साहित्य चक्र

07 September 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 07 सितम्बर 2026





वो भी क्या दिन थे

वो गाँव की मिट्टी,
वो गाँव का आँगन,
वो बचपन के सुहाने दिन,
वो अपनों का दुलार और अपनापन।
कुएँ से पानी खींचना,
आम के पेड़ पर चढ़कर आम तोड़ना,
दोस्तों के संग खेलना-कूदना,
नन्हीं नावों को पानी में छोड़ना।
बारिश की बूंदों में बेफिक्र भीगना,
मिट्टी की खुशबू में मन का महकना,
न कोई चिंता, न कोई फिक्र थी,
हर छोटी खुशी ही तब बड़ी खुशी थी।
न मोबाइल था, न कोई भागदौड़,
न रिश्तों में था कोई मन का मोड़,
वो हँसी, वो मस्ती, वो प्यारा बचपन,
आज भी ढूँढ़ता है उन्हें मेरा मन।
वो दिन लौटकर अब नहीं आएँगे,
बस यादों में आकर हमें सताएँगे,
जब भी बीते दिनों को याद करेंगे,
आँखों में नमी और होंठों पर मुस्कान लाएँगे।
सच कहूँ तो दिल आज भी यही कहता है-
वो भी क्या दिन थे,
वो भी क्या दिन थे…
जो लौटकर अब कभी नहीं आएँगे,
बस याद बनकर दिल में रह जाएँगे।

- गरिमा लखनवी


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अपनों की भीड़ में रह कर भी तन्हा हो गया हूँ मैं,
अपनी ही नज़र में खुद पर ही रुस्वा हो गया हूँ मैं।

​बुझा कर शम्अ खुद अपने ही हाथों से अँधेरे में,
किसी की उम्मीद में रोशनी का धोखा हो गया हूँ मैं।

​ज़माने की नज़र में मुकम्मल ज़ात हूँ लेकिन,
हक़ीक़त जानिए तो अंदर से टूट गया हूँ मैं।

तअल्लुक़ तोड़ने वालों का शिक़वा तक नहीं कोई,
यूँ चुपके से किसी की याद से रुख़्सत हो गया हूँ मैं।

​मेरे होने न होने से किसी को फ़र्क क्या पड़ता,
चराग़-ए-सुब्ह की मानिंद बुझा दिया गया हूँ मैं।

​मुश्ताक़ अब तो ख़ुद से भी वाबस्ता नहीं हूं मैं,
ख़ुदा जाने मैं अपने आप से क्या हो गया हूँ मैं।

- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़


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इजहार

खत में भेज रहा हूँ प्रेम का इजहार
सच्चे दिल से करता हूँ तुमसे प्यार
वन उपवन से आती है प्रेम पुकार
कोरे कागज पे लिखा है प्रेम करार

मैं तन मन से करता हूँ आज इकरार
हर जन्म में हुआ है तुमसे मेरा प्यार
मत करना मेरे प्यार का कभी इनकार
तेरा मेरा दिल धड़कता है संग दिलदार

ना कर मेरी आरजू को अब शर्मसार
तेरे लिये कर ली है मैं जग से तकरार
फकत तुम हो मेरे जीवन की संसार
एक बार मुड़ेर पे आ कर लूँ तेरी दीदार

बादलों की धुन्ध से करा दूँ तेरी श्रृंगार
प्रेम से अर्पण है मेरा जिगर उपहार
मेरे दिल की खुली है तेरे लिये मेरा द्वार
किस बात की अब करती हो तुम विचार

आ जा मेरे आँगन में तुम इक बार
भूल जाऊँ तेरे जुल्फों में छुप संसार
ले जाऊँगा सनम तुम्हें चाँद के उस पार
एक दुजे में समाँ जाऊँगा आ मेरे दिलदार

- उदय किशोर साह


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हर रोज़ एक नई जंग

शिक्षक हूं मैं, हर रोज एक नई जंग लड़ती हूं,
लड़ाई के मैदान में नहीं, बच्चों के दिलों में उतरती हूं।
झांकती हूं मैं नन्हें दिलों में, अंतर की थाह पाने को,
कितने आतुर हैं ये नन्हें बालक, प्यार सबका पाने को।

एक मुस्कान ही काफी है, इनके दिल में उतर जाने को,
बाहें फैला कर रखते हैं हर पल, ये सबको अपनाने को।
करते हैं नादानियां, है शरारतों का समंदर इनमें,
नहीं सुनते ये किसी की, रहते हैं मगन निज धुन में।

जिसके लिए रोको इनको, वही तो है करना इनको,
गिर-गिर कर ही तो है, संभलना इनको।
नाज़ुक तन और निश्चल मन है,
जब-जब गौर से देखूं इनको।

नन्हें से शैतान हैं प्यारे, अल्हड़पन से भरे हुए,
नित नई शरारत सूझे इनको, करते हैं परेशान मुझे।
रोज समस्या नई है लाते, जंग में हैं मुझको उलझाते,
हर चीज़ को अपना बतलाते, नहीं जरा भी खौफ हैं खाते।

