साहित्य चक्र

02 June 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 03 जून 2026






खुशी

खुशी मन-मंदिर की
मृदुल ज्योति है,
जो अंधियारे के आवरण को
हटा जाती है,
न यह ऊपरी हँसी का
कोलाहल है,
बल्कि हृदय की गहराइयों में
गूँज जाती है।
धन, वैभव, क्षणिक अभिलाषा,
इन सीमाओं में बॉधी नहीं
खुशी की परिभाषा ।
यह तो संतोष के
सागर की लहर है,
जो अंतर्मन से कभी
थमती नहीं है।
जब मन अपेक्षाओं के
बंधन त्याग जाए,
और वर्तमान में अपना
अस्तित्व पा जाए,
तब हर श्वास, हर धड़कन,
हर क्षण में,
खुशी स्वयं ही आत्मस्वर
बन गूँज जाए।


- अदिति त्रिपाठी


*****


सहारा

एक सहारा अपना भी हो,
अपना बस हो इक किनारा,
सब कुछ खोकर भी पाऊँ उसमें,
अपने मन मंदिर का एक ठिकाना,
करू वंदना आरती गाऊँ,
सारी दुविधा क्षण भर बिसराऊँ।

नयी सुबह की नयी भोर हो,
नयी किरन का नया शोर हो,
उजियारो से रहे वो जगमग,
खुशियो से भरे हो भाव हतप्रत,

खोकर भी जिसमे खो न पाऊँ,
मन में सागर सी गहराई लाऊँ,
रहे न वेदना की एक भी बदली,
झूमे, नाचे गाए मन बन पगली।
एक सहारा अपना भी हो
अपना बस हो इक किनारा।


- दिव्या


*****


हर एक की आवाज़

दिल्ली से आई दिल में आशा लिए,
कि घूमेंगे और इस पल को यादगार रखेंगे।
पर वो बेचारी अनजान सी,
कि ये उसका आखिरी पल होगा।

मौसम सुहाना था,
सबने नाव की सवारी ली।
सब लोग इस पल को जी रहे थे,
अपनों को ये सुंदर नज़ारा दिखा रहे थे।

पर वक्त ने अचानक से मोड़ लिया,
सुहाना मौसम एक तूफान में तब्दील हुआ।
उस तूफानी बेमान मौसम ने,
नदी की लहरों ने एक रौद्र रूप ले लिया।
अचानक से नाव पलट गई।

सब लोग चीखने और चिल्लाने लगे,
एक नाव में थी माँ की ममता,
और उसका 4 साल का बच्चा।
वो बच्चा जिसने सही बोलना भी ना सीखा।

वो बच्चा इतना डर गया,
कि बस रोते-रोते बोल दिया 'माँ मुझे तुम बचा लो'।
उसकी माँ अपने बच्चे को,
अपने सीने से लिपटा रखा।

उस माँ ने अपने लाल को छोड़ा नहीं,
पर उस तूफान और लहरों ने,
उस बेचारी माँ की एक ना सुनी।

माँ ने अपने बच्चे को,
बचाने की तो पूरी कोशिश...
पर उस भगवान को कुछ और ही मंज़ूर।

उस माँ की ममता हार गई,
तूफान और लहरें खामोश हो गईं,
उस एक पल में 7 लोगों की मौत हो गई।

अब ये गलती किसकी है?
क्यों नहीं पहुँची Rescue Team?
कहाँ थे वो लोग?`
क्या इन लोगों को,
बैठाने का पैसा मिलता है?
क्या कर रही NDRF Team?
कहाँ से लाएगी उन 7 लोगों को ?


- आयुषी यादव


*****


मरने से रिश्ते मरा नहीं करते

जिस्म के मर जाने से रिश्ते मरा नहीं करते
घड़े में छेद हो जाये तो घड़े भरा नहीं करते
रूह निकल जाती है चोला बदल जाती है
मन में जिसके सच्चाई वह झूठों से डरा नहीं करते

बेईमान हमेशा ऊंचा बोलकर करता है डराने की कोशिशें
ईमानदारी पर जो चलते है वह अक्सर लड़ा नहीं करते
पत्थर कूट कूट कर जो पेट पालते हैं परिवार का
अडिग रहते हैं वो अपनी जुबान से फिरा नहीं करते

बारिशें आंधियां तूफान कितने आ जाएं
हौसले वाले कभी जीवन में डरा नहीं करते
नेकी की राह पर करते जो मानवता की सेवा
रहते हैं दिलों में वो कभी मरा नहीं करते

मरना तो सबका निश्चित है एक दिन
फिर क्यों नहीं गलत काम से हैं डरते
कर्मों का फल तो भोगना पड़ेगा सभी को
अच्छा फल वही पाएंगे जो कर्म अच्छे हैं करते

कोई नहीं रोक सकता मंजिल पाने से उनको
जो कांटों की राह पर हैं सफर करते
लोग करते हैं याद उन्हीं को जो कर जाते हैं कुछ अच्छा
शरीर से बेशक मर जाते हैं वह पर रूह से कभी नहीं मरते


