खुशी
खुशी मन-मंदिर की
मृदुल ज्योति है,
जो अंधियारे के आवरण को
हटा जाती है,
न यह ऊपरी हँसी का
कोलाहल है,
बल्कि हृदय की गहराइयों में
गूँज जाती है।
धन, वैभव, क्षणिक अभिलाषा,
इन सीमाओं में बॉधी नहीं
खुशी की परिभाषा ।
यह तो संतोष के
सागर की लहर है,
जो अंतर्मन से कभी
थमती नहीं है।
जब मन अपेक्षाओं के
बंधन त्याग जाए,
और वर्तमान में अपना
अस्तित्व पा जाए,
तब हर श्वास, हर धड़कन,
हर क्षण में,
खुशी स्वयं ही आत्मस्वर
बन गूँज जाए।
- अदिति त्रिपाठी
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सहारा
एक सहारा अपना भी हो,
अपना बस हो इक किनारा,
सब कुछ खोकर भी पाऊँ उसमें,
अपने मन मंदिर का एक ठिकाना,
करू वंदना आरती गाऊँ,
सारी दुविधा क्षण भर बिसराऊँ।
नयी सुबह की नयी भोर हो,
नयी किरन का नया शोर हो,
उजियारो से रहे वो जगमग,
खुशियो से भरे हो भाव हतप्रत,
खोकर भी जिसमे खो न पाऊँ,
मन में सागर सी गहराई लाऊँ,
रहे न वेदना की एक भी बदली,
झूमे, नाचे गाए मन बन पगली।
एक सहारा अपना भी हो
अपना बस हो इक किनारा।
- दिव्या
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हर एक की आवाज़
दिल्ली से आई दिल में आशा लिए,
कि घूमेंगे और इस पल को यादगार रखेंगे।
पर वो बेचारी अनजान सी,
कि ये उसका आखिरी पल होगा।
मौसम सुहाना था,
सबने नाव की सवारी ली।
सब लोग इस पल को जी रहे थे,
अपनों को ये सुंदर नज़ारा दिखा रहे थे।
पर वक्त ने अचानक से मोड़ लिया,
सुहाना मौसम एक तूफान में तब्दील हुआ।
उस तूफानी बेमान मौसम ने,
नदी की लहरों ने एक रौद्र रूप ले लिया।
अचानक से नाव पलट गई।
सब लोग चीखने और चिल्लाने लगे,
एक नाव में थी माँ की ममता,
और उसका 4 साल का बच्चा।
वो बच्चा जिसने सही बोलना भी ना सीखा।
वो बच्चा इतना डर गया,
कि बस रोते-रोते बोल दिया 'माँ मुझे तुम बचा लो'।
उसकी माँ अपने बच्चे को,
अपने सीने से लिपटा रखा।
उस माँ ने अपने लाल को छोड़ा नहीं,
पर उस तूफान और लहरों ने,
उस बेचारी माँ की एक ना सुनी।
माँ ने अपने बच्चे को,
बचाने की तो पूरी कोशिश...
पर उस भगवान को कुछ और ही मंज़ूर।
उस माँ की ममता हार गई,
तूफान और लहरें खामोश हो गईं,
उस एक पल में 7 लोगों की मौत हो गई।
अब ये गलती किसकी है?
क्यों नहीं पहुँची Rescue Team?
कहाँ थे वो लोग?`
क्या इन लोगों को,
बैठाने का पैसा मिलता है?
क्या कर रही NDRF Team?
कहाँ से लाएगी उन 7 लोगों को ?