माथा अपना पकड़ मैं लेती, समस्या सुलझाते-सुलझाते।
रोज एक नई जंग लड़ती हूं, बच्चों को पढ़ाते-पढ़ाते।
बच्चों के दिलों में उतरती हूं, प्यार से समझाते-समझाते।
रोज एक नई जंग लड़ती हूं, खुद को आजमाते-आजमाते।

- कंचन चौहान


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गांव का आदमी

उठता है सुबह तड़के
डालता है सिरहाने के नीचे हाथ
निकालता है बीड़ी का बण्डल और लाइटर
जलाता है बीड़ी खींचता है जोर का कश
जैसे मानों एक ही कश में अपने अंदर
समेट लेगा जीवन के दुखों को
चलता है धीरे धीरे अपनी गौशाला की ओर
करता है इकट्ठा गोबर एक टोकरी में
उठाकर सिर पर चला जाता है दूर खेत के कोने में
फैंकता है गोबर के ढेर पर ऐसे जैसे
मानों दूर छिटक रहा हो अपनी परेशानियों को
उठाता है दूध की भरी केनी
चल पड़ता है शहर की ओर
हलवाई को बेचने के लिए
चार पैसे बन जाएंगे परिवार चलाने के लिए
लौट कर पीता है चाय फौजी जग में
लेता है एक एक घूंट ऐसे जैसे
समेटना चाहता हो परिवार के
दुखों को अपने अंदर
नहा धोकर करता है प्रार्थना अपने इष्टदेव से
मिल जाये दिन भर के लिए काम
उठाता है प्लास्टिक के डिब्बे में रखी रोटी
चटनी एक छीला हुआ प्याज साथ में हरी मिर्च
चल पड़ता है सड़क की ओर जहां
ढेर लगा है पत्थरों का
निकालता है झोले में पड़ा हथौड़ा
करता है शुरू पत्थर कूटना
ऐसे चलता है उसका हथौड़ा
मानो कूटना चाहता हो अपनी उलझनों को
शाम को थका हारा पहुंचता है घर
बैठ जाता है टूटी चारपाई पर
फिर निकालता है जेब से बीड़ी का बंडल
एक बीड़ी ही तो है जो देती है
पूरा दिन रात उसका साथ
तभी पुकारती है घरवाली खाने के लिए
हाथ मुंह धोकर पोंछता है गमछे से
जो रहता है उसके कांधे पर
रूखा सूखा जो भी बना खा लेता है
बच्चों के साथ बैठ कर
पाता है अपनेपन का एहसास
सो जाता है फिर चारपाई पर
देखता है छत्त की ओर
नज़र आती है वही बांस की कड़ियाँ
खिड़की से आती ठंडी ठंडी हवा
नींद की आगोश में ले लेती हैं उसको
सुबह उठते ही रहती है फिर
बंडल से निकली एक बीड़ी
उसकी परेशानियों को धुएं के छल्ले
में उड़ाने के लिए तैयार
यही तो है गांव का आदमी
समाप्त हो जाएगी उसकी जिंदगी
काम के बोझ तले दबकर
सबका साथ छूट जाएगा
पर बीड़ी निभाएगी साथ
अंतिम सांस तक

- रवींद्र कुमार शर्मा


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“गुरु- एक उजाला”

हम मिट्टी थे हम
आपने हमें आकार दिया,
अक्षरों की दुनिया से आगे
जीवन का व्यवहार दिया।

जब समय की आँधियों ने
हमारे दीप बुझाने चाहे,
आपने हथेलियों की ओट से
हमारे उजाले बचाए।

हमारी आँखों में पलते
हर छोटे-से स्वप्न को,
आपने अपनी प्रार्थनाओं में
माँगा था हर क्षण को।

हम हारकर लौटे तो
आपने हार नहीं मानी,
हमने खुद को कम आँका
आपने हमारी कीमत जानी।

हमने तो बस पाठ पढ़े,
आपने जीवन पढ़ा दिया,
हमने केवल मंज़िल माँगी
आपने रास्ता बना दिया।

आज हम जो भी हैं,
उसमें आपका अंश है,
हमारी हर उड़ान के पीछे
आपके विश्वास का आकाश है।

गुरु होना केवल पढ़ाना नहीं,
किसी के भीतर का दीप बन जाना है…
और शिष्य की सफलता देखकर
चुपचाप मुस्कुरा जाना है।

- डॉ. सारिका ठाकुर ‘जागृति’


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शिक्षक दिवस

पहली गुरु मेरी मां
पहला नमन मां को

दूसरा गुरु मेरे पिताजी
दूसरा नमन पिताजी को

तीसरा गुरु मेरे भाई बहन
तीसरा नमन भाई बहन को

चौथे गुरु मेरा समस्त परिवार
जिन्होंने मुझे हर चीज़ सिखाई

पाँचवां गुरु मेरे शिक्षक
नमन वंदन अपने गुरुओं को

छठवां गुरु पूरा समाज
जिन्होंने कई सारी चीजें सिखाई

सातवां गुरु मेरे साथी
कुछ अच्छे अनुभव सीखे

नमन वंदन सारे संसार को
नमन वंदन समस्त गुरुओं को


- सुमन डोभाल काला


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एक शिक्षक की कलम से

मैं एक शिक्षक हूँ
समाज का सच्चा पथ प्रदर्शक हूँ
शिक्षा देना है मेरा काम
मकसद है सबो को मिले शिक्षा का ज्ञान।

