साहित्य चक्र

08 March 2026

विश्व महिला दिवस की विशेष प्रस्तुति- 2026




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नारी शक्ति, स्वाभिमान और संस्कार

तुम में अदिति का धैर्य, और सती सा पावन तेज है,
तुम दुर्गा की हुंकार हो, जिसमें अधर्म का परहेज है।
कभी सीता बन तुमने प्रेम की कठिन अग्नि को झेला,
कभी काली बन अकेले ही असुरों के दल को धकेला।

आज के इस युग में, तुम फिर वही हुंकार भरो,
अन्याय अगर हो खुद के साथ, तो तुम न जरा डरो।
दबना नहीं, झुकना नहीं, खुद की पहचान बचानी है,
अहिल्या की पाषाण चेतना, अब फिर से जगानी है।

गर पा लिया है ऊँचा कद, और धन की तुम अधिकारी हो,
आधुनिकता की दौड़ में, तुम अगर सबसे भारी हो-
पर याद रहे, अनुसूया ने भी मर्यादा को पाला था,
त्याग और सेवा से ही, घर का आंगन उजाला था।

पति अगर हो कमतर तुमसे, फिर भी मान न घटने देना,
अहंकार के विष से अपने, मधुर रिश्तों को न कटने देना।
सास-ससुर भी माता-पिता हैं, उनका तुम सम्मान करो,
बेवजह तंग कर किसी को, न अपना घर श्मशान करो।

शक्ति भी तुम, भक्ति भी तुम, तुम ही प्रेम की मूरत हो,
मर्यादा और स्वाभिमान की, तुम सबसे सुंदर सूरत हो।
बधाई हो तुम्हें आज, इस नारी शक्ति के उत्सव की,
तुम आधार हो इस सृष्टि का, और गरिमा हो भविष्य की।


- देवेश चतुर्वेदी


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शक्ति, समर्पण, शौर्य की परिभाषा हो

हे नारी! तुम चीर बचा लो,
हे नारी! तुम आंखों का नीर बचा लो,
करे जो कोई दुस्साहस
तुम्हारी गरिमा को चोट पहुंचाने का,
तुम निज आंचल का क्षीर बचा लो,

हां, तुम हकदार हो चूड़ी की खन-खन की,
हां, तुम हकदार हो पायल की छम-छम की,

चूल्हा-चौका, ड्योढ़ी,
आंगन सब तुम संसार का आधार हो ,
तुम ग्रहणी, तुम अध्यापिका, तुम सैनिक,
तुम पायलट, नहीं तुम कभी भी लाचार हो,
ममता का अभियान भी तुम,
श्रद्धा शौर्य का गान भी तुम,

हे नारी! तुमने तो मुरलीधर तक को भी नाच नचाया है,
जब-जब पड़ी विपदा धरा पर तुमने शक्ति रूप दिखाया है,
इंसानों की तो बात ही छोड़ो,
तुमने तो ब्रह्मा, विष्णु, महेश को भी गोदी खिलाया है,

तुम्हारे बिना अधूरा यह ब्रह्मांड है,
तुमसे ही तो युगों की शान है,
संस्कार व अधिकारों की अभिलाषा हो,
हां तुम, शक्ति, समर्पण, शौर्य की परिभाषा हो।


- रचना चंदेल 'माही'


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दुर्गा सी तलवार उठाए, राक्षसों का संहार करे।

नारी शक्ति, ज्योति जलाए जो दीप अंधेरों में,
माँ की गोद सी सहलाए, हर दर्द के घाव भरे।

सीता सी त्याग सिखाए, वनवास में भी मुस्काए,
दुर्गा सी तलवार उठाए, राक्षसों का संहार करे।

खेतों में बहाए पसीना, घर को स्वर्ग बनाए जो,
स्कूल में सपने संवारे, बेटियों  संग  उड़ान भरे।

थके नहीं वो दौड़ दौड़ कर घर का सारा कम करे,
छुट्टी हो या इतवार बेचारी न फ़िर भी विश्राम करे।

"इंदिरा" सी अडिग रहे, विश्व पटल पर  झुक न पाए,
"लता"सी स्वरों को बाँध ले,करोड़ों दिल पर राज करे।

होली रंगों में बने राधिका ,गरबे में संग संग नृत्य करे,
योग आसन सिखलाए,आयुर्वेद का अमृत पान करे।

संघर्ष की अग्नि में तपे,बने जो सोना शक्ति अपार करे,
जहाँ नारियों की पूजा होती, वहाँ देव भी निवास करे।

नारी शक्ति  शाश्वत,अमर रहे प्रण ये मुश्ताक करे,
भारत माँ की कोख से जन्मी, ज्योति, चारों ओर करे।


- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह


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हे मानव!
जब तुमने मानवता
की परिभाषा गढी होगी
तो जरूर
तुम्हारे सामने मुस्कुराती
कोई स्त्री भी खड़ी होगी।

प्रकृति ने
जब रखी होगी
जीवन गति की आधारशिलाएं
निश्चित रूप
से बराबर खड़ी
होगी महिलाएं।

रचे
जब तुमने
अनेक सभ्यताएं
व संस्कृतियाँ
फिर
आज क्यों हैं
स्त्री पुरुष के बीच
अनेक विकृतियाँ?

