साहित्य चक्र

08 October 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 8 अक्टूबर 2026





बापू की स्मृति

हुआ जन्म गांधी बाबा का
ले रही नीति थी अंगड़ाई।
कर रुदन दिया संदेश लाल ने
गोरी सत्ता भी थर्रायी।

जब से सुध ली थी बापू ने
निज सुख चैन को भुला दिया।
आत्मनिर्भर हिन्द बने तब
खादी का चरखा चला दिया।

लकुटी वाले गाँधी के
चरखे की लीला न्यारी थी।
अपराजेय जो शक्ति सुनो
चरखे के आगे हारी थी।

चर्चिल था महा ज्ञानी
न बापू को समझ पाया।
फटी धोती में पहुंचे शख्त
को वह देख घबराया।

करो कुछ या मरो तुम सब
ये बापू ने थ बतलाया।
समर्पण खुद का कर फिर
हमें आजाद करवाया।

- करन सिंह "करुण"


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दानव

सब चाहते हैं मैं रहूं इस मोबाइल फोन से दूर,
पर जो कहते हैं ये वो इसके मज़े लेते भरपूर।

इक कमरे में रहते हैं मम्मी पापा भाई बहन,
छत होती एक मगर होते इक दूजे से कोसों दूर।

सब चाहते हैं मैं रहूं इस मोबाइल फोन से दूर,
पर रहूं क्यों कैसे क्या है इसका फोन का कसूर।

जो कहते हैं फोन छीन लेता है आंखों का नूर,
वो भी खुद नहीं रह पाते इससे पल भर दूर।

सबको देखा देखी में इससे नहीं रह पाता हूँ दूर,
हर काम होता आसान इससे फिर कैसे रहूं दूर।

जग भर के हंसते खेलते गाते खिलौने होते,
मेरी उंगलियों पर हरपल ये नाचते भरपूर।

जो कहते थे ज्यादा मत देखो इस फोन को,
उनकी याद आती है जब दिखता नहीं पास दूर।

चिड़चिड़ा अड़ियल क्रोधी सा स्वभाव हो गया,
मन चाहता रहूं अब अकेला सारी दुनिया से दूर।

देर बाद समझ आया,समझा जिसको अपना,
वो था दानव एक जिसने मुझे सबसे किया दूर।

- राज कुमार कौंडल


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दो महापुरुष

दो ज्योतियाँ जगी थीं, भारत के भाल पर,
एक राह सत्य की, एक स्वाभिमान पर।

एक ने अहिंसा से, तोड़ा था अहंकार,
दूजे ने अभावों में, दिया था ललकार।

गांधी का जंतर था,अंतिम जन का कल्याण,
शास्त्री का नारा था जय जवान,जय किसान!

दे गए विरासत में, जो सादगी का विचार,
क्या रख पाए हैं हम, उसका तनिक भी सम्मान ?

केवल तस्वीरों पर, माला पहना देना,
या दो अक्टूबर को, छुट्टी मना लेना।

क्या यह कृतज्ञता है, या रस्म की मजबूरी?
बातों में तो प्रेम है,लेकिन कर्मों में है दूरी!

छोड़कर आडंबर, अगर नीति को अपनाएँ,
सत्य और सादगी को, जीवन में ले आएँ।

तभी दूर होगी यह, मन की औपचारिकता,
तभी सच्ची श्रद्धांजलि, पाएगी यह भव्यता।

- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़


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लाल गुदड़ी के- लाल बहादुर

लाल, गुदड़ी के लाल,
हमारे प्यारे लाल बहादुर।
बापू के विचारों का
था उन पर गहरा प्रभाव।
स्वतंत्रता संग्राम में
गए जेल, आजीवन सहा अभाव।

देश का आत्मसम्मान बचाया,
आत्मनिर्भरता का दिया मंत्र।
झुके नहीं किसी शक्ति के आगे,
रहे सिद्धांतों पर सदा अडिग।
हमारे बीच से निकले थे वो,
हमारे ही दिल में रह गए।

भारत रत्न, देश के गौरव,
देश की आन, देश की शान,
गूँजा उनका अमर नारा-
“जय जवान, जय किसान।”
सादगी से भरा रहा जीवन,
त्याग-तपस्या बनी पहचान।

आज उनकी जयंती पर
करें हम उन्हें शत-शत नमन।
देश के इस सच्चे सपूत को
बारंबार नमन-वंदन।

- रोशन कुमार झा


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गाँधी-शास्त्री जयंती

दो अक्टूबर गाँधी शास्त्री का है जयंती
देश को आजाद कराने हेतु किये थे क्रांति
भारत के जन जन के है दोनों प्यारे
एक थे बापू तो दूसरे थे नन्हे हमारे।

गांधी जी के मुख में था सदैव हे राम
तो शास्त्री जी के कथन थे जय जवान जय किसान
दोनों को ही देश के प्रति लगाव था
जाति पाति से कोई भी नही भेदभाव था।

गाधी जी थे सत्य और अहिंसा के पुजारी
तो शास्त्री जी थे सादा जीवन उच्च विचार धारी
सुचारू रूप से चले ये हमारा देश
मन में कोई किसी से ना रखे क्लेश।

सत्य अहिंसा के पथ पर देश हो अग्रसर
देश की तरक्की रहे उन्नत शिखर पर
ऐसे ही भावना रखे थे वे मन में दोनो
कोई भी टकराहट ना हो अपने ही अपनों।

आपसी भाईचारे बनाकर रहे समस्त देशवासी
किसी के घर में ना रहे कोई उदासी
उन दोनों महापुरुषों के याद में हरेक वर्ष
धूमधाम से जंयती मनाते हैं पूरे भारतवर्ष।

भूलना नही चाहिए हमे उनके बलिदान
चुन्नू कवि यही है सबो से आह्वान
गांधी जैसा शास्त्री को भी मिले सम्मान
तब फिर कहलायेगा मेरा भारत है महान।

- चुन्नू साहा


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पेपरों का खौफ

सितंबर चला गया, अक्टूबर आ गया,
सितंबर के महीने की बात बताता हूँ,
मैं आपको मेरी पेपरों की कहानी सुनाता हूँ...

