साहित्य चक्र

28 July 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 28 जुलाई 2026






हरियाली

घनघोर घटा चहुंओर अब छा गई,
छम-छम कर नाचती देखो वर्षा आ गई।

पंछियों की डार भी पीहू-पीहू कर नाचने लग गई,
छाई थी जो काली बदरी वो पानी बन बरस गई।

बेरहम गर्मी जो सबके हाल बेहाल कर गई,
शीतल बूंदें बारिश की सुकून पहुंचाने आ गई।

बच्चों की टोलियाँ वर्षा में मस्ती करने निकल गई,
वो कागज की किश्तियां भी दूर तक निकल गई।

सूखा चारा खाते पशुओं में भी ऊब सी आ गई,
फिर हरी घास से उनके मनों में रौनक छा गई।

हर कली डाली मुस्कराते गीत खुशी के गा गई,
सबके जीवन में वर्षा से नवबहार सी छा गई।

मिट्टी के हर कण में नई उमंग सी छा गई,
देखो अब के वर्ष धरा पर फिर हरियाली छा गई।


- राज कुमार कौंडल


*****


इस ग़म से कोई कैसे निजात पाए,
इश्क़ हो और फिर भी कह ना पाए।

उनकी नज़रों में बहती गहराई है इतनी,
वो बस देखें आह भर तो डूब जाए।

कैसे मानूँ कि बस दुनियादारी निभाती है!,
जो मिलते ही छोटे बच्चे की तरह लिपट जाए।

इस इंतज़ार में आँखों में सपने लिए बैठा है कोई,
कि सुबह का भूला शाम होते ही लौट आए।

मेरे अश्कों के कुछ अशआर को पूरी कहानी ना समझना,
इश्क़ का दरिया यूँ चंद बूँदों में समेटा ना जाए।


- स्वाति जोशी


*****


जीने की उपहार

कल्पनाओं की पंख लगाकर हम दोनों
चलों ख्वाबों की दुनियां में। बस जायें
हवा महल सपनों में बनाकर जन्नत में
तेरी जुल्फों के साये में। हम सो जायें

ना कोई फिक्र ना कोई चिन्ता व गम
रोक ना पाये छुकर हमारे बढ़ते कदम
ना कोई विपत्त ना कोई कष्ट व दुःख
चारों तरफ मिले खुशियों का सुख

साथ जीने की व साथ मरने की जब
हमने मिलकर मंदिर में कसमें खाई
फिर क्यूं मरने की डर भय तुमको
तेरी उम्मीद के बाजू में अब दिखलाई

हमें मौत की परवाह कब है जानूँ
हम तो हैं प्यार के जाबांज मतवाले
हमें आकाश से गिरने की डर नहीं
हम हैं राही दिल के अमर दिलवाले

री पुरवाई ले चल हमें अपने संग संग
ले चल सफर मेंचन्दा के उसपार
जहाँ सुकून की बहती है एक दरिया
ला दो हमें तुम जीने की अनुपम उपहार


- उदय किशोर साह


*****


देखना चाहता था मैं
जिन्हें अपनी दुआओं में भी ऊँचा,
वही मुझे अपनी महफ़िल में
बौना समझ बैठे,
चले हम भी अपनी ही फितरत से
मेहनत की सीढ़ियाँ चढ़ते रहे ,
और उनके समकक्ष बन बैठे,
कल तक जो साया समझते थे
होश उड़ जाते हैं अब उनके
हम को देखकर...
आँखें झुका लेते हैं अब वह
जो सर उठा कर बात करते थे,
और हम सोचते हैं के
अरसा बीत गया उनसे भेंट हुए ,
पर दर्द ये है के
भेंट अब भी अजनबी सी लगती है ,
वह भी पूछते हैं अब हाल
जो हाल पूछने लायक न समझते थे
और हम मुस्कराकर कहते हैं
अरसा बीत गया उनसे भेंट हुए,
देखना चाहता था मैं
जिन्हें अपनी दुआओं में भी ऊँचा,
वही मुझे अपनी महफ़िल में
बौना समझ बैठे।


- बाबू राम धीमान


*****


महिला पुलिस

मैं पुलिस हूँ,
हाँ, महिला पुलिस हूँ!
माँ की मैं भी लाड़ली-दुलारी हूँ,
हर प्रदेश, हर क्षेत्र में अब मैं भारी हूँ।
हाँ, इस लोकतांत्रिक देश की शान हूँ,
अपने फर्ज और सम्मान की पहचान हूँ।

मैं नारी हूँ,
हाँ, अपने पापा की लाड़ली हूँ!
हर संघर्ष से लड़कर आज वर्दीधारी हूँ।
करुणा भरे हृदय और स्त्रीत्व के साथ,
फर्ज की खातिर लाठियाँ भी उठाई हैं हाथ।

मैं पली हूँ
एक ऐसी दुनिया में,
जहाँ अपनों से ज़्यादा,
रिश्तेदारों और आस-पड़ोस के ताने खाए हैं।
पर इन्हीं तानों से मैंने
अपनी मेहनत के हथियार बनाए हैं।

मैं दौड़ी हूँ,
हाँ, मैदानों में बहुत तेज भागी हूँ!
सर्दी, गर्मी और बरसात में रातों को जागी हूँ।
खुद को तपाकर लाखों प्रतिद्वंद्वियों के बीच से निकली हूँ,
कलम घिस-घिस कर, पसीने में ढलकर आगे बढ़ी हूँ।

मैं कांस्टेबल बनी हूँ,
अपनी मेहनत से यह वर्दी पाई है!
गाँव के मैदान में तैयारी के वे दिन याद हैं,
जब बेवक़्त पापियों की गंदी नज़रें मँडराई हैं।
पर मैं झुकी नहीं, किताबों में खुद को खपाया है,
तब जाकर यह मुकाम हासिल कर पाया है।

मैं SI (सब-इंस्पेक्टर) हूँ,
आज कांधे पर 'डबल स्टार' सजाए हैं!
तैयारी के लिए भेजते समय, जो माँ-बाप को कोसते थे,
जिनकी नज़रों में मैं काँटे की तरह खटकती थी,
उनकी संकीर्ण सोच को मात देकर यह रुतबा पाया है!

