साहित्य चक्र

02 August 2026

विकास और पर्यावरण पर लेखकों की विशेष लेखमाला पढ़िए






विकास के नाम पर पेड़ों का काटना कितना सही ?


पेड़ हमारे जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।पेड़ों के बिना इंसान का अस्तित्व बिल्कुल शून्य है। पेड़ों को विकास के नाम पर काटना बिल्कुल भी सही नहीं है।परंतु इनके काटने के बिना जीवन में कई आवश्यक वस्तुओं का अभाव हो जाएगा।ग्रामीण क्षेत्रों में अभी अधिकतर लोग रसोई घर में ईंधन के रूप में लकड़ी का इस्तेमाल करते हैं,पशुओं के लिए चारा इमारती लकड़ी,भूमि अपरदन से रोकते हैं और सबसे महत्वपूर्ण ये कि पेड़ हमें सांस लेने के लिए ऑक्सीजन देते हैं और हमारी छोड़ी हुई कार्बनडाक्साइड गैस को ग्रहण करते हैं।


पृथ्वी पर सभी प्राणियों का जीवन मुख्यत:पेड़ों पर ही टिका है।विकास के नाम पर पेड़ों को हम काट तो रहे हैं परंतु ये भी सोचने का विषय है जिस अनुपात में पेड़ काट रहे हैं क्या उस अनुपात में नए पौधे लगा भी रहे हैं कि नहीं।अक्सर हम देखते हैं कई बड़े बड़े फलदार पेड़ जिन्हें हमारे पूर्वजों ने लगाया था उनके फल और उनसे कई प्रकार के लाभ हम उठा रहे हैं।क्या हम भी अपनी आने वाली पीढ़ियों के बारे में सोच रहे हैं या नहीं।


सरकार द्वारा अक्सर पेड़ों के महत्व को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय स्तर की योजनाएं चलाकर रखी हैं।जैसे कि एक पेड़ मां के नाम परन्तु हर बार पेड़ लगाने ही नहीं हैं अपितु जो पेड़ लगाए हैं क्या उनकी हम देखभाल भी कर रहे हैं या नहीं।हमारे पूर्वजों यूँ ही पेड़ों की पूजा नहीं करते थे जैसे पीपल की पूजा करना।वे इस बात से भली भांति परिचित थे कि पेड़ सभी प्राणियों में प्राण वायु का संचार करते हैं बल्कि पीपल तो दिन रात हम सभी को ऑक्सीजन देता था।वे तो यहां तक कहते थे शाम या रात के समय किसी प्रकार का पत्ता फूल फल सब्जी नहीं तोड़ी जाती  क्योंकि ये पौधे भी रात का सोए होते हैं।


प्रोजेक्ट जैसे सड़कों व रेलवे लाइन का विस्तारीकरण बड़े  बड़े भवन जो विकास की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं पर उनकी महत्वता के कारण पेड़ों के काटने को भी बढ़ावा नहीं दिया जा सकता। हम पर्वतीय राज्यों में कई वर्षों से बरसात के दिनों इस बेतरतीब दोहन के परिणाम भयंकर बाढ़ बादल फटने जैसी घटनाओं के रूप में देख चुके हैं। अत:इस पावन कार्य की शुरुआत के लिए हमे सरकारों की तरफ ताकना बंद करना होगा जितना राज्य करता हमे भी राज्य के साथ कंधे से कंधा मिला कर पेड़ों की रक्षा कर पर्यावरण को बचाकर देश सेवा में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी।


                                                                           - राज कुमार कौंडल


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विकास के नाम पर पेड़ों को काटना कितना सही है ?


"यदि पृथ्वी पर जीवन को सुरक्षित रखना है, तो विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना ही होगा।"

वर्तमान युग को विकास का युग कहा जाता है। नई सड़कें, चौड़ी राष्ट्रीय राजमार्ग, मेट्रो रेल, उद्योग, बहुमंजिला इमारतें, स्मार्ट सिटी और आधुनिक सुविधाएँ किसी भी देश की प्रगति के प्रतीक मानी जाती हैं। प्रत्येक राष्ट्र अपने नागरिकों को बेहतर जीवन, रोजगार और आधारभूत सुविधाएँ उपलब्ध कराने के लिए विकास कार्यों को गति दे रहा है। 

किंतु इस विकास की दौड़ में सबसे अधिक नुकसान यदि किसी का हुआ है, तो वह प्रकृति का हुआ है। विशेष रूप से पेड़ों की अंधाधुंध कटाई ने पर्यावरण के सामने गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। ऐसे में यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या विकास के नाम पर पेड़ों को काटना उचित है?

पेड़ केवल प्रकृति की सुंदरता नहीं बढ़ाते, बल्कि वे पृथ्वी पर जीवन के सबसे बड़े रक्षक हैं। वे हमें शुद्ध ऑक्सीजन प्रदान करते हैं, कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर जलवायु परिवर्तन की गति को धीमा करते हैं, वर्षा चक्र को संतुलित बनाए रखते हैं तथा मिट्टी के कटाव को रोकते हैं। जंगल असंख्य वन्य जीवों और पक्षियों का प्राकृतिक आवास हैं। 

औषधियों, फल, फूल, लकड़ी और अनेक प्राकृतिक संसाधनों का आधार भी पेड़ ही हैं। भारतीय संस्कृति में तो वृक्षों को देवतुल्य माना गया है। पीपल, बरगद, नीम और तुलसी जैसे पौधों की पूजा केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि प्रकृति संरक्षण की एक वैज्ञानिक परंपरा भी रही है।

वर्तमान समय में विकास परियोजनाओं के लिए बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई की जा रही है। इसके परिणाम अब स्पष्ट दिखाई देने लगे हैं। वैश्विक तापमान में निरंतर वृद्धि, असामान्य वर्षा, भीषण गर्मी, बाढ़, सूखा, वायु प्रदूषण और जैव विविधता का ह्रास मानव अस्तित्व के लिए गंभीर चुनौती बन चुके हैं।

बढ़ती जनसंख्या और बदलती आवश्यकताओं के अनुरूप सड़कें, विद्यालय, अस्पताल, उद्योग और परिवहन सुविधाएँ आवश्यक हैं। लेकिन विकास का अर्थ प्रकृति का विनाश नहीं होना चाहिए। वास्तविक विकास वही है जो पर्यावरण की रक्षा करते हुए मानव जीवन को बेहतर बना। 

 आधुनिक तकनीकों, हरित भवनों, शहरी वनों और पर्यावरण-अनुकूल निर्माण पद्धतियों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। केवल पौधारोपण कार्यक्रम आयोजित करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि पौधों का संरक्षण और संवर्धन भी उतना ही आवश्यक है।

