साहित्य चक्र

07 August 2026

सच्चे और निस्वार्थ रिश्ते, आज के दौर की सबसे बड़ी पूंजी


जीवन के इस कठिन और तेज़ रफ़्तार दौर में जहाँ हर इंसान अपनी ही दुनिया, अपने स्वार्थ और व्यस्तता के इर्द-गिर्द घूमता दिखाई देता है, वहाँ कई बुनियादी मानवीय मूल्य पीछे छूटते जा रहे हैं। आज की इस स्वार्थी दुनिया में रिश्तों की नींव अक्सर लेन-देन और अपने फ़ायदे पर रखी जाने लगी है। ऐसे माहौल में सच्चे, निष्ठावान और निस्वार्थ रिश्ते किसी अनमोल मोती या उपहार से कम नहीं हैं।





निस्वार्थ रिश्तों का महत्व- किसी भी इंसान की असली दौलत उसके बैंक खाते या संपत्ति नहीं, बल्कि उसके वे वफ़ादार रिश्ते होते हैं जो ख़ुशी में मुस्कुराते हैं और दुख में ढांढस बंधाते हैं। एक सच्चा रिश्ता वह है जो किसी शर्त, पृष्ठभूमि या आर्थिक लाभ का मोहताज न हो। जो इंसान बिना किसी मतलब के आपका सम्मान करे, आपकी उपस्थिति की सराहना करे और बिना कहे आपकी तकलीफ़ को समझ ले, वही आपकी वास्तविक पूंजी है।

मुश्किल घड़ी में परीक्षा- रिश्तों की सच्ची पहचान हमेशा मुश्किल और परीक्षा के समय ही होती है। जब जीवन में संकट आता है, सफ़लताएं मुंह मोड़ लेती हैं और अपने भी अजनबी लगने लगते हैं, तब जो कुछ हाथ आपका सहारा बनते हैं, वही जीवन के असल स्तंभ होते हैं। कठिन समय में साथ निभाने वाले लोग इंसान को निराशा के अंधेरे से निकालकर नई उम्मीद और हौसला देते हैं।

रिश्तों की हिफाजत और समझदारी- आज के इस ख़ुदग़र्ज़ दौर में दिल से चाहने वाले लोग बहुत कम मिलते हैं। यही वजह है कि ऐसे रिश्तों की क़द्र करना, उनमें आने वाली दूरियों को समय रहते दूर करना और उन्हें संभालकर रखना ही असली बुद्धिमानी है। रिश्तों में अहंकार, ग़लतफ़हमियां और उपेक्षा दूरियों की वजह बनती हैं, जबकि विनम्रता, सहनशीलता और अपनापन रिश्तों को लंबे समय तक जीवंत रखते हैं।

जीवन संक्षिप्त है और यह सफर अकेले तय करना मुमकिन नहीं है। इसलिए अपने आसपास मौजूद उन निष्कपट और निस्वार्थ रिश्तों को पहचानिए जो आपसे किसी भी प्रकार की अपेक्षा रखे बिना जुड़े हैं। उनकी क़द्र कीजिए, उन्हें समय दीजिए और इन रिश्तों को सुरक्षित रखिए, क्योंकि यही वे पूंजी हैं जो इंसान को जीवन के कठिन रास्तों पर कभी अकेला नहीं छोड़ती।


- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़


लघुकथा- ममता






बात उन दिनों की है जब मैं बीएससी पार्ट वन में था। मेरा एडमिशन ज़रूर बुंडू कॉलेज में था लेकिन मैं रांची में लॉज में रहकर पढ़ाई करता था। चूंकि बचपन से मेरी परवरिश नाना के यहां हुई है तो अक्सर अपने घर से ज्यादा नाना घर ही आना-जाना होता था। यूं तो नाना घर वाले गांव से डायरेक्ट रांची के लिए काफ़ी सारी बसें चलती थीं लेकिन फिर भी सिल्ली से रांची तक ट्रेन का सफ़र न केवल स्टूडेंट होने के नाते सस्ता था बल्कि इस रूट की विहंगम प्राकृतिक छटा हर बार सफ़र को एक नया और रोमांचक अहसास प्रदान करता था।