आज मैं खुश हूँ...
संघर्ष के वो दिन याद कर आँखें ज़रूर नम हैं,
पर पापा की रुंधती मुस्कान और माँ की पुचकार में,
मेरा पूरा जहाँ और सारी खुशियाँ समाई हैं।
बदलती नज़रों के बीच, आज मैंने सबकी सच्ची प्रीति पाई है।


- राघवेंद्र प्रकाश 'रघु'


*****


गिरने लगी चट्टानें, ज़ख्म देने लगी बरसात

गिरने लगी चट्टानें, ज़ख्म देने लगी बरसात
नदी नाले ऊफान पर, बरतो सदैव एतिहात,
नदी किनारें न जाएं, मानो कविराय की बात
निठल्ले कभी न बैठिये, न धरो हाथ पर हाथ,

सेल्फ़ी लेने के चक्कर में अक्सर, जाते नदी के पास
खड़े होते बीच नदी में, बड़ी सी चट्टान पर इन्सान
वीडियो बनती रह जाती, चलता हँसी मज़ाक
ऊफान आया नदी में, पलभर में सब कुछ खाक,

सब देखते रह जाते, नदी प्रवाह बहा ले जब साथ
चीखें गूँजती रह जाती, पर हाथ नहीं आता हाथ
गलती खुद की ही होती, कोई देखता तक नहीं,
भगवान भी नहीं बचा पाते,जब बहते प्रवाह के साथ,

सैल्फी लेने के चक्कर में,उजड़ गए कीमती चिराग़
रोक पाए नदी प्रवाह को, इतना बलशाली नहीं इन्सान
राह देखती रह गई माँ, दरवाजा ताकता रह गया बाप,
जीवन दायनी नदियाँ देखो, अब बनने लगी हैअभिशाप।


- बाबू राम धीमान


*****


लौट कर हर जन्म में मैं हिन्दुतान आता हूं
मैं भारत का फौजी हूँ भारत के गीत मैं गाता हूँ
जो देशभक्त हैं उनके लिए मैं यह कविता सुनाता हूँ
बेशक कुर्बान हो गया मैं सरहद पर लड़ते लड़ते
लौट कर हर जन्म में मैं हिन्दुतान आता हूं
जो देशभक्त हैं उनके लिए मैं यह कविता सुनाता हूँ

नहीं मानता करता रहता शरारत वह बार बार
कर दिया था हमने बंगला देश बनाकर इसको दोफाड़
नब्बे हज़ार सैनिक गिगिड़ाये थे हमारे वीरों के आगे
चटगांव बंदरगाह पर जब मारी थी हमारे वीरों ने दहाड़
उन वीरों को नमन करें हम सबको यह समझाता हूँ
जो देशभक्त हैं उनके लिए मैं यह कविता सुनाता हूँ

दुश्मन कारगिल द्रास की चोटियों पर बैठ गया
सोच कर यह कि हिंदुस्तान को नहीं है खबर
युद्ध हुआ कारगिल में हमने दुश्मनों के छक्के छुड़ा दिए
चोटियों पर जो बैठे थे नसीब नहीं हुई उनको कब्र
कुछ लौट कर जो घर नहीं आये उनकी याद दिलाता हूं
जो देशभक्त हैं उनके लिए मैं यह कविता सुनाता हूँ

चीन भी लगा रहता है करता रहता है
सीमा का उलंघन बार बार
गलवान में ठोका हमने चालीस को
दिया मौत के घाट उतार
चीन भूल जाये 1962 को
आधुनिक भारत की मैं ताकत दिखाता हूं
जो देशभक्त हैं उनके लिए मैं यह कविता सुनाता हूँ

देश मेरा भारत है है माता भारती
उठो मेरे देशवासियो मां है पुकारती
उनका ख्याल रखो जो सीमा के है पहरेदार
उनकी बदौलत जीती हूँ हमेशा कभी नहीं मैं हारती
देश पहला प्रेम है मेरा यह सबको बतलाता हूँ
जो देशभक्त हैं उनके लिए मैं यह कविता सुनाता हूँ

बार बार पिटने के बाद भी नहीं सँभलता है
कभी आतंकी भेजता है कभी सीमा पर चालें चलता है
कुत्ते की पूंछ है कभी सीधी नही होगी
हर बार मुंह की खाता है फिर हाथ मलता है
सर्जिकल स्ट्राइक करता हूँ घर में घुस कर मार आता हूँ
जो देशभक्त हैं उनके लिए मैं यह कविता सुनाता हूँ


- रवींद्र कुमार शर्मा


*****


विरहन की दर्द

काली कोयलिया डाली से करती फरियाद
बेशरमी क्यूं भूल गया घर की तुम याद
गम की मारी चन्दा तेरी प्यारी अबोध चकोरी
कब समझोगो तुम प्रीत की रीत संवाद

सावन बीता भादो भी ना मन को है जीता
फागुन की भी क्या बीत जायेगी फुहार
लौट आ परदेशी अपने घर वापस आ जौशी
खेत खलिहान में हैं जीने की संभावना अपार

चुन्नु नित्य रोता मुन्नु भी तेरी याद में ना सोता
नित्य करता रहता है तेरी यादों की हर बात
ना चाहिये हमें निगोड़ी झुमका लौट आ दुमका
दुःख सुख सह लेगें हम दोनों झोपड़ी में साथ

मंगरू घर आया सहरु को भी परदेश ना भाया
उन सब के घर मन रही दीपावली की त्यौहार
किस बात पे रूठा तुँ बेदर्दी मेरे प्रियवर
छोड़ छाड़ के आ वापस घर आज है इतवार

ये जीवन है संग जीने की संग संग मरने की
मत कर जीवन की अरमानों को तुँ। बरबाद
ना जाने कब आ जायेगी धरती पे.. कयामत
मन की हर बातें तुम कर दो आज अबाद


- उदय किशोर साह


*****


ऐसे ही नहीं...

