साहित्य चक्र

17 October 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 17 अक्टूबर 2026






मनुष्य और उसकी विराट इच्छाएं

कितना अल्प है मनुष्य,
फिर भी कितनी विराट
उसकी इच्छाएँ हैं…!
मुट्ठी भर साँसों का सफ़र,
और ख़्वाब हैं कि
आसमान से भी ऊँचे हैं।

पाँव टिके हैं धरती पर,
मगर आँखों में पूरा आकाश है,
हाथों की लकीरों में सीमित जीवन,
और मन में अनंत की प्यास है।

थोड़ा-सा सुख मिल जाए,
तो और अधिक पाने की चाह जागती है,
एक मंज़िल पर पहुँचते ही
दूसरी मंज़िल नज़र आती है।

कभी धन की चाह,
कभी यश का अभिमान,
कभी दुनिया को जीतने की ज़िद,
तो कभी अपनों से ही
अपना अस्तित्व स्वीकार करवाने का अरमान।

वह भूल जाता है अक्सर,
कि जिस जीवन को सँवारने में
सारी उम्र लगा देता है,
वही जीवन एक दिन
उसकी मुट्ठी से रेत-सा फिसल जाता है।

जिन चीज़ों को पाने के लिए
वह अपनी शांति खो देता है,
एक दिन उन्हीं चीज़ों के बीच बैठकर
वह शांति को ही खोजता है।

जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि
सब कुछ पा लेना नहीं,
बल्कि उस क्षण को पहचान लेना है,
जब मन कह उठे..
“मेरे पास जो है,
वह भी कम नहीं…
और जो नहीं है,
उसके बिना भी
मेरा जीवन अधूरा नहीं।

- नरेंद्र मंघनानी


*****


असत्य का भी साथ चाहिए

क्यों कीचड़ ही चाहिए,
कमल के खिलने को?

क्यों ताँबे का साथ चाहिए,
कुंदन को हार में ढलने को?

क्यों युधिष्ठिर को भी असत्य का
सहारा लेना पड़ा,
महाभारत में धर्म की विजय का
इतिहास लिखने को?

क्यों विष की जरूरत है,
विष के प्रभाव को मिटने को?

क्यों कांटा निकले कांटे से,
फिर घी निकाली जाए टेढ़ी उंगली से?

फिर सत्य और असत्य के बीच,
क्यों खिंची है ऐसी रेलमपेल?

कुछ हासिल करने के लिए,
कुछ धर्म निभाने के लिए,
कभी-कभी क्यों अंततः
असत्य का भी साथ चाहिए ?

- रोशन कुमार झा


*****


अध्यापक नहीं मसाल हूं मैं
अध्यापक नहीं मसाल हूं मैं
ज्ञान की लौ जलाने आया हूं
जग से अज्ञान मिटाने
जग को जगाने
भटके यौवन को राह
दिखलाने आया हूं
अध्यापक नहीं मसाल हूं मैं
सिर्फ पढ़ाना मेरा काम नहीं
जीवन जीने की कला सिखाना
छात्रों को अनुशासित बनाना
संघर्षों से हंसते-हंसते लड़ना
सिखलाने आया हूं
अध्यापक नहीं मसाल हूं मैं
छात्रों को चरित्रवान बनाने
छात्रों में आत्मविश्वास जगाने
छात्रों का विवेक कर जागृत
भौतिक जगत से
अन्तर्जगत की ओर
ले आने आया हूं
अध्यापक नहीं मशाल हूं मैं
गीता ,बाइबल और कुरान के
ज्ञान से अवगत कराऊं
वेदों - उपनिषदों के
गूढ़ रहस्यों से परिचित कराऊं
सत्य और आनंद की
वास्तविक परिभाषा बतलाऊं
सिर्फ अध्यापक नहीं बनना मुझे
अभीप्सा है कि
सच्चा गुरु बनने का गौरव पाऊं
अध्यापक नहीं मसाल हूं मैं
ज्ञान की लौ जलाने आया हूं

- प्रवीण कुमार


*****


सुबह की सैर का आनन्द ही कुछ और है
खत्म हो रहा पैदल चलना, मुश्किल आता दौर है

पहले चिड़ियों की चहक से खुलती थी सुबह, सबकी
अब हर तरफ प्रेशर हॉर्न और धुएँ का ज़ोर है,
आती है शरीर में देखो, चेतना और स्फूर्ति
पैदल चलने में मज़ा ही कुछ और है
साहब! जो पैदल चलता था पहले कभी शान से
आज उसे ही सब कहते हैं - ये कुछ और है,
पहले खुलकर साँस लेते थे तो जी उठते थे,
अब हर साँस में धूल और धुएँ का ही ज़ोर है,
हर कोई भाग रहा है गाड़ी-घोड़े की ओर
सुकून का अब कहाँ किसी को ठौर है,
साहब! पैसों से नापते हैं अब, इज्ज़त यहाँ,
इंसानियत का अब कहाँ दौर है?

