साहित्य चक्र

13 August 2026

क्योंकि नेता तो मैं हूं ना....



कहते हैं पूत के पांव पालने में ही दिखने लगते हैं तो ये बात मेरे ऊपर भी चरितार्थ होती है। ऐसा है कि नेतागिरी का गुण बचपन से ही मुझमें कूट-कूटकर भरा था ये बात और है कि इतना बारीक कूटा गया था कि आप जैसे साधारण मनुष्यों को बिना सूक्ष्मदर्शी वो गुण दिखाई देना मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन है। हालांकि नेतागिरी के गुण से ओत-प्रोत होने के बावजूद मुझे कभी भी तिल मात्र भी इसका घमंड नहीं रहा है।

तो बात शुरू करते हैं हाईस्कूल के दिनों से ! उन दिनों हाईस्कूल हमारे यहां सातवीं से ही शुरू हो जाता था तो हमलोग जैसे ही सातवीं में पहुंचे तो मुझे पहली बार अपने-आप में नेता के छुपे हुए गुण का अहसास हुआ। मैंने अपनी क्लास में आठ-दस लड़कों की एक टोली बना ली थी। दो ही महीनों में एक दिनचर्या बन चुकी थी कि पहली घंटी का क्लास करने के बाद उन सभी लड़कों को बहकाकर स्कूल से बाहर ले जाना है। बाहर जाकर स्कूल के आस-पास खेतों, होटलों, साईकिल दुकान, खोमचे वाले के पास आदि जाकर खूब मटरगश्ती करनी है। कभी बेर खानी है तो कभी सिंदुआर की झाड़ियों में मोटी डालियों पर लटकना है और सीधे टिफिन से ठीक पहले वाली घंटी के वक्त क्लास लौटना है। हालांकि बाहर जाने से पहले बाक़ी लड़के बाद में होने वाली कुटाई को लेकर सशंकित रहते थे लेकिन मजाल है कि मेरे गुरु मंत्र दिए जाने के बाद कोई डर छू-मंतर न हो जाए ?





ये अलग बात है क्लास लौटने के बाद रोज़ाना शर्मनाक तरीके से स्कूल के चपरासी खुदू मामा द्वारा कुटाई होती थी। मैं मन ही मन सोचता कि कम से कम टीचर्स से मार खाते तो इज्ज़त तो बनी रहती क्लास में ! खैर मार खा-खाकर मैं और मेरे गैंग के लड़के ढीठ बन चुके थे। क्लास दर क्लास दसवीं कक्षा तक मेरी बहुमुखी नेतागिरी की प्रतिभा में और भी निखार आता गया और हमलोग हुड़दंग और फ़िर कुटाई के बड़े-बड़े कीर्तिमान रच डाले। स्कूल में सभी टीचर्स और दो चपरासी में कोई ऐसा नहीं बचा था जिसका बीपी बढ़वाकर हमलोग उनसे न धुले हों। मैं उन लड़कों का नेता था इसलिए मेरे नाम एक खास कीर्तिमान दर्ज था। कभी किसी से ऊंची आवाज़ में बात तक नहीं करने वाले अत्यंत शांत स्वभाव वाले बाउरी सर से भी मैं प्रसाद पा चुका था। मेरे अलावा पूरे स्कूल में उन्होंने कभी किसी को एक चांटा तक नहीं मारा था तो आप समझ सकते हैं मेरे टैलेंट का लेवल।

कॉलेज तो मैं कभी ज्यादा गया नहीं इसलिए मेरे कॉलेज के सहपाठी मेरी नेतागिरी के अभूतपूर्व कौशल से महरूम रह गए। लेकिन जिस लॉज में हम छह लड़के रहते थे वहां मैं कैसे चूक सकता था। सुबह चार बजे उठकर जॉगिंग करने जाना और लौटकर फिर दस बजे तक सोना। रूम में गैस चूल्हा रहने के बावजूद होटल में सामूहिक भोजन। कभी चांडिल डैम,कभी सूर्य मंदिर तो कभी रातों को ऑर्केस्ट्रा देखने जाना। रूम में समय-समय पर ताश खेल का मजमा लगाना ये सब मेरी ही उत्कृष्ट नेतागिरी और मोटिवेशन का कमाल था।

कालांतर में कुछ ख़ास कारणों से तकरीबन 19 की उम्र में मेरी शादी हुई। इसके बाद मैं गांव शिफ्ट हो गया। क़रीब एक साल बाद हमारे यहां विधानसभा चुनाव की दुंदुभी बज चुकी थी। चुनावी जंग में इस बार हमारे ईचागढ़ विधानसभा की रणभूमि में यूं तो तीन बार के विजेता विधायक सिंह जी सहित वर्तमान विधायक सह डिप्टी सीएम स्व सुधीर महतो जी ताल ठोंक रहे थे। लेकिन उस बीच इस दफे केला छाप पर मेरे पिता के मित्र श्री कार्तिक महतो जी दहाड़ रहे थे।

चहुं ओर बस उनकी ही चर्चा थी और लगभग यही सबको महसूस हो रहा था कि इस बार कार्तिक जी ही बाजी मारेंगे। मुझे वोटर बने महज़ एक या डेढ़ साल ही हुए थे। सो युवा जोश से लबरेज़ मैं जब कार्तिक जी से मिला तो एक बार फिर मेरे अंदर का कद्दावर नेता जाग गया। फिर क्या ? मैं युद्ध स्तर पर कार्तिक जी के लिए कैंपेन में लग गया। विश्वास नहीं कीजिएगा कि मैंने ग्रासरूट लेवल पर इतना भयंकर और तूफ़ानी चुनाव प्रचार किया कि अंततः कार्तिक जी 18 हज़ार वोटों से हार गए। सक्रिय राजनीति की दुनिया में यह मेरी पहली उपलब्धि थी।

