साहित्य चक्र

20 February 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 20 फरवरी 2026



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“निशा की नीरव वीणा”

निशा की नीरव वीणा पर,
किसने मधुर स्वप्न छेड़ा है?
चाँदनी की चंचल छाया में
मन क्यों आज अकेला है?

वन की वीथियों में वायु
धीरे-धीरे कुछ गाती है,
सूनी सरिता की लहरों में
पीड़ा चुपके मुस्काती है।

तारों के अश्रु झिलमिल हैं,
अंबर का हृदय उदास है;
मेरे अंतर के कोने में
किस स्मृति का निवास है?

ओ दूर क्षितिज के दीपक!
किस आशा से तुम जलते हो?
मेरे मौन निमंत्रण को
क्या तुम भी सुनते-चलते हो?

मैं खोज रही उस छाया को
जो स्वप्नों में मुस्काती है,
जो हर मधुमय उषा बनकर
जीवन-पथ पर आती है।

निशा ढलेगी, उषा खिलेगी,
तम का आवरण टूटेगा-
मेरे अंतर्मन का पंछी
फिर से गान नया छेड़ेगा।


- डॉ सारिका ठाकुर 'जागृति'



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बातें, तो आख़िर बातें हैं
शब्दों का एक खेल हैं बातें
जिनसे मन बहलाता हूँ,
हासिल क्या हुआ और क्या होगा इनसे ?
यक्ष प्रश्न उठाता हूँ,
क्या ये कभी खत्म होंगी ?
ज़रा गौर फरमाइएगा
बातें, तो आख़िर बातें हैं,

कहीं से भी शुरू करो
थमने का नाम नहीं लेती बातें,
उतार देती है गहराई में कभी-कभी
मन में पैदा करती है उलझने,
हल जब तक कोई नहीं निकलता इनका,
ख़त्म होने का नाम नहीं लेती बातें,

सिलसिला इनका जब शुरू होता
रुकने का नाम फ़िर नहीं लेती बातें,
उठते हैं मन में कई सवाल इनको लेकर
कभी लगता है कि जवाब मिल गया, और
कभी लगता है कि अभी कोसों है दूर
बेनतीजा जब ये रहती,
मन को बहुत धड़काती ये बातें,

नादान सी कभी लगती बातें
कभी हंसाती तो कभी रुलाती बातें,
कईयों के मुख पर बहुत जचती बातें
अपना जब ये जादू दिखाती,
गिरगिट की तरह रंग बदलती बातें ,
सिवाय मौन के
कोई कुछ नहीं कर सकता इनका,
क्योंकि बातें, तो आख़िर बातें हैं


- बाबू राम धीमान


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जाति-पाति की गिरा दो दीवार

गिरा दो अब जाति-पाति की दीवार
हम आर्य हैं, हमें मत बाँटों मेरे यार
समाज में बन्द करो जाति की तकरार
हम हैं हिन्द का सब एक ही   परिवार

हमें विधाता ने सिर्फ इन्सान है बनाया
हम इसे भारत व इरान नक्से में लाया
हमने अपना समृद्ध हिन्दुस्तान  बनाया
फिर हमें जाति में क्यूं आपने गिनवाया?

कौन भेद भाव कर बाँट रहा है  समाज
इनका मुखड़ा उतार दो मिलकर आज
षड़यंत्र की है कोई देश में एक छुपी राज
वोट बैंक की है ये  गहरी खाई  की काज

हम भारत वासी है सब यहाँ पे भाई भाई
पड़ोस में रह रही है  हमारी अपनी  ताई
सब अपना है जहाँ  नहीं है कोई भी पराई
कौन पैदा कर रहा समाज में जाति की खाई

सभ्य समाज से बना है हमारा यह परिवार
जाति पाँति है रोग करना है इसका वहिष्कार
समाज को बाँटने वाले का हो यहाँ से तिरष्कार
कानून बना दो इस पर ओ मजबूत सरकार


- उदय किशोर साह



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दिल की अलमारी

दिल की अलमारी में बिखरा सा हर सामान है,
लगता है यहां कोई आया तूफान है,
तितर बितर हैं सहेजे हुए लम्हें,
औंधे पड़े हैं ख्यालों के पुलिंदे,
और सिलवटों में सिकुड़े हुए ख्वाब,
कहीं एक कोने में उदास पड़ा मासूम अरमान है
दिल की अलमारी में बिखरा सा हर सामान है।
फट गए है यादों के लिफाफे,
कुछ अनकही बातें चल पड़ी हैं,
दिल की अलमारी से बाहर की ओर
और खुल गई हैं तह नींदों की,
सुकून सिर्फ कुछ देर का मेहमान है
लगता है यहां कोई आया तूफान है।
कुछ नहीं रखा सलीके से,
ना यादें, ना ख्याल, ना उम्मीदें
रखीं है तो आज भी धड़कनें,
कुछ हलचल और अहसास,
जिनसे आज भी ये बहुत दिल परेशान है।
दिल की अलमारी में बिखरा सा हर सामान है।
हैं दिल की दराजे खाली सी,
सब कुछ फैला है इधर उधर
और खुली पड़ी है ये अलमारी,
दिल भटक रहा है क्या पाने को ?
इस बात से ये बिल्कुल अनजान है
लगता है यहां कोई आया तूफान है।


