साहित्य चक्र

21 June 2026

काफल: उत्तराखंड के पहाड़ों से जुड़ी मेरे बचपन की मीठी यादें

उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में पला-बढ़ा मेरा बचपन प्रकृति की गोद में बीता है। गर्मियों के दिन आते ही हमें काफल के पकने का बेसब्री से इंतजार रहता था। खेतों के किनारे और जंगलों में लगे काफल के पेड़ हमारे लिए किसी खजाने से कम नहीं थे। स्कूल जाते समय, छुट्टियों में और खाली समय में हम अपने दोस्तों के साथ पेड़ों पर चढ़ जाते थे और घंटों काफल खाते रहते थे। उस समय न मोबाइल का आकर्षण था, न कंप्यूटर और न ही टीवी की दुनिया का प्रभाव। हमारा बचपन प्रकृति के साथ बीता और शायद यही कारण था कि हम शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ और मजबूत रहे।




हम केवल पके हुए काफल का ही आनंद नहीं लेते थे, बल्कि कच्चे काफल का स्वाद भी हमारे लिए किसी विशेष व्यंजन से कम नहीं था। दोपहर के समय जब घर के बड़े-बुजुर्ग आराम कर रहे होते थे, तब हम सब दोस्त चुपके से कच्चे काफल इकट्ठा करते। फिर सिलबट्टे में पीसे हुए नमक में थोड़ा सरसों का तेल मिलाकर उसके साथ कच्चे काफल खाते थे। उसकी खट्टी-तीखी स्वादिष्टता आज भी याद आते ही मन को बचपन की गलियों में पहुँचा देती है।





जब हम अपने माता-पिता के साथ उत्तराखंड के जंगलों में जाते थे, तब भी पेड़ों पर चढ़कर काफल तोड़ना और वहीं बैठकर खाना हमारे लिए सबसे बड़ा आनंद होता था। हमने इस प्राकृतिक फल को खूब खाया, लेकिन कभी इससे हमारी तबीयत खराब नहीं हुई। स्थानीय लोगों के अनुभव और कई वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार काफल में अनेक लाभकारी गुण पाए जाते हैं, जो स्वास्थ्य के लिए उपयोगी माने जाते हैं।


आश्चर्य की बात यह है कि अनेक शोधों के बावजूद आज भी काफल की व्यावसायिक खेती करना आसान नहीं हो पाया है। यह फल विशेष प्रकार की मिट्टी, ठंडी जलवायु और उत्तराखंड जैसे पहाड़ी वातावरण में ही अच्छी तरह पनपता है। शायद यही कारण है कि यह दुर्लभ होता जा रहा है और बड़े बाजारों में बहुत कम दिखाई देता है।


आज हम बड़े हो गए हैं। जीवन की भागदौड़ में वही काफल हमारे लिए एक दुर्लभ स्वाद बन गया है। आज भी जब स्कूल के पुराने मित्र मिलते हैं, तो बचपन की वही बातें छिड़ जाती हैं- पेड़ों पर चढ़ना, जंगलों में घूमना, कच्चे काफल को नमक और सरसों के तेल के साथ खाना और बिना किसी चिंता के प्रकृति के साथ जीना।


आज हम उसकी तस्वीरें देखते हैं और मन ही मन यही सोचते हैं- काश! उत्तराखंड के पहाड़ों में बिताए गए वे बचपन के दिन फिर लौट आते और हम एक बार फिर अपने दोस्तों के साथ पेड़ों पर चढ़कर उसी काफल का स्वाद ले पाते। मेरे लिए काफल केवल एक फल नहीं, बल्कि उत्तराखंड की मिट्टी की खुशबू, पहाड़ों की संस्कृति, दोस्तों का साथ और बचपन की अनमोल यादों का एक जीवंत हिस्सा है।