कभी कलम, कभी तलवार,
कभी मशाल थामनी पड़ती है,
ऐसे ही नहीं मिलती आज़ादी,
ऐसे ही जंग जीती जाती है।

कभी सूरज, कभी चाँद,
कभी दीप बनना पड़ता है,
ऐसे ही नहीं मिटता तिमिर,
ऐसे ही जीवन में उजाला होता है।

कभी इंतज़ार, कभी इनकार,
कभी बेवफ़ाई भी सहनी पड़ती है,
ऐसे ही जन्म लेता है सच्चा प्यार,
नहीं तो हर दिल खिलौना होता है।

कभी बारिश, कभी धूप,
कभी शिशिर की मार सहनी पड़ती है,
तभी नन्हा पौधा वृक्ष बनता है।
ऐसे ही नहीं खिलते गुल,
महकने के लिए हर मौसम में मुस्कुराना पड़ता है।

कभी गिरना, कभी संभालना,
कभी खुद से लड़ना होता है।
ऐसे नहीं मिलता मुकाम,
हर कदम इंतहान से गुजरना होता है।


- रोशन कुमार झा


*****


जीवन संघर्ष है

जीवन में संघर्ष नहीं किया तो फिर क्या किया ?
सुबह तो सब जागते हैं,
सांस तो सब लेते हैं,
तुमने भी लिया तो क्या किया ?
कभी अपने को नहीं कोसा तो क्या किया ?
कभी परिस्थित से नहीं लड़े तो क्या किया ?
अपने मन को मारा नहीं जिम्मेदारी के लिए तो क्या किया ?
सबकी तरह तुम भी एक समतल जीवन चाहते हो ?
पथिक को मजा नहीं आता है समतल जमीन पे,
तुमको तो पर्वत, नदी और खाई से डर लगता है,
तो तुम अपने जीवन के पथिक नहीं हो ?
तुम जीना चाहते हो एक ऐसा जीवन जो लोग देखते हैं सपनों में,
और सपने वही देखते है,
जिन्हें परिस्थित ने कभी रातों को जगाया नहीं।


- प्रणव राज


*****


सोच अपनी बदल नहीं पाए।
हम किसी राह चल नहीं पाए।

आजमाते रहे कभी जिनको,
उन रिवाज़ो में ढल नहीं पाए।

आस जितनी रही घटाओं से,
अब्र उतने पिघल नहीं पाए।

रात-दिन राह भर चले लेकिन,
पार हद से निकल नहीं पाए।

वक़्त के साथ-साथ रहकर भी,
चंद लम्हें संभल नहीं पाए।

बोल थे,साज़ थे,मिले सुर भी,
दिल हमारे बहल नहीं पाए।


- नवीन माथुर पंचोली


*****


कौन बो रहा है ऐसी फसल,
बिगड़ रही है आज की ऐसी नस्ल।

फूल से सुंदर बच्चे, काँटे हो रहे हैं,
बड़ों के मुँह पर अब चाँटे हो रहे हैं।

धीरज इनका हीमोग्लोबिन-सा घट रहा है,
गुस्सा जैसे भयानक बिलीरूबिन-सा बढ़ रहा है।

बड़ों की बातें रुकावट लग रही हैं,
बाहरी दुनिया ही सजावट लग रही है।

अपनों के लिए जीने का दौर खो गया,
ख़ून-ख़राबा, क़त्ल-ए-आम अपनों का हो गया।

न कोई पश्चाताप है, न कोई शिकन,
कैसे आ लगा यह रिश्तों को ग्रहण।


- अजय नेमा



*****





21 July 2026

कहानी- सुगंधा


सुगंधा एक गृहिणी थी। सुबह से लेकर शाम तक वह घर के कामों में इतनी व्यस्त रहती कि उसे अपने लिए समय निकालना तो दूर, दिन, तारीख़ और वार का भी ध्यान नहीं रहता था।

सुबह उसकी दिनचर्या सबसे पहले शुरू होती और रात में सबसे बाद में समाप्त होती। कभी बच्चों के लिए उनकी पसंद का अलग नाश्ता बनाना होता, कभी सास-ससुर की सेवा करनी होती, तो कभी पति की फरमाइशें पूरी करनी होतीं। इन सबके बीच कब सुबह से शाम हो जाती, उसे स्वयं भी पता नहीं चलता था।





ऐसा नहीं था कि सुगंधा के जीवन में कोई दुख नहीं था। यदि किसी काम में थोड़ी-सी भी देर हो जाती, तो पति की ऊँची आवाज़ सुननी पड़ती। यदि सास-ससुर की किसी अपेक्षा में थोड़ी-सी भी कमी रह जाती, तो उनके उलाहने मिलते। बच्चों की शिकायतें भी समय-समय पर उसके हिस्से में आती ही रहती थीं।

सुगंधा हर संभव प्रयास करती कि उसके कारण पति, सास-ससुर या बच्चों को शिकायत का कोई अवसर न मिले। वह अपनी क्षमता से बढ़कर सबकी अपेक्षाएँ पूरी करने की कोशिश करती। फिर भी यदि कभी किसी को समझाना पड़ता, तो वह अपने बच्चों को ही समझा देती। उसे लगता था कि शायद यही सबसे आसान रास्ता है।

लेकिन इतना सब करने के बाद भी वह सबको खुश नहीं रख सकी। धीरे-धीरे वह ऐसी गृहिणी बनती जा रही थी, जो दूसरों की खुशियों के लिए तो दिन-रात लगी रहती थी, लेकिन अपनी खुशी का उसे स्वयं भी पता नहीं था। उसका पूरा जीवन पति, बच्चों, सास-ससुर और घर की जिम्मेदारियों तक सीमित होकर रह गया था।

यदि कभी वह अपनी कोई छोटी-सी इच्छा या फरमाइश ज़ाहिर भी कर देती, तो अक्सर उसे यही सुनने को मिलता- "तुझे जाना ही कहाँ है? तुम तो सारा दिन घर पर आराम ही करती हो।"

