*****
चिट्टा
रहता था माँ से कुछ उखड़ा-उखड़ा
तेज आवाज़ में बात करना
छुपाते हुए मुखड़ा
मासूम सी माँ कुछ समझ ना पायी
क्यों है बाल मेरा मुझ से रुठा-रुठा
कोशिशें सब बेकार सी
दुलारने, सहलाने, पुचकारने की
शर्म लाज छोड़ जरुरतें उसकी बढ़ने लगी
जेब खर्च अब सौ से हजारों में बढ़ने लगी
पाई-पाई जोड़ पिता उसका
बेटे के समृद्ध भविष्य को जोड़ता
पढ़ाई के खर्चे मेरे अधिक कहकर
बेटा लेकर वापिस न मोड़ता
जब तक माता-पिता, परिवार,
समाज समझ पाता
एक नहीं अनेक नौजवानों को
इक जानलेवा नशा चिट्टा
उनकी जान ले डूबा
एक प्यारा सा मुस्कुराता परिवार
असीम पीड़ा, वेदना और मातम से गुजरा
क्यों नहीं समय आने से पहले
हम सब लोग जान जाते
अपनी नौजवान पीढ़ी को
खत्म होने से पहले ही बचा पाते
बचपन से ही बच्चों के दोस्त हम बन जाएं
कह पाएँ हर मन की बात
उनके सखा हम बन जाएं
एक नहीं अनेक परिवार
पूरे के पूरे उजड़ गए
चिट्टा एक दो, पांच दस नहीं
सैकड़ों परिवार ले डूबे
पुलिस, प्रशासन के जिम्मे लाद
जिम्मेदारी अपनी सब भूल गए
हो जाएं समाज, परिवार, नगर-शहर
सब एकजुट, तभी सामना कर पाएंगे
असमय-अनजान मृत्यु से हम सब
तभी जीत हासिल कर पाएंगे।
दूर नहीं वो दिन जब हम सब
बेटा-बेटी ही नहीं
एक समृद्ध परिवार भी खो देंगे
जब देश मेरा क्रांति कर
गुलामी की बेड़ियाँ तोड़
आजादी पा सकता है
क्यों नहीं अपने ही समाज की
नशे की जड़ों को तोड़ सकता है
हो जाएं सब एकजुट
क्रांतिकारी भावना से
गर बचाना है देश भविष्य अपना
नशे की गिरफ्त और लाचारी से...
- मीना कुमारी शर्मा
*****
पहली- अक़्लमंद तो था नहीं.
अक़्लमंद तो था नहीं
जेब से भी था ख़ाली-ख़ाली ही
मगर गर्दन में ऐंठन थी थोड़ी
कि जो जाती न थी
रोना था,इसी बात का रोना था
कि ज़रा भी झुकता न था
जो झुक जाता,
थोड़ा-सा भी झुक जाता,तो पाता
फिर इतना-इतना कुछ पाता
उठाता स्वर्ण-मुद्राऍं,गिनना भूल जाता
कि ठीक से संभाल भी नहीं पाता
सिर्फ़ इतनी-सी थी ज़िद मेरी
कि नहीं हो शर्त कोई जीवन में जीने की
असहमति के लिए बची रहे जगह
जगह-जगह,हर जगह
अगर हो जाता शामिल मैं भी सहमतों में
तब न ऐंठन होती,न कविता होती,न मैं
चाहता हूॅं,यही चाहता हूॅं
कि बची रहे
ये ऐंठन बची रहे
कविता में कविता की ऐंठन बची रहे
कविता बची रहे,जीवन बचा रहे
मैं रहूॅं,न रहूॅं ज़रुरी तो नहीं
कवि बचा रहे।
दूसरी- जागेगा सच और सब में.
दु:ख,प्रेम,सपने और कविताऍं
कहने लगे कि एक दिन,किसी एक दिन
रहेंगे,सब रहेंगे साथ-साथ और यहीं
नदियों में प्रवाह और घुमाव बने रहेंगे सब
झरनों का गिरना और उछलना बना रहेगा
ऑंधियों से वृक्षों का टकराना बना रहेगा
मैं नहीं रहूॅंगा,तुम नहीं रहोगे,नहीं रहेंगे वे
बाॅंसवन रहेगा,बाॅंसुरी रहेगी,गूॅंज रहेगी
जो जगाती रहेगी आग,पकाती रहेगी अन्न
जागेगा सच और सब में।
- राजकुमार कुम्भज
*****
बस इत्ती सी तो....