- आयुषी यादव
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मरने से रिश्ते मरा नहीं करते
जिस्म के मर जाने से रिश्ते मरा नहीं करते
घड़े में छेद हो जाये तो घड़े भरा नहीं करते
रूह निकल जाती है चोला बदल जाती है
मन में जिसके सच्चाई वह झूठों से डरा नहीं करते
बेईमान हमेशा ऊंचा बोलकर करता है डराने की कोशिशें
ईमानदारी पर जो चलते है वह अक्सर लड़ा नहीं करते
पत्थर कूट कूट कर जो पेट पालते हैं परिवार का
अडिग रहते हैं वो अपनी जुबान से फिरा नहीं करते
बारिशें आंधियां तूफान कितने आ जाएं
हौसले वाले कभी जीवन में डरा नहीं करते
नेकी की राह पर करते जो मानवता की सेवा
रहते हैं दिलों में वो कभी मरा नहीं करते
मरना तो सबका निश्चित है एक दिन
फिर क्यों नहीं गलत काम से हैं डरते
कर्मों का फल तो भोगना पड़ेगा सभी को
अच्छा फल वही पाएंगे जो कर्म अच्छे हैं करते
कोई नहीं रोक सकता मंजिल पाने से उनको
जो कांटों की राह पर हैं सफर करते
लोग करते हैं याद उन्हीं को जो कर जाते हैं कुछ अच्छा
शरीर से बेशक मर जाते हैं वह पर रूह से कभी नहीं मरते
- रवींद्र कुमार शर्मा
*****
फिर एक दिन
और फिर एक दिन
ज़िम्मेदारियाँ
उम्र से बड़ी हो जाती हैं।
और फिर एक दिन
घर का आँगन
सपनों से छोटा पड़ जाता है।
और फिर एक दिन
रोज़ी-रोटी की राहें
बेटों को शहरों तक ले जाती हैं।
और फिर एक दिन
माँ की आँखों का इंतज़ार
दरवाज़े पर ठहर जाता है।
और फिर एक दिन
पिता की आवाज़ में छुपा अपनापन
फ़ोन की घंटियों में सिमट जाता है।
और फिर एक दिन
दो शहरों के बीच
सिर्फ़ दूरी नहीं,
थकान भी बस जाती है।
और फिर एक दिन
त्योहार तारीख़ों में रह जाते हैं,
और परिवार
तस्वीरों में मुस्कुराता है।
और फिर एक दिन
बचपन का वो घर
सबका होकर भी
किसी का नहीं रह जाता।
और फिर एक दिन
समझ आता है,
कमाने की दौड़ में
हमने साथ बिताने वाला समय
कहीं पीछे छोड़ दिया।
और फिर एक दिन
दिल चुपचाप
वापस उसी आँगन में लौटना चाहता है,
जहाँ बिना वजह भी
अपनापन मिला करता था।
- नरेंद्र मंघनानी
*****
भारत को महान बनाना है
हर तरफ भ्रष्टाचार है,
बढ़ता जा रहा अनाचार है
कहीं अत्याचार है
तो कहीं व्यभिचार है
फिर भी मेरा भारत महान
है हम भारतवासी
पर विदेशी पहनावे,
विदेशी रहन-सहन
विदेशी संस्कृति से ही
जाने हमें क्यों प्यार है
फिर भी मेरा भारत महान
पश्चिम की नकल में
तन पर वस्त्र कम होते जा रहे
नग्नता का फूहड नाच
अब तो प्रत्यक्ष दिख रहा
फिर भी मेरा भारत महान
नेता भूले हैं देश और देशहित
देशसेवा का भाव नहीं
नेता अब प्रजापालक नहीं रहे
निजहित ही साधने में लगे हैं
फिर कैसे हो
मेरा भारत महान
कोई लड़ रहा
जाति के नाम पर
कोई धर्म के नाम पर
कोई भाषा के नाम पर
कोई क्षेत्र के नाम पर
फिर भी मेरा भारत महान
गुणवत्ता की किसे परवाह है
स्वहित साध लिया जाये
तो देश से क्या लेना देना
तभी टैलेंटेड भी जा रहे विदेश
फिर भी मेरा भारत महान
निश्चित रूप से
हमने श्रेष्ठ चिंतन को छोड़ा है
अवनति की ओर
अपने जीवन को मोडा है
निकृष्ट हो गए हैं हम
अपनी संस्कृति को कर आत्मसात
विकृत सोच एवं तुच्छ मनोवृति से
हर भारतीय को बचाना है
हमें भारत को महान बनाना है।
- प्रवीण कुमार
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नहीं होती
चाँद देखे बिना मेरी रात नहीं होती,
मन नहीं लगता जब बात नहीं होती!
एक अजनबी पर इतना ऐतबार क्यों है,
मोहब्बत की ऐसे तो शुरुआत नहीं होती!
पूरा दिन गुज़ारना हो जाता है मुश्किल,
तड़पते हैं हम यदि मुलाक़ात नहीं होती!
कैसे कहें कितनी चाहत है इस दिल में,
कभी-कभी किस्मत भी साथ नहीं होती!
