मैं रहूं या ना रहूं
बिलासपुर लेखक संघ से है
प्यार तो हर पल ये कहना चाहिए
मैं रहूं या ना रहूं मेरा संघ रहना चाहिए
रक्त की बूंदें मेरी, कपाल की भरदें दवात,
हड्डियों की कलमें लिखें मां भारती की आरती,
देवधरा गुणगान हो,
कहलूरी का सम्मान हो,
और लेखक संघ वैभव चाहिए
मैं रहूं या ना रहूं....
जय जय करो पुरुषार्थ की परमार्थ की।
हर हाल में निजस्वार्थ पराजय चाहिए,
वैभव अजर अमर रहे यही गीत गाना चाहिए
मैं रहूं या ना रहूं मेरा संघ रहना चाहिए
दुश्मनों से कह दो भारत,
अमर है, यह सत्य कहना सीख लो
सच ना बोले ऐसी जीव्हा को ही बाहर खींच लो
वैभव अजर है अमर रहना चाहिए
मैं रहूं या ना रहूं मेरा संघ रहना चाहिए
- बृजलाल लखनपाल
*****
नफरत
नफरत की चश्मा उतार कर देखो
सामने दिखेगा तुम्हें सिर्फ इन्सान
मन को सुकून देने वाला है
जब नफरत का करोगे अपमान
नफरत की बीज मन में ना डालना
छीन लेता है ये जीवन का सुकून
नफरत की पौधा और इनका फल
पैदा करता है अदावत की जूनून
इतिहास के पन्ने पलट कर देख लो
मिट गई है सूरमाओं की हस्ती
जीवन के सुख में आग लगा देता है
जल गई है धरा पे बस्ती की बस्ती
नफरत की जो खोल बैठा है दुकान
मिट गई है उस सज्जन की जहान
सगे सवंधी सड़क पे आ गये हैं
पड़ गई है उनकी मुसीबत में जान
गुस्से क़ो ठंडे बस्ते में रख मेरे भाई
गुस्सा है अब बारूद की एक ढ़ेर
अपनो में हो या बेगानों की ताईं
गुस्से से नही है सुकुन को कभी खैर
- उदय किशोर साह
*****
हर की उमस
और इस गहन ताप से
निकलकर
ठिठुरते हुए जाड़ों में चलते हैं
चलो दूर पहाड़ों में चलते हैं।
वादियों की बाहों में
सिमटते हुए बादल,
हवाओं की तरंगों में
हरियाली का फैला हुआ आँचल
फलों से लदे हुए झाड़ों में चलते हैं,
चलो दूर पहाड़ों में चलते हैं।
जहां हर एक मोड पर
मंजिल नजर आती हैं।
बहता हुआ पानी देखकर ,
थकान उतर जाती है।
जहां पत्थरों का सीना फाड़कर
झरने निकलते हैं।
चलो दूर पहाड़ों में चलते हैं।
ठंडी हवा जब
छूकर गुजरती है,
सुबह के कोहरे पर सुनहरी धूप ,
चांदी सी बिखरती है,
बर्फ के घरौंदे,
उस धूप से पिघलते हैं।
चलो दूर पहाड़ों में चलते हैं।
- मंजू सागर
*****
कैसे ?
आज अपनी नौकरी बचानी मुश्किल,
धंधा-कारोबार चलना हुआ मुश्किल,
ख़ुद पे भरोसा करना हुआ मुश्किल,
औरों की क्या बात करें।
सोचो, आज़ादी जो दिलाई अंग्रेज़ों से,
हमें इस आज़ादी को कैसे बचाओगे ?
इस देश की मिट्टी का ऋण
कैसे चुकाओगे ?
सोचो ज़रा, अपना फ़र्ज़
कैसे निभाओगे ?
चील की नज़र से खग का नीड़
कैसे बचाओगे?
भेड़ियों से मेमने को
कैसे बचाओगे ?
जिस आज़ादी के लिए ख़ून बहा,
उस ख़ून का ज़रा भी
तुममें कतरा है ?
हार नहीं मानोगे ?
जज़्बा है ?
जोश है ?
