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हुंकार: मिट्टी का मान
सुनो विश्व के सौदागरों, यह भारत की परिपाटी है,
यहाँ रक्त से अधिक पवित्र, हमारे देश की माटी है।
सिंहासन के गलियारों में, जो समझौते मुस्काते हैं,
डर है वो मेरे हलधर की, खुशहाली खा जाते हैं।
जो दूध की नदियाँ बहती थीं, उस पर पहरा मत डालो,
पशुपालक के अरमानों पर, तुम अंगारा मत डालो।
गर सात समंदर पार से, 'मक्खन-मिश्री' आएगी,
तो मेरे घर की कामधेनु, भूखी ही रह जाएगी।
विदेशी चकाचौंध में तुम, निज गौरव को मत भूलना,
मजदूरों की सूखी थाली, और निवाले को मत तौलना।
व्यापार बढ़ाओ शौक से तुम, पर इतना ध्यान रहे,
परदेशी ऊँची दुकानों में, मेरा किसान न मौन रहे।
मर्यादा कहती है शासन, जन-जन का अभिलाषी हो,
न कि नीति कोई ऐसी हो, जो खुद ही गला-अधिशासी हो।
तर्क दिए जाएंगे तुमको, कि 'विकास' की ये सीढ़ी है,
पर पूछो उन बूढ़ी आँखों से, जिनकी दाँव पर पीढ़ी है।
रूस की दूरी, तेल की मजबूरी, तुम भले बताते हो,
पर लागत की उस आग में, तुम किसको झुलसाते हो?
जब पसीना गिरता धरती पर, तब अंबर झुकता है,
जब किसान खड़ा हो अड़कर, तब हर चक्का रुकता है।
उठो लेखनी! धार बनो, तुम सत्य का उद्घोष करो,
संसदीय सीमाओं में रहकर, प्रखर विमर्श का घोष करो।
न हार चाहिए, न वार चाहिए, हमें न्याय का साथ चाहिए,
मेरे देश के अन्नदाता के, सिर पर सुख का हाथ चाहिए।
सत्ता की ऊँची मेजों पर, बस इतना याद रहे,
भारत तब तक ही भारत है, जब तक किसान आबाद रहे!
खेतों से संसद तक गूँजे, यह स्वर बड़ा प्रतापी हो,
जन-गण-मन के इस आँगन में, श्रम का मोल प्रतापी हो।
- देवेश चतुर्वेदी
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स्मृतियों की राह
कविता नहीं है राख का ढ़ेर
भीतर थोड़ा भीतर तक भरी हैं चिंगारियाॅं
उन्हीं से बनी रहती है गर्माहट विचारों में
कमतर नहीं होती हैं उड़ानें आर-पार की
वे जाती हैं और ले जाती हैं सभी को
ऊॅंचाइयों के पार,बादलों-दीवारों के पार
कठिन ज़रुर है स्मृतियों की राह में कविता
मगर असंभव का संभव है कविता ही
और कविता का बेहतर संभव है मनुष्यता
जबकि संभव के असंभव में कार्रवाई
कविता काम नहीं,ज़रा नहीं फ़ुरसत का
वह वही रोज़मर्रा की उधेड़बुन,उलझनें
मिले छुट्टी, तो मिले कविता।
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और कविता में आग
काॅंटों की तरह चुभते हैं शब्द
बाद उसके तड़पते हैं कविता में आने को
होते नहीं हैं,मिलते नहीं हैं रास्ते यूॅं ही
काटना ही पड़ते हैं पहाड़ और जॅंगल
ऊॅंचाइयों से उतरना होता है नीचे और नीचे
तब कहीं जाकर बनता है,मिलता है रास्ता
और कविता में आग।
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जड़ें वे ही छूती हैं
ज़रुरी है हवा और धूप
और बेहद ज़रूरी है सीनों में आग
इन चीज़ों से ही मिटती है फफूॅंद सब
और यह-वह अनपेक्षित सीलन भी
सदियों से संदूक-बंद तमाम शब्दों की
ज़मीन भी मिलती है तो इन्हीं चीज़ों से
जड़ें वे ही छूती हैं हर हाल बुलंद-आसमान