- बीना सेमवाल


आज की प्रमुख रचनाएँ- 21 जून 2026





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पिता ने सिखाया

सिखाया पिता ने यही सिखाया
हार जाना पर कभी भी हार नहीं मानना
हार जो मानोगे तो लड़ना भूल जाओगे
शत्रुओं से फिर कभी भी लड़ नहीं पाओगे
ग़ुलामी करोगे, ग़ुलाम ही कहलाओगे
सड़ा दिए जाओगे दलदली-यातनाघरों में
ज़रा भी पूछना नहीं पड़ेगा पता नरक का
नरक होगा पल-पल पूरा आमने-सामने
नहीं चाहोगे अंतत: फिर भी भुगतोगे
ऑंखें होते हुए भी मगर जान नहीं पाओगे
करोगे क्या ऐसा जातक जीवन पाकर
चाहोगे पर चाहकर भी मर नहीं पाओगे
सिखाया पिता ने यही सिखाया।


- राजकुमार कुम्भज


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दिल में दबाते हो दर्द को तुम, लवों पर क्यूँ लाते नहीं हो,
समंदर समेटे हो अश्कों का भीतर, आँखों से क्यूँ इन्हें बहाते नहीं हो।
हँसते रहते हो फीकी सी हंसी, नकाब क्यूँ हसी का हटाते नहीं हो,
चाहते हो बताना हर बात तुम, चाहकर भी क्यूँ मगर बताते नहीं हो।
दिल में दबाते हो दर्द को तुम, लवों पर क्यूँ लाते नहीं हो।

कशमकश बहुत है भीतर-भीतर, बाहर क्यूँ इसे लाते नहीं हो,
आँखे बंद करके करते हो इबादतें, मंदिर मस्जिद क्यूँ जाते नहीं हो।
लाख पूछने पर भी हमें तुम, बात दिल में दबी क्यूँ बताते नहीं हो,
झुकी नज़रों से देखते हो तुम, नज़र से नज़र क्यूँ मिलाते नहीं हो।
दिल में दबाते हो दर्द को तुम, लवों पर क्यूँ लाते नहीं हो।

गहरी किसी ठोकर से घायल हो तुम, जख्मों को क्यूँ दिखाते नहीं हो,
महफ़िल में भी रहते हो गुमशुम, वजह क्यूँ इस चुप्पी की बताते नहीं हो।
गुनगुनाते हो तन्हाई में बहुत, राग-ए-दिल क्यूँ महफ़िल में गाते नहीं हो,
आ जाने दो आँधियों को एक बार तुम, उठते तूफानों को यूँ दबाते नहीं है।
दिल में दबाते हो दर्द को तुम, लवों पर क्यूँ लाते नहीं हो।


- धरम चंद धीमान



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इतनी सी जिंदगी

दो जून की रोटी,
दो कपड़े,
दो ईंटों का घर,
दो मीठे बोल,
दो कदम हमसफ़र
दो पल का चैन-
बस इतनी सी तो होती है ,
दो दिन की असल जिंदगी।


- रोशन कुमार झा



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बड़ा बड्डीखणा बी खरा नी हुन्दा
एड़ा गल्लांन्दे आए स्याणे,
कर ले सब्र, जे आई ख़बर
फेरी बादा बिच पऊंणा पच्छ्ताणे

ओच्छे बणी कन्ने, कुछ नी मिलदा
चार दिना री हुन्दी बड्डीयाई,
फेरी नी पूछदा कोई भाईयों
याद आऊँदी फेरी अपणी कमाई,

ओच्छे अपणा, ओच्छपण नी छड्डदे
चाहे बादा बिच पओ पच्छ्ताणे,
चौहट्टे-चबारे फेरी गल्लां लगदिया
लोक हंसदे,तान्ने कसदे, याद आऊँदे फेरी स्याणे,

अक्कड़ बुरी, अकड़ना तिस दे बी बुरा
न मिलदा कुछ कुसी जो, ना ई आऊँदा पूरा,
कर सुरत, रह नीठा,छड्ड दे बड्डीखणा ओ बन्देया
निवां बणी कन्ने चल, आई नी पऊणा पच्छ्ताणे,

गल्लां हुंदियाँ सच्चीयाँ, लोक बणादें ख्वाणे
जीभा ज़बानी ये गल्लां चड़दियाँ स्वाद कोई क्या जाणे ?
कर ले अम्ल, बान गठ्ठी, याद आऊँदे फेरी स्याणे
रसभरूरिया ये गल्लां लोकों, कीमत कोई क्या जाणे ?