दिल धड़कता है तो बादल ग़रज़ते हैं,
यूँ ही बिन मौसम, बरसात नहीं होती!
इश्क़ का मजहब नहीं जान पाया कोई,
क्योंकि प्यार की कोई जात नहीं होती!
तुम अगर दे देते, ज़रा सा साथ हमारा,
जिंदगी में हमारी कभी मात नहीं होती।
- आनन्द कुमार
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अगर मैं फिर से शुरू करूँ ?
अगर मै फिर से शुरू करूँ, नयी जिंदगी संग तेरे ?
तो बोलो, साथ दोगी ना इस बार तुम मेरे ?
बीते दिनों की बातें भुलाकर, हम दोनों ही साथ आएँ।
फिर से एक नयी जिंदगी शुरू कर एक दुजे को अपनाएं।
जहाँ मैं नहीं बल्कि हम दोनों का ही होगा सम भाव
हमारे बीच किसी अन्य जन का नहीं रहेगा प्रभाव ।
हम दोनों ही मिलकर, हर एक सुख-दुख को बाँट लेंगे,
कसम से, हमारी ये नयी जिंदगी में अन्य का ना सुनेंगे ।
हाँ कह दो ना तुम एकबार, मुझे तेरे ही संग है अब रहना
अगर मैं फिर से शुरू करूँ तो, तुम भी साथ मेरा देना।
- चुन्नू साहा
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नया सवेरा
जिंदगी की शाम से निराश न हो,
वह जीवन क्या जिसमें सफलता की प्यास न हो,
अंधकार में रोशनी खोजने की ताकत है तुझमें,
वह योद्धा क्या जिसके बदन पर फटा लिबास न हो।
जीवन में से अंधकार भी जाएगा,
तू अपनी वीर गाथा भी गाएगा,
अपने से बुराइयों को दूर कर,
सूर्य उभरेगा अंबर से नया सवेरा भी आएगा।
- प्रणव राज
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साहब की नौकरी और जलेबी का स्वाद
तैयारी के उन दिनों में, हम भी कैसे शेर थे,
लगता था कि बस हम ही, इस दुनिया के कुबेर थे।
ख्वाबों में आता था ऑफिस, जैसे स्वर्ग का द्वार हो,
और अपनी कुर्सी विष्णु जी के, बिल्कुल अगल-बगल यार हो!
सोचा था जब बनके साहब, केबिन में हम बैठेंगे,
नीचे चलते 'मानुष' को देख, शान से हम ऐंठेंगे।
सोचेंगे- "ये दीन-हीन जीव, देखो कैसे डोल रहा,
इसे क्या पता कि ऊपर बैठा, ईश्वर किस्मत खोल रहा!"
मगर हकीकत सामने आई, तो सारा नशा उतर गया,
नौकरी क्या लगी मियां, सुकून ही कहीं सुधर गया।
वो दोस्त जिनकी लग गई, अब उनका हाल बताता हूँ,
सुनकर उनकी आपबीती, मैं थोड़ा सा थरथराता हूँ।
या तो फाइल 'उनके' नीचे, या 'वो' फाइल के नीचे हैं,
काम के भारी बोझ ने, उनके नयन भी मीचे हैं।
दिन भर 'यस सर-यस सर' में, जबान उनकी थकती है,
साहब वाली कुर्सी अब तो, कांटों जैसी चुभती है।
तब याद आता है वो जमाना, वो कॉलेज वाली मस्ती,
जब दस रुपये की जलेबी में भी, बसती थी अपनी हस्ती।
मुंह में पान दबाकर हम, दुनिया के दुख हरते थे,
गली की नुक्कड़ पर बैठकर, कश्मीर के मुद्दे हल करते थे!
पाकिस्तान की खैर नहीं थी, ऐसी चर्चा होती थी,
बिना बजट के अपनी संसद, जम के पर्चा धोती थी।
आज न फुर्सत, न वो मस्ती, न वो लंबी बातें हैं,
फाइलों के जंगल में अब, कटती अपनी रातें हैं।
सिकंदर भी तो हार गया था, सारी दुनिया जीतकर,
क्या ले जाओगे साथ बताओ, यूं ही जीवन बीतकर?