- रवींद्र कुमार शर्मा


*****


फिर एक दिन

और फिर एक दिन
ज़िम्मेदारियाँ
उम्र से बड़ी हो जाती हैं।
और फिर एक दिन
घर का आँगन
सपनों से छोटा पड़ जाता है।
और फिर एक दिन
रोज़ी-रोटी की राहें
बेटों को शहरों तक ले जाती हैं।
और फिर एक दिन
माँ की आँखों का इंतज़ार
दरवाज़े पर ठहर जाता है।
और फिर एक दिन
पिता की आवाज़ में छुपा अपनापन
फ़ोन की घंटियों में सिमट जाता है।
और फिर एक दिन
दो शहरों के बीच
सिर्फ़ दूरी नहीं,
थकान भी बस जाती है।
और फिर एक दिन
त्योहार तारीख़ों में रह जाते हैं,
और परिवार
तस्वीरों में मुस्कुराता है।
और फिर एक दिन
बचपन का वो घर
सबका होकर भी
किसी का नहीं रह जाता।
और फिर एक दिन
समझ आता है,
कमाने की दौड़ में
हमने साथ बिताने वाला समय
कहीं पीछे छोड़ दिया।
और फिर एक दिन
दिल चुपचाप
वापस उसी आँगन में लौटना चाहता है,
जहाँ बिना वजह भी
अपनापन मिला करता था।


- नरेंद्र मंघनानी


*****


भारत को महान बनाना है
हर तरफ भ्रष्टाचार है,
बढ़ता जा रहा अनाचार है
कहीं अत्याचार है
तो कहीं व्यभिचार है
फिर भी मेरा भारत महान
है हम भारतवासी
पर विदेशी पहनावे,
विदेशी रहन-सहन
विदेशी संस्कृति से ही
जाने हमें क्यों प्यार है
फिर भी मेरा भारत महान
पश्चिम की नकल में
तन पर वस्त्र कम होते जा रहे
नग्नता का फूहड नाच
अब तो प्रत्यक्ष दिख रहा
फिर भी मेरा भारत महान
नेता भूले हैं देश और देशहित
देशसेवा का भाव नहीं
नेता अब प्रजापालक नहीं रहे
निजहित ही साधने में लगे हैं
फिर कैसे हो
मेरा भारत महान
कोई लड़ रहा
जाति के नाम पर
कोई धर्म के नाम पर
कोई भाषा के नाम पर
कोई क्षेत्र के नाम पर
फिर भी मेरा भारत महान
गुणवत्ता की किसे परवाह है
स्वहित साध लिया जाये
तो देश से क्या लेना देना
तभी टैलेंटेड भी जा रहे विदेश
फिर भी मेरा भारत महान
निश्चित रूप से
हमने श्रेष्ठ चिंतन को छोड़ा है
अवनति की ओर
अपने जीवन को मोडा है
निकृष्ट हो गए हैं हम
अपनी संस्कृति को कर आत्मसात
विकृत सोच एवं तुच्छ मनोवृति से
हर भारतीय को बचाना है
हमें भारत को महान बनाना है।


- प्रवीण कुमार


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नहीं होती

चाँद देखे बिना मेरी रात नहीं होती,
मन नहीं लगता जब बात नहीं होती!

एक अजनबी पर इतना ऐतबार क्यों है,
मोहब्बत की ऐसे तो शुरुआत नहीं होती!

पूरा दिन गुज़ारना हो जाता है मुश्किल,
तड़पते हैं हम यदि मुलाक़ात नहीं होती!

कैसे कहें कितनी चाहत है इस दिल में,
कभी-कभी किस्मत भी साथ नहीं होती!

दिल धड़कता है तो बादल ग़रज़ते हैं,
यूँ ही बिन मौसम, बरसात नहीं होती!

इश्क़ का मजहब नहीं जान पाया कोई,
क्योंकि प्यार की कोई जात नहीं होती!

तुम अगर दे देते, ज़रा सा साथ हमारा,
जिंदगी में हमारी कभी मात नहीं होती।


- आनन्द कुमार


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अगर मैं फिर से शुरू करूँ ?

अगर मै फिर से शुरू करूँ, नयी जिंदगी संग तेरे ?
तो बोलो, साथ दोगी ना इस बार तुम मेरे ?
बीते दिनों की बातें भुलाकर, हम दोनों ही साथ आएँ।
फिर से एक नयी जिंदगी शुरू कर एक दुजे को अपनाएं।
जहाँ मैं नहीं बल्कि हम दोनों का ही होगा सम भाव
हमारे बीच किसी अन्य जन का नहीं रहेगा प्रभाव ।
हम दोनों ही मिलकर, हर एक सुख-दुख को बाँट लेंगे,
कसम से, हमारी ये नयी जिंदगी में अन्य का ना सुनेंगे ।
हाँ कह दो ना तुम एकबार, मुझे तेरे ही संग है अब रहना
अगर मैं फिर से शुरू करूँ तो, तुम भी साथ मेरा देना।


- चुन्नू साहा


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नया सवेरा

जिंदगी की शाम से निराश न हो,
वह जीवन क्या जिसमें सफलता की प्यास न हो,
अंधकार में रोशनी खोजने की ताकत है तुझमें,
वह योद्धा क्या जिसके बदन पर फटा लिबास न हो।

जीवन में से अंधकार भी जाएगा,
तू अपनी वीर गाथा भी गाएगा,
अपने से बुराइयों को दूर कर,
सूर्य उभरेगा अंबर से नया सवेरा भी आएगा।


- प्रणव राज


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साहब की नौकरी और जलेबी का स्वाद

तैयारी के उन दिनों में, हम भी कैसे शेर थे,
लगता था कि बस हम ही, इस दुनिया के कुबेर थे।

ख्वाबों में आता था ऑफिस, जैसे स्वर्ग का द्वार हो,
और अपनी कुर्सी विष्णु जी के, बिल्कुल अगल-बगल यार हो!

सोचा था जब बनके साहब, केबिन में हम बैठेंगे,
नीचे चलते 'मानुष' को देख, शान से हम ऐंठेंगे।

सोचेंगे- "ये दीन-हीन जीव, देखो कैसे डोल रहा,
इसे क्या पता कि ऊपर बैठा, ईश्वर किस्मत खोल रहा!"