- मंजू सागर


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प्रतिध्वनि

मुझे मसल कर देख लो,
हाथों में खुशबू मेरी रह जाएगी।
इंतकाम गर लेना है तो,
शौक़ से लेना ये आरज़ू भी पूरी कर लो।

पता होगा तुम्हें -
समंदर सब कुछ लौटाता है,
फिर मेरी यादों को भी
फेंक कर देख लो।

मेरी तस्वीर से रंग छीनना चाहते हो,
छीन लो-श्याम श्वेत सी भी
जिंदगी जीना आता है।

रंगों से भरम तो टूटेगा,
आप और मैं रहेंगे सदा,
हम होने का भरम तो छूटेगा।

बनकर आए ख्वाब,
लेकिन ख्वाब को टूटना होता है।
हर मिलने वाले को यहां
बिछड़ना होता है।

तुम रास्ता थे,मंजिल समझ बैठा।
कारवां रुका रास्ते में-
सब कुछ लुटा के बैठा।


- रोशन कुमार झा


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फागुन

फागुन का रंग,
रचता हैं बसंत।
प्रेम का रंग,
प्रीत कुसुम अनंत।

महक उठता अंग,
संयम के प्रतिबन्ध।
रचते रस छन्द,
होती होली ले उमंग।

बौराते जन जन,
बांसुरी की तरंग।
आई रुनझुन रुनझुन,
कच्चे पक्के ले रंग।

गाते फागुन सँग,
प्रीत प्रकर पंथ।
नजरो की ठिठोली,
भरी प्रेम के भंग।

हँसे खामोश सुगंध,
जगे रंगों के रंग।
मिलकर होते सारे,
जग कर सारे रंग।


- मीना तिवारी


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उन्हीं की भाषा में उनको बस समझाने की ठानी है।

ये उकसावे की नीति नही तो इसे बताओ क्या बोलें ?
मानवता के दुश्मन को हम दैत्य नही तो क्या बोलें ?
अरे कितनी बार चेताया हमने एक न उसने मानी है,
अब उसी की भाषा में उसको बस समझाने की ठानी है।
बार बार समझाने पर भी मर्यादा को तोड़ दिया
भारत जैसी महाशक्ति से टकराने का मन जोड़ लिया।
आतंक के आका आसिम और शहवाज तनिक तुम धैर्य धरो,
मोदी जी यह सही समय है इनका तुम उद्धार करो।
अग्नि नही आकाश नही ब्रह्मोस इसी का उत्तर है।
जब- जब संधान किया हमने तब- तब पाक निरुत्तर है।

हर आतंकी की घटना पर हम उसके मौन को क्या बोलें ?
खुली पोल उन जालिम की अब और बताओ क्या खोलें?
हर बार दलीलें दी हमने पर एक न उसने मानी है।
अब उसी की भाषा में उसको बस समझाने की ठानी है।
ब्रेन वॉश कर भारत में नफरत को फैलाया है
भारत मां के अमन चैन पर पाक ग्रहण सा छाया है ,
प्रभाव ग्रहण का बढ़े उससे पहले उसका उपचार करो
प्रकाश निगलने से पहले उस पर तीखा प्रहार करो ।
जैश मुहम्मद लश्कर तैय्यबा सबने की मनमानी है
अब उसी की भाषा में उसको बस समझाने की ठानी है।
हर बार करी गद्दारी हमको दिया हमेशा धोखा है।
अस्त-व्यस्त भारत करने को सबकुछ उसने झोका है।

सबकुछ उसने झोंक दिया पर बाल न बांका कर पाया
जब रक्तचूर्ण अभियान चला, तब वैरी भी था थर्राया।
सीख न लेकर कोई अपितु एक न उसने मानी है,
अब उसी की भाषा में उसको बस समझाने की ठानी है।
बहुत हो चुकी लुका छिपी अब आकर इसको बन्द करो
यदि मां का दूध पिया तुमने तो आकर सीधे द्वन्द करो।
युद्ध धर्म की सभी विद्या द्धन्द में तुम्हे सिखा देंगे
जन्नत वाली हूरों से किये देरी बिना मिला देंगें ।
वसुन्धरा से जन्नत की हूरों की रची कहानी है
अब उसी की भाषा में उसको बस समझाने की ठानी है।


