साहित्य चक्र

30 September 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 01 अक्टूबर 2026






अस्तित्व का सवाल है

पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ!
गुफ्तगू में मशगूल थीं
एक-ब-एक सुगबुगाते हुए
"नाक" आगे आकर बोलती है
सोशल मीडिया के इस दौर में!
आप सब की उपयोगिता है।
काला-सफेद और रंगीन
"आँख" सब कुछ देखती है
भला-बुरा दोनों ही
"कान" सुनता रहता है
संदेश देने को "जिह्वा" को
हिला-डुला लिया जाता है
और "त्वचा" के स्पर्श से ही
मोबाइल चलाया जाता है
मेरा तो कोई सरोकार नहीं
बस निराकार साँसे देकर
व्यक्ति को जिंदा किए भर हूँ
फिर रोती हुई बोली
तुम सब भी ध्यान मेरा नहीं देते
सुध भी मेरी कभी नहीं लेते
मुझे तो लगने लगा है
कि डार्विन का सिद्धांत!
अब मुझ पर लागू होने वाला है
उपयोगिता के आधार पर
मेरा अस्तित्व ही
जल्दी खत्म होने वाला है
इसलिए सहेलियों तुम सबसे
मेरी आरजू है
कि मेरी इस व्यथा पर
गहराई से विचार कीजिए
मत समझिए कि!
यह मेरी नाक का सवाल है
बस इतना समझिए कि!
यह मेरे अस्तित्व का सवाल है
यह मेरे अस्तित्व का सवाल है

- जितेन्द्र कुमार दुबे


*****


तुम्हारे छोड़ें हर तीर पकड़े जाएंगे।
तीर की कैसी है तासीर पकड़े जाएंगे।

कल भी मैंने पूछा था और आज भी,
कब जिंदा हुए मरे कब जमीर पकड़े जाएंगे ?

शिकारी के हाथों में पिंजरा दिख रहा है,
जरूर फिर खोड़रों के कीर पकड़े जाएंगे।

तेरा हर ताना बाना सिर्फ तानाशाही है,
जुबान से भले बने हैं फकीर पकड़े जायेंगे।

नफरत के धुएं से सब धुआं धुआं कर दिया,
जिसने की जहरीली समीर सब पकड़े जाएंगे।

पेट भरने की तलाश में मन मर मर गया विकास,
परोसी जिसने जहरीले खीर सब पकड़े जाएंगे।

- राधेश विकास


*****


माना कि आप बहुत बड़े हो, साहब!
मगर चींटी के समान तो हम भी हैं,
अगर तुम! सागर की लहरों जैसे हो,
उसी में बसे निशान तो हम भी हैं,

तुम बरगद की छाँव से बड़े हो
तो छोटी सी घास ही सही,
पर धरती को सींचने में,
एक प्रयास तो हम भी हैं,
माना कि आपकी तूती
बोलती है इस जहाँ में,
मगर झींगुर के समान
आवाज़ हमारी भी तो है,

आपकी गर्जना से गूंजते हैं ,
बड़े बड़े महल-चौबारे,
हमारी टर-टर से ही तो,
गांव की रात आबाद भी तो है।

तूती तो बुलबुल की होती है,
मगर झींगुर तो नींद उड़ाता है
आप तो दिन में सुनाई देते हो, साहब!
मगर हम तो अंधेरों में भी याद आते हैं।

- बाबू राम धीमान


*****


मैं आसमान थोड़ी हूँ

​बिछड़ने का ग़म साफ़ था उसकी नज़रों में,
मुझसे कह रहा था कि मैं बेक़रार थोड़ी हूँ।

तमाम उम्र मैंने नाम ये उसके ही लिख डाली,
ज़बान से अब मुकर जाऊं वो इंसान थोड़ी हूँ।

बड़े ताबा, बड़े रौशन, सपने टूट ही जाते हैं।
सब को दामन में छुपा लूं आसमान थोड़ी हूँ।

दिल ये ज़िद्दी है मेरा अड़ा है उसके आने को,
वो प्यार है मेरा, मैं उसका इंतज़ार थोड़ी हूं।

आया था पल दो पल के लिये चला भी गया,
मैं उसकी ज़िंदगी का आख़री पड़ाव थोड़ी हूं।

आओ बैठेंगे गुफ्तगु होगी "मुश्ताक़" मुस्कुरायेंगे,
वक़्त ही वक़्त है दो पल की मुलाक़ात थोड़ी हूं।

- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह


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ब्रांडों की इस दौड़ में, बिकता मन का चैन।
तन पर लाखों खर्च हैं, भीतर खाली नैन।।

किस्तों में जीवन कटा, कर्ज हुआ सरताज।
महँगी गाड़ी ले लिया, छूटा घर का साज।।

दिखने में सब खुशहाल हैं, भीतर गहरा शोक।
सोशल मीडिया पर हँसें, मन में पलता रोग।।

जरूरत से ज्यादा जुटा, फिर भी मन ना तृप्त।
लोभ बढ़े दिन-रात तो, जीवन जाए लिप्त।।

मोबाइल सुख खोजते, रिश्ते हुए अनजान।
पास खड़े अपनों लगे, दूर हुआ इंसान।।

धन की खातिर दौड़ते, सुबह हुई से शाम।
जीवन पूछा एक दिन, मेरा क्या है काम।।

बच्चों को सुविधा मिली, समय मिला न प्यार।
बड़ा हुआ जब पुत्र तो, रिश्ते हुए उधार।।

हर सुविधा घर में मिली, फिर भी मन बेजार।
सुख-साधन के बीच में, सुख क्यों हुआ फरार।।

फोटो में मुस्कान है, आँखों में है पीर।
दिखलावे के युग भला, कौन हुआ गंभीर।।

चाहत की यह बेल अब, फैल गई हर ओर।
जितना सींचो लालसा, उतना बढ़ता जोर।।

वस्तु बढ़ी तो चाह भी, चाह बढ़ी तो शोक।
तृष्णा की इस आग में, जलता जाए लोक।।

माप लिया सुख को यहाँ, धन-दौलत के साथ।
प्रेम, समय और संतोष को, छोड़ दिया क्यों हाथ।।

जिसको समझा सुख सदा, निकला केवल जाल।
चमकीली दुनिया तले, मन है क्यों बेहाल।।

ऊँची है अट्टालिका, ऊँचे इनके दाम।
पर रिश्तों की नींव में, क्यों दिखता विराम।।

जीवन भर संग्रह किया, फिर भी मन लाचार।
संतोषी की झोंपड़ी, निकली सुख का द्वार।।

दौड़-दौड़कर पा लिया, दुनिया भर का माल।
खुद को पाने की घड़ी, आई बीते काल।।

- डॉ. प्रियंका सौरभ


*****


देशभक्ति जब सो गई, बढ़ने लगे विकार।
जागो भारतवासियो, फिर जागें संस्कार।।

जो भारत के शत्रु हैं, उनसे कैसा प्यार।
देशप्रेम की लौ जले, घर-घर और हर द्वार।।

राष्ट्रविरोधी बात को, मत देना सम्मान।
सत्य, न्याय और देशहित, बनें सभी की जान।।

देश बचाना धर्म है, देश बढ़ाना कर्म।
भारत माँ की शान में, अर्पित हो हर धर्म।।

झूठे नारे छोड़कर, सच का रखिए साथ।
देशहित की राह में, बढ़ें मिलाकर हाथ।।

जाति-धर्म में मत बँटो, भारत की पहचान।
एक तिरंगे के तले, अपना हिंदुस्तान।।

देशप्रेम केवल नहीं, भाषण और बयान।
कर्मों से दिखता सदा, भारत का सम्मान।।

वीरों के बलिदान को, रखो सदा तुम याद।
उनकी पावन प्रेरणा, करती भारत आबाद।।

देशद्रोह की सोच को, मत देना विस्तार।
भारत की एकता ही, सबसे बड़ा हथियार।।

जब जागे जन-चेतना, मिटे सभी अँधियार।
देशप्रेम से ही सदा, जुड़ा रहे परिवार।।

- डॉ. सत्यवान सौरभ


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अगर मैं!
बुद्ध होता, महावीर होता
मोहम्मद होता, नानक होता
ईसा मसीह होता...
और होता राम-कृष्ण!
तो मैं इंसानों को
जानवरों जैसी शिक्षा देता!
एक सूत्र में बंधे रहो...
प्रकृति को साफ रखो...
कल की कल सोचो...
जितनी जरूरत उतना खाओ...
और कदम से कदम मिलाओ...

