"काका राम-राम बाप !" बचपन में सुबह-सुबह जॉगिंग के लिए जाते वक्त ये आवाज़ सुनाई दे तभी महसूस होता था कि वाकई सवेरा हुआ है। अहले सुबह सफेद ड्रेस पहने, लेफ्टिनेंट कर्नल के स्टाइल में मोजे के अंदर फुल पैंट के निचले हिस्से को खोंसे, कंधे पर चार सेल की बड़ी टॉर्च टांगकर साईकिल से सिल्ली की ओर से आते गौरा कुम्हार आते-जाते आते-जाते हर परिचित-अपरिचित हर किसी को राम-राम ज़रूर कहते थे। उनके कहने का अंदाज ही निराला था जिस कारण यह सुबह का नज़ारा पूरे बन्ता गांव सहित आस-पास के इलाके के लोगों की भी चर्या बन चुकी थी।
दरअसल गौरा कुम्हार बन्ता गांव से सिल्ली जाने वाली सड़क पर सिल्ली रेलवे स्टेशन के ईस्ट केबिन के पास बने रेलवे क्रासिंग पर केबिनमैन के साथ ही गेटकीपर का भी काम करते थे। हम लोगों ने ज्यादातर देखा कि उनकी ड्यूटी रात को ही लगती थी। शाम को गांव से ड्यूटी के लिए रवाना होने से पहले दो पैग मारकर लेफ्टिनेंट कर्नल के गेटअप में सफेद पोशाक और टॉर्च कंधे पर टांगकर सबको राम-राम कहते हुए ही जाते थे। ड्यूटी ज्वाइन करने से पहले दो पैग और मारकर मस्ती से ड्यूटी किया करते थे।
रात नौ बजे के बाद मजाल है कि कोई भी उन्हें सोने से रोक सके ! पाठक सोचेंगे कि इतने संवेदनशील ड्यूटी पर वे सोते थे तो ड्यूटी कैसे होती होगी ! तो बता दूं कि उनके सोने का स्टाइल भी स्वान निद्रा थी। उन्हें हर आती-जाती ट्रेनों के लिए ट्रैक चेंज करने के समय का पूरा ख्याल रहता था। उन्हें किसी अलार्म की भी जरूरत नहीं होती थी। ऊंघते हुए भी स्पीकर पर आती हर सूचना पर उनका पूरा ध्यान रहता था। यही कारण है कि अपने पूरे कार्यकाल में कभी भी ड्यूटी की लापरवाही का उन पर कोई आरोप नहीं लगा। रही बात रेलवे क्रासिंग की तो एक मजेदार बात बताते चलूं कि वो इतने शातिर और ढीठ थे कि रात नौ बजे के बाद वे क्रॉसिंग के रेलवे फाटक को पूरी तरह से बंद कर ही सोते थे।
सड़क पर चलने वाले अनजाने राहगीर तो जबतक केबिन की सीढ़ियां चढ़ कर उन्हें न जगाएं गेट खुलना संभव ही नहीं था। लेकिन इलाके के लगभग सभी लोगों को पता था कि गेट बंद है मतलब गौरा काका सो रहे हैं। चूंकि हमारे इलाके में काका-भतीजा में बाप-बेटे की तरह मज़ाक चलता है तो इलाके के लोग नीचे से ही गौरा काका को कुछ सभ्य और मजाकिया गालियां देकर चिल्लाते थे तो उधर से भी "काका राम-राम बाप" के संबोधन के साथ सम्मानपूर्वक फाटक खुलता था।
सुबह जब गौरा काका की छुट्टी होती थी तो एक बार फिर लेफ्टिनेंट कर्नल के गेटअप के साथ टॉर्च टांगे साईकिल से सबसे पहले मयखाने की ओर जाते थे। फिर दो पैग लगाने के बाद ही हर राहगीर को अपना चिर-परिचित अभिवादन करते हुए बन्ता गांव लौटते थे। हर इंसान कुछ अच्छे-बुरे गुणों को मिलाकर जीवन जीते हैं लेकिन जो भी हो गौरा कुम्हार सबके दिलों में बसते थे। बीतते वक्त के साथ एक समय वो भी आया जब वो रिटायर्ड हुए। यूं तो अधिकतर इंसान रिटायरमेंट के दिन मायूस और इमोशनल हो जाते हैं लेकिन गौरा काका उस दिन और भी ज्यादा प्रफुल्लित थे। उस दिन वे सर से पांव तक मयखाने में महुए के रंग में सराबोर होकर उसी चिर-परिचित अंदाज में गांव पहुंचे। गांव वालों ने भी उनका गर्मजोशी से स्वागत किया।
इतने खुशमिजाज आदमी को भूलना तो कठिन होता है लेकिन अचानक एक दिन ख़बर मिली की अत्यधिक तनाव की वजह से हार्ट अटैक से वो चल बसे। उनकी मौत से न केवल उनके परिवार, बल्कि पूरे गांव में मातम पसर गया। यूं तो गौरा कुम्हार नहीं रहे लेकिन आज़ भी सुबह-सुबह बन्ता-सिल्ली उस सड़क पर उनका अहसास नज़र आता है। रेलवे क्रासिंग पर अब फ्लाई ओवर बन चुका है और वो केबिन भी अब कंप्यूटराइज्ड हो चुका है। उस केबिन में अब कोई ड्यूटी पर नहीं रहता है लेकिन फ्लाई ओवर के ऊपर से गुजरते हुए आज़ भी लगता है कि खिड़की से हाथ हिलाकर गौरा काका कह रहे हैं"काका राम-राम बाप !!"
- कुणाल

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