- करन सिंह ''करुण'


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प्रेम-विवाह

“प्रेम” शब्द सुनते-बोलते ही
एक नई ऊर्जा का संचार होने लगता है।

मनुष्य प्रेम में रहते हुए अपने जीवन के
सबसे सुखद पलों का आनंद ले रहा होता है,
पर शर्त है, वह प्रेम वासनाग्रस्त न हो।

प्रेम में रहने वाले दो प्रेमियों के
मध्य जन्म–जन्मांतर तक के वादे हो जाते हैं;
वे चले जाते हैं एक अलग दुनिया में, पर

जब वह इस समाज की सच्चाई से वाकिफ होते हैं
तो उन्हें ही घृणा होने लगती है “प्रेम” से।

समाज सब कुछ बर्दाश्त कर सकता है;
सिर्फ दो प्रेमियों के मिलन को छोड़कर, पर

यदि प्रेम को जीवन का भाग मान लिया जाये
तो समाज भी एक दिन टेक देगा घुटने प्रेमियों के आगे।


- सुभाष "अथर्व"


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मेरी अंजुमन में आने की
अब खता ना किजिए
इस कदर मेरी दिल को
और दगा ना दिजिए
मेरी अंजुमन मे आने की…

मेरी रूह से निकलती है
तेरी लिए आहे
मेरी आह को पाने कि
सजा ना किजिए
मेरी अंजुमन मे आने की…

मै देखती रही उन्हे
अक्स भरी निगाहो से
मुझे मोम को पत्थर बनने की
दुवा ना दिजीए
मेरी अंजुमन मे आने की…


- किरन शर्मा


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नूरानी आँखों में हजारों ख्वाब सँजोती
प्यारी लगती हैं बेटियाँ।
घर के काम खत्म करके, किताबें
पढ़ती प्यारी लगती हैं बेटियाँ।
हरेक मुद्दे पर बेबाकी से नजरिया बताती
प्यारी लगती हैं बेटियाँ।
पार कर दहलीज आँगन की मनमौजी से मुसकाती
प्यारी लगती हैं बेटियाँ।
अपने हर फर्ज को बेताबी से निभाती
प्यारी लगती है बेटियाँ।
बाबा का सहारा बनकर लाठी थामती
प्यारी लगती है बेटियाँ।
माँ, बहन, बीवी के फर्ज को एहतियात से निभाती
प्यारी लगती है बेटियाँ।
खुद के वजूद को सहेजती-सुलझाती
प्यारी लगती है बेटियाँ।


- नितेश पालीवाल 'नूर'


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हम उदास होते ही ढूंढते हैं तुम्हें
सुबह और शाम ढूंढते हैं तुम्हें

जैसे तुम आ ही रही हो ढूंढते हैं तुम्हें
हर सवाल और जवाब में ढूंढते हैं तुम्हें

तुम चांद सी चमकती हो हरदम
तुम्हें पाने की ज़िद में ढूंढते हैं तुम्हें

हर क्लास हर सांस में ढूंढते हैं तुम्हें
हर एक एहसास में ढूंढते हैं तुम्हें


- मनोज कौशल


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तुम देना साथ मेरा

ओ प्रिये, तुम देना साथ मेरा
जब थक जायेगा राहों में कदम मेरा
जिंदगी की ये राह आसान नहीं
रूक जाता है पग मेरा कहीं-कहीं
लक्ष्यहीन हो जाता हूँ, मायूस होकर
कि जब खाता हूँ राहों में ठोकर
अकेला राही मैं, कुछ समझ न पाता हूँ।

कुसुम पथ पर भी काँटे महसूस करता हूँ
होकर थका हारा बेसहारा बनकर पथिक
मिलता नहीं है मेहनत का उचित पारिश्रमिक
ऐसे वक्त में तेरी आती है बहुत याद
कि कितनी अच्छी होती यदि तू होती मेरे साथ।
बाँट लेते आपस में ही सुख-दुःख को
मिटा लेते मन के भूख को
दो-चार प्रेम की बातें कर लेते
प्रिये, यदि तुम मेरे साथ में होते ?