- दीपक कोहली


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तीर लगते नहीं निशाने तक।
पाँव उठते नहीं ठिकाने तक।

उन्हें भी रोकना नहीं आता,
हम ठहरते नहीं बुलाने तक।

डूबते तो सभी ने देखा पर,
हाथ बढ़ते नहीं बचाने तक।

ताश के घर-महल बनाते हो,
ये संभलते नहीं जमाने तक।

आज रिश्तों का हाल है ऐसा,
ये चलते नहीं निभाने तक।
- नवीन माथुर पंचोली


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मानव भूला अपनी पहचान

इन्सान भूल गया अपनी ही पहचान
मानव था बन गया जग में शैतान
रब ने बनाया था इसको इन्सान
पर ये बन गया धरती का हैवान

नारी थी पूज्य देवी दुर्गा स्वरूप
सुन्दरी हो या वो हो काली कुरूप
पर पुरूष संग बना दी हत्यारिन
फुफकार करती है बन कर नागिन

माता पिता थे कल हमारे भगवान
मिहनत कर दी थी अपनी हमें नाम
कुपुत्र औलाद ने बना दी गुमनाम
बृद्धाश्रम बन ग्ई बुढ़े बुढ़ी की धाम

सरिता थी पावन गंगा माता समान
पर नदियाँ को बना दी नाला बेईमान
अपवित्र जल बना घर की मेहमान
बीमारी का दे रहा नित्य ही पैगाम

गुरूदेव थे हमारे पिता के समतुल्य
शिक्षक आज भूला दी खुद की मूल्य
तन पे जम गई चरित्रहीनता की धूल
नैतिकता की पतन चुभ रही है शूल

- उदय किशोर साह


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दो दीप देश के

दो दीप जले थे भारत में,
जिनसे जगमग देश हुआ।
गांधी जी ने सत्य सिखाया,
अहिंसा का संदेश दिया।
सादा जीवन, ऊँचे विचार,
बापू की थी यही पुकार।
सच की राह कभी मत छोड़ो,
मिलकर भारत को तुम जोड़ो।
शास्त्री जी थे सरल महान,
भारत माँ के सच्चे लाल।
“जय जवान, जय किसान” से,
गूँजा अपना हिंदुस्तान।
मेहनत, साहस, स्वाभिमान,
इनसे बढ़ता देश महान।
दोनों महापुरुषों को नमन,
भारत माता का अभिनंदन।
सत्य-अहिंसा अपनाएँ हम,
श्रम की महिमा गाएँ हम।
गांधी-शास्त्री के आदर्शों से,
नया भारत बनाएँ हम।

- गोपाल कौशल भोजवाल


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हरश्रृंगार धरा पर बिखर गई...

काश! कहीं कोई ऐसा हो,
जो बनकर आधार सँभाले,
थककर जब यह जीवन बिखरे,
मौन स्नेह से गले लगा ले।

रजनी भर महकी पारिजात ,
सुरभि-सुधा जग में बिखराई,
भोर हुई, थक टूटी कलिका,
सुध लेने स्वर्णिम भोर आई।

धरणी सम मिले पावन आश्रय,
तो जीवन को विश्राम मिले,
साँसों की इस सुरभित महक को,
धरा-धाम-सी छाँव मिले।

शाखा से छूटना अंत नहीं है,
समर्पण का यह रूप नया,
झरना पारिजात का सार्थक,
अवनी से लिपटी उसकी हया।

विश्वास दृढ़ है हरश्रृंगार का
धरा तो अंक लगाएगी
पारिजात की पावन महक को,
हर हृद तक पहुंचाएगी ।

हरश्रृंगार धरा पर बिखर गई।
लिपट अवनी से निखर गई।

- सविता सिंह ‘मीरा’