शुद्ध मिलती थीं पहले प्राण वायु,
अब हर तरफ मोटर-गाड़ियों का ही शोर है,

नंगे पाँव जो पहले ओस पर चलता था
अब कांटों भरा उसका हर छोर है,

पहले सैर में मिलते थे यार- दोस्त बहुत सारे,
अब हर शख्स मोबाइल में बोर है,

जिस्म थक रहे हैं आज, दिल थक रहे हैं,
सेहत का जनाज़ा उठ रहा,कहते हैं ये तरक्की का दौर है

पहले जो सड़कें थीं अपनों से भरी,
अब वीरान पड़ा हर एक छोर है,

साहब! तरक्की तो बहुत कर ली हमने,
पर सेहत और सुकून कमज़ोर है।

कभी पीपल के नीचे बैठा करते थे शौक से
अब वहाँ भी कंक्रीट का ढेर है,

साहब! हमने बेच दिया सुकून अपना,
ये तरक्की नहीं, विनाश का दौर है।

- बाबू राम धीमान


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छोड़ दीजिए

ज़िंदगी में कोई काम ऐसा हो,
जो आपको अच्छा न लगे, उसे छोड़ दीजिए।
किसी का साथ दिल को रास न आए,
तो ऐसे रिश्ते को भी छोड़ दीजिए।
किसी चीज़ के पीछे यूँ मत भागिए,
जो वक्त पर मिलना हो, उसे वक्त पर छोड़ दीजिए।
कोई काम आपका बन नहीं रहा हो,
तो उसे भी किस्मत पर छोड़ दीजिए।
जो आपको मिलना होगा, मिलकर रहेगा,
इसलिए हर बात की फिक्र करना छोड़ दीजिए।
दूसरों की चिंता में अपनी ज़िंदगी न भूलिए,
अपने लिए भी थोड़ा जीना सीख लीजिए।
जो आपके साथ चले, उसका साथ निभाइए,
जो रास्ते में रुक जाए, उसे छोड़ दीजिए।
हर शिकायत का हिसाब रखना छोड़ दीजिए,
दिल में बोझ बनाकर कुछ भी मत रखिए।
सबके दुख को अपना समझना छोड़ दीजिए,
हर किसी का दर्द अपने दिल में न रखिए।
ज़िंदगी में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं,
जो बुरा है, उसे वहीं छोड़ दीजिए।
जिनसे भी मिलें, उनकी कमियाँ वहीं छोड़ आइए,
हर बात को दिल से लगाना छोड़ दीजिए।
ज़िंदगी बहुत खूबसूरत है, इसे यूँ न गँवाइए,
जो सुकून छीन ले- उसे बस छोड़ दीजिए।

- गरिमा लखनवी


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हे मिर्च! तुम भी बड़ी कमाल की हो
बड़े-बड़ों की सिट्टी-पिट्टी गुम कर देती हो,

छोटी सी, नाज़ुक सी दिखती हो
पर मिज़ाज तीखा रखती हो,

अगर कमाल दिखाने पर आ ही गई,
तो सी-सी करवा कर ही दम लेती हो,
थाली में आते ही, रंग दिखा जाती हो,
जुबां पर लगते ही, आग लगा जाती हो।

कोई कितना भी बने तीस मार खाँ, अपने आपको
एक कुतर में ही,सारी हेकड़ी निकाल देती हो,

दाम तो तेरा कुछ भी नहीं, पर भाव बड़े खाती हो
बिना तेरे हर सब्जी फीकी, ये राज भली भांति जानती हो,

हे मिर्च! कभी हरी, कभी लाल हो जाती हो
मौसम के संग तुम भी तो रंग बदलती हो,

पर जो भी तुझे, एक बार दिल से चख लें,
उसे तुम!उम्र भर याद आती हो,

तेरे बिना चटनी भी, अधूरी सी लगती है,
तेरे बिना हर जायका भी, अधूरा सा लगता है,

तू सबको रूला कर खुद कभी रोती ना हो,
जले तो जुबां सबकी, पर बदनाम तुम ही होती हो,

- बाबू राम धीमान


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पुकारती मधुशाला

पाठकगण की जीभ चाहेगी,
हर पल पीने को यह हाला,
पाठकगण के हाथ चाहेंगे,
पकड़ लेने को यह स्वर्ण प्याला;

कभी न थकेगा अपना साकी,
भरता रहेगा उनका प्याला,
तारीफ करेंगे पीने वाले,
रोज बुलाएगी मेरी मधुशाला।

गली से होकर कोई गुजरेगा,
कदम ठहर जाएंगे पीने को हाला,
बुलाएगा अंदर अपना साकी,
पकड़ा देगा एक नया प्याला;

कुछ लोग देख कर चले जाएंगे,
लक्ष्य महत्वपूर्ण है न कि हाला,
जो ठहर गए उन्हें पिलाएगा साकी,
आवाज देगी सबको मधुशाला।

- प्रणव राज


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ज्ञान का कुआं भरा हुआ है।
प्यासे रील की मधुशाला में डूबे हैं।
कमबख्त! जवानी भोग के सिवाय
सारा कुछ करवा रही है।
दिखावे की बकैती विद्या और
संभोग लक्ष्य (मोक्ष) बन गया है।
चोरी, डकैती सम्मान हो गया है,
सोशल मीडिया समाज हो गया है।
रिश्ते स्वार्थ की माला बन ग‌ए हैं,
जरा खींचे तो बिखर जाएंगे। आज!
इंसान टेक्नो-बिजूका बन गया है।