मगर हकीकत सामने आई, तो सारा नशा उतर गया,
नौकरी क्या लगी मियां, सुकून ही कहीं सुधर गया।

वो दोस्त जिनकी लग गई, अब उनका हाल बताता हूँ,
सुनकर उनकी आपबीती, मैं थोड़ा सा थरथराता हूँ।

या तो फाइल 'उनके' नीचे, या 'वो' फाइल के नीचे हैं,
काम के भारी बोझ ने, उनके नयन भी मीचे हैं।

दिन भर 'यस सर-यस सर' में, जबान उनकी थकती है,
साहब वाली कुर्सी अब तो, कांटों जैसी चुभती है।

तब याद आता है वो जमाना, वो कॉलेज वाली मस्ती,
जब दस रुपये की जलेबी में भी, बसती थी अपनी हस्ती।

मुंह में पान दबाकर हम, दुनिया के दुख हरते थे,
गली की नुक्कड़ पर बैठकर, कश्मीर के मुद्दे हल करते थे!

पाकिस्तान की खैर नहीं थी, ऐसी चर्चा होती थी,
बिना बजट के अपनी संसद, जम के पर्चा धोती थी।

आज न फुर्सत, न वो मस्ती, न वो लंबी बातें हैं,
फाइलों के जंगल में अब, कटती अपनी रातें हैं।

सिकंदर भी तो हार गया था, सारी दुनिया जीतकर,
क्या ले जाओगे साथ बताओ, यूं ही जीवन बीतकर?

सीधी सी बस बात यही है, इसे गांठ में बांध लो,
काम तो चलता ही रहेगा, खुद को जरा पहचान लो।

ज़िन्दगी के जो पल मिलें, उन्हें मस्ती में तुम जी लेना,
चाय की प्याली दोस्तों के संग, फुर्सत से तुम पी लेना।

साहब बनना ठीक है पर, इंसान बने रहना तुम,
बचपन वाली उस हंसी को, सीने में भरे रहना तुम।


- देवेश चतुर्वेदी


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मन की खिड़की में उतरा था वो चाँद,
कोरे शब्दों की स्याही में घुला,
मन की गहराइयों में स्वत: उतरकर
जैसे मेरी कला का रहस्य खोल चला।

पाँच वर्ष बीते आशीर्वाद रूपी कलम थामे,
पर उसकी छवि अब भी जीवित है,
हर अक्षर में उसकी अनूठी छाप,
हर भाव में उसकी परछाईं लिखित है।

मैंने पूछा-
"क्यों आए थे उस रात,
और क्यों फिर कभी न लौटे?"
चाँद मुस्कुराकर बोला-
"मैं तो हर हृदय में हूँ,
बस पहचानने की दृष्टि चाहिए।

मैं नकारात्मकता में उजाला हूँ,
अंधेरे में छिपा श्वेत सा सहारा हूँ,
जब अंतर्मन थक जाएँ,
मैं प्रेरणा बनकर उतरा करता हूँ।

तुम्हारी कलम को मैं ही गति देता हूँ,
तुम्हारे भावों को मैं ही स्वर देता हूँ,
मैं विलुप्त नहीं,
बस तुम्हारे भीतर ही ठहर गया हूँ।"


- अंशिता त्रिपाठी


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पुरखों की विरासत...
हम बंटवारे में छोड़ आए हैं।
हमारे चेहरे पर... जो चमक है
वो हमारी खुद की बनाई है।
तुमने अपने पूर्वजों के लिखें
सारे ग्रंथ, कहानी छोड़ दिए
सच कहूं तो तुम गद्दार हो...
ना अपने पूर्वजों के हुए...
ना संस्कृति और सभ्यता के
तुमने जिस-जिस को मां बोल!
उसकी हालत बदतर कर दी
सच बोलूं तुम स्वार्थी हो।
अपने पूर्वजों की तुमने!
भाषा छोड़ दी...
वेशभूषा छोड़ दी...
रहन-सहन छोड़ दिया... और
थोड़ी लाभ के लिए जाति बचा ली
सच कहूं! तुम्हें तुम्हारे
पूर्वजों का श्राप लगेगा।
मेरा क्या! मैंने अपने
पूर्वजों की विरासत छोड़ी
मेरी आने वाली पीढ़ी
मेरी विरासत छोड़ देगी।


- दीपक कोहली


*****


अधूरी वापसी

अब न मेरा गांव में वो घर रहा,
सिर्फ पुरखों की यादें रहीं,
जिसे करके ताजा मैं आहें भर रहा।

चले थे कमाने ,आ गए शहर,
कमाया सब कुछ गवां के अपना घर।
होते गए अंदर से खाली,
फीकी रही होली और बुझी से दिवाली।

अब लौटा हूं देर हुई बहुत,
रिश्ते निभाने वाले अलविदा कह गए,
कुछ मेरी तरह थे वो भी,
शहर की हवा में बह गए।

अब गांव में भी पहुंची शहर की बीमारी है।
जो थे कभी सर्व सुलभ उसकी भी मारामारी है।

दूध, दही और घी भी यहां मिलते नकली।
बोली भूल गए,परिधान भूले,
गाय नहीं पालते-पालते अब कुत्ते बिल्ली।

अब रिश्ते चुप रहते,बोलते सिक्के है।
हा मन मिजाज मिल जाए किसी से,
पर वो भी इक्के दुक्के हैं।


अब होती है घुटन बहुत,
सपनों में ही रहना अच्छा लगता है,
कंधा नहीं है किसी का मजबूत
सर रखने को,
अकेले आंसू बहाना अच्छा लगता है।


- रोशन कुमार झा


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फिर वो सुबह आएगी...