- बाबू राम धीमान



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-पिता कब अच्छे दोस्त बन गए... पता ही नहीं चला!

बचपन में जिनसे सबसे ज़्यादा डर लगता था,
आज उन्हीं से हर बात कहने का मन करता है।

जो कभी कहते थे- "इतना मत हँसो..."
"समय पर घर आना..." "पढ़ाई पर ध्यान दो..."
तब लगता था, ये सिर्फ़ रोकते-टोकते हैं।
लेकिन समय ने धीरे-धीरे बताया...
वे रोक नहीं रहे थे,
वे जीवन की ठोकरों से बचा रहे थे।

एक उम्र के बाद एहसास हुआ कि
पिता के पास हर सवाल का उत्तर नहीं होता,
लेकिन हर मुश्किल में कंधा ज़रूर होता है।

अब उनसे बातें होती हैं... कभी व्यापार की,
कभी परिवार की, कभी जीवन की,
और कभी बिना किसी वजह के भी।

अब समझ आता है, वे केवल पिता नहीं,
मेरे सबसे सच्चे, सबसे मौन और
सबसे भरोसेमंद दोस्त हैं।
दोस्त वह नहीं जो हर बात पर "हाँ" कह दे,
दोस्त वह है जो आपकी भलाई के लिए
ज़रूरत पड़ने पर "ना" भी कह सके।

शायद इसी लिए... पिता पहले अनुशासन बने,
फिर सहारा बने, और एक दिन...
पता ही नहीं चला कि वे सबसे अच्छे दोस्त बन गए।

जो लोग आज भी अपने पिता के साथ
बैठकर दो पल हँस सकते हैं,
उनसे अधिक अमीर शायद ही कोई होगा।


- नरेंद्र मंघनानी


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बीत गए वह दिन पर उनकी यादें पास हैं,
दूर हो तुम पर तुम्हारी यादें पास हैं।

हर वक्त मुझे याद आती है तुम्हारी,
तुम्हारे वापस आने की खास है,

मैने हमेशा तुम्हें याद किया है,
इसलिए शायद बस यादें पास है,

तुम्हारा जिस्म नहीं है मेरे पास,
पर तुम्हारे होने का एक एहसास है,

कई समय से मैं रह रहा हूं अकेला,
अकेलेपन से लड़ने का मुझे अभ्यास है,

जब हम पहली बार मिले थे,
तब से तुम्हारी धड़कन मेरे पास है,

तुम दिया थी मेरी जिंदगी की,
पर अब दिया- बत्ती नहीं बस प्रकाश है,

शाम को घर की ओर जाने लगता हूं,
घर पर तुम देखोगी ये आस है,

मैं तो कब का दफन हो जाता,
वह तो तुम्हारी यादें मेरे पास हैं,

साथ हमारा कभी छूट नहीं सकता,
तुम हो वहां पर दिल मेरे पास है,

हमारी कुछ बातें अधूरी रह गई,
उनके पूरे होने की आस है,

तुम्हें देखूं तो ग़ज़ल बन जाए,
पर अब यह कागज एक लाश है,

तुम गई तो स्याही भी ले गई,
पर फिर से लिखूंगा ग़ज़ल ये आस है,

कुछ यादें हमेशा साथ में रह जाती हैं,
जैसे तुम्हारी मेरे पास है,

रात को कमरे में बैठे गुनगुनाता हूं,
तुम्हारे लिए लिखे गीत आज भी पास हैं,

तुम्हे आज भी रोज देखता हु,
तुम्हारी तस्वीर आज भी पास है,

तुम जब आई थी मेरी जिंदगी में,
वह पल आज भी खास है,

इसीलिए तो जिंदा है "राज",
तुम्हारी यादें अभी भी पास है।


- प्रणव राज


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व्यक्तित्व

व्यक्तित्व केवल रूप नहीं,
न ही वाणी का श्रृंगार।
यह तो अंतर्मन की सुगंध है,
जो देती जीवन को आकार॥

विपदा में जो धैर्य रखे,
सफलता में रहे विनीत।
वही व्यक्तित्व उज्ज्वल होता,
जिसके भाव रहें संगीत॥