अच्छा लगा था
जब बॉस ने बिना कहे,
बिना जताए, बिना बताए
ऑफिस की मेज़ पर
सेलिब्रेशन का एक बड़ा पैक
चुपचाप रख दिया था।
वो भावनात्मक रिश्ता
दिल से निकलकर
सीधे दिल तक पहुँच गया-
बस इतना ही तो चाहिए,
और बस…
हो गया नारी दिवस।
उफ़्फ… आज बहुत देर हो गई,
कब सुबह हो गई पता ही नहीं चला।
उन्होंने खिड़की से आती धूप को
बड़े करीने से
एक मोटी-सी चादर से ढक दिया,
ताकि मेरी नींद
ज़रा और ठहर सके।
आँखें भर आती हैं…
हम सच में
इतने से ही खुश हो जाते हैं।
कोई आडंबर नहीं,
कोई शोर नहीं—
बस इतनी-सी ही तो बात है।
आज काजल नहीं लगाया तुमने,
दो भौंहों के बीच
वो छोटी-सी बिंदी भी नहीं।
क्या हुआ उदास हो क्या?
बस इतना पूछ लेना ही
काफी होता है,
वरना हम तो
इतनी-सी केयर पर भी
पागल हो जाते हैं।
किसी राह चलती
एक स्त्री को
ससम्मान नज़र देना,
उसकी देह पर
तंज़ न कसना
बस इतना ही तो…!
सच कहूँ,
अगर ऐसे छोटे-छोटे स्नेह
हर दिन मिलते रहें,
तो फिर किसी
महिला दिवस की
ज़रूरत ही नहीं।
- सविता सिंह मीरा
*****
डरना मत मेरे बच्चों
कोई जब रोके
घर से निकलने से
तुम्हें स्कूल जाने से
खुल कर जीने से
डरना मत मेरे बच्चों।
तुम हार जाओगे
जिंदगी की रेस में
तुम्हें जाना होगा स्कूल
सही गलत को जानने के लिए
फैसले लेने के लिए
डरना मत मेरे बच्चों।
तुम्हें बनना होगा
बुद्ध सा बौद्धिक
रैदास सा चिंतक
कबीर सा प्रासंगिक
तुम 21वीं सदी के बच्चे हो
डरना मत मेरे बच्चों।
तुम्हें जानना होगा
आधुनिक रीति रिवाज
माँ बाप भाई भतीजावाद
उससे भी ज्यादा संवेदना
भूलना नहीं है संस्कार
तुम्हें संचार क्रांति भी
जानना होगा
डरना मत मेरे बच्चों।
- मनोज कौशल
*****
वफ़ा
फैला दो हवाओं में
पैगाम मेरा
कि हम तेरे शहर में
वफ़ा बाटने आये है।
लेकर ग़म तेरे
नसीब में अपने,
तेरा नाम अपनी
तकदीर लिखने आये है।
वो जो कहते हैं लोगों से
कुछ भी न मिलता
यूँ सोचने से
उनको कह दो
हम उनको अपने
नसीब में लिखने आए हैं।
- डॉ.राजीव डोगरा
*****
पिता
पिता पहेली नहीं है
वह बहुत ही सहज है
उसका हृदय
हमेशा बच्चों के लिए ही धड़कता है
उसका बच्चों को समझाना,
ज्यादा बकबक करना
कभी डाँट देना
उसके हृदय को मलिन नहीं बनाता
पिता की आत्मा गंदी नहीं होती
पिता पिता है
हमेशा गंगा की तरह
पवित्र आत्मा को ढोता हुआ
एक दैवीय वरदान।
- अनिल कुमार मिश्र
*****
यह दुनियां न तेरी न मेरी
यह दुनियां किसी की नहीं है जागीर
कठपुतली हैं सब यहां राजा हो या फकीर
अपना किरदार निभाकर सबको है जाना
मिलेगा वही किसी को जो लिख देती है तकदीर
कोई यहां गरीब है कोई जन्म से अमीर
ईमानदार है कोई किसी का मर गया है ज़मीर
तकदीर के भरोसे मिल रहा किसी को सब कुछ
कोई बन गया है राजा और कोई बना बज़ीर
न कोई किसी के साथ आता है
न कोई किसी के साथ है जाता
मिलना भी उसी से होता है यहां
जिससे होता है कोई पिछले जन्म का नाता
किस्मत में जो होगा वह मिलकर रहेगा
उसे कोई छीन नही पायेगा
जो हमारा नहीं है वह लाख कोशिश पर भी नहीं मिलेगा
उसे हथेली पर से छीन कर भी कोई ले जाएगा
छोड़ना पड़ेगा सब कुछ एकदम जब बुलावा आएगा
आंख बंद हो जाएगी कुछ देख नहीं पाएगा
दूर खड़े देखेंगे सब तेरी अंतिम विदाई
अपना जिसको समझता रहा पास आने से भी घबराएगा
- रवींद्र कुमार शर्मा
*****
विचारों का मंथन
मन के सागर में गहराई है,
लहरों में छिपे तूफ़ान भी हैं,
कभी प्रश्नों का घना अँधेरा,
कभी उत्तर के अरमान भी हैं।
जब भीतर हलचल होती है,
मन स्वयं से प्रश्न करता है,