भेद-भाव नहीं रखता हूँ जाति-पाति का
उद्देश्य रखता हूँ समाज में शांति का
सत्य अहिंसा का पाठ सदैव पढ़ाता हूँ
अधर्म से धर्म-पंथ के ओर पग बढ़वाता हूँ

न किसी को अन्याय करने को कहता हूँ
न किसी को अन्याय सहने को कहता हूँ
धर्म-अधर्म का फर्क सदैव बतलाता हूँ
अधर्म के विरूद्ध खड़े रहने को कहता हूँ ।

जबतक हूँ मै शिक्षक पद पर विराजमान
देता रहूँगा अपनी शिक्षा का ज्ञान
अबोध को बोध कराकर
निरक्षरों को अक्षर अक्षर सिखाकर।

बनाता हूँ उनसबो को सबल
ताकि बिन अक्षर,संस्कार के न हो जाये कही निर्बल
ऐसा ही तो एक शिक्षक का है काम
अपने संपूर्ण शिक्षा का कर दे दान।

- चुन्नू साहा


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दरिया सा बहने लगता हूँ

चित्र अपना देख कर
न जाने क्यों ?
दरिया सा बहने लगता हूँ

भीतर मेरे गोविन्द सागर
लहरों सा बहता रहता हूँ
सुख-दुःख को रख कर किनारे
मैं खुद को ही गहरा करता हूँ
ये लाल साफा -
मेरी पगड़ी नहीं , निशानी है
ठौहड़ू की मिट्टी की सोंधी सुगंध
और उसी की ही कहानी है
जितना झुका हूँ, उतना ही उठा हूँ
ये दरिया नहीं
पहाड़ की रवानी है,
आँखों में देखा, तो समंदर पाया
पलकों में रोक रखा, एक अर्सा पुराना
फ़ौलाद की फैक्ट्रियों के धुएँ में भी
बिलासपुर की आबो-हवा सा
महका करता हूँ

लोग कहते हैं-
तस्वीर तो, बस तस्वीर है
मैं कहता हूँ-
ये आईना है, मेरे सफर का,
जहाँ हर लकीर में लिखा है-
इज्ज़त का, शोहरत का, और सबर का
हर वक्त इम्तहान होता है

भृगु ने लात मारी थी हरि को-
श्री हरि ने चरण दबाए थे,
मैंने तो खुद को ही लात मारी
और खुद को ही गले लगाया है

चित्र अपना देख कर,
न जाने क्यों दरिया सा बहने लगता हूँ
क्योंकि- मैं पत्थर तो हूँ नहीं,
और मैं तो ठौहडू का पानी हूँ,
जो बहता है अपने ही प्रवाह से
और बह कर भी, पहाड़ सा रहता हूँ
चित्र अपना देख कर न जाने क्यों ?
दरिया सा बहने लगता हूँ।।

- बाबू राम धीमान


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गुरु

जो दुनिया दिखाए वो माँ पहली गुरू है,
पर जो जग में जीने काबिल बनाए वो गुरु है।

खुद जले और औरों को रोशन करे,
वो निरंतर जलने वाला दीपक गुरू है।

वीराने में फूल खिला दे और कांट छांट कर,
सुंदर पौधे का रूप जो दे वो माली गुरू है।

अंधेरी राहों को जो उजालों से भर दे,
जीने का मकसद जो दिखाए वो राहबर गुरू है।

सजा दे जो तालीम से अपने शागिर्दों को,
वो अकेला सच्चा हमदर्द खैरख्वाह गुरू है।

नाकामी के कांटों को चुन चुन कर जो निकाले,
जीवन में साये से बढ़कर वो हमसफर गुरू है।

बेशक तनख्वाहदार होने से कद्र कम हो गई,
बेकद्री में जो तालीम की लौ जगाए वो गुरु है।

वक्त और संगीन हालातों ने गिरा दिया वजूद,
वजूद को संभालने में संघर्ष जो करे वो गुरू है।

- राज कुमार कौंडल


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शिक्षक दिवस

नमन मात पिता चरणों में
नमन गुरु के चरणों में
जीवन पथ प्रदर्शक आप हो
हो भाग्य विधाता तुम्हीं

आपके सानिध्य में बना आज मैं
आप हो जीवन दाता गुरुवर
आप से संस्कार दुलार प्यार
पाया हरपल जीवन में गुरूवर

दो आशीर्वचन इतना मैं
जीवन में हार कभी न पाऊं
आपकी की बातें
चाक और डस्टर न भूलूँ मैं
इतना सफलता पाऊं गुरुवर

- मनोज कौशल


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उनको कहाँ फ़ुर्सत कि अब मुलाक़ात हो,
काश फिर कभी दो घड़ी उनसे बात हो।