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ऐसा देश नहीं चाहिए

भ्रष्टाचार हो इस देश में, ऐसा देश नहीं चाहिए,
नारी की हो जहाँ बेइज्जती, ऐसा देश नहीं चाहिए।
बड़े-बुजुर्गों का जहाँ मान-सम्मान न हो,
छोटों के प्रति जहाँ प्यार न हो, ऐसा देश नहीं चाहिए।
जहाँ धन-दौलत की ही पूजा हो,
इंसानियत की कोई कदर न हो, ऐसा देश नहीं चाहिए।
जहाँ धर्म के नाम पर आपस में विवाद हो,
भाई-भाई का जहाँ दुश्मन हो, ऐसा देश नहीं चाहिए।
जहाँ रिश्तों में हर पल तकरार हो,
सास-बहू में भी प्रेम न हो, ऐसा देश नहीं चाहिए।
जहाँ गरीबों के हक पर कोई डाका डाले,
और स्वार्थ में अपने ही घर भर डाले, ऐसा देश नहीं चाहिए।
जहाँ अमीरी-गरीबी में भेदभाव की दीवार हो,
हर इंसान के बीच समानता और अधिकार हो।
जहाँ प्रेम, भाईचारा और सद्भावना का वास हो,
हर चेहरे पर मुस्कान और दिल में विश्वास हो।
जहाँ अमन-चैन, सुख-शांति का बसेरा हो,
हर नागरिक के जीवन में उजियारा हो।
ऐसा देश नहीं, ऐसा भारत चाहिए,
जहाँ हर दिल में प्रेम और हर मन में सम्मान चाहिए।

- गरिमा लखनवी


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इतना गुमान ना करो!
प्रकृति ने तुम्हें स्त्री बनाया है।
तुम क्यों फिजूल में,
इन मर्दों से तुलना करती हो ?
सारे मर्द तुम्हीं से पैदा हुए हैं।
तुम्हारे दुश्मन मर्द नहीं,
बल्कि तुम खुद स्वयं हो।
मर्दों की बनाई!
हर परंपरा को तुम,
सिर पर उठाए ढोती हो।
आखिर! तुम विद्रोह
क्यों नहीं करती हो ?
उस परंपरा के खिलाफ...
उस संस्कृति के खिलाफ...
उस धर्म के खिलाफ...
जहां सिर्फ!
तुम्हारा शोषण लिखा है।

- दीपक कोहली


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मामी की पनीर की सब्जी

क्या मस्त पनीर की सब्जी बनाई,
देखते ही मन में उठी तबाही।

आज तो मामी जी गजब ढाया,
स्वाद ऐसा कि हर कोई ललचाया।

आपकी सब्जी का स्वाद चखा तो लगा ऐसा,
जैसे किसी शादी की दावत में आ गया हूँ मैं सा!

ऐसी सब्जी अगर आप रोज खिलाओगे,
तो मोटे हो जाएंगे, फिर पतले न हो पाएंगे!

मामी जी के हाथों का स्वाद है निराला,
चट कर गए सब, खाली हो गया प्याला।

अब जब भी बनेगी यह सब्जी खास,
सबसे पहले खिंचे चले आएंगे आपके पास!

- साहिल पांचाल


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हर शख्स अनजबी था

बाद जाने के तेरे , मैं और बता क्या करता।
अश्क अपने न बहाता तो बता क्या करता।

हर शख़्स अनजबी था मेरा तेरे  इस शहर में।
तस्वीर तेरी ये न दिखाता तो बता क्या करता।

कौन है ऐसा जो रखता ज़ख्म पर मेरे मरहम।
चौखट पे तेरी सर रखने के सिवा क्या करता।

बे वफ़ाई का इल्ज़ाम दे तुम्हें हम नहीं, नहीं।
तक़दीर तो है तक़दीर तू भी भला क्या करता।

ग़मे जुदाई दिलकी न देखी गई हमसेमुश्ताक़।
आज़ाद रूह को न करता तो बता क्या करता।

- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह


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तुम्हारे छोड़ें हर तीर पकड़े जाएंगे।
तीर की कैसी है तासीर पकड़े जाएंगे।

कल भी मैंने पूछा था और आज भी,
कब जिंदा हुए मरे कब जमीर पकड़े जाएंगे ?

