पक्षियों के लिए गर्मी में पानी कौन रखता है
आजकल घरों में रोशनदान कौन रखता है
बड़े बुजुर्गों की बातें हमेशा ध्यान से सुनना
जो भी कहते हैं वो बड़े तजुर्बे से कहते हैं
बिना दरिया के मौजों में रवानी कौन रखता है
बिना लैला के मजनू की कहानी कौन रखता है
ये दौलत ये शोहरत पल भर का तमाशा है
मां बाप गुरुओं की कद्रदानी कौन करता है।
- मनोज कौशल
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बेमौसमी ओलावृष्टि
बेमौसमी ओलावृष्टि का देख ताण्डव
सबक तक नहीं सीख रहा है मानव।
फसल बर्बाद हो रही
लहलहाने के बजाय खेतों में ढह रही।
बागवान मुश्किल में दिख रहे
उन्हें भी अपनी फसल के बर्बादी के लक्षण लग रहें।।
बादलों की गड़गड़ाहट से धरती कांपें
तो कभी भूकम्प के झटकों से हांफे ।
लगता है अब गर्मी का मौसम नहीं आएगा
सीधे बरसात में ही प्रवेश हो जाएगा।
इंसान बदला बदल रहा मौसम
दोष किसको दें बस यही लगी है कशमकश।
सम्भल जा रे इंसान अब तो थोड़ा सोच
शायद अब वो दिन दूर नहीं
जब तूं जताएगा अफसोस।
- विनोद वर्मा
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जैसी तेरी मर्जी
आना न आना तेरी मर्जी
मैं न आऊँ, ये क्यों रोक दी ?
एकतरफा ही सही,
लेकिन आना जाना है ही
खैर कोई बात नहीं,
जैसे तेरी मर्जी,
लेकिन मै हूँ और वही हूँ
सफर मे जहाँ तू रूकी थी
यदि आना चाहो तो,
तू आना, मैं हूँ अभी भी,
भले वक्त कुछ बदला है,
मन मेरा वही ही है।
आ जाओ तो, तू सही,
सब वैसा ही हो जायेगा,
जैसा मन है तेरी,
वादा है मेरा, मानो सही।
प्रेम अमरत्व है,
ये मरता कभी नही
पुनः दोहराता हूँ तुझसे
आना है तो, आ ही जाओ।
देर, अब किस बात की ?
गिले शिकवे जीवन का हिस्सा है
ये तो चलते रहेगा ही
यूँ ही... यूँ ही... यूँ ही।
- चुन्नू साहा
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मुझे तुमसे फिर से मोहब्बत हो गई
जब मैं सो कर उठा तो
तुम शीशे के सामने बैठी मुस्कुरा रही थी
मैंने तुम्हारा मुस्कुराते चेहरे को देखा...
तुम्हारे गाल पर पड़ते डिम्पल को देखा...
तुम्हारी ठोड़ी पर बने प्यारे से तिल को देखा...
तुम शरमा रही थीं
तुम इतरा रही थीं
और जब तुम शरमाई
और इतराई तभी मुझे तुमसे
फिर से मोहब्बत हो गई...
- दीपक बारुपाल
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अधूरे ख़्वाब
क्यों दिल के कुछ ख़्वाब अधूरे ही रह जाते हैं,
जो तमाम कोशिशों से भी मुक़म्मल नहीं हो पाते।
ये सपनों की दुनिया भी कितनी विचित्र होती है,
जिसमें लोग देखते हैं ख़ुद को खुश होते हुए।
इंसान हालातों का मारा एक नुमाइंदा मात्र है,
जिसे करना होता है सब्र अपने टूटे अरमानों का।
मुरझाई मुस्कान का या जागती हुई नींदों का,
हाँ होती है उसे बेहद तकलीफ़ इनके टूटने पर।
जिन्हें तन्हाई में जीता है और अक्सर सोचता है,
ख़ामोश गहरी रातों में उन अजीवित पलों को।
फिर भी नहीं करता किसी से कोई शिकायत,
और कर लेता है संतोष अपने आप से कहीं,
उदासी के साथ ख़ुद को ख़ुद में समेटे हुए,
मजबूरी में दबी रह जाती है उसकी हर आरज़ू।
अपनी नाकाम क़िस्मत का लेखा समझ कर,
एक दिन जब उसकी ये आँखें बंद हो जाती हैं।
तो उनमें कैद हो जाते हैं उसके वो सभी ख़्वाब,
जो उसने देखे तो थे पर कभी पूरे नहीं हो पाए।
- आनन्द कुमार
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शाम तो ढल जाने दें...