चुनाव के ठीक बाद मेरा चयन पारा शिक्षक के पद पर हुआ। कुछ दिन शांत रहने के बाद जब मैं अपने प्रखंड स्तर पर पारा शिक्षक संघ का सचिव बना तो मुझे एक बार फिर अपनी नेतागिरी का कौशल दिखाने का सुअवसर प्राप्त हुआ। उन दिनों पारा शिक्षकों के मानदेय का भुगतान प्रखंड स्तर से ही होता था लेकिन अनियमित ! मैंने इस अनियमितता को दूर करने का बीड़ा अपने कंधों पर ले लिया। यकीन मानिए जिस माह से मैंने मुहिम शुरू की उसके बाद अगले नौ महीनों तक मानदेय का फंड ही नहीं आया। इस प्रकार मैं अपने शिक्षक संगठन में भी नेतागिरी के कीर्तिमान हेतु एक दो-ढाई सौ ग्राम साइज़ का मील का पत्थर गाड़ चुका था।

वर्ष 2014 में सक्रिय राजनीति के क्षेत्र में मेरे सबसे फेवरेट युवा लोकप्रिय लीडर,तीन बार के डिप्टी सीएम और एक बार के होम मिनिस्टर परम आदरणीय सुदेश कुमार महतो जी हमारे लोकसभा प्रत्याशी के रूप खड़े थे। मैं तो पहले से ही पार्टी में जुड़ा ही था ऊपर से फेवरेट लीडर को देखकर मेरी बांछे खिल गई। ख़ुदा कसम मैं भाव-विभोर होकर इतनी तन्मयता से ज़मीनी स्तर पर अभियान चलाया कि उनकी जमानत जब्त होते-होते बची।

वर्ष 2018 आते-आते मैं अपने शिक्षक संगठन में अपनी धाकड़ नेतागिरी की बदौलत प्रखंड से प्रोन्नति पाकर जिला सोशल मीडिया प्रभारी बन चुका था। उन दिनों हर दूसरे-तीसरे दिन पारा शिक्षकों का धरना-प्रदर्शन,घेराव होता रहता था। मैं कहां पीछे रहने वाला था ! हर दिन अखबारों में बयानबाज़ी और जहां-तहां लोकल टीवी चैनलों पर बाइट देकर इतराना मेरी दिनचर्या बन चुकी थी। उस समय टेट पास, प्रशिक्षित और अप्रशिक्षित पारा शिक्षक एक साथ एकजुट होकर चट्टानी एकता के साथ अपनी मांगों को लेकर आंदोलनरत थे। मैं ही वो महामानव और कर्मठ नेता हूं जिसने पारा शिक्षकों की चट्टानी एकता में छेद कर उसमें एक बरगद का बीज डाल दिया था। 2019 तक आते-आते बरगद अपनी जड़ें फैलाकर चट्टानों में दरार पैदा करना शुरू कर चुका था।

वर्ष 2019 के लोकसभा चुनावों में हम पारा शिक्षक तत्कालीन राज्य सरकार की नीतियों से इतने क्षुब्ध थे कि मैंने जीवन में पहली बार सहाय जी के "हाथ" मजबूत करने की ठान ली। मेरा आक्रोश और नेतागिरी का जोश उफ़ान मार रहा था। मैंने जी-जान लगाकर सहाय जी की सहायता करने की कोशिश की लेकिन अंततः सहाय जी असहाय हो गए।

2021 के अंत तक मैं संगठन के लिए मेहनत कर पारा शिक्षकों की एकता वाली चट्टान को कटिंग पत्थर के टुकड़ों में तब्दील करने में कामयाब हो चुका था। पारा शिक्षक संघ तीन धड़ों में बंट चुका था।अब मैं और ज्यादा प्रमोट होकर टेट पास पारा शिक्षकों के संघ का प्रदेश प्रवक्ता बन चुका था। मतलब मैं राज्य स्तर का बड़ा नेता बन चुका था। आप लोगों को विश्वास नहीं होगा कि बतौर प्रवक्ता मैंने इतना धुआंधार परफॉर्मेंस दिया कि 2022 की शुरुआत तक टेट पास पारा शिक्षक संघ मेरे सकल प्रयासों से मेरे कर-कमलों द्वारा तीन फाड़ हो चुके थे। मेरी इसी निःस्वार्थ सेवा भावना और लगन की वजह से जनवरी 2022 में मुझे टेट पास पारा शिक्षकों एवं गैर पारा कैंडीडेट्स का प्रदेश अध्यक्ष बना दिया गया।

बतौर प्रदेश अध्यक्ष हमारी मुहिम थी कि बिना परीक्षा ही पूर्व की तरह काउंसलिंग के जरिए शिक्षक नियुक्ति कराना। मैं प्रदेश अध्यक्ष बनते ही नायक फिल्म के शिवाजी राव की तर्ज़ पर ताबड़तोड़ धरना-प्रदर्शन चालू कर दिया। सिर्फ़ यही नहीं, संगठन के सदस्यों की सहमति पर कोर्ट में केस भी करवा दिया गया। आप लोगों को विश्वास नहीं होगा कि महज़ एक साल के भीतर सरकार ने हमारी मांगों को दरकिनार कर ठिकाने लगाते हुए अपनी ही नियमावली के साथ शिक्षक नियुक्ति का विज्ञापन ज़ारी कर दिया। फिर क्या ? उसके बाद हमारी नेतागिरी के भी घोड़े लग गए !

