तू तो लौटा ही नहीं, दिल न लगा तेरे बाद,
खुद से भी खुद को न पाया है ज़रा तेरे बाद।
धूप सुनहरी आँखों में चुभी, छाँव न मयस्सर,
हर हसीं मंज़र भी लगता है खफ़ा था तेरे बाद।
हंसी महफ़िलों में बुलाते रहे हर शाम मुझे,
मुझे खामोशियाँ ही आईं रास हां तेरे बाद।
ज़िक्र होता है जब भी रूह सिहर उठती है,
धड़कनों अभी नाम लेती हैं तेरा तेरे बाद।
तु तो कहता था कि साथ चलेंगे पल-पल,
तेरा साया भी न आया,इधर क्यों तेरे बाद।
आईना देख के अब डर सा मुझे लगता है,
शक्ल तक अपनी न पहचान सका तेरे बाद
- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़
*****
पेड़ कट रहे
पेड़ कट रहे हैं,
और हम इसे “विकास” कह रहे हैं।
छाँव जा रही है,
और हम इसे “जरूरत” कह रहे हैं।
धूप हर साल और तेज़ हो रही है,
पर हम बस कहते हैं- “मौसम बदल गया।”
हवा भारी हो रही है,
साँसें छोटी हो रही हैं…
और हम फिर भी आगे बढ़ रहे हैं।
जहाँ कभी ठंडक मिलती थी,
वहाँ अब तपन उतर आई है।
जहाँ कभी पेड़ थे,
वहाँ सिर्फ़ खाली ज़मीन रह गई है।
एक दिन समझ आएगा-
पेड़ सिर्फ़ हरियाली नहीं थे,
वो हमारी साँसों की सबसे बड़ी सुरक्षा थे।
तब शायद बहुत देर हो चुकी होगी
- सुनीता बिश्नोई
*****
घुमड़ - घुमड़ जब बादल घिरे,
प्यासी धरती की तब आस जगे
मौसम की पहली बारिश में,
प्राण -प्राण में नई उमंग जगे।
पत्ता पत्ता डाली डाली ,
हो गई हरी और मतवाली,
ठूंठ में भी नव चेतना है भरी,
मौसम की पहली बारिश ऐसी पड़ी।
इन्द्रधनुषी रंगों से सजकर,
वर्षा ऋतु बनी है दुल्हन,
मोर पपीहा की सुर तान,
बादल गरज गरज करे गान।
पर्वत से निकलता झरना,
झर झर,झर झर गिरता जाए,
मंद मंद चाल में बहती नदी,
मीठे मीठे स्वर गुनगुनाए।
बदलता मौसम संदेश है देता,
आगे बढ़ें वक़्त नहीं है रुकता,
मौसम की पहली बारिश की सीख,
चमके गगन में जैसे चमकता रीख।
- कांता शर्मा
*****
हाइकु
जीवन-पथ पर
जो बाँटता मुस्कान
वही समृद्ध।
भरा हुआ मन
आभार के फूलों से
हल्का हो गया।
दीपक ने कहा
जलना ही प्रार्थना है
अँधेरा हारा।
- नरेंद्र मंघनानी
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कोशिश कर हल निकलेगा
आज नहीं तो कल निकलेगा
करो अभ्यास निरंतर तुम
जरूर एक दिन फल निकलेगा
करो प्रतिज्ञा सफल होने को
पत्थरों से भी जल निकलेगा
भरी दुपहरी परेशान है किसान
बिना मेहनत ना फसल निकलेगा
उलझनों से दिक्कत ही होगा
सिर्फ उम्मीदों से ही हल निकलेगा।
- मनोज कौशल
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बने जो खेवनहार है
डुबो दी नैया, खुद बन खेवैया,
कर्म करते रहे दुश्मन का, मीठा बोल के भैया- भैया।
एक हाथ चप्पू खेते, दूजे छेद कर डाला,
जान खुद को भी डूबता, दोष कश्ती को दे डाला।