किताबों से दूर मैं भागता रहा,
पढ़ाई के नाम से मुँह मोड़ता रहा।

मम्मी ने घुमा के एक चाटा लगाया,
तब जा के पढ़ने का ध्यान आया।

चाटा पड़ते ही पढ़ाई का भूत जाग गया,
और मन में किताबों के प्रति प्यार आ गया।

मम्मी से बोला- "एक बात बताता हूँ,
पढ़ाई क्यों नहीं पसंद, ये राज़ सुनाता हूँ।

मैथ्स में जब से ये ए-बी-सी-डी आई है,
तब से तो मेरी बुद्धि ही चकराई है।

साइंस और संस्कृत भी पल्ले नहीं पड़ती,
इन किताबों के आगे मेरी हिम्मत हारती।

अब तुम ही बताओ माँ, क्या उपाय करूँ?
इन कठिन विषयों से मैं कैसे पार लगूँ?"

मम्मी हँसी और बोली- "घबराता क्यों है प्यारे,
मेहनत करेगा तो हल होंगे उलझन सारे।

रोज़ थोड़ा-थोड़ा पढ़ेगा तो समझ में आएगा,
तू हिम्मत रखेगा, तो टॉपर बन जाएगा।"

- साहिल पांचाल


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क्या दूर क्या नजदीक कभी फासला नहीं देखा,
कितना हुआ पस्त कभी हौसला नहीं देखा।

कोई था दिल में जिसके लिए आता रहा बार-बार,
कभी रात नहीं देखा कभी रास्ता नहीं देखा।

टांग दी तेरी खातिर सलीब पर जिंदगी अपनी,
तुझे अपना कहने की खातिर कोई वास्ता नहीं देखा।

तुम्हारे दिए कोई भी वादे आज तक मुकर्रर नहीं हुए,
जिस तरह तुम मुकरे वैसा कोई मुकरता नहीं देखा ?

अपना भी कहा फिर दुनियादारी भी कह दी,
बाप का दिया हौसला और माँ की दुआ नहीं देखा।

कुछ तो वादा किये रहे होंगे अपने माँ बाप से तुम,
विकास माँ बाप ने चेहरा देखा तेरा मुखौटा नहीं देखा।

- राधेश विकास


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सबको साथ लेकर चलें

यह ख़याल बहुत अच्छा है।
लेकिन साथ लेकर चलना
सिर्फ लोगों को साथ रखना नहीं है,
बल्कि उनके स्वभाव, विचार,
गति और गलतियों को भी
साथ लेकर चलना है।

और फिर परिणाम…
हमेशा हमारी इच्छा के
अनुसार नहीं आएँगे।

कभी तेज़ी से ऊपर,
कभी अचानक नीचे…
बिल्कुल सेंसेक्स की तरह!

इसलिए यदि हम
साथ चलने का निर्णय लेते हैं,
तो हमें परिणामों के
इन उतार-चढ़ावों को भी
धैर्य और विश्वास के साथ
स्वीकार करने की तैयारी रखनी होगी।

क्योंकि नेतृत्व का असली अर्थ
सबको अपनी गति से चलाना नहीं,
बल्कि अलग-अलग
गति से चलने वालों को भी
एक दिशा में बनाए रखना है।

और शायद यही वजह है कि,
अकेले चलने में परिणाम
जल्दी मिल सकते हैं,
लेकिन सबको साथ लेकर चलने में
एक ऐसी यात्रा बनती है,
जिसकी मंज़िल से ज्यादा
उसका साथ याद रहता है।

- नरेंद्र मंघनानी


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कौन हो तुम ?

जो मेरी तरफ़ इस तरह देख रहे हो,
सिर्फ़ देख ही नहीं रहे हो
आँखों की पुतलियों को भी घूमा रहे हो

मैं सोच में पड़ गया
और सोचता ही रह गया
क्या मुझे ?
इनके प्रश्नों के जबाव देने चाहिए,
यदि हाँ तो क्यों?
मैंने कहा-
मैं कोई तमाशबीन नहीं,
मैं कोई मुसाफ़िर नहीं,
बंधुआ मजदूर भी नहीं
फिर मुझसे ऐसे सवाल क्यों?

मैं तो तेरी गोदी में पला हूँ,
तेरे आँचल में खेला हूँ,
तेरी छाया में बैठा हूँ,
और तो और मैं तुम्हें अपना
कहता भी आया हूँ,मानता भी आया हूँ,

फ़िर ख़्याल आया कि -
ये बेचारी तो पूछती ही नहीं
बल्कि परखती भी है
और परखना भी चाहिए
आख़िर कोई कैसे विश्वास करें ?

मैंने नज़रें झुका ली-
और एक शब्द भी नहीं कहा,
मैंने जवाब देना भी उचित नहीं समझा
मेरा मौन ही मेरा जवाब था

उसने मेरी तरफ़ देखा-
कनखियों से मेरे हावभाव को परखा
और कहा-
शायद मैं लोगों को पसन्द ही नहीं हूँ।

- बाबू राम धीमान


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गांधी कहाँ हैं ?

आज भी गाँधी दिख जाते हैं,
देश के नोटों पर।
मेडिकल कॉलेज, सेतु, विद्यालय,
थाना, घाट या फिर कोर्ट में।

या फिर नेताओं के नारों में,
उनकी आदम कद मूर्ति,
संभालती ट्रैफिक, चौराहों पर।
विदेशी मंचों पर,
या फिर फ़िल्म के किरदारों में।

नाम उनका बेचा जा रहा,
उनके ही नाम से-
कहीं सत्ता की सीढ़ी के लिए,
कहीं अपनी पहचान के लिए।

उनकी तस्वीर सबको चाहिए,
पर उनके विचार कितनों को?
उनका नाम सबकी ज़ुबाँ पर,
पर उनके रास्ते पर कितने हैं ?

आज भी गाँधी दिख जाते हैं-
हर उस जगह,
जहाँ उनका नाम
काम आ सकता है।

सब कुछ हासिल किया तुमने,
क्या कभी समाज के अंतिम
पंक्ति की अंतिम व्यक्ति से मिले हो,
या फिर उनके विचारों को बस
यू ही ताबीज बना कर पहन रखा है।

- रोशन कुमार झा


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ओह! साबरमती का संत
तूने कैसे कर दिया कमाल...
देश को अंग्रेजों से आजाद कर
तूने कैसे मचा दिया धमाल...
हाथ में लाठी, तन पर धोती
मुख में अहिंसा, स्वराज का नारा...
अंग्रेजों को बुद्धि-विवेक से मारा...
ओह! साबरमती का संत
तूने कैसे कर दिया कमाल...