दुर्भाग्यवश मैं आज़ प्राइमरी टीचर हूं। सरकारी प्रावधानों से बंधे होने के कारण फिलवक्त मैं खेत की मेड़ के नीचे दुम दबाकर चुपचाप बैठे सियार की तरह अपनी भी नेतागिरी की चूल मारती पूंछ को "दबड़ाकर (मोड़कर)" बैठा हुआ हूं। और इसी वज़ह से बहुत सारे लोग राहत की सांस ले रहे हैं। मैं जहां भी और जिसके भी समर्थन में नेतागिरी में उतर जाऊं, उसके घोड़े लगना तय है। यही मेरी काबिलियत और खासियत दोनों ही हैं। खैर ! मुझमें नेतागिरी का जज्बा अभी खत्म नहीं हुआ है। जनकल्याण की चाहत दिल में अभी भी तरोताजा है। बस वक्त का इंतजार है। लोगों का कल्याण मैं करता आया हूं और करके रहूंगा क्योंकि.....नेता तो मैं हूं ना।


- कुणाल



नोट- यह लेख केवल हास्य और व्यंग्य हेतु लिखा गया है।

आज की प्रमुख रचनाएँ- 13 अगस्त 2026







अमृत मंथन

अमृत मंथन होता है यहाँ हर बार,
सबकी लगती अमृत पाने को कतार।

देव आज भी छले जाते हैं,
राहु-केतु अमृत पा जाते हैं।
कौन चलाए सुदर्शन चक्र यहाँ ?
कृष्ण भी सब देख
मौन बंसी बजाते हैं।

हर बार अपने हिस्से में
बस हलाहल ही आता है,
अमृत मंथन का युग
अब केवल कथा कहलाता है।

क्या नौकरी, क्या पढ़ाई,
क्या तबादलों का व्यापार।
रोज़ खुलती सरकारों की कलई,
रोज़ नया होता भ्रष्टाचार।

प्रजातंत्र अब
बस चुनावों तक सीमित है,
जनता हर दिन ठगी जाती,
सत्ता फिर भी जीवित है।

गरीब को हर ठग नोच रहा,
हर घड़ी, हर पग।
न्याय खड़ा है मौन यहाँ,
सत्य बना है अभागा जग।

कब फिर कोई कृष्ण आएगा?
कब सुदर्शन फिर लहराएगा?
कब इस मंथन से अमृत निकलेगा,
और विष पीने वाला भी मुस्कुराएगा ?


- रोशन कुमार झा


*****


मेरी अपनी मधुशाला

पीले जितना पी सकता है
तू इन अंगूरों की हाला,
मैं खड़ा हूं तेरे बगल में
लेकर दोनों हाथों में प्याला।

कवि बनकर आया साकी
लेकर कविताओं की हाला,
मन भर सुनता जा तू
सुनाती जाएगी मेरी मधुशाला।

यहां का पता भूल न पाते
जो लोग हाथों में लिए रहते प्याला,
मैं भी उन्हें भूल न पता
जो उन्हें पिलाता हूं हाला।

कवि का रस ऐसा चढ़ा
की कभी खाली न होता उनका प्याला,
शाम को उनके साथ
खड़ी होकर चल दी मेरी मधुशाला।


- प्रणव राज


*****


घूटन

करूंगा शिकायत
रब के दर पर
जिन्होंने मुझे रुलाया है।
मुस्कुरा कर
औरों के संग
मेरी आंखों में आंसू लाए है।
थक चुका हूं
हर रिश्ते को निभा कर
अब जाकर
अपने रब के घर
उसको अपना
हर गम सुनाऊंगा।
दुआएं जिनको
रास न आई मेरी
देकर बददुआएं उनको
अपनी बिरहा की कहानी
सब को सुनाऊंगा।


- डॉ. राजीव डोगरा


*****


अपने तो अपने होते है

अपने तो अपने होते हैं ,
उसे पराये,हम क्यो समझते है ?
सुख दुख की हरेक घड़ी में,
अपने ही तो,पास आते है।

भले कभी-कभार थोडी मनमुटाव होती है,
विचार एक दुसरे से मेल नही खाती है,
निज मन मर्जी को ,हम कर लेते है
लेकिन फिर भी,अपनापन तो रखते है।


नाराजगी का बात को मन मे रखकर
खुश ना रह सकोगे, अपनो से दुर होकर,
इस बात को ,हमे सोचना तो होता है,
जैसे भी हो,अपने तो फिर से मना लेते है।

दो चार दिनों की जिंदगी मे पराये को लेकर
अपनो से दुर रहना,है एकदम बेकार,
पराये तो सिर्फ, खुश मे ही दिखते है,
अपने तो, सदैव अपने ही होते है।


- चुन्नू साहा, पाकूड


*****


समस्या गिनाना आसान है,
समाधान खोजना कठिन

हम अक्सर बस समस्याएँ बताते जाते हैं...
यह गलत है, वह ठीक नहीं है,
यह क्यों हुआ, वह कैसे हो गया...
लेकिन कभी ठहरकर यह नहीं सोचते कि
इसका हल क्या हो सकता है?
हम स्वयं इसके लिए क्या कर रहे हैं ?
और यदि अभी कुछ नहीं कर रहे,
तो क्या कर सकते हैं ?