शुष्क है यह भग्न उर
नीर नयनों में भरा
ताप विरहाग्नि सहे,
कंपित हुई यह धरा।
तिमिरमय इस चेतना में
भोर फिर से क्या उगेगी?
तृप्ति फिर से तब मिलेगी!!

मौन बैठी कल्पना,
आस का दीपक लिए।
शून्य पावन मन्दिरों में
प्रिये जो आँसू दिए।
चिर-विरहित इस हृदय को
तृप्ति फिर से क्या मिलेगी?
भोर फिर से क्या उगेगी??

शांत कर दे जाह्नवी,
आ हृदय में तू सकल।
प्राण के इस मरुस्थल में
खिल उठे फिर से कमल।
सत्य बोलो हे प्रिये!
क्या नेह सरिता सी बहेगी
भोर फिर से वह उगेगी?
तृप्ति फिर से वह मिलेगी?


- सविता सिंह मीरा


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कल किसने देखा है

क्या कल कभी आता है,
सब काम लोग कल पर टाल जाते हैं,
क्या होता है कल आखिर,
न किसी ने देखा, न कोई जान पाता है।
जीवन तो बस आज में है,
कल का सपना अधूरा रह जाता है,
जो जीते हैं हर पल को खुलकर,
सफल वही कहलाता है।
क्या पता कल जिंदगी रहे न रहे,
फिर क्यों अरमान अधूरे रखें,
जो करना है, आज ही कर लो,
क्यों वक्त को यूँ बहने दें।
कहीं ऐसा न हो एक दिन,
मन में बस पछतावा रह जाए,
काश वो काम आज कर लिया होता,
ये सोच दिल को सताए।
क्योंकि कल कभी नहीं आता,
सच तो केवल आज ही है,
हर तमन्ना पूरी कर लो,
क्या पता कल हो न हो।


- गरिमा लखनवी


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बढ़ी है नफ़रत बढ़ें हैं शूल।
खिला है जब से विषैला फूल।।

ये ख़त्म कैसे हुआ है अम्न।
कहाॅं पे हमसे हुई है भूल।।

धुऑं बचा है बची है राख।
बची न बस्ती बची है धूल।।

गधे हैं ख़ुश सब यहाॅं पे आज।
कि ढो रहे बोझ वो अमूल।।

किया था झूठे ने वादा झूठ।
थी उसकी बातें सभी फ़ुज़ूल।।

जो कहते करते अच्छे लोग।
गधों का कोई नहीं उसूल।।

वफा के बदले जफ़ा निज़ाम।
दिया है उसने मुझे ये मूल।।


- निज़ाम फतेहपुरी


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बाबुल ऐसा वर ढूंढो

बाबुल मुझको ऐसा वर ढूंढो,
जो नारी का सम्मान करे।
सुख दुख में हमेशा साथ रहे
ना कभी मेरा अपमान करे।
जो मुझको ब्याहकर ले जाए
रुपया, पैसा ,गहनों के बिना
कर्ज का बोझ चढ़ाए ना
तुम्हारी पगड़ी का भी ध्यान करे।
बाबुल ऐसा वर ढूंढो
जो नारी का सम्मान करे।
जब गलती कोई कर दूं मैं,
धीरे से मुझको समझा दे
जब गुस्सा उसको आए तो
बस थोड़ा सा मुस्का दे।
मैं दूजे घर से आई हूं
थोड़ी मेरी पहचान करे।
बाबुल मुझको ऐसा वर ढूंढो
जो नारी का सम्मान करे।
मैं सारे रिश्ते अपना लूंगी,
उसके रंग में ढल जाऊंगी,
छोड़कर बाबुल का अंगना
उसकी बगिया महकाऊंगी।
वो मेरे भी रिश्ते समझे
बस इतना सा अहसान करे।
बाबुल मुझको ऐसा वर ढूंढो
जो नारी का सम्मान करे।
मैं सारी बातें मानूंगी,
जुबान भी नहीं खोलूंगी
जितना जरूरी होगा
मैं बस उतना ही बोलूंगी।
मैं लाड प्यार से पाली तुमने,
वह मुझ पर ना कोई वार करे।
बाबुल ऐसा वर ढूंढो
जो नारी का सम्मान करे।
अगर मिले ना वर ऐसा
मैं बिन ब्याहे ही रह जाऊंगी
इस समाज के डर के कारण
शायद ससुराल में मारी जाऊंगी।
जाने कितने वहशी बैठे हैं!
जो लाडो बेटी के प्राण हरे
बाबुल मुझको ऐसा वर ढूंढो
जो नारी का सम्मान करे।


- मंजू सागर


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दो कौड़ी का शिक्षक

उस दिन जब समाचारों में
"दो कौड़ी का शिक्षक" सुना,
जाने क्यों मन रो पड़ा,
जाने क्यों कुछ भीतर टूटा।

जिसने उँगली पकड़ चलाया,
जिसने अक्षर का दीप जलाया,
जिसके शब्दों से जीवन ने
अपना पहला अर्थ पाया।

वह शिक्षक आज खड़ा था चुप,
न कोई उत्तर, न प्रतिकार,
बस उसकी नम आँखों में था
सम्मान खोने का संताप अपार।

सोचा होगा उस गुरु ने भी
"क्या इतना ही मेरा मान ?
जिन बच्चों के सपने सींचे,
क्या इतना सस्ता है ज्ञान ?"

