साहित्य चक्र

28 April 2026

आत्म-सम्मान, स्वार्थ और संबंधों का बदलता स्वरूप- एक समग्र दृष्टिकोण


आज का समय विचारों के परिवर्तन का समय है, जहाँ एक ओर हमें बचपन से मिले संस्कार हैं और दूसरी ओर जीवन के अनुभवों से उपजी नई समझ। बचपन में हमने सीखा कि दूसरों की खुशी का ध्यान रखना चाहिए, परिवार को सर्वोच्च स्थान देना चाहिए और हर व्यक्ति का सम्मान करना चाहिए। ये सिद्धांत हमारे व्यक्तित्व की नींव बनाते हैं और समाज को एकजुट रखते हैं।

किन्तु जैसे-जैसे जीवन आगे बढ़ता है, अनुभव हमें यह भी सिखाते हैं कि केवल दूसरों के लिए जीना पर्याप्त नहीं है। यदि व्यक्ति स्वयं के अस्तित्व, भावनाओं और आत्म-सम्मान की उपेक्षा करता है, तो वह भीतर से कमजोर होने लगता है। यहीं से एक नई समझ जन्म लेती है- स्वयं को महत्व देना भी उतना ही आवश्यक है जितना दूसरों को देना।





आत्म-सम्मान और स्वार्थ: असली अंतर

समाज में अक्सर “खुद को महत्व देना” स्वार्थ समझ लिया जाता है, जबकि वास्तव में यह आत्म-सम्मान है। स्वार्थ वह स्थिति है जहाँ व्यक्ति केवल अपने हित के बारे में सोचता है, चाहे उससे दूसरों को नुकसान ही क्यों न हो। वहीं आत्म-सम्मान वह भावना है जिसमें व्यक्ति अपनी भावनाओं, अपने अधिकारों और अपनी गरिमा को भी उतना ही महत्व देता है जितना वह दूसरों को देता है। अपनी खुशी का ध्यान रखना, अपनी सीमाएँ तय करना और अपनी ऊर्जा का सही दिशा में उपयोग करना- ये सभी आत्म-सम्मान के संकेत हैं, न कि स्वार्थ के।

ऊर्जा और भावनाओं का सही उपयोग

हर व्यक्ति के भीतर एक सीमित लेकिन अत्यंत मूल्यवान भावनात्मक ऊर्जा होती है। यदि हम इसे उन लोगों पर खर्च करते हैं जो हमारे प्रेम, सम्मान और प्रयासों को महत्व नहीं देते, तो यह ऊर्जा व्यर्थ चली जाती है। इसलिए यह आवश्यक है कि हम अपनी भावनाओं और ऊर्जा का निवेश उन संबंधों में करें जहाँ हमें समझ, सम्मान और स्नेह प्राप्त हो। यह निर्णय कठिन अवश्य हो सकता है, किन्तु यह मानसिक और भावनात्मक संतुलन के लिए आवश्यक है।

रिश्तों का सच: पारस्परिकता का महत्व

एक स्वस्थ संबंध वही है जिसमें दोनों पक्षों से समान रूप से सम्मान, प्रेम और समझ हो। यदि कोई व्यक्ति लगातार अपने संस्कार, मेहनत, भावनाएँ और खुशियाँ किसी संबंध में देता है, तो यह स्वाभाविक है कि वह बदले में भी वही अपेक्षा करे। यह अपेक्षा गलत नहीं है, बल्कि मानवीय संबंधों की बुनियाद है। किन्तु यदि बार-बार प्रयासों के बावजूद उपेक्षा, अनादर या असंतुलन बना रहता है, तो ऐसे संबंधों से दूरी बनाना आत्म-सम्मान की रक्षा का कदम होता है, न कि स्वार्थ का।





महिलाओं के संदर्भ में बदलती सोच

यह विषय महिलाओं के जीवन में विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहा है। पारंपरिक समाज में महिलाओं को यह सिखाया गया कि उनका पहला कर्तव्य परिवार के प्रति है- चाहे इसके लिए उन्हें अपने आत्म-सम्मान तक का त्याग क्यों न करना पड़े। “इज्जत” और “समाज” के नाम पर उन्होंने अनेक बार अन्याय सहा। “मायका” और “ससुराल” के बीच उनकी पहचान सीमित कर दी गई, जैसे उनके लिए कोई तीसरी जगह हो ही नहीं सकती। किन्तु आज की महिला इस सोच को बदल रही है। वह यह समझ रही है कि सम्मान और प्रेम एकतरफा नहीं हो सकते। यदि उसे किसी संबंध में लगातार उपेक्षा या अपमान का सामना करना पड़ता है, तो उस संबंध से बाहर आना उसका अधिकार है।

दुर्भाग्यवश, इस आत्म-सम्मान को कई बार “अहंकार” या “जिद” के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। जबकि वास्तव में यह वर्षों से दबे हुए आत्म- सम्मान की पुनर्स्थापना है। आज की महिला अपने जीवन में ऐसे हालात स्वीकार नहीं करना चाहती, जिन्हें उसने अपनी पिछली पीढ़ियों की महिलाओं को सहते हुए देखा है।

