लड़ा सामने,
ख़ूब हँसती- हँसाती रही सरहदें।

धर्म, जाति, ज़ुबाँ ,रंग के नाम पर,ये
रोज़ बंटती - बंटाती रही सरहदें।

तार, कांँटे,सलाखों से बनकर कहीं,
रास्ते सब मिटाती रही सरहदें।

पूछकर हाल दोनों तरफ के जुदा,
दर्द दिल में दबाती रही सरहदें।

रोज़ ऊँची हुई और गहरी हुई,
ख़ून जितना बहाती रही सरहदें।

गन गरजती रही,बम उगलती रही,
इस तरह ज़ुल्म ढाती रही सरहदें।


- नवीन माथुर पंचोली


*****


जीवन दीप

जीवन तेरा माटी के दीपक समान,
फिर क्यों करता है, हे मानव, अभिमान?
कच्ची मिट्टी से ही बना है तन-प्राण,
सत्य यह जान, हे इंसान।

उम्र है दीपक के तेल समान,
समय के साथ पल-पल घटता जाता,
होता नहीं तनिक भी आभास,
तले तक, जब तक पहुँच नहीं जाता।

संघर्षों की आँधी जब चलती प्रचंड,
मंद पड़ जाती जीवन-बाती, यह अखंड।
खुशियों की बयार जब देती झोंका,
भभक उठती लौ, फिर हो तरो-ताज़ा।

बनकर झकोरे बीमारियाँ-परेशानियाँ आएँ,
दीपक की लौ को बुझाने धाएँ।
पर प्रभु-कृपा का जब तक हो आवरण,
हो नहीं सकता जीवन-दीप का क्षरण।

माटी का है यह जीवन-दीप,
पर विधाता का अनुपम, अतीव उपहार।
सद्कर्मों से इसे सजा, सँवार
यही जीवन का सच्चा श्रृंगार।

हो भले कच्ची माटी के समान,
पर हो यदि प्रभु-कृपा का वरदान,
मुसीबतों की आँधियाँ लाख आएँ-
जीवन-दीप को बुझा न पाएँ।


- देवेंद्र भण्डारी


*****


सुंगला रा पाणी

पाणिये रिया सुबला ऐथी, सुंगल एथा रा नाँव,
बिच पर अ ई सड़क, ऊपर थल्ले एथी गाँव
बड्डे-बड्डे दरख्त एथी, घणी-घणी इन्हा री छाँव
शोखी लैंदी जिऊये री गर्मी, ठण्डड़ी तांजे बगदी हवा,
फेरी कदी नि बिसरदा भाईयों, एथीं रा नाँव,
शान्त हुई जांदा जिऊ म्हारा
तांजे तसल्ली कन्ने पींदे सुंगला रा पाणी

पहाड़ा ते औंदा, नालुए रिये बगदा
सुंगला रे पाणिये री, अपणी ई कहाणी,
पुख़र, सुआ कोई नी एथी,
नालुए रिये बगदा नीला पाणी,
पाणी पीणे जो रूकदियां गड्डियाँ,
सबणी अपणी प्यास भुजाणी,
तौन्दिया रे त्याड़े तांजे धुप्पा भखदी
याद आऊँदा फेरी सुंगला रा पाणी ,

पीणे जो बड़ा भारी स्वाद आ,
छैल बांका एथि रा मिट्टणु पाणी,
मिट्टणु पाणिये रिया कोई रिसा नी भाईयों,
घीयु साईं लगदा पीणे जो पाणी,
चार-चफेरे ऐथी रिय्यासी दिखदी,
जिऊये सौगी तांजे नज़र घुमाणी
आऊँदे-जांदे ऐथी रुकदे रहन्दे
पी लैन्दे एथी रा ठण्डड़ा जेया पाणी,


- बाबू राम धीमान


*****


नन्हीं सी जान

नन्हीं सी जान, लिए अरमान,
एक दिन छुएगी आसमान।

अपनों से दूर, सपनों के पास,
सफल हो उसकी आस।

बचपन भूल, शौक भूल
चली बहुत दूर गुरुकुल।

रोटी में उसको मां दिखती,
गुरु में दिखते उसके पिता।

गुरुकुल में बचपन भूल,
अपना भविष्य गढ़ रही,
सब सुख चैन छोड़,
नन्हीं बिटिया पढ़ रही।