इस दिशा में नागरिकों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रत्येक व्यक्ति यदि अपने जीवन में कम-से-कम एक पौधा लगाकर उसकी जिम्मेदारी ले, तो पर्यावरण संरक्षण का बड़ा अभियान सफल हो सकता है। विद्यालयों में पर्यावरण शिक्षा को व्यवहारिक रूप दिया जाए, ताकि बच्चों में प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता विकसित हो। 

महात्मा गांधी ने कहा था- "पृथ्वी हर व्यक्ति की आवश्यकता पूरी कर सकती है, लेकिन हर व्यक्ति के लालच को नहीं।"

इस प्रकार कहा जा सकता है कि विकास के नाम पर अंधाधुंध पेड़ों की कटाई किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। हमें ऐसे विकास मॉडल को अपनाना होगा जिसमें प्रकृति और प्रगति एक-दूसरे के पूरक बनें, विरोधी नहीं। यदि हम आज वृक्षों की रक्षा करेंगे, तभी आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित, समृद्ध और हरित भविष्य दे सकेंगे। इसलिए हमारा संकल्प होना चाहिए- "विकास भी, पर्यावरण भी; प्रगति भी, प्रकृति भी।"


                                                              - मनोज कौशल, शिक्षक (हिंदी)


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वृक्ष: धरती की साँस, मानवता की आशा


"यदि वृक्ष हैं, तभी भविष्य है।" यह केवल नारा नहीं, बल्कि मानव सभ्यता का शाश्वत सत्य है। भारतीय संस्कृति में प्राचीन काल से वृक्षों को देवतुल्य माना गया है। पीपल, वट, नीम और तुलसी हमारी आस्था, संस्कृति तथा जीवन के प्रतीक हैं। ऋषि-मुनियों ने वृक्षों की छाया में ज्ञान प्राप्त किया और हमारे धर्मग्रंथों ने प्रकृति संरक्षण को मानव का परम धर्म बताया है।

वैज्ञानिक दृष्टि से वृक्ष पृथ्वी के जीवन-रक्षक हैं। एक परिपक्व वृक्ष प्रतिवर्ष लगभग 22 किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित कर वातावरण को शुद्ध करता है। संयुक्त राष्ट्र भी मानता है कि जलवायु परिवर्तन से लड़ने का सबसे प्रभावी प्राकृतिक उपाय वनों का संरक्षण है। जापान में फ़ॉरेस्ट बाथिंग को स्वास्थ्य उपचार का हिस्सा बनाया गया है, जबकि कोस्टा रिका ने अपने वनों का सफल पुनर्जीवन कर विश्व के सामने अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया है।

विडंबना यह है कि हम विकास की ऊँची इमारतें खड़ी करने की होड़ में उन्हीं जंगलों की नींव उखाड़ रहे हैं, जिन पर मानव सभ्यता टिकी है। आज पेड़ों को काटकर सड़कें चौड़ी की जा रही हैं, पर शायद हम यह भूल रहे हैं कि कल इन्हीं सड़कों पर स्वच्छ हवा की तलाश करनी पड़ सकती है।

वृक्ष केवल फल, फूल, औषधियाँ और छाया ही नहीं देते, बल्कि असंख्य जीवों का आश्रय भी हैं। यदि वृक्ष नहीं रहेंगे, तो वर्षा, स्वच्छ वायु और जीवन—तीनों संकट में पड़ जाएंगे। इसलिए आइए, संकल्प लें कि एक भी वृक्ष अनावश्यक न कटे, क्योंकि वृक्ष बचेंगे, तभी मानवता बचेगी।


- रोशन कुमार झा, जमशेदपुर


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विकास के नाम पर पेड़ों को काटना कितना सही है ?


इस लेख को लिखने से पहले मैं अपनी माननीया राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु जी के उस भाषण का ज़िक्र करूंगी, जो उन्होंने पर्यावरण राष्ट्रीय सम्मेलन 2025, विज्ञान भवन, नई दिल्ली में दिया था। इस भाषण में उन्होंने पेड़ों और धरती को नमन और क्षमा मांगने वाली बहुत सुंदर बात कही थी।

राष्ट्रपति जी ने अपने बचपन की बात बताते हुए कहा:- "मेरे पिता और माता लकड़ियां एकत्र करते थे। फिर वे उन्हें छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर जलाने लायक बनाते थे। मैं हर दिन देखती थी कि मेरे पिता लकड़ियों को काटने से पहले उनके आगे झुकते थे। मैं अपने पिता से पूछती थी, आप लकड़ियां काटने से पहले प्रार्थना क्यों करते हैं? वह मुझसे कहते थे कि वह क्षमा मांग रहे हैं।"

उन्होंने आगे कहा कि पर्यावरण संरक्षण का संदेश देते हुए राष्ट्रपति ने याद किया कि कैसे उनके पिता खाना पकाने और कृषि के लिए पेड़ों एवं धरती का उपयोग करने से पहले उनको नमन करते थे तथा उनसे क्षमा मांगते थे।

इसका मतलब क्या था ? राष्ट्रपति जी का कहना था कि हमारे पूर्वज प्रकृति को बहुत सम्मान देते थे। पेड़ काटने से पहले, धरती पर फावड़ा चलाने से पहले हम धरती माँ से नमन करके क्षमा मांगते थे। क्योंकि हम जानते थे कि हम प्रकृति से ले रहे हैं, इसलिए उसका सम्मान करना जरूरी है। उन्होंने लोगों से सवाल किया कि "क्या उन प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट करना उचित है, जिन्हें मनुष्य स्वयं नहीं बना सकता?"

यह भाषण पर्यावरण को बचाने और प्रकृति के साथ समन्वय का बहुत सुंदर संदेश है। उन्हें संरक्षित करना हमारा धर्म है। कहा भी गया है- "वृक्षो रक्षति रक्षितः" अर्थात तुम उसकी रक्षा करो, वह तुम्हारी रक्षा करेगा। अब प्रश्न यह उठता है कि यदि हम अपने वृक्षों की रक्षा नहीं करेंगे तो हमें क्या-क्या प्राकृतिक आपदा झेलनी पड़ेगी ?