शिकारी के हाथों में पिंजरा दिख रहा है,
जरूर फिर खोड़रों के कीर पकड़े जाएंगे।

तेरा हर ताना बाना सिर्फ तानाशाही है,
जुबान से भले बने हैं फकीर पकड़े जायेंगे।

नफरत के धुएं से सब धुआं धुआं कर दिया,
जिसने की जहरीली समीर सब पकड़े जाएंगे।

पेट भरने की तलाश में मन मर मर गया विकास,
परोसी जिसने जहरीले खीर सब पकड़े जाएंगे।

- राधेश विकास


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निज कर्म

निज कर्म करो
मत मांगो श्रेय किसी से
निज हृदय को संतुष्ट करो
ईमानदारी के साथ
समर्पण भाव के साथ
निष्काम कर्म करो
रख ध्येय पर ध्यान
ऐसा श्रम करो कि
विधाता को लिखना पड़े
तुम्हारे लिए नूतन विधान
तन्मय होकर कर्म करो
धर्म समझ कर
हर्षित होकर
निज कर्म करो
मत मांगो श्रेय किसी से
बस स्वयं को तृप्त करो

- प्रवीण कुमार


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कचरा

सुबह सुबह कोहरे में,
बच्चे छोटे छोटे कदमों से,
जा रहे हैं,
स्कूल की सड़क पर,
दूर कहीं स्कूल में घंटी बज रही है,
पर उनकी आंखें जमीन पे,
कुछ ढूंढ रहीं है,
पैरों में कोई तेजी नहीं,
कोई हड़बड़ी नहीं,
उनकी पीठ पर किताबों का बस्ता नहीं है,
गले में टाई नहीं,
साफ, सफेद कपड़े और जूते नहीं है,
एक बोड़ा भरा हुआ कचरे से,
पीठ पर हो कर सवार,
उनके साथ जा रहा है।

- प्रणव राज


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देने का सुख

जब हम बिना किसी बदले की
उम्मीद के देना सीख जाते हैं,
तो समझिए हमने केवल देने की कला नहीं,
जीने की कला सीख ली है।
क्योंकि अपेक्षा से दिया गया प्रेम
धीरे-धीरे हिसाब बन जाता है,
और बिना अपेक्षा दिया गया प्रेम
आशीर्वाद बन जाता है।

जो दिया, उसे भूल जाना,
जो मिला, उसके लिए कृतज्ञ रहना,
और जिसने कुछ लौटाया नहीं,
उससे भी मन में कोई शिकायत न रखना...
शायद यही तो है
मन के समृद्ध होने की निशानी।

किसी के चेहरे पर मुस्कान रख देना,
किसी के दुःख में चुपचाप साथ खड़े रहना,
किसी के कठिन रास्ते पर
सहारे का एक हाथ बढ़ा देना...
ये छोटी-छोटी प्रेम की सौगातें
हमारे साथ कहीं नहीं जातीं,
मगर किसी के जीवन में
बहुत देर तक महकती रहती हैं।

- नरेंद्र मंघनानी


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नई सुबह पर अक्सर नज़र रहती है मेरी,
कोई पैगाम लाये प्यार का, या कोई समाचार लाए,

रात तो हर रोज़ ज़ख्म दे कर चली जाती है,
शायद सुबह ही कोई मरहम साथ लाए,

बड़ी बेसब्री से इंतज़ार करता हूँ, नई सुबह का,
कि शायद कल जो टूटा था, वह आज जुड़ जाए,

रात ने जो लूटा है, मेरे सुकून का वह हिस्सा
शायद सुबह उसे वापस लौटा लाए,

अल सुबह कह जाती है कुछ कानों में मेरे,
"उठ, अभी पूरी रात नहीं, बाकी है अंधेरे,"

और मैं फिर से उसी उम्मीद में जी लेता हूँ,
कि शायद आज कोई अपना, मुझे सवेरे-सवेरे पुकारे,