स्वयं के लिए निर्णय लेना: स्वार्थ नहीं, समझदारी

जब व्यक्ति यह महसूस करता है कि उसके प्रयासों, भावनाओं और सम्मान का मूल्य नहीं समझा जा रहा, तब उसे अपने लिए निर्णय लेने का अधिकार है। ऐसे लोगों और परिस्थितियों से दूरी बनाना, जो हमारे मानसिक और भावनात्मक संतुलन को प्रभावित करते हैं, एक आवश्यक कदम है। यह निर्णय समाज की पारंपरिक सोच के विपरीत लग सकता है, किन्तु यह आत्म-सम्मान और आत्म-सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।






निष्कर्ष: संतुलन ही समाधान है

जीवन हमें यह सिखाता है कि न तो पूर्ण रूप से दूसरों के लिए जीना सही है और न ही केवल अपने लिए। सही मार्ग वह है जहाँ हम दूसरों के प्रति संवेदनशील रहें, उनके लिए सम्मान और प्रेम बनाए रखें, लेकिन साथ ही अपने आत्म-सम्मान और गरिमा से कोई समझौता न करें।

यदि हम दूसरों को प्रेम, सम्मान और महत्व देते हैं, तो हम भी उसके अधिकारी हैं। जहाँ यह संतुलन बना रहता है, वहीं संबंध मजबूत और सार्थक बनते हैं। और जहाँ यह संतुलन बार-बार टूटता है, वहाँ अपने लिए सही निर्णय लेना ही सच्ची समझ और परिपक्वता का परिचायक है। अंततः, एक सशक्त समाज वही है जहाँ व्यक्ति अपने संस्कारों को संजोते हुए, अपने आत्म-सम्मान के साथ जीवन जी सके- और यही संतुलन हमें एक बेहतर और अधिक संवेदनशील समाज की ओर ले जाता है।


- कंचन चौहान


27 April 2026

पहाड़ों की नई जीवन रेखा, दुर्गम क्षेत्रों में सड़क क्रांति और विकसित भारत


भारत की भौगोलिक संरचना जितनी विविधतापूर्ण है, उतनी ही चुनौतीपूर्ण भी। उत्तर के ऊंचे हिमालयी शिखरों से लेकर उत्तर-पूर्व की दुर्गम पहाड़ियों तक, एक समय था जब विकास की किरणें इन दुर्गम क्षेत्रों की चोटियों पर पहुँचने से पहले ही दम तोड़ देती थीं। लेकिन आज परिदृश्य बदल चुका है। वर्तमान में सीमावर्ती और दुर्गम इलाकों तक पहुँचती सड़कें केवल डामर और कंक्रीट का जाल नहीं हैं, बल्कि ये राष्ट्र रूपी शरीर की शिराएं और धमनियांबन चुकी हैं।

जिस प्रकार मानव शरीर में धमनियां ऑक्सीजन युक्त रक्त को हृदय से शरीर के अंगों तक पहुँचाती हैं और शिराएं उसे वापस लाती हैं, ठीक उसी प्रकार ये सड़कें देश के मुख्य आर्थिक केंद्रों को सुदूर गांवों से जोड़ रही हैं।आर्थिक गतिशीलता, इन सड़कों के माध्यम से पहाड़ों का स्थानीय उत्पाद,चाहे वह जैविक फल हों, हस्तशिल्प हो या जड़ी-बूटियाँ,अब सीधे बड़े बाजारों तक पहुँच रहा है।





यह 'रक्त' का वह प्रवाह है जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित कर रहा है। पहले एक बीमार व्यक्ति को अस्पताल ले जाने के लिए कई किलोमीटर पालकी या कंधे पर ढोना पड़ता था। आज एंबुलेंस सीधे घर के दरवाजे तक पहुँच रही है। दुर्गम क्षेत्रों के बच्चे अब उच्च शिक्षा के लिए शहरों से बेहतर तरीके से जुड़ पा रहे हैं।भारत के सीमावर्ती इलाकों में सड़कों का जाल बिछना केवल पर्यटन के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी अनिवार्य है। 'सीमा सड़क संगठन' जैसी संस्थाएं कठिन परिस्थितियों में भी ऐसी सड़कों और सुरंगों (जैसे अटल टनल) का निर्माण कर रही हैं, जो हर मौसम में संपर्क बनाए रखती हैं।

"सड़क केवल दो स्थानों को नहीं जोड़ती, बल्कि यह दो संस्कृतियों, दो उम्मीदों और 'अंत्योदय' के संकल्प को भी जोड़ती है।"परिदृश्य तेज़ी से बदला है,सुविधाएं अब आमजन की पहुंच में हैं। विकसित भारत के विजन में 'कनेक्टिविटी' सबसे बड़ा स्तंभ है। जब सड़कें सुदूर गांव तक पहुँचती हैं, तो अपने साथ निम्नलिखित सुविधाएं भी लाती हैं।