जिंदगी का हर सबक ले रही,
खामोशी से बस मुस्कुरा रही।

आंखों में चमक देखते बनती,
उसे पता है वो सीप है
जिसमें छुपा है मोती।

क्या सुबह क्या शाम,
हर वक्त है सपनो के नाम।
क्या त्याग है,क्या लग ,
क्या चाहत क्या सफलता की अगन।

खाली बिस्तर नींद नहीं आती,
अब मां सुबह नहीं जगाती।

रातों के सपने में भाई बुलाता,
पिता बाजार ले जाते और
मां खाना खिलाती।
आंख खुलती बिस्तर पर,
ऊपर सिर्फ एक पंखा घूमता पाती।

एक चारपाई,दो बर्तन और
पास एक बस्ता है।
घर जाने को मन,
बहुत तरसता है।

रिश्ते नाते अब किताबों से,
नन्हीं सी जान पल रही,
सिर्फ अरमानों में।

एक दिन मेहनत उसकी रंग लाएगी।
नन्हीं सी चिड़िया, आकाश को छू आएगी।


- रोशन कुमार झा


*****




09 July 2026

डॉ. शैलेश शुक्ला की तीन गज़लें पढ़िए





गज़लें


उन्हें भुलाने की कोशिश में उन्हीं की याद आयी
हर बात से निकलकर बस उन्हीं की बात आयी।

सोने की कोशिश की, मगर हम न सो पाए रात भर
इन कोशिशों में हर दफ़ा इक और नई रात आयी।

मुस्कुराने की कोशिश की, हमने मगर हर बार
पर आँखों में फिर आँसुओं की ही सौगात आयी।

भरोसा उन पर खुद से ज़्यादा है हमें, मगर
मौसम बदलने की खबर हवा अपने साथ लायी।

वो कहते हैं कि बेवफ़ाई वफ़ा से जीत जाती है
भला कोई क्या जाने कि किसने किससे है मात खायी।

सोचा था ‘शैलेश’ उन्हें हम भुला देंगे आसानी से
मगर अब जा के याद हमें अपनी ही औक़ात आयी।


*****


वो तो हमें खुद से जुदा बताए बैठे हैं
हम उन्हें दिल का खुदा बनाए बैठे हैं।

वो मिलें या न मिलें, है उनकी अपनी मर्ज़ी
हम तो खुद को ही उन्हीं में समाए बैठे हैं।

वो कहते हैं कि हमसे नहीं कोई नाता
फिर भी मेरी राहों में नज़रें बिछाए बैठे हैं।

वो हमें दूर से हर रोज़ निहारा करते हैं
हम जो देखें उन्हें, तो नज़रें चुराए बैठे हैं।

अपनी चाहत से चाहे वो जिसे भी चाहें
हम तो दिल में उन्हें अपना बनाए बैठे हैं।

दूर जाएँ वो अगर हमसे, तो कोई फ़र्क नहीं
हम तो हर ज़र्रे में उनको ही बसाए बैठे हैं।

‘शैलेश’ को वो मिलें, न मिलें—पता नहीं
पर दिल से तो उन्हें हम अपनाए बैठे हैं।

*****


चले आते हैं इन गलियों में अक्सर दीवानों की तरह,
इस मिट्टी में अपना घर होने का एहसास होता है।

बरसों शहर में रहकर भी हम शहर के हो न सके,
गाँव और कस्बे में बिताया हर लम्हा ख़ास होता है।

तमाम साज़ो-सामान जोड़े हमने, खुश रहने की ख़ातिर,
एसी की हवा में भी बेनवा की याद से मन उदास होता है।

रिश्ते तो बहुत बने शहर में, पर स्वार्थ की दूरियाँ रहीं,
अपनों से अपनेपन का रिश्ता ही दिल के पास होता है।

भीड़ में रहकर भी अक्सर हम तन्हा ही रह जाते हैं,
हर शख़्स के चेहरे पर मुखौटों का आभास होता है।

जब लौटते हैं यादों में अपने गाँव की पगडंडियों पर,
हर कोना, हर आँगन जीता-जागता इतिहास होता है।