- दीपक कोहली


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बादलों को देखा है

मैने बदलो को देखा है,
नीले आकाश में तैरते देख है,
कभी सूर्य को छिपा कर छांव देते,
तो कभी घटाओं को काला होते देखा है।

गरजते-तमतमाते हुए आते देखा है,
लोगो को खिड़कियाँ
और दरवाज़े बंद करते देख है,
वहीं, बच्चे छप-छप खेलते हैं,
फिर, बादलों को हवाओं
संग लौटते देखा है।

- प्रणव राज


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देर
भले हो जाए
मगर सच-सच देता है।
जो
पहले विश्वास लेता है
फिर गच देता है।
खुलेगी जब परतें हैं तो
जमाना परतीत नहीं करेगा?
याद
रखना भीष्म का मौन
महाभारत रच देता है।

- राधेश विकास


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हाॅं जनाब! मैं कान हूॅं

हाॅं जनाब मैं कान हूॅं लेकिन आजकल परेशान हूॅं,
मेरी समस्याऍं बहुत सारी है इसीलिए मैं हैरान हूॅं।
मुझको जिम्मेदारियाॅं सिर्फ सुनने की ही दी गई है,
इसीलिए ताली गाली अच्छा बुरा सुनता रहता हूॅं।

मैं अपना दुःख व दर्द किसी को नहीं बता सकता,
न रो सकता न हॅंस सकता न ईसारा कर सकता।
न देख सकता न चल सकता ना गलें लग सकता,
यहाॅं तक कि कोई भी अंग को छू भी ना सकता।

हम दो भाई है पर एक दूजे का मुॅंह तक ना देखा,
बनानें वाले ने भी हमारे संग किया है ऐसे धोखा।
हमारी कोई तारीफ़ नहीं करता नहीं शाबाश देता,
कोई नहीं है हमारे ख़ास और नहीं है कोई सखा।

कभी बाल-कटवाने जातें वहाॅं कान को काट देते,
कोई खूॅंटी समझकर चश्मा पेन-पेंसिल टांग देते।
कभी नर्स कान भींचे कभी शिक्षक ने कान खींचें,
कान में छेदन करके लौंग टोप्स झुमके टांग देते।

फ़ाड़ दिया मेरा पर्दा उस दिन कनपटी पे मारकर,
अब कान नहीं मुझे खूॅंटी बना दिये जानबूझकर।
बीमारी का मास्क भी रखना पड़ता है लटकाकर,
ईयर फोन भी मुझे ही रखना पड़ता सम्भालकर।

होंठों पर लिपस्टिक बालों में बादामी-तेल लगातें,
दांतों के लिए पेस्ट एवं चेहरे के फेसक्रीम लगातें।
इतनी परेशानियाें के बाद भी हम भाई ख़ुश रहते,
नेत्रों का बहुत ख़्याल रखतें उनमें काजल लगातें।

किसी से सुना है मन हल्का हो जाता दर्द बांटकर,
ऑंखें ऑंसू गिराकर नाक बहकर और छींककर।
होंठ चुम्मा लेकर दाॅंत पीसकर मुॅंह जोर से रोकर,
मैं बदनसीब कान किसको सुनाऊॅं व्यथा जाकर।

- गणपत लाल उदय


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आईने जैसी नदी

यह कैसी खींची हुई नदी है
यह कैसी आईने जैसी नदी है
जिसकी सतह पर बर्फ-सफेद चाँद झुका हुआ है।
ठीक है, नदी जिससे तुम अब बचते हो।
ओह! आईने जैसी नदी
यह चिह्नित करने के लिए कि तुम कौन सी नदी हो
मैं अब पानी में ढेला फेंकता हूँ।
नदी, तुम्हारा आईना टूट जाता है
नदी, तुम्हारे सपने को ध्वस्त कर देती है
नदी, तुम्हारा दिल इस तरह टूट जाता है
वहाँ आदमी के चेहरे को सहलाती है।
ओह नदी!दुख तुम्हारे भाग्य में है।

- निर्मल रॉय


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महकने से पहले

क्या होती है जिम्मेदारी,
समय से पहले कली को
फूल बना दे,
फूल बन जाने के बाद महकने
से पहले ही मुरझाने का
मौसम लाए।

दिन और रात का फर्क मिटाये,
हर किसी की पहचान
तुरन्त कराए।
जीने का शौख नहीं, इंसान चैन से
मरने भी न पाए।

जिम्मेदारी जिसके कंधे है,
उसकी शौख कब,
बनती लाचारी उसे नहीं मालूम।

वो बने सहारा सबका,
उसका सहारा बने कौन,
यही सोच उम्र कटी,
रह जाता अकेला, बस
खुद को हौसला देकर,
खड़ा हो मौन।

- रोशन कुमार झा


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ज़ख्म मेरा है, तुम्हारा क्या है।