अगर हाँ, तो आगे बढ़ो-
वरना हर ख़ामोशी तुम्हारी
देश के लिए ख़तरा है।
सोचो ज़रा,
ये देश सिर्फ़ तुम्हारा नहीं,
तुम्हारे पुरखों की अमानत है।
इस मिट्टी पर जो ऋण है तुम्हारा,
उसे चुकाना भी
तुम्हारी ज़िम्मेदारी है।
आज जो मुश्किल है,
उससे लड़ोगे कैसे?
अपने हक़ के लिए
खड़े होगे कैसे?
जिस आज़ादी को
ख़ून से सींचा गया था,
उसकी हिफ़ाज़त
करोगे कैसे ?
सवाल सिर्फ़ आज़ादी का नहीं,
सवाल अपने होने का है।
सवाल सिर्फ़ हक़ का नहीं,
सवाल फ़र्ज़ निभाने का है।
तो सोचो ज़रा-
जब वक़्त तुमसे पूछेगा,
तुम क्या जवाब दोगे?
जिस मिट्टी ने तुम्हें पहचान दी,
उसका ऋण कैसे चुकाओगे ?
- रोशन कुमार झा
*****
तिरंगा- हमारी आन, बान और शान
हमारी आन, बान और शान है तिरंगा
गर्व से लहराती है, खुली आसामन मे तिरंगा
भारत देश के प्रतीक चिन्ह है ये तिरंगा
पहचान बताती है हमारी ये तिरंगा।
जहां भी रहो, जैसे भी रहो, यदि थामे हो तिरंगा
गुजरे यदि कोई वहाँ से तो पहचान बताती तिरंगा
देखते ही लोग कहेगे, देखो ये है भारतीय तिरंगा
तब तुम्हे गर्व महसूस होगी, कहोगे वाह तिरंगा।
अपने घरो में, कार्यालय में, शान से लहराओ तिरंगा
हाँ, सम्मान के साथ ही लहराना तुम तिरंगा
संघर्ष, बलिदान के बाद ही मिली है हमें तिरंगा
इसीलिए तुम सब संभाले रखो ठीक से तिरंगा ।
आज़ाद मुल्क के आज़ादी के बताती तिरंगा
जब-जब देखो तुमसब ये तिरंगा
गुलामी की जंजीर टूटती दिखायेगी ये तिरंगा
आओ हमसब मिलकर लहराये तिरंगा
- चुन्नू साहा
*****
राष्ट्र-गौरव तिरंगा
केसरिया साहस का प्रतीक, श्वेत शांति की छाया,
हरे रंग ने भारत भू पर, अनुपम रूप सजाया।
मध्य सुशोभित धर्मचक्र यह, गति का पाठ पढ़ाता,
पिंगली वेंकैया का यह सपना, जग में मान बढ़ाता।
जय भारत, जय ध्वज यह, जन-जन का अभिमान,
कश्मीर से कन्याकुमारी तक, गूंजे भारत महान!
अखंडता और एकता की, यह पावन परिभाषा,
उन्नति और समृद्धि की, जन-जन की अभिलाषा।
चौबीसों तीलियाँ सिखलातीं,निरंतर बढ़ते जाना,
सत्य, त्याग ,कर्मनिष्ठा से, भारत-भाग्य जगाना।
जय भारत, जय ध्वज यह, जन-जन का अभिमान,
कश्मीर से कन्याकुमारी तक, गूंजे भारत महान!