प्रत्येक
पुरुष अधूरा है
स्त्री के बिन
बिन
पुरुष के कहाँ
पूरे होते स्त्री के भी दिन
सिर्फ
दो नस्ले हैं
नर और मादा।

कितना भी प्रयास
कर लो रहोगे
एक दूसरे के बिन आधा
जीवन
समर में बराबर की
सहभागी है स्त्री
पुरुषत्व
तभी पूर्ण हुआ है
जब जागी है स्त्री
सृष्टि का
सिंगार पुरुष अकेले
नहीं कर सकता.
स्त्री के बिना एक
ढेले नहीं धर सकता।

कवि
ने भी नहीं लिखा
केवल सोहन मोहन
सब हँसने लगते
देख कर राजू राधा
का सम्मोहन.
जब तक नर
भारी रहेगा नारी पर
समता के बीज
कहाँ रोपोगे
जीवन क्यारी पर.
पुरुष
जब जब लौटा है
जीवन से थक हार कर।

थकान भी
लहालोट हुई है
उसकी एक मुस्कान पर.
स्त्री की
मुस्कान के साथ
पुरुष जब घर से
निकला है
काम पर.
खुद को
पाया है सदैव
सबसे ऊँचे
मुकाम पर.
ना तो
स्त्री केवल आँगन है
और
न केवल
पुरुष सिवान
एक दूजे
के बिन जीवन
बना रहता है
वियावान।

मिटा कर
हर लैंगिक भेद
करो हर यात्रा आरंभ
न स्त्री
अहंकार में डूबे
ना पुरुष
भरे पुरुषत्व का दम्भ
जीवन पर
जितना पुरुष का
उतना ही
स्त्री का अधिकार।

हिमालय सँग
सागर भी मुस्कुराए
देख कर
स्त्री और पुरुष का
सह अस्तित्व और प्यार.
हे मानव
हर भेद भस्म करो,
करो हर चट्टान चूर्ण।
विकास तभी
होगी मानवता की
परिभाषा पूर्ण।


- राधेश विकास


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“नारी- ज्वाला, जयी, जागृति”

वह अबला नहीं, वह ज्वाला है,
वह केवल कथा नहीं, वह हाला है।
अन्यायों के दुर्ग गिरा दे,
वह प्रलय नाद की ज्वाला है!

जिसने जग को जन्म दिया है,
वह क्यों भय से सिर झुकाए?
जिसकी रग-रग में दुर्गा बहती,
वह क्यों आँसू आँख सजाए?

वह दुर्गा बन रण में उतरे तो
असुरों का अस्तित्व मिटे,
वह रानी लक्ष्मीबाई बनकर गरजे तो
साम्राज्यों के सिंहासन हिलें!

वह श्रम है, वह शक्ति है,
वह संकल्पों की भक्ति है,
वह नभ छूने का साहस है,
वह इतिहासों की सृष्टि है!
जो बंधन बाँधेंगे पग में,
वह जंजीरें तोड़ देगी,
जो दृष्टि उठेगी तिरस्कार की,
वह दृष्टि भी मोड़ देगी।

अब नारी मौन नहीं रहेगी,
वह अपने अधिकार लिखेगी,
हर क्षेत्र, हर मंच, हर पथ पर
विजय-पताका स्वयं फहरेगी!

उठो, प्रखर बनो, स्वर दो!
अन्यायों को ललकार दो!
“जागृति” की ज्वाला बनकर,
सारिका सा विस्तार दो!
हे नारी! तुम स्वयं शस्त्र हो,
अब अपने सामर्थ्य का विस्तार दो!


- डॉ. सारिका ठाकुर 'जागृति'


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आधी आबादी को नमन

नारी, तू हो नारायणी,
माँ हो, तू हो कल्याणी।

हो तु जगत जननी,
सबो की, आनंददायिनी।

तेरे हर रूपों की कहानी,
देखे है, और है सुनी।

माँ रूप मे ममतामयी बनी,
बहन बनी तो, रक्षकवाहिनी।

सुता रूप मे आनंददायिनी।
तो बनी कभी तू, अर्द्धांगिनी।

सब रूपों में, छायी तू,
हर रूप में, भायी तू।

तेरे ही से सृष्टि बनी,
यही तेरी है, कहानी।

आधी आबादी तेरी भी है,
सभी जगह में, अब तू भी है।

गाड़ी के पहिये के समान,
तेरी बनी है, अब पहचान।

एक के बिना दूजे का काम,
रूक जाती है, ये लिये मान।

आदरणीया, पूजनीया बनी,
नमन करे, तुझे सभी ज्ञानी।


- चुन्नू साहा


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नारी साहस ही तो जग में नारी सम्मान
नहीं अबला नारी, नारी शक्ति की पहचान।

ममता की धारा है नारी, दृढ़ता की मिसाल
उसकी हिम्मत के आगे हर मुश्किल बेहाल।

कभी माँ बन कर जग को जीवन देने वाली
सृजनकर्ता हैं नारी, इस जग का आधार।

कभी बेटी बनकर हर आँगन को महकाती
बहन रूप में स्नेह के दीप सदा ही जलाती।

देकर आशीष सदा ममता लुटाने बाली स्त्री
पत्नी बनकर जीवन पथ को सरल बनाती।

अन्याय की आँधी से, संसार में छाए बदहाली
नारी ही दुर्गा बन जाए, रण में कहलाए काली।

कलम उठाए तो, नारी नया ही इतिहास रचाए
अपने साहस से हर बंधन से नारी ने मुक्ति पाली।