यह सुनकर वह हर बार मुस्कुरा देती, जबकि वह जानती थी कि जिसे लोग आराम कह रहे हैं, वह वास्तव में बिना रुके चलने वाला एक अंतहीन सफर था। एक दिन अचानक सुगंधा की तबीयत इतनी खराब हो गई कि उसमें खड़े होने तक की शक्ति नहीं बची।

डॉक्टर ने उसे कुछ दिनों तक पूर्ण विश्राम करने की सलाह दी। अब घर की सारी जिम्मेदारियों के साथ-साथ उसकी देखभाल की जिम्मेदारी भी परिवार पर आ गई। कुछ ही दिनों में घर का पूरा संतुलन बिगड़ गया। तब सुगंधा के ससुर ने उससे कहा, "कुछ दिन तुम अपने मायके चली जाओ। वहाँ तुम्हारी अच्छी तरह देखभाल हो जाएगी और तुम जल्दी ठीक हो जाओगी।"

यह सुनकर सुगंधा हैरान रह गई। आज तक जब भी उसने कहीं जाने की बात की थी, उसे यही कहा जाता था- "तुम्हारे बिना इस घर का कोई काम नहीं चल सकता।" लेकिन आज उसके बीमार पड़ते ही उसे मायके जाने की अनुमति भी मिल गई।

कुछ समय मायके में रहकर जब वह पूरी तरह स्वस्थ होकर वापस लौटी, तो उसने घर का बदला हुआ रूप देखा। घर में एक पूर्णकालिक नौकरानी रख ली गई थी। सास-ससुर अपनी क्षमता के अनुसार अपने छोटे-मोटे काम स्वयं करने लगे थे। बच्चे अपनी चीज़ें अपनी जगह रखने लगे थे और उसके पति भी हर छोटी-बड़ी बात के लिए उस पर निर्भर नहीं रहते थे।

सबसे अधिक आश्चर्य की बात यह थी कि नौकरानी घर का काम उतनी लगन, सफाई और व्यवस्थित ढंग से नहीं करती थी, जितनी निष्ठा और बारीकी से सुगंधा किया करती थी। कई काम अधूरे रह जाते, कुछ चीज़ें इधर-उधर पड़ी रहतीं और कई बार उसकी कार्यशैली में लापरवाही भी दिखाई देती। फिर भी घर में कोई उससे शिकायत नहीं करता था।

सुगंधा को याद आया कि जब वह पूरे मन से, बिना किसी शिकायत के, दिन-रात घर के लिए लगी रहती थी, तब भी उसकी छोटी-सी भूल पर उसे सुनना पड़ता था। लेकिन आज, नौकरानी से वही काम पूरी तरह न होने पर भी सभी शांत थे। कारण केवल इतना था कि सबको डर था कि यदि वह भी काम छोड़कर चली गई, तो घर की जिम्मेदारियाँ फिर उनके कंधों पर आ जाएँगी।

उसी क्षण सुगंधा को जीवन का एक गहरा सत्य समझ में आया। आवश्यकता से अधिक दूसरों का काम करते रहने से केवल अपनी परेशानियाँ ही नहीं बढ़तीं, बल्कि हम अनजाने में अपने प्रियजनों को आत्मनिर्भर बनने का अवसर भी छीन लेते हैं। सहायता करना अच्छी बात है, लेकिन सहायता उतनी ही होनी चाहिए, जितनी वास्तव में आवश्यक हो। यदि एक ही व्यक्ति हर जिम्मेदारी अपने ऊपर ले लेगा, तो उसके पास स्वयं के लिए समय और ऊर्जा कभी नहीं बचेगी।

उधर परिवार ने भी एक महत्वपूर्ण सीख प्राप्त की। उन्हें एहसास हुआ कि यदि सुगंधा अकेले ही पूरे घर का भार उठाती रही, तो वह शारीरिक और मानसिक रूप से थक जाएगी। वह केवल एक गृहिणी नहीं, बल्कि अपनी इच्छाओं, सपनों और भावनाओं वाली एक इंसान भी है। उसका भी अपने जीवन पर उतना ही अधिकार है, जितना घर के किसी और सदस्य का।

उस दिन के बाद परिवार ने घर की छोटी-बड़ी जिम्मेदारियाँ आपस में बाँट लीं। बच्चों ने अपने काम स्वयं करने शुरू कर दिए। सास-ससुर ने अपनी क्षमता के अनुसार अपने काम स्वयं करने शुरू किए और उसके पति ने भी घर के कामों में हाथ बँटाना अपनी जिम्मेदारी समझा। सुगंधा से भी कहा गया कि अब वह अपने लिए समय निकाले, अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखे और अपने अधूरे शौक पूरे करे।

सुगंधा ने महसूस किया कि जब पूरे परिवार की जिम्मेदारियाँ केवल एक ही व्यक्ति के कंधों पर डाल दी जाती हैं, तो वह धीरे-धीरे शारीरिक और मानसिक रूप से थकने लगता है। लगातार बढ़ता हुआ बोझ उसे तनावग्रस्त
और चिड़चिड़ा बना देता है। लेकिन जब परिवार के सभी सदस्य अपनी-अपनी जिम्मेदारियाँ मिलकर निभाते हैं, तो न केवल एक व्यक्ति का भार कम होता है, बल्कि पूरे परिवार का जीवन अधिक संतुलित, सहज और सुखद बन जाता है। जिम्मेदारियों का बँटवारा केवल काम कम नहीं करता, बल्कि रिश्तों में सहयोग, सम्मान और अपनापन भी बढ़ाता है।

घर किसी एक व्यक्ति के त्याग से नहीं, बल्कि सभी सदस्यों के सहयोग से चलता है। और जो परिवार यह समझ जाता है, वहाँ केवल काम ही नहीं बँटते, बल्कि खुशियाँ भी बाँटी जाती हैं।


                                   - कंचन चौहान, बीकानेर



छायाचित्र आधारित पंक्तियाँ






कठिन तो है ये डगर..
लक्ष्य तक पहुँचूंगा जरूर,
चाहे भटकना पड़े दर-बदर।

   
                            - सूरजमल AkS


*****


मंज़िलें तुमको मुबारक! ओ मुसाफ़िर…
हम तो दरिया है चलते जाएँगे, रास्ते बनते जाएँगे।