शुद्ध हवा की कमी- पेड़ों के कटने से ऑक्सीजन कम होती है और प्रदूषण बढ़ता है। प्राकृतिक आपदा- जंगल उजड़ने से बाढ़ और मिट्टी खिसकने का खतरा बना रहता है। इसके कारण कभी भूस्खलन, कभी अत्यधिक वर्षा, कभी सूखा आदि की संभावना रहती है। बेघर होते जीव- पेड़ों पर या जंगल में रहने वाले पशु-पक्षियों का आशियाना छिन जाता है। भोजन की तलाश में वे बस्तियों में आ जाते हैं, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ता है। यह प्रकृति के नियम के विरुद्ध है।

बेहतर विकल्प और समाधान-

1- पेड़ों का प्रतिस्थापन: जितने पेड़ काटे जाएं, उससे कई गुना अधिक पेड़ लगाए जाएं। पर यह विधि आंशिक फलदायक है क्योंकि पौधे को पेड़ बनने में समय लगता है।

2- पेड़ों को शिफ्ट करना: काटने के बजाय पेड़ों को सुरक्षित तरीके से दूसरी जगह स्थानांतरित किया जाए।

3- विकास योजना में बदलाव: ऐसी योजना बनाई जाए जिसमें कम से कम पेड़ कटें।

प्रकृति और पेड़ हमारे जीवन का आधार हैं। यदि वे नहीं होंगे तो हम जीएंगे कैसे? प्रकृति ने हमें बहुत कुछ दिया है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो प्रकृति के पास अथाह संपत्ति है हमें देने के लिए, पर यह संपत्ति भी करोड़ों वर्षों के परिश्रम से हमें प्राप्त हुई है।

वैज्ञानिकों के अनुसार लगभग 100 करोड़ वर्ष पहले पृथ्वी पर शैवालों से पौधे विकसित हुए। और 50 करोड़ साल पहले ये जलीय पौधे धीरे-धीरे जमीन पर आए और विशाल वृक्षों का रूप लिया। इस उत्पत्ति के रहस्य को जानते हुए हम कह सकते हैं कि प्रकृति एवं पेड़ हमें बहुत कठिनाई से मिले हैं।
अतः इसे संरक्षित करना हमारा कर्तव्य एवं धर्म दोनों है।

इसलिए अंधाधुंध होकर पेड़ों की कटाई करना, मात्र सौंदर्यीकरण के लिए या अनावश्यक विकास के लिए, यह उचित नहीं है। विकास के नाम पर पेड़ काटना ज़रूरी कब है ? सड़क, अस्पताल, स्कूल, पानी की लाइन... ये भी तो समाज के लिए जरूरी हैं। बिना बुनियादी चीजों के विकास रुक जाएगा। तो कुछ जगह पेड़ काटने पड़ते हैं।

जब "विकास" का मतलब सिर्फ कंक्रीट और इमारत हो जाए। एक पेड़ काटते हैं, पर 10 लगाते नहीं। शहर गर्म हो जाता है, भूजल नीचे चला जाता है, पक्षी बेघर हो जाते हैं, सांस लेने की हवा कम हो जाती है। गर्मी हर साल बढ़ रही है, उसका एक कारण यह भी है।

तो सही रास्ता क्या है ? "विकास + संरक्षण" साथ चले।

पहले सोचो: क्या पेड़ हटाए बिना काम हो सकता है? रोड का डिजाइन बदला जा सकता है? जैसे विदेशों में सड़कें पेड़ों को बचाकर बनती हैं, वैसे ही यहां भी बनें। काटो तो लगाओ: 1 पेड़ कटे तो 5 लगें। और लगाकर भूलें नहीं, उन्हें पाला भी जाए। पुराने पेड़ बचाओ: 50 साल का पीपल और नया पौधा बराबर नहीं होते। सार- पेड़ काटना अपने आप में गलत नहीं है। गलत है बिना सोचे काटना। विकास का मतलब विनाश नहीं होना चाहिए।


- रत्ना बापुली


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विकास के नाम पर पेड़ों को काटना कितना सही है ?


"यदि विकास की राह में प्रकृति का अस्तित्व ही समाप्त हो जाए, तो वह विकास नहीं विनाश कहलाता है।" आज ऊँची-ऊँची इमारतें, चौड़ी सड़कें और बड़े-बड़े उद्योग विकास के प्रतीक माने जाते हैं। लेकिन इन सबकी नींव में यदि हजारों पेड़ों का बलिदान छिपा हो, तो हमें यह सोचने की आवश्यकता है कि क्या ऐसा विकास वास्तव में उचित है ?

पेड़ केवल लकड़ी का स्रोत नहीं, बल्कि पृथ्वी के प्राण हैं। वे हमें शुद्ध वायु, वर्षा, छाया, औषधियाँ और असंख्य जीव-जंतुओं को आश्रय प्रदान करते हैं। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई से जलवायु परिवर्तन, बढ़ता तापमान, जल संकट और प्राकृतिक आपदाओं जैसी गंभीर समस्याएँ जन्म ले रही हैं। यदि यही स्थिति बनी रही, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें कभी माफ़ नहीं करेंगी।

निस्संदेह, विकास आवश्यक है, लेकिन पर्यावरण का सम्मान करते हुए। जहाँ पेड़ काटना अपरिहार्य हो, वहाँ उससे कई गुना अधिक वृक्ष लगाए जाएँ और उनका संरक्षण भी किया जाए। वास्तव में यही सच्चा और टिकाऊ विकास है।


अंत में मैं केवल इतना कहना चाहूँगी-

"पेड़ बचेंगे, तभी पृथ्वी बचेगी!
पृथ्वी बचेगी, तभी हमारा भविष्य सुरक्षित रहेगा।"


इसलिए विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखना मानव की सबसे बड़ी जिम्मेदारी होनी चाहिए।


- नूतन गर्ग, दिल्ली


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विकास के नाम पर पेड़ों को काटना कितना सही है ?


आज हमारा देश एक विकसित देश है, जिस पर हमें बहुत गर्व भी होता है। परन्तु इस गर्व को महसूस करने के लिए हमने बहुत बड़ी कीमत चुकाई है।हम जिसे विकास समझ रहे हैं वह विकास न होकर विनाश है। हम जिस पथ पर अग्रसर हो रहे हैं हमारे आने वाली पीढ़ी स्वच्छ वायु स्वच्छ जल और स्वच्छ वातावरण के लिए तरसेगी।

क्योंकि हम वर्तमान मे उन्नति और विकास के नाम पर पृथ्वी पर से पेड़ों को काटकर के उसे नग्न बनाते जा रहे हैं, जिसका परिणाम यह होगा कि संपूर्ण पृथ्वी सूर्य के तेज गर्मी को बर्दाश्त ना कर सकेगी जिसके कारण से ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्या अपने चरम पर होगी। इसीलिए यह आवश्यक हो गया है कि अब हम सबको एकजुट होकर के पृथ्वी पर से पेड़ों के नष्ट होने या काटे जाने का विरोध करना चाहिए।

यदि पेड़ों को काटना बहुत आवश्यक हो उन्हें काटने की बजाय उन्हें उस स्थान से निकलकर दूसरे स्थान पर लगाना चाहिए। क्योंकि उस पेड़ का जो मूल्य है वह हम नया पेड़ लगा करके उसकी भरपाई नहीं कर सकते हैं।


- अनुरोध त्रिपाठी, प्रयागराज



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विकास के नाम पर प्रकृति का विनाश कितना उचित ?