नशीली नज़र उसकी मेरी जानिब,मैं मुस्कुराया था,
एक हादसा था हुआ, लोगों इसमें तुम्हारा क्या है।

उसको है मुहब्बत,मुझसे, मैं भी उससे प्यार करता हूं।
ज़माने वालों क्यूं परेशान होते हो इसमें तुम्हारा क्या है।

मेरे दर्द की शिद्दतों का अहसास उन्हें क्योंकर होगा।
इश्क़ है,हर पल,पल पल, तस्सव्वुर उसका तुम्हारा क्या है।

कुच ए जानां में जाने से क्यों रोकते हो मुझे तुम हरदम।
दिल मेरा है, मुहब्बत मेरी, ज़ख्म मेरा है, तुम्हारा क्या है।

इश्क़ वालों कब मिली हैं, मंज़िलें मुश्ताक़ मुझे बताओ तो।
अब हुआ मालूम के इश्क़ के दरिया का कनारा  क्या है।

- डॉ. मुश्ताक़ अहमद


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08 October 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 8 अक्टूबर 2026





बापू की स्मृति

हुआ जन्म गांधी बाबा का
ले रही नीति थी अंगड़ाई।
कर रुदन दिया संदेश लाल ने
गोरी सत्ता भी थर्रायी।

जब से सुध ली थी बापू ने
निज सुख चैन को भुला दिया।
आत्मनिर्भर हिन्द बने तब
खादी का चरखा चला दिया।

लकुटी वाले गाँधी के
चरखे की लीला न्यारी थी।
अपराजेय जो शक्ति सुनो
चरखे के आगे हारी थी।

चर्चिल था महा ज्ञानी
न बापू को समझ पाया।
फटी धोती में पहुंचे शख्त
को वह देख घबराया।

करो कुछ या मरो तुम सब
ये बापू ने थ बतलाया।
समर्पण खुद का कर फिर
हमें आजाद करवाया।

- करन सिंह "करुण"


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दानव

सब चाहते हैं मैं रहूं इस मोबाइल फोन से दूर,
पर जो कहते हैं ये वो इसके मज़े लेते भरपूर।

इक कमरे में रहते हैं मम्मी पापा भाई बहन,
छत होती एक मगर होते इक दूजे से कोसों दूर।

सब चाहते हैं मैं रहूं इस मोबाइल फोन से दूर,
पर रहूं क्यों कैसे क्या है इसका फोन का कसूर।

जो कहते हैं फोन छीन लेता है आंखों का नूर,
वो भी खुद नहीं रह पाते इससे पल भर दूर।

सबको देखा देखी में इससे नहीं रह पाता हूँ दूर,
हर काम होता आसान इससे फिर कैसे रहूं दूर।

जग भर के हंसते खेलते गाते खिलौने होते,
मेरी उंगलियों पर हरपल ये नाचते भरपूर।

जो कहते थे ज्यादा मत देखो इस फोन को,
उनकी याद आती है जब दिखता नहीं पास दूर।

चिड़चिड़ा अड़ियल क्रोधी सा स्वभाव हो गया,
मन चाहता रहूं अब अकेला सारी दुनिया से दूर।

देर बाद समझ आया,समझा जिसको अपना,
वो था दानव एक जिसने मुझे सबसे किया दूर।

- राज कुमार कौंडल


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दो महापुरुष

दो ज्योतियाँ जगी थीं, भारत के भाल पर,
एक राह सत्य की, एक स्वाभिमान पर।

एक ने अहिंसा से, तोड़ा था अहंकार,
दूजे ने अभावों में, दिया था ललकार।

गांधी का जंतर था,अंतिम जन का कल्याण,
शास्त्री का नारा था जय जवान,जय किसान!

दे गए विरासत में, जो सादगी का विचार,
क्या रख पाए हैं हम, उसका तनिक भी सम्मान ?

केवल तस्वीरों पर, माला पहना देना,
या दो अक्टूबर को, छुट्टी मना लेना।

क्या यह कृतज्ञता है, या रस्म की मजबूरी?
बातों में तो प्रेम है,लेकिन कर्मों में है दूरी!

छोड़कर आडंबर, अगर नीति को अपनाएँ,
सत्य और सादगी को, जीवन में ले आएँ।

तभी दूर होगी यह, मन की औपचारिकता,
तभी सच्ची श्रद्धांजलि, पाएगी यह भव्यता।

- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़


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लाल गुदड़ी के- लाल बहादुर

लाल, गुदड़ी के लाल,
हमारे प्यारे लाल बहादुर।
बापू के विचारों का
था उन पर गहरा प्रभाव।
स्वतंत्रता संग्राम में
गए जेल, आजीवन सहा अभाव।

देश का आत्मसम्मान बचाया,
आत्मनिर्भरता का दिया मंत्र।
झुके नहीं किसी शक्ति के आगे,
रहे सिद्धांतों पर सदा अडिग।
हमारे बीच से निकले थे वो,
हमारे ही दिल में रह गए।

भारत रत्न, देश के गौरव,
देश की आन, देश की शान,
गूँजा उनका अमर नारा-
“जय जवान, जय किसान।”
सादगी से भरा रहा जीवन,
त्याग-तपस्या बनी पहचान।

