देखा है
मैंने देखा है-
बचपन को कुम्हलाते हुए,
भूख से बिलबिलाते हुए।
कूड़े में अपने हिस्से की
जूठन चुनते हुए।
तुम बात करते हो
बस अपने मन की,
उन्हें झूठे दिलासे देते हुए।
मैंने देखा है-
बच्चियों को तन पर,
चिथड़े लपेटे हुए,
खेलने की उम्र में
खिलौने के भाव बिकते हुए।
तुम बात करते हो
आधी आबादी की,
पर सच से मुँह मोड़ते हुए।
मैंने देखा है-
बुढ़ापे को कल की लड़ाई
आज हारते हुए,
सपनों के टिमटिमाते दीप
खुद ही बुझाते हुए।
दवा की खातिर
ज़िंदगी दाँव पर लगाते हुए।
तुम क्या बात करते हो-
उनका हक़ मारकर
खुद पर लुटाते हुए।
मैंने देखा है-
कतारों में खड़ी भीड़ को,
जेबें जिनकी खाली हैं।
कल भी हालत पतली थी,
आज भी वही बदहाली है।
पहले था राम भरोसा,
फिर दिया तुमने दिलासा।
अब बस बातें करते हो,
खुद की जेबें भरते हो-
और कहते हो- सब अच्छा है!
मैंने देखा है-
ललक पढ़ाई की,
चाहत सिंचाई की,
मार महँगाई की।
तुम तो आसानी से
मुँह मोड़ जाते हो,
हर सवाल को टाल जाते हो,
और बात करते हो
बस ढिठाई की।
- रोशन कुमार झा
*****
भय
जब जब तू पास है आता
इंसान को भीरू है बनाता।
मन में छाई रहती नकारात्मकता
जीवन को मृत्यु की ओर है धकेलता।
हर पल घबराया घबराया सा रहता
किसी भी कार्य को मन नहीं करता।
शिथिलता, अकेलापन से सामना होता
आत्मविश्वास भी खोया जाता।
जोर की आवाज जब कहीं से आती
मन में भय की बदली छा जाती।
किसी से बात करने में घबराहट होती
जिंदगी बस एकांतपन को ही ढूंडती।
भय है कुछ ऐसी ही बीमारी
जो सारी खुशियां छीन लेता है हमारी।
भय को स्वयं पर हावी न होने देना
इसके विरुद्ध अभियान जरूर चला लेना।
जहां जहां आत्मविश्वास हुआ नीचा
भय ने अपनी जड़ों को वहां है सींचा।
जीवन को व्यस्त और खुशनुमा बनाए रखना
फिर भय जैसे राक्षस को नहीं पड़ेगा देखना।
- विनोद वर्मा
*****
पहले खुद को खोज
मिल ही जाएँगे तेरे जवाब तुझे,
पहले तू खोज... तुझे जानना क्या है।
दुनिया के सवालों में उलझा है क्यों,
एक बार पूछ..तुझे पाना क्या है।
राहें तो बहुत हैं इस जीवन-पथ पर,
हर राह का अपना ही अफसाना है।
किस ओर चलेगा, यह तय कर पहले,
फिर मंज़िल को भी तो आना है।
दूसरों के आईने में खुद को न देख,
तेरा चेहरा तेरा ही तराना है।
जो भीतर बैठा चुपचाप तुझे देख रहा,
उससे मिलना ही असली खजाना है।
- नरेंद्र मंघनानी
*****
छोटा हूँ तो क्या हुआ, मन में बड़ा विचार।
बूँद-बूँद से भर रहा, सागर का भंडार।।
नन्हा दीपक क्या करे, पूछे जग संसार।
अँधियारा छँटता वही, जब जले एक बार।।
कद छोटा हो तो रहे, हौसला आसमान।
पर्वत भी झुकता कभी, देखे दृढ़ इंसान।।
कण-कण मिलकर बन गया, धरती का आकार।
छोटा कोई भी नहीं, यदि भीतर है सार।।
बूँद अकेली क्या करे, हँसे अगर संसार।
बूँद-बूँद मिलकर बने, सागर देख अपार।।
चींटी छोटी है मगर, चढ़ती ऊँचा शैल।
मेहनत जिसके साथ हो, जीत उसी का खेल।।
नन्हा बीज दिखे मगर, भीतर वन का राज।
समय मिले तो दे सके, धरती को नव साज।।
छोटी सी मुस्कान में, छिपा बड़ा संसार।
जिसने दिल से दे दिया, उसका ऊँचा प्यार।।
शब्द भले हों चार ही, रखते गहरा मोल।
सच्चे मन से निकलकर, खोलें मन के बोल।।
छोटी सी कोशिश करे, बदल सके हालात।
एक कदम ही खोलता, मंजिल तक की बात।।
नन्ही किरणें भोर की, हरती तम हर बार।