जिस घर में नारी का, सम्मान पुष्प खिला रहेगा
वहाँ सुख का हर दीप सदा ही, प्रज्वल होता रहेगा।

इस समाज में, नारी सशक्त हो, हो प्रतिभाशाली
तभी भविष्य भी उज्ज्वल होगा, गरिमामय होगी नारी।


- आशी प्रतिभा


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उदारमना नारी

ईश की सुन्दर रचना है ये,
जग का इससे पूर्ण श्रृंगार।
सारी सृष्टि की ये धूरी,
मानव हित के लिए जरूरी।

शक्ति का ये दूजा रूप,
ममता का है सहज स्वरुप।
जननी है संपूर्ण जगत की,
अखिल विश्व ब्रह्मांड सहित की।

नारायण की रचना नारी,
देखन में लागे छवि न्यारी।
धरा-धाम पर जब ये आयी,
सृष्टि में उजियारी छायी।

माँ बनकर पयपान कराती,
बने बहन संग हँसती गाती।
नानी बनकर कथा सुनाती
परीलोक की सैर कराती।

दादी बनकर प्रेम लुटाती,
अनुशासन का पाठ पढ़ाती।
बनकर ये जीवन की साथी,
हर सुख-दुःख में साथ-निभाती।

जब-जब बेटी रूप में आती,
सेवा करती है दिन-राती।
नारी में ही नर की खान है,
नारी नर का स्वाभिमान है।

नारी का हर रूप है प्यारा,
हर रिश्ता लगता है न्यारा।
त्याग की देवी सीता भी है,
प्रेम की रानी राधा भी है।

पाँच पति की पंचाली है।
चक्षुबन्ध ये गन्धारी है।
सती महान अनुसूया है।
पत्थर बनी अहिल्या माँ है।

भक्ति प्रेममय मीराबाई,
हो चाहे थे लक्ष्मी बाई।
कहो इसे रजिया-सुल्तान,
या मानो कल्पना महान।

नारी का अतीत गौरवमय।
पर भविस्य है अंधकारमय।
गर्भों में यह मारी जाती।
जीवन का सुख जान न पाती।

बेटी सर का बोझ हो रही।
मात-पिता की रोग हो रही।
अपनों द्वारा जाती मारी।
मातु-पिता-दादी हत्यारी।

इन पर गर न रोक लगी तो,
सारी धरा बिलट जाएगी।
निज के हाथों ही खुद नारी,
स्वयं को ठगा हुआ पाएगी।


- प्रीतम कुमार पाठक



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अधिकार

नारी स्वयं का अधिकार ढूंढती है।
पूरा नहीं आधा आकाश चाहती है।
सिर्फ आधी धरती मांगती है।
हवा पानी रोशनी सब कुछ
सिर्फ आधा ही चाहती है।
अगर चाहो तो बदले में
आधा पिंजरा आधी घुटन
सबसे बांट सकती है।
नारी अधिकार के साथ साथ
आधा कर्तव्य आधी जिम्मेदारी
भी लेना चाहती है।
नारी चाहती है
केवल उतनी ही समानता,
जितनी उसे प्रकृति से मिली है।
अगर पिता नर है तो नारी मां
बेटा है तो वो बेटी
भाई है तो वो बहन
पति है तो वो पत्नि
प्रेमिक है तो वो प्रेमिका।
नर शिक्षक है तो नारी शिक्षिका।
अपनी क्षमताओं के आधार पर
नारी अधिकार ढूंढती है स्वयं का।


- सुतपा घोष


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मैं एक नारी हूँ,
सच में थक जाती हूँ कुछ आडंबर से,
हर व्रत, हर मन्नत, हर पकवान,
क्यों बंधे हों सिर्फ पुरुष के नाम?

क्या चाहती है ये दुनिया,
हम बन जाएं उनके "AI" समान,
जहाँ हर स्विच उनकी "हाँ" पर टिके,
हर रंग, हर विचार उन्हीं से सजे।

पर क्यों सीमित कर देते हो हमें,
उनके इर्द-गिर्द की परिधि में?
हम भी चुन सकते हैं अपना रंग,
अपना ढंग, अपनी दुनिया का संग।

हम हैं स्वच्छंद विचार,
हमारी सोच है गहरी धार,
जो परंपरा को चुनौती दे,
और सफलता की राह खुद गढ़े।

मैं नारी हूँ-
बंधन नहीं, स्वतंत्रता हूँ,
अनुकरण नहीं, सृजन हूँ
सिर्फ सहचर नहीं,
बल्कि अपनी पहचान हूँ।


- अंशिता त्रिपाठी


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नारी की जीवन-यात्रा

नन्हीं सी कली बनकर आई,
सपनों की दुनिया संग लाई।
हँसी में छुपे थे कितने डर,
फिर भी हर पल मुस्कुराई।
बचपन में सीखी सहना उसने,
हर छोटी-बड़ी कठिनाई।
पर हिम्मत उसकी दीपक जैसी,
अंधेरों में भी जगमगाई।
यौवन आया, जिम्मेदारी आई,
कंधों पर घर-परिवार सजाया।
अपने सपनों को चुपके रखकर,
सबके सपनों को सच बनाया।
कभी माँ बनकर ममता बरसाई,
कभी बेटी बनकर घर महकाया।
अपने दर्द को दिल में रखकर,
सबको खुशियों से सजाया।
समय के संग बाल हुए चाँदी,
चेहरे पर झुर्रियों की लकीरें आईं।
पर साहस उसकी पहचान रहा,
जीवन भर उसने हार न मानी।
नारी केवल एक नाम नहीं,
यह शक्ति, प्रेम और त्याग की कहानी है।
बचपन से लेकर बुढ़ापे तक,
वह साहस की अमर निशानी है।