न रोक ए हम नवा अब मेरे आंसू,
आंखों से ये समन्दर तो निकल जाने दें।
जुल्फों की घनी छाओं की चाहत है दो घड़ी
कुछ पल ही सही दिल की गहराई में उतर जाने दें।
आंखों से तेरी, थोड़ी मैं पीलूं तो बुरा क्या है,
मैं हूं मदहोश थोड़ा सा मुझको भी बहक जाने दें।
मै खुद ही चला जाऊंगा, हूं मुसाफिर तन्हा-तन्हा,
अभी सूरज भी नहीं डूबा जरा शाम तो ढल जाने दें।
आतिशे इश्क है ऐसे न बुझेगी अब मुश्ताक
अपने होठों को मेरे होठों के करीब तो आ जाने दें।
- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह
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प्रयास
नए सत्र की हुई देखो अब शुरुआत,
नई किताबें नई वर्दी नया बैग नई कक्षा,
नए जोश से इस वर्ष की करेंगे शुरुआत।
नन्हे नन्हे कदम वक्त से मिलाएंगे अब ताल,
छोटे छोटे पर नेक मजबूत इरादे हमारे,
गुरुओं की सीख संग करेंगे इक नया आगाज़।
जो कमियां रह गई थी पिछले साल,
उन पर मेहनत से करेंगे कुठाराघात,
हर सिखाई गई बात को करेंगे अब आत्मसात।
अब न आलस होगा न ही कोई उत्पात,
समय से पहले संभालेंगे अपने कदमों को,
ताकि वर्ष के अंत में न हो कोई पाश्चाताप।
कईयों का होगा नया स्कूल,होगी नई क्लास,
मेल जोल बढ़ाएंगे सबसे करेंगे प्यार से बात,
अपनों के सपनों को पूरा करने का करेंगे प्रयास।
- राज कुमार कौंडल
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अजनबी होते रिश्ते
रिश्ते भी आजकल अजनबी से हैं होने लगे
लोग नफरतों के बीज अब बहुत हैं बोने लगे
प्यार मोहब्बत की फसलें तो अब तबाह हो गई
खूनी रिश्ते भी अब पहचान हैं खोने लगे
रिश्तेदार ही नारी की आबरू को कर रहे तार तार
मां बहन बेटी की छबि को फैंक चुके दिल से बाहर
न खौफ कानून का न इज़्ज़त का ही है डर
डर रहे हैं आज सभी एक दूसरे पर भरोसा कर
रिशतों में अपनेपन की मिठास अब हो गई है कम
इंतज़ार करती थी जो आंखे रिश्तेदारों के आने का
अपनो के पास आना भी अब बोझ लगने लगा है
समय ही नहीं है एक दूसरे के पास आने जाने का
गया वो जमाना जब आपस में होता था बहुत प्यार
आज एक दूसरे की कर रहे बहुत टांग खिंचाई
एक दूसरे के घर आते जाते थे बहुत रिश्तेदार
संपति के चक्कर में दुश्मन बन बैठे हैं भाई
पुरानों में था बहुत रिश्ते निभाने का चलन
धीरे धीरे रिश्तों का उजड़ रहा अब चमन
अब तो घर में घरवाले ही बेगानों की तरह हैं रहते
पैसों के चक्कर में कोई छोड़ रहा घर कोई छोड़ रहा वतन
मोबाइल पर व्यस्त रहते हैं आपस में कुछ नहीं हैं कहते
कानून का डर नहीं किसी को बेखौफ हैं घूमते
वो रिश्तों की कद्र क्या जाने जो खुद
चरस गांजा अफीम चिट्टा खाकर नशे में हैं झूमते
- रवींद्र कुमार शर्मा
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लिखना, न लिखना!