समस्या सामने रखकर
जिम्मेदारी दूसरे के कंधों पर डाल देना बहुत आसान है।
फिर सामने वाला उस समस्या के बारे में
सोचता रहे, उलझता रहे और समाधान खोजता रहे।

लेकिन असली समझदारी तब है,
जब हम समस्या के साथ
समाधान की दिशा भी लेकर आएँ।
क्योंकि केवल यह कहना कि
“समस्या है” शिकायत है;
और यह कहना कि
“समस्या है, आइए देखते हैं
इसे कैसे हल करें” जिम्मेदारी है।
समाधान खोजने वाले ही परिवर्तन लाते हैं।


- नरेंद्र मंघनानी


*****


आदिवासी- प्रकृति के सच्चे प्रहरी
ए.सी. के कमरों में हम,
फिर भी बेचैन और बीमार,
हर सुविधा पास हमारे,
फिर भी जीवन लाचार।
वो जंगल में रहते हैं,
धरती को माँ कहते हैं,
जड़ी-बूटी अपनी दवा,
प्रकृति से ही जीते हैं।
न बोतल का पानी चाहिए,
न कृत्रिम हवा का सहारा,
पेड़-पौधों से रिश्ता उनका,
धरती ही उनका संसार सारा।
बिरसा मुंडा ने भी कहा था,
जल-जंगल-जमीन हमारी,
अपनी मिट्टी, अपनी संस्कृति,
यही तो है पहचान हमारी।
हमने प्रकृति को छोड़ा,
और रोगों को अपनाया,
उन्होंने प्रकृति को थामा,
तो जीवन स्वस्थ बनाया।
सोचो ज़रा-
सभ्यता आगे बढ़ी है,
या प्रकृति से दूर खड़ी है ?


- बीना सेमवाल


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सच्चे रक्षक हैं आदिवासी
जल, जंगल, जमीन के
सच्चे रक्षक हैं
आदिवासी.
भारत भूमि के सच्चे
सेवक हैं आदिवासी
उन्हें पसंद है जंगलों के
पेड़ पौधे पशु पक्षी
जंगली जानवर
जंगलों के घास और फूस.
उन्हें पसंद है
प्रकृति की बनाई
संस्कृति
पहनावा रहन-सहन
बात विचार.
वे मूलनिवासी हैं
इस धरती के
उन्हें पसंद है यहां
रहना खाना.
सच में ,
जल जंगल जमीन के
सच्चे रक्षक हैं
आदिवासी
मूलनिवासी..!


- मनोज कौशल


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सुमन का अंतर्मन

एक शाम अलसायी सी,
मन में महिमा मुस्कायी सी।
डगमग डोल रही डाली से,
क्षण-क्षण में मुरझाई सी।

कभी गजरा बन इठलाती है,
प्रभु-पद पर शीश नवाती है।
समझे न कोई सुमन की व्यथा,
पल-पल जो काटी जाती है।

बीज से बढ़कर बचपन मुस्काया,
शाखों पर भ्रमरों का गुंजन छाया।
कैसे बांधूं अपने पाश में उनको,
मकरंद का मधुर मिलन न हो पाया।

बस यही मेरी लघु कहानी है,
पल दो पल की जिंदगानी है।
खुशबू ही मेरी खास पहचान,
बगिया-मंदिर महकानी है।

सींच-सींच तुमने पाला है,
चमन चहुंओर संभाला है।
पूरा अधिकार तुम्हारा मुझ पर,
तेरी खुशी ने मुझे निहाला है।

तूने बढ़ाया सदा मेरा मान,
हर मोड़ पर मिला सम्मान।
शहीदों के शीश चढ़ूं जब मैं,
बढ़ जाता मेरा गौरव-गान।


- सविता सिंह 'मीरा'


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​बरस रही है आज जो सावन की ये घटा,
दिल को हंसी शाम,याद इक बात आ गई।

​बूंदों के शोर में तेरी आवाज़ सी लगी,
जैसे ,सावन में तू बनके मेहमान आ गई।

​तन्हाईयों के शहर में जलते हैं दिए अब ,
हर मोड़ पर जैसे तेरी परछाई आ गई।

​मौसम है वो ही सर्द और सुलगती है आरज़ू,
जाने कहाँ से घूम कर फ़िर बरसात आ गई।

​मुश्ताक़ अब न पूछ हमसे हिज्र का मज़ा,
जीने की हसरत, ज़िंदगी की शाम आ गई।


- डॉ. मुश्ताक अहमद शाह "सहज़"


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शराब है विनाश की दवाई

मदिरापान का जो हुआ यहाँ शिकार
उजड़ा उस जालिम का घर .परिवार
नशे की लत में नाली में वो समाया
अपने नौनिहाल को भूख से तड़पाया

मदिरा क़ा करो जग में सब वहिष्कार
बचा लो भाई खुद की हँसता संसार
गर पाना है समाज में मान सम्मान
मदिरालय से छुड़ा लो अपनी पहचान

अंगूरी रस का जग में हो तिरस्कार
इन्सानियत जिसे नहीं करती स्वीकार
फिर रोग व्याधि की दलदल में क्यूं जायें
सोम रस को कभी जीवन में ना अपनायें

सभ्य हो सभ्यता पर करो अब विचार
हैवानियत से बच कर रहना मेरे यार
गृहणी की बात मान कर रोज मस्कुराना
मधुशाला से उजड़ गये पढ़े लिखे सयाना

लालपरी की मत कर जीवन में इन्तजार
इस बेवफा ने रूलाया है कितने ही परिवार
बुद्धि विनाश की है ये जहर सी दवाई
अच्छे अच्छे की करा दी है जग में हँसाई


- उदय किशोर साह


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'कच्चे धागे' की ताकत

सन उन्नीस सौ तिहत्तर की है यह बात
नहीं भूलती अब भी वह कष्टकारी रात
'कच्चे धागे' फ़िल्म लगी थी मंडी कृष्णा टाकीज़ में
पहुंचे जब वहां देखा बेकाबू थे हालात