- बीना


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चालीस पार

हम बढ़ती उम्र की औरतें
क्या चाहती हैं,
शायद थोड़ा बेबाक़ होना चाहती हैं,
डर थोड़ा कम हो जाता हैं,
प्यार बेहिसाब चाहती हैं
सभी मरी हुई ख्वाहिशों को फिर से पूरा करना चाहती हैं,
फिर से आज़ाद घूमना चाहती हैं ,
बेपरवाह होना चाहती हैं
अपने माँझी पर पूरा एतबार चाहती हैं
हम बढ़ती उम्र की औरतें
आँखो में आँखें डालकर बात करना चाहती हैं
शर्मो हया का लबादा दूर फ़ेक
उन्मुक्त होना चाहती हैं
झूठा दिखावटी आइना और नहीं
ख़ुद की स्वतंत्रता के साथ तुम्हें भी स्वतंत्र करना चाहती हैं
फिर से वही मासूम प्यार चाहती हैं
जहाँ देह का भान ना हों
हो पूर्ण समर्पण ,हो एक विश्वास
शिकवे शिकायतें ना हों,
प्रश्नों की बौछार ना हो
शायद वो गहरी अमावस की रात चाहती हैं ॥
अंतर्मन में गहरी पैठ लगाये अवसादों
से निकलना चाहती हैं,
सबकी अपेक्षायें ना हो उससे,
कोई उसके लिए भी कुछ कर गुज़रे
एक ऐसा रिश्ता ख़ास चाहती हैं,
ज़िंदगी को मुट्ठी में समेटना चाहती हैं ,
सारे इन्द्रधनुषी रंग इनमें भरना चाहती हैं,
आँखों में बचपन की फिर से वही चमक चाहती हैं,
पचपन में भी सोलह सा दिल चाहती हैं,
हम बढ़ती उम्र की औरतें
फिर से उमंगों पर मचलना चाहती हैं
जिसे बंद कर दिया था किसी कोने में
आज फिर उसी कोने को साफ़ करना चाहती हैं।
रिमझिम बरसती बूँदों में अरगनी पर
सूखते कपड़ों को लाना नहीं चाहती,
किचन में खड़े होकर पकौड़े भी नहीं बनाना चाहती,
अब वो ख़ुद भीगना चाहती हैं
भीगे हुए कैशों को तुम लपेट दों
एक तोलियाँ में,
अब वो ख़ुद अपनी फ़िक्र करवाना चाहती हैं,
हम बढ़ती उम्र की औरतें
क्या चाहती हैं,


- डॉ. अर्चना मिश्रा


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मैं एक नारी- आस्था, विश्वास और कर्म

आस्था मेरी चुप प्रार्थना है,
जो आँखों में दीप जलाती है,
विश्वास मेरी मौन शक्ति है,
जो टूटकर भी मुस्काती है।
कर्म मेरे हाथों की रेखा नहीं,
मेरे हाथों का संकल्प है,
जो गिरकर फिर उठना सिखाए,
वही जीवन का विकल्प है।
मैं जानती हूँ प्रतीक्षा क्या है,
संघर्ष की हर एक धड़कन,
कर्म ने ही मुझे सिखाया है,
आँसू भी बन सकते हैं स्वप्नन।
विश्वास ने जब थामा साथ,
डगमग पाँव भी चल पड़े,
आस्था ने जब सिर रख दिया,
तो कांटे भी फूलों में ढल पड़े।
मैं नारी हूँ- पर कमजोर नहीं,
मेरी शक्ति मेरा श्रम है,
आस्था मेरी साँसें हैं,
विश्वास मेरी पहचान है।
मैं माँ हूँ और बेटी भी,
मैं सृजन और संस्कार हूँ,
कर्म पथ पर चलकर ही,
मैं स्वयं अपनी पहचान हूँ।
नूतन कहती है सब नारियों से-
न केवल मानो, न केवल चाहो,
अपने कर्म को पूज्य बनाओ,
आस्था रखो, विश्वास जगाओ,
और अपना भाग्य स्वयं रच जाओ।
क्योंकि- नारी जब कर्म में ढल जाती है,
तो आस्था स्वर बन जाती है,
विश्वास इतिहास रचता है,
और दुनिया नई कहानी गढ़ जाती है।


- नूतन गर्ग


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नारी के बारे में

कभी फुर्सत मिले तो
पढ़ लेना
रसोई के गणित से परे
नारी के बारे में।

जो संघर्षरत जीवनपर्यंत
पढ़ लेना
बिस्तर की बायोलॉजी से परे
नारी के बारे में।

कभी इत्मीनान से
पढ़ लेना
तन के भूगोल से परे
नारी के बारे में।

कुछ तो है, जो है खास
पढ़ लेना
भीतर का खौलता इतिहास
नारी के बारे में।

कभी ठहराव के साथ
पढ़ लेना
खुली जुल्फों की हिंदी से परे
नारी के बारे में।

सहनशक्ति को परिभाषित
पढ़ लेना
संस्कृत सी संस्कृति से परे
नारी के बारे में।

अगर पढ़ पाओ तो
पढ़ लेना
माथे की बिंदी से परे
नारी के बारे में।

विभिन्न परिस्थितियों में निखरती
पढ़ लेना
हँसी के पीछे के दर्द से परे
नारी के बारे में।