छोटा होकर भी बने, सूरज का आधार।।
माटी का कण क्या करे, सोच रहा हर हाल।
मिलकर वही बना सके, सुंदर भवन विशाल।।
छोटी नाव भँवर फँसी, रखती अपना मान।
जिसके भीतर साहस हो, पार करे तूफान।।
छोटी गलती मानकर, बड़ा बने इंसान।
झुकने वाला ही सदा, पाता सच्चा मान।।
कम साधन से भी रचे, सपनों का संसार।
हिम्मत जिसके पास हो, उसको क्या दरकार।।
नन्हे पंखों से उड़ें, सपने लेकर साथ।
आकाशों की दूरियाँ, बन जाती दो हाथ।।
छोटा हूँ तो क्या हुआ, भीतर मेरा मान।
कर्मों से पहचान हो, यही बड़ी पहचान।।
- डॉ. प्रियंका सौरभ
*****
पहले गांव था अब है नदी
प्रकृति से करने चला था मुकाबला
बड़ा सा घर रेत की तरह ढह गया
अब तो केवल नदी नज़र आती है वहां
गांव तो तिनके की तरह बह गया
तिनके की तरह उड़ गया टिक नहीं पाया
प्रकृति ने मानव को बहुत समझाया
फिर भी कर रहा अपनी मनमानी
जानबूझ कर सब का कर रहा सफाया
प्रकृति जब लगी अब लेने इंतक़ाम
तब लगा याद आने भगवान का नाम
कल तक जो समझता था खुद को बड़ा
थर थर कांप रहा जब आफत में फंसी है जान
आदमी का कुछ ऐसा ही बन गया है स्वभाव
अपने आपको समझने लगा है नबाब
कुदरत को तो कुछ मानता ही नहीं
जमीन अच्छी नहीं लगती उड़ने के देखता रहता ख्वाब
पहाड़ खोदे,पेड़ काटे सड़कें बनवाई
बैठे बिठाए ले ली प्रकृति से लड़ाई
प्रकृति से मत करो खिलवाड़ सबने समझाया
पर यह बात एहंकारी की समझ में न आई
प्रकृति देती है सबको भरपूर प्यार
बिना बात के नहीं करती कभी किसी से तकरार
लेकिन जब कोई लगे सिर पर बैठकर नाचने
तो देरी नहीं करती झट से देती है उसका भूत उतार
- रवींद्र कुमार शर्मा
*****
विलय
चंचल बारिश अब आकर
टीस दिल में जगा गई
बिरहन फिर से मचल उठी
नीर भी आग लगा गई।
बैठी नदी के कूल पर
कंधे तेरे रखकर सर
बूँदे झट से बरस पड़ी
कुछ बूँद ठहरी अधर पर।
सन गई अब तो प्रीत से
बूँदे मुझको रिझा गई,
बिरहन फिर से मचल उठी
नीर भी आग लगा गई।
छुआ जो बूँद को तुमने
देख दहके ये तन बदन
नटखट बारिश रह रहकर
बढ़ा रही दिल की धड़कन।
मन पर काबू कैसे हो
रीत मीत को सीखा गई
बिरहन फिर से मचल उठी
नीर भी आग लगा गई।
तेरे वलय में सिमट कर
भीग रही थी बारिश में
प्रेम पयोधि उमड़ पड़ा
बादल की ही साजिश में।
नमी ने बूंदों की मन में
बीज प्रणय की उगा गई।
बिरहन फिर से मचल उठी
नीर भी आग लगा गई।
अब रक्तिम आनन हो गया
काया भी कंचन हो गई
मैं कहाँ रह गई थी मैं
सखे वक्ष वलय में खो गई।
आँचल में लम्हों को रख
जीवन अपना सजा गईं
बिरहन फिर से मचल उठी
नीर भी आग लगा गई।
- सविता सिंह मीरा
*****
वो कदरदान दोस्ती के हैं।
जो मददगार हर किसी के हैं।
वो हमेशा मिलेंगे मुस्काते,
जो तलबगार हर ख़ुशी के हैं।
टिमटिमाते रहेंगे वो हरदम,
राहबर जो यहाँ सभी के हैं।
आँख से वास्ते निभाते हैं,
अक्स जो दूर रोशनी के हैं।
हैे सभी के लिए दुआ उनकी,
जो निगहबान ज़िंदगी के हैं ।
नाज़ रखते हैं सोचपर अपनी,
वो जिन्हें बात के सलीके हैं।
- नवीन माथुर पंचोली
*****
हस्ताक्षर
परिणय की मधुर रात्रि में,
दिखाना अपना पौरुष बल
प्रथम मिलन से पहले,
तुम अपने हाथों से उतार देना
मेरी नथ.... मेरा टीका
मेरे कंगन और झुमके
कर देना मुक्त मुझे मंगलसूत्र से,
उतार लेना मेरी गर्दन से
गजरों का भार...