आज उनकी जयंती पर
करें हम उन्हें शत-शत नमन।
देश के इस सच्चे सपूत को
बारंबार नमन-वंदन।

- रोशन कुमार झा


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गाँधी-शास्त्री जयंती

दो अक्टूबर गाँधी शास्त्री का है जयंती
देश को आजाद कराने हेतु किये थे क्रांति
भारत के जन जन के है दोनों प्यारे
एक थे बापू तो दूसरे थे नन्हे हमारे।

गांधी जी के मुख में था सदैव हे राम
तो शास्त्री जी के कथन थे जय जवान जय किसान
दोनों को ही देश के प्रति लगाव था
जाति पाति से कोई भी नही भेदभाव था।

गाधी जी थे सत्य और अहिंसा के पुजारी
तो शास्त्री जी थे सादा जीवन उच्च विचार धारी
सुचारू रूप से चले ये हमारा देश
मन में कोई किसी से ना रखे क्लेश।

सत्य अहिंसा के पथ पर देश हो अग्रसर
देश की तरक्की रहे उन्नत शिखर पर
ऐसे ही भावना रखे थे वे मन में दोनो
कोई भी टकराहट ना हो अपने ही अपनों।

आपसी भाईचारे बनाकर रहे समस्त देशवासी
किसी के घर में ना रहे कोई उदासी
उन दोनों महापुरुषों के याद में हरेक वर्ष
धूमधाम से जंयती मनाते हैं पूरे भारतवर्ष।

भूलना नही चाहिए हमे उनके बलिदान
चुन्नू कवि यही है सबो से आह्वान
गांधी जैसा शास्त्री को भी मिले सम्मान
तब फिर कहलायेगा मेरा भारत है महान।

- चुन्नू साहा


*****


पेपरों का खौफ

सितंबर चला गया, अक्टूबर आ गया,
सितंबर के महीने की बात बताता हूँ,
मैं आपको मेरी पेपरों की कहानी सुनाता हूँ...

किताबों से दूर मैं भागता रहा,
पढ़ाई के नाम से मुँह मोड़ता रहा।

मम्मी ने घुमा के एक चाटा लगाया,
तब जा के पढ़ने का ध्यान आया।

चाटा पड़ते ही पढ़ाई का भूत जाग गया,
और मन में किताबों के प्रति प्यार आ गया।

मम्मी से बोला- "एक बात बताता हूँ,
पढ़ाई क्यों नहीं पसंद, ये राज़ सुनाता हूँ।

मैथ्स में जब से ये ए-बी-सी-डी आई है,
तब से तो मेरी बुद्धि ही चकराई है।

साइंस और संस्कृत भी पल्ले नहीं पड़ती,
इन किताबों के आगे मेरी हिम्मत हारती।

अब तुम ही बताओ माँ, क्या उपाय करूँ?
इन कठिन विषयों से मैं कैसे पार लगूँ?"

मम्मी हँसी और बोली- "घबराता क्यों है प्यारे,
मेहनत करेगा तो हल होंगे उलझन सारे।

रोज़ थोड़ा-थोड़ा पढ़ेगा तो समझ में आएगा,
तू हिम्मत रखेगा, तो टॉपर बन जाएगा।"

- साहिल पांचाल


*****


क्या दूर क्या नजदीक कभी फासला नहीं देखा,
कितना हुआ पस्त कभी हौसला नहीं देखा।

कोई था दिल में जिसके लिए आता रहा बार-बार,
कभी रात नहीं देखा कभी रास्ता नहीं देखा।

टांग दी तेरी खातिर सलीब पर जिंदगी अपनी,
तुझे अपना कहने की खातिर कोई वास्ता नहीं देखा।

तुम्हारे दिए कोई भी वादे आज तक मुकर्रर नहीं हुए,
जिस तरह तुम मुकरे वैसा कोई मुकरता नहीं देखा ?

अपना भी कहा फिर दुनियादारी भी कह दी,
बाप का दिया हौसला और माँ की दुआ नहीं देखा।

कुछ तो वादा किये रहे होंगे अपने माँ बाप से तुम,
विकास माँ बाप ने चेहरा देखा तेरा मुखौटा नहीं देखा।

- राधेश विकास


*****


सबको साथ लेकर चलें

यह ख़याल बहुत अच्छा है।
लेकिन साथ लेकर चलना
सिर्फ लोगों को साथ रखना नहीं है,
बल्कि उनके स्वभाव, विचार,
गति और गलतियों को भी
साथ लेकर चलना है।

और फिर परिणाम…
हमेशा हमारी इच्छा के
अनुसार नहीं आएँगे।

कभी तेज़ी से ऊपर,
कभी अचानक नीचे…
बिल्कुल सेंसेक्स की तरह!