सत्य, करुणा, प्रेम और सेवा,
जिसके जीवन का आधार।
उसके पदचिह्नों से महके,
धरती, अम्बर और संसार॥

चमक नहीं पहचान बनाती,
न ही ऊँचे पद का मान।
व्यक्तित्व वही श्रेष्ठ कहलाए,
जो जीते सबके हृदय-प्राण॥


- डॉ. सारिका ठाकुर 'जागृति'


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शिकायत

वह कभी प्रेम का इज़हार नहीं करता था,
पर शिकायतों का कोई अवसर नहीं छोड़ता था।

तब समझ में आया,
कभी-कभी प्रेम शब्दों में नहीं,
इसी तरह की शिकायतों में रहता है।

एक दिन न दिखूँ,
तो वह दो दिन गायब हो जाता।
उससे शिकायत करती,
तो बड़ी सहजता से कहता
"पहले तुम तो उस दिन नहीं दिखीं थीं।"

उसकी हर नाराज़गी में
मेरा हिसाब छिपा होता था,
और हर शिकायत में
एक अनकहा अधिकार।

शायद प्रेम हमेशा
"मैं तुमसे प्यार करता हूँ" नहीं कहता,
कभी-कभी वह शिकायतों का लिबास पहनकर भी
हमारे पास आ बैठता है।


- सविता सिंह मीरा


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मेरा पहला प्यार है तू...
हां! तुझसे ज्यादा मैं
पिता से प्यार करता हूं।
मगर तेरी हिफाजत
और सम्मान से
कोई नहीं खेल सकता,
जब तक मैं जिंदा हूं।
तेरे लिए मैं सारे
जगत से लड़ सकता हूं।
हां! गुस्सा होता हूं तेरे से...
कभी लड़ लेता हूं तेरे से...
मगर तेरा अंश हूं तेरे से
बड़ा थोड़ी हो सकता हूं।
तेरे दूध का कर्ज थोड़ी ना
मैं अदा कर सकता हूं।


- दीपक कोहली



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दिव्या अनुराग

जन्म जमांतर की मेरी
अतृप्त इच्छाएं
मुझे छूने लगी है।

देख कर तुमको
मुझ में प्रेम जिज्ञासा
फिर उत्पन्न होने लगी है।

तुम्हारे अस्पर्श अहसास
मेरे सहस्रार को
जागृत करने लगे है।

न चाहते हुए भी
मेरे अनाहत में
तुम्हारे स्वर को गूंजने लगे हैं


- डॉ. राजीव डोगरा



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ज़िन्दगी कटी है

जितनी भी ज़िन्दगी कटी है सब तेरे नाम
बुरा किया अच्छा किया है सब तेरा काम
जैसी बुद्धि दी तूने है उसी का परिणाम
अपने कर्मों का फल भुगतेगा क्यों बन रहा अनजान

जिंदगी में किससे मिलना है तुझे नहीं मालूम
किससे मिलाना है यह वही तय है करता
मालूम है तुझे कि जाना पड़ेगा एक दिन खाली हाथ
मोहमाया में फंस गया जाने से बहुत है डरता

बने बनाये खेल को बिगाड़ना
या बिगड़े हुए खेल को बनाना
किसी के हाथ में तो कुछ भी नहीं
अपनी मर्जी से आता है उसको नचाना

कभी करता है वह दिल्लगी
कभी उपहास है उड़ाता
भटकाता है अकेली राहों में
तो फिर राह भी है दिखाता

जिंदगी को जो यूं ही तमाम कर दिया
जिसने दिया सब कुछ उसी को बदनाम कर दिया
अवसर जो मिले आगे बढ़ने के उन्हें गंवा बैठा
दूसरों का जीना भी हराम कर दिया


- रवींद्र कुमार शर्मा


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मौत सच है रहेंगे सदा हम नहीं।
जीने का भी यहाॅं पे मज़ा कम नहीं।।