मुलाक़ातों के सफ़र में रह गईं ख़ामोशियाँ,
काश ख़ामोशियों में भी कोई बात हो।

दिल के आँगन में उदासी का बसेरा है मगर,
किसी दिन फिर से ख़ुशियों की बरसात हो।

वक़्त की कोई पाबंदी नहीं होती इश्क़ में,
दिन हो चाहे रात हो, बस उनकी याद हो।

हमने तो हर मोड़ पर उनका ही इंतज़ार किया,
क्या ख़बर थी रास्तों में इतनी रात हो।

वो मिले तो पूछ लेंगे हाल-ए-दिल अपना कभी,
क्या पता उस एक पल में सारी कायनात हो।

दूरियाँ बढ़ती गईं, रिश्ते भी ख़ामोश हो गए,
पर दिल नरेंद्र कहता है- कभी मुलाक़ात हो।

उनको कहाँ फ़ुर्सत कि अब मुलाक़ात हो,
काश फिर कभी दो घड़ी उनसे बात हो...

- नरेन्द्र सोनकर, बरेली


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भरे हुए पन्ने पर कैसे लिखूँ ?

भरे हुए पन्ने पर कैसे लिखूँ,
हर कोना किसी बीती हुई बात का घर है,
हर अक्षर किसी चेहरे की परछाईं,
हर ख़ाली जगह भी
किसी अधूरे ख़त का असर है।

मैंने सोचा था,
जहाँ शब्द खत्म होंगे,
वहीं से कुछ नया लिखूँगा;
मगर इस पन्ने की ख़ामोशी ने बताया,
कुछ जगहें खाली नहीं होतीं,
बस वहाँ शब्दों की जगह
धड़कनें रहती हैं।

ये काग़ज़ भी अजीब है,
जितना पढ़ता हूँ,
उतना अपना लगता है;
जितना अपना लगता है,
उतना ही पुराना निकलता है।
शायद ये पन्ना नहीं,
मेरा दिल है,
जिस पर हर मिलने वाले ने
अपनी एक पंक्ति लिख दी,
किसी ने स्याही से,
किसी ने आँसुओं से,
और किसी ने
सिर्फ़ छोड़कर।

कुछ पन्ने पलटे नहीं जाते,
क्योंकि उनके साथ
पूरी ज़िंदगी पलट जाती है।
और कुछ पन्ने,
कितने भी भरे हों,
हम उन्हें बार-बार पढ़ते हैं,
इस उम्मीद में कि
कहीं किसी हाशिए पर
हमारे लिए बचा हो
एक छोटा-सा ख़ाली कोना।

- नरेंद्र मंघनानी


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हिन्दुस्तान के कोने कोने का सुमधुर संवाद है।

धड़कनों में गूंजती है ज़बान हमारी शान है,
हिंदी अपनी मातृभाषा, देश की पहचान है।

​सरहदों को चीरती जो भाव का विस्तार है,
रीति-नीति और संस्कृति का अमर श्रृंगार है।

वेद की ऋचाओं से जो निकली अनघ नाद है,
हिन्दुस्तान के कोने कोने का सुमधुर संवाद है।

​पूरब से पश्चिम तक जो सेतु का काम है,
हर जुबां पर गूंजता जिसका प्यारा नाम है।

कबीर की साखियों में जो मिठास घोलती,
मीरा के भजनों में जो प्रेम बनके बोलती।

​आधुनिकता की दौड़ में मत इसे विस्मृत करो,
अपनी इस विरासत पर गर्व तुम निरंतर करो।

- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़



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04 September 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 04 सितम्बर 2026





कैसे भूल जाऊँ अपनी गाँव की पावन मिट्टी।
जेहन में कौंध रहा जिनकी यादें खट्टी मिठी॥
बचपन से सिखाया ना रोना सदा मस्कुराना।
शहर में आकर मैं बन गया सबका बेगाना॥

शुद्ध हवा शुद्ध पानी की नदी थी हमें प्यारी।
अमुवा के बगीचे में बीतता था वक्त हमारी॥
पहाड़ों से आती थी जब शेर की दहाड़।
सीने में धड़कता था बैरी जन का भी प्यार॥

बाग बगीचे हरी भरी वन व घर की गुलशन।
मेहमानों का भी मोह लेते थे उनके चित्तमन॥
कोयलिया काली काली की करूण पुकार।
याद आती है नित्य हमें घर व गाँव जवार॥

माता पिता का था घर में एकलौता  दुलारा।
उनके लिये मैं था एक अनमोल ही सितारा॥
ये पत्थर के महल ये कंकरीट पथ अनजाना।
मजबूरी में भी नहीं होता इस शहर में जमाना॥

काश ! ये पापी पेट, जीवन में ना हमें रूलाता।
रोटी कमाने शहर हमें, कभी ना बुलाता॥
गाँव की पर्णकुटी था, स्वर्ग सा अपन नजारा।
सुकून देता था घर का टूटी खाट पे सारा॥