पर सच तो यह इतिहास कहेगा,
शब्दों से गुरु छोटा नहीं होता,
जिसके कारण जग रोशन हो,
वह कभी दो कौड़ी का नहीं होता।

कौड़ी के यदि शिक्षक होते,
तो डॉक्टर, वैज्ञानिक, पत्रकार कहाँ होते ?
सच तो यह है गुरु स्वयं मिटकर भी
दूसरों के जीवन में उजाला बोते।


- डॉ. सारिका ठाकुर 'जागृति'


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दावानल बना है दानव
जेठ महीने की तपिस से
गर्म हवाओं से,
सभी जल रहे हैं
सूख रहे हैं पेड़- पौधे
पशु -पक्षी भी हैं भूखे -प्यासे
प्रकृति हो रही व्यथित
दावानल करने लगी बेहाल
दावानल बना है दानव
मानवजनित दावानल से
जलते वनों में जल रहे
असंख्य पेड़ पौधे, जीव-जंतु
पशुओं के आवास
पक्षियों के घोंसले भी जल रहे
जाने कितने जीव
हो गए बेघर
दावानल बना है दानव
वायु प्रदूषण में हो रही सतत वृद्धि
विश्व ऊष्णन निरंतर बढ़ रहा
मृदाकटाव बढ़ने से
मृदा हो रही बंजर और ऊसर
दूषित हवा से होने लगे
हृदय, त्वचा एवं श्वसन रोग
पारिस्थितिक संतुलन हो रहा नष्ट
पिघलने लगे हैं ग्लेशियर
ओजोन में हो गया है छिद्र
दावानल बना है दानव
वन हैं पृथ्वी के फेफड़े
वन करते ताप नियंत्रित
वन जलवायु को करते प्रभावित
वन हैं धरा पर
जीवन का मूल
आओ वनों को जलने से बचाएँ
धरा को हरा -भरा,मनमोहक
स्वस्थ एवं खुशहाल बनाएं।


- प्रवीण कुमार


*****


जीवन के सच्चे पथ प्रदर्शक

माता-पिता जीवन का आधार हैं,
उनके बिना सपने भी बेकार हैं।
माँ की ममता छाँव सी ठंडी,
पिता का साया शक्ति अखंड है।
वे खुद संघर्षों में जीते हैं,
पर बच्चों के लिए खुशियाँ सीते हैं।
उनके त्याग का कोई मोल नहीं,
उनके जैसा इस जग में कोई और नहीं।
जिस घर में माता-पिता का सम्मान होता है,
वहीं सच्चा सुख और भगवान का वास होता है।


- नूतन गर्ग


*****


चाहने वाले

साथ चाहने वाले
अपनी चाल धीरे कर ही लेते हैं,
वे मंज़िल से पहले
रिश्तों को चुन लेते हैं।
उन्हें जल्दी नहीं होती
सबसे आगे निकल जाने की,
वे ख़ुशी ढूँढ़ लेते हैं
किसी अपने का हाथ थाम लेने की।
राह में यदि कोई थक जाए,
तो वे ठहरना जानते हैं,
अपने कदमों की गति से अधिक
दिलों की दूरी मापना जानते हैं।
जो सचमुच अपने होते हैं,
वे पीछे छूटने नहीं देते,
समय चाहे कितना भी बदल जाए,
साथ का धागा टूटने नहीं देते।
क्योंकि प्रेम का अर्थ
किसी से आगे निकल जाना नहीं होता!
प्रेम तो वह एहसास है
जहाँ कोई कहता है,
"चलो, धीरे-धीरे ही सही,
पर साथ चलते हैं...!


- नरेंद्र मंघनानी


*****



28 May 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 29 मई 2026





आज की चाय

पहले चाय बहाना होती थी,
दोस्तों को पास बुलाना होती थी।
घंटों बैठकर बातें होतीं,
हँसी में आधी परेशानियाँ खोतीं।
मित्र, रिश्तेदार साथ बैठते,
दिल के सारे राज़ कहते।
एक कप चाय में अपनापन था,
हर रिश्ते में मीठा बंधन था।
अब मोबाइल पर हाल पूछ लेते हैं,
इमोजी भेजकर रिश्ते जी लेते हैं।
न वो बैठकी, न वैसी यारी,
हर चेहरे पर दिखती लाचारी।
तनाव, अकेलापन, मन की दूरी,
भीड़ में भी सबकी मजबूरी।
क्योंकि अब दिल खुलकर कहता कहाँ है,
कोई चाय पर बैठता कहाँ है।
आओ फिर से वो दौर बुलाएँ,
एक कप चाय संग रिश्ते निभाएँ।
थोड़ा समय अपनों को दें,
दो मीठे शब्द प्यार के कहें।
क्योंकि चाय सिर्फ पेय नहीं होती,
यह दिलों की गर्माहट होती।


- बीना सेमवाल


*****





मां ईश्वर का साया है
मां ईश्वर का साया है,
जिसने संसार बसाया है।
मां का होना वरदान है,
मां का होना एहसान है।
बिना बोले जो सब समझे,
ममता की असल पहचान वो।
मां सा प्यार नहीं मिलता,
ना वो एहसास कहीं जग में।
बेशक जग में सब रिश्ते हैं,
रिश्तों में प्यार भी बेशक है,
लेकिन मां की ममता जैसा
वह एहसास नहीं मिलता।
जो केवल मां में संभव है,
वह निर्मल भाव नहीं मिलता।
मां के आंचल की छांव तले
जो मिले सुकून, नहीं मिलता।
बेशक दुनिया में सब कुछ है,
बस मां का स्वरूप नहीं मिलता।
खो जाती है जब मां जग में,
आंखें ढूंढें उसको नभ में।
फिर रहे तलाश अधूरी ही,
बेशक दुनिया को छान लो फिर,
नहीं मां सा अक्श कोई जग में,
बेशक ढूंढो उसको नभ में।
मां की ममता का मान करो,
मां है जग में, अभिमान करो।
मां सा कोई शख्स नहीं मिलता,
नहीं मां का अक्श कहीं जग में।
मां है तो दुनिया सुंदर है,
मां खुद ईश्वर का साया है।
मां का होना ही वर है,
मां के रूप में खुद ईश्वर
धरती पर बना हमसाया है।
मां ईश्वर का साया है,
जिसने संसार बसाया है।
मां में खुद की रचना करके,
ईश्वर धरती पर आया है।