त्यागकर सब मान मर्यादा,
मेरे हाथ में सौंप देना तुम
सिर्फ एक कलम, डायरी
और कुछ किताबें।
थोड़ी सी रोशनी और
ढेर सारा साहस।
डायरी के प्रथम पृष्ठ पर
मैं लिखूंगी अपना भविष्य,
वह भविष्य जहां
मैं अपने पैरों पर खड़ी हो सकूँ!
खुद को एक ऐसी मशाल बना सकूं
जिससे तुम्हारी
कई पीढ़ियां रोशन हों।
द्वितीय पृष्ठ पर लिखूंगी
एक ऐसी परंपरा,
जिसमें मैं बेटी होकर
तुम्हारी तरह,
बिना किसी प्रश्न उत्तर के,
अपने माता पिता की
जिम्मेदारी निर्वाहन कर सकूं।
तृतीय पृष्ठ पर लिखूंगी
कर्तव्य और समर्पण,
जीवन का वह ठहराव,
जहां सिर्फ मैं और तुम
और सिर्फ हम हों।
चतुर्थ पृष्ठ मेरे
प्रेम और धैर्य का प्रत्यक्ष प्रमाण होंगे,
सिंदूर, मंगलसूत्र और बिछिया
ये मेरे किसी अध्याय का हिस्सा नहीं होंगे।
हमारा रिश्ता
इन सब बंधनों का मोहताज नहीं होगा।
उन पृष्ठों पर मुझे केवल
सम्मान लिखना है।
मुझे लिखना है
हर पृष्ठ पर
तुम्हारा अटूट प्रेम और विश्वास...
मुझे पढ़ना है उन्मुक्तता का पाठ,
सामाजिक संस्कृति
में लिपटी हुई स्त्री की पीड़ा
और न्याय,
मुझे पढ़ना है वह हर अध्याय
जहां समर्पित स्त्री
भावनाओं के जाल से निकलकर
खुद का जीवन
खुद के लिए स्थापित करती है।
मुझे लिखने हैं कुछ पन्नो पर
इंद्रधनुष के रंग,
उंगलियों के पोरों पर,
तितलियों के छूटते निशान,
और अंतिम पन्ने पर लिखना है
जीवन का वह पड़ाव,
जब बालों में चांदी बिखरती है,
मैं आऊंगी दो प्याली चाय लिए
तब तुम मेरे चश्में हटाकर
मुझे सहारा देकर कुर्सी पर बिठाना
और फिर मुझे अखबार
पढ़कर सुनाना!
जब ये देह साथ छोड़ देगी
तब तुम टूटना मत!