ज़िंदगी चार दिन की जियो शान से।
बाटो खुशियाॉं जहाॉं में मगर ग़म नहीं।।

ज़ुल्म सहते रहे उनके हॅंसते हुए।
रोए ऐसे की ऑंखें हुई नम नहीं।।

ज़ेहनी कमजोर जो लड़ते फिरते हैं वो।
गुस्से में कांपते जिनके कुछ दम नहीं।।

जंग बल से नहीं तुम लड़ो अक़्ल से।
नज़रें दुश्मन पे हों ये मगर ख़म नहीं।।

चढ़ने के बाद जल्दी न उतरे मिरी।
फूल महवे की पीता कभी रम नहीं।।

लोग क्यूॅं डर रहे देख मुझको निज़ाम।
ठर्रा बोतल में है ये कोई बम नहीं।।


- निज़ाम फतेहपुरी



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16 June 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 17 जून 2026





अनुराग चंद्रिका

विरह-विपिन में भी सदा, रखती मधुर प्रकाश।
टूटे मन के द्वार पर, लिखती नव विश्वास॥

नयनों की निस्तब्धता, पढ़ ले पल में आह।
बिन बोले ही बाँट दे, स्नेहिल मन की चाह॥

ज्यों चंदन की गंध हो, ज्यों सरिता का नीर।
वैसी ही अनुरागिनी, हर ले मन की पीर॥

ममता के आकाश में, प्रेम-पंख ले खोल।
अनुरागों की चंद्रिका, भर दे मधुमय बोल॥

द्वेष-धुआँ जब घेर ले, जग का कोना-कोन।
प्रेम-दीप बन जल उठे, इसका उज्ज्वल मौन॥

रिश्तों की इस भीड़ में, जहाँ स्वार्थ का शोर।
अनुरागी चंद्रा कहे, प्रेम रहे सिरमौर॥

जीवन की संध्या तले, जब थक जाए प्राण।
चंद्रिका बन साथ दे, बनकर मधुर विधान॥

प्रेम न केवल प्राप्ति है, प्रेम स्वयं उपहार।
जिसने इसको जान लिया, उसका बेड़ा पार॥


- शशि धर कुमार


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आँखें हो रही शर्मसार

आधुनिकता की कैसी बह रही बयार।
उड़ गई मर्यादा की यहाँ पे संसार॥
आधुनिकता की दौड़ में हारा संस्कार।
शर्म से झुक गई आँखें, हो रहीशर्मसार॥

फैशन ने खोल दी है नई नई बाजार।
अर्धनग्न परिधान की छाई है बहार॥
गर्व में चूर है बिकनी की वो दरबार। 
शर्म से झुक गई आँखें, हो रही शर्मसार॥

दौलत की नशे में चूर है जिनका परिवार।
पश्चिमी सभ्यता की कर रहे वो     प्रचार॥
भारतीय सभ्यता हुई  समाज में तार तार।
शर्म से झुक गई आँखें , हो रही शर्मसार॥

 भूल गया अपना वजूद  अपना व्यवहार।
नकल में पागल है जग के युवा  बेरोजगार॥
भारतीय चलचित्र भी है आज गुनहगार।
शर्म से झुक गई आँखें, हो रही शर्मसार॥

गलत परिवेश की खुल गई  आज द्वार।
ओछी संस्करण  की चल गई  व्यापार॥
किस को दोष दूँ मैं ओ  परवरदिगार ।
शर्म से झुक गई आँखें, हो रही शर्मसार॥


- उदय किशोर साह


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कुछ पूछिए मत…
कहा आपने,
"पूछिए नहीं,
बस मेसेंजर में अपनी कविता भेज दीजिए…"
तो लीजिए,
प्रश्नों का बोझ नहीं लाया हूँ,
बस मन की कुछ धड़कनें
शब्दों में सजा लाया हूँ।
अगर पसंद आए,
तो मुस्कुराकर पढ़ लीजिए,
न आए पसंद,
तो हवा के संग उड़ जाने दीजिए।
कविताएँ ज़बरदस्ती
दिलों में नहीं उतरतीं,
वे तो चुपके से
आत्मा के द्वार खटखटाती हैं।
मैं तो केवल
भावों का एक यात्री हूँ,
शब्द मेरी पोटली हैं,
और प्रेम मेरी पूँजी।
यदि मेरी पंक्तियों में
आपको अपना ही कोई एहसास मिल जाए,
तो समझूँगा,
मेरी कविता ने
अपना घर पा लिया।
क्योंकि…
कविता पढ़ी नहीं जाती,
महसूस की जाती है;
और जिसे महसूस कर लिया जाए,
वह शब्द नहीं,
एक मौन संवाद बन जाती है।