तब जान पाओगे
नारी का मान-सम्मान
अगर नहीं,
तो तुम्हारी स्नातक-स्नातकोत्तर की पढ़ाई-
सब व्यर्थ है, निश्चित ही व्यर्थ है भाई।


- राघवेंद्र प्रकाश 'रघु'


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स्त्रियां विरोध नहीं करती

नित दिन प्रताड़ित होती हैं, खंडित होती हैं ,
हमेशा शोषित होती हैं और दंडित होती हैं ,
बांध कमर पर पट्टा जिम्मेदारियां वहन करती हैं,
फिर भी प्रताड़ना का प्रतिरोध नहीं करतीं
ये सच है कि स्त्रियां विरोध नहीं करतीं।

खुद के अस्तित्व के लिए कभी सवाल नहीं करतीं,
सिंहासन मिले या वनवास मलाल नहीं करतीं,
लक्ष्मण रेखा के अंदर खुद को समाहित किए,
अपनी आजादी के लिए कभी क्रोध नहीं करतीं,
ये सच है कि स्त्रियां विरोध नहीं करती।

अपनी तृष्णा , आकांक्षा , हृदय में ही मार लेती हैं
समस्त जीवन रिश्तों की बेड़ियों में गुजार लेती हैं ,
इज्जत और सम्मान के लिए खुद की कुर्बानी देकर
पिता के घर जाने का कभी अनुरोध नहीं करतीं,
ये सच हैं कि स्त्रियां विरोध नहीं करतीं।

सशक्त है, सबल है, आत्मनिर्भर और संस्कारी भी,
दुर्गा है, सीता है, काली है और बेचारी भी!
हाथ से कलम का शस्त्र भी चलाना जानती है,
मगर अन्याय के विरुद्ध अवरोध नहीं करतीं,
ये सच है कि स्त्रियां विरोध नहीं करतीं।

जिस दिन वो विरोध करेंगी, शोषण नहीं होगा,
अपराधों का समाज में पोषण नहीं होगा,
क्यूं अपने अधिकारों पर ये शोध नहीं करतीं ?
ये सच हैं कि स्त्रियां विरोध नहीं करतीं।


- मंजू सागर


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नकली सी मुस्कुराहट लिए
सबको बहलाती रही.
डरे सहमे से दिल को,
हिचकिचाहट में सहलाती रही.
बहुत दिया प्यार औरों को,
ख़ुद को इसी क्रम में खो सा दिया था.
ख़ुद को छोड़, बाकी सबको,
खूब सा दिलासा दिया था.
बिना makeup के भी जो अब
खूबसूरत सी लग रही हूँ,
हां ये प्यार ही है,
जो अब खुद से भी कर रही हूँ.
सबको समझा, बहाने दिए,
गलतियों को उनके सिरहाने दिए.
दरवाजों के पीछे, क़िताबों के नीचे,
आंसुओं को जाने दिए.
कहते थे सब, खोई खोई सी रहती हो,
अगर मन में कोई बात है,
क्यों नहीं किसी से कहती हो.
हकीक़त में तो मैं खुद भी नहीं थी,
या तो उन अनकहे बातों में,
या अनिश्चित कल में कहीं थी!
अब जो सब समझ आने लगा है,
मन मेरा आज को अपनाने लगा है.
ख़ुद पर भरोसा, और वक़्त पे यकीं,
काफ़ी अरसे के बाद फिर से गहराने लगा है...


- भाग्यश्री मिश्रा


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नारी दिवस की ज़रूरत नहीं

अच्छा लगा था
जब बॉस ने बिना कहे,
बिना जताए, बिना बताए
ऑफिस की मेज़ पर
सेलिब्रेशन का एक बड़ा पैक
चुपचाप रख दिया था,
ये भावनात्मक रिश्ता
दिल से निकल कर
सीधे दिल तक पहुँच गया
बस इतना ही तो चाहिए।
और बस…
हो गया नारी दिवस।

उफ़्फ… आज बहुत देर हो गई,
कब सुबह हो गई पता ही नहीं चला।
उन्होंने खिड़की से आती धूप को
बड़े करीने से
एक मोटी-सी चादर से ढक दिया,
ताकि मेरी नींद
ज़रा और ठहर सके।
आँखें भर आती हैं…
हम सच में
इतने से ही खुश हो जाते हैं।
कोई आडंबर नहीं,
कोई शोर नहीं
बस इतनी-सी ही तो बात है।

आज काजल नहीं लगाया तुमने,
दो भौंहों के बीच
वो छोटी-सी बिंदी भी नहीं।
क्या हुआ-उदास हो क्या?
बस इतना पूछ लेना ही
काफी होता है
वरना हम तो
इतनी-सी केयर पर भी
पागल हो जाते हैं।

सच कहूँ
अगर ऐसे छोटे-छोटे स्नेह
हर दिन मिलते रहें,
तो फिर किसी
महिला दिवस की
ज़रूरत ही नहीं।

स्त्री आधारशिला है सृष्टि की
उसे दिवस की जरूरत नहीं
जरूरत है बदलते हुए
भावनात्मक पर दृष्टि की।


- सविता सिंह मीरा


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20 February 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 20 फरवरी 2026



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“निशा की नीरव वीणा”

निशा की नीरव वीणा पर,
किसने मधुर स्वप्न छेड़ा है?
चाँदनी की चंचल छाया में
मन क्यों आज अकेला है?