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गांधी होना आसान नहीं है
क्योंकि गांधी होने के लिए
सिर्फ एक धोती में रहना होगा
अहिंसा परमो धर्म कहना होगा
और पूर्ण स्वराज लेना होगा
नफरतों को हराने के लिए
प्राणों का त्याग देना होगा
हे राम हे राम कहना होगा

- दीपक कोहली


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ग़ज़ल

​हम-सफ़र जो साथ थे, उस कारवाँ को क्या हुआ,
आँधियों के दौर में, अमन-ओ-अमाँ को क्या हुआ।

​चुप खड़े हैं सब यहाँ, ख़ामोशियाँ ही ख़ामोशियाँ,
गूँजती थी जो कभी, उस बेकरारी को क्या हुआ।

​फूल भी मुरझा गए, और पत्तियाँ भी झड़ गईं,
रब जाने आज इस, हँसते चमन को क्या हुआ।

​दर्द का आलम तो देखिए,आँख भी नम न हुई,
ज़िल्लतों के शहर में, मेरे गुमाँ को क्या हुआ।

​बात जो दिल में छुपी, होंठों पे लाते ही नहीं,
मुश्ताक़ तेरी, शोख़ी-ए-ज़बाँ को क्या हुआ।

- डॉ. एमए शाह


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शायद योजना कुछ और थी…
हर प्रयास का परिणाम
हमारी इच्छा के अनुसार नहीं हो सकता।
कभी हम असफल होते हैं,
कभी अपने ही निर्णयों से निराश होते हैं,
और कभी परिस्थितियाँ
हमारी बनाई हुई सारी योजनाओं को
एक ही पल में बदल देती हैं।
लेकिन शायद जीवन का अर्थ
हर बार वही पा लेना नहीं है,
जो हमने चाहा था।
कभी-कभी न मिलना भी एक संदेश होता है,
रुक जाना भी एक दिशा होती है,
और असफलता भी किसी बड़ी सफलता की
तैयारी कर रही होती है।
इसलिए जो हुआ, उसे स्वीकार कीजिए,
जो नहीं हुआ, उसके लिए स्वयं को दोष मत दीजिए,
और जो सामने है, उसमें पूरी शक्ति से जुट जाइए।
क्योंकि जीवन में हर रास्ता
मंज़िल तक पहुँचाने के लिए नहीं होता...
कुछ रास्ते हमें बदलने के लिए भी होते हैं।
शायद हमारी योजना छोटी थी,
और उसकी योजना हमसे कहीं बड़ी।

- नरेंद्र मंघनानी


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भाई की याद
मेरे भाई की याद मुझे आ रही है,
उसकी फोटो देखकर उसकी बातें भी दिमाग में छा रही हैं,
मेरे भाई की याद मुझे आ रही है।
कुछ बातें और कुछ यादें आज मुझे आ रही हैं,
अब मेरे को मेरे भाई की याद सता रही है।
आओ, कुछ बचपन की बातें बताता हूँ,
उसकी याद मुझे आज क्यों आ रही है... मैं आपको सुनाता हूँ।
जब भी मैं उदास होता था,
वह झट से हँसा देता था
और मेरे चेहरे पर फट से मुस्कान ला देता था।
और उस मुस्कान में मैं सारी उदासी भूल जाता था
और झट से ही खुश हो जाता था।
आज उससे बातें करने का मन कर रहा है मेरा,
अब मैं उसको फोन मिलाऊँगा,
और बचपन की उन मीठी यादों को ताज़ा करके
एक बार फिर अपने बचपन की दुनिया में लौट जाऊँगा।

- साहिल पांचाल


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अवलोकन

निर्माण कार्य को आगे बढ़ाने के लिए
तुमने बीच में आने वाली
रुकावटों पर ध्यान नहीं दिया।
लगातार बहते रहने के चक्कर में
तुमने रुकना याद नहीं रखा।

तुम सीधे-सादे थे,
तुम सच्चे थे,
और तुम ईमानदार थे, यह सब जानते थे।

तुम अच्छे थे
तुम उदार थे
और तुम सहज-स्वाभाविक थे,
यह सब जानते थे।

हालाँकि यह बेहतर होता
अगर तुम्हें यह एहसास होता कि
सागर की भी सीमाएँ होती हैं
और आकाश की भी अपनी सीमा होती है।

- निर्मल रॉय


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जनता के अधिकार पर, मंडराता अंधकार।
मत की चोरी रोकना, लोकतंत्र का सार।।