- डॉ. शैलेश शुक्ला


*****

कम उपचारक नहीं होता आलिंगन अथवा जादू की झप्पी






कई लोग अपने मित्रों अथवा परिचितों से बड़ी गर्मजोशी से मिलते हैं। अच्छी तरह
से हाथ मिलाते हैं अथवा गले मिलते हैं। कई लोग हाथ मिलाने की बजाय कुछ उँगलियाँ
आगे कर देते हैं और वो भी इस तरह से जैसे उनकी उँगलियाँ टूटी हुई हों या वे मनुष्य
न होकर रोबोट हों। अभिवादनस्वरूप जो शब्द बोलेंगे वो भी एकदम सपाट लहजे में व
बिना किसी स्नेह व आत्मीयता के। इससे रिश्तों में ताज़गी व स्थायित्व नहीं रह पाता
और संबंध मृतप्राय होने लगते हैं।


जब भी दोस्तों व परिचितों से मिलें गर्मजोशी से
मिलें। आयु के अनुसार प्यार व सम्मान के साथ अभिवादन के शब्द बोलें। समवयस्कों
से गले मिलें और बच्चों को गोद में ले लें इससे अच्छी तो कोई बात ही नहीं हो सकती
क्योंकि जादू की झप्पी देना अथवा आलिंगनबद्ध होना या किसी को अपनी बाँहों में भर
लेना अभिवादन का आत्मीय तरीक़ा ही नहीं अपितु एक अत्यंत सुखद अनुभूति व एक
अप्रतिम स्वास्थ्यवर्धक एवं उपचारक प्रक्रिया भी है। पाश्चात्य जगत में तो एक कहावत
ही प्रचलित है कि जो रोज़ आलिंगन करता है वह हमेशा तनावमुक्त व स्वस्थ रहता है।


हम किसी को अपनी बाँहों में तभी अच्छी प्रकार से लेते हैं जब हम अतिशय
प्रेममय होते हैं और जब हम किसी को आलिंगनबद्ध करते हैं अथवा हमें कोई अपने
आगोश में लेता है तो भी हम प्रेममय होने लगते है। हमारी बॉडी कैमिस्ट्री परिवर्तित होने
लगती है। यदि वह आलिंगन अर्थपूर्ण है और उससे हमें प्रसन्नता मिल रही है तो हमारे
शरीर में लाभदायक हॉर्मोंस का उत्सर्जन प्रारंभ हो जाता है। इसका विपरीत भी उतना ही
सही है। यदि कोई व्यक्ति द्वेष अथवा कपट के वशीभूत होकर किसी का आलिंगन
करता है तो सामनेवाले का रोम-रोम सुलग उठता है जिससे उसके शरीर में लाभदायक के
बजाय तनाव उत्पन्न करने वाले हॉर्मोंस का उत्सर्जन प्रारंभ हो जाता है जिससे वो बेचैनी
का अनुभव करने लगता है और फ़ौरन प्रतिरक्षात्मक स्थिति में आ जाता है।




एक माँ अपने बच्चे को विशेष रूप से छोटे बच्चे को दिन में न जाने कितनी बार
अपनी बाँहों में भरती है, कितनी बार उसे अपनी छाती से लगाकर थपथपाती है। इस
आलिंगन का आनंद एक माँ ही अनुभव कर सकती है दूसरा कोई नहीं। बच्चा भी माँ की
गोद में, उसके आलिंगन में न केवल सुरक्षित अपितु आनंदित भी अनुभव करता है। जो

बच्चे चलना सीख जाते हैं और सरपट दौड़ते हैं वे भी अपनी माँ की गोद अथवा उसके
आलिंगन में आने के लिए मचलते रहते हैं। इसका एक ही कारण है और वो ये कि वे
आलिंगनबद्ध होकर प्रसन्नता के सागर में ग़ोते लगाने लगते हैं। बच्चा चोट, भूख, दर्द
अथवा अन्य किसी कारण से कितना भी क्यों न रो रहा हो बस एक बार उसे अपने
आलिंगन में ले लीजिए वो सब कुछ भूलकर सामान्य हो जाएगा और जल्दी ही हँसने-
मुस्कुराने लगेगा। ये आलिंगन का ही प्रभाव होता है।