जो गड़ी हों ज़मीन में।
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टकराती हैं लहरें
चट्टानों से टकराती हैं लहरें
नदियाॅं लाती हैं जिन्हें मीलों दूरी से
तय करते हुए निष्ठा और निरंतरताऍं
अभी है और अभी है नहीं कुछ भी जैसा
चलता नहीं है प्रेम और युद्ध में कभी भी
ज़रुरी होता है सिर्फ़ ख़ुद का ज़िंदा होना
ज़िंदा होने का सबूत चाहिए भरपूर बस
हाथ हैं साथ तो पाॅंव भी चलना चाहिए
अंतिम नहीं होता है कुछ भी।
- राजकुमार कुम्भज
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शमशान
हो गया आज फिर,
एक और देहावसान,
लोकलाज से कोई,
तो कोई कर्तव्य बोध से,
जा रहा था शमशान।
चेहरों पर थी शिकन,
आवाज़ थी दबी-दबी,
पिला रहे थे सब एक दूजे को ,
बस दुनियादारी की घुट्टी,
बाँट अध्यात्मिकता का ज्ञान।
जाने बाले को सब कह रहे थे,
था आदमी बड़ा अच्छा,
बस ये ही एक कमी थी,
लेकर संज्ञान किसी बात का,
बाकी तो ये था महान।
सुन रहा था मैं,
और हो रहा था हैरान,
जीते जी तो इसके किसी ने,
इसको कहा नहीं अच्छा इंसान।
काश ! जीते जी इसके कोई कहता,
अच्छा नहीं तुमसा कोई,
तो जाता क्यूँ इतनी जल्दी,
कर लेता कुछ और कर्म महान।
खैर हो गया कपालमोचन,
डाल सब चन्दन,
बिल और आम की लकड़ी,
घर की राह हो अग्रसर,
चार कदम चल भूल गये,
अपने अध्यात्मिकता के ब्यान।
चल पड़ी फिर वही,
रास्ते, खेत और हिस्सों की बात,
दिनभर दुनियादारी करते,
रात को इक्कट्ठे हो सुनाते वही जज्बात,
किसी सर्वज्ञा समान।
बीत गये दिन दस तेरह,
अब फिर वही सब मेरा, क्या तेरा ?
कोर्ट कचहरी पेशी,
बैंक, पैसा,उत्तराधिकारी,
बकील,पटवारी, हिस्सेदारी,
और वही नफे नुक्सान की दुकान।
इसी उहापोह में हो जाएगा,
फिर एक और देहावसान,
दोहराई जायेगी कहानी यही,
बीतेंगे चंद दिन दिखावे के शोक में,
भूल जाएगा एक दिन यहाँ से है जाना,
भगवान् से भी बड़ा,
ये महान इंसान
- धरम चंद धीमान
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साहित्य समर भूमि में वीरों
आपका स्वागत है,
बज चुकीं रणभेरी शब्दों की
हुआ चहुंओर शंख नाद है,
कलमकार बने हुए हैं सेनापति
कविता के महाभारत में
नेतृत्व करते अपनी सेना का
काव्य के चक्रव्यूह में,
पाञ्चजन्य बज चुका है देखो
महारथियों ने शस्त्र ताने हैं,
तोड़ने को काव्य चक्रव्यूह को
योद्धा रण में कूदे हैं,
सामना कर हैं बीर पराक्रमी,
रण कौशल दिखाते हैं,
शब्दों के भाले फेंक रहे हैं
काव्य के धर्म युद्ध में,
कोई चलाता है देखो आग्नेयास्त्र
कोई वरुणास्त्र चलाता है,
कोई प्रकट करता है प्यारा ब्रह्मास्त्र
कोई मंत्र भूल जाता है,
कोई चलाता है नारायण अस्त्र,
कोई शरण में जाता है
कलम प्यासी हुई स्याही की,
लड़खड़ाने को विवश है,
लिखा जाएगा इतिहास सभी का
कलमकार ने मन में ठाना है,
नायक बन कर उभरूं रण में
योद्धाओं ने कसमें खाई है,
समय का पहिया घूम रहा है
देता यहाँ चकफेरी है
शब्दों के कुरूक्षेत्र में आज
सबकी नजरें टिकी है
पूछता धृतराष्ट्र ! संजय से बताओ
क्या किया आज बीरों ने।