हर घर पर लहराए तिरंगा, गौरव-गाथा गाए,
सारे जहाँ से अच्छा यह देश, सदा मुस्काए।
जाति,पंथ और भेद भुलाकर,राष्ट्र-धर्म अपनाएँ,
भारत माता के चरणों में, हम शीश सदा झुकाएँ।
जय हिंद, जय भारत
- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़
*****
हुंकार
भरी थी हुंकार गगन हिंद का गुंजाया था,
इंकलाब के नारों से वतन को जगाया था।
वतन के खातिर कितने वीरों ने लहू बहाया था,
अपने लहू की खुशबू से तिरंगे को महकाया था।
लहू के हर कतरे ने जोश हिंद में जगाया था,
जीवन को नहीं वीरों ने शहादत को अपनाया था।
कितनी मांओं के दिल अंदर से रोया था,
क्या क्या सपना जो उन्होंने संजोया था।
सपना बेशक वो पूरा न हो पाया था,
क्योंकि वीर बेटों ने वतन को अपना बनाया था।
मरते दम तक सिर्फ वतन को दिल में बसाया था,
खुदमुख़्तारी न मिलने तक सियाहपोशी को अपनाया था।
तिरंगे की आन बान शान को अपना बनाया था,
आजादी का ये दिन कांटों का ताज पहन कर आया था।
- राज कुमार कौंडल
*****
तिरंगा झंडा
तिरंगा झंडा की शान बढ़ाएंगे
देश भक्तों को तैयार करेंगे
तन मन अर्पण के यत्न करेंगे
हम अपने कर्तव्य को निभाएंगे।
गली गली में झंडा लेकर चलेंगी
लोगों के दिल में भक्ति जगाएंगी
शांति वातावण को पैदा करेंगी
हम तिरंगा झंडा की रक्षा करेंगी।
तीन रंगों की झंडा शोभायमान
देश केलिए प्रतीक और पहचान
सभी धर्मों करता भक्ति से नमन
घर घर में लहराते तिरंगा हर दिन।
देश भक्तों के त्याग तिरंगा
वीरों के बलिदान तिरंगा
सभी धर्मों की एकता तिरंगा
स्वतंत्रता को याद दिलाता तिरंगा।
- श्रीनिवास एन
*****
आज़ादी
सबसे पहले सबसे ज्यादा
हमको प्यारी आजादी
सबको प्यारी आजादी
मातृभूमि पर मर मिटने वाले
को पसंद थी आजादी.
इंकलाब जिंदाबाद है
भगत सिंह के नारों से
हुये कुर्बान वीर सपूत जो
उनको पसंद थी आजादी
आज़ादी कोई भीख नहीं है
नहीं किसी की बपौती
गाँव के युवा स्त्रियों जवान को,
गाँव के किसान को
दुनिया जहान को
पसंद थी आजादी
- मनोज कौशल
*****
तिरंगा प्यारा-प्यारा
तिरंगा प्यारा-प्यारा है,
भारत देश हमारा है।
केसरिया देता बलिदान,
सफेद सिखाता शांति महान।
हरा रंग खुशहाली लाए,
नीला चक्र आगे बढ़ाए।
पंद्रह अगस्त का दिन है न्यारा,
आजादी का पर्व है प्यारा।
वीरों ने जो बलिदान दिया,
हमने स्वतंत्र आसमान लिया।
मिल-जुलकर हम आगे बढ़ेंगे,
भारत का सम्मान बढ़ाएँगे।
पढ़-लिखकर बनेंगे होशियार,
देश बनाएँगे सुंदर-शानदार।
न ऊँच-नीच, न कोई भेद,
सबके मन में प्रेम का मेल।
भारत माँ की जय-जयकार,
तिरंगा रहे सदा ऊँचा-ऊँचा अपार
*****
स्वतंत्रता दिवस महान
आओ बच्चों, आज मनाएँ,
आजादी का पर्व महान।
फहराएँ हम प्यारा तिरंगा,
गूँजे भारत का जयगान।
वीरों ने सपने सँजोए थे,
भारत हो स्वतंत्र महान।
हँसते-हँसते देश के खातिर,
कर डाला अपना बलिदान।
केसरिया हमको सिखलाए,
साहस, त्याग और बलिदान।
श्वेत रंग कहता है सबसे,
रखना मन में सदा समान।
हरा रंग खुशहाली लाए,
धरती का बढ़ता सम्मान।
नीला चक्र हमें समझाए,
चलते रहना बनकर गतिमान।
नन्हे हाथों में किताबें हों,
आँखों में हों नए अरमान।
मेहनत, सच्चाई और एकता से,
हम ऊँचा करें हिंदुस्तान।
जाति-धर्म के भेद भुलाकर,
बनें प्रेम की मीठी तान।
मिलकर ऐसा देश बनाएँ,
जिस पर गर्व करे हर इंसान।