यूँ ही हंसते रोते काट लेते सफर
दिल में रहता न कोई कसर
चलो प्रिये अब उठो ना तुम भी
पुकार रहा है तुझे चुन्नू कवि
एक मीठी मुस्कान दे खिला दो मेरा चेहरा
अब थक गया हूँ प्रिये, साथ दो मेरा


- चुन्नू साहा



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बसंत का आगमन

​ऋतु वसंत का हुआ पदार्पण,
स्वागत में खेतों में सरसों खिली।

​वृक्षों पर नव-कोपलें हैं आईं,
पवन भी सर-सर मस्त चली।

​दूर कोकिला फगुआ गाती,
अमवा पर सुंदर मंजरी खिली।

​खेतों ने भी ली है अंगड़ाई,
मुस्का रही गेहूँ की बाली।

​रंगों का पावन त्योहार आया,
उड़ रहे चहुँ ओर अबीर-गुलाल।

​छोड़ क्लेश, मन प्रेम-रंग में रँगना,
छाएगी खुशियों की फिर नव बहार।


- राघवेंद्र प्रकाश 'रघु'



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यह दुनियां न तेरी न मेरी

यह दुनियां किसी की नहीं है जागीर
कठपुतली हैं सब यहां राजा हो या फकीर
अपना किरदार निभाकर सबको है जाना
मिलेगा वही किसी को जो लिख देती है तकदीर

कोई यहां गरीब है कोई जन्म से अमीर
ईमानदार है कोई किसी का मर गया है ज़मीर
तकदीर के भरोसे मिल रहा किसी को सब कुछ
कोई बन गया है राजा और कोई बना बज़ीर

न कोई किसी के साथ आता है
न कोई किसी के साथ है जाता
मिलना भी उसी से होता है यहां
जिससे होता है कोई पिछले जन्म का नाता

किस्मत में जो होगा वह मिलकर रहेगा
उसे कोई छीन नही पायेगा
जो हमारा नहीं है वह लाख कोशिश पर भी नहीं मिलेगा
उसे हथेली पर से छीन कर भी कोई ले जाएगा

छोड़ना पड़ेगा सब कुछ एकदम जब बुलावा आएगा
आंख बंद हो जाएगी कुछ देख नहीं पाएगा
दूर खड़े देखेंगे सब तेरी अंतिम विदाई
अपना जिसको समझता रहा पास आने से भी घबराएगा


- रवींद्र कुमार शर्मा


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18 February 2026

एपस्टीन फाइल्सः सच, सन्नाटा और समाज का आईना


Jeffrey Epstein का नाम आज केवल एक व्यक्ति का नाम नहीं रह गया है; वह एक ऐसे अंधेरे अध्याय का प्रतीक बन चुका है, जिसने मानवता, न्याय और नैतिकता- तीनों को कठघरे में खड़ा कर दिया। “एपस्टीन फाइल्स” केवल कागज़ों का पुलिंदा नहीं हैं। वे उन अनसुनी आवाज़ों की प्रतिध्वनि हैं, जिन्हें कभी शक्ति, प्रभाव और धन के शोर में दबा दिया गया था।





जब यह मामला सामने आया, तो दुनिया ने देखा कि कैसे प्रभावशाली लोगों के बीच भी अपराध छिप सकते हैं। कैसे सत्ता और संपर्क कभी-कभी सच्चाई पर पर्दा डाल देते हैं। और कैसे पीड़ितों की चुप्पी को वर्षों तक अनसुना किया जाता है। इन फाइल्स में सिर्फ नाम नहीं हैं- इनमें विश्वासघात की कहानियाँ हैं, टूटे हुए बचपन हैं, और उस समाज का आईना है जो कभी-कभी सच जानकर भी चुप रह जाता है।

कई लोगों के लिए यह केवल एक “स्कैंडल” हो सकता है। पर जिनकी ज़िंदगियाँ प्रभावित हुईं, उनके लिए यह जीवन भर का घाव है। एपस्टीन की कहानी हमें यह सिखाती है कि न्याय में देर हो सकती है, पर सच को पूरी तरह दफन नहीं किया जा सकता। जब दस्तावेज़ खुलते हैं, तो केवल तथ्य नहीं निकलते- वे हमारी सामूहिक जिम्मेदारी को भी उजागर करते हैं।

यह आलेख किसी सनसनी के लिए नहीं, बल्कि एक स्मरण के लिए है- कि समाज की वास्तविक शक्ति उसके प्रभावशाली लोगों में नहीं, बल्कि उसके नैतिक साहस में होती है। जब भी “एपस्टीन फाइल्स” का नाम लिया जाएगा, वह हमें याद दिलाएगा- कि चुप्पी भी कभी-कभी अपराध की साझेदार बन जाती है। और सच बोलना, चाहे देर से ही सही, मानवता का सबसे बड़ा कर्तव्य है।


- प्रफुल्ल सिंह "संवेदन स्पर्श"


सादगी की रोशनी


शहर की चमक-दमक में पला-बढ़ा आरव हमेशा मानता था कि सफलता का मतलब बड़ा घर, महँगी गाड़ी और लोगों के बीच प्रसिद्धि है। कॉलेज से निकलते ही उसने एक बड़ी कंपनी में नौकरी पा ली। तनख्वाह अच्छी थी, जीवन तेज़ रफ्तार से आगे बढ़ रहा था, पर भीतर कहीं एक अजीब-सी खालीपन की धुंध छाई रहती।

