नारी के बढ़ते आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता ने समाज में नई चेतना जगाई है, लेकिन इसके साथ ही यह प्रश्न भी उठने लगा है कि बदलते समय में पारिवारिक और वैवाहिक संस्थाओं का स्वरूप क्या होगा। जैसे-जैसे महिला शिक्षा का विस्तार हो रहा है और महिलाएँ आत्मनिर्भर बन रही हैं, मन में एक दुविधा और असमंजस बार-बार उठता है कि क्या आने वाले समय में हमारी पारिवारिक संस्था और वैवाहिक संस्था उसी प्रकार चल पाएँगी, जैसे अब तक चलती आ रही हैं।
क्योंकि महिलाओं में बदलाव बहुत तेजी से हो रहे हैं, लेकिन समाज-विशेषकर पुरुषों में- उतनी तेजी से बदलाव नहीं आ रहे। पुरुष की मानसिकता आज भी काफी हद तक यही है कि एक औरत पहले अपने घर को संभाले और उसके बाद यदि वह आत्मनिर्भर बनना चाहती है तो अपने परिवार को प्राथमिकता देते हुए ही अपने काम को संभाले।
लेकिन आज की महिला का तर्क है कि जब वह पुरुष के बराबर बाहर का काम करती है और जिम्मेदारियाँ निभाती है, तो घर में भी दोनों की जिम्मेदारी बराबर होनी चाहिए। घर का काम किसी लिंग विशेष से जुड़ा हुआ नहीं होना चाहिए, बल्कि आवश्यकता के अनुसार बाँटा जाना चाहिए। जब भोजन करना दोनों की समान आवश्यकता है, तो भोजन बनाना केवल स्त्री का ही काम कैसे माना जा सकता है ?
बड़े शहरों में इस सोच में कुछ बदलाव अवश्य दिखाई देता है, लेकिन यह कहना कि वहाँ इसे पूरी तरह स्वीकार कर लिया गया है, शायद सही नहीं होगा। इसी कारण आज की बहुत-सी लड़कियाँ विवाह और पारिवारिक बंधन में बंधने से हिचकती हैं। वे अपने बच्चों और घर की पूरी जिम्मेदारी अकेले नहीं संभालना चाहतीं। शायद इसी मानसिकता के चलते हमारी पुरातन वैवाहिक और पारिवारिक व्यवस्था भी कहीं-न-कहीं चुनौती के दौर से गुजर रही है।
वास्तव में प्रकृति ने नर और नारी दोनों को समान बनाया है। भेदभाव समाज की देन है, प्रकृति की नहीं। लंबे समय तक स्त्री के मन में यह धारणा स्थापित कर दी गई कि वह सहनशीलता की मूर्ति है- वह सहना जानती है, संघर्ष करना जानती है और पुरुष के अन्याय को भी चुप रहकर सहना जानती है। उसके मन में यह बात बैठा दी गई कि एक अच्छी महिला वही है जो अत्याचार सहकर भी अपने घर और परिवार को संभालकर रखे।
यदि उन तथाकथित अधिकारों की बात करें जो बाद में उसे मिलते हैं, तो अक्सर वे केवल इतने ही होते हैं कि उसे रहने के लिए एक घर और खाने के लिए रोटी मिल जाए। लेकिन समय के साथ दिशा भी बदली है और नारी की दशा भी बदली है। आज नारी आत्मनिर्भर हो गई है और वह किसी प्रकार की गुलामी सहन करने को तैयार नहीं है। लेकिन इस बदलती मानसिकता के चलते यह भी चिंता सामने आ रही है कि कहीं भारत की सुंदर वैवाहिक और
पारिवारिक परंपरा खतरे में न पड़ जाए।
एक ओर कुछ महिलाएँ विद्रोह की भावना से घर-परिवार की जिम्मेदारियों से दूरी बनाना चाहती हैं और अपने तरीके से जीवन जीना चाहती हैं। यदि हम पुरातन कथाओं की ओर देखें तो कहा जाता है कि स्वर्ग की अप्सराएँ किसी श्राप के कारण कुछ समय के लिए पृथ्वी पर आती थीं और समय पूरा होने पर बिना किसी मोह-माया के वापस चली जाती थीं। आज कहीं-न-कहीं ऐसी स्थिति बनती दिखाई देती है कि कुछ महिलाएँ अपने जीवन को केवल अपने ही तरीके से जीना चाहती हैं।
मुझे लगता है कि इस समाज और इसकी सुंदर परंपराओं को बचाने का एक ही उपाय है। जिस प्रकार पुरुषों ने धीरे-धीरे स्त्री के मन में यह विचार स्थापित किया कि वह सहनशीलता की मूर्ति है और घर को जोड़कर रखना उसी की जिम्मेदारी है, उसी प्रकार अब स्त्रियों को भी अपने विचारों और अपनी सहनशीलता के माध्यम से पुरुषों के मन में समान जिम्मेदारी की भावना स्थापित करनी होगी। इसके लिए शुरुआत करनी होगी अपने ही घर से- अपने बेटों से। उन्हें यह सिखाना होगा कि घर की जिम्मेदारी केवल स्त्री की नहीं, बल्कि पूरे परिवार की साझा जिम्मेदारी है।
इसके साथ ही हमें अपनी बेटियों के मन में भी यह बात स्थापित करनी होगी कि घर का काम करना या पारंपरिक रूप से “महिलाओं के काम” माने जाने वाले कार्य करना किसी भी प्रकार से उन्हें छोटा नहीं बनाता। मनुष्य जीवन की यह सच्चाई है कि यदि वह इस संसार में आया है, तो जीवन के लिए अनेक प्रकार के कार्य करने ही पड़ते हैं और उनका किसी लिंग विशेष से कोई संबंध नहीं होता।
अपनी बेहतरी और जीवन के निर्वाह के लिए कुछ काम हमें स्वयं करने ही पड़ते हैं। यह आवश्यक नहीं कि पुरुषों के कार्यों को अपनाकर या पुरुषों की तरह व्यवहार करके ही हम श्रेष्ठ सिद्ध हों या हमें सम्मान मिले। हमें अपने मूल गुणों को त्यागना नहीं है, बल्कि अपने अच्छे संस्कारों और सकारात्मक गुणों को समाज में भी स्थापित करना है।
यदि स्त्री केवल विद्रोह का मार्ग अपनाएगी तो समाज का कल्याण नहीं होगा और इसके दुष्परिणाम आने वाली पीढ़ियों में देखने को मिल सकते हैं। आवश्यक है कि स्त्री और पुरुष दोनों प्रतिस्पर्धा या विद्रोह नहीं, बल्कि साझेदारी के भाव से जीवन जिएँ।
समाज की बेहतरी के लिए नारी को एक बार फिर अपने संयम और सहनशीलता के गुणों को सशक्त रूप में स्थापित करना होगा और इन्हीं मूल्यों को पुरुषों के मन में भी विकसित करना होगा। तभी आने वाली पीढ़ियाँ सम्मान, सहयोग और समानता के साथ जीवन जी सकेंगी और लिंगभेद से मुक्त एक संतुलित तथा सुखी समाज का निर्माण कर पाएँगी।
- कंचन चौहान



