- नरेंद्र मंघनानी


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पापा को आराम चाहिए

सुबह तड़के से उठ जाते हैं,
नाश्ता भी नहीं खाते हैं,
दिन भर लैपटॉप पर खट खट करते-करते,
रात को थकान से टूट जाते हैं।

रविवार के दिन भी काम निपटाने में बच्चों के साथ नहीं खेलते हैं,
रात दिन सुबह शाम बॉस के नखरे झेलते हैं,
नींद न पूरी होती तो,
कुर्सी पर बैठे-बैठे झपकियां लेते हैं।

रोजमर्रा की कशमकश से दूर जाने का,
परिवार के संग बैठकर खाने का,
मन तो बहुत करता होगा उनका,
शारीरिक और मानसिक सुख पाने का।

माना, कि काम करने से पैसे आते हैं,
अगर पैसे कमाने में पापा अंदर से टूट जाते हैं,
तो लात मारो ऐसे पैसे को,
जिसके लिए पापा हमसे दूर जाते हैं।

पापा को थोड़ा आराम चाहिए,
दिन भर की भाग दौड़ से विश्राम चाहिए,
जीवन भर दौड़ते हैं वो,
उन्हें थोड़ा सा विराम चाहिए।


- प्रणव राज


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हत्था किस्मत

नवें नवें बने प्रधाना मेम्बरां जो बधाई,
तिने जे लोकां रे अणमूल्ले वोटा री दात पाई।

हूण सारे जितने वाले इसा गल्ला रा रख़्यो ध्यान,
बेकार ना जाए किसी रा मतदान भाई।

हूण मलेखा नी करना,सब्बी रा करना मान,
किन्ने वोट दित्त्या मिजों किन्ने नी वोट पाई।

हूण सारे इलाके री डोर इ तुसांरे हत्थ,
से जे किते रे वादे तीनां जो रखयों चेते भाई।

एडा नी बोलना की पंचायता च पैसा ई निया,
ऐ पुराने सड़ी रे बहाने नी लाणे मेरे भाई।

जियां जे कित्या था प्रचार जोरा शोरा कने,
तेड़े जोरा शोरा कन्ने कम्मा रा रखना चेता भाई।

ऐ इलेक्शन पंजा पंजा सालां री बारी नी,
लोकें तुसा रे हत्था अपनी किस्मत दिती थमाई।


- राज कुमार कौंडल


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अब आम ख़ुद ही गिरते हैं...

होता था कभी ऐसा भी सवेरा,
हर सुबह उसके साये में बच्चों का डेरा,
पत्थर-डंडियों की सड़सड़ाहट पे,
हर डाल झूमते देख ये नज़ारा।
अब वो कलरव को हर डाल तरसते हैं...
अब आम ख़ुद ही गिरते हैं...

गिलहरी-चिड़ियों का साथ तो आज़ भी है,
पर मोटी डाल में लगा झूला कहां गया ?
तरक्की की होड़ ने उजाड़ा आंगन,
उसकी छांव का वो मेला कहां गया ?
गर्मियों के दोपहर अब अकेलेपन पे हंसते हैं...
अब आम ख़ुद ही गिरते हैं...

नीड़ों पर झूलते नौनिहाल अब,
फुर्सत नहीं कब धमा-चौकड़ी करें।
मोबाइलों से फुर्सत मिले तब तो,
आम की थोड़ी-सी फिकर करें।
बोझिल फलों की टहनियां,
अब नाउम्मीद रहते हैं...
अब आम ख़ुद ही गिरते हैं...