मुस्कुराते हुए मेरे पीछे चले आना।
अगर तुम मेरे हृदय की
डायरी के इन पन्नों पर
हस्ताक्षर करोगे
तो मैं तुम्हारे साथ जीवनपथ पर
कदम बढ़ाने के लिए तैयार हूं।
- मंजू सागर
*****
स्मृतियों का मकड़जाल
स्मृतियों के मकड़जाल में फँसा रहता है मानव,
मौत के बाद भी,
जिस्म तो ख़ाक हो जाता है,
पर नाम अटका रहता है यादों में भी,
लोग कहते हैं मरने के बाद सुकून मिलता है,
मगर, सच तो ये है कि वो यहीं भटकता है,
कभी किस्सों में, कभी बातों में भी
और कभी ख्यालों में भी,
उलझ कर रह जाता है मानव
अपनी ही स्मृतियों में,
जैसे कोई परिंदा फँस जाए
कभी कहीं बेरहम हवाओं में,
निकलना भी चाहे तो निकल न पाए,
और उम्र तमाम हो जाती है इन्हीं ख्यालों में,
कचोटती हैं यादें स्मृतियों के झरोखे से,
न सोने देती हैं, न रोने देती हैं,
न आहें और न ही सिसकियाँ भरने देती हैं,
हाथ रख देती है अपना दुखती रग पर
जैसे कोई सूखे ज़ख्मों को फिर से कुरेद दे,
याद आती है तो,ये तस्वीरें जीने नहीं देती,
मौत आती है तो सिर्फ़ साँसें छूटती हैं,
मोह नहीं छूटता,
आदमी तो चला जाता है दुनिया से,
पर दुनिया से उसका नाम कभी नहीं छूटता
- बाबू राम धीमान
*****
किताबों से दोस्ती
किताबों की दुनिया में खोना चाहता था मैं,
धीरे-धीरे उन्हीं का होना चाहता था मैं।
पर इस डिजिटल दुनिया ने ऐसा जोर दिखाया,
किताबों के पन्नों को दूर भगाया।
पर अब किताबों से कभी जुदा न हूँगा मैं,
हर लम्हा इन्हीं के साए में रहूँगा मैं।
छोड़कर ये चमकती screens की दुनिया,
अब सिर्फ इन पन्नों से ही दोस्ती करूँगा मैं।
पन्नों की इस दुनिया से नया कल बनाऊँगा,
किताबों को चुनकर मैं अपना रास्ता सजाऊँगा।
- साहिल पांचाल
*****
सूरज की सपने
तुम्हारी मुस्कान आज़ादी से बहती है
तुम्हारी ज़िंदगी आज़ादी से बहती है।
तुम्हारे शब्द गुलाब फैलाते हैं,
और प्यार की खुशबू।
तुम्हारे बगीचे के आसमान से शांति गिरती है
तुम्हारे दिल की बेचैनी हवा
तुम पर वार करती है।
लेकिन देखो,
उस बदमाश का सिर कहाँ है,
वह जलकर राख हो गया है।
वह एक
काला आदमी बन गया है।
उसकी फितरत जलन वाली है दिन-रात,
उसके सिर पर ज़ुल्म
इधर-उधर उड़ता रहता है।
उसकी ज़िंदगी बह जाती है
तुम्हारी मुस्कान से वह डरती है,
तुम्हारी खुशी उसके दिल में डर फैलता है
जब से तुम्हें देखकर उसका दिल कांपता है।
जो तुम्हें फिर से मारेगा,
उसमें बहुत हिम्मत है?
उसे यह देखने दो।
अगर कभी कोई टेढ़ा इंसान
ज़हर फैलाए,
दोनों हाथों से,
हथियार उठा ले।
हरे खेत के आखिर में,
चावल के छोटे दानों से भरा,
लाल शालूक की लाल परछाई
तालाब के पानी में मिल जाए।
जैसे तुम सपने में देखते हो
उस तालाब का पानी,
जैसे सूरज
तुम्हारी आँखों में चमक ला दे।
- निर्मल रॉय
*****
ज़िंदगी
ज़िंदगी से बड़ा कोई सफ़र नहीं होता,
हर किसी को यहाँ ख़ुद की ख़बर नहीं होता।
भीड़ में उम्र गुज़रती है मुसाफ़िर की तरह,
हर किसी पर किसी चेहरे का असर नहीं होता।
जिसको खोने का हमें उम्रभर डर रहता है,
वक़्त आने पर वही दिल में अगर नहीं होता।
आईना रोज़ हमें चेहरा दिखाता है मगर,
आदमी ख़ुद की हक़ीक़त से बसर नहीं होता।
दर्द चुपचाप सिखाता है ज़माने के सबक़,
हर कोई दर्द में इतना भी हुनर नहीं होता।
मंज़िलें दूर नहीं होतीं कभी राहों से,
आदमी थक के जो रुक जाए, सफ़र नहीं होता।
हमने रिश्तों को बचाया है बहुत कुछ खोकर,