यदि मुझे लिखना आता,
तो सबसे पहले यह लिखता- मत लिखो।
यह पढ़ते ही एक हल्की-सी उदास मुस्कान उभरती है।
शब्द जन्म लेते हैं, पर प्रश्न भी साथ लाते हैं,
लिखा हुआ कितना पढ़ा जाएगा,
और पढ़ा हुआ कितना समझा जाएगा ?
दुनिया शब्दों से भरी है, पर भावों तक पहुँचना दुर्लभ है।
जो समझा भी गया, वह कितनी देर ठहरेगा ?
स्मृतियाँ भी समय की धारा में धीरे-धीरे धुंधली हो जाती हैं।
लिखा हुआ क्षणभंगुर है, ठीक जीवन की तरह।
पर इसका अर्थ यह नहीं कि न लिखें।
लिखना ही तो उस क्षणभंगुरता के विरुद्ध एक मौन विद्रोह है।
हम लिखते हैं, क्योंकि उसी क्षण में हम सच में जीते हैं।
सार्थकता शब्दों के फैलाव में नहीं, उनके जन्म में है।
इसलिए लिखो,भले ही कोई पढ़े या न पढ़े…
क्योंकि क्षणभंगुर भी सुंदर होता है।
- नरेंद्र मंघनानी
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बड़े खफा हो खुद से
बड़े खफा हो खुद से, ये कैसी लड़ाई है,
आईना भी चुप है, पर आँखों में रुलाई है।
हर ख्वाब से दूरी, हर चाहत अधूरी है,
दिल ने ये खुद से की कैसी बेवफाई है।
कल तक जो हँसता था, आज वही सहमा है,
अपनों की भीड़ में क्यों खुद से ही बहका है।
क्यों हर गलती को तुम सजा बना बैठे हो,
क्यों अपने ही दिल को क़ैदख़ाना बनाएं बैठे हो।
थोड़ा ठहरो, खुद को समझो, ये ज़िंदगी तुम्हारी है,
हर ठोकर के पीछे छुपी एक सीख सिखानी है।
जो टूट गया है अंदर, उसे फिर से जोड़ो,
खुद से जो रूठे हो, अब खुद से ही जोड़ो।
खुद को माफ़ करना में एक हिम्मत होती है,
हर रात के बाद नई सुबह भी होती है।
ये ग़म, ये शिकवे, सब धुंधले हो जाएंगे,
जब तुम खुद से कहोगे कि हम फिर से मुस्कुराएंगे।
- डॉ. सारिका ठाकुर 'जागृति'
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रवायत
हमें यूं तुमको
देखने की आदत है।
न है मोहब्बत
फिर भी बहुत कुछ
कहने की आदत है।
कभी सोचा ही नहीं
तुमको पाने का
बस यूं ही तुमसे
दिल लगाने की आदत है।
लोग सोचते हैं
जिस्म को छूने की
हमें यूं ही
तुम्हारी रूह को
गले लगाने की आदत है।
- डॉ. राजीव डोगरा
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बस यूँ ही...
फिर से दिल ने तुम्हे पुकारा है।
इसको तुम बिन न कुछ गंवारा है।
आप चाहो हमें ज़ुरूरी नहीं,
हमने भी कब किया इशारा है।
जिसकी आंखों में संवरते थे कभी,
उसने ही कर लिया किनारा है।
क्यों कहा करते थे कहो ऐसा,
जो तुम्हारा है। वो हमारा है।
देखकर क्यों न तुमको मुस्काऊँ,
कौन तुम सा हसीं है प्यारा है।
दिल में मीरा को क्यों बसाया था,
और नज़रों से क्यों उतारा है।
- सविता सिंह मीरा
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