- कुणाल


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विसंगति

कोई
लूट कर
भी नहीं अघाता,
किसी
की सारी
पूँजी जा रही।
बड़े
शौक से सजाया
था आलीशान आशियाना,
पर
जिंदगी बनकर
रिफ्यूजी जा रही।
माना
विरोधाभाषों में
तालमेल से जिंदगी
आगे बढ़ने का रास्ता देती है,
पर
किसी की ठोकरों में
समंदर खुद पनाह माँगता है,
मगर
कहीं कहीं प्यास की खातिर
एक एक बूँद पूजी जा रही।


- राधेश विकास


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संशय से भरी, प्रेम निवेदन

कोई थी.. लेकिन अभी नहीं है,
पास है, लेकिन दूर कहीं है,
कभी गलत थी, लेकिन अब सही है
महसूस होता है, यहीं कहीं है ।

मन है मिलने का, लेकिन भय है
कुछ तो अभी भी संशय है
पता नहीं कैसा महसूस होगा
दिल मे यही बात का मची प्रलय है।

लेकिन मिलना तो अब होगा ही
जो भी सोचने का है, वो सोचेगा ही
अब भय रखकर मन मे, दूरी कैसा ?
जीवन उसके बिना भी चलेगा ही।

बस यही सोचकर आ जाना है,
सारे गिले शिकवे भूला देना है,
ये नश्वर तन का भरोसा नहीं है,
कभी भी त्यागना, आ सकता है।

कह देंगे सुनो मेरी अर्जी,
पहले जैसा बनो या बना लो दूरी,
मेरे तरफ से मिट गये सारे शिकायत
अब रखो चाहे ना रखो, जो मर्जी।


- चुन्नू साहा


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आधा अधूरा

अनपढ़ मन से,
जब कभी पहचानने लगूंगी
अक्षरों की आकृति,
समझने लगूंगी शब्दों की मूक भाषा,
जब होने लगेगा मात्राओं का ज्ञान,
पढ़ना सीख जाऊंगी शब्दों के भाव
जब मुझमें आ जाएंगीं
संवेदना और भावनाएं,
हृदय करेगा प्रकृति से संवाद,
तब मैं एक पुस्तक लिखूंगी...
पुस्तक में लिखूंगी जीवन का सार,
जन्म से मरण तक का क्रम,
मोह से त्याग का अनुबंध,
प्रेम और वियोग
वियोग और मृग मरीचिका
धड़कन और हृदय का द्वंद्व
वह बहुत सी बातें जिन्हें कोई
समझ ही नहीं पाया।
कोई समझ भी गया तो
शायद लिख नहीं पाया
लिखूंगी वह बहुत कुछ
जो हमेशा आधा अधूरा रहा।
जो अधूरा रहकर,
कलम के लिए
अनगिनत सवाल छोड़ गया।


- मंजू सागर


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आस

एक आस में जी ली जिंदगी,
सोचा जीवन मिला है अच्छी काटेगी,
पर बचपन गुजरा बेहतर से बेहतर,
उसके बाद पिसी और घिसी है जिंदगी,
किसी तरह जी है जिंदगी बस एक आस में,
बस अधूरी आस में गुजार दी एक लंबी उम्र,
सोचा कुछ ठहराव आएगा एक आस में,
बिखरी कई बार आस मेरी रुकी है ये साँस मेरी,
पर अपनी एक आस में गुज़ार दी लम्बी जिंदगी,
बहुत कुछ खोया एक आस में बहुत कुछ पाया एक आस में,
पर रही आधी-अधूरी ज़िंदगी अनगिनत आस लिए,
शायद किस्मत में आस की आशाएँ लिखी थी,
बहुत इंतज़ार की आस में सारी आशाएं लिखीं थी किस्मत में,
कई खुशियां एक साथ मिल गई
लगा सारे जन्मों को जी लिया
हर आस में...!