- मोहन मीणा, जयपुर


*****


पेड़ की छाँव, खुला आसमान
और सफ़र का साथ,
कभी-कभी मंज़िल से ज़्यादा खूबसूरत होता है
ठहरने का एहसास।


- नरेंद्र मंघनानी


*****


हो साथ राजदूत का, तो मंज़िल दूर नहीं
जज़्बा हो दिल में कुछ कर गुजरने का,
तो डगर दूर नहीं।


- बाबू राम धीमान


*****


घर के वास्ते ही, घर छोड़ चले हैं।
अपनों की खुशियों के खातिर,
हर दर्द, खुशी से ओढ़ चले हैं।


- रोशन झा


*****


प्रकृति का सुन्दरतम् चेहरा देख, मन को मोह लिया,
रोक कर अपनी वाहन को, सुकून का अहसास लिया।


- चुन्नू साहा


*****


चला हूं ख़ोज में कि चैन पाऊं जहां,
ख़ुद से भागकर भी मगर जाऊं कहां!


- कुणाल


*****


अकेला ही चला था, सुकून की तलाश में,
देख कुदरत के हसीन नजारे, नजरें ठहर गई।


- प्रवीण कुमार


*****


कैसी विडंबनाओं का बोझ लिए खड़े हैं दोनों,
एक रुक नहीं सकता, एक चल नहीं सकता।


- स्वाति जोशी


*****


ईश्वर द्वारा रचित सृष्टि के सौंदर्य में मुग्ध मन को,
वापस खींच पाना बहुत ही मुश्किल है।


- अनुरोध त्रिपाठी


*****


"पेड़ की छाँव में बैठा हूँ, मगर सफ़र अभी बाकी है,
ख़ामोशी कह रही है, खुद से मिलना अभी बाकी है।"


- डॉ. सारिका ठाकुर 'जागृति'


*****


हरे भरे खेतों में पेड़ की छांव तले,
तेरा इंतजार और सामान का बोझ लिए सफ़र हुआ करता था।
जाने कहां खो गया ? कभी पहाड़ों के उस पार तेरा घर हुआ करता था।


- मंजू सागर


*****


आसमा ज़मी तक झुक सकता है,
चाहे तो दोपहिया रुक सकता है।
मगर जिंदगी जहां तक चलती है,
सफ़र उसी मंज़िल पे थम जाता है।


- सुतपा घोष


*****



20 July 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 21 जुलाई 2026





​तू तो लौटा ही नहीं, दिल न लगा तेरे बाद,
खुद से भी खुद को न पाया है ज़रा तेरे बाद।

​धूप सुनहरी आँखों में चुभी, छाँव न मयस्सर,
हर हसीं मंज़र भी लगता है खफ़ा था तेरे बाद।

​हंसी महफ़िलों में बुलाते रहे हर शाम मुझे,
मुझे खामोशियाँ ही आईं रास हां तेरे बाद।

​ज़िक्र होता है जब भी रूह सिहर उठती है,
धड़कनों अभी नाम लेती हैं तेरा तेरे बाद।

​तु तो कहता था कि साथ चलेंगे पल-पल,
तेरा साया भी न आया,इधर क्यों तेरे बाद।

​आईना देख के अब डर सा मुझे लगता है,
शक्ल तक अपनी न पहचान सका तेरे बाद


- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़


*****


पेड़ कट रहे

पेड़ कट रहे हैं,
और हम इसे “विकास” कह रहे हैं।
छाँव जा रही है,
और हम इसे “जरूरत” कह रहे हैं।
धूप हर साल और तेज़ हो रही है,
पर हम बस कहते हैं- “मौसम बदल गया।”
हवा भारी हो रही है,
साँसें छोटी हो रही हैं…
और हम फिर भी आगे बढ़ रहे हैं।
जहाँ कभी ठंडक मिलती थी,
वहाँ अब तपन उतर आई है।
जहाँ कभी पेड़ थे,
वहाँ सिर्फ़ खाली ज़मीन रह गई है।
एक दिन समझ आएगा-
पेड़ सिर्फ़ हरियाली नहीं थे,
वो हमारी साँसों की सबसे बड़ी सुरक्षा थे।
तब शायद बहुत देर हो चुकी होगी


- सुनीता बिश्नोई


*****


घुमड़ - घुमड़ जब बादल घिरे,
प्यासी धरती की तब आस जगे
मौसम की पहली बारिश में,
प्राण -प्राण में नई उमंग जगे।

पत्ता पत्ता डाली डाली ,
हो गई हरी और मतवाली,
ठूंठ में भी नव चेतना है भरी,
मौसम की पहली बारिश ऐसी पड़ी।

इन्द्रधनुषी रंगों से सजकर,
वर्षा ऋतु बनी है दुल्हन,
मोर पपीहा की सुर तान,
बादल गरज गरज करे गान।

पर्वत से निकलता झरना,
झर झर,झर झर गिरता जाए,
मंद मंद चाल में बहती नदी,
मीठे मीठे स्वर गुनगुनाए।

बदलता मौसम संदेश है देता,
आगे बढ़ें वक़्त नहीं है रुकता,
मौसम की पहली बारिश की सीख,
चमके गगन में जैसे चमकता रीख।