लाइन इतनी लंबी कि खिड़की तक पहुंचना था मुश्किल
कुछ लोग ब्लैक में बेच रहे थे टिकट
जैसे ही हम उन तक पहुंचे टिकट हो गए खत्म
पिक्चर तो देखनी थी समस्या खड़ी हो गई विकट

किसी तरह हम भी लाइन में हो गए खड़े
धीरे धीरे सरकते सरकते खिड़की तक पहुँचे हम
हमने भी पैसे मुट्ठी में डाल कर खिड़की में हाथ डाल दिया
भीड़ ने धक्का मारा फंस गया हाथ निकल रहा हो जैसे दम

हाथ फंस गया खिड़कीं में न अंदर जाए न बाहर
भीड़ के धक्के से उखड़ गए पांव दर्द से हम रहे थे कराह
पसीना पसीना हो रहे थे हवा में लटके हुए
हाथ बाहर निकालने के लिए हम पूरा जोर रहे थे लगा 

बहुत देर के बाद टिकट मिला हाथ भी खिड़की से छूटा
बाल बिखरे हुए सूरत रोनी जैसे किसी ने हो बहुत पीटा
टिकट मिलते ही दोस्तो के चेहरे पर मुस्कुराहट छाई
मैं अधमरा सा हो गया था मानो किसी ने प्राण हो खींचा

पिक्चर मे कहाँ लगे दिल अब तो कलाई पर था ध्यान
कलाई के दर्द ने कर रखा था बहुत परेशान
दोस्त तो ले रहे थे 'कच्चे धागे' का आनंद
कलाई सूज गई थी मेरी तो निकल रही थी जान

होस्टल था हमारा गुरुद्वारे से थोड़ा आगे
पिक्चर देखकर हम होस्टल की तरफ थे भाग रहे
वापिस जब आये रात बारह बजे चुपके से गेट के पास
देखा जब तो होस्टल वार्डन और चौकीदार थे जाग रहे

होस्टल वार्डन ने की हम सब की बहुत धुनाई
डर के मारे मुंह से चूँ तक नहीं निकल पाई
तमाशा देखने खड़े हो गए आकर सारे
'कच्चे धागे' की ताकत उम्र भर के लिए खूब समझ आई


                   - रवींद्र कुमार शर्मा


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कत्थई सी शाम

वही कत्थई सी शाम
और मन में समंदर के जैसा शोर!
लहरें टकराकर लौट जाती हैं
और अपने पीछे छोड़ जाती हैं
सफेद नमक....
कुछ अधूरी ख्वाहिशें
और स्मृतियों की सीपियां।

मैं नंगे पांव दौड़कर
उठा लेती हूं वो सीपियां और नमक,
बना लेती हूं मन के समंदर किनारे,
एक सुंदर सा घर,
मेरा घर....
घर में दरवाज़े और कुछ खिड़कियां।
लेकिन नहीं आती उन खिड़कियों से हवा।
होने लगती है घुटन...

कठोर लहरें टकराती हैं दरवाजों से,
तो खनकने लगती हैं सीपियां,
और फिर वही कुछ टूटने का शोर...
अथाह शोर...
दीवारों से झड़ने लगती हैं स्मृतियाँ,
गिरने लगती हैं तस्वीरें,
जब झांकता है समंदर दरारों से
टूट जाते हैं स्वप्न....

मेरा प्रेम और तुम्हारा छल,
मौन करता है लहरों का शोर,
छोड़ जाता है सन्नाटा...
तुम्हारा छल....
बहता है आंखों से बनकर नमक
यही है मेरे प्रेम का अंतिम अवशेष
गहरी रात में,
फिर से डूब जाएगी कत्थई शाम।

सीपियां छिपा लेंगी,
मेरे अश्रु मोती बनाकर...
खुद में और बंद हो जाएंगी,
सदा के लिए...
सफेद नमक घुल जाएगा
आंखों के समंदर में,
फिर प्रतीक्षा रहेगी ना स्मृतियां,
रहेगा तो ये समंदर....
ये कत्थई शाम....
मेरा प्रेम और तुम्हारा छल...


- मंजू सागर


*****


खालीपन

हर चेहरे पर मुस्कानों का उजला संसार है,
फिर भी जाने क्यों मन इतना लाचार है।
क्षण-क्षण को तस्वीरों में बाँध लिया हमने,
पर जीने के पल जाने कहाँ खो दिए हमने।

गैलरी भरी है पर दिल है खाली,
हर तस्वीर मुस्कुराती, फिर भी आँखें हैं सवालों वाली।
हज़ारों चेहरों का साथ है इस आभासी भीड़ में,
फिर भी कोई अपना नहीं मिलता इस भीड़ में।

कभी रिश्ते धड़कनों से पहचाने जाते थे,
बिन कहे ही आँखों से हाल सुनाए जाते थे।
अब हाल पूछने को भी संदेश भेजना पड़ता है,
और दर्द छिपाने को मुस्कुराना पड़ता है।

तस्वीरें चेहरे बचा सकती हैं, स्पर्श नहीं,
यादें साथ रख सकती हैं, अपनापन नहीं।
इंसान को आखिर भीड़ नहीं एक दिल चाहिए,
जो तस्वीर नहीं, उसके आँसू पढ़ सके बस वही अपना चाहिए।


- डाॅ. सारिका ठाकुर 'जागृति'


*****


सॅंकरे हैं दरवाज़े

हर गली,तॅंग गली,भूली-बिसरी-सी
दीवारें ही दीवारें हैं,हर तरफ़,चारों तरफ़
खिड़की दिखाई नहीं देती है कहीं कोई
सॅंकरे हैं दरवाज़े और मुॅंड़ेर ही मुॅंड़ेर
कहने को हैं दिशाऍं दस आने-जाने को
मगर हर बार,हर कहीं,दोराहे-चौराहे
इधर जाऊॅं कि उधर जाऊॅं कि किधर
उलझता ही जाता हूॅं उलझनों की तरह
धूप में बैठी स्त्रियाॅं बुनती हैं स्वेटर जैसे
ऊन का गोला नहीं है सूर्य

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जीवन में जीवन जैसा.