- उदय किशोर साह


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साथ सच का

जीवन में हमेशा सही के साथ चले हैं,
शायद तभी आज अकेले खड़े हैं।
हमें चाहिए ही नहीं
गलत लोगों का साथ,
क्योंकि कुछ रिश्ते सिर्फ़ दिखावे के होते हैं,
सामने अपनापन जताते हैं,
और पीछे से
आपकी जड़ें खोद जाते हैं।
हमने तो सच को ही अपना साथी माना है,
सच की राह को ही अपना रास्ता जाना है।
फिर भला दुनिया की भीड़ से
क्यों डरें हम,
जब सिर पर रब का हाथ है,
तो किस बात का संशय,
किस बात का डर है?
मन को उम्मीद के धागे से बाँध रखा है,
विश्वास की लौ को अब भी जला रखा है।
कर्म के पथ पर
निर्भय होकर कदम बढ़ाते हैं,
जो होगा, अच्छा ही होगा-
बस इसी विश्वास के साथ
यूँ ही चलते जाते हैं।
न किसी से शिकायत,
न किसी से होड़,
सच का साथ हो
तो अकेलापन भी
ईश्वर का दिया हुआ एक सुकून है।
क्योंकि भीड़ में खड़े होने से बेहतर है,
सच के साथ अकेले खड़ा होना।

- पूनम गूंजा


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क्या है मेरिट ?
मैं पूछता हूं!
एक व्यक्ति,
अपनी पीढ़ी का
पहला साक्षर है।
यानी उसके माता-पिता,
दादा-दादी अनपढ़ थे।
तथाकथित मेरिट के अनुसार!
जबकि वे कुशल कारीगर थे।
जिन्हें तुम आज!
सिविल इंजीनियर...
फैशन डिजाइनर...
हेयर डिजाइनर...
और वैज्ञानिक कहते हो।
जरा! अपने दादा-दादी से पूछो
कि तुम्हारा पुश्तैनी घर
किसने बनाया था ?
क्या घर बनाना,
मेरिट में नहीं आता ?
क्या विशाल मंदिर बनाना
मेरिट में नहीं आता ?
क्या चमड़ा उतार कर
जूते-चप्पल बनाना
मेरिट में नहीं आता ?
फिर! तुम्हारी मेरिट में
क्या आता है ? और
इस तथाकथित मेरिट का
आधार क्या है ?
ना बराबर संपत्ति...
ना बराबर व्यापार...
ना बराबर जमीन...
ना बराबर अधिकार...
कही तुम्हारी मेरिट,
जातिवादी तो नहीं है!

- दीपक कोहली


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हादसा हो जाऊं

तेरी नज़रों सी नज़र मैं कहां से लाऊं,
बेसबब क्यों मैं तुझ से ख़फ़ा हो जाऊं।

राबता मुझसे महफ़िल में नहीं था उसका,
बेहतर है खामोशी से अब मैं दफ़ा हो जाऊं।

मायूस जुस्तजू है दिल भी टूटने वाला,
सफ़ीना मेरा डूबे, मैं हादसा) हो जाऊं।

अफ़साना मेरा किसी अफ़साने में नहीं,
बहती रहे आंखें टूटा आइना हो जाऊं।

छेड़ते क्यों हैं बरसों पुराने मंज़र मुझको,
दीदार का यारब कोई तो बहाना हो जाऊं।

शर्मिंदा न कर तर्केतालुक़ करके मुश्ताक़,
मेरी तो यही तमन्ना के बस में तेरा हो जाऊं।

- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़


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दरवाज़ा खुला रहने दो

दरवाज़ा खुला हो
तो ज़रूरी नहीं
आँधियाँ ही घर में आएँ,
कभी किसी सुबह की
सुनहरी धूप भी दस्तक देती है।
हर खुली खिड़की
खतरे का संकेत नहीं होती,
कभी कोई खूबसूरत पंख
उड़ता हुआ भीतर आता है,
और सूने आँगन में
उम्मीद के रंग भर जाता है।
हाँ, कुछ हवाएँ
घर अस्त-व्यस्त कर जाती हैं,
मगर हर हवा तूफ़ान नहीं होती,
कुछ हवाएँ तो
बंद कमरों में
जीने की खुशबू भर जाती हैं।
कभी-कभी
ज़िंदगी भी तो
पंख लगाकर आती है,
और बस इतना चाहती है
कि कोई दरवाज़ा खुला हो…!

- नरेंद्र मंघनानी


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जीवन का सार बस प्यार

जीवन का सार है, बस प्यार
प्यार बिना जीवन है बेकार
इस बात से क्यों करते है इंकार
जीवन है तो होगा ही प्यार।

प्यार का मतलब सब में है भिन्न-भिन्न
जितने भी रिश्ते है, सब में ये है अभिन्न
भाई का भाई के प्रति है प्यार
माता पिता का बच्चों से है प्यार।

दोस्ती में दोस्ती जैसा है प्यार
तो भाई-बहन का है अनोखा प्यार
पेड़-पौधों से भी होता है प्यार
तो जीव-जंतुओं में भी है आधार।

एक-दूसरे से करो सब प्यार
सुकून की जीवन का रहे हकदार
बनेगा बहुत सुन्दर सा संसार
जीवन का सार है, बस प्यार और प्यार।