वन की वीथियों में वायु
धीरे-धीरे कुछ गाती है,
सूनी सरिता की लहरों में
पीड़ा चुपके मुस्काती है।

तारों के अश्रु झिलमिल हैं,
अंबर का हृदय उदास है;
मेरे अंतर के कोने में
किस स्मृति का निवास है?

ओ दूर क्षितिज के दीपक!
किस आशा से तुम जलते हो?
मेरे मौन निमंत्रण को
क्या तुम भी सुनते-चलते हो?

मैं खोज रही उस छाया को
जो स्वप्नों में मुस्काती है,
जो हर मधुमय उषा बनकर
जीवन-पथ पर आती है।

निशा ढलेगी, उषा खिलेगी,
तम का आवरण टूटेगा-
मेरे अंतर्मन का पंछी
फिर से गान नया छेड़ेगा।


- डॉ सारिका ठाकुर 'जागृति'



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बातें, तो आख़िर बातें हैं
शब्दों का एक खेल हैं बातें
जिनसे मन बहलाता हूँ,
हासिल क्या हुआ और क्या होगा इनसे ?
यक्ष प्रश्न उठाता हूँ,
क्या ये कभी खत्म होंगी ?
ज़रा गौर फरमाइएगा
बातें, तो आख़िर बातें हैं,

कहीं से भी शुरू करो
थमने का नाम नहीं लेती बातें,
उतार देती है गहराई में कभी-कभी
मन में पैदा करती है उलझने,
हल जब तक कोई नहीं निकलता इनका,
ख़त्म होने का नाम नहीं लेती बातें,

सिलसिला इनका जब शुरू होता
रुकने का नाम फ़िर नहीं लेती बातें,
उठते हैं मन में कई सवाल इनको लेकर
कभी लगता है कि जवाब मिल गया, और
कभी लगता है कि अभी कोसों है दूर
बेनतीजा जब ये रहती,
मन को बहुत धड़काती ये बातें,

नादान सी कभी लगती बातें
कभी हंसाती तो कभी रुलाती बातें,
कईयों के मुख पर बहुत जचती बातें
अपना जब ये जादू दिखाती,
गिरगिट की तरह रंग बदलती बातें ,
सिवाय मौन के
कोई कुछ नहीं कर सकता इनका,
क्योंकि बातें, तो आख़िर बातें हैं


- बाबू राम धीमान


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जाति-पाति की गिरा दो दीवार

गिरा दो अब जाति-पाति की दीवार
हम आर्य हैं, हमें मत बाँटों मेरे यार
समाज में बन्द करो जाति की तकरार
हम हैं हिन्द का सब एक ही   परिवार

हमें विधाता ने सिर्फ इन्सान है बनाया
हम इसे भारत व इरान नक्से में लाया
हमने अपना समृद्ध हिन्दुस्तान  बनाया
फिर हमें जाति में क्यूं आपने गिनवाया?

कौन भेद भाव कर बाँट रहा है  समाज
इनका मुखड़ा उतार दो मिलकर आज
षड़यंत्र की है कोई देश में एक छुपी राज
वोट बैंक की है ये  गहरी खाई  की काज

हम भारत वासी है सब यहाँ पे भाई भाई
पड़ोस में रह रही है  हमारी अपनी  ताई
सब अपना है जहाँ  नहीं है कोई भी पराई
कौन पैदा कर रहा समाज में जाति की खाई

सभ्य समाज से बना है हमारा यह परिवार
जाति पाँति है रोग करना है इसका वहिष्कार
समाज को बाँटने वाले का हो यहाँ से तिरष्कार
कानून बना दो इस पर ओ मजबूत सरकार


- उदय किशोर साह



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दिल की अलमारी

दिल की अलमारी में बिखरा सा हर सामान है,
लगता है यहां कोई आया तूफान है,
तितर बितर हैं सहेजे हुए लम्हें,
औंधे पड़े हैं ख्यालों के पुलिंदे,
और सिलवटों में सिकुड़े हुए ख्वाब,
कहीं एक कोने में उदास पड़ा मासूम अरमान है
दिल की अलमारी में बिखरा सा हर सामान है।
फट गए है यादों के लिफाफे,
कुछ अनकही बातें चल पड़ी हैं,
दिल की अलमारी से बाहर की ओर
और खुल गई हैं तह नींदों की,
सुकून सिर्फ कुछ देर का मेहमान है
लगता है यहां कोई आया तूफान है।
कुछ नहीं रखा सलीके से,
ना यादें, ना ख्याल, ना उम्मीदें
रखीं है तो आज भी धड़कनें,
कुछ हलचल और अहसास,
जिनसे आज भी ये बहुत दिल परेशान है।
दिल की अलमारी में बिखरा सा हर सामान है।
हैं दिल की दराजे खाली सी,
सब कुछ फैला है इधर उधर
और खुली पड़ी है ये अलमारी,
दिल भटक रहा है क्या पाने को ?
इस बात से ये बिल्कुल अनजान है
लगता है यहां कोई आया तूफान है।