डिजिटल इंडिया का विस्तार दिखाई देता है,सड़क के साथ-साथ ऑप्टिकल फाइबर बिछाना आसान हो जाता है, जिससे पहाड़ों में इंटरनेट पहुँच रहा है।
पर्यटन को बढ़ावा मिला है, ग्रामीण पर्यटन के जरिए स्थानीय लोगों को रोजगार के नए अवसर मिल रहे हैं। पलायन पर रोक लगी है,जब सुविधाएं और रोजगार गांव में ही मिलने लगते हैं, तो शहरों की ओर होने वाला मजबूर पलायन कम होने लगा है।

सड़कों का यह बढ़ता जाल इस बात का प्रमाण है कि विकास अब केवल महानगरों तक सीमित नहीं है। देश के सबसे पिछड़े और दुरूह इलाकों तक पहुँचती ये 'धमनियां' राष्ट्र के शरीर में ऊर्जा का नया संचार कर रही हैं। यह बदलता बुनियादी ढांचा इस बात की गारंटी है कि विकसित भारत की यात्रा में कोई भी नागरिक और कोई भी क्षेत्र पीछे नहीं छूटेगा। आज पहाड़ केवल देखने में सुंदर नहीं रहे, बल्कि वे रहने और विकास करने के लिए भी सुलभ हो गए हैं।


- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़



बुनियादी कौशल

आज का युग, ज्ञान का नहीं, विज्ञान का युग बन गया है। बच्चे उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रवेश पा रहे हैं, विदेशी विश्वविद्यालयों से डिग्रियाँ लेकर लौट रहे हैं परंतु जीवन के बुनियादी कौशलों से कोसों दूर हैं। वे ‘कक्षा ज्ञान’ में पारंगत हैं, लेकिन ‘ज़िंदगी के सबक़’ से अनजान।

मेरी छोटी बहन की कैंसर की कीमो थेरेपी के दौरान मैं उसके भावनात्मक सहयोग के लिए कुछ दिन उसके पास रही।

एक रात्रि, जब घरेलू सहायिका जा चुकी थी… मैं अपने भांजे को, जो प्रशासनिक अधिकारी है, दो महीने पहले ही भारतीय सिविल सेवा का प्रशिक्षण लेकर लौटा था... रात्रि का भोजन गर्म करके दे रही थी।






तभी मैंने महसूस किया कि किचिन सिंक का पानी रुक रहा है। किचिन में जो भी साधन, नुस्खे- पेचकस, सिरका, नींबू रस, चक्कू आदि मिला- उनसे मैंने सिंक के छिद्रों को खोलने की नाकाम कोशिश की।

अब तक बेटा भी भोजन समाप्त कर, किचिन में आ गया... मुझे सिक में सटर पटर करते देख पूछने लगा- मौसी क्या हुआ? मैंने तुरंत कहा- बेटा कोई मोटा मजबूत तार मिलेगा... लगता है सिंक के छिद्रों में कचरा फंसा है... पानी बह नहीं रहा।”

बेटा अपनी मासूम सी अनभिज्ञता जताते धीरे से बोला- “मौसी तार-वार तो मुझे कुछ पता नहीं...”

“ठीक है, तुम अपने कपड़ों की अलमारी से एक एल्यूमिनियम वाला या जिसका तार सख्त न हो... हैंगर ला दो।”

“ठीक है।” बेटा तुरंत हैंगर ले आया। मैंने हैंगर के हुक के नीचे जुड़े दोनों सिरों को प्लास व पेचकस की मदद से खोल, तार को सीधा

कर सिंक के छिद्रों में बारी-बारी घुमाया- जिससे सारा कचरा पाइप से होता हुआ, नीचे जाली पर इकट्ठा होने लगा। कुछ ही मिनटों में सारा पानी गड़-गड़ कर बह गया। बेटा ध्यान से मेरे सब उपक्रम देख रहा था।

वह चकित होकर बोला- “मौसी, आपने तो कमाल कर दिया! मौसी आज आप नहीं होती तो मैं क्या करता; मुझे तो ऐसे काम बिल्कुल नहीं आते।”

मैंने सहजता से कहा- बेटा जिंदगी की रोजमर्रा की जरूरतें किताबें नहीं, हमारे अनुभव ही हमें सिखाते हैं। उसके चेहरे पर संकोच और भीतर एक अजीब-सी आत्म-स्वीकृति थी- किताबी ज्ञान के बावजूद वह जीवन की छोटी-छोटी परिस्थितियों से निपटने में असहाय है।

यही आज के शिक्षित समाज की सच्चाई है। हमारे बच्चे तकनीकी, प्रबंधन और प्रशासनिक पाठ्यक्रमों में दक्ष हैं, उनके पास डिग्री है, ज्ञान है, पर अनुभव नहीं। असल में शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार पाना नहीं होता बल्कि जीवन जीने की समझ विकसित करना होता है।




परंतु आज की शिक्षा व्यवस्था में ‘जीवन कौशल’ (Life Skills) के लिए कोई स्थान नहीं है। हम बच्चों को हर विषय की थ्योरी सिखा रहे हैं लेकिन प्रयोग नहीं। कभी-कभी लगता है- हमने बच्चों को इतना ‘स्मार्ट’ बना दिया कि वे अब किसी किसी भी समस्या को सुलझाने के लिए गूगल सर्च करते हैं।

हर ज्ञान का असली मूल्य तभी है, जब वह जीवन को आसान बनाए। आज आवश्यकता है कि हम बच्चों को केवल बुद्धिमान नहीं, व्यवहारिक भी बनाएं क्योंकि जीवन की सबसे बड़ी डिग्री- ‘अनुभव’ होती है, जो किसी विश्वविद्यालय में नहीं मिलती, बस व्यवहार में लाने से मिलती है।


- नील मणि





हीट वेव की मार, क्या करें सरकार!