- चुन्नू साहा


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काम नेकी का हरदम किया कीजिए।
मुफ़्लिसों का सदा तुम भला कीजिए।।

देख राहों में काँटे रुके ना कदम।
साथ अपनों के हरदम चला कीजिए।।

प्रेम तेरा कभी कम न हो साथिया।
चाँद-तारों की बातें किया कीजिए।।

हाथ में हाथ तेरा रहे हर जनम।
रब से मेरे लिए ये दुआ कीजिए।।

दिल की हसरत थी जो वो मिली ही नहीं।
ज़िंदगी से भला क्या गिला कीजिए।।

- रति सिंह 'रिंकी'


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वो सच को क्या समझेंगे
जो जीवित है सिर्फ अभिनय में।
नित लिपटे हैं रति से,
कब डुबोया खुद को प्रणय में।
देह की भूख मन की
कहाँ भरपाई करता है?
वासना-भावना ऐसे ही
खेलतीं हर सांस हर शय में।

- राधेश विकास


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युवा पीढ़ी क्यों गांवों को भूलती जा रही

एक दिन वह गांव का घर भी छूट जाएगा
वह शहर का घर भी नहीं बचा पायेगा
जाना तो पड़ेगा अकेले उस मंजिल की ओर
जहां से फिर कोई वापिस नहीं आएगा

घर का आंगन मिट्टी से भरा हुआ
वह कच्ची दीवारें भी मिट्टी में समा जाएंगी
एक एक ईंट पत्थर जोड़ कर बनाया था जिहोने
उनकी यादे भी धीरे धीरे धुंधली नज़र आएंगी

सब मस्त हैं सब की अपनी अपनी ज़िंदगी है
बचपन के यार दोस्त कोई अब नहीं बुलाते
कहाँ गए वह सुंदर लम्हें वह अनमोल समय
नाम लेकर दूर से अब कोई आवाज़ नहीं लगाते

सुनसान आंगन में लगे पत्थर अब भी करते हैं याद
एक दूसरे के पीछे दौड़ते कितना होता था वाद विवाद
ऐसा क्या हुआ वक्त ने कैसी यह करवट बदली
हर कोई क्यों चाह रहा गांव से होना आज़ाद

शहर की ज़िंदगी क्यों सभी को रास आ रही
एकदूसरे से अनजान ऐसी ज़िन्दगी क्यों भा रही
गांव अब वैसे नहीं रहे तेजी से हो रहा विकास
फिर भी युवा पीढ़ी क्यों गांवों को भूलती जा रही

शहर तो शहर है कभी किसी का अपना न हुआ
युवा पीढ़ी को चाहिए बना लो गांव में भी एक ठाँव
कोरोना जैसी महामारी से जो हो गया फिर सामना
तो फिर याद आएगा अपना वही छोटा सा गांव

- रवींद्र कुमार शर्मा



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मुझसे उसका नाम बड़ा है।
मुझको इससे लेना क्या है।

जीत हमेशा होगी उसकी,
अफ़वाहों से कौन डरा है।

वो कैसे बिल्ली पालेगा,
जिसने तोता पाल रखा है।

पहले ही तासीर है कड़वी,
और करेला नीम चढ़ा है।

भूख मिटेगी किससे किसकी,
दाने -दाने पर लिक्खा है।

उसको डर है खो जाने का,
जिसको ज़्यादा साथ मिला है।

साथ हमारे दूर सफ़र में,
कौन पराया कौन सगा है।

सबकी अपनी-अपनी हस्ती,
अपना-अपना फ़न, रुतबा है।

- नवीन माथुर पंचोली


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काया कंचन

आँखों से हिय में गया उतर,
अब मौन प्रीत हो गई मुखर।
वो छुवन दुपहरी धूप हुई,
काया कंचन-सी गई निखर।

नयनों में नूतन स्वप्न सजे,
साँसों में सुरमई साज़ बजे।
तपती दुपहरी शीतल हो,
जब संग प्रिये का रूप सजे।

धड़कन की गति पल-पल बढ़े,
चंदन-सी चाहत मन में चढ़े।
इस चंचल मन के आँगन में,
चाहत के मधुर चिराग जले।

चमकी चाहत की छाँव घनी,
हर साँस आज सर्वस्व बनी।
मीरा के मोहन मिल ही गए,
सुंदर-सी यह सांझ बनी।

                                - सविता सिंह मीरा


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31 August 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 31 अगस्त 2026