आरोपों के दौर में, उठते कई सवाल।
सच क्या है, यह सामने, आए अब हर हाल।।

जनता के मत पर जो, डाले अपनी घात।
लोकतंत्र की पीठ पर, करता है आघात।।

कुर्सी की खातिर यहाँ, बिकने लगे उसूल।
सत्ता मिलते ही हुए, सारे वादे धूल।।

मतदाता को भूलकर, सत्ता में मदमस्त।
जनता जागी एक दिन, सिंहासन हो ध्वस्त।।

जनता के अधिकार को, समझा जिसने माल।
वक्त पड़ेगा एक दिन, होगा उसका हाल।।

मत की चोरी हो अगर, चुप मत रहना आज।
लोकतंत्र की नींव पर, होता गहरा आघात।।

मत का सौदा जो करे, उससे पूछो बात।
जनता के अधिकार की, सौरभ ये है मात।।

चेहरे पर मुस्कान है, भीतर काला खेल।
जनता के विश्वास से, करे रोज़ ही खेल।।

सत्ता के गलियार में, गूँजे झूठे बोल।
जनता के हर प्रश्न का, कौन चुकाए मोल।।

लोकतंत्र के नाम पर, होता जब व्यापार।
जनता के विश्वास पर, होता सीधा वार।।

जनादेश के नाम पर, मत करना व्यापार।
जनता के विश्वास का, रखिए सदा विचार।।

मत की ताकत कम नहीं, मत समझो कमजोर।
एक-एक मत बदलता, सत्ता का हर दौर।।

झूठे दावों से कभी, सच सके नहीं हार।
जनता जब जागे तभी, खुलता पूरा सार।।

मतपेटी की पवित्रता, रखिए सदा महान।
इसमें जनता की बसी, आशा और' अरमान।।

सत्ता चाहे जो मिले, मत का रखिए मान।
जनता के अधिकार से, ऊँचा नहीं विधान।।

आरोपों का दौर है, चारों ओर सवाल।
निष्पक्ष जांच ही करे, सही खुलासा हर हाल।।

देश-विरोधी शक्तियाँ, करतीं अपना काम।
जनता के विश्वास को, करतीं है बदनाम।।

लोकतंत्र की नींव में, जनता का विश्वास।
इसको चोट लगी अगर, कैसे बचे विकास।।

जनता जागे अब यही, सौरभ समय पुकार।
मत की रक्षा से बने, लोकतंत्र दमदार।।

- डॉ. सत्यवान सौरभ


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हरड़ का पुराना पेड़


घर के आंगन में है एक हरड़ का पेड़
बड़ी बड़ी हरड़े लगती हैं बहुत दूर
कई वर्षों से खड़ा एक कोने में
गर्मियों में छाया देता है भरपूर

सर्दियों में कर देते हैं उसकी छंटाई
ताकि धूप आंगन में आ जाए
पुराने पेड़ हो गए धीरे धीरे खत्म
हरियाली तभी बढ़ेगी जब कोई नए पौधे लगाए

बुजुर्ग करते थे बहुत समझदारी का काम
हरड़ भेड़ा और आमला तीनों हैं लगाए
बनता है त्रिफला चूर्ण इन तीनों का
हाजमा हो जाये सही पेट के रोगों से मुक्ति दिलाए

कई पक्षियों का जमघट लगा रहता है उस पर
चिड़ियां तो पूरा दिन चहक चहक कर शोर मचाती हैं
दाना चुगने के लिए उतरती हैं आंगन में झुंड में
अंदर से कोई निकलता है तो झट भाग जाती हैं

शाम होते ही पक्षियों की सुनाई देती हैं आवाजें
खाने के लिए मुंह खोलते चूज़े नज़र हैं आते
पूरा दिन करते हैं इंतज़ार अपनी मां का
चीं चीं की आवाज से पूरा वातावरण हैं गुंजाते

अम्मा बैठी रहती है उस पेड़ के नीचे ब्यूह के ऊपर
रहता है हमेशा उसका रास्ते से आने जाने वालों पर ध्यान
हर आने जाने वाला करता है उनसे खूब बातें
पास आकर करते हैं बात देते हैं सब बहुत इज़्ज़त मान

कभी जमघट लगा रहता था यहां इंसानों का
आंगन भरा रहता था बच्चों और घरवालों से
बुजुर्गों की दमदार आवाजें गूंजती थी जहां
आज दुखी हैं दरवाजे उनपर लटके बड़े बड़े तालों से

वीरान पड़ा है आंगन अब लगे रहते हैं पत्तों के ढेर
लगता है कभी कभी जैसे देख रहा है दूर से आसमान
जा रहे सब धीरे धीरे अपनी भी आएगी बारी एक दिन
सामने कोई नहीं बस दिखते हैं उनके कदमों के निशान

- रवींद्र कुमार शर्मा



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हम जिन्हें राह दिखाने निकले।
लोग वो हमसे सयाने निकले।

बात करते हैं वो शराफ़त की,
लोग जो हद से पुराने निकले।

जो हमारे नहीं तुम्हारे भी नहीं,
आज वो सबके ठिकाने निकले।

वो फिसलना ,वो संभलना उनका,
ये तो सब उनके बहाने निकले ।

हमको अक्सर ही जो मिले तन्हा,
साथ उनके तो ज़माने निकले ।

जो सदाएं थी सभी भूली सी,
लोग फिर उनको सुनाने निकले।

बात सारी वो जानी-अनजानी,
आज फिर सबसे जताने निकले।

- नवीन माथुर पंचोली


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हर अपना अपना नहीं, भ्रम में रहना छोड़ ।
समय पड़े तो देखिए, कौन निभाता जोड़ ।।

रावण को विश्वास था, कुल है पूरा साथ ।
सत्य सामने आ गया, छूट गए सब हाथ ।।

कुंभकर्ण ने साथ दे, निभाया भ्रातृ धर्म ।
सच का स्वर दबा रहा, अधूरा रहा कर्म ।।

सत्य विभीषण ने कहा, सह न सका अन्याय ।
अपनों ने ही त्याग कर, दी उसको तब हाय ।।

साथ खड़ा होना नहीं, बस रिश्ते की बात ।
गलत राह से रोक दे, वह है सच्चा साथ ।।

गलती पर जो मौन रह, कैसा उसका नेह ।
पास रहे सच ना कहे, मन में कैसी हेय।।

परिवार वही आईना, दिखला दे सच रूप ।
गिरने से ही थाम ले, दूर करे हर कूप ।।

सुख में तो सब साथ हैं, दुख में मिले न मीत।
जो विपदा में साथ दे, समझो सच्ची प्रीत।।

भटके पथ पर रोककर, जो दिखला दे राह ।
वही सगा कहलाएगा, वह है सच्ची चाह ।।

रिश्ते केवल रक्त के, होते नहीं महान ।
सत्य, विश्वास प्रेम से, बनता सच्चा मान ।।

समय सभी को परखता, खुल जाता व्यवहार ।
कौन पराया, कौन सँग, होता साफ विचार ।।

अंत समय बस यह समझ, जीवन का निष्कर्ष ।
हर अपना अपना नहीं, सच्चा दुर्लभ हर्ष ।।

- डॉ. प्रियंका सौरभ


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30 September 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 01 अक्टूबर 2026