फंस गये आखिर वो, खुद के ही हाथों बुने जाल में,
दांव दे गये दुश्मन को, शिकार हो गये अपनी ही चाल में।
चुस्ती और चालाकी उनकी, राह में खुद की ही बन गई रोड़ा,
गुमराह कर दिए भोले राही, मंजिल के काबिल न छोड़ा।
माली खुद को कहकर, पत्ते-पत्ते का जीता भरोसा,
पर पानी की जगह जड़ों में, बूँद-बूँद तेज़ाब परोसा।
खोल दी दुश्मन ने सब सच्चाई, देख उचित एक मौका,
समझ आ गया था अब सबको, हो गया था उनसे बड़ा ही धोखा।
कर हिम्मत मिल जुल सारे, एक दूजे को दिया सहारा,
जैसे कैसे आखिर उनको, मिल ही गया था किनारा।
बन बेचारा सिमटा सा बैठा, किनारे पर मिल गया फिर वही खेवैया,
ढूँढ रहा था शायद शिकार फिर, बांध छोर से अपनी नैया।
हैरान सभी क्यूँ खुद ही डुबोये, नैया के बन खेवनहार है,
है कैसी ये सोच बताओ, क्यूँ करते इतना अनाचार है।
- धरम चंद धीमान
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गलती
खुद के भीतर झांको, बाहर कभी मत देखो,
गलती अक्सर खुद मे है, इसे तुम ही परखा,
बाहर में गलती ढूंढने से, गलतियां ही तुझे मिलेगी,
सही दिखाई कहीं भी तुझे कभी नहीं देगी।
हैरान परेशान होकर विचलित तुम हो जाओगे
अतः खुद मे ही बदलो,सकुन से रह पाओगे,
सुकून ही तो चाहिए ना हमें और कुछ तो नहीं ?
सुकुन के वास्ते, खुद के गलती को ही सुधार तो सही।
- चुन्नू साहा
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दोहा उर्दू छंद
सच कहना है अब बुरा, कहे यहाॅं सच कौन।
सच के दुश्मन हैं सभी, अच्छा है जो मौन।।
भूल गया है मौत को, लालच से मजबूर।
तन्हा जाना क़ब्र में, फिर भी करे ग़ुरुर।।
मेरी क्या पहचान है, ढूॅंड रहा मैं कौन।
दिखता जो वो मैं नहीं, अंदर कुछ है मौन।।
फ़ितरत है इंसान की, सबके अलग विचार।
कुछ तो सच को सच कहें, कुछ करते इनकार
जीते जी का साथ है, मरने पर है भार।
चले सभी इस पार तक, चले नहीं उस पार।।
साक़ी ऐसी मत पीला, चढ़कर उतरे यार।
एक बार ऐसी पिला, भव-सागर हो पार।।
कुछ दिन का बस खेल है, मौत हॅंसे इक ओर।
बचना मुश्किल मौत से, लाख लगा ले जोर।।
कीड़े खाऍं क़ब्र में, जब तक रहे शरीर।
सोच वहाॅं तकलीफ़ में, कैसी होगी पीर।।
जिसके दिल में प्यार है, सही वही इंसान।
पत्थर दिल कुछ नफ़रती, घूम रहे शैतान।।
मांस जला हड्डी बची, राख बची शमशान।
भूल गए अपने सभी, कर्म बची पहचान।।
उतरी उम्र ढलान पर, रहा अधूरा ज्ञान।
अंत नहीं है मौत से, आगे का कर ध्यान।।
- निज़ाम फतेहपुरी
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वृक्षों की रक्षा का त्यौहार 'हरेला
देवभूमि की शान है त्यौहार 'हरेला',
प्रकृति का वरदान है त्यौहार 'हरेला'
मिट्टी के कण-कण में बसी,
खुशहाली की पहचान है 'हरेला'