आज विकास के नाम पर जिस तेजी से पेड़ों की कटाई हो रही है, उसके दुष्परिणाम हमारे सामने हैं। बढ़ती गर्मी, अनियमित वर्षा, बाढ़, भूस्खलन, जल संकट और वायु प्रदूषण यह संकेत देते हैं कि कहीं न कहीं विकास और प्रकृति के बीच संतुलन बिगड़ रहा है।

विकास आवश्यक है। विद्यालय, अस्पताल, सड़कें और अन्य सुविधाएँ समाज की जरूरत हैं। लेकिन विकास ऐसा होना चाहिए जिससे प्रकृति को न्यूनतम क्षति पहुँचे। यदि किसी जनहित के कार्य के लिए पेड़ काटना अपरिहार्य हो, तो उसके बदले अधिक संख्या में वृक्ष लगाना भी हमारी जिम्मेदारी होनी चाहिए।

ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी लोग प्रकृति से गहरा जुड़ाव रखते हैं। वहीं आज की युवा पीढ़ी भी पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक है और जंगलों की अंधाधुंध कटाई का विरोध करती दिखाई देती है। इसके विपरीत, शहरी क्षेत्रों में सड़क चौड़ीकरण, नई कॉलोनियों और बड़े निर्माण कार्यों के नाम पर हजारों पेड़ काटे जा रहे हैं। इसका परिणाम बढ़ते तापमान, जलभराव और प्राकृतिक आपदाओं के रूप में सामने आ रहा है।

हमें ऐसा विकास चाहिए जो प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखे। सरकार के साथ-साथ प्रत्येक नागरिक का भी कर्तव्य है कि वह अधिक से अधिक वृक्ष लगाए, प्लास्टिक का कम उपयोग करे और पर्यावरण संरक्षण में अपना योगदान दे।

याद रखिए, प्रकृति हमें जीवन देती है। यदि हम उसका सम्मान करेंगे, तो वह आने वाली पीढ़ियों के लिए भी सुरक्षित रहेगी। इसलिए आइए, हम विकास के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण का भी संकल्प लें।


- सुमन डोभाल काला


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क्या विकास के लिए पेड़ों को काटना सही है ?


सामान्यतः विकास किसी क्षेत्र विशेष में उन्नति, वृद्धि या निरंतर आगे बढ़ने को कहते हैं। वर्तमान में किसी क्षेत्र, प्रदेश या देश में विकास के लिए पेड़ों को काटना आम बात है। सामान्यतः हम देखते हैं कि भवन बनाने, सड़के बनाने, खेत बनाने और उद्योग स्थापित करने के लिए जगह-जगह पेड़ काटे जा रहे हैं।

पेड़ों को काटना कभी भी उचित नहीं ठहराया जा सकता परन्तु क्षेत्र, प्रदेश या देश विशेष का विकास भी अनिवार्य हैं। अतः हमें वनों के काटने की एक निश्चित सीमा तय करनी होगी ताकि विकास भी हो जाए और पारिस्थितिक संतुलन पर भी वृक्षों के कटान का विपरीत प्रभाव ना पड़े।

हमें वनों के काटने और विकास कार्यों के मध्य एक संतुलन बनाना होगा। हर एक विकास कार्य में हमारा यह लक्ष्य होना चाहिए कि काटे गए पेड़ों के स्थान पर ,उससे अधिक संख्या में पेड़ लगाए जाएं। इसके अतिरिक्त ,इन पेड़ों की रखवाली का दायित्व उन व्यक्तियों पर होना चाहिए जो इन विकास कार्यों से लाभान्वित हो रहे हो। एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि अगर पूर्ण विकसित वृक्षों को काटा जाता है तो उनकी शीघ्र प्रतिपूर्ति करना असंभव है, इसलिए हमें पूर्ण विकसित वर्षों के काटने से बचना चाहिए।

प्रत्येक समझदार व्यक्ति का यह दायित्व है कि वह पेड़ों को कटने से बचाए एवं वृक्षारोपण में अपनी निरंतर भागीदारी सुनिश्चित करें। हमें एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में न सिर्फ स्वयं वृक्षारोपण करना चाहिए बल्कि औरों को भी इस पुनीत कार्य हेतु प्रेरित करना चाहिए। तभी हम बढ़ती हुई वैश्विक उष्णन और जलवायु परिवर्तन जैसी प्राकृतिक आपदाओं से निपट सकते हैं।


- प्रवीण कुमार


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मित्रता दिवस विशेष- 02 अगस्त 2026





मेरी पहली दोस्ती- सुनीता के नाम


मेरी पहली दोस्ती सुनीता से हुई। वह केवल मेरी सहेली नहीं, मेरे संघर्षों की सच्ची साथी थी। उत्तराखंड के छोटे-से शहर टिहरी में हमारा बचपन बीता। जब पानी की कमी होती, हम साथ नदी से पानी भरते, वहीं कपड़े धोते और फिर कई किलोमीटर पैदल स्कूल जाते। पढ़ाई, होमवर्क और घर-परिवार की ज़िम्मेदारियां- हर कदम पर हम एक-दूसरे का सहारा बने।


"वक़्त बदल गया, रास्ते बदल गए,
पर दोस्ती के एहसास कभी नहीं बदले।"


आज हमारी शादियाँ हो चुकी हैं, जीवन अपनी-अपनी दिशा में आगे बढ़ गया है, लेकिन वर्षों बाद भी हमारी मित्रता वैसी ही निर्मल, निस्वार्थ और अटूट है। सच तो यह है कि पहली दोस्ती उम्रभर दिल की सबसे खूबसूरत याद बनकर साथ चलती है।


- बीना सेमवाल


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पांचवीं कक्षा के बाद जब हमने गांव छोड़ा तो उस समय ललिता गांव में नहीं थी, छुट्टियों में अपने मामा के घर गई हुई थी। कुछ दिनों बाद गांव से मेरे चाचाजी मुझे लेने आये, उन्होंने कहा- "ललिता बहुत ज्यादा बीमार है और एक बार तुझसे मिलना चाहती है।"

गांव जाकर जब मैं उससे मिली तो हम दोनों एक-दूसरे के गले लगाकर बहुत रोये। वो बहुत कुछ जो मन में रह गया था आंसुओं में बहकर बाहर आ गया। उसके बाद समझ आया कि हम दोनों की जिंदगी में एक-दूसरे की क्या अहमियत है। एक-दूसरे से दूर होने के बाद भी हम 36 साल से अपनी दोस्ती को आज भी निभा रहे हैं।


- मंजू सागर


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निःस्वार्थ दोस्ती

दोस्ती शब्द सुनते ही दिल, दिमाग और चेहरा एक साथ खिल उठता है। दोस्ती में कुछ तेरा या मेरा नहीं होता। सब कुछ हमारा होता हैं। दोस्ती वो रिश्ता है जो हमे पारिवारिक रूप से या परंपरागत तरीके से नहीं मिलती। ना ही जन्मसूत्र से मिलती हैं। जिंदगी के बाकी रिश्ते माता पिता भाई बहन चाचा मामा बुआ मौसी कुछ भी हम स्वयं नहीं चुनते। पर दोस्त, एक दूसरे को लाखों करोड़ी की भीड़ में ढूंढ लेते। और फिर दोस्ती हो जाती है।