एक दिन कंपनी के प्रोजेक्ट के सिलसिले में उसे पहाड़ों के एक छोटे-से गाँव जाना पड़ा। वहाँ इंटरनेट कम चलता था, सड़कें कच्ची थीं और बाजार भी छोटा था। आरव को लगा जैसे वह समय में पीछे आ गया हो। गाँव में उसकी मुलाकात हुई- एक बुज़ुर्ग शिक्षक, शंभूनाथ जी से।





वे एक छोटे-से कच्चे घर में रहते थे। पहनावा साधारण, भोजन सादा, लेकिन चेहरे पर अद्भुत शांति। गाँव के बच्चे उन्हें “गुरुजी” कहते और रोज़ शाम को उनके आँगन में पढ़ने आते।

आरव ने एक दिन उनसे पूछा, “गुरुजी, आपने शहर जाकर बड़ी नौकरी क्यों नहीं की? यहाँ तो सुविधाएँ भी नहीं हैं।”

शंभूनाथ जी मुस्कराए, “बेटा, सुविधा और सुख एक नहीं होते। सुविधा बाहर से मिलती है, सुख भीतर से उगता है। मैंने सादगी चुनी, क्योंकि सादगी मन को हल्का रखती है।”

आरव चुप हो गया। अगले कुछ दिनों में उसने देखा- गुरुजी बच्चों को पढ़ाने के बाद खेतों में किसानों की मदद करते, बीमारों के लिए जड़ी-बूटियाँ लाते और शाम को नदी किनारे बैठकर ध्यान करते। उनके पास धन नहीं था, पर सम्मान और स्नेह की संपदा अपार थी।

एक शाम आरव नदी किनारे उनके साथ बैठा था। पहाड़ों के पीछे सूरज ढल रहा था। गुरुजी बोले, “सादगी का अर्थ अभाव नहीं है। यह तो इच्छाओं का संयम है। जब मन अनावश्यक चाहतों से मुक्त होता है, तभी वह सच्ची समृद्धि को पहचानता है।”

उनकी बातें आरव के मन में गूंजती रहीं। शहर लौटते समय उसने महसूस किया कि गाँव की शांति उसके भीतर कहीं बस गई है। शहर आकर उसने अपने जीवन की रफ्तार धीमी की। अनावश्यक खर्च कम किए, सप्ताहांत में झुग्गी-बस्तियों के बच्चों को पढ़ाना शुरू किया और हर दिन कुछ समय स्वयं के लिए निकालने लगा। धीरे-धीरे उसके चेहरे पर भी वही संतोष झलकने लगा, जो उसने गुरुजी में देखा था।




कुछ महीनों बाद जब वह फिर गाँव गया, तो गुरुजी ने उसे देखकर कहा, “लगता है, तुम्हें तुम्हारी सच्ची संपदा मिल गई।” आरव ने नम्रता से उत्तर दिया, “हाँ गुरुजी, अब समझ आया कि सादगी ही सच्ची संपदा है।”

उस दिन आरव ने जाना- धन से जीवन सजता है, पर सादगी से जीवन संवरता है। बाहरी वैभव क्षणिक है, पर सरलता और संतोष ही वह दीपक हैं जो जीवन भर प्रकाश देते हैं।


- रेखा चंदेल



मेरा और तुम्हारा ईश्वर!


तुम्हारे और मेरे धार्मिक होने में धरती और आसमान का फर्क है। तुम पंडित, मौलाना, पादरी और आदि धर्म गुरु के बताए गए मार्गों या कर्मों को ही धर्म समझ लेते हो। मगर मैं अन्याय के खिलाफ लड़ना, सच को सच व गलत को गलत कहना और अत्याचार के विरुद्ध खड़ा होने को अपना धर्म मानता हूं। मेरे से नहीं होती काम चोरी, मेरे से नहीं बोला जाता झूठ, मैं इंसानों में नहीं कर पाता हूं भेद और मैं अपने धर्म को सर्वश्रेष्ठ घोषित नहीं करता हूं, क्योंकि मैं तुम्हारे जैसा धार्मिक नहीं हूं। 





हां तुम करते होंगे दिन-रात पूजा-पाठ और पांच वक्त की नमाज़ अदा... मगर मैं नहीं करता। क्योंकि मेरा ईश्वर (प्रकृति) मुझे किसी भी बंधन में नहीं बांधता है। तुम्हारे ईश्वर और अल्लाह ने तुम्हारे लिए नियमों की सूची बना रखी है। मेरा ईश्वर (प्रकृति) मुझे सभी जीव जंतुओं को बराबर मानने या देखने को कहता है। तुमने अपने ईश्वर और अल्लाह को कभी देखा नहीं होगा, मगर मैं अपने ईश्वर (प्रकृति) को हर रोज देखता और महसूस करता हूं। मेरा ईश्वर (प्रकृति)मुझ से हर रोज सूर्य की पहली किरण के साथ संवाद की शुरुआत करता हैं और शाम की संध्या के साथ संवाद को विराम देते हैं।