- कंचन चौहान


*****




हम ऐसे रत्न

हम ऐसे रत्न हैं सखी, जो मुफ़्त में बिक जाते हैं,
पत्थर-सी किस्मत ले कर, हर राह में ठोकर खाते हैं।

कीमत अनमोल हीरे-सी, पर पत्थर लोग समझते हैं,
किस्मत के हाथों छले गए, हर राह में ठोकर खाते हैं।

दुनिया मेरी ऐसी बनाई, किससे करूँ शिकायत मैं,
रोड़े बिछे हैं राहों में, कैसे उनको हटाऊँ मैं।

मेहनत मेरी काम न आई, पानी फिर गया करनी में,
दोष किसी को देती नहीं, वक्त कटा उदर भरनी में।

ऐसी मांझी बन न पाई, जो खे ले नाव तूफानों में,
डूब चुकी है मेरी नैया, पुकार न पहुँची कानों में।

अब तो संतोष का दामन, पकड़ के जी लूँ कुछ पल,
हर किसी के दामन में, मिलता नहीं सफल फल।


- रत्ना बापुली


*****




माँ एक शब्द नहीं माँ ईश्वरीय वरदान है,
माँ धरती है माँ आकाश है,
माँ भगवान का दूसरा रूप है,
जो सौ दर्द सहते हुए भी एक जीव को रचती है,
वह भव्य देवीय शक्ति है,
माँ अपना संपूर्ण जीवन
अपने उस परिवार को देती है
जिसे वह एक एक बूँद रक़्त से सींचती है,
माँ ईश्वर की वह कृति है जिसमे सारा भ्रह्माण्ड समाया है,
माँ का एक दिन नहीं बल्कि हर दिन माँ दिवस होता है,
माँ है तो जीवन है माँ है तो ख़ुशियाँ है,
माँ दुखों का नाश है माँ सुखों की आस है,
धन्य धन्य है उस ईश्वर को जिसने बहुत ही फ़ुरसत से माँ रची,
षष्टांग प्रणाम उस माँ को जिसकी वजह से मैं हूँ,
पुनः एक बार संसार की सारी माँओं को नमन वंदन करती हूँ,
आज माँ नहीं नम है आँखें मेरी,
हर जन्म में तेरी ही कोख मिले तेरा ही साया मिले,


- सुमन डोभाल काला


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श्रमिक वंदना

भोर होते ही श्रमिक जागे,
मेहनत कर भाग्य जगाते।
ईंट उठाकर घर बनाते,
सबके सपने सच करवाते।

धूप तले दिनभर तपते,
कदम-कदम आगे बढ़ते।
पसीना मोती सा झरता,
धरती हरियाली से भरता।

खेतों में अन्न उगाते,
सबके घर खुशियाँ लाते।
कारखाने भी रोज़ चलाते,
देश को उन्नति पथ पर बढ़ाते।

श्रम से जग उजियारा होता,
हर आँगन उत्सव सा होता।
मजदूरों का मान बढ़ाओ,
जीवन उनका धन्य बनाओ।


- डॉ. सारिका ठाकुर 'जागृति'


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कितनी बड़ी बात है ना!
योनि से आया आदमी
योनि के पीछे पागल रहता है।
गजब तो तब हो जाता है, जब
उसी योनि पर वो गालियां देता है।
और दुनिया के सामने
उसी योनि पर खुल कर
बात करने में शर्माता है।
विडंबना देखिए!
जब कोई उसे उसकी
मां, बहन और पत्नी की
योनि की गाली देता है
तो वो गुस्सा हो जाता है।
आदमी के इस व्यवहार को
उसकी मूर्खता कहें या
फिर उसका दोगलापन ?


- दीपक कोहली


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मां

नि:स्वार्थ प्रेम की
परिभाषा है मां
उसकी हर
त्याग तपस्या
अतुलनीय है
मां वो पूंजी है
जिसे चाहकर भी
खोया नहीं जा सकता
मां अंतर्मन की आवाज है
प्रेम की सच्ची
परिभाषा है मां
मैं चाहे जितनी बार खो जाऊं
पर मां को कभी भी
खोया नहीं जा सकता
मां है तो मुक्कमल हूं मैं
मां ही सृष्टि की रचना है
मां है तो ये सृष्टि है।


- मनोज कौशल


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बादशाह की हार

शतरंज के बड़े खिलाड़ी निकले,
वजीर से ही बादशाह को मात दी।
वाह खूब खेला है , तुमने मासूम दिल से,
मेरी सारी ख़ुशगहमियां पल में उतार दी।

अच्छा हुआ जो तूफानों ने
बादलों को चीर दिया,
तेरी ये फितरत पहले मालूम न थी,
अब तेरी खामोशी ने सब बता दिया।

मैंने वक्त मांगा था, हिसाब नहीं,
तुम मेरी जिंदगी का एक पन्ना नहीं
पूरी किताब थी।

लट्टू सा घुमाया मुझे,
अपने इशारों पर नचाया भी।
पतंग जैसे मंजे को कभी
ढील देकर अचानक खींच ली।

वह क्या अदा पाई है,
ये तेरी अदा थी,पुरानी
या सिर्फ मुझ पर आजमाई है।

मैंने भी ये खेल अब तुझसे सिखा है,
जीतने का इरादा नहीं, अब
बस देखना है,और कितने वार करते हो

मैं तुमसे प्यार करता हूं अब भी,
लेकिन देखना है अब,
क्या तुम यही सितम बार-बार करते हो।