अगर ऐसा होता
अगर पुरुषों के पीरियड्स आते,
तो यक़ीनन दुनिया बड़ी संवेदनशील होती
हर महीने चार दिन
ऑफिस में “Menstrual Leave” होती,
और दर्द को “मूड स्विंग” कहकर
हँसी में नहीं उड़ाया जाता।
चाय की प्याली के साथ
दर्द की दवा भी मिलती,
और पत्नी बड़े प्यार से कहती यह बात
“आज आराम कर लो,
घर का काम मैं कर लूँगी।”
टीवी पर विज्ञापन आते
“हर पुरुष का हक़ है,
इन दिनों खुलकर जीना!”
और विज्ञापन के अंत में
कोई सुंदर-सी मॉडल नहीं,
एक डॉक्टर समझाती
“यह प्राकृतिक है।”
स्कूलों में लड़कों को पढ़ाया जाता
“इन दिनों शरीर का विशेष ख़याल रखें,”
और कोई अध्यापक
उन्हें शर्मिंदा करने के बजाय
सहानुभूति सिखाता।
मंदिर के बाहर कोई बोर्ड न होता
“इन दिनों प्रवेश वर्जित।”
बल्कि शायद पुजारी कहते
“ईश्वर ने ही शरीर दिया है,
उसके नियमों पर
मनुष्य की पाबंदी कैसी?”
औरत तब मुस्कुराकर पूछती
“अब समझे साहब,
हर महीने दर्द में भी
रोटी क्यों बनती है?”
शायद तब
उसकी “ना” को आलस नहीं,
उसकी थकान को बहाना नहीं,
और उसके दर्द को
नखरा नहीं कहा जाता।
और सबसे मज़ेदार बात
जिस समाज ने सदियों तक
स्त्री के दर्द पर
चुप्पी की चादर डाल रखी है,
वही समाज शायद
पुरुषों के लिए
“पीरियड्स सेल्फ-केयर किट”
सरकारी योजना में बाँटता।
काश, पुरुषों के भी पीरियड्स आते…
तो शायद ...स्त्री को बराबरी माँगनी नहीं पड़ती
दुनिया खुद समझ जाती
कि दर्द का कोई लिंग नहीं होता,
बस समाज ने उसकी भी जाति बना रखी है।

- डॉ. सारिका ठाकुर ‘जागृति’


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संस्कार की जननी है बहन!

मां के बाद
सबसे निश्चल प्यार
करने वाली होती है
बहन
सुख दुःख की
सच्ची साथी है
बहन
बहन वो एहसास है
जो कभी भुलाया
नहीं जा सकती
किसी से भी
संस्कार की
जननी है बहन
रक्षा का सूत्र
उसके होने का
प्रतीक है
भाई के सही
रास्ते पर चलने
का दृढ़ निश्चय
प्रतिज्ञा है
जीवन तो
बिना भाई के भी
जिया जा सकता है
बिना बहन के भी
जिया जा सकता है
जीवन
बहन वो एहसास है
जो कभी
विस्मृत नहीं हो सकती।

- मनोज कौशल


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मुंहबोले रिश्तों की नदी

जिन भाइयों की सूनी है कलाई,
जिन बहनों का नहीं कोई भाई,
आज बहुत होती होगी ललक उनमें,
मन में होती होगी कुछ अधूरेपन की कसक।

अगर होते भैया, या होती बहना,
तो मनाते हम भी ये दिन खास।
हम भी कसमें खाते,
बहनों को डोली में बिठाते,
हँसते-खेलते करते उन्हें विदा,
लड़ते-झगड़ते, पर होते नहीं कभी जुदा।

बहना भी सोचती होगी-
गर भैया होते,
तो फिर न होती कोई कमी।
होते पिता जैसे,
या फिर लाड़ले बेटे से,
मिलता उनसे संबल,
जीवन में हर पल।

राह नहीं तकना होता,
की कोई बढ़ाए हाथ,
बस करते मन मानी अपनी,
कह देते दिल की हर बात।

यही तो भाग्य का खेल है-
कोई अपने रिश्ते को खोजे,
किसी के लिए रिश्ते बस खेल हैं।

फिर भी हार कहाँ मानी हमने,
मुंहबोला भाई है,
मुंहबोली बहना है।
रिश्ते खून से ही नहीं,
दिल से भी बनते हैं।

अब रिश्तों की इस नदी को
यूँ ही बहते रहना है,
स्नेह की धारा में
हर मन को कहते रहना है।

- रोशन कुमार झा


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कौड़ियों के मोल

जिन्दगी के लम्हे पहले से ही बहुत कम हैं,
इन्हें लापरवाही से और ख़र्च न कीजिए।

सड़कें हैं जीवन आधार इनका फायदा लीजिए ,
रफ्तार से इन्हें मौत के कुएं में न तब्दील कीजिए।

माना कि रफ्तार के शौकीन हो आप,
इस शौक से जिंदगी को शोक में न बदल दीजिए।

फिर कहां मिलेगी ये हसीन दुनिया,
लापरवाही में जन्नत को दोज़ख न कीजिए।

कोई पलकें बिछाकर करता हैं इंतजार,
उस इंतजार को न लौटने वाला न कीजिए।

खुद तो भुगते हैं की अपनी गलतियों की सज़ा,
अपने कर्मों की सज़ा गैरों को न भुगतने दीजिए।

राह पैमाई के कायदे कानून हैं, अपनाइए उन्हें ,
यूँ जिंदगी को कौड़ियों के भाव में खो न दीजिए।


- राज कुमार कौंडल


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प्रकृति की लीला

नेपाल में बाढ़ आई,
अश्रुओं का सैलाब लिए,
प्रकृति इतनी रूठी हुई,
कि अपने ही प्यारों को
काल के गाल में समा गई।

वक्त था खौफ़ से भरा,
कोई मरा यहाँ,
कोई पड़ा अधमरा।
चारों ओर पसरा था
मौत का सन्नाटा,
हर आँख में दर्द था,
हर दिल में था मातम गहरा।

यही तो लीला है
सृजन और विध्वंस की,
नियति के आगे भला
किसका बस चले?