भूले से भूल गया जो भी
याद आ ही जाता है ऑंखें खुलते ही
बशर्ते कि नींद नहीं हो आचरण में
पत्थर बरस रहे हों सिर ऊपर छोटे-बड़े
और पैरों में बॅंधी हों बेड़ियाॅं लोहे की
सोने से ज़्यादा मॅंहगा बिकता हो साहस
डरते-डरते मरने से पहले मरते हों वीर
खोना-पाना कठिन नहीं है,ज़रा भी नहीं
नियम नहीं है कि जो खोया,फिर पाया
नमक नहीं,पानी नहीं,क़िताब नहीं है
तब फिर बचता ही क्या है जीवन में
जीवन जैसा,पाने जैसा ?

*******

एक औरत अंधेरे में.

एक औरत अंधेरे में
जाग रही है सदियों से घर के लिए
और भाग रही है नॅंगे पाॅंव जॅंगल-जॅंगल
तलाश रही है अन्न,जल और आग
कुऍं की गहराई तक जाती नहीं हैं सीढ़ियाॅं
बिखरे-बिखरे हैं नन्हीं तितलियों के रॅंग
औरत समेट रही है कुछ सूखी लकड़ियाॅं
ताकि सेंक सके चार रोटियाॅं घर के लिए
लोरी सुनकर भूखे ही सो गए हैं बच्चे
देर नहीं,सुबह हो रही है,जाग रहे हैं बच्चे
बच्चों के जागने से पहले,ज़रा कुछ पहले
उम्मीद लिए घर पहुॅंचना है एक औरत को
एक औरत अंधेरे में

*******

बच्चों की पीठ पर

घोड़े बन रहे हैं बच्चे
एक-दूसरे की पीठ पर सवार होकर
उड़ रहे हैं खुले आसमान की ओर
मुठ्ठियों में कसकर पकड़ लेने को चाॅंद
और चाॅंद है कि रोज़ ही अपनी अदा में
घटता-बढ़ता रहता है नितांत बेशर्मी से
शर्म जो होती ज़रा भी तो डूब न मरता
सीधे-सरल उतरकर ज़मीन पर
बच्चों की पीठ पर

*******

है ज़िम्मेदारी कारण कविता

बदलती हैं हवाऍं,बदलता है पानी
बदलते है शहर,बदलते हैं नाम शहरों के
सुर सॅंगीत के बदलते हैं ताल सहित
तान बदलती हैं,तानें बदलते हैं धार अपनी
साज़िशें बंद कमरों की अपने ही हठ में
बदलती रहती हैं दृष्टि और दृष्टिकोण
गूॅंथते हुए मिर्च-मसालों में ढ़ेरों लिप्साऍं
मगर ज़िद है ज़िम्मेदारी कारण कविता
कि बदलती नहीं है रीढ़


- राजकुमार कुम्भज


*****


उसकी इच्छा

जब कुछ समझ न आए,
हर चीज़ तुम्हें उलझाए,
रहना ख़ामोश, रखना हौसला,
कि बाढ़ का पानी भी
धीरे-धीरे उतर जाएगा।

लहरें डराएँगी,
रातें होंगी लंबी,
काली, विकराल।
याद रखना, तेरे पीछे कोई है,
जो रखेगा तुझे संभाल।

अपने भी मजबूर होंगे,
परछाई भी दूर होगी,
सिर्फ़ होंगे तुम- अकेले।

यही तुम्हारी परीक्षा होगी,
जानो, वही होगा
जो उसकी इच्छा होगी।

बस तुम ख़ामोश रहना,
हौसला बनाए रखना,
वक़्त चाहे जितना लगे,
ये दौर भी गुजर जाएगा।


- रोशन कुमार झा


*****


तुम्हारे स्वागत में मधुशाला

आओ प्रिय तुम्हें पकड़ा
देता हूं मधु का प्याला,
कह देता हूं साकी को
भर देगा वह स्वर्ण हाला।

पी लेना तुम मन भर हाला
खाली कभी न होगा वह प्याला,
आते रहना हमेशा मेरे पास
सब जगह दिखेगी मेरी मधुशाला। (1)

कमरे से निकल कर
आ बैठना मदिरालय में
पिलाता रहेगा भोला साकी,
देता रहेगा एक नया प्याला।

तुम्हारे लिए यहां के
दरवाज़े हमेशा खुले हैं,
आ बैठना दोस्तों संग
स्वागत करेगी मधुशाला। (2)


- प्रणव राज



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07 August 2026

सच्चे और निस्वार्थ रिश्ते, आज के दौर की सबसे बड़ी पूंजी


जीवन के इस कठिन और तेज़ रफ़्तार दौर में जहाँ हर इंसान अपनी ही दुनिया, अपने स्वार्थ और व्यस्तता के इर्द-गिर्द घूमता दिखाई देता है, वहाँ कई बुनियादी मानवीय मूल्य पीछे छूटते जा रहे हैं। आज की इस स्वार्थी दुनिया में रिश्तों की नींव अक्सर लेन-देन और अपने फ़ायदे पर रखी जाने लगी है। ऐसे माहौल में सच्चे, निष्ठावान और निस्वार्थ रिश्ते किसी अनमोल मोती या उपहार से कम नहीं हैं।