मुझे नहीं पता तुम्हारा ईश्वर और अल्लाह तुम्हारे सुख-दुख में शामिल होते हैं या नहीं, मगर मेरा ईश्वर (प्रकृति) मेरे साथ हमेशा खड़ा रहता हैं। मेरा ईश्वर (प्रकृति) मुझे अपना विकराल रूप भी दिखता है, डरता है, हंसना है और मेरे लिए लड़ता भी है। इतना ही नहीं बल्कि मुझे जिंदा रखने के लिए कई बार खुद बीमार भी पड़ जाता है। बस यही फर्क है तुम्हारे और मेरे ईश्वर में... इसलिए मैं तुमसे अलग हूं।


                                                           - दीपक कोहली




आज की प्रमुख कविताएँ- 19 फरवरी 2026






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मासिक वेदना

हर माह चुपचाप चली आती,
दर्द की हल्की आह सुनाती,
तन में जैसे तूफ़ान उठे,
मन में गहरी थकान जगाती।

कमर झुके पर हौसला ऊँचा,
चेहरे पर मुस्कान सजाती,
पीड़ा की हर लहर को सहकर,
कर्तव्य पथ पर बढ़ती जाती।

कभी ऐंठन, कभी उदासी,
आँखों में नमी भी लाती,
फिर भी जीवन की इस धारा को
शक्ति बनाकर अपनाती।

यह कमजोरी का चिह्न नहीं है,
यह सृजन की पहचान कहलाती,
मासिक वेदना की हर बूंद
नारी की महिमा गुनगुनाती।


- डॉ. सारिका ठाकुर 'जागृति'


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हुंकार: न्याय की मशाल


उठो राष्ट्र के भाग्य विधाता, मौन त्यागना होगा अब,
अपने हक की खातिर तुमको, खुद ही जागना होगा अब।
शमसाबाद की पावन धरती, आज गवाही देगी यह,
शिक्षक के स्वाभिमान की, ज्वाला नहीं दबेगी अब।

दशक बीत गए सेवा में, अब परीक्षा की बात चली,
कलमकार के स्वाभिमान पर, क्यों यह तीखी घात चली ?
अनुभव की जो पूंजी है, वह सब डिग्रियों से भारी है,
सम्मान हमारा मत छीनो, यह चेतावनी हमारी है।

वो पुरानी पेंशन जो है, संबल है लाचारी का,
हक छीनकर मार्ग चुना क्यों, शासन ने हठकारी का ?
सींचा है भविष्य भारत का, हमने अपना रक्त जला,
पर न्याय मांगते शिक्षक का ही, क्यों घोंटा जाता गला ?

मर्यादित अनुशासित हम हैं, संविधान को मानते,
पर अधिकार किसे कहते हैं, शिक्षक अच्छे से जानते।
आयुष! तुम हुंकार भरो अब, स्वर को अपने तेज करो,
अन्याय के आगे झुकने से, तुम साफ मना-परहेज करो।

संगठित हो साथ चलो सब, संगठन ही शक्ति है,
अधिकारों की लड़ाई लड़ना, सबसे बड़ी भक्ति है।
जब तक पेंशन बहाल न होगी, चैन न हम पा पाएंगे,
शिक्षक संघ के ये सेनानी, अब पीछे न हट जाएंगे।


- देवेश चतुर्वेदी


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मेथी के फूल

मेथी के फूलों ने कहा मुझसे
क्यों देख रहे हो मेरी ओर,
मैं तो बस एक अदना सा फूल हूँ
अपनी खुशबू से महकता हूँ,

मेरी ओर देखने से
क्या तुम्हें मिलेगा कुछ ?
मैं तो मात्र एक फूल हूँ
अपनी जिन्दगी खुद जीता हूँ,

क्यों है तुम्हारी नज़रें मुझ पर
क्या तुम्हें मेरी जरूरत है?
मैं तो बस एक छोटा सा हिस्सा हूँ
इस बड़ी दुनियां का,

मेथी के फूलों की बातें सुनकर
मैंने सोचा अपने मन में,
कुछ पल तुम्हें देख कर ऐ दोस्त
अपना मन बहलाता हूँ,

तेरी इन नन्हीं पंखुड़ियों में प्यारे
एक रूहानी सुन्दरता है,
बरबस खिंचती है वह मुझे
उसकी खुशबू में खो जाता हूँ।