- रोशन कुमार झा


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शुक्रिया

मुझको भुलाने के लिए शुक्रिया,
ग़म देकर रुलाने के लिए शुक्रिया।

चेहरे की चमक खो गयी थी कहीं,
इसे आंसुओ से धुलाने के लिए शुक्रिया।

हम तो मांग रहे थे ज़िन्दगी तुमसे,
यूँ मौत के बीच झुलाने के लिए शुक्रिया।

तुम्हारी नाराज़गी तोड़ देती थी कभी,
ज़िन्दगी भर मुँह फुलाने के लिये शुक्रिया।

सरे बाजार निलाम हुई है इज़्ज़त मेरी,
अपनी महफ़िल में बुलाने के लिए शुक्रिया।

क्या बीती मुझपर ये तुम क्या जानो,
इस दिल को जलाने के लिए शुक्रिया।

कोई अपना नहीं होता इस जहां में,
ये बात याद दिलाने के लिए शुक्रिया।


- आनन्द कुमार


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वो घर अब वैसा नहीं

बड़ी रौनक थी आँगन में, हँसी दीवार सुनती थी,
हर इक कोने में अपनों की कोई आवाज़ रहती थी।

कभी नाराज़गी भी थी, कभी चुप्पी भी गहरी थी,
मगर रिश्तों के धागों में वो पहली गर्मजोशी थी।

वही चौखट, वही कमरा, वही तस्वीर है लेकिन,
न जाने वक्त क्या बदला ,ये घर वैसा नहीं लेकिन।

जहाँ मिल बैठकर अक्सर शामें ठहरा करती थीं,
अब उन कमरों में बस यादों की आहट गुज़रा करती है।

कभी हम भी इसी छत पर सितारों से मिला करते,
अब अपने ही मकाँ में अजनबी होकर मिला करते।

मगर उम्मीद बाकी है, दुआ अब भी धड़कती है,
किसी दिन फिर इसी आँगन में रौनक लौट आएगी।


- नरेंद्र मंघनानी


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मां रौ आंचळ

बात बाळपन री है
म्हं बाळक हो
अचपळों अर बदमाश हो
खेलतो -कूदतों मस्त हो
काम कीं नीं करतो
ओळमों सिर-माथे राखतों
अळबाद पर अळबाद करतों
म्हं घणां उजाड़ करतो
बापू जैळी चकतों
जाड़ पिसतो
म्हं "मां" री ओट लेवतों
मां पल्लू रो परकोटो बणांवती
म्हं शरणागत हुंवतों
बापू कैंवतों टिंगर
धरती माथै बौझ हैं
म्हं सुबकतों मां पुचकारती,
गळती म्हं करतों
मां मनावती
बात बात म्हं खिजतों
मनावणां मां करती
टेम लदगों
कद बड़ा होगा??
ठा नीं पड़्यों
आज पीड़ घणीं
सांझ री बगत
भींत माथै टंग्योड़ी
बापू री फोटू देख
म्हारों हिवड़ों फाट्यों
म्हं बोल्यों
बापू म्हं धरती माथै
आजै भी बोझ हूं
पण बापड़ी लाद्या फिरै हैं
म्हारें कान मांय पैचाणीं
सी आवाज़ आई
बेटा धरती बापड़ी कै करें?
धरती "मां" हुवै!
म्हं आंसू पूंछतों
बी सूं पैली
"मां " री आवाज आई
बेटा दूध ल्याऊ!
आज ठा पड़्यों
मां "मां" ही हुवै
कै जळम दैवणी
अर कै जळमभौम!


- जितेन्द्र कुमार बोयल


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माँ का दर्द

आज से दस साल पहले,
मैंने आंखों में चश्मा पहने,
तो, माँ की आंखों में आंसू आ गये,
कि मेरे बेटे मे कमी क्या दे दिये ?

क्योंकि माँ पचहत्तर साल के उम्र में भी,
साफ साफ दुनिया को देख लेती थी,
और मैं चौंतीस साल के उम्र मे ही,
आंखो में चश्मा पहने ली।

माँ उस दिन बहुत ही उदास थी,
वो बार बार खुद को दोषी मान रही थी,
कि कुछ तो कमी रह गया है, मुझमें
जिससे मेरे बेटे ने पहना है चश्मे।

माँ की उदासी देख मैंने समझाया, कि
ऐसा कोई बात नहीं है, माँ
लिखते-पढ़ते वक्त आंखों में,
पानी आ जाता है थोड़ी सी ।

जिस वजह से, चिकित्सक ने,
चश्मे लगाने की सलाह है दी,
तेरे से कोई कमी नहीं हैं, माँ
तू तो बच्चों वास्ते,
एक की हो जमीन-आसमाँ।


- चुन्नू साहा


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ठगे जा रहे हैं

आजकल दर दर पर फरियादी बन आ रहे हैं,
सब हाथ जोड़ विनम्र मुद्रा में वोट मांग रहे हैं।

ईमानदारी सत्यनिष्ठा की मिशाल बने बैठे हैं।
हरेक की खातिरदारी करने को तैयार बैठे हैं।

आजकल सब हाथ जोड़कर सेवक बने बैठे हैं,
सबको बड़ी दीन हीन कातर नजरों से देख रहे हैं।

गर्मी में दौड़ धूप कर खूब पसीना बहा रहे है,
गिले शिकवे मिटाकर सबको गले लगा रहे हैं।

सबके सुख दुख को अपना बता रहे हैं,
जीतने के लिए कितने मिट्टी से जुड़ते जा रहे हैं।

साम दाम दंड भेद के सूत्र सब अपना रहे हैं,
कुर्सी पाने की चाह में हर दांव आजमा रहे हैं।