सावन की फुहारें जब धरती को नहलाती हैं,
खुशियों की सौगातें अपने संग ये लाती हैं,
टोकरियों में सजे अंकुर, प्यारे-प्यारे
आशाओं का मान है त्यौहार 'हरेला'
देवभूमि की शान है त्यौहार 'हरेला',
प्रकृति का वरदान है त्यौहार 'हरेला'
पर्वतों की गोद में, खिलते सुंदर फूल,
हरियाली के रंग निराले, भाते मन के मूल,
आओ हम सब मिलकर, आज ये प्रण करें,
नए-नए पौधे रोपें, वृक्षों की रक्षा करें,
संकल्प का विधान है त्यौहार 'हरेला',
देवभूमि की शान है त्यौहार 'हरेला',
प्रकृति का वरदान है त्यौहार 'हरेला'
बड़ों का मिले आशीष, घर-आंगन महक उठे,
नेह और प्रेम के धागों से, जीवन दमक उठे,
हमारी जड़ों की गहराई, संस्कारों का मान है,
परंपराओं की अमूल्य, ये सुंदर पहचान है,
देवभूमि की शान है त्यौहार 'हरेला',
प्रकृति का वरदान है त्यौहार 'हरेला'
आने वाली पीढ़ियों को, हरियाली का उपहार दें,
पावन मिट्टी को पूजें, प्रकृति को भरपूर प्यार दें,
सुख-समृद्धि की बयार, हम सब मिलकर बहा दें,
जीवन का अभिमान है त्यौहार 'हरेला',
"मुश्ताक़" देवभूमि की शान है त्यौहार 'हरेला'
- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह 'सहज़'
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दुखाकर दिल किसी का भी हमें हँसना नहीं आया।
छुड़ाकर हाथ अपनों से कभी चलना नहीं आया।।
ज़हाँ में लोग हैं ऐसे बड़ी मज़बूरी में जीते।
किसी की बेबसी को भी हमें तकना नहीं आया।।
किसी से हम नहीं कहते मगर हर बात है चुभती।
जली मैं इक दिया जैसी मगर बुझना नहीं आया।।
कहें ग़र हम सुनेंगे क्या यही इक बात है मन में।
करे मनमानियाँ हरदम उन्हें सुनना नहीं आया।।
नदी सी ज़िंदगानी है बहे मन शांत शीतल सी।
मिले जो राह पर पत्थर कभी रुकना नहीं आया।।
पकड़ लो हाथ तुम साथी चलेंगे साथ जीवन भर।
सफ़र कितना भी मुश्किल हो कभी थकना नहीं आया।।
रहें हम दूर उनसे जो शिकायत रोज़ ही करते।
ग़लत के सामने हमको कभी झुकना नहीं आया।।
- रति सिंह
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ग़ज़ल
किस्मत को दोष क्यों देते हो भाया,
हाथ में मौके को गर पकड़ना न आया।
जहां मुड़ी तक़दीर, वहीं मुड़ गए तुम,
खुद अपनी किस्मत को लिखना न आया।
सोने का चम्मच मांगा, मेहनत से डर गए,
वैभव का असली मतलब समझना न आया।
किताबें थीं अलमारी में धूल खाती रहीं,
इल्म की दौलत से दोस्ती निभाना न आया।
आसमान छूने चले थे, सीढ़ी से उतर गए,
जुनून की आग में खुद को जलाना न आया।
समंदर से चाहा मोती निकाले पर गोता न लगाया,
पानी को पत्थर बना जब तराशना न आया।
- रत्ना बापुली
*****
हारे हुए बाजीराव की मस्तानी हो तुम।
हर दिलकश मौसम की रूहानी हो तुम
बदले भले ही गर्दिश-ए-वक़्त
पर मेरी दीवानी हो तुम,