अस्तित्व का सवाल है

पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ!
गुफ्तगू में मशगूल थीं
एक-ब-एक सुगबुगाते हुए
"नाक" आगे आकर बोलती है
सोशल मीडिया के इस दौर में!
आप सब की उपयोगिता है।
काला-सफेद और रंगीन
"आँख" सब कुछ देखती है
भला-बुरा दोनों ही
"कान" सुनता रहता है
संदेश देने को "जिह्वा" को
हिला-डुला लिया जाता है
और "त्वचा" के स्पर्श से ही
मोबाइल चलाया जाता है
मेरा तो कोई सरोकार नहीं
बस निराकार साँसे देकर
व्यक्ति को जिंदा किए भर हूँ
फिर रोती हुई बोली
तुम सब भी ध्यान मेरा नहीं देते
सुध भी मेरी कभी नहीं लेते
मुझे तो लगने लगा है
कि डार्विन का सिद्धांत!
अब मुझ पर लागू होने वाला है
उपयोगिता के आधार पर
मेरा अस्तित्व ही
जल्दी खत्म होने वाला है
इसलिए सहेलियों तुम सबसे
मेरी आरजू है
कि मेरी इस व्यथा पर
गहराई से विचार कीजिए
मत समझिए कि!
यह मेरी नाक का सवाल है
बस इतना समझिए कि!
यह मेरे अस्तित्व का सवाल है
यह मेरे अस्तित्व का सवाल है

- जितेन्द्र कुमार दुबे


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तुम्हारे छोड़ें हर तीर पकड़े जाएंगे।
तीर की कैसी है तासीर पकड़े जाएंगे।

कल भी मैंने पूछा था और आज भी,
कब जिंदा हुए मरे कब जमीर पकड़े जाएंगे ?

शिकारी के हाथों में पिंजरा दिख रहा है,
जरूर फिर खोड़रों के कीर पकड़े जाएंगे।

तेरा हर ताना बाना सिर्फ तानाशाही है,
जुबान से भले बने हैं फकीर पकड़े जायेंगे।

नफरत के धुएं से सब धुआं धुआं कर दिया,
जिसने की जहरीली समीर सब पकड़े जाएंगे।

पेट भरने की तलाश में मन मर मर गया विकास,
परोसी जिसने जहरीले खीर सब पकड़े जाएंगे।

- राधेश विकास


*****


माना कि आप बहुत बड़े हो, साहब!
मगर चींटी के समान तो हम भी हैं,
अगर तुम! सागर की लहरों जैसे हो,
उसी में बसे निशान तो हम भी हैं,

तुम बरगद की छाँव से बड़े हो
तो छोटी सी घास ही सही,
पर धरती को सींचने में,
एक प्रयास तो हम भी हैं,
माना कि आपकी तूती
बोलती है इस जहाँ में,
मगर झींगुर के समान
आवाज़ हमारी भी तो है,

आपकी गर्जना से गूंजते हैं ,
बड़े बड़े महल-चौबारे,
हमारी टर-टर से ही तो,
गांव की रात आबाद भी तो है।

तूती तो बुलबुल की होती है,
मगर झींगुर तो नींद उड़ाता है
आप तो दिन में सुनाई देते हो, साहब!
मगर हम तो अंधेरों में भी याद आते हैं।

- बाबू राम धीमान


*****


मैं आसमान थोड़ी हूँ

​बिछड़ने का ग़म साफ़ था उसकी नज़रों में,
मुझसे कह रहा था कि मैं बेक़रार थोड़ी हूँ।

तमाम उम्र मैंने नाम ये उसके ही लिख डाली,
ज़बान से अब मुकर जाऊं वो इंसान थोड़ी हूँ।

बड़े ताबा, बड़े रौशन, सपने टूट ही जाते हैं।
सब को दामन में छुपा लूं आसमान थोड़ी हूँ।

दिल ये ज़िद्दी है मेरा अड़ा है उसके आने को,
वो प्यार है मेरा, मैं उसका इंतज़ार थोड़ी हूं।

आया था पल दो पल के लिये चला भी गया,
मैं उसकी ज़िंदगी का आख़री पड़ाव थोड़ी हूं।

आओ बैठेंगे गुफ्तगु होगी "मुश्ताक़" मुस्कुरायेंगे,
वक़्त ही वक़्त है दो पल की मुलाक़ात थोड़ी हूं।

- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह


*****


ब्रांडों की इस दौड़ में, बिकता मन का चैन।
तन पर लाखों खर्च हैं, भीतर खाली नैन।।

किस्तों में जीवन कटा, कर्ज हुआ सरताज।
महँगी गाड़ी ले लिया, छूटा घर का साज।।

दिखने में सब खुशहाल हैं, भीतर गहरा शोक।
सोशल मीडिया पर हँसें, मन में पलता रोग।।

जरूरत से ज्यादा जुटा, फिर भी मन ना तृप्त।
लोभ बढ़े दिन-रात तो, जीवन जाए लिप्त।।

मोबाइल सुख खोजते, रिश्ते हुए अनजान।
पास खड़े अपनों लगे, दूर हुआ इंसान।।

धन की खातिर दौड़ते, सुबह हुई से शाम।
जीवन पूछा एक दिन, मेरा क्या है काम।।

बच्चों को सुविधा मिली, समय मिला न प्यार।
बड़ा हुआ जब पुत्र तो, रिश्ते हुए उधार।।

हर सुविधा घर में मिली, फिर भी मन बेजार।
सुख-साधन के बीच में, सुख क्यों हुआ फरार।।

फोटो में मुस्कान है, आँखों में है पीर।
दिखलावे के युग भला, कौन हुआ गंभीर।।

चाहत की यह बेल अब, फैल गई हर ओर।
जितना सींचो लालसा, उतना बढ़ता जोर।।

वस्तु बढ़ी तो चाह भी, चाह बढ़ी तो शोक।
तृष्णा की इस आग में, जलता जाए लोक।।

माप लिया सुख को यहाँ, धन-दौलत के साथ।
प्रेम, समय और संतोष को, छोड़ दिया क्यों हाथ।।