- कांता शर्मा


*****


हाइकु

जीवन-पथ पर
जो बाँटता मुस्कान
वही समृद्ध।

भरा हुआ मन
आभार के फूलों से
हल्का हो गया।

दीपक ने कहा
जलना ही प्रार्थना है
अँधेरा हारा।


- नरेंद्र मंघनानी


*****


कोशिश कर हल निकलेगा
आज नहीं तो कल निकलेगा

करो अभ्यास निरंतर तुम
जरूर एक दिन फल निकलेगा

करो प्रतिज्ञा सफल होने को
पत्थरों से भी जल निकलेगा

भरी दुपहरी परेशान है किसान
बिना मेहनत ना फसल निकलेगा

उलझनों से दिक्कत ही होगा
सिर्फ उम्मीदों से ही हल निकलेगा।


- मनोज कौशल


*****




बने जो खेवनहार है

डुबो दी नैया, खुद बन खेवैया,
कर्म करते रहे दुश्मन का, मीठा बोल के भैया- भैया।
एक हाथ चप्पू खेते, दूजे छेद कर डाला,
जान खुद को भी डूबता, दोष कश्ती को दे डाला।
फंस गये आखिर वो, खुद के ही हाथों बुने जाल में,
दांव दे गये दुश्मन को, शिकार हो गये अपनी ही चाल में।
चुस्ती और चालाकी उनकी, राह में खुद की ही बन गई रोड़ा,
गुमराह कर दिए भोले राही, मंजिल के काबिल न छोड़ा।
माली खुद को कहकर, पत्ते-पत्ते का जीता भरोसा,
पर पानी की जगह जड़ों में, बूँद-बूँद तेज़ाब परोसा।
खोल दी दुश्मन ने सब सच्चाई, देख उचित एक मौका,
समझ आ गया था अब सबको, हो गया था उनसे बड़ा ही धोखा।
कर हिम्मत मिल जुल सारे, एक दूजे को दिया सहारा,
जैसे कैसे आखिर उनको, मिल ही गया था किनारा।
बन बेचारा सिमटा सा बैठा, किनारे पर मिल गया फिर वही खेवैया,
ढूँढ रहा था शायद शिकार फिर, बांध छोर से अपनी नैया।
हैरान सभी क्यूँ खुद ही डुबोये, नैया के बन खेवनहार है,
है कैसी ये सोच बताओ, क्यूँ करते इतना अनाचार है।


- धरम चंद धीमान


*****




गलती

खुद के भीतर झांको, बाहर कभी मत देखो,
गलती अक्सर खुद मे है, इसे तुम ही परखा,
बाहर में गलती ढूंढने से, गलतियां ही तुझे मिलेगी,
सही दिखाई कहीं भी तुझे कभी नहीं देगी।

हैरान परेशान होकर विचलित तुम हो जाओगे
अतः खुद मे ही बदलो,सकुन से रह पाओगे,
सुकून ही तो चाहिए ना हमें और कुछ तो नहीं ?
सुकुन के वास्ते, खुद के गलती को ही सुधार तो सही।


- चुन्नू साहा


*****




दोहा उर्दू छंद

सच कहना है अब बुरा, कहे यहाॅं सच कौन।
सच के दुश्मन हैं सभी, अच्छा है जो मौन।।

भूल गया है मौत को, लालच से मजबूर।
तन्हा जाना क़ब्र में, फिर भी करे ग़ुरुर।।

मेरी क्या पहचान है, ढूॅंड रहा मैं कौन।
दिखता जो वो मैं नहीं, अंदर कुछ है मौन।।

फ़ितरत है इंसान की, सबके अलग विचार।
कुछ तो सच को सच कहें, कुछ करते इनकार

जीते जी का साथ है, मरने पर है भार।
चले सभी इस पार तक, चले नहीं उस पार।।

साक़ी ऐसी मत पीला, चढ़कर उतरे यार।
एक बार ऐसी पिला, भव-सागर हो पार।।

कुछ दिन का बस खेल है, मौत हॅंसे इक ओर।
बचना मुश्किल मौत से, लाख लगा ले जोर।।

कीड़े खाऍं क़ब्र में, जब तक रहे शरीर।
सोच वहाॅं तकलीफ़ में, कैसी होगी पीर।।

जिसके दिल में प्यार है, सही वही इंसान।
पत्थर दिल कुछ नफ़रती, घूम रहे शैतान।।

मांस जला हड्डी बची, राख बची शमशान।
भूल गए अपने सभी, कर्म बची पहचान।।

उतरी उम्र ढलान पर, रहा अधूरा ज्ञान।
अंत नहीं है मौत से, आगे का कर ध्यान।।


- निज़ाम फतेहपुरी


*****




वृक्षों की रक्षा का त्यौहार 'हरेला

​देवभूमि की शान है त्यौहार 'हरेला',
प्रकृति का वरदान है त्यौहार 'हरेला'

मिट्टी के कण-कण में बसी,
खुशहाली की पहचान है 'हरेला'

​सावन की फुहारें जब धरती को नहलाती हैं,
खुशियों की सौगातें अपने संग ये लाती हैं,

टोकरियों में सजे अंकुर, प्यारे-प्यारे
आशाओं का मान है त्यौहार 'हरेला'

देवभूमि की शान है त्यौहार 'हरेला',
प्रकृति का वरदान है त्यौहार 'हरेला'

​पर्वतों की गोद में, खिलते सुंदर फूल,
हरियाली के रंग निराले, भाते मन के मूल,

आओ हम सब मिलकर, आज ये प्रण करें,
नए-नए पौधे रोपें, वृक्षों की रक्षा करें,

संकल्प का विधान है त्यौहार 'हरेला',
देवभूमि की शान है त्यौहार 'हरेला',

प्रकृति का वरदान है त्यौहार 'हरेला'
​बड़ों का मिले आशीष, घर-आंगन महक उठे,

नेह और प्रेम के धागों से, जीवन दमक उठे,
हमारी जड़ों की गहराई, संस्कारों का मान है,

परंपराओं की अमूल्य, ये सुंदर पहचान है,
देवभूमि की शान है त्यौहार 'हरेला',

प्रकृति का वरदान है त्यौहार 'हरेला'
​आने वाली पीढ़ियों को, हरियाली का उपहार दें,

पावन मिट्टी को पूजें, प्रकृति को भरपूर प्यार दें,
सुख-समृद्धि की बयार, हम सब मिलकर बहा दें,

जीवन का अभिमान है त्यौहार 'हरेला',
"मुश्ताक़" देवभूमि की शान है त्यौहार 'हरेला'


- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह 'सहज़'


*****



दुखाकर दिल किसी का भी हमें हँसना नहीं आया।
छुड़ाकर हाथ अपनों से कभी चलना नहीं आया।।