इसलिए यदि हम
साथ चलने का निर्णय लेते हैं,
तो हमें परिणामों के
इन उतार-चढ़ावों को भी
धैर्य और विश्वास के साथ
स्वीकार करने की तैयारी रखनी होगी।

क्योंकि नेतृत्व का असली अर्थ
सबको अपनी गति से चलाना नहीं,
बल्कि अलग-अलग
गति से चलने वालों को भी
एक दिशा में बनाए रखना है।

और शायद यही वजह है कि,
अकेले चलने में परिणाम
जल्दी मिल सकते हैं,
लेकिन सबको साथ लेकर चलने में
एक ऐसी यात्रा बनती है,
जिसकी मंज़िल से ज्यादा
उसका साथ याद रहता है।

- नरेंद्र मंघनानी


*****


कौन हो तुम ?

जो मेरी तरफ़ इस तरह देख रहे हो,
सिर्फ़ देख ही नहीं रहे हो
आँखों की पुतलियों को भी घूमा रहे हो

मैं सोच में पड़ गया
और सोचता ही रह गया
क्या मुझे ?
इनके प्रश्नों के जबाव देने चाहिए,
यदि हाँ तो क्यों?
मैंने कहा-
मैं कोई तमाशबीन नहीं,
मैं कोई मुसाफ़िर नहीं,
बंधुआ मजदूर भी नहीं
फिर मुझसे ऐसे सवाल क्यों?

मैं तो तेरी गोदी में पला हूँ,
तेरे आँचल में खेला हूँ,
तेरी छाया में बैठा हूँ,
और तो और मैं तुम्हें अपना
कहता भी आया हूँ,मानता भी आया हूँ,

फ़िर ख़्याल आया कि -
ये बेचारी तो पूछती ही नहीं
बल्कि परखती भी है
और परखना भी चाहिए
आख़िर कोई कैसे विश्वास करें ?

मैंने नज़रें झुका ली-
और एक शब्द भी नहीं कहा,
मैंने जवाब देना भी उचित नहीं समझा
मेरा मौन ही मेरा जवाब था

उसने मेरी तरफ़ देखा-
कनखियों से मेरे हावभाव को परखा
और कहा-
शायद मैं लोगों को पसन्द ही नहीं हूँ।

- बाबू राम धीमान


*****


गांधी कहाँ हैं ?

आज भी गाँधी दिख जाते हैं,
देश के नोटों पर।
मेडिकल कॉलेज, सेतु, विद्यालय,
थाना, घाट या फिर कोर्ट में।

या फिर नेताओं के नारों में,
उनकी आदम कद मूर्ति,
संभालती ट्रैफिक, चौराहों पर।
विदेशी मंचों पर,
या फिर फ़िल्म के किरदारों में।

नाम उनका बेचा जा रहा,
उनके ही नाम से-
कहीं सत्ता की सीढ़ी के लिए,
कहीं अपनी पहचान के लिए।

उनकी तस्वीर सबको चाहिए,
पर उनके विचार कितनों को?
उनका नाम सबकी ज़ुबाँ पर,
पर उनके रास्ते पर कितने हैं ?

आज भी गाँधी दिख जाते हैं-
हर उस जगह,
जहाँ उनका नाम
काम आ सकता है।

सब कुछ हासिल किया तुमने,
क्या कभी समाज के अंतिम
पंक्ति की अंतिम व्यक्ति से मिले हो,
या फिर उनके विचारों को बस
यू ही ताबीज बना कर पहन रखा है।

- रोशन कुमार झा


*****


ओह! साबरमती का संत
तूने कैसे कर दिया कमाल...
देश को अंग्रेजों से आजाद कर
तूने कैसे मचा दिया धमाल...
हाथ में लाठी, तन पर धोती
मुख में अहिंसा, स्वराज का नारा...
अंग्रेजों को बुद्धि-विवेक से मारा...
ओह! साबरमती का संत
तूने कैसे कर दिया कमाल...


*****


गांधी होना आसान नहीं है
क्योंकि गांधी होने के लिए
सिर्फ एक धोती में रहना होगा
अहिंसा परमो धर्म कहना होगा
और पूर्ण स्वराज लेना होगा
नफरतों को हराने के लिए
प्राणों का त्याग देना होगा
हे राम हे राम कहना होगा

- दीपक कोहली


*****


ग़ज़ल

​हम-सफ़र जो साथ थे, उस कारवाँ को क्या हुआ,
आँधियों के दौर में, अमन-ओ-अमाँ को क्या हुआ।

​चुप खड़े हैं सब यहाँ, ख़ामोशियाँ ही ख़ामोशियाँ,
गूँजती थी जो कभी, उस बेकरारी को क्या हुआ।

​फूल भी मुरझा गए, और पत्तियाँ भी झड़ गईं,
रब जाने आज इस, हँसते चमन को क्या हुआ।

​दर्द का आलम तो देखिए,आँख भी नम न हुई,
ज़िल्लतों के शहर में, मेरे गुमाँ को क्या हुआ।

​बात जो दिल में छुपी, होंठों पे लाते ही नहीं,
मुश्ताक़ तेरी, शोख़ी-ए-ज़बाँ को क्या हुआ।