हर कोई रिश्तों में इतना बेख़बर नहीं होता।
जिसको दुनिया ने समझा था कमज़ोर बहुत,
उसके अंदर से कोई इतना कमतर नहीं होता।
वक़्त छीन लेता है सब कुछ मगर ये सच है,
वक़्त से बढ़कर कोई दूसरा रहबर नहीं होता।
मौत आए तो सभी फ़र्क़ मिटा देती है,
कोई अमीर वहाँ, कोई दरिद्र नहीं होता।
ज़िंदगी रोज़ नया रूप दिखाती है हमें,
इससे गहरा कोई आईना मगर नहीं होता।
'शशि', जीना है तो बस इतना समझकर जीना,
हर मिला शख़्स हमेशा हमसफ़र नहीं होता।
- शशि धर कुमार
*****
जिंदगी
जिंदगी एक सफर है
बस चलते जाना है
किसी पल मिलेगी खुशी
किसी पल मिलेगा गम
हंसते -हंसते जिंदगी का
हर लम्हा जिए जाना है
जिंदगी के सफर में
बस चलते जाना है
कभी यहां मिलेंगे फूल
तो कभी मिलेंगे कांटे
कांटों की चुभन भुला,
तुम्हें हर पल मुस्कुराना है
जिंदगी के सफर में
बस चलते जाना है
रुदन है मरण समान,
हास्य ही जीवन है
अतः मुस्कुराते - मुस्कुराते
जीवन का हर पल बिताना है
जिंदगी के सफर को
जिंदादिली से जिए जाना है
- प्रवीण कुमार
*****
किसी की याद
हमें किसी की याद आ रही है,
उनकी बातें हमें खुश करती जा रही हैं।
हमें किसी की याद आ रही है।
हर पल ख्याल बस उन्हीं का आ रहा है,
दिल उनसे मिलने को बेताब हुआ जा रहा है।
मजबूरी है कि चाहकर भी मिल नहीं पा रहे,
पर सच तो यह है कि वो बहुत याद आ रहे।
कम से कम एक बार फोन पर तो बात करना चाहते हैं,
सिर्फ आवाज़ ही नहीं, हम तो उन्हें देखना
और मिलना भी चाहते हैं।
यह याद हमें बहुत तड़पा रही है,
हमें उनकी याद बहुत आ रही है।
- साहिल पांचाल
*****
जीवन की कलाकृति
जीवन भर रिश्तों को साधते रहे,
परिस्थितियों को सँवारते रहे,
कभी स्वयं को थोड़ा पीछे रखा,
कभी अपनों को आगे करते रहे।
कभी समय के साथ झुके,
कभी हालातों से लड़े,
कभी मौन रहकर बहुत कुछ कह गए,
कभी मुस्कुराकर आँसू सह गए।
यूँ ही संतुलन बनाते-बनाते,
जिंदगी की राह कटती गई,
और जब सफ़र का अंतिम छोर आया,
तब समझ आया...
जीवन कोई सीधी रेखा नहीं,
यह तो रिश्तों, त्याग, संघर्ष और प्रेम से
धीरे-धीरे बनती हुई
एक सुंदर कलाकृति है।
जिसमें हर चोट एक रेखा है,
हर रिश्ता एक रंग,
शायद जीवन का सार यही है...
न कुछ व्यर्थ, न कुछ बेकार
- नरेंद्र मंघनानी
*****
सितंबर की शाम
सितंबर की एक शाम थी,
चन्द्रमा झांक रहा था ठीक मेरे सिर के ऊपर से,
न ज्यादा रोशन, न ज्यादा धुंधला
बिल्कुल तुम्हारी ही याद जैसा,
हवा रुकी हुई थी,
पत्ते भी जैसे सांस रोके सुन रहे थे,
और मैं, उस चाँद में कोई चेहरा ढूंढ रहा था।
शीतलता मिल रही थी मुझे ए चाँद! तेरे दीदार से
जैसे सुकून मिले किसी अपने के प्यार से,
तू भी तो रोज़ उसे देखता होगा न ऊपर से
कहता होगा-कोई मर रहा है तेरे इंतज़ार से,
आँखें पत्थरा गई मेरी ए चाँद! तुझे देखते-देखते
रात ढल गई मेरी तुझमें खोते-खोते,
तू तो हर रात चमकता है किसी और के लिए
और मैं बुझ सा गया तुझे ही देखते-देखते,
देखता रहा मैं तुझे ए चाँद! रात भर,
तेरी रोशनी में बड़े-बड़े पर्वत भी बौने लग रहे थे,
तू इतना ऊँचा, इतना अकेला और इतना विशाल
सारी दुनिया को, फिर भी अपना लग रहा था ,
नज़र आ रहा था मुझे ए चाँद ! शिव-शक्ति बिंदु
तेरे ही माथे पर सजा था जैसे कोई दिव्य सिन्धु,
आधा शिव, आधी शक्ति, तू पूरा हो गया
और मैं तुझे देख के,देख के, खुद में ही खो गया,
चहल-कदमी कर रहा था मैं तेरे पर्वत पर ए चाँद!