- बाबू राम धीमान
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लोगों को अजनबी होते हुए देखा है
हमने रिश्तों को अजनबी होते हुए देखा है
हमने भाई भाई को जमीन जायदाद
के लिए अजनबी होते हुए देखा है
जो कभी बरसों से एक ही थाली में
खाये,पिये एक ही साथ खेले कूदे
एक ही साथ पले बढ़े।
हमने बहनों को भी शादी के बाद
अजनबी होते हुए देखा है जो कभी
घर के तिजोरी की मालकिन हुआ
करती थी।
हमने उन अभागे बहु बेटी को अपने
सास और ससुर की छोटी छोटी रोक पर
अपने परिवार से अजनबी होते हुए देखा है।
हमने पति पत्नियों को अदालत में
एक दूसरे से हमेशा हमेशा के लिए
अजनबी होते हुए देखा है।
हमने अपने स्कूल कॉलेज के दोस्तों को
हमेशा हमेशा के लिए
अजनबी होते हुए देखा है।
हमने अपनी ही परछाई को भी
अजनबी होते हुए भी देखा है।
हमने उन सुंदर शरीर को
कब्र में अजनबी हुए भी होते
हमने उन औलादों को भी देखा
है जो अपने मा बाप को
वृद्धा आश्रम में भेजते हुए देखा है।
हमने एक ही अंगन को
पड़ोसी होते हुए देखा है ।
हमने अपने ही मिट्टी को बंगला देश
और पाकिस्तान होते हुए देखा है।
- सदानंद गाजीपुरी
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मेरा आदर्श शिक्षक
मेरा शिक्षक मेरी पहचान,
शिक्षक जो ना होते तो पूरी दुनियां
अज्ञान के अधेरे में रहते।
लोग की सद बुद्धि अज्ञान
दलदल में फंस कर रह जाते।
न कोई शिक्षा मिलता,
न कोई उच्च संस्कार मिलता।
सही मार्ग दर्शन नही मिल पाता।
शिष्य अपना अस्तित्व खो बैठता।
शिष्य अपना लक्ष्य नही बना पाता शिक्षक बिना।
जीवन की सफलता निर्धारित नही कर पाता शिक्षक बिना।
शिक्षक बिना विज्ञान कौन बताता।
चांद सूरज, उदय अस्त, प्रकाश अंधेरा,
रात दिन, सबकी जानकारी कौन देता।
भूगोल पृथ्वी, जल, वायु अग्नि आकाश
धरती सबकी जानकारी शिक्षक बिना असंभव।
समाजिक प्रक्रिया हड़प्पा संस्कृति
परम्पराओं, संविधान, मौलिक अधिकार,
कर्त्तव्य पालन आदि शिक्षक बिना असंभव।
किताबे हमे ठेर सारा ज्ञान देती।
पर शिक्षक बिना ज्ञान कौन प्राप्त करवाता,
यहां शिक्षक बिना असंभव।
ऋषि मुनि, साधु संत, कबीर दास, तुलसीदास,
रामचरित्र मानस, भागवत गीता, वैध पुराण,
कथा, ग्रंथ इतिहास शिक्षक से ज्ञान प्राप्त हुआ।
शिक्षक बिना असंभव हैं,
यहां शिष्य को संसार में बहुत सम्मान प्राप्त करवाते।
शिक्षक जो न होते तो जीवन का ज्ञान दर्पण नही देख पाते।
- सुजाता चौधरी
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प्रेम में प्रमाण कैसा
मत पूछो मुझसे प्रेम का अर्थ,
वह शब्दों में बँधता नहीं,
जो साँसों में मद्धम मद्धम
दीप सा जलता है! कहता नहीं।
तुम हो
जैसे साँझ में थिरकती छाया,
जिसे न छू सकती हूँ,
न खो सकती हूँ।
दृग के कोरों पर जो ठहर गया
वह अश्रु नहीं पहचान है,
मेरी मौन वेदना का
एक अकाट्य -सा प्रमाण है।
प्रीत में वचन कैसे लिखूँ,
जब स्वयं ही शेष नहीं,
मैं तो बिखरकर तुम्हारी स्मृति में
धीरे-धीरे विलीन हुई कहीं।
न राधा होने की चाह रही,
न कृष्ण तुम्हें कह पाई,
इन नामों से परे कहीं