- सुमन डोभाल काला


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बदलते समय की आस

एक ही घर की छाँव तले,
बैठे हैं अपने पास-पास,
दो ने थामी ज्ञान की पुस्तक,
दो को भाया स्क्रीन का प्रकाश।

पुस्तक के पन्नों में डूबे,
कुछ मन खोजें नया विचार,
मोबाइल की जगमग दुनिया में,
कुछ खो बैठे अपना संसार।

एक ओर शब्दों का सागर है,
एक ओर क्षणिक आकर्षण जाल,
एक देता चिंतन की गहराई,
एक रखता मन को बेहाल।

ज्ञान वहीं है जहाँ मन ठहरे,
जहाँ विचारों का हो विस्तार,
माध्यम चाहे कोई भी हो,
उद्देश्य बने जीवन का सार।

भूले रिश्तों की यह व्यथा
कहीं पुस्तक, कहीं मोबाइल का संसार,
पर सबसे बढ़कर प्रेम और संवाद,
यही है जीवन का सच्चा आधार।


- डॉ सारिका ठाकुर 'जागृति'


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फूल

फूल ने मुस्कुराते हुए कहा,
मैं काँटों के साथ रहता हूँ,
मेरा जीवन बहुत कठिन है,
फिर भी खुशबू बिखेरता हूँ।
तब मैंने हँसकर कहा,
तुम्हारी तरह मेरा भी जीवन है,
अभी मैं एक छोटा-सा बच्चा हूँ,
धीरे-धीरे बड़ा हो जाऊँगा।
अपनी खुशबू से सारा जहाँ महकाऊँगा,
सबके जीवन में प्रेम जगाऊँगा,
फिर जीवन के आखिरी दिनों में,
भगवान के चरणों में रहूँगा।
और अंत में एक दिन,
तुम्हारी ही तरह मिट्टी में मिल जाऊँगा,
पर अपनी खुशबू से लोगों के दिलों में,
सदा के लिए बस जाऊँगा।


- गरिमा लखनवी


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ओलम

जी रहा हूँ जीवन
बड़ी ही शिद्दत से
क्या मेरी पीड़ा का
कारण बन तुम
मुझे शून्य करोगे ?

हारा तो कभी
था ही नहीं मैं
पर क्या छेड़
मेरे जज्बातों की तरंगों को
मुझे तुम अधूरा करोगे?

मानता हूं तुम्हें
भेजा है उस खुदा ने
स्वयं मेरे पास
क्या छेड़ प्रेम का राग
मुझे हीरा करोगे ?


- डॉ. राजीव डोगरा


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दूर हो बहुत घर की याद तो आती होगी

बाहर ही मिलता है सब कुछ
यह नासमझी की हैं बातें
अमेरिका और कनाडा की रातों से
हैं सुंदर मेरे भारत की रातें

क्या वहां मिलेगा जो यहां नहीं मिलता
देखा है बहुत ऊंचा उड़ने का सपना
वह रिश्ते मां बाप का प्यार नहीं मिलेगा
जिसके लिए छोड़ दिया घर अपना

दूर हो बहुत घर की याद तो आती होगी
सपनों की दीवार बीच मे आ जाती तो होगी
मिलता होगा जब कोई हमवतन तो
याद वतन की बहुत आती तो होगी

गांव खेत खलिहान दोस्त सब पीछे छूटे
दूर हुए भाई बंधु रिश्ते नाते सब टूटे
देखते रहते हैं राह बूढ़े माता पिता तुम्हारी
निकले खून के सब रिश्ते भी झूठे

आती होगी याद वह गांव की हवा ठंडी ठंडी
कहां भूलती होगी वह पहाड़ी से जाती पगडंडी
न कोई दोस्त न कोई अपना है विदेश में
याद तो आती होगी शाम को लगती दोस्तों की वह मंडी

आ जा विदेश छोड़कर तुझको धरती तेरी पुकारती
पत्थरा गई हैं बूढ़ी आंखें तेरी राह निहारती
पराए हैं लोग वहां कोई नहीं है अपना
कैसे भूला उस मां को जो आने पर तेरी आरती थी उतारती


- रवींद्र कुमार शर्मा


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सिंदूरी स्वप्न

पलकों में जो छुपा हुआ था,
वह पैगाम सुनहरा है।

आज खुला है राज हृदय का,
रंग यह बेहद गहरा है।

अधरों का वह मौन समर्पण,
आज विवश होकर बोला

चुपके से सदियों का सावन,
इस सूने आँगन डोला।

माँग सजी जब लाल रेख से,
मन का दर्पण मुसकाया।

जिसको केवल चाहा दिल ने,
उसको अपने सम्मुख पाया।


- सविता सिंह मीरा


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