अक्सर पहले अनजान लोग आपस मिलते हैं, उनमें से जिनकी इच्छाए, रुचि, भावनाएं, चेतना, जागरूकता एवं विचार धाराएं आपस में अधिकांश रूप मेल खाती हैं। वो एक दूसरे को हर परिस्थिति में भली भांति समझ पाते हैं। इस प्रकार वो अच्छे दोस्त बन जाते हैं। मेरी सबसे पहली और अच्छी दोस्त है प्रकृति। क्योंकि हम, एक दूसरे को अच्छी तरह से समझते हैं। जिंदगी के हर पल हर एक परिस्थिति, हर फैसला एवं हर सफलता और असफलता को समझने में प्रकृति से अच्छा उदाहरण और कोई नहीं दे सकता। प्रकृति से मुझे हर मुश्किल से सामना करने की हिम्मत मिलती है।

जिंदगी को सही तरीके से जीने की प्रेरणा भी प्रकृति ही है। ये पेड़ पौधे नदी पहाड़ वादियां,फूल पत्ते पक्षी मै सबकी भावनाओं को समझ सकती हूं। हम एक दूसरे का ख्याल भी रखते हैं। दोस्ती में कोई आभार नहीं होता। इसलिए मैं धन्यवाद तो नहीं कहूंगी, पर गर्व से कहती हूं, कि प्रकृति मेरी निःस्वार्थ दोस्त है।

- सुतपा घोष, दुर्गापुर


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बचपन की अनमोल धरोहर, पहली मित्रता और अशोक

जीवन के सफ़र में कई रिश्ते बनते हैं, लेकिन बचपन की पहली मित्रता सबसे अनोखी और निष्कपट होती है, जहां स्वार्थ का कोई स्थान नहीं होता।

​मेरा मित्र अशोक सिर्फ़ एक नाम नहीं, बल्कि भरोसे और बिना शर्तों के स्नेह का दूसरा नाम था। नीम के पेड़ की छांव, एक ही छाते में भीगते हुए स्कूल से घर लौटना और हर मुश्किल वक्त में उसका यह कहना,"फ़िक्र मत कर, तेरा भाई तेरे साथ है",आज भी मेरी स्मृतियों में जीवित है।

​वक्त के क्रूर मोड़ ने उसे हमसे छीन लिया, लेकिन उसकी यादें और दोस्ती इस जीवन की सबसे बड़ी दौलत बनकर हमेशा मेरे दिल में अमर रहेंगी।


- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़



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मेरे दोस्त

जब भी दोस्ती का ज़िक्र आता है, सबसे पहले तुम याद आते हो। तुम केवल मेरे सहपाठी नहीं, बल्कि मेरी परछाईं थे। साथ-साथ स्कूल जाना, एक ही साइकिल से ट्यूशन पहुँचना और लौटते समय समोसे खाना- ये छोटी-छोटी यादें आज भी मुस्कान दे जाती हैं।

पढ़ाई में हमारी स्वस्थ प्रतिस्पर्धा कभी-कभी तकरार भी कराती थी, लेकिन आज समझ आता है कि उसी ने हमें आगे बढ़ना सिखाया। समय ने हमें अलग राहों पर पहुँचा दिया, पर दोस्ती का वह अपनापन आज भी दिल में ज़िंदा है। मित्रता दिवस पर बस इतना कहना चाहता हूँ- तुम्हारी दोस्ती मेरे जीवन की सबसे अनमोल यादों में हमेशा रहेगी।


- रोशन कुमार झा, जमशेदपुर


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पहली मित्रता


मेरी पहली मित्रता विक्रांत से हुई, वह मेरे मामा जी का सबसे बड़ा बेटा है। बचपन में ननिहाल में जाना अक्सर होता था। हम दोनों इस दौरान खूब मस्ती करते थे । विकी उर्फ विक्रांत बचपन से ही समझदार और पढ़ाई में होशियार था। वो दिल का सच्चा था और हम दोनों एक दूसरे का साथ बहुत पसंद करते थे।

बचपन में लगभग सारे त्योहार हम दोनों बड़े प्यार से इकट्ठे मनाते थे। कभी विकी हमारे घर आता था, कभी मैं अपने मामा के घर जाकर विकी के साथ का आनंद लेता था।

आज विकी बैंगलुरु में एक प्राइवेट कंपनी में एक अच्छे पैकेज पर कार्यरत है, शादीशुदा है और एक खुशहाल जीवन व्यतीत कर रहा है। अक्सर उससे बात होती रहती है, तो ये एहसास होता है कि वो आज भी पहले की तरह बिंदास ही है, उसे प्रसन्न देख मुझे भी अत्यन्त प्रसन्नता होती है।


- प्रवीण कुमार, घुमारवीं



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मेरी पहली दोस्ती पुष्पा श्रीवास्तव से थी। मैं गांव से पहली बार पढ़ने शहर आई थी और ठीक से बोलना, ड्रेस अप होना भी नहीं आता था। उसने ही मुझे संबल दिया और दूसरे मेरा मज़ाक करते थे, तो वह मुझे अकेले में समझाती थी।

इसलिए मैंने तो सच्चे दोस्त की परिभाषा जो जानी है, वह नीचे पंक्तियों में उल्लेखित की है-


कांटों की राहों में जो कमल खिलाएं,
दुःख की घड़ी में जो संवल दिलाएं।
सच्चा दोस्त मैंने जाना वही कहलाएं,
जो एकांत में तेरे दोषों को समझाएं।



- रत्ना बापुली, लखनऊ



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31 July 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 01 अगस्त 2026





भानु, धरती, गगन, पवन
जिसका करते सादर सम्मान 
ऐसे ही गुरु की महिमा का
करती हूँ मैं गुणगान।

गुरु की जिसके समदा झुकते 
ब्रह्मा विष्णु महेश्वर 
कीर्ति जिसकी प्रतिबिंबित करते 
अचल शिखि रत्नाकार 
किंकखत् रहते हैं जिसके 
महाद्वीप -अनन्य,महान 
ऐसे ही गुरु की महिमा का
करती हूँ मैं गुणगान।

शिक्षा संस्कार देकर जिसने
जीवन पथ सुगम बनाया 
प्रगति लक्ष्य परिभाषित कर 
मानवता का अंश बढ़ाया
गुरु-मूल पर ही अवलंबित
हमारी उन्नति का अभिमान 
ऐसे ही गुरु की महिमा का
करती हूँ मैं गुणगान।