निस्वार्थ रिश्तों का महत्व- किसी भी इंसान की असली दौलत उसके बैंक खाते या संपत्ति नहीं, बल्कि उसके वे वफ़ादार रिश्ते होते हैं जो ख़ुशी में मुस्कुराते हैं और दुख में ढांढस बंधाते हैं। एक सच्चा रिश्ता वह है जो किसी शर्त, पृष्ठभूमि या आर्थिक लाभ का मोहताज न हो। जो इंसान बिना किसी मतलब के आपका सम्मान करे, आपकी उपस्थिति की सराहना करे और बिना कहे आपकी तकलीफ़ को समझ ले, वही आपकी वास्तविक पूंजी है।

मुश्किल घड़ी में परीक्षा- रिश्तों की सच्ची पहचान हमेशा मुश्किल और परीक्षा के समय ही होती है। जब जीवन में संकट आता है, सफ़लताएं मुंह मोड़ लेती हैं और अपने भी अजनबी लगने लगते हैं, तब जो कुछ हाथ आपका सहारा बनते हैं, वही जीवन के असल स्तंभ होते हैं। कठिन समय में साथ निभाने वाले लोग इंसान को निराशा के अंधेरे से निकालकर नई उम्मीद और हौसला देते हैं।

रिश्तों की हिफाजत और समझदारी- आज के इस ख़ुदग़र्ज़ दौर में दिल से चाहने वाले लोग बहुत कम मिलते हैं। यही वजह है कि ऐसे रिश्तों की क़द्र करना, उनमें आने वाली दूरियों को समय रहते दूर करना और उन्हें संभालकर रखना ही असली बुद्धिमानी है। रिश्तों में अहंकार, ग़लतफ़हमियां और उपेक्षा दूरियों की वजह बनती हैं, जबकि विनम्रता, सहनशीलता और अपनापन रिश्तों को लंबे समय तक जीवंत रखते हैं।

जीवन संक्षिप्त है और यह सफर अकेले तय करना मुमकिन नहीं है। इसलिए अपने आसपास मौजूद उन निष्कपट और निस्वार्थ रिश्तों को पहचानिए जो आपसे किसी भी प्रकार की अपेक्षा रखे बिना जुड़े हैं। उनकी क़द्र कीजिए, उन्हें समय दीजिए और इन रिश्तों को सुरक्षित रखिए, क्योंकि यही वे पूंजी हैं जो इंसान को जीवन के कठिन रास्तों पर कभी अकेला नहीं छोड़ती।


- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़


लघुकथा- ममता






बात उन दिनों की है जब मैं बीएससी पार्ट वन में था। मेरा एडमिशन ज़रूर बुंडू कॉलेज में था लेकिन मैं रांची में लॉज में रहकर पढ़ाई करता था। चूंकि बचपन से मेरी परवरिश नाना के यहां हुई है तो अक्सर अपने घर से ज्यादा नाना घर ही आना-जाना होता था। यूं तो नाना घर वाले गांव से डायरेक्ट रांची के लिए काफ़ी सारी बसें चलती थीं लेकिन फिर भी सिल्ली से रांची तक ट्रेन का सफ़र न केवल स्टूडेंट होने के नाते सस्ता था बल्कि इस रूट की विहंगम प्राकृतिक छटा हर बार सफ़र को एक नया और रोमांचक अहसास प्रदान करता था।

इस रूट पर पहाड़ काटकर बनाए गए सुरंगनुमा रास्ते, दूर-दूर तक फैले अथाह साल के जंगल और पहाड़ियां, छोटी-छोटी नदी-नाले और बीच के छोटे-छोटे रेलवे स्टेशन किसी का भी मन मोह लेने को पर्याप्त थे। सिल्ली से रांची तक का भाड़ा मात्र ग्यारह रुपए ! सिल्ली एक छोटा सा शहर है और उस लिहाज़ से यहां का रेलवे स्टेशन भी काफ़ी साधारण सा था। गिनी-चुनी ट्रेनें ही यहां रुकतीं थीं इसलिए प्लेटफॉर्म पर उन दिनों एकाध छोटे-छोटे यात्री शेड और इक्के-दुक्के फल,खीरे और भुंजे बेचने वाले ही दिखते थे।

हमेशा की तरह उस दिन मैं जल्दी-जल्दी तैयार होकर रांची जाने के लिए पौने दस बजे स्टेशन पहुंच कर टिकट लेकर प्लेटफॉर्म पर दाखिल हो गया। टाटा-रांची मेमू पैसेंजर का समय दस बजकर दस मिनट था इसलिए मैं रिलेक्स होने के लिए प्लेटफॉर्म पर ही एक जामुन के पेड़ के नीचे बने चबूतरे पर बैठ गया। अभी बैठकर दस मिनट ही हुए थे कि अनाउंसमेंट हुआ कि हमारी ट्रेन डेढ़ घंटे लेट है। मेरे चेहरे पर हल्की सी उबासी आ गई क्योंकि एक तो ट्रेन पकड़ने की जल्दबाजी में तैयार नाश्ते को भी छोड़ कर आया था ऊपर से डेढ़ घंटे प्लेटफॉर्म पर टहलकर बोर होना पड़ता।