उफ्फ! ये गर्मी मार ही डालेगी। इन दिनों इस वाक्य को देश का हर नागरिक दोहरा रहा है। गर्मी ने पुराने सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। सरकार को हाई अलर्ट जारी करना पड़ रहा है। आम नागरिक जो रिक्शा चलाता है, मजदूरी करता है और कारखानों में काम करता है, उसके लिए एक और चुनौती पहाड़ की तरह खड़ी है। कड़ाके की ठंड और गर्मी की मार सिर्फ आम नागरिकों पर पड़ती है। इसलिए किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि हमारा देश में आम नागरिकों की समस्या कोई बड़ी समस्या नहीं होती है।




विकास के नाम पर कभी हम हसदेव के जंगलों को तो कभी उत्तराखंड और महाराष्ट्र के जंगलों को काट देते हैं। सरकार के आंकड़े बताते हैं कि पिछले 10 सालों में देश में वनों की संख्या में तेजी से गिरावट आई है। इतना ही नहीं विकास के लिए हम सड़कों के आसपास वाले जो पेड़ काटते हैं, उनके बदले में जो पौधे लगाने चाहिए, वह लगते तो है, मगर उनमें से एक या दो प्रतिशत पौधे ही पेड़ बन पाते हैं। इस विषय पर अब हमारी सरकारों, राजनेताओं और आम जनता को गंभीरता से सोचना होगा। नहीं तो वह बहुत समय दूर नहीं जब गर्मी के कारण लोग मरने लग जाएंगे और गर्मी एक आपात स्थिति पैदा कर सकती है।

बतौर नागरिक हमें अपने आसपास के पेड़ों को काटने से बचना होगा। इसके अलावा अपने समाज, अपने गांव, मोहल्ले में एक मुहिम चलानी होगी, जिसके तहत वृक्षारोपण हो और उन पौधों को संरक्षण प्रदान कर उन्हें समय पर खाद व पानी देकर पेड़ में बदलना होगा। इतना ही नहीं बल्कि विवाह, नामकरण जैसे शुभ कार्यों में भी वृक्षारोपण और वृक्ष दान देने की परंपरा शुरू करनी होगी। धार्मिक यात्रा, मूवी देखना इत्यादि फिजूल खर्च करने से बेहतर है कि उन पैसों से अपने गांव में रह रहे किसी रिश्तेदार या दोस्त से 10 पेड़ अपने परिवार के नाम से लगाने के लिए कहिए और उसको 3-5 साल तक हर महीने ₹200-300 भेजिए। और समय-समय पर उन पौधों की फोटो मंगवाए।

केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को पर्यावरण को लेकर विशेष योजना बनाने की जरूरत है। वक्त रहते अगर इस पर सरकारें काम नहीं करेगी तो हमारे पास विकास, संसाधन सब होगा, मगर सांस लेने के लिए ऑक्सीजन और पर्यावरण नहीं होगा। आधुनिकता के इस दौड़ में कितना भागोगे और संसाधनों की खरीद कब तक करोगे ? कम से कम अपने क्षेत्र, राज्य, देश का पर्यावरण और प्रकृति को बेहतर बनाने के लिए हम सभी को साथ में आकर सोचा होगा। नहीं तो हीट वेव का शिकार हम सभी होंगे और इससे हमारा जीवन प्रभावित होगा।


                                                       - दीपक कोहली


आज की प्रमुख रचनाएँ- 28 अप्रैल 2026









कैमरों में कैद होती इंसानियत की मौत
यह सिर्फ एक मौत नहीं,जमीर के टूटने की करुण दास्तान है।
देखो,संघर्ष में रोती हुई हर जान कितनी परेशान है ?
सड़कों पर गिरती-फैलती दिखती संवेदनाएं, हमसे करती रहीं सवाल,
हम खड़े के खड़े बस देखते, नजरें घुमाते ये कैसा आज का इंसान है ?
मदद को निज हाथ बढ़ाने की जगह, लिए कैमरे रहे तान हैं,
वीडियो तो बन रही, लेकिन जा रही निर्दोष की जान है।
किसी की आखिरी सांस भी तमाशा बनती रह गई,
शर्म से झुक जाना चाहिए ये कैसा हमारा मान है ?
भीड़ का गुस्सा इंसाफ नहीं, बस अंधा एक तूफान है,
जिसमें डूबती इंसानियत और हर रिश्ता वीरान है।
क्या आंखों के आंसू भी अब सूख चुके हैं सबके,
या दिल के हर कोने में पत्थर-सा हुआ अरमान है ?
जो फोन उठाकर हंसते रहें, वह सोचें एक पल ठहर,
कल उनके अपने पर भी ऐसा ही कोई इम्तिहान है।
अब सोचता हूं उस रात को उनके घरों में क्या हुआ होगा,
कई माँओं के आंगन में गहरा सन्नाटा पसरा पड़ा होगा।
कैमरों की रोशनी में इंसानियत कहीं अंधेरे में खो गई,
आइए, हम इंसान बनें क्योंकि यही हमारी सबसे बड़ी पहचान है।