सब रामराज्य लाने को तैयार बने बैठे हैं,
जुबान को मिसरी सी मीठी बनाए बैठे हैं।

कुछ तो नए नए अपनी किस्मत आजमा रहे हैं,
कुछ तो पांच वर्षों बाद अपने चेहरे दिखा रहे हैं।

वादे विकास के नए नए सपने दिखाए जा रहे हैं,
सब को मुंगेरी लाल के सपने दिखाए जा रहे हैं।

सोच समझ कर करना अपने मत का प्रयोग,
नहीं तो आमजन वर्षों से यूँ ही ठगे जा रहे हैं।


- राज कुमार कौंडल


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आज ख़ुद से मैं खुद रूबरू होके आया हूं
अपने हर रंज ग़म में सुरूर होके आया हूं

नहीं दिल को चाहत, दौलत शौहरत की
ये मोहब्बत का नया दस्तूर लेके आया हूं
अपने हर रंज ग़म से सुरूर होके...

सिफारिशों से नहीं बनते हैं अब काम अजब दौर है
सिफारिश संग तोहफा हुजूर लेके आया हूं
अपने हर रंज ग़म से सुरूर होके...

मिसालों में दलीलों में गुज़रे वक्त ही रहे जिंदा है काफ़ी
नया वक़्त है धोखा बदस्तूर देके आया हूं
अपने हर रंज ग़म से सुरूर होके...

मैनें लाख दुहाई 'नरेंद्र' दर्द ग़म ज़ख्म की उसको दी
वो न पिघला लौट मैं मजबूर होके आया हूं
अपने हर रंज ग़म से सुरूर होके...
मोहब्बत का नया दस्तूर लेके...


- नरेन्द्र सोनकर बरेली


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तपती धूप

गुस्से में क्यूँ है आज   दिनमान
आग बरसाता है तेरा  आसमान
तपती गरमी से जग है   परेशान
बहती  से पसीना  सुबह से शाम

सूख गये धरा पे सब    ताल तलैया
व्याकुल निहार रहे      किसान भैया
तड़प रही बेचारी       प्यासी गौरेय्या
रे बदरा ओढ़ा दे छतरी छईयां  छईयां

पछुवा हवा गरम लू संग लेकर आई
बरगद पीपल शीतलता दे।    सुहाई
रे मेघा कुछ शरम कर मेरे।      भाई
गरमी से जन जीवन को आफत आई

प्यासी है धरती प्यासा खेत खलिहान
पानी बरसा कर कर दो।   तुँ एहसान
ठंडी हवा की दे दो हमें कर मेहरबान
जीव जन्तु की बात आज तुम    मान

प्यासी सरिता भूल गई खुद की रवानी
त्रस्त हैं जलचर मांग रहे हैं पानी पानी
लुट गई सब नदियों की भरी   जवानी
बदलो अपनी नीति लिख नई कहानी


- उदय किशोर साह


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दरियादिल इतने नहीं हो तुम !
जितना नाटक करते हो ,
अकड़ कर बैठते हो सभा में
और सरे आम झूठ बोलते हो,

सभाएं हमने भी देखी हैं बहुत सी
मगर ऐसी नहीं देखी, साकी
कत्ल करवाते हो जज्बातों का
और मुजरिम को खुले घूमाते हो

पैरवी भी खुद ही करते हो, मसले की
और राह भी खुद ही दिखाते हो,
अक्लमंद सभी समझते हैं अपने को,
इस जहां में ऐ दोस्त!
पर कोई किसी से कम नहीं

एतबार नहीं है, तो आजमा कर देख लो
कर ले तसल्ली अगर सीने में हिम्मत हो
चांद टूटता नहीं यहां किसी के इश्क में ए दोस्त!
दर्द से दर्द ही सिला होता हैं, परख कर देख लो


- बाबू राम धीमान


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बचपन

धूल में खेलती, सपनों से अनजान थी,
नन्हीं सी मैं, बस एक उड़ती जान थीं।

पेड़ से गिरी, किस्मत ने थाम लिया,
फिर भी जीवन ने आगे बढ़ा दिया।

रोटी की खातिर दूर तक चलती रहीं,
धूप में भी मैं चुपचाप जलती रही।

गरीबी ने मेरे सपनों को आजमाया,
पर मैंने हर दर्द को शब्द बनाया।

किताबों में रातें, खामोश सी बातें,
कविताओं में ढली, मेरी सारी रातें।

मैं टूटी नहीं, मैं निखरती रहीं,
हर मुश्किल में भी मैं चलतीं रहीं।


- सुनीता बिश्नोई



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टी का महत्व

चाय  पीओ उत्साह पाओ
थकान दूर करो शक्ति पाओ
तनाव हटाओ शांति पाओ
सिरदर्द घटाओ स्वस्थ पाओ
जीवन में चाय पीना जरूरी है।

चाय से मिली शक्ति अनोखा है
चाय से मिली रुचि अति मधुर है
चाय से मिली शांति निर्मल है
चाय से मिला उत्साह बेमिसाल है
चाय पीने से शक्ति बढ़ती है नित्यं।

हम को कार्यरत की शक्ति देती है
जीवन में नीरस को मिटाता है
और मस्तिष्क तेज बनता है
इससे शरीर चुस्त बन जाता है
चाय से मिली शक्ति अद्वितीय है।

आजकल चाय कई किस्में में मिलते है
ग्रीन टी पीने से कोलेस्ट्रॉल कम होते है
अदरक टी पीने से पाचक शक्ति बढ़ती है
नींब टी पीने से निरोधक शक्ति बढ़ती है
ज़िंदा में टी पीना एक हिस्सा बनता है।


- श्रीनिवास एन, आंध्रप्रदेश


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