- मंजू सागर


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प्रतिध्वनि

मुझे मसल कर देख लो,
हाथों में खुशबू मेरी रह जाएगी।
इंतकाम गर लेना है तो,
शौक़ से लेना ये आरज़ू भी पूरी कर लो।

पता होगा तुम्हें -
समंदर सब कुछ लौटाता है,
फिर मेरी यादों को भी
फेंक कर देख लो।

मेरी तस्वीर से रंग छीनना चाहते हो,
छीन लो-श्याम श्वेत सी भी
जिंदगी जीना आता है।

रंगों से भरम तो टूटेगा,
आप और मैं रहेंगे सदा,
हम होने का भरम तो छूटेगा।

बनकर आए ख्वाब,
लेकिन ख्वाब को टूटना होता है।
हर मिलने वाले को यहां
बिछड़ना होता है।

तुम रास्ता थे,मंजिल समझ बैठा।
कारवां रुका रास्ते में-
सब कुछ लुटा के बैठा।


- रोशन कुमार झा


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फागुन

फागुन का रंग,
रचता हैं बसंत।
प्रेम का रंग,
प्रीत कुसुम अनंत।

महक उठता अंग,
संयम के प्रतिबन्ध।
रचते रस छन्द,
होती होली ले उमंग।

बौराते जन जन,
बांसुरी की तरंग।
आई रुनझुन रुनझुन,
कच्चे पक्के ले रंग।

गाते फागुन सँग,
प्रीत प्रकर पंथ।
नजरो की ठिठोली,
भरी प्रेम के भंग।

हँसे खामोश सुगंध,
जगे रंगों के रंग।
मिलकर होते सारे,
जग कर सारे रंग।


- मीना तिवारी


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उन्हीं की भाषा में उनको बस समझाने की ठानी है।

ये उकसावे की नीति नही तो इसे बताओ क्या बोलें ?
मानवता के दुश्मन को हम दैत्य नही तो क्या बोलें ?
अरे कितनी बार चेताया हमने एक न उसने मानी है,
अब उसी की भाषा में उसको बस समझाने की ठानी है।
बार बार समझाने पर भी मर्यादा को तोड़ दिया
भारत जैसी महाशक्ति से टकराने का मन जोड़ लिया।
आतंक के आका आसिम और शहवाज तनिक तुम धैर्य धरो,
मोदी जी यह सही समय है इनका तुम उद्धार करो।
अग्नि नही आकाश नही ब्रह्मोस इसी का उत्तर है।
जब- जब संधान किया हमने तब- तब पाक निरुत्तर है।

हर आतंकी की घटना पर हम उसके मौन को क्या बोलें ?
खुली पोल उन जालिम की अब और बताओ क्या खोलें?
हर बार दलीलें दी हमने पर एक न उसने मानी है।
अब उसी की भाषा में उसको बस समझाने की ठानी है।
ब्रेन वॉश कर भारत में नफरत को फैलाया है
भारत मां के अमन चैन पर पाक ग्रहण सा छाया है ,
प्रभाव ग्रहण का बढ़े उससे पहले उसका उपचार करो
प्रकाश निगलने से पहले उस पर तीखा प्रहार करो ।
जैश मुहम्मद लश्कर तैय्यबा सबने की मनमानी है
अब उसी की भाषा में उसको बस समझाने की ठानी है।
हर बार करी गद्दारी हमको दिया हमेशा धोखा है।
अस्त-व्यस्त भारत करने को सबकुछ उसने झोका है।

सबकुछ उसने झोंक दिया पर बाल न बांका कर पाया
जब रक्तचूर्ण अभियान चला, तब वैरी भी था थर्राया।
सीख न लेकर कोई अपितु एक न उसने मानी है,
अब उसी की भाषा में उसको बस समझाने की ठानी है।
बहुत हो चुकी लुका छिपी अब आकर इसको बन्द करो
यदि मां का दूध पिया तुमने तो आकर सीधे द्वन्द करो।
युद्ध धर्म की सभी विद्या द्धन्द में तुम्हे सिखा देंगे
जन्नत वाली हूरों से किये देरी बिना मिला देंगें ।
वसुन्धरा से जन्नत की हूरों की रची कहानी है
अब उसी की भाषा में उसको बस समझाने की ठानी है।


- करन सिंह ''करुण'


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प्रेम-विवाह

“प्रेम” शब्द सुनते-बोलते ही
एक नई ऊर्जा का संचार होने लगता है।

मनुष्य प्रेम में रहते हुए अपने जीवन के
सबसे सुखद पलों का आनंद ले रहा होता है,
पर शर्त है, वह प्रेम वासनाग्रस्त न हो।

प्रेम में रहने वाले दो प्रेमियों के
मध्य जन्म–जन्मांतर तक के वादे हो जाते हैं;
वे चले जाते हैं एक अलग दुनिया में, पर

जब वह इस समाज की सच्चाई से वाकिफ होते हैं
तो उन्हें ही घृणा होने लगती है “प्रेम” से।

समाज सब कुछ बर्दाश्त कर सकता है;
सिर्फ दो प्रेमियों के मिलन को छोड़कर, पर

यदि प्रेम को जीवन का भाग मान लिया जाये
तो समाज भी एक दिन टेक देगा घुटने प्रेमियों के आगे।


- सुभाष "अथर्व"