- फैय्याज अहमद फैजी


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नेह-विटप

चलो आज कुछ स्वप्न बुनें,
मन-उपवन से पुष्प चुनें,
कर लें सूक्ष्म संचय हम,
मृदा-हृदय में भाव गुनें।
जब अंकुरित हों भाव-सुमन,
नेह-जल से हों सिंचित तन,
सहेजूँ स्पंदन अंजूरी भर
हँस उठे हरितिम मधुवन।
जब-जब आए मधुप अलि,
पार्श्व बसाऊँ लज्जित कलि,
प्रीत-मकरंद संजो,
उड़े गगन ले सुवास चली।
पुष्प-पंखुरी से पुनः,
बीज रूप धरें जीवन,
मृदा-मिलन में लीन हो,
वृहत् वृक्ष से विकसित वन।

यह क्रम अनवरत ही चले ,
नव-रूपों में जीवन ढले,
यह शाश्वत गति अविचल,
लहरित हो सृष्टि के तले।

हम भी कुछ संकल्प गढ़ें,
संग-संग कुछ स्वप्न जड़ें,
स्नेह-लेपित धरा-तन पर,
एक प्रीति-विटप विकसित करें।

छाया तले फिर संग मिलें,
शांत हों संताप के छले,
जड़ दृढ़ हो अंतर-तल में,
ताप-दाह सब दूर चले।

दुःखाग्नि में दीप जले,
नेह-सिक्त उर दृढ़ पले,
मार्ग कठिन यदि आ पड़े,
पग न रुके, संकल्प चले।


- सविता सिंह मीरा


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उनकी क्या गलती है

जिनकी चलती है,
बताओ भला फिर उनकी क्या गलती है ?
चलती नहीं है जिनकी,
जिन्दगी उमीदों पर उनकी चलती है।

मिलता नहीं मौका है जिनको,
सौगातें धोखों की उन्हें मिलती है।
जान पहचान है जिनकी,
बिन प्रयत्न खुशियाँ उन्हें मिलती है।

छिन्न जाते अधिकार है जिनके,
उदासियाँ और आहें चेहरों से झलकती है।
आती नहीं बाधाएं पथ में जिनके,
आँखे उनकी जुगनू सी चमकती है।

सीधे साफ़ दिल होते जिनके,
बेरहम ये दुनिया उनको पग-पग छलती है।
एक हाथ से जखम है देती,
दूजे हाथ से दिखावटी मरहम मलती है।

होती है मंजिल पास ही जिनके,
अंतहीन पथ की दूरी जीवन भर खलती है।
पंहुच वाले पहुँच जाते पहले ही,
बाकियों की डगर की दूरी बढ़ती चलती है।

कटु वाणी कठोर शब्द होते उनके,
जुबाँ हर पल बस जहर ही उगलती है।
फिर भी वो सरताज हैं होते,
तांक-झाँक, चुस्ती, चालाकी की दुकान खूब चलती है।

मायूसियां होती न हिस्से उनके ,
फरियादें शायद उनकी ही ये कायनात सुनती है।
बताओ आखिर उनकी भी क्या गलती है,
जिनकी हर कहीं चलती है।


- धरम चंद धीमान


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ऐतबार

किसपे भरोसा करूं,
किसी पे ना करूं।
अब ऐतबार ना रहा,
बोलते हैं मीठी मीठी,
वो पहले वाला प्यार ना रहा।

सब को पड़ी हैअपनी अपनी,
झूठी तसल्ली देता हर कोई,
साथ देने का वादा ही रहा,
अब वो पहले वाला संसार न रहा।

रिश्ते रंग बिरंगे कागज के फूल बन गए,
अब न वो ताजगी ना वो महक रहा।

अपनों से गैर ही भले,जो कभी
पूछे हाल चल अपनी।
यहां अपनों से अपनों का
कोई सरोकार ना रहा।

खून के रिश्ते ने भी सकून खोया है,
बोए हुए आम पर भी बबूल हो आया है।

सबने कराए है, समझौते सिर्फ यहाँ,
कभी जिससे थी ना उम्मीदी,
वो अब फरिश्ता बन आया है।

जिंदगी सांप सीढ़ी का खेल बनी है,
अब चलना ही होगा,बात जिंदगी
और मौत में ठनी है।

ऐतबार क्या करूं, किसका करूं,
खुद के ही भरोसे रहना है अब,
किसी से कोई गिला, शिकवा नहीं,
किसी से नहीं कुछ कहनी है।


- रोशन कुमार झा


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दोस्ती जो मोहब्बत से ऊपर है

कुछ रिश्ते नामों के मोहताज नहीं होते,
बिन कहे भी दिल के पास होते।
ना इज़हार की कोई ज़रूरत पड़ती,
ना शब्दों में जज़्बात बयान होते।