सीधी सी बस बात यही है, इसे गांठ में बांध लो,
काम तो चलता ही रहेगा, खुद को जरा पहचान लो।
ज़िन्दगी के जो पल मिलें, उन्हें मस्ती में तुम जी लेना,
चाय की प्याली दोस्तों के संग, फुर्सत से तुम पी लेना।
साहब बनना ठीक है पर, इंसान बने रहना तुम,
बचपन वाली उस हंसी को, सीने में भरे रहना तुम।
- देवेश चतुर्वेदी
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मन की खिड़की में उतरा था वो चाँद,
कोरे शब्दों की स्याही में घुला,
मन की गहराइयों में स्वत: उतरकर
जैसे मेरी कला का रहस्य खोल चला।
पाँच वर्ष बीते आशीर्वाद रूपी कलम थामे,
पर उसकी छवि अब भी जीवित है,
हर अक्षर में उसकी अनूठी छाप,
हर भाव में उसकी परछाईं लिखित है।
मैंने पूछा-
"क्यों आए थे उस रात,
और क्यों फिर कभी न लौटे?"
चाँद मुस्कुराकर बोला-
"मैं तो हर हृदय में हूँ,
बस पहचानने की दृष्टि चाहिए।
मैं नकारात्मकता में उजाला हूँ,
अंधेरे में छिपा श्वेत सा सहारा हूँ,
जब अंतर्मन थक जाएँ,
मैं प्रेरणा बनकर उतरा करता हूँ।
तुम्हारी कलम को मैं ही गति देता हूँ,
तुम्हारे भावों को मैं ही स्वर देता हूँ,
मैं विलुप्त नहीं,
बस तुम्हारे भीतर ही ठहर गया हूँ।"
- अंशिता त्रिपाठी
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पुरखों की विरासत...
हम बंटवारे में छोड़ आए हैं।
हमारे चेहरे पर... जो चमक है
वो हमारी खुद की बनाई है।
तुमने अपने पूर्वजों के लिखें
सारे ग्रंथ, कहानी छोड़ दिए
सच कहूं तो तुम गद्दार हो...
ना अपने पूर्वजों के हुए...
ना संस्कृति और सभ्यता के
तुमने जिस-जिस को मां बोल!
उसकी हालत बदतर कर दी
सच बोलूं तुम स्वार्थी हो।
अपने पूर्वजों की तुमने!
भाषा छोड़ दी...
वेशभूषा छोड़ दी...
रहन-सहन छोड़ दिया... और
थोड़ी लाभ के लिए जाति बचा ली
सच कहूं! तुम्हें तुम्हारे
पूर्वजों का श्राप लगेगा।
मेरा क्या! मैंने अपने
पूर्वजों की विरासत छोड़ी
मेरी आने वाली पीढ़ी
मेरी विरासत छोड़ देगी।
- दीपक कोहली
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अधूरी वापसी
अब न मेरा गांव में वो घर रहा,
सिर्फ पुरखों की यादें रहीं,
जिसे करके ताजा मैं आहें भर रहा।
चले थे कमाने ,आ गए शहर,
कमाया सब कुछ गवां के अपना घर।
होते गए अंदर से खाली,
फीकी रही होली और बुझी से दिवाली।
अब लौटा हूं देर हुई बहुत,
रिश्ते निभाने वाले अलविदा कह गए,
कुछ मेरी तरह थे वो भी,
शहर की हवा में बह गए।
अब गांव में भी पहुंची शहर की बीमारी है।
जो थे कभी सर्व सुलभ उसकी भी मारामारी है।
दूध, दही और घी भी यहां मिलते नकली।
बोली भूल गए,परिधान भूले,
गाय नहीं पालते-पालते अब कुत्ते बिल्ली।
अब रिश्ते चुप रहते,बोलते सिक्के है।
हा मन मिजाज मिल जाए किसी से,
पर वो भी इक्के दुक्के हैं।
अब होती है घुटन बहुत,
सपनों में ही रहना अच्छा लगता है,
कंधा नहीं है किसी का मजबूत
सर रखने को,
अकेले आंसू बहाना अच्छा लगता है।
- रोशन कुमार झा
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फिर वो सुबह आएगी...
शुष्क है यह भग्न उर
नीर नयनों में भरा
ताप विरहाग्नि सहे,
कंपित हुई यह धरा।
तिमिरमय इस चेतना में
भोर फिर से क्या उगेगी?
तृप्ति फिर से तब मिलेगी!!
मौन बैठी कल्पना,
आस का दीपक लिए।
शून्य पावन मन्दिरों में
प्रिये जो आँसू दिए।
चिर-विरहित इस हृदय को
तृप्ति फिर से क्या मिलेगी?