हारे हुए बाजीराव की मस्तानी हो तुम।
शायद गर्दिश की करवटें भी आएँगी
वक़्त के रफ़्तार की सरपटें भी होंगी
भुलाना मत मेरी हर एक कुर्बानी को तुम,
हारे हुए बाजीराव की मस्तानी हो तुम।
न शिकवा है दिल में, न कोई बेकरारी है
सिर्फ़ और सिर्फ़, अब तुम्हारी ही बारी है
मेरी हर चलती सांस की जुबानी हो तुम,
हारे हुए बाजीराव की मस्तानी हो तुम।
नाउम्मीदी के साये में,उम्मीद जगाए बैठा हूँ
बिन याद किए तुमको,पलकें मूँद नहीं पाता हूँ
मेरी रूह पर अमिट निशाँ की रवानी हो तुम,
हारे हुए बाजीराव की मस्तानी हो तुम।
- सूरजमल AkS
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आंसू नहीं मोती हैं
जो आंसुओं की फुहार,
शहीदों की शहादत पर,
देशभक्तों, समाज सुधारकों,
समाजरक्षकों, धर्मार्थियों के,
जग से महाप्रयाण पर,
या किसी की प्रसन्नता में,
हर्षित हो, मुदित हो,
नयन-नीर द्वारा,
दृष्टिगोचर होता आनंद,
अनूठा अपनापन और लगाव,
अनोखा जुड़ाव दर्शाकर,
समाज को बनाता है,
सुदृढ़ एवं सौहार्दपूर्ण,
ऐसी अश्रुधारा,
ऐसी अश्रु वर्षा,
मात्र आंसू न होकर,
अमूल्य, अनुपम मोती हैं।
- प्रवीण कुमार
*****
वीर सब बढ़े चलो
वीर सब बढ़े चलो
हार से ना डरो
हो कर्तव्यनिष्ठ तुम
जीवन सब वार दो
दुश्मनों को संहार दो
सामने रूकावट हो
ना कोई बनावट हो
हो के यूं मायूस तुम
हर बला को टाल दो
हर किसी को प्यार दो
उलझनों को मार दो
वीर सब बढ़े चलो
धीर सब बढ़े चलो।
- मनोज कौशल
*****
तुम बन कर देखो सती, मैं
मैं शिव सा वियोग रचाऊँगा।
तुम्हारी आस में मैं वर्षों तक ऐसे रह जाऊँगा,
तुम प्रतीक्षा कर लेना।
तुम्हारे सिवा किसी को अपने दिल में न बसाऊँगा,
तुम परीक्षा दे देना।
मैं अपने ध्यान को नहीं भटकाऊँगा,
तुम आना जन्म लेकर
मैं तुममें बस जाऊँगा।
एक बार मेरी होकर देखो,
मैं तुम्हारा साथ जन्मों तक निभाऊँगा।
- रिशीता सिंह
*****
"चुप्पी भी अपराध है"
कितना कठिन है
अपने हिस्से की सुविधा छोड़कर
पूरे देश के भविष्य के लिए खड़ा होना।
एक व्यक्ति भूख से लड़ रहा है,
पर उसका संघर्ष
किसी एक नाम का नहीं,
हर उस बच्चे का है
जो बेहतर शिक्षा का अधिकार रखता है।
आज प्रश्न सिर्फ शिक्षा व्यवस्था पर नहीं,
हमारी संवेदनाओं पर भी है।
क्या व्यवस्था इतनी कठोर हो गई है
कि एक आवाज़ सुनने के लिए
एक जीवन दाँव पर लगाना पड़े?
आइए, मतभेदों से ऊपर उठें।
यह समय तमाशबीन बनने का नहीं,
सत्य के साथ खड़े होने का है।
क्योंकि यह लड़ाई किसी एक व्यक्ति की नहीं,
हम सबके भविष्य की लड़ाई है।
- डॉ. सारिका ठाकुर 'जागृति'
*****
खुद से मिलन
मौन...
समझे कौन?
उफ़! इस शोर-शराबे में,
शब्द सभी हो गए थे गौण।
तभी कहीं से स्वर उभरा-
"कौन है, जो आया आज?"