ज़हाँ में लोग हैं ऐसे बड़ी मज़बूरी में जीते।
किसी की बेबसी को भी हमें तकना नहीं आया।।

किसी से हम नहीं कहते मगर हर बात है चुभती।
जली मैं इक दिया जैसी मगर बुझना नहीं आया।।

कहें ग़र हम सुनेंगे क्या यही इक बात है मन में।
करे मनमानियाँ हरदम उन्हें सुनना नहीं आया।।

नदी सी ज़िंदगानी है बहे मन शांत शीतल सी।
मिले जो राह पर पत्थर कभी रुकना नहीं आया।।

पकड़ लो हाथ तुम साथी चलेंगे साथ जीवन भर।
सफ़र कितना भी मुश्किल हो कभी थकना नहीं आया।।

रहें हम दूर उनसे जो शिकायत रोज़ ही करते।
ग़लत के सामने हमको कभी झुकना नहीं आया।।


- रति सिंह


*****




ग़ज़ल

किस्मत को दोष क्यों देते हो भाया,
हाथ में मौके को गर पकड़ना न आया।

जहां मुड़ी तक़दीर, वहीं मुड़ गए तुम,
खुद अपनी किस्मत को लिखना न आया।

सोने का चम्मच मांगा, मेहनत से डर गए,
वैभव का असली मतलब समझना न आया।

किताबें थीं अलमारी में धूल खाती रहीं,
इल्म की दौलत से दोस्ती निभाना न आया।

आसमान छूने चले थे, सीढ़ी से उतर गए,
जुनून की आग में खुद को जलाना न आया।

समंदर से चाहा मोती निकाले पर गोता न लगाया,
पानी को पत्थर बना जब तराशना न आया।


- रत्ना बापुली


*****




हारे हुए बाजीराव की मस्तानी हो तुम।

हर दिलकश मौसम की रूहानी हो तुम
बदले भले ही गर्दिश-ए-वक़्त
पर मेरी दीवानी हो तुम,
हारे हुए बाजीराव की मस्तानी हो तुम।

शायद गर्दिश की करवटें भी आएँगी
वक़्त के रफ़्तार की सरपटें भी होंगी
भुलाना मत मेरी हर एक कुर्बानी को तुम,
हारे हुए बाजीराव की मस्तानी हो तुम।

न शिकवा है दिल में, न कोई बेकरारी है
सिर्फ़ और सिर्फ़, अब तुम्हारी ही बारी है
मेरी हर चलती सांस की जुबानी हो तुम,
हारे हुए बाजीराव की मस्तानी हो तुम।

नाउम्मीदी के साये में,उम्मीद जगाए बैठा हूँ
बिन याद किए तुमको,पलकें मूँद नहीं पाता हूँ
मेरी रूह पर अमिट निशाँ की रवानी हो तुम,
हारे हुए बाजीराव की मस्तानी हो तुम।


- सूरजमल AkS


*****




आंसू नहीं मोती हैं
जो आंसुओं की फुहार,
शहीदों की शहादत पर,
देशभक्तों, समाज सुधारकों,
समाजरक्षकों, धर्मार्थियों के,
जग से महाप्रयाण पर,
या किसी की प्रसन्नता में,
हर्षित हो, मुदित हो,
नयन-नीर द्वारा,
दृष्टिगोचर होता आनंद,
अनूठा अपनापन और लगाव,
अनोखा जुड़ाव दर्शाकर,
समाज को बनाता है,
सुदृढ़ एवं सौहार्दपूर्ण,
ऐसी अश्रुधारा,
ऐसी अश्रु वर्षा,
मात्र आंसू न होकर,
अमूल्य, अनुपम मोती हैं।


- प्रवीण कुमार


*****




वीर सब बढ़े चलो

वीर सब बढ़े चलो
हार से ना डरो
हो कर्तव्यनिष्ठ तुम
जीवन सब वार दो
दुश्मनों को संहार दो
सामने रूकावट हो
ना कोई बनावट हो
हो के यूं मायूस तुम
हर बला को टाल दो
हर किसी को प्यार दो
उलझनों को मार दो
वीर सब बढ़े चलो
धीर सब बढ़े चलो।


- मनोज कौशल


*****


तुम बन कर देखो सती, मैं
मैं शिव सा वियोग रचाऊँगा।
तुम्हारी आस में मैं वर्षों तक ऐसे रह जाऊँगा,
तुम प्रतीक्षा कर लेना।
तुम्हारे सिवा किसी को अपने दिल में न बसाऊँगा,
तुम परीक्षा दे देना।
मैं अपने ध्यान को नहीं भटकाऊँगा,
तुम आना जन्म लेकर
मैं तुममें बस जाऊँगा।
एक बार मेरी होकर देखो,
मैं तुम्हारा साथ जन्मों तक निभाऊँगा।


- रिशीता सिंह


*****




"चुप्पी भी अपराध है"

कितना कठिन है
अपने हिस्से की सुविधा छोड़कर
पूरे देश के भविष्य के लिए खड़ा होना।

एक व्यक्ति भूख से लड़ रहा है,
पर उसका संघर्ष
किसी एक नाम का नहीं,
हर उस बच्चे का है
जो बेहतर शिक्षा का अधिकार रखता है।

आज प्रश्न सिर्फ शिक्षा व्यवस्था पर नहीं,
हमारी संवेदनाओं पर भी है।
क्या व्यवस्था इतनी कठोर हो गई है
कि एक आवाज़ सुनने के लिए
एक जीवन दाँव पर लगाना पड़े?