वो दोस्ती भी क्या खूब होती है,
जिसमें अपनापन बेहिसाब होता है।
जहाँ हर दर्द बिना कहे समझा जाए,
और हर मुस्कान का हिसाब होता है।

ना हाथ थामने की शर्त वहाँ,
ना साथ निभाने की कसमें होतीं।
बस आँखों की खामोशी कह देती,
कुछ बातें कितनी गहरी होतीं।

वो रिश्ता पाक हवा सा लगता,
जिसमें कोई लालच नहीं होता।
दिल बस यूँ ही धड़क उठता है,
जब उसका ज़िक्र कहीं होता।

ना मोहब्बत कहो, ना दोस्ती कहो,
ये एहसास बड़ा निराला है।
कुछ लोग किस्मत से मिलते हैं,
जिनसे हर रिश्ता भी हारा है।

यकीन मानो इस दुनिया में,
सब बंधन शब्दों से नहीं चलते।
कुछ दोस्ती के रिश्ते ऐसे होते,
जो मोहब्बत से भी ऊपर निकलते।


- डॉ. सारिका ठाकुर 'जागृति'


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बचपन से मुलाकात
कल एक अजीब-सी बात हुई,
किसी और से नहीं,
खुद से ही मुलाकात हुई।
वह गुलाबी फ्रॉक, वह चमकती आँखें,
वह चहचहाती चिड़िया-सी मैं,
कूदती, फुदकती, उड़ती मैं-
आज फिर खुद के सामने आ बैठी।
पूछा मैंने धीरे से,
"क्या तुम वही हो बचपन वाली,
जिसे हर जवाब पता था?
जो सबकी आँखों का तारा थी,
जिसे हर सवाल पता था?"
जिसे आसमान छूना था,
लंबी उड़ान भरनी थी,
क्षितिज के उस पार कहीं
अपना आशियाना बसाना था।
एक फीकी-सी हँसी,
उदास आँखों की खामोशी
बिन कहे सब कह गई-
बचपन की वो उड़ान
कहीं आसमान में खो गई।
बचपन की ख़्वाहिशें, वो सपने,
जो थे कभी मेरे अपने,
नश्तर-से चुभते अब
जवाब मुझसे माँग रहे हैं।
क्यों न पकड़ा उन्हें मजबूती से,
क्यों टाँग दिए सपनों को
मैंने ही एक खूंटी पे?
खुशियाँ कम और आहें ज़्यादा,
ले आई हूँ मैं
बीते हुए कल से।
वो चमकती आँखें भी अब
किसी गर्दिश में बोझिल हो गईं।
सोचती हूँ…
क्यों आज फिर
बचपन से मुलाकात हो गई।


- कंचन चौहान


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लालच की मत पाल अरमान

लालच की मत पालो कभी अरमान
लोभ बना देता है मानव को बेईमान
लुप्त हो जाती है आपकी ईमान
अनीति जन्म देता है जग में शैतान

मत खाओ कभी अनीति की कमाई
हराम बदनाम है इस जगत में भाई
पाप है हड़पने की एक घर जमाई
जीवन में आता है कठिन दुखदाई

लालच है जगत में जानो बुरी बलाई
लोभ की पाप लोभी को है। रुलाई
मिहनत की खाना सब जग में कमाई
लालच लोक लज्जा लालची की लुटाई

लालची की होती है जग में भी हँसाई
जिस जिस ने लोभ को मन में है बसाई
परेशानी की सबब निश्चित है पाई
कष्टमय जीवन ज़ीता है वो कसाई

किस्मत में है जो वो चल कर आयेगा
सब्र संतोष का मीठा। फल दे जायेगा
सुख शांति की जीवन तेरा मुस्कुरायेगा
फटेहाल में भी सुकून जग में पायेगा


- उदय किशोर साह


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प्रियत्तमा की विरह-वेदना

नयनों से झरते नीर, झर झर
अश्क नाम कैसे दूँ इसे भला?
अश्क तो बूँद मे है होते
ये नीर से तो भरता है समुन्दर।

कहाँ हो तु सनम मेरी ?
कुछ तो पता नही है,तुम्हारी
ऐसे भला कोई है, छोड़ जाता
लौट आ वापस, ओ सनम मेरी।

अपने है न हम, ओ सनम
गुस्सा अब थूक दो ना,
जहाँ भी हो तू, लौट आ सनम
एक है,एक ही रहेगे दोनो हम।

तेरे यादो मे निशदिन हूँ रहता
कसम से,पलक ना है झपकता
बिताये तेरे संग की हर बातो का
याद कर, नयनों से नीर हूँ बहाता।

जमाने वाले तो, पागल मुझे है सोचते
तरह तरह के सलाह,आकर है देते
क्यों तु खुद को है, बर्बाद करते ?
सच्चे प्रेमी लौट, आ ही है जाते।


- चुन्नू साहा


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हम अगली पीढ़ी हैं

हमें कहा गया-
पढ़ो,
देश तुम्हारा है।
हमने किताबें उठाई,
पर नौकरियां
पोस्टरों में ही रहीं।