इंतज़ार करता हूँ हर उस आवाज़ का,हर पैगाम का,
जो मेरे नाम को, मोहब्बत से बुलाए,

भीड़ में तो हर कोई पुकारता है मुझे,
कोई तो हो जो दिल से आवाज़ लगाए

- बाबू राम धीमान


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नारी एवं प्रभु

नारी-
यह कैसा अन्याय है प्रभुवर
यह कैसा अन्याय।
देकर कोमल काया तूने
किया नही है न्याय।
तूने किया नही है न्याय।
प्रभु-
प्रस्तर सम धरती न कभी
जानो बीज है उगाती,
कोमल काया तेरी है
तू जननी का सुख पाती।
नारी-
क्यों हमको ही प्रभुवर,
है बंधन मे रहना पड़ता।
सामाजिक मर्यादाओं को
हमको ही सहना पड़ता।
प्रभु-
मर्यादित जन ही इस जग में,
पुरुषोत्तम राम कहलाता है।
तुमको देकर कोमल काया,
मर्यादा का लाज निभाया है।
नारी-
बलिदान सदा से करती आयीं
हम नारियॉ निज परिवार हित ।
फिर भी बलिदानों की गाथा में
नही है अपना कोई अस्तित्व।
प्रभु-
तुम्हारा मौन बलिदान ही जानों
सबसे है सर्व श्रेष्ठ।
पुरूष समाज की तुम अंग रक्षक,
तुम्हीं तो हो कुल श्रेष्ठ।
फिर भी तेरे बलिदानों की,
गाथा इतिहास दोहराता है,
पन्नाधाए एंव वीरांगनाओं की,
गाथा यह सुनाता है।
नारी
हौसलों में भरकर रंग,
हमारी भावनाओं को दिया पंख,
पर क्यों समाज ने कतर डाले,
मेरे उगते ये नवल पंख।
प्रभु
हौसलों के जो पंख न होते,
दारुण दुःख तुम सह न पाते।
दुर्योधन जैसे बैरी से,
तुम मुकाबला कर न पाते।
तुम्हारे ही हौसलों ने एक,
नया मुकाम बनाया है।

आसमान तक परचम लहरा कर,
अपना नाम कमाया है।
अब भी क्या तुमको शक है,
मैंने किया अन्याय।
तुम न होती तो सृष्टि न होती,
न होता कोई पुरूष प्रर्याय।
एक ऐसी धुरी हो तुम,
तुम विन संसार विराना है
नर व नारी एक ही हो तुम
फिर किसको तुम्हें हराना है।

- रत्ना बापुली


*****


क्यूँ रुठा कायनात हमार

हँसता खेलता है. ये जीवन हमारा
प्रकृति की थी हम पे सदैव सहारा
फिर प्रकृति क्यूं कर रही र्दुव्यवहार
क्यूँ रूठ गई ये कायनात हमार

दरक रहा पहाड़ जमीदोज हो जाता
कयामत की दिन हमको दिखलाता
कौन सी खता हुई ब्रम्हांड से यार
क्यूँ रूठ गई ये कायनात हमारा

वर्षा की पानी है जीने का सहारा
वर्षा ने दे दी है बाढ़ का विकृत नजारा
बादल की तांडव से त्रस्त है संसार
क्यूँ रूठ गई ये क्यानात हमार

नदी नाला गुस्सा हम पर क्यूं जतलाता
गाँव का गाँव नदी के अंदर समां जाता
कौन सी गलती हो गई, मैं हूँ शर्मसार
क्यूँ रूठ गई ये कायनात हमार

प्रकृति के आगे हम मानव हैं फतिगां
गलती से ले ली है उनसे हम पंगा
अपनी करनी पे कर मिल कर विचार
क्यूँ रुठ गई ये कायनात हमार

- उदय किशोर साह



*****


तुम जब मेरी गोद में आई
तब शायद मुझे भी नहीं पता था
कि एक छोटी सी नन्हीं सी परी
मेरी पूरी दुनिया और मेरी जान बन जाएगी।
बचपन से प्यारी, समझदार, होशियार हो,
याद है मुझे नन्हें-नन्हें हाथ जब मुझे छूते तो
मन को बहुत सुकून मिलता है।
छोटे-छोटे कदमों से चलना इठलाना
आज भी वो खूबसूरत पल याद है मुझे
वे सारे हसीन पल आज भी याद है।
कल तक जो मेरी उँगली पकड़ कर चलती थी
आज वो अपना हाथ से मुझे उड़ाती है
मेरे को पंख लगाती है
बेटी से मां बनकर मेरे सपने जगाती है
तुम बस यूँ ही मेरे आंगन की रौनक बनी रहना।
जिंदगी में कैसे भी पल हो,
हिम्मत से ऐसे ही आगे बढ़ते रहना।
उम्र भर ऐसे ही खिलती रहना और
मेरी बाहों में सिमटी रहना।
वही नन्हीं सी मेरी जान बनी रहना।
अपने जैसी ही एक प्यारी सी परी जनना
ताकि तुम भी फख्र करो कि
तुम बिल्कुल मेरे जैसी ही खूबसूरत मां हो।
तुमने एक परी को जन्म दिया,
ईश्वर तुम्हारे सारे सपने पूरे करें
और तुमको आरोग्य रखें।