लग रहा था जैसे चल रहा हूँ तेरे दिल के करीब,
नीचे दुनिया सो रही थी गहरी नींद में,
और मैं जाग रहा था ए चांद! सिर्फ तेरे नसीब में,
सुन रहा था मैं ए चाँद ! तेरे पानी की छल-छल
जैसे शिव की जटा गुनगुना रही हो कोई ग़ज़ल
हर बूँद में मुझे तेरा ही नूर नज़र आया था
और हर लहर में मेरा ही कसूर था,
हर बूँद में मुझे तेरा ही नूर नज़र आया ए चाँद!
जैसे अंधेरों को फिर से कोई सुरूर नज़र आया,
पानी नहीं था वह, तेरी रोशनी बह रही थी
और मैं प्यासा, उसी में खुद को पा रहा था
मुझे अजनबी समझ के देख रहे थे एस्किमो, ए चाँद!
अपने इग्लू से-कभी देखते, कभी छुप जाते थे,
जैसे तू भी मुझे देखता है-
कभी पूरा, कभी अधूरा, कभी बादलों में छुपा हुआ।
- बाबू राम धीमान
*****
मिली है उम्र बहुत कम, संभाल कर रखो,
दिलों में बुग़्ज़ ना यूँ पाल पाल कर रखो।
सफ़र ये एक पल का है, रास्ता भी कठिन,
मोहब्बतों को ज़ाद-ए-सफ़र बना कर रखो।
अजीब लोग हैं जो यूं उम्र ज़ाया करते हैं,
दूसरों के दामन पे न मिट्टी उछाल के रखो।
फ़ेंकोगे कीचड़ हाथ हो जाएंगे गंदे आपके,
कभी तो ख़ुलूस की सूरत सँवार कर रखो।
किसी को गिराने से तुम बुलंद हो जाओगे बोलो,
अपने क़दम भी तो सीधी राह पे चला कर रखो।
ये ज़िंदगी है अमानत, इसे नेकियों में ढालो तुम,
यही चराग़-ए-वफ़ा अपने साथ जला कर रखो।
मुश्ताक़' इन नफ़रतों से कुछ न होगा हासिल,
दिलों में शम्मा मुहब्बत की अपने जला कर रखो।
- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह
*****
बाजों से वह क्यों डरे, चिड़िया रखती पंख।
हिम्मत जिसके खून में, टूटे हर इक दंभ।।
गिरने का डर छोड़ दे, गिरकर उठना सीख।
ठोकर को हथियार कर, खींच जीत की लीक।।
झूठी ताकत मत दिखा, सच की अपनी धार।
एक अकेला सत्य भी, भारी पड़े हजार।।
मंजिल उनको ही मिले, जो लड़ते हर हाल।
किस्मत बैठी देखती, कर्म बदलते चाल।।
भाग्य भरोसे बैठकर, मत करना अभिमान।
कर्मों से जो जीतता, उसका ऊँचा मान।।
संकट जितना चीखता, उतना बढ़ता जोर।
हिम्मत वाला चुप रहे, फिर करता है भोर।।
दुश्मन चाहे सामने, मन में रखना धीर।
साहस की हुंकार से, काँपे हर जंजीर।।
चिड़िया छोटी देखकर, बाज न करना गर्व।
पंखों में जब आग हो, उड़ान बनती पर्व।।
चिड़ियों से सीखो जरा, पंख नहीं तलवार।
फिर भी रखती आसमां, पूरा वो अधिकार।।
- डॉ. प्रियंका सौरभ
*****
लज्जा भी हो रही शर्मसार
नफरत की इस भरी बाजार में
फितरत की खुल गई है दुकान
घृणा द्वेष बंद डब्बे में बिक रहा
फिर भी जग में है आज महान
भेंड़चाल क़ी इस कायनात में
लुप्त हो रहे आज सभ्य इन्सान
शराफत बैठ डेवढी में रोता है
लफंगे पाते इस जग में सम्मान
जलालत की इस गंदी नाला में
लम्पट बन बैठा है ढोंगी गुणवाण
मूरख की महफिल में मेरे भाई
धोखेबाज बन बैठा है धनवान
जरायमपेशा की इस दुनियां में
असलेह बना ईमानदार जहान
ईमानदारी आँधी में ढ़ह गई
ईमान का तन हुआ लहू लुहान
बेशरमी की इस संसार में
लज्जा भी हो गई है शर्मसार
कैसे कैसे रंग चेहरे पे हैं आये
फिर भी ये है इस जग में महान
- उदय किशोर साह
*****