वे हमसे भविष्य मांगते हैं
वोट के बदले,
और बदले में,
सिर्फ
धैर्य देते हैं।

हम सवाल पूछते हैं
तो कहा जाता है-
उम्र छोटी है।
पर जब भीड़ चाहिए होती है,
तब
हम ही सबसे बड़े
नागरिक होते हैं।

हम अगली पीढ़ी हैं-
लेकिन हर दल के लिए
सिर्फ
अगला इंतजार।


- प्रिंसी यादव


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चलो खुशियां ढूढ़ते हैं

जो प्यासे हैं उन्हें पानी देकर
जो भूखे हैं उन्हें अन्न देकर,
निराश मन मे आशा गढ़ते हैं
चलो खुशियां ढूढ़ते हैं।

दिन तो कट जाती है खेल-कूदकर
रात कटती सुबह का इंतजार कर,
हे राम! किसे सुनाए हमारी व्यथा
भला कौन सुने हमारे कथा?

घोर बदल की घटा है छाई
देख भूख तुझे शर्म भी न आयी
अभी तो बारिश भी न छुटा था,
फिर भी द्वार पर मैं खड़ा था।

बहुत उड़ लिए ऊंचे आसमान में
बहुत वक़्त गुजरा भटकते हुए अंधेरे में,
इस अंधेरी रात की,एक नई सुबह ढूंढते हैं
चलो खुशियां ढूंढते हैं...
चलो खुशियां ढूढ़ते हैं।

- सूरजमल AKs


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इधर आरोह है, उधर अवरोह है,
खतरा है, नहीं कोई उहापोह है।

मुश्किल में अस्मत है खड़े सफेद पोश है,
चलो उधर जिधर डकैतों का गिरोह है।

अनजानी सड़क का सफर आसान है,
जान पहचान की खतरे में फंसा बटोह है।

अंधेरों से निपट लेते हर हाल में मगर,
कुछ दिखता नहीं सियासत चमचमाती खोह है।

सही गलत का कहीं कुछ भेद नहीं रहा,
हथोड़ा वही मारो जहां गरम लोह है।

गैरों की भूख, प्यास, नींद, हंसी बेमानी है,
जहां सिर्फ अपनी मलाई कटे बस उसी की टोह है।

राम राम जपना, पराया माल अपना की रट है,
विकास नारों में बताना सिर्फ सब माया मोह है।


- राधेश विकास


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बचपन

वो कच्ची सड़क, वो धूप, वो साया रह गया,
तरबूज की फाँकों में बचपन समाया रह गया।

पेड़ों पे चढ़ के तोड़ते थे कच्चे आम हम,
नमक-मिर्च में लिपटा हर इक साया रह गया।

पंप सेट का पानी था जैसे कोई जादू,
भीगते रहे हम, वक्त भी नहाया रह गया।

वो यारों की टोली, वो हँसी के फव्वारे,
हर एक लम्हा दिल में जगमगाया रह गया।

न कोई फिक्र थी, न कोई दौलत की चाह,
बस सादगी का रंग ही भाया रह गया।

अब शहर की भीड़ में खो गए हैं हम “शशि”,
गाँव का हर ख्वाब आँखों में छाया रह गया।


- शशि धर कुमार


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मेरे धरती पुत्र

देखता हूँ तेरी मेहनत को, पसीना आता है मुझे
कड़क धूप से करते हो मुकाबला,सलाम है तुझे
न देखा है तुझ जैसा कोई जांबाज,मैंने जमाने में
सदियां गुज़र गईं तलाश करते करते आख़िर तुझे,
मिला नहीं कहीं भी आप जैसा इस जमाने में मुझे

तेरी तपिश से सूरज भी शरमाकर ढल जाए
हौसले के आगे तेरे हर मुश्किल पिघल जाए
हे मेरेधरती पुत्र!इन खूबसूरत पहाड़ों की तू शान है
तेरे जैसे फ़ौलादी जांबाज़ पर मुझे भी तो मान है

देखें हैं बड़े-बड़े धुरंधर मैंने भी इस जमाने में
विशालकाय, अम्बर सदृश, औंधे मुंह गिरे महखाने में
तेरे हाथों की लकीरों में हल की रेखाएं देखी है मैंने
तेरी आंखों के सपने में सोने की बलाएं देखी है मैंने
ऐ नगतुल्य ! विशालकाय मेरे फौलादी धरतीपुत्र!
तेरी मेहनत के आगे सब फीके मिले मुझे

बीज बोए तो धरती हँसे, तू हँसे तो किस्मत खिले
तेरे पसीने की बूंदों से, मेहनत का आँगन भी मिले
ऐ धरतीपुत्र! तेरे नाम से, पहाड़ भी गर सिर उठाएँ
तेरी गाथा सुनके बादल भी, सावन बन बरस जाएं।।