कोलाहल के उस सागर में भी
किसी ने पढ़ लिए मन के राज।
मुड़कर देखा- न कोई अपना,
न कोई चेहरा, न कोई पास।
तभी अंतस ने धीरे से कहा-
"तू स्वयं ही है सबसे ख़ास।"
उस पल जैसे टूट गए
मन के सारे भ्रम-जाल।
जिसकी अपेक्षा थी जग से
मिला उत्तर जो भीतर का था सवाल।
फिर शब्द मौन से निकल पड़े,
भाव हुए निर्भय, निडर।
क्यों भटकूँ अब इधर-उधर,
जब मिल गया अपना ही घर।
स्वयं को पाकर जाना मैंने-
न कोई दूरी, न कोई बंधन।
सबसे अनुपम, सबसे पावन,
होता है खुद से अपना मिलन।
अब न शिकायत, न कोई प्रश्न,
न पाने-खोने का है डर।
जिसने स्वयं को जान लिया,
उससे सुंदर नहीं कोई सफ़र।
मौन...
समझे कौन?
उफ़! इस शोर-शराबे में,
शब्द सभी हो गए थे गौण।
तभी कहीं से स्वर उभरा-
"कौन है, जो आया आज?"
कोलाहल के उस सागर में भी
किसी ने पढ़ लिए मन के राज।
मुड़कर देखा- न कोई अपना,
न कोई चेहरा, न कोई पास।
तभी अंतस ने धीरे से कहा-
"तू स्वयं ही है सबसे ख़ास।"
उस पल जैसे टूट गए
मन के सारे भ्रम-जाल।
जिसकी अपेक्षा थी जग से
मिला उत्तर जो भीतर का था सवाल।
फिर शब्द मौन से निकल पड़े,
भाव हुए निर्भय, निडर।
क्यों भटकूँ अब इधर-उधर,
जब मिल गया अपना ही घर।
स्वयं को पाकर जाना मैंने-
न कोई दूरी, न कोई बंधन।
सबसे अनुपम, सबसे पावन,
होता है खुद से अपना मिलन।
अब न शिकायत, न कोई प्रश्न,
न पाने-खोने का है डर।
जिसने स्वयं को जान लिया,
उससे सुंदर नहीं कोई सफ़र।
- सविता सिंह 'मीरा'
*****
क्षितिज सुनाता रोज़ ही, आशा का संदेश।
हर प्रभात कहता उठो, जीवन परम विशेष॥
सूरज चुपके से रचे, नव उजियारा-गान।
रातों के हर दर्द का, करता है अवसान॥
लहर-लहर सागर कहे, छोड़ो बीता काल।
आगे बढ़ना ही सदा, जीवन की है चाल॥
लाली ओढ़े व्योम ने, लिखा नया अध्याय।
अँधियारे के अश्रु से, जन्मा नव पर्याय॥
रेतों के पदचिह्न भी, देते यही पुकार।
चलते रहने से सदा, मिलता है संसार॥
थका हुआ हर मन यहाँ, पाए फिर विश्वास।
नव किरणों के साथ ही, खिल उठती हर आस॥
कल की हारों का नहीं, रखता सूरज लेख।
हर दिन देता रोशनी, मिटा निराशा-रेख॥
भीतर जितना दीप हो, उतना जग उजियार।
मन का निर्मल आलोक ही, जीवन का आधार॥
'सौरभ' हर प्रभात में, ईश्वर का वरदान।
उठो, बढ़ो, मुस्काइए, यह जीवन का गान॥
हर प्रभात कहता उठो, जीवन परम विशेष॥
सूरज चुपके से रचे, नव उजियारा-गान।
रातों के हर दर्द का, करता है अवसान॥
लहर-लहर सागर कहे, छोड़ो बीता काल।
आगे बढ़ना ही सदा, जीवन की है चाल॥
लाली ओढ़े व्योम ने, लिखा नया अध्याय।
अँधियारे के अश्रु से, जन्मा नव पर्याय॥
रेतों के पदचिह्न भी, देते यही पुकार।
चलते रहने से सदा, मिलता है संसार॥
थका हुआ हर मन यहाँ, पाए फिर विश्वास।
नव किरणों के साथ ही, खिल उठती हर आस॥
कल की हारों का नहीं, रखता सूरज लेख।
हर दिन देता रोशनी, मिटा निराशा-रेख॥
भीतर जितना दीप हो, उतना जग उजियार।