जिसको समझा सुख सदा, निकला केवल जाल।
चमकीली दुनिया तले, मन है क्यों बेहाल।।

ऊँची है अट्टालिका, ऊँचे इनके दाम।
पर रिश्तों की नींव में, क्यों दिखता विराम।।

जीवन भर संग्रह किया, फिर भी मन लाचार।
संतोषी की झोंपड़ी, निकली सुख का द्वार।।

दौड़-दौड़कर पा लिया, दुनिया भर का माल।
खुद को पाने की घड़ी, आई बीते काल।।

- डॉ. प्रियंका सौरभ


*****


देशभक्ति जब सो गई, बढ़ने लगे विकार।
जागो भारतवासियो, फिर जागें संस्कार।।

जो भारत के शत्रु हैं, उनसे कैसा प्यार।
देशप्रेम की लौ जले, घर-घर और हर द्वार।।

राष्ट्रविरोधी बात को, मत देना सम्मान।
सत्य, न्याय और देशहित, बनें सभी की जान।।

देश बचाना धर्म है, देश बढ़ाना कर्म।
भारत माँ की शान में, अर्पित हो हर धर्म।।

झूठे नारे छोड़कर, सच का रखिए साथ।
देशहित की राह में, बढ़ें मिलाकर हाथ।।

जाति-धर्म में मत बँटो, भारत की पहचान।
एक तिरंगे के तले, अपना हिंदुस्तान।।

देशप्रेम केवल नहीं, भाषण और बयान।
कर्मों से दिखता सदा, भारत का सम्मान।।

वीरों के बलिदान को, रखो सदा तुम याद।
उनकी पावन प्रेरणा, करती भारत आबाद।।

देशद्रोह की सोच को, मत देना विस्तार।
भारत की एकता ही, सबसे बड़ा हथियार।।

जब जागे जन-चेतना, मिटे सभी अँधियार।
देशप्रेम से ही सदा, जुड़ा रहे परिवार।।

- डॉ. सत्यवान सौरभ


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अगर मैं!
बुद्ध होता, महावीर होता
मोहम्मद होता, नानक होता
ईसा मसीह होता...
और होता राम-कृष्ण!
तो मैं इंसानों को
जानवरों जैसी शिक्षा देता!
एक सूत्र में बंधे रहो...
प्रकृति को साफ रखो...
कल की कल सोचो...
जितनी जरूरत उतना खाओ...
और कदम से कदम मिलाओ...

- दीपक कोहली


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तीर लगते नहीं निशाने तक।
पाँव उठते नहीं ठिकाने तक।

उन्हें भी रोकना नहीं आता,
हम ठहरते नहीं बुलाने तक।

डूबते तो सभी ने देखा पर,
हाथ बढ़ते नहीं बचाने तक।

ताश के घर-महल बनाते हो,
ये संभलते नहीं जमाने तक।

आज रिश्तों का हाल है ऐसा,
ये चलते नहीं निभाने तक।
- नवीन माथुर पंचोली


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मानव भूला अपनी पहचान

इन्सान भूल गया अपनी ही पहचान
मानव था बन गया जग में शैतान
रब ने बनाया था इसको इन्सान
पर ये बन गया धरती का हैवान

नारी थी पूज्य देवी दुर्गा स्वरूप
सुन्दरी हो या वो हो काली कुरूप
पर पुरूष संग बना दी हत्यारिन
फुफकार करती है बन कर नागिन

माता पिता थे कल हमारे भगवान
मिहनत कर दी थी अपनी हमें नाम
कुपुत्र औलाद ने बना दी गुमनाम
बृद्धाश्रम बन ग्ई बुढ़े बुढ़ी की धाम

सरिता थी पावन गंगा माता समान
पर नदियाँ को बना दी नाला बेईमान
अपवित्र जल बना घर की मेहमान
बीमारी का दे रहा नित्य ही पैगाम

गुरूदेव थे हमारे पिता के समतुल्य
शिक्षक आज भूला दी खुद की मूल्य
तन पे जम गई चरित्रहीनता की धूल
नैतिकता की पतन चुभ रही है शूल

- उदय किशोर साह


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दो दीप देश के

दो दीप जले थे भारत में,
जिनसे जगमग देश हुआ।
गांधी जी ने सत्य सिखाया,
अहिंसा का संदेश दिया।
सादा जीवन, ऊँचे विचार,
बापू की थी यही पुकार।
सच की राह कभी मत छोड़ो,
मिलकर भारत को तुम जोड़ो।
शास्त्री जी थे सरल महान,
भारत माँ के सच्चे लाल।
“जय जवान, जय किसान” से,
गूँजा अपना हिंदुस्तान।
मेहनत, साहस, स्वाभिमान,
इनसे बढ़ता देश महान।
दोनों महापुरुषों को नमन,
भारत माता का अभिनंदन।
सत्य-अहिंसा अपनाएँ हम,
श्रम की महिमा गाएँ हम।
गांधी-शास्त्री के आदर्शों से,
नया भारत बनाएँ हम।

- गोपाल कौशल भोजवाल


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हरश्रृंगार धरा पर बिखर गई...

काश! कहीं कोई ऐसा हो,
जो बनकर आधार सँभाले,
थककर जब यह जीवन बिखरे,
मौन स्नेह से गले लगा ले।

रजनी भर महकी पारिजात ,
सुरभि-सुधा जग में बिखराई,
भोर हुई, थक टूटी कलिका,
सुध लेने स्वर्णिम भोर आई।

धरणी सम मिले पावन आश्रय,
तो जीवन को विश्राम मिले,
साँसों की इस सुरभित महक को,
धरा-धाम-सी छाँव मिले।

शाखा से छूटना अंत नहीं है,
समर्पण का यह रूप नया,
झरना पारिजात का सार्थक,
अवनी से लिपटी उसकी हया।

विश्वास दृढ़ है हरश्रृंगार का
धरा तो अंक लगाएगी
पारिजात की पावन महक को,
हर हृद तक पहुंचाएगी ।

हरश्रृंगार धरा पर बिखर गई।
लिपट अवनी से निखर गई।

- सविता सिंह ‘मीरा’


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ऐसा देश नहीं चाहिए

भ्रष्टाचार हो इस देश में, ऐसा देश नहीं चाहिए,
नारी की हो जहाँ बेइज्जती, ऐसा देश नहीं चाहिए।
बड़े-बुजुर्गों का जहाँ मान-सम्मान न हो,
छोटों के प्रति जहाँ प्यार न हो, ऐसा देश नहीं चाहिए।
जहाँ धन-दौलत की ही पूजा हो,
इंसानियत की कोई कदर न हो, ऐसा देश नहीं चाहिए।
जहाँ धर्म के नाम पर आपस में विवाद हो,
भाई-भाई का जहाँ दुश्मन हो, ऐसा देश नहीं चाहिए।
जहाँ रिश्तों में हर पल तकरार हो,
सास-बहू में भी प्रेम न हो, ऐसा देश नहीं चाहिए।
जहाँ गरीबों के हक पर कोई डाका डाले,
और स्वार्थ में अपने ही घर भर डाले, ऐसा देश नहीं चाहिए।
जहाँ अमीरी-गरीबी में भेदभाव की दीवार हो,
हर इंसान के बीच समानता और अधिकार हो।
जहाँ प्रेम, भाईचारा और सद्भावना का वास हो,
हर चेहरे पर मुस्कान और दिल में विश्वास हो।
जहाँ अमन-चैन, सुख-शांति का बसेरा हो,
हर नागरिक के जीवन में उजियारा हो।
ऐसा देश नहीं, ऐसा भारत चाहिए,
जहाँ हर दिल में प्रेम और हर मन में सम्मान चाहिए।