- बाबू राम धीमान


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विधा गीत

कब तक अकेले मन को छलेंगे,
कभी तो वह आकर गले से मिलेंगे।

बहारों से आती उनकी जो खुशबू,
मेरी तरफ़ राह निकल ही पड़ेंगे ।

हो सके तो उनसे जाकर यह कहना
नज़र मेरी बस उनकी राह ही तकेंगे।

उपवन से जाकर ज़रा तुम कह दो,
फूल जो बिछाएं न मुरझाने लगेंगे।

सहनशील दिल मेरा बहुत है भोला
जनम जनम तक भी प्रतीक्षा करेंगें।


- रत्ना बापुली


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तुम्हारी चाहत

तुम्हारी चाहत को हम कभी मिटने नहीं देंगे,
तुम माँगोगे दर्द, हम खुशी ही देंगे।
तुम्हारी मुस्कान हमें सुकून देती है,
तुम्हारे आँसू हमें हर पल रुला देते हैं।
तुम्हारी हर ख्वाहिश हमें पूरी करनी है,
तुम्हारा हर सपना यकीन में बदलना है।
तुम्हारी राहों में फूल हम बिछाएंगे,
तुम्हारे हर ग़म को खुद में ही समाएंगे।
तेरी हँसी से ही मेरी दुनिया सजती है,
तेरी एक झलक से ये रूह महकती है।
रातों की खामोशी में तेरा नाम पुकारें,
दिन की हर धूप में तेरी छाया उतारें।
तुम हमें भूल जाओ, ये मुमकिन नहीं होगा,
हम तुम्हारी याद को दिल से जाने नहीं देंगे।
हर धड़कन में बस नाम तुम्हारा ही छाया है,
ये दिल हमेशा तुम पर ही आया है।


- गरिमा लखनवी


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टूटते रिश्ते और बदलती प्राथमिकताएं

आज प्राथमिकताओं के आगे रिश्ते कहाँ हैं टिकते
अनमोल जो होते थे कभी आज कौड़ियों के भाव हैं बिकते
कभी रिश्तों में हुआ करती थी शहद से भी ज़्यादा मिठास
घाव ऐसे मिल रहे हैं रिश्तों में जो ताउम्र धीरे धीरे हैं रिसते

आज प्राथमिकता नहीं है रिश्तों को बचाना
आज आदमी का लक्ष्य है केवल पैसा कमाना
हंसते हुए किसी को देख नहीं सकते
काम रह गया है केवल दूसरों को रुलाना

एक बच्चा है परिवार में उसे रिश्तों की क्या पहचान
भाई बहन बुआ मासी चाचा चाची का नहीं है ज्ञान
नारी का सम्मान कैसे करेगा दिल से कोई
जब उसके मन में ही नहीं है नारी का सम्मान

बूढ़े माता पिता को नहीं रखना चाहता कोई साथ
संवेदनहीन हम हो गए बिगड़ रहे हालात
सिर्फ पैसे की एहमियत है सबके लिए
ज़िंदा नहीं किसी के मन में अब जज़्बात


- रवींद्र कुमार शर्मा


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ये अप्रैल तू ऐसा न था 

 बेमौसमी सर्दी का आलम दिखा
वर्षा की फूहारों के साथ तू बिता
ये अप्रैल तू ऐसा न था।
धूप भी इतनी खिली
जून की तरह तपीस मिली
ये अप्रैल तू ऐसा न था।
फसल भी खेतों में खड़ी दिखती 
अब तो मौसम को देख इंतजार है करती
ये अप्रैल तू ऐसा न था।
बादल आसमान में उमड़ते दिखते
तो कभी  अंगारे भी खूब गिरते
ये अप्रैल तू ऐसा न था।
आमों के पेड़ पर बौर भी खूब दिखा पड़ता 
ओलावृष्टि से पल में है वो झड़ता
ये अप्रैल तू ऐसा न था।
पपीहा भी भूल गया 
शायद अभी गर्मी का मौसम नहीं  है आया 
ये अप्रैल तू ऐसा न था।


- विनोद वर्मा


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रिश्ते केवल भावनाओं से नहीं चलते…
वे ध्यान से साँस लेते हैं, और उपस्थिति से जीवित रहते हैं।
आज की दुनिया में हम सब व्यस्त हैं,
काम में, मोबाइल में, अपने-अपने विचारों में।
हम “साथ” तो होते हैं, पर “जुड़े” नहीं होते।
किसी के पास समय तो है, पर ध्यान नहीं…
और यहीं से रिश्तों में एक अनकही दूरी जन्म लेती है।
ध्यान का अर्थ केवल बातें करना नहीं है, ध्यान का अर्थ है,
किसी की आँखों में देखकर उसकी खामोशी समझना,
उसके छोटे-छोटे बदलावों को महसूस करना,
और बिना कहे उसके मन की थकान को पहचान लेना।
जहाँ ध्यान होता है, वहाँ अपनापन अपने आप खिल उठता है।
और जहाँ ध्यान कम हो जाता है,
वहाँ सबसे गहरा प्रेम भी धीरे-धीरे सूखने लगता है।
रिश्तों की सबसे बड़ी सच्चाई यही है,
कि उन्हें “बड़े-बड़े वादों” की नहीं,
बल्कि “छोटे-छोटे ध्यान” की ज़रूरत होती है।


- नरेंद्र मंघनानी (अम्मा हीं)


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