- बाबू राम धीमान


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बसंत ऋतु

शीत ऋतु के बाद अब बसंत ऋतु आ रही है,
पेड़ पौधों पर नवजीवन की बाहर आ रही है।

मौसम बदला सर्दी जा रही है गर्मी आ रही है,
ठिठुरन हो रही है गायब तपत वापिस आ रही है।

हल्के सूती कपड़े अब फिर बाहर आने लगे हैं,
गर्म कपड़ों की पोटली फिर संदूक में जा रही है।

हीटर गीजर को मिलेगा अब कुछ आराम,
पंखे कूलर ऐ सी की बारी अब आने लगी है।

अंगीठी,धूप सेंकने की रुत वापिस जाने लगी है,
ठंडी छांव खातिर अब पेड़ों की याद आने लगी है।

गेहूं पक रही है पीली सरसों लहलहा रही है,
रंगों का त्यौहार होली भी चुपके से आ रही है।

गौरैया घोंसले बनाने लगी,कोयल गाने लगी है,
और देखो बसंत रंग बिरंगे फूल खिला रही है।

परिवर्तन है कुल ब्रह्मांड का अटल नियम,
इसी नियम में बंध अब बसंत ऋतु आ रही है।


- राज कुमार कौंडल


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कदम-कदम पर लगा मेला है बहुत।
लब ए जान की खातिर झमेला है बहुत।

जितनी सड़क होती जाती चौड़ी यहाँ,
उतना ही बढ़ रहा नित रैला है बहुत।

छूँछ पैलगी जिउ झन्न का दौर है दोस्तों,
भले संभाले रहो सब अपना थैला है बहुत।

सिर्फ लिबास में है कोबरा परन्फ्यूम है,
मगर हर किसी के मन में भरा मैला है बहुत।

सारी हेकड़ी निकाल ली पहली ही रात में,
पहले जो निकलता था बनके छैला बहुत।

जिंदगी की रेसिपी को समझना आसान नहीं विकास,
हाथ में जो ककड़ी है खाने पर लगता है करैला बहुत।


- राधेश विकास


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दो जीव

एक खेत मे थे भगवान के रचे दो जीव,
एक था जानवर और एक था इंसान,
उसके लिए वो जानवर था वरदान,
वो इंसान कराता था उससे मजदूरी,
वह भी करता था मन से हुजूरी,
वो दोनों पूरे तन से जोतते थे खेत,
रात मे फिर भरते थे अपना पेट,
इंसान का तो यह कर्म था,
उस जानवर का यह धर्म था,
मन से करत थे काम, दोनों थे मेहनती,
वो दोनों एक दूसरे के थे साथी,
पर, एक थक जाता,
तो दुसरे को खानी पड़ती लाठी,
दोनों करते थे भगवान से विनती,
एक को चाहिए थी पसल अच्छी,
तो, एक तो चाहिए थी कमज़ोर लाठी,
दोनों की विनती थी सच्ची,
दोनों थे भगवान के ही रचे,
इस बात को समझने के लिए थे कच्चे।


- प्रणव राज


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वक्त के ऐतबार से ख़ामोश हूं मैं....

ना मंद पड़ी हैं गुबारें दिल की,
ना ही चूक गया हूं मैं।
हालात की दुश्वारियों से,
हां थोड़ा सा रुक गया हूं मैं।

वक्त के ऐतबार से ख़ामोश हूं मैं....

दबा के हसरतें दिल में कहीं,
तेरी नज़रों से बस छुप गया हूं मैं।
जुर्म तेरी ही सही मगर तेरी खातिर,
बेवजह भी झुक गया हूं मैं।

वक्त के ऐतबार से ख़ामोश हूं मैं....

आदी हूं हमेशा बादशाहत का,
हां ज़रूर अभी लुट गया हूं मैं।
हर सितम का हिसाब लूंगा वक्त आएगा,
तमाशों से तेरी ऊब गया हूं मैं।

वक्त के ऐतबार से ख़ामोश हूं मैं....


- कुणाल


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मैं इसलिए साथ हूँ…

किसी ने पूछा मुझसे यूँ ही,
“तुम हर किसी के लिए क्यों खड़ी रहती हो?”
मैं मुस्कुराई हल्की-सी,
और दिल की आवाज़ से कहती गयी-

क्योंकि मैंने भी वो रातें देखी हैं,
जब आंसू तक हमसफ़र नहीं थे,
भीड़ तो थी चारों ओर मगर,
दिल के लिए कोई दर नहीं थे।

मैंने महसूस किया है वो सन्नाटा,
जो शब्दों से भी गहरा होता है,
जब इंसान टूटता अंदर से,
पर बाहर से बस ठहरा होता है।