- सुमन डोभाल काला


*****



24 September 2026

छायाचित्र आधारित पंक्तियाँ- 25 सितंबर 2026







सुख-दुःख का ताना-बाना बिनते जुलाहा दम्पत्ति।
कातते सूत बनाते वस्त्र यही उनकी पूर्ण सम्पत्ति।

- डॉ. उपासना पाण्डेय


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कपड़ा बुनने वाले जुलाहा हम, दोनों मेहनत करते मिलकर
जब कोई धागा टूट गया तो, एक छोर से बाँध जोड़ कर,
फिर से सूत पिरो कर हम, नए-नए वस्त्र बनाने हम।

- सुमन डोभाल काला


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कमाई

लाखों धागें जोड़ एक कपड़ा बुनते,
कितने सपनें कितने उम्मीदें साथ पिरोते।
उम्र का ताना-बाना, धागों की आवाजाही,
एक दूसरे का साथ ही जिंदगी की सच्ची कमाई।

- सुतपा घोष


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साथी का हाथ पकड़ कर चलना इसी को कहते हैं।
साथी धागे का एक सिरा है पकड़े, तो दूसरा सिरा स्वयं भी पकड़ ले।
जिंदगी की राह कितनी भी कठिन हो।
इस तरह साथ चलने से सफर जिंदगी का कट जाएगा।
- अनुरोध त्रिपाठी


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श्रम की डोर से जीवन संवारते, ताना-बाना रोज़ सजाते।
हुनर की अपनी सुंदर कहानी, बुनकर हैं संस्कृति की निशानी।

- बीना सेमवाल


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मिट्टी से बने घर में कला और संस्कृति देख रहा हूँ।
पगड़ी और माथे पर आँचल में अपना भारत देख रहा हूँ।

- राघवेंद्र प्रकाश 'रघु'


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ना महल, ना जाह-ओ-हशम , बस मिट्टी और हुनर का रिश्ता,
इस छोटे से बरामदे में भारत की असली विरासत देख रहा हूं।

- तौसीफ़ अहमद


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अपनी संस्कृति,अपना पहनावा, अपने प्राचीन रीति रिवाज
यहां है सादगी, मधुरता और रिश्तों की अनुपम मिठास

- प्रवीण कुमार


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धागे नहीं रिश्ते बुन रहे हम,
हो साथ तुम तो क्या है गम।।

- कुणाल


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बांस से बनी वस्तुएं का करता हूं निर्माण, रोजमर्रा के जीवन में आते जो काम।
मेहनत इसमें है बहुत लो जान, फिर भी ना मिलता है हमें उचित दाम।

- चुन्नू साह


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जो कर्म को जीते हैं, आखिर वो कब थकते हैं।
उम्र तो महज़ पड़ाव है, बुजुर्ग ही असल जुड़ाव हैं।

- डॉ. जितेन्द्र बोयल


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अपने जीवन के संघर्षों को धागों में पिरोकर,
हमारी आबरू के सुंदर वस्त्र बुनते हैं बुनकर।

- सूरजमल AkS


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जीवन के धागे सुलझा, संवार कर सजा रहा हूं-
ना थका हूं, ना हार मानी, बस खुद को बुनता जा रहा हूं।

- रोशन कुमार झा


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माटी की दीवारों में बसी है पुरखों की कहानी,
हाथों के हुनर से चलती चरखे की रवानी।
रंग-बिरंगी पगड़ी, लाल चुनर की छांव में,
राजस्थान की माटी बसी है हर एक गांव में।

- नरेंद्र मंघनानी


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हाथ में धागा

धूप-छाँव में बैठा, कर-कर हाथ में धागा,
आँगन में है पल रहा, युगों पुराना ढाँचा।

- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह


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खड्डी बुनकर पेट पालते हैं, अजीब कहानी है भाग्य की,
हाथों में छाले, आँखों में सपने, यही निशानी है भाग्य की।
रेशम औरों के तन पर सजता, हम तो धागों में ही उम्र बिता देते हैं।

- बाबू राम धीमान


*****