- गरिमा लखनवी


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इतना गुमान ना करो!
प्रकृति ने तुम्हें स्त्री बनाया है।
तुम क्यों फिजूल में,
इन मर्दों से तुलना करती हो ?
सारे मर्द तुम्हीं से पैदा हुए हैं।
तुम्हारे दुश्मन मर्द नहीं,
बल्कि तुम खुद स्वयं हो।
मर्दों की बनाई!
हर परंपरा को तुम,
सिर पर उठाए ढोती हो।
आखिर! तुम विद्रोह
क्यों नहीं करती हो ?
उस परंपरा के खिलाफ...
उस संस्कृति के खिलाफ...
उस धर्म के खिलाफ...
जहां सिर्फ!
तुम्हारा शोषण लिखा है।

- दीपक कोहली


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मामी की पनीर की सब्जी

क्या मस्त पनीर की सब्जी बनाई,
देखते ही मन में उठी तबाही।

आज तो मामी जी गजब ढाया,
स्वाद ऐसा कि हर कोई ललचाया।

आपकी सब्जी का स्वाद चखा तो लगा ऐसा,
जैसे किसी शादी की दावत में आ गया हूँ मैं सा!

ऐसी सब्जी अगर आप रोज खिलाओगे,
तो मोटे हो जाएंगे, फिर पतले न हो पाएंगे!

मामी जी के हाथों का स्वाद है निराला,
चट कर गए सब, खाली हो गया प्याला।

अब जब भी बनेगी यह सब्जी खास,
सबसे पहले खिंचे चले आएंगे आपके पास!

- साहिल पांचाल


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हर शख्स अनजबी था

बाद जाने के तेरे , मैं और बता क्या करता।
अश्क अपने न बहाता तो बता क्या करता।

हर शख़्स अनजबी था मेरा तेरे  इस शहर में।
तस्वीर तेरी ये न दिखाता तो बता क्या करता।

कौन है ऐसा जो रखता ज़ख्म पर मेरे मरहम।
चौखट पे तेरी सर रखने के सिवा क्या करता।

बे वफ़ाई का इल्ज़ाम दे तुम्हें हम नहीं, नहीं।
तक़दीर तो है तक़दीर तू भी भला क्या करता।

ग़मे जुदाई दिलकी न देखी गई हमसेमुश्ताक़।
आज़ाद रूह को न करता तो बता क्या करता।

- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह


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तुम्हारे छोड़ें हर तीर पकड़े जाएंगे।
तीर की कैसी है तासीर पकड़े जाएंगे।

कल भी मैंने पूछा था और आज भी,
कब जिंदा हुए मरे कब जमीर पकड़े जाएंगे ?

शिकारी के हाथों में पिंजरा दिख रहा है,
जरूर फिर खोड़रों के कीर पकड़े जाएंगे।

तेरा हर ताना बाना सिर्फ तानाशाही है,
जुबान से भले बने हैं फकीर पकड़े जायेंगे।

नफरत के धुएं से सब धुआं धुआं कर दिया,
जिसने की जहरीली समीर सब पकड़े जाएंगे।

पेट भरने की तलाश में मन मर मर गया विकास,
परोसी जिसने जहरीले खीर सब पकड़े जाएंगे।

- राधेश विकास


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निज कर्म

निज कर्म करो
मत मांगो श्रेय किसी से
निज हृदय को संतुष्ट करो
ईमानदारी के साथ
समर्पण भाव के साथ
निष्काम कर्म करो
रख ध्येय पर ध्यान
ऐसा श्रम करो कि
विधाता को लिखना पड़े
तुम्हारे लिए नूतन विधान
तन्मय होकर कर्म करो
धर्म समझ कर
हर्षित होकर
निज कर्म करो
मत मांगो श्रेय किसी से
बस स्वयं को तृप्त करो

- प्रवीण कुमार


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कचरा

सुबह सुबह कोहरे में,
बच्चे छोटे छोटे कदमों से,
जा रहे हैं,
स्कूल की सड़क पर,
दूर कहीं स्कूल में घंटी बज रही है,
पर उनकी आंखें जमीन पे,
कुछ ढूंढ रहीं है,
पैरों में कोई तेजी नहीं,
कोई हड़बड़ी नहीं,
उनकी पीठ पर किताबों का बस्ता नहीं है,
गले में टाई नहीं,
साफ, सफेद कपड़े और जूते नहीं है,
एक बोड़ा भरा हुआ कचरे से,
पीठ पर हो कर सवार,
उनके साथ जा रहा है।

- प्रणव राज


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देने का सुख

जब हम बिना किसी बदले की
उम्मीद के देना सीख जाते हैं,
तो समझिए हमने केवल देने की कला नहीं,
जीने की कला सीख ली है।
क्योंकि अपेक्षा से दिया गया प्रेम
धीरे-धीरे हिसाब बन जाता है,
और बिना अपेक्षा दिया गया प्रेम
आशीर्वाद बन जाता है।

जो दिया, उसे भूल जाना,
जो मिला, उसके लिए कृतज्ञ रहना,
और जिसने कुछ लौटाया नहीं,
उससे भी मन में कोई शिकायत न रखना...
शायद यही तो है
मन के समृद्ध होने की निशानी।

किसी के चेहरे पर मुस्कान रख देना,
किसी के दुःख में चुपचाप साथ खड़े रहना,
किसी के कठिन रास्ते पर
सहारे का एक हाथ बढ़ा देना...
ये छोटी-छोटी प्रेम की सौगातें
हमारे साथ कहीं नहीं जातीं,
मगर किसी के जीवन में
बहुत देर तक महकती रहती हैं।