- डॉ. एमए शाह


*****


शायद योजना कुछ और थी…
हर प्रयास का परिणाम
हमारी इच्छा के अनुसार नहीं हो सकता।
कभी हम असफल होते हैं,
कभी अपने ही निर्णयों से निराश होते हैं,
और कभी परिस्थितियाँ
हमारी बनाई हुई सारी योजनाओं को
एक ही पल में बदल देती हैं।
लेकिन शायद जीवन का अर्थ
हर बार वही पा लेना नहीं है,
जो हमने चाहा था।
कभी-कभी न मिलना भी एक संदेश होता है,
रुक जाना भी एक दिशा होती है,
और असफलता भी किसी बड़ी सफलता की
तैयारी कर रही होती है।
इसलिए जो हुआ, उसे स्वीकार कीजिए,
जो नहीं हुआ, उसके लिए स्वयं को दोष मत दीजिए,
और जो सामने है, उसमें पूरी शक्ति से जुट जाइए।
क्योंकि जीवन में हर रास्ता
मंज़िल तक पहुँचाने के लिए नहीं होता...
कुछ रास्ते हमें बदलने के लिए भी होते हैं।
शायद हमारी योजना छोटी थी,
और उसकी योजना हमसे कहीं बड़ी।

- नरेंद्र मंघनानी


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भाई की याद
मेरे भाई की याद मुझे आ रही है,
उसकी फोटो देखकर उसकी बातें भी दिमाग में छा रही हैं,
मेरे भाई की याद मुझे आ रही है।
कुछ बातें और कुछ यादें आज मुझे आ रही हैं,
अब मेरे को मेरे भाई की याद सता रही है।
आओ, कुछ बचपन की बातें बताता हूँ,
उसकी याद मुझे आज क्यों आ रही है... मैं आपको सुनाता हूँ।
जब भी मैं उदास होता था,
वह झट से हँसा देता था
और मेरे चेहरे पर फट से मुस्कान ला देता था।
और उस मुस्कान में मैं सारी उदासी भूल जाता था
और झट से ही खुश हो जाता था।
आज उससे बातें करने का मन कर रहा है मेरा,
अब मैं उसको फोन मिलाऊँगा,
और बचपन की उन मीठी यादों को ताज़ा करके
एक बार फिर अपने बचपन की दुनिया में लौट जाऊँगा।

- साहिल पांचाल


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अवलोकन

निर्माण कार्य को आगे बढ़ाने के लिए
तुमने बीच में आने वाली
रुकावटों पर ध्यान नहीं दिया।
लगातार बहते रहने के चक्कर में
तुमने रुकना याद नहीं रखा।

तुम सीधे-सादे थे,
तुम सच्चे थे,
और तुम ईमानदार थे, यह सब जानते थे।

तुम अच्छे थे
तुम उदार थे
और तुम सहज-स्वाभाविक थे,
यह सब जानते थे।

हालाँकि यह बेहतर होता
अगर तुम्हें यह एहसास होता कि
सागर की भी सीमाएँ होती हैं
और आकाश की भी अपनी सीमा होती है।

- निर्मल रॉय


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जनता के अधिकार पर, मंडराता अंधकार।
मत की चोरी रोकना, लोकतंत्र का सार।।

आरोपों के दौर में, उठते कई सवाल।
सच क्या है, यह सामने, आए अब हर हाल।।

जनता के मत पर जो, डाले अपनी घात।
लोकतंत्र की पीठ पर, करता है आघात।।

कुर्सी की खातिर यहाँ, बिकने लगे उसूल।
सत्ता मिलते ही हुए, सारे वादे धूल।।

मतदाता को भूलकर, सत्ता में मदमस्त।
जनता जागी एक दिन, सिंहासन हो ध्वस्त।।

जनता के अधिकार को, समझा जिसने माल।
वक्त पड़ेगा एक दिन, होगा उसका हाल।।

मत की चोरी हो अगर, चुप मत रहना आज।
लोकतंत्र की नींव पर, होता गहरा आघात।।

मत का सौदा जो करे, उससे पूछो बात।
जनता के अधिकार की, सौरभ ये है मात।।

चेहरे पर मुस्कान है, भीतर काला खेल।
जनता के विश्वास से, करे रोज़ ही खेल।।

सत्ता के गलियार में, गूँजे झूठे बोल।
जनता के हर प्रश्न का, कौन चुकाए मोल।।

लोकतंत्र के नाम पर, होता जब व्यापार।
जनता के विश्वास पर, होता सीधा वार।।

जनादेश के नाम पर, मत करना व्यापार।
जनता के विश्वास का, रखिए सदा विचार।।

मत की ताकत कम नहीं, मत समझो कमजोर।
एक-एक मत बदलता, सत्ता का हर दौर।।

झूठे दावों से कभी, सच सके नहीं हार।
जनता जब जागे तभी, खुलता पूरा सार।।

मतपेटी की पवित्रता, रखिए सदा महान।
इसमें जनता की बसी, आशा और' अरमान।।

सत्ता चाहे जो मिले, मत का रखिए मान।
जनता के अधिकार से, ऊँचा नहीं विधान।।

आरोपों का दौर है, चारों ओर सवाल।
निष्पक्ष जांच ही करे, सही खुलासा हर हाल।।

देश-विरोधी शक्तियाँ, करतीं अपना काम।
जनता के विश्वास को, करतीं है बदनाम।।

लोकतंत्र की नींव में, जनता का विश्वास।
इसको चोट लगी अगर, कैसे बचे विकास।।

जनता जागे अब यही, सौरभ समय पुकार।
मत की रक्षा से बने, लोकतंत्र दमदार।।

- डॉ. सत्यवान सौरभ


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हरड़ का पुराना पेड़


घर के आंगन में है एक हरड़ का पेड़
बड़ी बड़ी हरड़े लगती हैं बहुत दूर
कई वर्षों से खड़ा एक कोने में
गर्मियों में छाया देता है भरपूर