शायद इसलिए मैं ठहर जाती हूँ,
जब कोई चुपचाप बिखर रहा हो,
शायद इसलिए हाथ बढ़ा देती हूँ,
जब कोई खुद से ही डर रहा हो।

मैं जानती हूँ अकेलापन क्या है,
और उसका बोझ कितना भारी,
इसलिए बन जाती हूँ छाँव कभी,
किसी की तपती दोपहरी सारी।

अगर मेरे होने से
किसी का एक पल हल्का हो जाए,
तो मेरे बीते दर्द का मतलब
शायद थोड़ा सा समझ में आ जाए।


- आरती कुमारी


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ये इश्क नहीं आसां

जुनून–ए–इश्क है मगर इकरार कैसे करूं ?
मैं उस अजनबी शख्स से प्यार कैसे करूं ?
आदतन बदल गई हूं उसके हिसाब से ,
वो सामने आ जाए तो मैं इजहार कैसे करूं ?
तेरे रूबरू आते ही उड़ जाते हैं होश मेरे ,
अपनी धड़कनों पर ऐतबार कैसे करूं ?
नकाब में हूं कि मुझको कहीं जमाना ना देख ले ,
इस नकाब को लिए तेरा दीदार कैसे करूं ? 
जिसे मालूम ही नहीं मेरे दिल का मुआमला
इस दिल को लेकर उससे तकरार कैसे करूं ?
काश ! आ जाए इस बहाने वो मेरा हाल पूछने
लेकिन मैं खुद को इतना बीमार कैसे करूं ?
जुस्तजू है कि पहल उसकी तरफ से ही हो
मगर तब तलक मैं वक्त का इंतजार कैसे करूं ?
कनीज़ नहीं मल्लिका बनने की चाहत है ,
तेरी सल्तनत में मैं खुद का अख्तियार कैसे करूं ?
ये इश्क नहीं आसां इतना तो समझ लिया है ,
ये आग का दरिया है इसे पार कैसे करूं ?


- मंजू सागर


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शिक्षक की वेदना

जब थामी थी इस विभाग की डगर, मन में एक अरमान जगा था,
मजदूरों के उन नन्हे दीयों में, सूरज सा एक तेज दिखा था।
सोचा था, जो पसीने से तर हैं उन मजदूरों के लाल पढ़ाऊंगा,
शिक्षा की अलख जगाकर मैं भी, देश सेवा का मान बढ़ाऊंगा।

मगर... कलम हाथ में थामी थी, पर काम सैकड़ों आ गए,
शिक्षण के उन पावन क्षणों को, विभागीय झमेले खा गए।
कभी जनगणना की चौखट, कभी मतगणना का शोर है,
कभी पोलियो की खुराक, तो कभी चुनावी जोर है।

किताबों की खुशबू के बदले, राशन का हिसाब रखना पड़ता है,
धनिया, पुदीना, मिर्च-मसाले के, कड़वे सच को चखना पड़ता है।
कभी सिलेंडर का बोझ कंधों पर, कभी मीनू की तैयारी है,
क्या एक शिक्षक के जिम्मे ही, ये दुनिया भर की जिम्मेदारी है?

मन कहता है कि गर छोड़ ये सब, बस अक्षर ज्ञान सिखाता मैं,
तो सरकारी स्कूल के टाट से भी, 'आईएएस' बनाता मैं।
इन बच्चों की आंखों में भी, अफसर बनने के सपने हैं,
पर व्यवस्था के इन चक्रव्यूहों में, फंसे हुए हम अपने हैं।

फिर भी... जो लम्हे बचते हैं आपाधापी में, उनमें प्राण फूँक देता हूँ,
जितना भी मिलता है समय, पूरी निष्ठा से झोंक देता हूँ।
थका हुआ हूँ उलझनों से, पर हार नहीं मानी है,
राष्ट्र के इन नौनिहालों की, लिखनी नई कहानी है।


- आयुष गंगवार


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मन

इतने सारे
यातायात के साधन हैं
लंबी से लंबी दूरी
तय करने के लिए
अब चाँद भी
थोड़ा नजदीक है
और हाँ
अंतरिक्ष,मंगल भी।
काश! एक रेलगाड़ी
मेरे मन से
तेरे मन तक भी जाती।


- अनिल कुमार मिश्र


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शवों को जलाओ या दफनाओ... उन शवों को क्या फर्क पड़ता है ?
जिनके जाने के बाद तुम रो रहे हो दुनिया को दिखाने के लिए कि तुम्हें उसके जाने का कितना दुःख है।
क्या सच में दुःख है! अगर है तो फिर उसके साथ क्यों नहीं चले जाते हो ?
सच कहूं- तुम अपने स्वार्थ के लिए उनसे प्रेम का ढोंग करते हो।
- दीपक कोहली


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