आलिंगन की प्रक्रिया माँ और बच्चे दोनों को न केवल प्रसन्नता व बच्चे को
भावनात्मक सुरक्षा व सबलता प्रदान करने में सहायक होती है अपितु दोनों को अच्छा
स्वास्थ्य व रोगमुक्ति प्रदान करने में भी सक्षम होती है। इन क्षणों में दोनों के शरीरों की
अतःस्रावी ग्रंथियों में जो रासायनिक परिवर्तन होता है वो उनके शरीर की रोगावरोधक
प्रणाली को सुदृढ़ करता है जिससे दोनों ही स्वस्थ रहते हैं और किसी भी रोग की स्थिति
में शीघ्र रोगमुक्त हो जाते हैं।

जो माँ या बच्चे आलिंगन के विभिन्न रूपों के इन अद्भुत
प्रसन्नतादायक व आरोग्यवर्धक अनुभवों से वंचित रह जाते हैं उनके जीवन में इन
अभावों की पूर्ति अन्यत्र संभव ही नहीं। माँ की कोमल मसृण बाँहें हों अथवा पिता की
मज़बूत भुजाएँ या फिर दादा-दादी व नाना-नानी के आत्मीयतापूर्ण नाज़ुक हाथों का स्पर्श
इन सभी में निहित होता है पूर्ण सुरक्षा का एहसास व आनंद का परस्पर आदान-प्रदान।
इन क्षणों की उपेक्षा करना ही अस्वास्थ्यकर है।






विभिन्न आधुनिक शोधों से भी ज्ञात होता है कि आलिंगन का हमारे हृदय,
मस्तिष्क व दूसरे अंगों पर दीर्घकालीन आरोग्यकारी प्रभाव पड़ता है। प्रतिदिन बीस सेकेंड
का आलिंगन व्यक्ति को मानसिक रूप से सक्रिय व चुस्त-दुरुस्त रखने और हृदय की
बीमारियों से बचाने में काफ़ी हद तक कारगर होता है।

आलिंगन से व्यक्ति में इंफेक्शन
का मुक़ाबला करने की शक्ति बढ़ती है। विभिन्न प्रकार के तनावों के स्तर को संतुलित
रखने व अवसाद को रोकने में आलिंगन बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करता है।
परोक्ष रूप से आलिंगन व्यक्ति की स्मरण शक्ति को अक्षुण्ण बनाए रखने में भी
मददगार होता है। प्रश्न उठता है कि आलिंगन तनाव को कैसे कम करता है और इससे
उसकी स्मरण शक्ति कैसे ठीक रहती है?

वास्तव में आलिंगन के दौरान जो आनंदानुभूति होती है उससे हमारी पीयूष ग्रंथि
से ऑक्सीटोसिन नामक हार्मोन पर्याप्त मात्रा में निकलकर हमारे रक्त में मिल जाता है
जो शरीर में तनाव उत्पन्न करने वाले दूसरे हार्मोंस के दुष्प्रभाव को निष्क्रिय बना देता
है। इस प्रकार हम न केवल तनाव से बचे रहते हैं अपितु निरंतर तनावमुक्त व शांत
रहने के कारण अपनी याददाश्त को भी ठीक रख पाते हैं।

आलिंगन करने से न केवल
हृदय की धड़कनों व रक्तदाब को कम करने में सहायता मिलती है अपितु सर्दी-ज़ुकाम
जैसी व्याधियों में भी आराम मिलता है। हमारे शरीर की एड्रिनल ग्रंथि से स्रावित होने
वाला हार्मोन कार्टिसोल एक तनावप्रदायक हार्मोन है जो उच्च रक्तचाप, अस्थिभंगुरता,
दुश्चिंता, अवसाद व स्थूलकायता तक के लिए उत्तरदायी होता है।


इन स्थितियों अथवा व्याधियों से बचने के लिए खानपान पर नियंत्रण, व्यवस्थित
जीवनशैली, व्यायाम व चिकित्सक द्वारा उपचार अपेक्षित है लेकिन जो व्यक्ति आलिंगन
से दूर नहीं भागते उन्हें उपरोक्त व्याधियों से अधिक नहीं जूझना पड़ता। तनाव उत्पन्न
करने वाले किसी भी हार्मोन के दुष्प्रभाव से मुक्ति पाने व अपने को स्वस्थ रखने के
लिए आलिंगन एक प्रभावशाली क्रिया है।