चारु चरित्र उदारु प्रवृत्ति 
सतोगुण करें निवास
पदिन्दु हस्त-चंद्रिका रूपी
वाणी गत कोमल कंजा भास
गुरु दक्षिणा और सेवा हेतु 
प्रतिपल उत्सुक है मेरे प्राण
ऐसे ही गुरु की महिमा का
करती हूँ मैं गुणगान।


                               - अंशिता त्रिपाठी


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गुरु चरणों का प्रकाश

पूर्णिमा की शीतल चाँदनी में,
गुरु का तेज़ निखर आया है।
झुका हुआ यह शीश नहीं केवल,
जीवन ने खुद को अपनाया है।

गुरु के चरणों में जो झुकता है,
वह कभी पराजित नहीं होता।
उनके आशीष का एक स्पर्श,
मन का हर संशय हर लेता।

वे शब्द नहीं, संस्कार गढ़ते हैं,
अंधकार में दीप जलाते हैं।
भटके हुए हर पथिक को,
सत्य की राह दिखाते हैं।

आओ गुरु पूर्णिमा पर प्रण करें,
अहंकार का हर बंधन तोड़ेंगे।
गुरु के बताए प्रेम, ज्ञान और विनय से,
अपने जीवन को प्रकाश से जोड़ेंगे।


- डॉ. सारिका ठाकुर 'जागृति'


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मुझे अच्छे लगते हैं!

मुझे अच्छे लगते हैं
मेहनतकश स्त्रियाँ
और खाता बनाते पुरुष

अच्छे लगते हैं
उनके किए गए
अपने हिस्से का काम
वर्षों की बनाई रीति
परम्परा
नियम और कानून
को मात देना

दोनों खुश रहते हैं
अपने काम को
करते हुए
दोनों को विश्वास है
अपने कर्मों पर
सच में,
मुझे बहुत अच्छे लगते हैं
मेहनत स्त्रियां और
खाना बनाते पुरुष


- मनोज कौशल


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हर कर्म का होता है अपना विधान,
हर साधन का होता है सम्मान।

दर्जी को नाप, पुजारी को जाप,
संगीत को सुर, यज्ञ को प्रताप।

नेता भी यदि भूलें अपना धर्म,
जनसेवा से हो जाएँ वे विमुख कर्म।

तब जनता का जागृत प्रताप ज़रूरी है,
मत की चोट और जवाब ज़रूरी है।

लोकतंत्र की यही सच्ची पहचान,
जनमत ही है सबसे बड़ा विधान।

सत्ता का मद क्षणभर में ढह जाता है,
जब मतदाता अपना निर्णय सुनाता है।


- नरेंद्र मंघनानी


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गुरु की महिमा
हम गुरु को प्रणाम करते है,
हमको जो सही रास्ता दिखाएं,
वही सच्चा गुरु होता है,
भगवान से पहले गुरु ही,
हमे रास्ता दिखाते है,
जीवन के अंधेरों से,
उजाला की ओर लाते है,
जीवन के संघर्षों से हमे,
जीना सिखाते हैं,
सही गलत हम क्या कर रहे,
हमको वह बतलाते है,
शिष्यों के खुशी में,
खुद ही खुश हो जाते है,
हम कही भटक रहे हो,
रास्ता वही दिखाते हैं,
गुरु का कितना बखान करु,
भगवान से वह मिलाते हैं,
समस्त गुरु को मेरा शत शत नमन।


- गरिमा लखनवी


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दूध नहाए हैं सभी, फिर क्यों बिगड़े हाल ?
जो बोया सो काटते, फिर क्यों करे बवाल॥

सत्य छोड़कर चल दिए, छल की लेकर चाल।
फिर क्यों रोते घूमते, लेकर मन में ज्वाल॥
कर्मों का प्रतिफल मिला, कैसा फिरे मलाल
जो बोया सो काटते, फिर क्यों करे बवाल॥

नफ़रत के बीजों से कहाँ, उगते प्रेम-गुलाब।
काँटे ही काँटे मिले, सूख गए सब ख़्वाब॥
जैसी जिसकी सोच है, वैसा उसका हाल
जो बोया सो काटते, फिर क्यों करे बवाल॥

लोभ-मोह की आग में, जलते रहे उसूल।
स्वार्थों की आँधी चली, बिखर गए सब फूल॥
अपनों से ही दूर हो, कैसा यह भूचाल
जो बोया सो काटते, फिर क्यों करे बवाल॥

झूठ अगर सम्मान हो, सच हो जाए मौन।
फिर मत पूछो देश में, दोषी होगा कौन॥
नीति बिना समाज का, डगमग हर इक ताल
जो बोया सो काटते, फिर क्यों करे बवाल॥

'सौरभ' कर्मों का सदा, रहता सच्चा लेख।
समय कभी करता नहीं, पक्षपात या भेद॥
सत्य, दया, सद्कर्म से, सँवरें सबके हाल
दूध नहाए हैं सभी, फिर क्यों बिगड़े हाल?
जो बोया सो काटते, फिर क्यों करे बवाल॥


- डॉ. प्रियंका सौरभ


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प्रकृति:सृजन और संहार

प्रकृति, तेरी शक्ति असीमित है,
बारिश बन अमृत बरसाती है,
धरा पर जीवन मुस्काता है,
हर प्राणी तुझसे ही पलता है।
तू अपनी ही गति से चलती है।

कभी-कभी लगती है निष्ठुर-सी,
मानव के कर्मों का फल दे जाती।
कहीं सूखा, कहीं बाढ़ का प्रकोप,
अपना भीषण तांडव दिखलाती।

पानी के बिना भी जीवन मरता,
पानी से भी जीवन हार जाता।
कौन तुझ पर काबू कर पाया?
आज तक कौन तुझसे जीत पाया,
जो आज तुझे हराने की ठाने?

जब मानव तुझसे दूर हुआ,
स्वार्थ में खुद ही चूर हुआ।
तुझे भुलाकर प्रकृति का मान खोया,
फिर क्यों न आए सूखा और विपदा,
क्यों छोड़ दे तू उसके कर्मों का लेखा?

तेरा रूप जब विकराल बनता,
मानो साक्षात काल उतर आता।
बाढ़ के वे भयावह नज़ारे,
सावन-आषाढ़ के बेचारे।

तब इंसान को याद आती अपनी औकात,
धन-दौलत, शक्ति सब हो जाती मात।
न नौका साथ निभा पाती,
न कोई कश्ती पार लगा पाती।

प्रकृति का सम्मान करो मानव,
सामना तो कर सकते नहीं।
तू खुद खिलौना है,
तू किसी से खेल सकते नहीं।


- रोशन कुमार झा


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असम की व्यथा

घिर-घिर आये नभ में बादल , बरस रहे पुरजोर,
जलराशि संभाली न जाए, ब्रह्मपुत्र मचा रही है शोर,
गाँव डूबे, शहर डूबे, घर, पथ, आँगन सब डूबा जाए,
आंसू ही आंसू है असम में, हाल किसे दिल का सुनाए ?