इस रूट पर पहाड़ काटकर बनाए गए सुरंगनुमा रास्ते, दूर-दूर तक फैले अथाह साल के जंगल और पहाड़ियां, छोटी-छोटी नदी-नाले और बीच के छोटे-छोटे रेलवे स्टेशन किसी का भी मन मोह लेने को पर्याप्त थे। सिल्ली से रांची तक का भाड़ा मात्र ग्यारह रुपए ! सिल्ली एक छोटा सा शहर है और उस लिहाज़ से यहां का रेलवे स्टेशन भी काफ़ी साधारण सा था। गिनी-चुनी ट्रेनें ही यहां रुकतीं थीं इसलिए प्लेटफॉर्म पर उन दिनों एकाध छोटे-छोटे यात्री शेड और इक्के-दुक्के फल,खीरे और भुंजे बेचने वाले ही दिखते थे।

हमेशा की तरह उस दिन मैं जल्दी-जल्दी तैयार होकर रांची जाने के लिए पौने दस बजे स्टेशन पहुंच कर टिकट लेकर प्लेटफॉर्म पर दाखिल हो गया। टाटा-रांची मेमू पैसेंजर का समय दस बजकर दस मिनट था इसलिए मैं रिलेक्स होने के लिए प्लेटफॉर्म पर ही एक जामुन के पेड़ के नीचे बने चबूतरे पर बैठ गया। अभी बैठकर दस मिनट ही हुए थे कि अनाउंसमेंट हुआ कि हमारी ट्रेन डेढ़ घंटे लेट है। मेरे चेहरे पर हल्की सी उबासी आ गई क्योंकि एक तो ट्रेन पकड़ने की जल्दबाजी में तैयार नाश्ते को भी छोड़ कर आया था ऊपर से डेढ़ घंटे प्लेटफॉर्म पर टहलकर बोर होना पड़ता।






उन दिनों हम जैसे छात्रों के पास स्मार्टफोन भी नहीं थे कि रील्स घिसकर या फ्री फायर में धड़ाम-धूड़ूम कर टाइम पास कर सकूं। छोटा की-पैड फ़ोन ज़रूर था लेकिन उससे होगा क्या ? कोई गर्लफ्रेंड भी तो नहीं थी ! अचानक मेरी नज़र उसी जामुन के नीचे बने चबूतरे पर बैठकर चने,भुंजे और मूंगफली बेचती एक लड़की पर पड़ी। अक्सर उस जगह एक अधेड़ व्यक्ति बेचा करता था लेकिन आज़ उसकी जगह लड़की को बैठे देख कर मामूली सा प्रश्न भी मन में उठा। मैं सोचा भूख भी लग रही है तो इससे ही कुछ खरीदकर खा लेता हूं तो खाते-खाते टाइम पास हो जाएगा। मैंने दस का नोट उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा कि झालमूढ़ी बना दो। वो मुझसे पैसे लेकर चुपचाप झालमूढ़ी बनाने लग गई।

उसकी मासूमियत और खुबसूरती को मैं एकटक निहारते हुए सोचा कि कुछ बातें इसी से कर लेता हूं। पूरा इंटरमीडिएट बिना कॉलेज गये,बिना लड़की पटाए गुज़ार दिया था तो आज़ इसे देखकर मेरे लड़कपन की भावना थोड़ी-सी जाग गई। मैंने उससे पूछा -"तेरी जगह यहां जो बेचते हैं वो तुम्हारे पापा हैं क्या ?" उसने धीरे से कहा-"हां !" मैंने आगे पूछा कि "आज़ तुम क्यों बैठी हो ? तुम पढ़ाई नहीं करती क्या ?" उसने झालमूढ़ी का ठोंगा मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा-"पापा बाहर गए हैं तो यही हमारे पैसे कमाने का जरिया है तो मैं ही खोलती हूं अभी।

और बगल के स्कूल में पढ़ाई भी करती हूं। दसवीं का टेस्ट हो चुका है इसलिए अभी स्कूल नहीं जाना पड़ता है।" वो एक सांस में सबकुछ बोलती चली गई। उसके बात करने का अंदाज और उसकी मासूमियत मेरे दिल को छू गई। मैं झालमूढ़ी लेकर उसी के बगल में बैठ गया और इधर-उधर की बातें करने लगा। वो अपना काम भी कर रही थी और मुझसे बातें भी। उसने अपना नाम ममता बताया।बीच-बीच में कुछ और भी लड़के आकर कुछ खरीदने के बहाने उसे लाइन मार रहे थे। पता नहीं मुझे उन लड़कों से एक अजीब-सी चिढ़ हो रही थी,लग रहा था वो सिर्फ़ मुझसे ही बातें करे।