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मेरी अंजुमन में आने की
अब खता ना किजिए
इस कदर मेरी दिल को
और दगा ना दिजिए
मेरी अंजुमन मे आने की…

मेरी रूह से निकलती है
तेरी लिए आहे
मेरी आह को पाने कि
सजा ना किजिए
मेरी अंजुमन मे आने की…

मै देखती रही उन्हे
अक्स भरी निगाहो से
मुझे मोम को पत्थर बनने की
दुवा ना दिजीए
मेरी अंजुमन मे आने की…


- किरन शर्मा


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नूरानी आँखों में हजारों ख्वाब सँजोती
प्यारी लगती हैं बेटियाँ।
घर के काम खत्म करके, किताबें
पढ़ती प्यारी लगती हैं बेटियाँ।
हरेक मुद्दे पर बेबाकी से नजरिया बताती
प्यारी लगती हैं बेटियाँ।
पार कर दहलीज आँगन की मनमौजी से मुसकाती
प्यारी लगती हैं बेटियाँ।
अपने हर फर्ज को बेताबी से निभाती
प्यारी लगती है बेटियाँ।
बाबा का सहारा बनकर लाठी थामती
प्यारी लगती है बेटियाँ।
माँ, बहन, बीवी के फर्ज को एहतियात से निभाती
प्यारी लगती है बेटियाँ।
खुद के वजूद को सहेजती-सुलझाती
प्यारी लगती है बेटियाँ।


- नितेश पालीवाल 'नूर'


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हम उदास होते ही ढूंढते हैं तुम्हें
सुबह और शाम ढूंढते हैं तुम्हें

जैसे तुम आ ही रही हो ढूंढते हैं तुम्हें
हर सवाल और जवाब में ढूंढते हैं तुम्हें

तुम चांद सी चमकती हो हरदम
तुम्हें पाने की ज़िद में ढूंढते हैं तुम्हें

हर क्लास हर सांस में ढूंढते हैं तुम्हें
हर एक एहसास में ढूंढते हैं तुम्हें


- मनोज कौशल


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तुम देना साथ मेरा

ओ प्रिये, तुम देना साथ मेरा
जब थक जायेगा राहों में कदम मेरा
जिंदगी की ये राह आसान नहीं
रूक जाता है पग मेरा कहीं-कहीं
लक्ष्यहीन हो जाता हूँ, मायूस होकर
कि जब खाता हूँ राहों में ठोकर
अकेला राही मैं, कुछ समझ न पाता हूँ।

कुसुम पथ पर भी काँटे महसूस करता हूँ
होकर थका हारा बेसहारा बनकर पथिक
मिलता नहीं है मेहनत का उचित पारिश्रमिक
ऐसे वक्त में तेरी आती है बहुत याद
कि कितनी अच्छी होती यदि तू होती मेरे साथ।
बाँट लेते आपस में ही सुख-दुःख को
मिटा लेते मन के भूख को
दो-चार प्रेम की बातें कर लेते
प्रिये, यदि तुम मेरे साथ में होते ?

यूँ ही हंसते रोते काट लेते सफर
दिल में रहता न कोई कसर
चलो प्रिये अब उठो ना तुम भी
पुकार रहा है तुझे चुन्नू कवि
एक मीठी मुस्कान दे खिला दो मेरा चेहरा
अब थक गया हूँ प्रिये, साथ दो मेरा


- चुन्नू साहा



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बसंत का आगमन

​ऋतु वसंत का हुआ पदार्पण,
स्वागत में खेतों में सरसों खिली।

​वृक्षों पर नव-कोपलें हैं आईं,
पवन भी सर-सर मस्त चली।

​दूर कोकिला फगुआ गाती,
अमवा पर सुंदर मंजरी खिली।

​खेतों ने भी ली है अंगड़ाई,
मुस्का रही गेहूँ की बाली।

​रंगों का पावन त्योहार आया,
उड़ रहे चहुँ ओर अबीर-गुलाल।

​छोड़ क्लेश, मन प्रेम-रंग में रँगना,
छाएगी खुशियों की फिर नव बहार।


- राघवेंद्र प्रकाश 'रघु'



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यह दुनियां न तेरी न मेरी

यह दुनियां किसी की नहीं है जागीर
कठपुतली हैं सब यहां राजा हो या फकीर
अपना किरदार निभाकर सबको है जाना
मिलेगा वही किसी को जो लिख देती है तकदीर

कोई यहां गरीब है कोई जन्म से अमीर
ईमानदार है कोई किसी का मर गया है ज़मीर
तकदीर के भरोसे मिल रहा किसी को सब कुछ
कोई बन गया है राजा और कोई बना बज़ीर

न कोई किसी के साथ आता है
न कोई किसी के साथ है जाता
मिलना भी उसी से होता है यहां
जिससे होता है कोई पिछले जन्म का नाता

किस्मत में जो होगा वह मिलकर रहेगा
उसे कोई छीन नही पायेगा
जो हमारा नहीं है वह लाख कोशिश पर भी नहीं मिलेगा
उसे हथेली पर से छीन कर भी कोई ले जाएगा

छोड़ना पड़ेगा सब कुछ एकदम जब बुलावा आएगा
आंख बंद हो जाएगी कुछ देख नहीं पाएगा
दूर खड़े देखेंगे सब तेरी अंतिम विदाई
अपना जिसको समझता रहा पास आने से भी घबराएगा


- रवींद्र कुमार शर्मा


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