जल समाधि ले रही हैं फसलें, किसान नयन जलधार,
मेहनत और पसीने की कमाई, बह जाती है क्यूँ हर बार ,
बच्चे ,बूढ़े सब तड़फ रहे हैं, रो रही है धरती माता,
दिले हाल अब किसे सुनाएं, नहीं समझ कुछ आता।

भूखे पेट, सूखे गाल, मजदूर की छिन गई रोज-रोटी,
सूने हुए बाज़ार, गलियाँ, हो गई गायब बिजली की जोती,
टूट रही छत्त, बह रहा घर, कर न सके कुछ हैं लाचार,
आ जाती है ये विपदा कहाँ से, रह-रह फिर करती प्रहार।

व्याकुल हैं सब पशु और पक्षी, मिल नहीं रहा कोई ठौर,
नदी ले गई घोंसले, घरौंदे, ठिकाना रहा नहीं अब और,
बछड़े, गायें, खरगोश, हिरन, है सब में ख़ामोशी छाई,
क्रूर प्रकृति क्यूँ इतनी हो गई, बात ये इनकी समझ न आई।

धरम मिलकर सब हाथ बढ़ाओ,इनकी मदद का बनो आधार,
दुःख की इस विकराल घड़ी में , बाँट लो उनसे प्यार अपार,
करो प्रार्थना मुस्काएं सभी, हो खुशहाली हर खेत, घर द्वार,
जीतेगा जीवन फिर से असम में, जीतता है ज्यूँ हर बार।


- धरम चंद धीमान


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सृष्टि हो या प्रलय,
दोनों जीवन का लय।
प्रकृति की आपदा,
है जीवन की सम्पदा।
देती है वह प्रेरणा,
जीने की एषणा।

सावन करता जलमग्न
तब भी देखो जीवन,
चलता रहता अविरल
क्षण क्षण पल पल।

व्यवस्था का रोना
क्यो रोएं हर वर्ष,
सच्चा जीवन वही
जो मनाता है हर्ष।

हर साल होता जल भरांव
यही तो है अपना गांव।
फिर भी जीवन मस्त है।
नित कर्म में व्यस्त हैं।

कर साईकिल की सवारी,
पानी में भी चलता है।
भाई को भी साथ बैठा,
बाढ़ को चुनौती देता है।

यही जीवन का अंदाज ,
समझ ले अगर कोई।
कभी न घिर पाए घटा,
दुःखों का यहां कोई।


- रत्ना बापुली लखनऊ


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बाढ़

काले काले मेघ घन आए,
शहर गाँव सब पानी पानी।

बिज़ली कौंधी पानी बरसा,
घर आंगन सब पानी पानी।

खेत खलिहान सब पानी पानी,
बहा ले गया सब बाढ़ का पानी।

गरज-गरज के पानी बरसा,
घर आंगन , बाज़ार गौशाला डूबे।

ज़ार ज़ार कर इंसा रोये,
पशु-पछी भी प्राण गंवाए।

गाँव गलियाँ स्कूल सब कुछ डूबे,
काले घन जब भी आते अंदर से सब थर थर कांपे।

असम में जो प्रकृति रूठी हुई,
ब्रह्मपुत्र का विकराल स्वरूप।

गलती किसकी ? भुक्त भोगी कौन,
गरीब ही जान गंवाए गरीब ही मारा जाए।


- सुमन डोभाल


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कहीं ठंडी हवाओं का मधुर अहसास,
कहीं बाढ़ ने छीन लिए जीवन के विश्वास।

कोई प्रकृति का सौंदर्य निहार रहा,
कोई अपनों का आशियाना पुकार रहा।

उफनती लहरों ने सब कुछ बहा दिया,
निर्धनों का हर सपना रुला दिया।

आओ बढ़ाएँ मानवता का हाथ,
असम के संग चले सारा देश आज।


- बीना सेमवाल


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तोड़कर
भी तुम तोड़
नहीं पाओगे।
चाहकर
भी अंगूठा
काट नहीं पाओगे।
अगर
एकलव्य अपनी
पर आ ही जाएगा,
तो
याद रखना कोई भी
अर्जुन समर में उतार नहीं पाओगे।

पल
भर में साफ
सारा अपशिष्ट हो जाएगा।
ये
वो दौर नहीं
कि एकलव्य शिष्ट हो जाएगा।

समर
तुमने जरूर
जीत लिए हैं छल बल से,
मगर
तुम्हारे मन माफिक
कहाँ अभिष्ट हो जायेगा?
बदलते
दौर में तुम
खुद को बदल नहीं पाए।

जैसा
जुबां पे है वैसा
दिल से ढल नहीं पाए।
बातों
में तुम तो
बड़े-बड़े किले ढहा दिए,
सच
के समर में
एक कदम भी नहीं निकल पाए।

आज के
एकलव्य को
हर चुनौती स्वीकार है
हर वार झेल जाएंगे,
पहना
तू चाहे जितना
तोड़ हर नकेल जाएंगे,
पानी
जब सर से ऊपर
निकलने लगे तो समझ लेना,
विकास
आज के एकलव्य
खुला खेल फर्रुखाबादी खेल जाएंगे।


- राधेश विकास


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जीवन का रंग

हम धरा पर जन्म एक बार लेंगे,
लाख कठिनाई आयी चाहे।

जगत में अपना नाम करेंगे,
लाख हस्तियाँ आयी चाहे।

बिना नाम किए गुजर गए होंगे
लाख बुराई मिली चाहे।

समझकर कुछ हस्तियाँ जी जान लगा दिए होंगे।
लाख ठोकरे खाई चाहे।

उन्ही हस्तियों का स्वर्णाक्षरों में नाम मिलेंगे।


- ओम प्रकाश साह


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समय
चुपचाप
चौखट पर बैठा रहा,
हम
बीते कल की धूल
झाड़ते रहे।

समय
रास्ते बिछाता रहा,
हम
पगचिह्नों की गिनती में
अटके रहे।

समय
हर सुबह
नई दस्तक लाया,
हम
बंद खिड़कियों से
रोशनी का हिसाब पूछते रहे।

जब तक
कुंडी खुली,
समय
मुस्कुराकर
अगली चौखट पर
जा चुका था।


- नरेंद्र मंघनानी


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मीठी चूं-चूं

सुबह उठ कर रात बची रोटी को तोड़कर,
घर की छत पर प्यार से चारों ओर बिखरा दिया।

अभी रोटी के टुकड़ों को बिखराया ही था,
पंछियों ने आकर चीं-चीं का राग सुना दिया।

गौरैया मैना छोटे बड़े पंछी सब आए थे,
जो पहुंचे न थे उन्हें भी चूं चूं कर बुला लिया।