भोर फिर से क्या उगेगी??
शांत कर दे जाह्नवी,
आ हृदय में तू सकल।
प्राण के इस मरुस्थल में
खिल उठे फिर से कमल।
सत्य बोलो हे प्रिये!
क्या नेह सरिता सी बहेगी
भोर फिर से वह उगेगी?
तृप्ति फिर से वह मिलेगी?
- सविता सिंह मीरा
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कल किसने देखा है
क्या कल कभी आता है,
सब काम लोग कल पर टाल जाते हैं,
क्या होता है कल आखिर,
न किसी ने देखा, न कोई जान पाता है।
जीवन तो बस आज में है,
कल का सपना अधूरा रह जाता है,
जो जीते हैं हर पल को खुलकर,
सफल वही कहलाता है।
क्या पता कल जिंदगी रहे न रहे,
फिर क्यों अरमान अधूरे रखें,
जो करना है, आज ही कर लो,
क्यों वक्त को यूँ बहने दें।
कहीं ऐसा न हो एक दिन,
मन में बस पछतावा रह जाए,
काश वो काम आज कर लिया होता,
ये सोच दिल को सताए।
क्योंकि कल कभी नहीं आता,
सच तो केवल आज ही है,
हर तमन्ना पूरी कर लो,
क्या पता कल हो न हो।
- गरिमा लखनवी
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बढ़ी है नफ़रत बढ़ें हैं शूल।
खिला है जब से विषैला फूल।।
ये ख़त्म कैसे हुआ है अम्न।
कहाॅं पे हमसे हुई है भूल।।
धुऑं बचा है बची है राख।
बची न बस्ती बची है धूल।।
गधे हैं ख़ुश सब यहाॅं पे आज।
कि ढो रहे बोझ वो अमूल।।
किया था झूठे ने वादा झूठ।
थी उसकी बातें सभी फ़ुज़ूल।।
जो कहते करते अच्छे लोग।
गधों का कोई नहीं उसूल।।
वफा के बदले जफ़ा निज़ाम।
दिया है उसने मुझे ये मूल।।
- निज़ाम फतेहपुरी
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बाबुल ऐसा वर ढूंढो
बाबुल मुझको ऐसा वर ढूंढो,
जो नारी का सम्मान करे।
सुख दुख में हमेशा साथ रहे
ना कभी मेरा अपमान करे।
जो मुझको ब्याहकर ले जाए
रुपया, पैसा ,गहनों के बिना
कर्ज का बोझ चढ़ाए ना
तुम्हारी पगड़ी का भी ध्यान करे।
बाबुल ऐसा वर ढूंढो
जो नारी का सम्मान करे।
जब गलती कोई कर दूं मैं,
धीरे से मुझको समझा दे
जब गुस्सा उसको आए तो
बस थोड़ा सा मुस्का दे।
मैं दूजे घर से आई हूं
थोड़ी मेरी पहचान करे।
बाबुल मुझको ऐसा वर ढूंढो
जो नारी का सम्मान करे।
मैं सारे रिश्ते अपना लूंगी,
उसके रंग में ढल जाऊंगी,
छोड़कर बाबुल का अंगना
उसकी बगिया महकाऊंगी।
वो मेरे भी रिश्ते समझे
बस इतना सा अहसान करे।
बाबुल मुझको ऐसा वर ढूंढो
जो नारी का सम्मान करे।
मैं सारी बातें मानूंगी,
जुबान भी नहीं खोलूंगी
जितना जरूरी होगा
मैं बस उतना ही बोलूंगी।
मैं लाड प्यार से पाली तुमने,
वह मुझ पर ना कोई वार करे।
बाबुल ऐसा वर ढूंढो
जो नारी का सम्मान करे।
अगर मिले ना वर ऐसा
मैं बिन ब्याहे ही रह जाऊंगी
इस समाज के डर के कारण
शायद ससुराल में मारी जाऊंगी।
जाने कितने वहशी बैठे हैं!