अब धीरज धरो,
न शोक में डूबो,
जीवन का नाम ही है-
चलते रहना,
गिरकर फिर संभलना
और आगे बढ़ते रहना।

पर कैसी विडंबना है इस जीवन की-
कहीं बेगुनाहों को मिलती सज़ा,
तो कहीं गुनाहगार
पाते हैं इनाम।

यही जीवन की सच्चाई है,
यही नियति का विधान-
कभी आँसू, कभी मुस्कान,
कभी सृजन, कभी विध्वंस,
और फिर भी चलता रहता है
जीवन का कारवाँ।

- रोशन कुमार झा


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अंतिम मित्र

आखिरी दोस्त
आखिरी उम्मीद हो तुम।
जीवन के अंतिम अध्याय की
अंतिम कड़ी हो तुम।
मोह का पाश नहीं
स्नेह का अंतिम चरण हो तुम।
मेरे अंतिम जीवन की
अंतिम स्पष्ट किरण हो तुम।
मेरे अधूरे जीवन की
अंतिम मुस्कुराहट हो तुम।
सब कुछ खो जाने के बाद भी
मेरे अंतिम जीवन का
मधुर एहसास हो तुम।
थक सा गया था मैं
युगों के इंतजार के बाद
मेरे अंतिम जीवन के
अंतिम समय का
मोक्ष का आधार हो तुम।

                                  - डॉ. राजीव डोगरा


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फौजी की बहन

आ ना सकेगे बहना राखी में अभी घर
सरहद में तनाव है, गश्त है आठों पहर
तू उदास ना हो बहना, राखी भेज देना
एक नहीं अनेक राखी, भेजना तू बहना।

मेरे जैसा तेरे यहाँ बहना, है अनेक भाई
राखी त्यौहार में घर ना आने की उदासी है,
छाई कुछ भाईयों की तो, बहना नहीं है बहन
राखी में उन सबों का उदास रहता है मन।

तू सबके वास्ते बहना, राखी ढेर सारी भेजना
बाँध तेरे राखी को बहना, उमंग से है भरना
यहां सरहद किनारे तेरी जैसी है, अनेक बहना
उन्हीं सबों से ही हमसब को है, राखी बंधाना।

उन सबों में ही तेरी ही परछाई देख लेता हूं
बांधती है जब वो हमें राखी, भावुक होता हूं
और एक बात बहना कि राखी तू उसे बाँध देना
जो उदास बैठा है कोई भाई, जिसे ना है बहना।

- चुन्नू साहा


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प्रेम डोर

उपहार ही नहीं रक्षाबंधन प्यार की निशानी है,
राखी भाई बहन के प्रेम अमिट निशानी है।

निश्चल प्रेम तो परमात्मा की निशानी है,
राखी के कच्चे धागों में प्रेम प्रभु की निशानी है।

इस भाग दौड़ के वक्त में सुकून की निशानी है,
रक्षाबंधन तो भाई बहन के दिल की कहानी है।

दौलत की नहीं इसमें जज्बातों की खुश्बू लानी है,
हर तरफ इन कच्चे धागों की महक बिखरानी है।

दिखावा नहीं सादगी की थाल सजानी है,
भाई बहन की ये रस्म सदियों तक निभानी है।

बहनों की इस प्रेम डोर का कोई सानी नहीं है,
हर दुख दर्द जो बांट ले रक्षा बंधन वो कहानी है।

- राज कुमार कौंडल


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क्षणिका

गांव का सुनसान प्लेटफार्म,
बरसती बूँदों की छांव,
पटरी पर धीमे-धीमे
गुजरती ट्रेन की थरथर ध्वनि।
आज फिर वही जगह
जहाँ तुम छोड़ गए थे,
और अब भी प्रतीक्षा में हूँ,
कि लौट आओगे कभी...।

- सविता सिंह मीरा


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प्रेम की आँखें अलग होती हैं

प्रेम की आँखें
चेहरा नहीं देखतीं,
भाव पढ़ती हैं।
वे कमियाँ नहीं गिनतीं,
उनके पीछे छिपी मजबूरियाँ समझती हैं।

दुनिया जहाँ कहती है,
“इसमें क्या खास है?”
प्रेम वहाँ मुस्कुराकर कहता है,
“मेरे लिए तो यही सबसे खास है।”

जिसे प्रेम मिल जाता है,
उसे बदलने की नहीं,
समझे जाने की जरूरत होती है।

क्योंकि प्रेम की आँखें
व्यक्ति को उसकी अच्छाइयों से नहीं,
उसकी पूरी कहानी के साथ देखती हैं।
यही प्रेम है।

- नरेंद्र मंघनानी


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