आइए, मतभेदों से ऊपर उठें।
यह समय तमाशबीन बनने का नहीं,
सत्य के साथ खड़े होने का है।
क्योंकि यह लड़ाई किसी एक व्यक्ति की नहीं,
हम सबके भविष्य की लड़ाई है।


- डॉ.  सारिका ठाकुर 'जागृति'


*****




खुद से मिलन

मौन...
समझे कौन?
उफ़! इस शोर-शराबे में,
शब्द सभी हो गए थे गौण।

तभी कहीं से स्वर उभरा-
"कौन है, जो आया आज?"
कोलाहल के उस सागर में भी
किसी ने पढ़ लिए मन के राज।

मुड़कर देखा- न कोई अपना,
न कोई चेहरा, न कोई पास।
तभी अंतस ने धीरे से कहा-
"तू स्वयं ही है सबसे ख़ास।"

उस पल जैसे टूट गए
मन के सारे भ्रम-जाल।
जिसकी अपेक्षा थी जग से
मिला उत्तर जो भीतर का था सवाल।

फिर शब्द मौन से निकल पड़े,
भाव हुए निर्भय, निडर।
क्यों भटकूँ अब इधर-उधर,
जब मिल गया अपना ही घर।

स्वयं को पाकर जाना मैंने-
न कोई दूरी, न कोई बंधन।
सबसे अनुपम, सबसे पावन,
होता है खुद से अपना मिलन।

अब न शिकायत, न कोई प्रश्न,
न पाने-खोने का है डर।
जिसने स्वयं को जान लिया,
उससे सुंदर नहीं कोई सफ़र।


- सविता सिंह 'मीरा'


*****


क्षितिज सुनाता रोज़ ही, आशा का संदेश।
हर प्रभात कहता उठो, जीवन परम विशेष॥

सूरज चुपके से रचे, नव उजियारा-गान।
रातों के हर दर्द का, करता है अवसान॥

लहर-लहर सागर कहे, छोड़ो बीता काल।
आगे बढ़ना ही सदा, जीवन की है चाल॥

लाली ओढ़े व्योम ने, लिखा नया अध्याय।
अँधियारे के अश्रु से, जन्मा नव पर्याय॥

रेतों के पदचिह्न भी, देते यही पुकार।
चलते रहने से सदा, मिलता है संसार॥

थका हुआ हर मन यहाँ, पाए फिर विश्वास।
नव किरणों के साथ ही, खिल उठती हर आस॥

कल की हारों का नहीं, रखता सूरज लेख।
हर दिन देता रोशनी, मिटा निराशा-रेख॥

भीतर जितना दीप हो, उतना जग उजियार।
मन का निर्मल आलोक ही, जीवन का आधार॥

'सौरभ' हर प्रभात में, ईश्वर का वरदान।
उठो, बढ़ो, मुस्काइए, यह जीवन का गान॥


- डॉ. प्रियंका सौरभ


*****




टच स्क्रीन फोन और फेसबुक

एक आदमी ने नया ख़रीदा टच स्क्रीन फोन
जिसके लिए बैंक से ले लिया दस हज़ार का लोन
लोगों के सामने नया फोन था दिखाना
लेकिन उसको नहीं आता था चलाना

किसी तरह थोडा बहुत सीख कर करने लगे काम
क्योंकि टच वाला फोन था टच से होता था सारा काम
अब तो फेस बुक और व्हाट्सऐप पर होने लगी चेटिंग
नई नई महिलाओं से होने लगी सैटिंग

एक दिन एक महिला की फ्रेंड रिक्वेस्ट आई
महोदय ने एक्सेप्ट करने में देर नहीं लगाई
अब तो उसके सर पर चैटिंग का भूत हो गया सवार
महिला से अब चैटिंग जारी थी लगातार

एक दिन उसने महिला से मिलने का प्रोग्राम बनाया
महिला को मिलने के लिए पार्क में बुलाया
महिला ने कहा मिलने में परेशानी ना हो यह जान लीजिये
इसलिए अपनी कोई अच्छी सी पहचान बता दीजिये

महोदय ने कहा मेरा सूट होगा काला
और टाई का रंग होगा लाल
सर पर हैट होगा हाथों में बैट होगा
महिला ने कहा क्रिकेट के लगते हो बहुत शौक़ीन
कल पता चलेगा कि बेटिंग करते हो या होते हो बोल्ड क्लीन

अगले दिन की बात अब सब सुन लो लगा कर ध्यान
पार्क में महिला से मिलने पहुँच गए श्रीमान
महिला घुंगट में थी आ गई वो पास
श्रीमान जी खुश थे पूरी हो गई आस

महिला के पास आते ही रोम रोम खिल रहा था
मन ब्याकुल हो रहा था बल्लियों उछल रहा था
अब जो होने वाला था उसका नहीं था उनको एहसास
क्योंकि महिला के रूप में बीबी आ रही थी पास

महिला ने कहा अगर तुम्हारी बीबी को पता चल गया
तो समझो हमारा कचूमर निकल गया
बीबी को पता नहीं चलेगा तुम ज़्यादा ना दो ध्यान
क्योंकि बीबी को मूर्ख बनाना है मेरे बाएं हाथ का है काम

वह तो अनपढ़ वेवकूफ गंवार और जाहिल है
पुराने ज़माने की नारी है
पहनने,खाने बोलने की तमीज नहीं
अब तो उसके जाने की बारी है

इतना सुनते ही महिला ने घुंघट हटाया
अनपढ़ वेवकूफ गंवार और जाहिल नारी ने अपना रूप दिखाया
अब तो श्रीमान जी के सम्भलने की बारी थी
क्योंकि सामने खड़ी उनकी पत्नी प्यारी थी

घर में तो बात करने से कतराते हो
फ़ेसबुक और व्हाट्सऐप पर दूसरो की बीबियों को फंसाते हो
लातों और घूंसों की जो आई आंधी और तूफान
पति देव जी हो गए एकदम परेशांन

ये बेमौसमी आंधी और तूफान कहाँ से आ गए
जो पति देव की अक्कल एक मिनट में ठिकाने लगा गए
भाईओ इसलिए फ़ेसबुक और व्हाट्सऐप
पर मत दो ज़्यादा ध्यान
वर्ना लातों और घूंसों की आंधी से
आप भी हो सकते हैं परेशांन

अपने मोबाइल का सही से उपयोग कीजिये
और चैन से ज़िन्दगी का मज़ा लीजिये
वर्ना मुसीबतों का जो तूफान आएगा
इसका अंदाज़ा भी नहीं लग पायेगा


- रवींद्र कुमार शर्मा


*****