मन का निर्मल आलोक ही, जीवन का आधार॥
'सौरभ' हर प्रभात में, ईश्वर का वरदान।
उठो, बढ़ो, मुस्काइए, यह जीवन का गान॥
- डॉ. प्रियंका सौरभ
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टच स्क्रीन फोन और फेसबुक
एक आदमी ने नया ख़रीदा टच स्क्रीन फोन
जिसके लिए बैंक से ले लिया दस हज़ार का लोन
लोगों के सामने नया फोन था दिखाना
लेकिन उसको नहीं आता था चलाना
किसी तरह थोडा बहुत सीख कर करने लगे काम
क्योंकि टच वाला फोन था टच से होता था सारा काम
अब तो फेस बुक और व्हाट्सऐप पर होने लगी चेटिंग
नई नई महिलाओं से होने लगी सैटिंग
एक दिन एक महिला की फ्रेंड रिक्वेस्ट आई
महोदय ने एक्सेप्ट करने में देर नहीं लगाई
अब तो उसके सर पर चैटिंग का भूत हो गया सवार
महिला से अब चैटिंग जारी थी लगातार
एक दिन उसने महिला से मिलने का प्रोग्राम बनाया
महिला को मिलने के लिए पार्क में बुलाया
महिला ने कहा मिलने में परेशानी ना हो यह जान लीजिये
इसलिए अपनी कोई अच्छी सी पहचान बता दीजिये
महोदय ने कहा मेरा सूट होगा काला
और टाई का रंग होगा लाल
सर पर हैट होगा हाथों में बैट होगा
महिला ने कहा क्रिकेट के लगते हो बहुत शौक़ीन
कल पता चलेगा कि बेटिंग करते हो या होते हो बोल्ड क्लीन
अगले दिन की बात अब सब सुन लो लगा कर ध्यान
पार्क में महिला से मिलने पहुँच गए श्रीमान
महिला घुंगट में थी आ गई वो पास
श्रीमान जी खुश थे पूरी हो गई आस
महिला के पास आते ही रोम रोम खिल रहा था
मन ब्याकुल हो रहा था बल्लियों उछल रहा था
अब जो होने वाला था उसका नहीं था उनको एहसास
क्योंकि महिला के रूप में बीबी आ रही थी पास
महिला ने कहा अगर तुम्हारी बीबी को पता चल गया
तो समझो हमारा कचूमर निकल गया
बीबी को पता नहीं चलेगा तुम ज़्यादा ना दो ध्यान
क्योंकि बीबी को मूर्ख बनाना है मेरे बाएं हाथ का है काम
वह तो अनपढ़ वेवकूफ गंवार और जाहिल है
पुराने ज़माने की नारी है
पहनने,खाने बोलने की तमीज नहीं
अब तो उसके जाने की बारी है
इतना सुनते ही महिला ने घुंघट हटाया
अनपढ़ वेवकूफ गंवार और जाहिल नारी ने अपना रूप दिखाया
अब तो श्रीमान जी के सम्भलने की बारी थी
क्योंकि सामने खड़ी उनकी पत्नी प्यारी थी
घर में तो बात करने से कतराते हो
फ़ेसबुक और व्हाट्सऐप पर दूसरो की बीबियों को फंसाते हो
लातों और घूंसों की जो आई आंधी और तूफान
पति देव जी हो गए एकदम परेशांन
ये बेमौसमी आंधी और तूफान कहाँ से आ गए
जो पति देव की अक्कल एक मिनट में ठिकाने लगा गए
भाईओ इसलिए फ़ेसबुक और व्हाट्सऐप
पर मत दो ज़्यादा ध्यान
वर्ना लातों और घूंसों की आंधी से
आप भी हो सकते हैं परेशांन
अपने मोबाइल का सही से उपयोग कीजिये
और चैन से ज़िन्दगी का मज़ा लीजिये
वर्ना मुसीबतों का जो तूफान आएगा
इसका अंदाज़ा भी नहीं लग पायेगा
- रवींद्र कुमार शर्मा
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