मेरी आत्मा ने तुम्हें पहचाना,
और चुपचाप अपनाया।
अब न हार का कोई विषाद,
न जीत की कोई आकांक्षा है,
अब मेरी परछाई भी मेरी नहीं ,
जो बचा वह तुम्हारी छाया है।
मैं हूँ, या नहीं यह प्रश्न नहीं,
अब ‘मैं’ से मेरा कोई नाता नहीं,
तुम्हारी स्मृति की दीपशिखा में
मेरा अस्तित्व भी मौन हो गया।
- सविता सिंह मीरा
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उम्मीद की जीत
चार फ़रवरी संदेश लाया,
जीवन का सच हमें समझाया।
कैंसर केवल रोग नहीं,
हिम्मत ने जिसको मात सिखाया।
डर को छोड़ो, जागो आज,
समय पर जाँच बने अंदाज़।
संवेदना संग साथ बढ़ाएँ,
तभी सुरक्षित होगा हर समाज।
विश्व कैंसर दिवस यही पुकारे,
जागरूकता जीवन को निखारे।
साथ, सहारा और विश्वास से,
हर अंधियारा उजियारा हारे।
- डॉ. सारिका ठाकुर 'जागृति'
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जब हम दुनिया, परिस्थितियों या
लोगों को बदलने की ज़िद छोड़कर
अपने भीतर झाँकते हैं,
तभी असली सकारात्मक बदलाव जन्म लेता है।
स्वयं को बदलना कठिन है-
क्योंकि वहाँ कोई दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
पर वहीं से शक्ति शुरू होती है।
जैसे ही दृष्टि बदली,
वैसे ही सृष्टि बदलने लगती है।
जो भीतर घटा है, वही बाहर प्रकट होगा।
- नरेंद्र मंघनानी
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मेरी हर कविता के मौन में
तुम्हारा नाम सांसे लेता है,
मैं जो कुछ भी लिख पाती हूँ
वो तुम्हारी दी हुई रोशनी से ही चमकता है।
जब दुनिया ने सिखाया
झुक कर चलना, बिक कर जीना,
पर तुमने सिखाया सीधे खड़े रहकर सच कहना।
मेरी कलम किसी स्याही की मोहताज नहीं,
वो तुम्हारी नीयत की पवित्रता में डूबी हुई है,
हर अक्षर में तुम्हारी ईमानदारी धीरे-धीरे उतर आई है।
मैं हर रोज़ इस बेईमान भीड़ में
खुद को बचाने की कोशिश करती हूँ,
और हर रोज़ तुम्हारी तरह
थोड़ा और सच्चा होना सीखती हूँ।
अगर मेरी कविता किसी के दिल को छू जाए,
तो समझ लेना ये मेरा हुनर नहीं,
ये उस इंसान की देन है
जो बिना शोर किए पूरी दुनिया से बड़ा निकला।
तुम सिर्फ़ मेरी कविता का आधार नहीं,
तुम वो विश्वास हो जिस पर मैं
खुद को दोबारा लिख पाती हूँ।
- आरती कुमारी
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ग़ज़ल
वक़्त मुश्किल जब भी मुझपर आ गया,
ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा समझा गया।
आप मेरी ज़िन्दगी से क्या गए,
धड़कनों का शोर भी थम सा गया।
रात भर अब नींद भी आती ही नहीं,
सिलसिला ख़्वाबों का भी टूटा गया।
लौट कर आया नहीं वो फिर कभी,
ज़िन्दगी से वो मिरी ऐसा गया।
बन गया जैसे ख़ुदा अब आदमी,
क्या हुवा इसको के ये बौरा गया।
उससे उम्मीदे वफ़ा रखते हो क्यूँ,
हक़ जो अपने भाई का ही खा गया।
सब परिंदे उड़ गए हैं पेड़ से,
ऐ "अदा" कैसा ज़माना आ गया।
- डॉ. ओरीना अदा भोपाली
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ऐ फरवरी,
तू आ गई,
याद उसकी ला गई
कहाँ उससे अब
मुलाकात होती है?