भारत माँ की जय बोलेंगे,
गूँजे हर आँगन-हर मैदान।
स्वतंत्रता का पर्व मनाएँ,
जय हिंद! जय हिंद! हिंदुस्तान
- गोपाल कौशल भोजवाल
*****
स्वतंत्रता दिवस
15 अगस्त 1947 को देश हमारा आज़ाद हुआ,
वीरों के बलिदानों से भारत आबाद हुआ।
पर लगता है आज भी कहीं हम गुलाम हैं,
जातिवाद और भेदभाव के बीच परेशान हैं।
आरक्षण का दर्द भी आज तलक छलकता है,
भ्रष्टाचार का पैमाना रोज़ नया ही बढ़ता है।
नेता अपनी रोटी सेंकें, जनता को लॉलीपॉप देते हैं,
अपनी-अपनी स्वार्थ की दुकानें सजाकर बैठे हैं।
अंग्रेज़ों की फूट डालो और राज करो की नीति,
आज भी बाँट रही है देश को, कैसी है यह रीति।
सच्चा स्वतंत्रता दिवस तभी हम मनाएँगे,
जब अपने विचार खुलकर कह पाएँगे।
जब जाति-धर्म से ऊपर इंसानियत का मान होगा,
तभी तिरंगे का सच्चा सम्मान होगा।
जब हर नागरिक निर्भय होकर अपना अधिकार पाएगा,
तभी मेरा भारत सच में आज़ाद कहलाएगा।
- गरिमा लखनवी
*****
माँ एक शब्द नहीं
एक भाव है
एक विज्ञान है
एक महासागर है
एक पूर्ण विराम
एक घर ही नहीं
सम्पूर्ण ब्रह्मांड है
आकाश है
हिमालय जैसी ऊँची
घाटी जैसी गहरी
माँ ही तो है धरा
माँ एक अंक है
माँ एक वेद है
जिसमें सम्पूर्ण भण्डार
वेदों का वेद
जो कोरी सलेट को
भर भर ज्ञान दे
वही तो है माँ
जो अपने कलेजे
के टुकड़े को भी दान दे
धन्य है माँ
माँ मेरी माँ
- सुमन डोभाल काला
*****
आखिरी दुआ
थक चुकी हैं मेरी आँखें अब
तेरे नाम का रास्ता देखते-देखते...
जिस रास्ते से होकर
तुम गए थे शहर की ओर
मेरे दिल से निकालकर
इन दिनों मेरी आँखें
उसी रास्ते की मिट्टी में रहती हैं
मैं अपनी भीगी-भीगी आँखों से
दर्द से भरे दिल के साथ
तुम्हारे अलविदा कहते हुए
पैरों के निशान को रोज़ देखती हूँ
बरसों-बरस हो गए हैं तुम्हें,
अब तो मेरे दिल को भी याद नहीं
न जाने कितने बरस हो गए हैं तुम्हें
मेरी मोहब्बत से दूर
शहर के बाज़ार में गए हुए
इतने बरसों में
कभी-कभी मेरी रूह मुझसे कहती है
कि शहर की आबो-हवा में जाकर
ज़रा से बदल गए हो तुम
मुझे और मेरी मोहब्बत को
अपने दिल से भुला चुके हो तुम
पर मैं इस कमबख्त, निगोड़े दिल का
क्या करूँ, ये है कि
मानने को राज़ी ही नहीं है
अगर तुम समझते हो
कि मेरी रूह ने
तुम्हारे किरदार पर
मोहब्बत के वादे से मुकरने की
झूठी तोहमत लगाई है
तो फिर आओ ना मेरी बाँहों में
तुम्हें मेरी मोहब्बत का खुला निमंत्रण है
आकर मेरी बाँहों में, मेरी रूह की बात को
और कुछ नहीं, एक झूठ साबित कर जाओ ना
आखिर तुम्हें डर किस बात का है
तुम मुझे बताओ ना
देखो, मैं तुम्हारी कहानी का ही एक किरदार हूँ
मेरी तरफ से तो मैं अभी भी तुम्हारा प्यार हूँ
पर मुझे लगने लगा है अब ये
कि मेरी कहानी को, मेरे दिल को
बरसों पहले अलविदा कह चुके हो तुम
मेरी साँसों ने सिसक-सिसक कर
सदियों तक तुम्हारे ख़त का इंतज़ार किया
पर तुम्हारी मोहब्बत के इंतज़ार ने
मुझे आँखों में पानी के सिवा और कुछ न दिया
बस अब एक आख़िरी दुआ का ख़त मैं लिखकर जाऊँगी
अपने लहू से, तुम्हारी बेवफ़ाई के नाम
तुम्हारी रूह के लिए दुआ में
आख़िरी ख़त लिखकर अपने लहू से
अपनी मोहब्बत की समाप्ति का ऐलान
इस सारी कायनात के सामने कर जाऊँगी
मैं ऐसे कैसे चली जाऊँ मैं बिना कुछ कहे
तुमने मेरी मोहब्बत को समझा क्या है
इस कायनात में...