सब अपने अपने बच्चों का ख्याल रख रहे थे,
और नन्हे परिंदों ने आसमान सर पर उठा लिया।

कोई झगड़ा नहीं कोई परेशानी कहीं नहीं,
खाने से पहले निवाला बच्चों को दिया।

मिलजुल कर सब बांट कर खा रहे थे,
मिलवर्तन का इक नया जहां बसा दिया।

जहां हम सभी बंटे है दुनिया के तंग दायरों में,
वहीं प्रेम से रहना पंछियों ने हमें सिखा दिया।

जो प्रेम सबक हम पढ़ लिख कर न सीख पाए,
वो इन परिंदों की मीठी चूं-चूं ने सिखा दिया।


- राज कुमार कौंडल


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देहाती इलाक़े में
भूख, गरीबी, बेबसी से
तंग आकर
एक अधेड़
पेड़ पर लटक गया?
सरकारी अमले ने
लाश कों
मुर्दाघर पहुंचाया
पोस्टमॉर्टम कमेटी बनीं
जनता दबी जूबां
बतिया रही थी
भूख से मर गया!
पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट
कह रही थी
कुछ खा कर मरा हैं
वो भी फांसी!
यह तो कायरता हैं।
एक सच ओर था
लाश एक नहीं
दो बरामद हुई थीं
एक कों पोस्टमॉर्टम
हेतु भेजा गया
दुसरे किसी पेड़ कों
मुर्दे को जलाने के लिए
मरघट भेजा गया।


- जितेंद्र बोयल


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दर्द-ए-ला-दवा

​जो ज़ख़्म दिल को मिले, हम छुपाए बैठे हैं,
ज़ीस्त अपनी तमाम महफ़िलमें लुटाए बैठे हैं।

​वो आ के पूछ रहे हैं  हाले दिलअब मेरा,
ख़ुद ही दाग़ दामन में  जो लगाए  बैठे हैं।

​मंजिलों को चाहत में कहां से कहां पहुंचे,
सफ़र के मोड़ पे सब कुछ गँवाए बैठे हैं।

​न कोई ख़्वाब बचा है, न अब आरज़ू कोई ,
हम अपनी राख में  चिंगारी छुपा के बैठे हैं।

नसीब मेरा तुम्हारी हसरतों में खोया है,
हाथों की लकीरों में सजा के बैठे हैं।

​ग़म-ए-हयात के पत्थर रास्तों से मेरे हट जाओ,
ज़ख्मों पर'मुश्ताक़' हम तो नमक लगाके बैठे हैं।


- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़


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साथियां तेरे बिन

साथियां तेरे बिन जी ना पायेंगे,
कसम से कहता हूँ, अब ना जीयेंगे
जब तुम ही नहीं, मेरे जिंदगी में तो
अब इस दुनिया मेंं जी कर क्या करेंगे ?

तुम्हीं से तो मेरी ये दुनिया बसी है,
तुमसे ही तो मुझे गम और खुशी है,
सुख-दुःख में तुम ही मेरे साथ रही है,
फिर अचानक मन में ये जुदाई कैसी है ?

जो भी हो गिले शिकवे सब मैं स्वीकारा,
सुधरने का तो साथियां मौका दो दोबारा,
शिकायत का अब ना कोई मौका देंगे,
साथियां सात जन्मों का बंधन है हमारा।


- चुन्नू साहा


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"अंधेरे से उजाले तक"

ढलती शामों की हवा ये बताती है कि,
रातें कभी-कभी कितनी काली हो जाती हैं।

जब जीवन की हर राह अचानक अनजानी हो जाए,
और अपने ही कदम अपना बोझ उठाने से थक जाएँ।
जब चाहकर भी कुछ बदल पाना संभव न रहे,
और समय हर उत्तर अपने भीतर छिपा ले।

जब आँखों में सपने नहीं,सिर्फ़ जागती हुई रातें रह जाएँ,
और मुस्कान का अर्थ चेहरे से बहुत दूर चला जाए।

तब मन किसी सूने चौराहे पर खड़ा होता है-
न लौटने का साहस, न आगे बढ़ने का विश्वास।
बस चारों ओर घना, निःशब्द अँधकार...
जो धीरे-धीरे मन की हर रोशनी को निगलने लगता है।

ऐसे समय में कोई आँसू भी साथ नहीं देते,
क्योंकि वे भी आँखों में ही पत्थर बन जाते हैं।

और तब समझ आता है-
सबसे कठिन युद्ध दुनिया से नहीं,
अपने ही भीतर फैले उस अँधेरे से होता है
जो हर पल कहता है-
"अब और नहीं..."

फिर भी... कहीं बहुत भीतर, राख के नीचे दबी
एक नन्ही-सी चिंगारी चुपचाप साँस लेती रहती है।
शायद वही चिंगारी एक दिन फिर से
जीवन का सूरज बने...

क्योंकि सबसे गहरा अँधेरा भी,
प्रकाश की संभावना को कभी समाप्त नहीं कर पाता।


- आरती कुमारी


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मंत्री जी का दौरा

पूरे शहर भर पोस्टर लगाया जाएगा,
आधे अधूरे कामों को,
पूरा दिखाया जाएगा।
जाम नालियां, टूटी सड़के,
जर्जर विद्यालय,
लोगों की बदहाली का,
कहीं भी जिक्र ना आएगा।
महंगाई, बेरोजगारी, गरीबी,
भुखमरी और शहर भर की गंदगी पर,
फिलहाल पर्दा डाला जाएगा।
हर चौक चौराहे पर,
चमकता पोस्टर, पोस्टर में सरकार की,
बस तारीफ नजर आएगा।
जब जब शहर में
मंत्री जी का दौरा कराया जाएगा।


- बाबू लाल



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सब रिश्ते सोच समझकर नहीं बनाए जाते,
कुछ रिश्ते यूं हीं बन जाते हैं चलते-चलते,
दो-चार मुलाकातों में,
कुछ एक हंसी ठहाकों में,
कुछ अपनी,
कुछ दूसरों की सुनने-सुनाने में,
किसी का दुःख,
अपने दुःख जैसा महसूस होने पर,
किसी की बातों में,
अपनापन महसूस होने पर,
किसी की बातों में अपने लिए,
अपनापन महसूस होने पर,
किसी को थोड़ी ज्यादा ,
तवज्जो मिल जाने पर,
कोई दे जरा हौंसला जो
नई उड़ान भरने को,
जो थाम ले हाथ कोई ,
ठोकर लग गिर जाने से पहले ही,
जब कोई जान ले अक्सर हाल,
बिना कुछ बोले ही...!
बस इन्ही छोटे छोटे किस्सों से,
नजदीकियां बढ़ जाती हैं अक्सर,
प्यार चाहे हो न हो,
हां मगर...
एक एहसासों की डोर
जुड़ जाती है अक्सर... ख़ैर!


- सुमन डोभाल काला


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