हर क्षण
परिस्थितियों से
सवालात होते हैं
वक्त-बेवक्त बस
उसकी याद होती है
ना कोई गिला,
ना कोई शिकायत
याद में उसकी
अब दिन से रात होती है।
- राघवेंद्र प्रकाश 'रघु'
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कहानियां
अमीरों और धन कुबेरों के किस्से कहानियां,
धन बल बाहुबल के बल पर बनती कहानियां।
आमजन को उद्वेलित करती कहानियां,
आमजन के सोच समझ से बाहर की कहानियां।
मन के भावों को दरकिनार करती कहानियां,
अय्याशियों को अहमियत देती कहानियां।
इक दूजे के काले राज़ छिपाए ये कहानियां,
समय पर ब्लैकमेल का तीर चलाती कहानियां।
मजबूरी लाचारी अय्याशी बयां करती कहानियां,
स्वहित साधती अनसुनी अनकही कहानियां।
कई षडयंत्र शोषणों का पर्याय बनती कहानियां,
एप्सटिन फाइल समेटे हैं खुद में ऐसी कहानियां।
- राज कुमार कौंडल
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केहड़ा बुढ़ापा आई
केहड़ा बुढ़ापा आई गया,
सबकुछ अपणा गवाई लया!
स्याहियां बणाई, बेची कन्ने,
पैसे चार कमाई गया,
अप्पूं पढ़ेया, होरबी पढ़ाये,
बड्डे बणाये कोई फौरना पुजाये,
अप्पूं मंगता बणी गया!
केहड़ा बुढ़ापा...
कुक्कड़ झांगांने उठी-२,
सिरापर टोकरियां चक्की-२
सब्जियां ल्यांदी,
बेची पैसे कमाई गया,
होरनी जिंदगी बणाई गया,
कने अपणी जालां च फंसाई गया,
अप्पूं मंगता हुईओ गया।
केहड़ा बुढ़ापा...
नेक बनेकी नौकरियां कित्तियाँ,
धन कमाया अपणे वजना ते ज्यादा,
लाले होरीं जो बणाई गया
कने, अप्पूं जो लाल्ले पाई गया।
केहड़ा बुढ़ापा...
बकरे, अपणी जान गंवाई,
खाणे औल्यांजो मजा भीं नी आया,
सबनी री मौजां लाई गया,
कमाईंयां अपणी गंवाईं गया।
अप्पूं फेरी पछताईं गया।
केहड़ा बुढ़ापा...
मना रियां मना बिच रही ओ गईयां,
हुण मंगणे ते बी डर लगदा,
मन मंगणे जो बी नी करदा।
केहड़ा बुढ़ापा...