तुम्हें आज बेवफ़ा कहकर
बदनाम कर जाऊँगी मैं
- आकाश शर्मा आजाद
*****
ग़ज़ल
उतनी ये ज़िंदगानी है।
जितना दाना -पानी है।
छांँह मिले या धूप कहीं,
सबको राह बितानी है।
हैं सबके अपने मसले,
सबकी राम कहानी है।
कुछ में खिलती मुस्कानें ,
कुछ आँखों में पानी है।
यूँ महफूज़ समझ रहना,
तेरी ये नादानी है।
ठेठ पुरानी बात कोई,
लगती अब बचकानी है।
तब तक है मस्ती खोरी,
जब तक साथ जवानी है।
- नवीन माथुर पंचोली
*****
तुहें मिन्जों खून देवा मैं देणी अज़ादी
जुल्म सए कने सब कुछ गवाया
तिन्हें जे एह देश कराया आज़ाद
तिन्हारी कुर्बानियां नी भुली सकदे
सोने री चिड़िया थी करी तरी बर्बाद
भगत सिंह राजगुरु कने सुखदेव
तीनों थे दृढ़ निश्चय रे पक्के
ज्यादा उम्र नी थी इन्हांरी
पर अंगरेजां रे छड़वाई तिरे थे छक्के
चंद्रशेखर आज़ाद था तगड़ा जवान
मुछाँ हमेशा रहन्दी थी खड़ियां
अंग्रेजें लाया बतेहरा ज़ोर पर
पन्हाई नी सके तिसजो हथकड़ियां
सुभाष चंद्र बोसे आज़ाद हिंद सेना बणाई
अंग्रेजां कने लड़ी डटी कने आज़ादी री लड़ाई
तुहें मिन्जों खून देवा मैं देणी अज़ादी
सारे हिन्दुस्तानियाँ जो एह आवाज थी लगाई
आज़ादी री लड़ाई लड़ने वाल़ेयां कित्ते बड़े कम्म
छुपी छुपी करदे थे कम्म कई टोलियां थी बणाई
गांवां गांवां गल़ी गल़ी लोकां रे मना बिच
देशभक्ति री थी अलख जगाई
बौहत जवान पकड़े कने जेलां च पाये
मारी दिते सै सैजे थोड़ा बी गलाये
सेल्युलर जेला च लोकां पर कित्ते बड़े अत्याचार
लोहे री बेड़ियों च जकड़े कुछ फांसीया लटकाए
कर्ज तिन्हांरा नी सकदे कदी बी उतारी
तिन्हें जे जेलां च सारी उम्र गुज़ारी
आओ अज मिली सारे तिन्हांजो याद करिये
तिन्हें जे आज़ादिया खातर जिन्दगी दित्ति वारी
जुल्म सए कने सब कुछ गवाया
तिन्हें जे एह देश कराया आज़ाद
तिन्हारी कुर्बानियां नी भुली सकदे
सोने री चिड़िया थी करी तरी बर्बाद
भगत सिंह राजगुरु कने सुखदेव
तीनों थे दृढ़ निश्चय रे पक्के
ज्यादा उम्र नी थी इन्हांरी
पर अंगरेजां रे छड़वाई तिरे थे छक्के
चंद्रशेखर आज़ाद था तगड़ा जवान
मुछाँ हमेशा रहन्दी थी खड़ियां
अंग्रेजें लाया बतेहरा ज़ोर पर
पन्हाई नी सके तिसजो हथकड़ियां
सुभाष चंद्र बोसे आज़ाद हिंद सेना बणाई
अंग्रेजां कने लड़ी डटी कने आज़ादी री लड़ाई
तुहें मिन्जों खून देवा मैं देणी अज़ादी
सारे हिन्दुस्तानियाँ जो एह आवाज थी लगाई
आज़ादी री लड़ाई लड़ने वाल़ेयां कित्ते बड़े कम्म
छुपी छुपी करदे थे कम्म कई टोलियां थी बणाई
गांवां गांवां गल़ी गल़ी लोकां रे मना बिच
देशभक्ति री थी अलख जगाई
बौहत जवान पकड़े कने जेलां च पाये
मारी दिते सै सैजे थोड़ा बी गलाये
सेल्युलर जेला च लोकां पर कित्ते बड़े अत्याचार
लोहे री बेड़ियों च जकड़े कुछ फांसीया लटकाए
कर्ज तिन्हांरा नी सकदे कदी बी उतारी
तिन्हें जे जेलां च सारी उम्र गुज़ारी
आओ अज मिली सारे तिन्हांजो याद करिये
तिन्हें जे आज़ादिया खातर जिन्दगी दित्ति वारी
- रवींद्र कुमार शर्मा
*****
स्वतंत्रता!