मनोवैज्ञानिक व पारिवारिक चिकित्सक
वर्जीनिया सैटिर कहती हैं कि हमें अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए प्रतिदिन चार
बार, अपने रख-रखाव के लिए प्रतिदिन आठ बार व अपनी वृद्धि के लिए प्रतिदिन बारह
बार आलिंगन करना चाहिए। इसका सीधा सा अर्थ है कि हम जितनी ज़्यादा बार
आलिंगन करते हैं वह हमारे हित में होता है। आलिंगन बहुत काम की चीज़ है लेकिन
आलिंगन से पूर्व हमें हर प्रकार की मर्यादा का ध्यान रखना चाहिए और पूर्णतः सात्त्विक
भाव के साथ किसी को अपने बाहुपाश में लेना चाहिए।

संबंधों के निर्माण व उनमें माधुर्य व विश्वसनीयता उत्पन्न करने में भी आलिंगन
का महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। किसी के गले लगकर अथवा उसे अपनी बाँहों में भरकर
उसका अभिवादन करके हम अपरिचितों को भी अपने अधिक निकट आने के लिए तैयार
कर लेते हैं। कुछ व्यक्ति इस कला में निष्णात होते हैं और सबसे खुली बाँहों और खुले
दिल से मिलकर उनसे तत्क्षण आत्मीयता स्थापित कर लेते हैं। हम जब तक परस्पर
आलिंगन करने में संकोच करते रहते हैं हमारे संबंधों में औपचारिकता ही बनी रहती है
जिससे प्रगाढ़ता नहीं आ पाती। बच्चे हों या युवा, स्त्री हो या पुरुष आलिंगन अथवा जादू

की झप्पी सबको प्रसन्नता व आरोग्य प्रदान करने में सक्षम है। एक अत्यंत भयभीत
बच्चे अथवा किसी बड़े को आलिंगनबद्ध कर लीजिए और देखिए कि कैसे वो फ़ौरन
भयमुक्त व स्वस्थ हो जाता है। यदि हम स्वयं को किसी के आलिंगन के योग्य भी बना
लेते हैं तो ये भी जीवन की बहुत बड़ी उपलिब्ध ही है।


- सीताराम गुप्ता



मैं सोचती हूँ





कभी-कभी मैं सोचती हूँ...
क्या सचमुच मेरी ज़िंदगी में भी कोई ऐसा सवेरा आएगा,
जहाँ दर्द दरवाज़ा खटखटाए बिना लौट जाएगा,
और आँखें बिना किसी वजह के मुस्कुरा सकेंगी?

हर रात मैं अपने टूटे हुए हिस्सों को समेटकर सोती हूँ,
और हर सुबह फिर एक नई लड़ाई के लिए खड़ी हो जाती हूँ।

लोग कहते हैं, वक्त सब ठीक कर देता है...
मगर शायद उन्होंने उन लोगों का दर्द नहीं देखा,
जो बरसों तक उम्मीद और निराशा के बीच झूलते रहते हैं।

मेरे हिस्से की ज़िंदगी ने मुझे फूल कम,
काँटे ज़्यादा दिए हैं। मैंने अपनों को बदलते देखा है,
रिश्तों को बिखरते देखा है,
सपनों को आँखों के सामने दम तोड़ते देखा है।

और फिर भी... हर बार जब मैं पूरी तरह टूटने लगती हूँ,
मेरे भीतर कहीं एक छोटी-सी उम्मीद धीमे से कहती है-
"अभी नहीं... अभी तुम्हें और चलना है।"

जीवन की परीक्षाएँ अजीब होती हैं, इनमें न कोई घंटी बजती है,
न कोई प्रश्नपत्र मिलता है, न कोई समय सीमा होती है।

यहाँ हर दिन एक नया सवाल है, हर साँस एक संघर्ष,
और हर धड़कन हिम्मत का एक नया प्रमाण।

कई बार मैं मुस्कुराती हूँ,
लेकिन मेरी मुस्कान के पीछे दर्द का एक समंदर छिपा होता है।
कई बार मैं खामोश रहती हूँ,
क्योंकि शब्द भी मेरे घावों का बोझ नहीं उठा पाते।