- नरेंद्र मंघनानी


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नई सुबह पर अक्सर नज़र रहती है मेरी,
कोई पैगाम लाये प्यार का, या कोई समाचार लाए,

रात तो हर रोज़ ज़ख्म दे कर चली जाती है,
शायद सुबह ही कोई मरहम साथ लाए,

बड़ी बेसब्री से इंतज़ार करता हूँ, नई सुबह का,
कि शायद कल जो टूटा था, वह आज जुड़ जाए,

रात ने जो लूटा है, मेरे सुकून का वह हिस्सा
शायद सुबह उसे वापस लौटा लाए,

अल सुबह कह जाती है कुछ कानों में मेरे,
"उठ, अभी पूरी रात नहीं, बाकी है अंधेरे,"

और मैं फिर से उसी उम्मीद में जी लेता हूँ,
कि शायद आज कोई अपना, मुझे सवेरे-सवेरे पुकारे,

इंतज़ार करता हूँ हर उस आवाज़ का,हर पैगाम का,
जो मेरे नाम को, मोहब्बत से बुलाए,

भीड़ में तो हर कोई पुकारता है मुझे,
कोई तो हो जो दिल से आवाज़ लगाए

- बाबू राम धीमान


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नारी एवं प्रभु

नारी-
यह कैसा अन्याय है प्रभुवर
यह कैसा अन्याय।
देकर कोमल काया तूने
किया नही है न्याय।
तूने किया नही है न्याय।
प्रभु-
प्रस्तर सम धरती न कभी
जानो बीज है उगाती,
कोमल काया तेरी है
तू जननी का सुख पाती।
नारी-
क्यों हमको ही प्रभुवर,
है बंधन मे रहना पड़ता।
सामाजिक मर्यादाओं को
हमको ही सहना पड़ता।
प्रभु-
मर्यादित जन ही इस जग में,
पुरुषोत्तम राम कहलाता है।
तुमको देकर कोमल काया,
मर्यादा का लाज निभाया है।
नारी-
बलिदान सदा से करती आयीं
हम नारियॉ निज परिवार हित ।
फिर भी बलिदानों की गाथा में
नही है अपना कोई अस्तित्व।
प्रभु-
तुम्हारा मौन बलिदान ही जानों
सबसे है सर्व श्रेष्ठ।
पुरूष समाज की तुम अंग रक्षक,
तुम्हीं तो हो कुल श्रेष्ठ।
फिर भी तेरे बलिदानों की,
गाथा इतिहास दोहराता है,
पन्नाधाए एंव वीरांगनाओं की,
गाथा यह सुनाता है।
नारी
हौसलों में भरकर रंग,
हमारी भावनाओं को दिया पंख,
पर क्यों समाज ने कतर डाले,
मेरे उगते ये नवल पंख।
प्रभु
हौसलों के जो पंख न होते,
दारुण दुःख तुम सह न पाते।
दुर्योधन जैसे बैरी से,
तुम मुकाबला कर न पाते।
तुम्हारे ही हौसलों ने एक,
नया मुकाम बनाया है।

आसमान तक परचम लहरा कर,
अपना नाम कमाया है।
अब भी क्या तुमको शक है,
मैंने किया अन्याय।
तुम न होती तो सृष्टि न होती,
न होता कोई पुरूष प्रर्याय।
एक ऐसी धुरी हो तुम,
तुम विन संसार विराना है
नर व नारी एक ही हो तुम
फिर किसको तुम्हें हराना है।

- रत्ना बापुली


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क्यूँ रुठा कायनात हमार

हँसता खेलता है. ये जीवन हमारा
प्रकृति की थी हम पे सदैव सहारा
फिर प्रकृति क्यूं कर रही र्दुव्यवहार
क्यूँ रूठ गई ये कायनात हमार

दरक रहा पहाड़ जमीदोज हो जाता
कयामत की दिन हमको दिखलाता
कौन सी खता हुई ब्रम्हांड से यार
क्यूँ रूठ गई ये कायनात हमारा

वर्षा की पानी है जीने का सहारा
वर्षा ने दे दी है बाढ़ का विकृत नजारा
बादल की तांडव से त्रस्त है संसार
क्यूँ रूठ गई ये क्यानात हमार

नदी नाला गुस्सा हम पर क्यूं जतलाता
गाँव का गाँव नदी के अंदर समां जाता
कौन सी गलती हो गई, मैं हूँ शर्मसार
क्यूँ रूठ गई ये कायनात हमार

प्रकृति के आगे हम मानव हैं फतिगां
गलती से ले ली है उनसे हम पंगा
अपनी करनी पे कर मिल कर विचार
क्यूँ रुठ गई ये कायनात हमार

- उदय किशोर साह



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तुम जब मेरी गोद में आई
तब शायद मुझे भी नहीं पता था
कि एक छोटी सी नन्हीं सी परी
मेरी पूरी दुनिया और मेरी जान बन जाएगी।
बचपन से प्यारी, समझदार, होशियार हो,
याद है मुझे नन्हें-नन्हें हाथ जब मुझे छूते तो
मन को बहुत सुकून मिलता है।
छोटे-छोटे कदमों से चलना इठलाना
आज भी वो खूबसूरत पल याद है मुझे
वे सारे हसीन पल आज भी याद है।
कल तक जो मेरी उँगली पकड़ कर चलती थी
आज वो अपना हाथ से मुझे उड़ाती है
मेरे को पंख लगाती है
बेटी से मां बनकर मेरे सपने जगाती है
तुम बस यूँ ही मेरे आंगन की रौनक बनी रहना।
जिंदगी में कैसे भी पल हो,
हिम्मत से ऐसे ही आगे बढ़ते रहना।
उम्र भर ऐसे ही खिलती रहना और
मेरी बाहों में सिमटी रहना।
वही नन्हीं सी मेरी जान बनी रहना।
अपने जैसी ही एक प्यारी सी परी जनना
ताकि तुम भी फख्र करो कि
तुम बिल्कुल मेरे जैसी ही खूबसूरत मां हो।
तुमने एक परी को जन्म दिया,
ईश्वर तुम्हारे सारे सपने पूरे करें
और तुमको आरोग्य रखें।

- सुमन डोभाल काला


*****