सिर्फ एक शब्द नहीं है।
बल्कि विश्वास है, अहसास है,
नागरिकों का अधिकार है।
अच्छी शिक्षा प्राप्त करना...
जो मन करे वो खाना...
जहां चाहे वहां घूमना...
जो मर्जी वो पहनना...
और अपने वोट से,
नेताओं का चुनाव करना...
स्वतंत्रता! सिर्फ एक शब्द नहीं है,
यह लोकतंत्र की आत्मा है।
- दीपक कोहली
*****
मैली गंगा
नीर बहाती गंगा, पीर बताती गंगा,
घाट-घाट की प्यास बुझाए, जीवन की आस जगाती गंगा।
माँ कहकर जिसे पुकारा, उसकी ही गोद मैली है,
श्रद्धा के दीप जलाते हम, पर थैली कूड़े से भरी है।
अस्थि, फूल और पूजन-सामग्री, सब तुझमें बहा देते हैं,
पाप धुलाने की चाह में, तेरा ही आँचल मैला करते हैं।
कल-कल करती धारा पूछे, कब तक मेरा मान घटाओगे ?
मुझमें आस्था रखते हो तो, मुझको स्वच्छ कब बनाओगे ?
गंगा केवल जलधारा नहीं, जन-जीवन की श्वास है,
जिसकी निर्मलता में ही, भारत की सच्ची आस है।
आओ, गंगा को गंगा रहने दें, कचरे का भार न दें,
माँ की निर्मल गोद बचाकर, आने वाली पीढ़ी को उपहार दें।
नीर बहाती गंगा रहे, निर्मल बहती गंगा रहे,
हमारी श्रद्धा तभी सच्ची हो , जब माँ गंगा स्वच्छ रहे।
*****
आजादी
आजादी केवल तिरंगे की शान नहीं,
केवल सीमा की पहचान नहीं।
आजादी वह उजली साँस है,
जिसमें हर मन का अपना आकाश है।
सोच सकूँ बिना भय, बिना बंधन,
कह सकूँ सच बिना किसी उलझन।
अपने सपनों को पंख लगा सकूँ,
अपने कर्मों से राह बना सकूँ।
रहने की आजादी सम्मान के साथ,
जीने की आजादी समान अधिकार के साथ।
काम वही, जिसमें मन की उड़ान हो,
हर श्रम को अपना सम्मान हो।
आजादी केवल मुझ तक सीमित न रहे,
हर हाथ को अवसर,
हर आँख में सवेरे रहे।
नारी हो, नर हो, निर्धन या धनवान
सबको मिले जीने का समान आसमान।
और सबसे बड़ी आजादी यही
इंसान होकर इंसान बने रहें।
नफरत से मुक्त, करुणा से भरे,
अपने भीतर के दीपक को धरे।
देश तभी सचमुच आजाद कहलाएगा,
जब हर मन निर्भय मुस्कुराएगा।
तिरंगा तभी ऊँचा लहराएगा जब
हर भारतीय सम्मान से जी पाएगा।
- डाॅ. सारिका ठाकुर 'जागृति'
*****
गीत आजादी का हम गायेंगे,
खुशियाँ मनायेंगे ना-2
वो वीर थे महान हुए देश पर कुर्बान-2
जय हिन्द का नारा हम लगायेंगे
खुशियाँ मनायेगे ना
गीत आजादी का हम गायेंगे,
खुशियाँ मनायेंगे ना-2
बाँधे सर पर थे कफन मारे चुन-चुन के दुश्मन
झंडा सीमा पर हम तो लहरायेंगे
खुशियाँ मनायेगे ना
गीत आजादी का हम गायेंगे,
खुशियाँ मनायेंगे ना-2
राजगुरु सुखदेव संग भगत सिंह
थे वीर-2
असेम्बली को जब बम से उड़ाये थे
वंदे मातरम गाये थे ना
गीत आजादी का हम गायेंगे,
खुशियाँ मनायेंगे ना-2
बोस उध्दम आजाद की है कुर्बानी याद
कैसे याद परम वीर नहीं आयेंगे
खुशियाँ मनायेगे ना
गीत आजादी का हम गायेंगे,
खुशियाँ मनायेंगे ना-2
आप सभी को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं 💐