लिखदा -२ रहीओ गया,
अज्ज गांदा गांदा बी थकीओ गया।
मन अपणा मनाई लया ,
सबनी कर्जा चुकाई गया।
सोची सोची दौड़ लगाईरी,
जीवन सफल बणाई लया,
बुढ़ापा बी मौजां लाईओ गया।
केहड़ा बुढ़ापा...
- बृज लखनपाल
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सच के दर्पण- एप्सटीन फाइल्स
जो बाहर से दीख रहा हो,
पूर्ण सत्य अब होता है ?
जब नकाब खिंच जाता तब,
चेहरा असली होता है।
सद्चरित्र का छद्म मुखौटा,
हर कोई आज पहन बैठा।
हंस जमात में आज सैकड़ों,
बगुला घुसकर है बैठा।
नाले के कीड़े-सी गन्दगी,
दिमागों में ये भरे रहे हैं।
हज जाने वाले बागर-बिल्ले,
सौ चूहे खाये पड़े हैं।
जो ऊँचे रसूख हैं रखते,
काम नीच कर जाते हैं।
मानव की मर्यादा पर भी,
प्रश्न खड़े कर जाते हैं।
इज्जतदारों की इज्जत ही जब,
देखो तार-तार हो जाय।
इनके लिए सहज है सबकुछ,
तनिक शरम न इनको आय।
सत्ता का सिंहासन भी अब,
कीच से होकर जाता है।
साधु के कपड़े लटकाकर,
खल-कामी मुस्काता है।
जो भी हम छुप कर हैं करते,
समय देखता रहता है।
अवसर उचित जानता है जब,
भेद खोलता रहता है।
शर्म-लाज-भय परे हटाकर,
कर्म करेगें जब नाना।
पीछे इन सबसे बचने का,
ढूंढेंगें हर-एक बहाना।
सबके कुछ अपने अतीत हैं,
सबकी है मर्यादा।
सब ने थोड़ा पर छोड़ा है,
कुछ की है कुछ ज्यादा।
इसी जनम में कर्म तुम्हारे,
तुमको ढूँढ ही लेगें।
सच के दर्पण जब बोलेंगे,
छुपे राज खोलेंगे।
- प्रीतम पाठक
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पैसा
वस्तु विनिमय का तुम माध्यम हो
हरेक इंसान की तुम जरूरत हो
तेरे खातिर सब उलझते है
तुझे तिजोरी में संजोकर रखते है
तेरे सुरक्षा में ताला लगाते है
पैसा, तुम तो ठाठ से रहते है
हमसब तेरे अर्जन के वास्ते
भाई-भाई तो दोस्त के आये रास्ते
तोड़े परिजन, छोड़े अपनै रिश्ते
मुझे चाहिए पैसा और सिर्फ मुझे
मेरे अलावा और न कोई सूझे
अति से अति हो पैसा, मेरे पास
टीके ना रहे कोई, मेरे आस-पास
सर्वश्रेष्ठ माना जाऊं, मैं धनवानों में
ख्याति चूमे मेरे,आसमानों में
ऐसे ही विकृति ला देती है पैसा
सचमुच में इंसान की
ऐसी होती है मनोदशा
लेकिन बात ये सत्य ही है
अति बुरी बला वाली कथ्य भी है
कि, अति पैसा तेरा अहंकार बनेगा
गैर छोड़ो, अपने भी तुझे छोड़ेगा
दुश्मनों की संख्या में इजाफा होगी
प्रसिद्धि की नहीं तुझे, मुनाफा होगी
जान की दुश्मन होंगे, बहुत सारे
घर के साथ, खुद के वास्ते लगेगे पहरे
असुरक्षा की भाव में सदा रहोगे
खुद के छाये से भी डरोगे
अतः चुन्नू कवि ये कहते है
जरूरत के अनुसार ही कमाते हैं
मिल-जुलकर सभी रहते है
सुखी संसार व्यतीत करते है
पैसा है जरूरी, ये मानते है
अति हो, ये तो सीधे नकारते है।
- चुन्नू साहा
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