सर्दियों में कर देते हैं उसकी छंटाई
ताकि धूप आंगन में आ जाए
पुराने पेड़ हो गए धीरे धीरे खत्म
हरियाली तभी बढ़ेगी जब कोई नए पौधे लगाए

बुजुर्ग करते थे बहुत समझदारी का काम
हरड़ भेड़ा और आमला तीनों हैं लगाए
बनता है त्रिफला चूर्ण इन तीनों का
हाजमा हो जाये सही पेट के रोगों से मुक्ति दिलाए

कई पक्षियों का जमघट लगा रहता है उस पर
चिड़ियां तो पूरा दिन चहक चहक कर शोर मचाती हैं
दाना चुगने के लिए उतरती हैं आंगन में झुंड में
अंदर से कोई निकलता है तो झट भाग जाती हैं

शाम होते ही पक्षियों की सुनाई देती हैं आवाजें
खाने के लिए मुंह खोलते चूज़े नज़र हैं आते
पूरा दिन करते हैं इंतज़ार अपनी मां का
चीं चीं की आवाज से पूरा वातावरण हैं गुंजाते

अम्मा बैठी रहती है उस पेड़ के नीचे ब्यूह के ऊपर
रहता है हमेशा उसका रास्ते से आने जाने वालों पर ध्यान
हर आने जाने वाला करता है उनसे खूब बातें
पास आकर करते हैं बात देते हैं सब बहुत इज़्ज़त मान

कभी जमघट लगा रहता था यहां इंसानों का
आंगन भरा रहता था बच्चों और घरवालों से
बुजुर्गों की दमदार आवाजें गूंजती थी जहां
आज दुखी हैं दरवाजे उनपर लटके बड़े बड़े तालों से

वीरान पड़ा है आंगन अब लगे रहते हैं पत्तों के ढेर
लगता है कभी कभी जैसे देख रहा है दूर से आसमान
जा रहे सब धीरे धीरे अपनी भी आएगी बारी एक दिन
सामने कोई नहीं बस दिखते हैं उनके कदमों के निशान

- रवींद्र कुमार शर्मा



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हम जिन्हें राह दिखाने निकले।
लोग वो हमसे सयाने निकले।

बात करते हैं वो शराफ़त की,
लोग जो हद से पुराने निकले।

जो हमारे नहीं तुम्हारे भी नहीं,
आज वो सबके ठिकाने निकले।

वो फिसलना ,वो संभलना उनका,
ये तो सब उनके बहाने निकले ।

हमको अक्सर ही जो मिले तन्हा,
साथ उनके तो ज़माने निकले ।

जो सदाएं थी सभी भूली सी,
लोग फिर उनको सुनाने निकले।

बात सारी वो जानी-अनजानी,
आज फिर सबसे जताने निकले।

- नवीन माथुर पंचोली


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हर अपना अपना नहीं, भ्रम में रहना छोड़ ।
समय पड़े तो देखिए, कौन निभाता जोड़ ।।

रावण को विश्वास था, कुल है पूरा साथ ।
सत्य सामने आ गया, छूट गए सब हाथ ।।

कुंभकर्ण ने साथ दे, निभाया भ्रातृ धर्म ।
सच का स्वर दबा रहा, अधूरा रहा कर्म ।।

सत्य विभीषण ने कहा, सह न सका अन्याय ।
अपनों ने ही त्याग कर, दी उसको तब हाय ।।

साथ खड़ा होना नहीं, बस रिश्ते की बात ।
गलत राह से रोक दे, वह है सच्चा साथ ।।

गलती पर जो मौन रह, कैसा उसका नेह ।
पास रहे सच ना कहे, मन में कैसी हेय।।

परिवार वही आईना, दिखला दे सच रूप ।
गिरने से ही थाम ले, दूर करे हर कूप ।।

सुख में तो सब साथ हैं, दुख में मिले न मीत।
जो विपदा में साथ दे, समझो सच्ची प्रीत।।

भटके पथ पर रोककर, जो दिखला दे राह ।
वही सगा कहलाएगा, वह है सच्ची चाह ।।

रिश्ते केवल रक्त के, होते नहीं महान ।
सत्य, विश्वास प्रेम से, बनता सच्चा मान ।।

समय सभी को परखता, खुल जाता व्यवहार ।
कौन पराया, कौन सँग, होता साफ विचार ।।

अंत समय बस यह समझ, जीवन का निष्कर्ष ।
हर अपना अपना नहीं, सच्चा दुर्लभ हर्ष ।।

- डॉ. प्रियंका सौरभ


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