- रिंकी सिंह, मुंबई
*****
तिरंगा
हवा से नहीं,
फौजियों की साँस से लहराता है तिरंगा,
किसी डोर से नहीं,
उनके हौसलों से बंधा है तिरंगा।
जिस मिट्टी को हम
माँ कहकर माथे से लगाते हैं,
उसकी हिफाज़त में
वे अपनी जवानी छोड़ आते हैं।
हम चैन से सोते हैं
तो कोई सीमा पर जागता है,
हम घर में दीप जलाते हैं
तो कोई बर्फ़ में भी
सीने में सूरज जगाए रखता है।
किसी माँ की आँखों का सपना है वह,
किसी पिता का अभिमान,
किसी बहन की राखी है,
किसी पत्नी का मौन विश्वास,
और किसी बच्चे के लिए
पापा के लौट आने की आस है वह।
गोली जब सीने को चीरती है,
तो दर्द से पहले
देश निकलता है उस जवान की साँसों से...
और जब आख़िरी साँस
मिट्टी में मिल जाती है,
तब वही साँस
तिरंगे में समा जाती है।
इसलिए मत कहना
कि तिरंगा केवल हवा में लहराता है....
वह तो उन अनगिनत वीरों की
धड़कनों पर लहराता है
जिन्होंने अपना आज दे दिया
ताकि हमारा कल मुस्कुरा सके।
तिरंगा कपड़ा नहीं है,
यह शहीदों की आख़िरी साँस का विस्तार है।
- नरेंद्र मंघनानी
*****
तिरंगा लहराया है, गगन ने सर झुकाया है,
आज़ादी का जश्न, हिंदुस्तान मुस्कुराया है।
मंगल पांडे कीललकार, भगत सिंह की रफ़्तार,
बापू की अहिंसा और सुभाष चंद्र की वो धार।
कैसे आज़ादी का जश्न ये सुहाना आया है,
भारत माँ के वीरों ने, अपना लहू बहाया है।
नहीं ये बस पंद्रह अगस्त की तारीख़ पुरानी,
हर कण-कण में बसी है, बलिदान की कहानी।
जाति-धर्म की दीवारों को तोड़कर सब आए हैं,
देख आज़ादी का जश्न, गीत मिलकर गाए हैं।
सदियों की दासतां का बोझ हमने उतार दिया,
विजय के इस जश्न से, जग को सँवार दिया।
अधिकार मिले हैं हमको, अब कर्तव्यों की बारी है,
संविधान की मर्यादा, हम सबकी ज़िम्मेदारी है।
अशिक्षा, भेदभाव कुरीतियों को मिटाना है,
आज़ादी के जश्न में, नया दीप जलाना है।
विज्ञान हो या अंतरिक्ष, अब हम सब आगे बढ़ते हैं,
आत्मनिर्भर भारत का, हर सपना सच हम करते हैं।
यह देश हमारा संतों का, यह भूमि पावा, वीरों की,
आज़ादी का जश्न मनाओ, देखो महक तक़दीरों की।
आवाज़ें गूंज उठी जय हिंद! जय हिंद! के नारों की,
मुश्ताक़ याद करो तुम कुर्बानी भारत मां के लालों की।
- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़
*****
जहां पर्वत आसमान से मिलते हों,
जहां हर गली में फूल खिलते हों,
जहां की जमीन कभी बांझ नहीं होती,
जहां सुख, समृद्धि और शांति साथ मिलती हों।
जहां की पवन शीतलता का वरदान लाती हो,
जहां पेड़ पर बैठी हर चिड़िया गाती हो,
सूर्य जिसका एक एक कर्ण रोशन करे,
हर गली में जो आजादी की राह बनाती हो।
उस देश भारत को नमन करता हूं,
उसमें महानता की और बूंदे भरता हूं,
भारत को विश्वगुरु बनाने की,
भारत को ऊंचाइयों पे ले जाने की कोशिश करता हूं।
- प्रणव राज
*****