कुछ लोग पूछते हैं- "तुम इतनी चुप क्यों हो?"
काश वे जान पाते, कि कुछ दर्द ऐसे होते हैं जो रोने से नहीं,
जीने से महसूस होते हैं।

मैं थकी हूँ... बहुत थकी हूँ... मगर रुकी नहीं हूँ।

क्योंकि मुझे पता है, मेरे संघर्षों की कहानी अभी अधूरी है।
और शायद एक दिन, जब यह लंबी अँधेरी सुरंग खत्म होगी,
तब मेरी आँखों से निकला हर आँसू मेरी जीत की गवाही देगा।

उस दिन मैं वक्त से सिर्फ इतना कहूँगी-
"देख, तूने मुझे तोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी,
मगर मैं फिर भी बच गई...
क्योंकि मेरे भीतर उम्मीद अभी ज़िंदा थी।"


- आरती कुमारी (झाँसी)


चौमासा की डरावनी रातें!


पहाड़ दूर से जितने प्यारे और सुंदर दिखाई देते हैं, अक्सर पहाड़ों का जीवन उससे उतना ही डरावना व खतरनाक होता है। चौमास यानी बरसात के मौसम में पहाड़- नदियों की उफान, हरियाली की हनक और कीट-पतंगों के आक्रमण से भर जाते हैं। चौमास में महीनों बारिश लगी रहती है और बारिश के कारण स्थानीय लोगों के मन में आंतरिक डर बना रहता है।

चौमास में अधिक बारिश के कारण पहाड़ों की नदियाँ विकराल रूप धारण की रहती है। जमीन यानी पहाड़ों का खिसकना, रोड़-पुलों व घरों का टूटना, पेड़ों का गिरना और आपदा आना पहाड़ों में सामान्य बात है। इसीलिए शायद! पहाड़ के स्थानीय लोग अपने घर में हमेशा 1-2 माह का राशन बचाकर चलते हैं। कहते है कि जैसी परस्थितियाँ होती हैं, वैसे ही उपाय खोजे जाते हैं। अपने घर में हमेशा राशन का भंडार करके रखना पहाड़ों के लोग का वहां की परस्थितियों से लड़ने का एक कारगर हथियार है।






चौमास की रातों में कभी-कभी पहाड़ी लोग बिना सोए भी रहते हैं। इसलिए नहीं कि उन्हें नींद नहीं आती, बल्कि इसलिए क्योंकि पहाड़ों की ज्यादा बारिश डरा देती है। पहाड़ियों का डरना भी वाज़िब है, क्योंकि प्रकृति का कहर बिना बताएँ आती है और वो इंसानों की तरह जाति-धर्म व लिंग का किसी भी प्रकार का कोई भेद नहीं करती है। पहाड़ों के हर गांव में चौमास की रातों के कई दर्दनाक किस्से दफ्न है। शायद इन्हीं दर्दनाक किस्सों ने पहाड़ियों को कोमल हृदय का मानुष बनाया है।

पहाड़ियों के बारे में कहा जाता है कि पहाड़ी लोग हृदय से जितने कोमल होते हैं, उतने ही उनके हौंसले बुलंद होते हैं। पहाड़ी प्रकृति से बार-बार टूटता-डरता है, मगर हिम्मत नहीं हारता है। चौमास की डरावनी रातें पहाड़ियों को डराती तो जरूर हैं, मगर पहाड़ी लोग प्रकृति से कभी रूठते या नफरत नहीं करते हैं। क्योंकि पहाड़ के लोग प्रकृति को अपनी माँ मानते हैं और उसके कहर को माँ की डांट समझ कर सह लेते हैं।

पहाड़ों में चौमासा जितना डरावना होता है, उतना ही लाभदायक और प्यारा भी होता है, क्योंकि चौमासा अपने साथ हरियाली, रंग-बिरंगे फूल, नदियों की सु.. सु… सुसुहाहट और चिड़ियों की चहचहाहट लेकर आती है। चौमासा यानी आषाढ़, सावन, भादो और कार्तिक का माह और वर्षा ऋतु का मौसम होता है। चौमासा को वर्षावास, चतुर्मास और चातुर्मास्य भी कहते हैं।


- दीपक कोहली