जो लाडो बेटी के प्राण हरे
बाबुल मुझको ऐसा वर ढूंढो
जो नारी का सम्मान करे।
- मंजू सागर
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दो कौड़ी का शिक्षक
उस दिन जब समाचारों में
"दो कौड़ी का शिक्षक" सुना,
जाने क्यों मन रो पड़ा,
जाने क्यों कुछ भीतर टूटा।
जिसने उँगली पकड़ चलाया,
जिसने अक्षर का दीप जलाया,
जिसके शब्दों से जीवन ने
अपना पहला अर्थ पाया।
वह शिक्षक आज खड़ा था चुप,
न कोई उत्तर, न प्रतिकार,
बस उसकी नम आँखों में था
सम्मान खोने का संताप अपार।
सोचा होगा उस गुरु ने भी
"क्या इतना ही मेरा मान ?
जिन बच्चों के सपने सींचे,
क्या इतना सस्ता है ज्ञान ?"
पर सच तो यह इतिहास कहेगा,
शब्दों से गुरु छोटा नहीं होता,
जिसके कारण जग रोशन हो,
वह कभी दो कौड़ी का नहीं होता।
कौड़ी के यदि शिक्षक होते,
तो डॉक्टर, वैज्ञानिक, पत्रकार कहाँ होते ?
सच तो यह है गुरु स्वयं मिटकर भी
दूसरों के जीवन में उजाला बोते।
- डॉ. सारिका ठाकुर 'जागृति'
*****
दावानल बना है दानव
जेठ महीने की तपिस से
गर्म हवाओं से,
सभी जल रहे हैं
सूख रहे हैं पेड़- पौधे
पशु -पक्षी भी हैं भूखे -प्यासे
प्रकृति हो रही व्यथित
दावानल करने लगी बेहाल
दावानल बना है दानव
मानवजनित दावानल से
जलते वनों में जल रहे
असंख्य पेड़ पौधे, जीव-जंतु
पशुओं के आवास
पक्षियों के घोंसले भी जल रहे
जाने कितने जीव
हो गए बेघर
दावानल बना है दानव
वायु प्रदूषण में हो रही सतत वृद्धि
विश्व ऊष्णन निरंतर बढ़ रहा
मृदाकटाव बढ़ने से
मृदा हो रही बंजर और ऊसर
दूषित हवा से होने लगे
हृदय, त्वचा एवं श्वसन रोग
पारिस्थितिक संतुलन हो रहा नष्ट
पिघलने लगे हैं ग्लेशियर
ओजोन में हो गया है छिद्र
दावानल बना है दानव
वन हैं पृथ्वी के फेफड़े
वन करते ताप नियंत्रित
वन जलवायु को करते प्रभावित
वन हैं धरा पर
जीवन का मूल
आओ वनों को जलने से बचाएँ
धरा को हरा -भरा,मनमोहक
स्वस्थ एवं खुशहाल बनाएं।
- प्रवीण कुमार
*****
जीवन के सच्चे पथ प्रदर्शक
माता-पिता जीवन का आधार हैं,
उनके बिना सपने भी बेकार हैं।
माँ की ममता छाँव सी ठंडी,
पिता का साया शक्ति अखंड है।
वे खुद संघर्षों में जीते हैं,
पर बच्चों के लिए खुशियाँ सीते हैं।
उनके त्याग का कोई मोल नहीं,
उनके जैसा इस जग में कोई और नहीं।
जिस घर में माता-पिता का सम्मान होता है,
वहीं सच्चा सुख और भगवान का वास होता है।
- नूतन गर्ग
*****
चाहने वाले
साथ चाहने वाले
अपनी चाल धीरे कर ही लेते हैं,
वे मंज़िल से पहले
रिश्तों को चुन लेते हैं।
उन्हें जल्दी नहीं होती
सबसे आगे निकल जाने की,
वे ख़ुशी ढूँढ़ लेते हैं
किसी अपने का हाथ थाम लेने की।
राह में यदि कोई थक जाए,
तो वे ठहरना जानते हैं,
अपने कदमों की गति से अधिक
दिलों की दूरी मापना जानते हैं।
जो सचमुच अपने होते हैं,
वे पीछे छूटने नहीं देते,
समय चाहे कितना भी बदल जाए,
साथ का धागा टूटने नहीं देते।
क्योंकि प्रेम का अर्थ
किसी से आगे निकल जाना नहीं होता!
प्रेम तो वह एहसास है
जहाँ कोई कहता है,
"चलो, धीरे-धीरे ही सही,
पर साथ चलते हैं...!
- नरेंद्र मंघनानी
*****
