विचारों का यह मंथन ही
जीवन का पथ निर्मित करता है।
कभी निकलता विष सा संशय,
कभी अमृत सा विश्वास,
संघर्षों की इस हलचल में
जगता है जीवन में नव प्रकाश।
टूटती हैं भ्रम की दीवारें,
जाग उठती है नई चेतना,
विचारों का यह गहरा मंथन
देता जीवन को नयी दिशा।
जब मन खुद को समझ लेता है,
सत्य से जब मिलन होता है,
तभी विचारों का यह मंथन
जीवन का साधन होता है।
उलझनों के इस सागर में
यही हमारा पतवार है,
विचारों का सच्चा मंथन ही
मनुष्य का असली आधार है।
- डॉ सारिका ठाकुर 'जागृति'
*****
बुढ़ापा और दवाओं का डिब्बा
अब हर सुबह का पहला किस्सा दवाओं का डिब्बा है,
जीवन की बची हुई सांसों का सहारा दवाओं का डिब्बा है।
कल तक जो घर हंसी से भरता था आवाजों के मेले में,
आज तन्हाई से बातें करता दवाओं का डिब्बा है।
कांपते हाथों में यादों की धुंधली-सी गर्मी बाकी,
वरना ठंडी रातों का साथी दवाओं का डिब्बा है।
धड़कनों की चाल संभाले बैठा चुपके से सिरहाने,
वक़्त से चुराया थोड़ा लम्हा दवाओं का डिब्बा है।
बेटे-बेटियां दूर शहर में अपने सपनों में खोए,
मां-बाबा की दिनचर्या का हिस्सा दवाओं का डिब्बा है।
आईने में झुर्रियों ने जब उम्र का सच दोहराया,
जीने की जिद को फिर समझाता दवाओं का डिब्बा है।
“वीरेंद्र” दर्द लिखे तो कागज़ भी नम हो जाता है,
शब्दों के साथ-साथ अब रोता दवाओं का डिब्बा है।
- वीरेंद्र बहादुर सिंह
*****
कर्ण-युवा प्रतिज्ञा
उठो हिंद के ओजस्वियों, अब रणभेरी बजने दो,
शौर्य-शिखर पर युवा शक्ति का, विजय-केतु सजने दो।
तुम वंशज हो उस महाबली के, जिसने काल को ललकारा,
सूतपुत्र की पदवी तजकर, भाग्य स्वयं अपना संवारा।
सुनो युवाओं! मित्रता का, अर्थ नहीं व्यापार है,
यह प्राणों की आहुति है, यह जीवन का आधार है।
कर्ण खड़ा था दुर्योधन संग, जब जग ने दुत्कारा था,
बिना लाभ की परवाह किए, उसने मित्र को संवारा था।
कवच दिया और कुंडल सौंपे, मृत्यु को भी दान किया,
केशव के मधु-प्रलोभनों का, हँसकर अपमान किया।
आज देश को चाहिए ऐसी, निस्वार्थ मित्रों की टोली,
जो राष्ट्र-धर्म की रक्षा में, हँसकर खा ले सीने पर गोली।
मिटा दो जाति-पाति के बंधन, संगठन की शक्ति बनो,
भ्रष्टाचार के सीने में, तुम जलती हुई उक्ति बनो।
क्या डरते हो बाधाओं से? तुम पर्वत के सर तोड़ो,
अन्याय खड़ा हो सम्मुख तो, तुम निर्भय होकर मुख मोड़ो।
यह देश नहीं केवल माटी, यह जागृत देव-स्वरूप है,
तुम हो इसके रक्षक वीर, तुम राष्ट्र-प्रेम का रूप हो।
स्वार्थ त्याग कर हाथ मिलाओ, कर्ण-सा अडिग विश्वास जगाओ,
भारत माँ के चरणों में, अपना सर्वस्व चढ़ाओ।
न पद की भूख, न यश का लोभ, बस विजय का विश्वास हो,
तुम्हारी रग-रग में बस, केवल हिंदुस्तान का वास हो।
उठो! कि तुम ही शक्ति हो, तुम ही कल का विधान हो,
तुम्हारे शौर्य से ही सुरक्षित, मेरा गौरवशाली महान हो।
- देवेश चतुर्वेदी 'ईशान'
*****
विश्वास किस पर करें
बातें बड़ी मीठी मीठी करते
अपनेपन का ढोंग भी करते
पर दिल में दुश्मनी छुपाए रखते
किस पर विश्वास करते
इसी असमंजस में सब रहते।
हर कोई सामने कुछ नहीं कहते
पीठ पीछे निंदा में ही समय बिताते।
आज इंसान इंसान से ही डरते
किस को अपना समझें इसी उधेड़बुन में रहते।
हर कोई ईमानदार बनते
फिर ये बेईमानी हेराफेरी कौन है करते।
सच्चे व निष्पक्ष उलझे से हैं रहते
चालाक चुस्त हवा के साथ है बहते।
कुछ तो गिरगिट को भी टक्कर देते
उनके हक की बात जब नहीं किया करते।
विनोद वर्मा
*****