उन दिनों हम जैसे छात्रों के पास स्मार्टफोन भी नहीं थे कि रील्स घिसकर या फ्री फायर में धड़ाम-धूड़ूम कर टाइम पास कर सकूं। छोटा की-पैड फ़ोन ज़रूर था लेकिन उससे होगा क्या ? कोई गर्लफ्रेंड भी तो नहीं थी ! अचानक मेरी नज़र उसी जामुन के नीचे बने चबूतरे पर बैठकर चने,भुंजे और मूंगफली बेचती एक लड़की पर पड़ी। अक्सर उस जगह एक अधेड़ व्यक्ति बेचा करता था लेकिन आज़ उसकी जगह लड़की को बैठे देख कर मामूली सा प्रश्न भी मन में उठा। मैं सोचा भूख भी लग रही है तो इससे ही कुछ खरीदकर खा लेता हूं तो खाते-खाते टाइम पास हो जाएगा। मैंने दस का नोट उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा कि झालमूढ़ी बना दो। वो मुझसे पैसे लेकर चुपचाप झालमूढ़ी बनाने लग गई।

उसकी मासूमियत और खुबसूरती को मैं एकटक निहारते हुए सोचा कि कुछ बातें इसी से कर लेता हूं। पूरा इंटरमीडिएट बिना कॉलेज गये,बिना लड़की पटाए गुज़ार दिया था तो आज़ इसे देखकर मेरे लड़कपन की भावना थोड़ी-सी जाग गई। मैंने उससे पूछा -"तेरी जगह यहां जो बेचते हैं वो तुम्हारे पापा हैं क्या ?" उसने धीरे से कहा-"हां !" मैंने आगे पूछा कि "आज़ तुम क्यों बैठी हो ? तुम पढ़ाई नहीं करती क्या ?" उसने झालमूढ़ी का ठोंगा मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा-"पापा बाहर गए हैं तो यही हमारे पैसे कमाने का जरिया है तो मैं ही खोलती हूं अभी।

और बगल के स्कूल में पढ़ाई भी करती हूं। दसवीं का टेस्ट हो चुका है इसलिए अभी स्कूल नहीं जाना पड़ता है।" वो एक सांस में सबकुछ बोलती चली गई। उसके बात करने का अंदाज और उसकी मासूमियत मेरे दिल को छू गई। मैं झालमूढ़ी लेकर उसी के बगल में बैठ गया और इधर-उधर की बातें करने लगा। वो अपना काम भी कर रही थी और मुझसे बातें भी। उसने अपना नाम ममता बताया।बीच-बीच में कुछ और भी लड़के आकर कुछ खरीदने के बहाने उसे लाइन मार रहे थे। पता नहीं मुझे उन लड़कों से एक अजीब-सी चिढ़ हो रही थी,लग रहा था वो सिर्फ़ मुझसे ही बातें करे।

उसने मेरे में भी पूछा तो मैंने भी उसे सारी बातें बता दीं। बातों ही बातों में कब ट्रेन आने का वक्त हो गया मुझे पता ही नहीं चला। जब सचमुच ट्रेन आने वाली थी तो उस वक्त पता नहीं क्यों मुझे उसका साथ छोड़ कर जाने का मन नहीं कर रहा था,पर जाना तो था। मैं भारी मन से अपना बैग उठाया और कहा-"चलता हूं अब !" उसने मुस्कुराते हुए कहा- "आपसे बातें कर अच्छा लगा। फिर कब लौटना है ?" मैंने कहा-"पता नहीं !" ट्रेन प्लेटफॉर्म पर लग चुकी थी। चूंकि वहां ट्रेन सिर्फ एक मिनट के लिए ही रूकती थी तो मैं जल्दी से ट्रेन पर चढ़ गया।





चढ़कर मैं सीट की ओर नहीं जाकर गेट पर ही खड़ा होकर उसकी ओर ताकने लगा। वो लगातार मेरी ओर देख रही थी और साथ ही मुस्कुरा भी रही थी। अचानक ट्रेन खुली और धीरे-धीरे बढ़ने लगी तो जो कुछ हुआ मैं अवाक रह गया। जो काम एक लड़के को करना चाहिए वो काम वही कर गई ! मैं उसे जाते हुए भी बाय करने से आदतन डर रहा था कि वही पहले बाय कहकर मुस्कुराते हुए हाथ हिला दी। मैं भीतर से मस्ती में सराबोर हो गया और मैंने भी दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे स्टाइल में मुस्कुरा कर बाय कर दिया। ट्रेन खुलने से लेकर उसके बाय करने तक के छोटे-से लम्हे में हमारी आंखों की भाषा में जो बातें हुईं,उस पर एक और कहानी लिखी जा सकती है।

मैं थोड़ा संतोष और थोड़ी-सी उदास भावना लिए सीट पर जाकर बैठ गया। आज़ किता,गौतमधारा,गंगाघाट स्टेशनों की खुबसूरती में कुछ नयापन था। आज़ रास्ते की सुरंगों, जंगलों और नदियों के नजारे कुछ और ही थे। मैं उसी के ख्यालों में कब रांची पहुंच गया पता ही नहीं चला। इस वाकये के बाद काफ़ी बार नाना घर आना-जाना हुआ। लेकिन महज़ एक-दो बार ही उसका दीदार हुआ। उस वक्त उसके घर पर किसी का कोई फोन नहीं था कि नंबरों का आदान-प्रदान हो।

बस इन दो-तीन मुलाकातों में जो दो-चार बातें हुईं और आंखों से हुईं अनगिनत बातें ! इसके अलावा कभी न मेरी ओर से इज़हार हुआ और न ही उसकी ओर से ! कुछ महीनों बाद मैं अपने गांव चला गया। अब सिल्ली से रांची सफ़र का सिलसिला भी बंद हो गया था। वो कहां गई ये जानने का न जरिया मेरे पास था और न ही मैंने कोशिश की। पर जो भी हो ! वो छोटी-सी कहानी आज़ भी ज़ेहन में कभी-कभार आ ही जाती है। दुआ करूंगा कि जहां भी रहे वो बहुत खुश रहे।।


- कुणाल