उसने मेरे में भी पूछा तो मैंने भी उसे सारी बातें बता दीं। बातों ही बातों में कब ट्रेन आने का वक्त हो गया मुझे पता ही नहीं चला। जब सचमुच ट्रेन आने वाली थी तो उस वक्त पता नहीं क्यों मुझे उसका साथ छोड़ कर जाने का मन नहीं कर रहा था,पर जाना तो था। मैं भारी मन से अपना बैग उठाया और कहा-"चलता हूं अब !" उसने मुस्कुराते हुए कहा- "आपसे बातें कर अच्छा लगा। फिर कब लौटना है ?" मैंने कहा-"पता नहीं !" ट्रेन प्लेटफॉर्म पर लग चुकी थी। चूंकि वहां ट्रेन सिर्फ एक मिनट के लिए ही रूकती थी तो मैं जल्दी से ट्रेन पर चढ़ गया।





चढ़कर मैं सीट की ओर नहीं जाकर गेट पर ही खड़ा होकर उसकी ओर ताकने लगा। वो लगातार मेरी ओर देख रही थी और साथ ही मुस्कुरा भी रही थी। अचानक ट्रेन खुली और धीरे-धीरे बढ़ने लगी तो जो कुछ हुआ मैं अवाक रह गया। जो काम एक लड़के को करना चाहिए वो काम वही कर गई ! मैं उसे जाते हुए भी बाय करने से आदतन डर रहा था कि वही पहले बाय कहकर मुस्कुराते हुए हाथ हिला दी। मैं भीतर से मस्ती में सराबोर हो गया और मैंने भी दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे स्टाइल में मुस्कुरा कर बाय कर दिया। ट्रेन खुलने से लेकर उसके बाय करने तक के छोटे-से लम्हे में हमारी आंखों की भाषा में जो बातें हुईं,उस पर एक और कहानी लिखी जा सकती है।

मैं थोड़ा संतोष और थोड़ी-सी उदास भावना लिए सीट पर जाकर बैठ गया। आज़ किता,गौतमधारा,गंगाघाट स्टेशनों की खुबसूरती में कुछ नयापन था। आज़ रास्ते की सुरंगों, जंगलों और नदियों के नजारे कुछ और ही थे। मैं उसी के ख्यालों में कब रांची पहुंच गया पता ही नहीं चला। इस वाकये के बाद काफ़ी बार नाना घर आना-जाना हुआ। लेकिन महज़ एक-दो बार ही उसका दीदार हुआ। उस वक्त उसके घर पर किसी का कोई फोन नहीं था कि नंबरों का आदान-प्रदान हो।

बस इन दो-तीन मुलाकातों में जो दो-चार बातें हुईं और आंखों से हुईं अनगिनत बातें ! इसके अलावा कभी न मेरी ओर से इज़हार हुआ और न ही उसकी ओर से ! कुछ महीनों बाद मैं अपने गांव चला गया। अब सिल्ली से रांची सफ़र का सिलसिला भी बंद हो गया था। वो कहां गई ये जानने का न जरिया मेरे पास था और न ही मैंने कोशिश की। पर जो भी हो ! वो छोटी-सी कहानी आज़ भी ज़ेहन में कभी-कभार आ ही जाती है। दुआ करूंगा कि जहां भी रहे वो बहुत खुश रहे।।


- कुणाल





05 August 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 6 अगस्त 2026









दोस्ती

अश्कों की नमी सी है दोस्ती हमारी,
छलक जाये बातों बातों पर मेरी तुम्हारी ।

युगों से चलती एक प्रेम की रीत पुरानी,
सिर्फ इस रिश्तें में चलती बचपन की नादानी।

पवित्र गंगाजल सी मन में समाहित हो जाती,
संज्ञा रहित मुझे पूर्ण की अनुभूति कराती।

बचपन जवानी बुढ़ापे की कहानी है जीती,
फिर भी नहीं लगता कोई निशानी बीती।

भोर और सांझ के निःस्वार्थ मिलन सी,
न वादे, न दायरे, न उम्मीदों की चुभन सी।

प्रार्थना,श्रद्धा,जड़ी बूटी का घुला अटूट मिश्रण,
मौन चुप्पी भाषा का करती बेजोड़ चित्रण।

अलंकारों, छंदों का उजास बिखेरती,
वक्त के दीमक को है पल में समेटती।

दूरियों में भी मेरे एहसासों को बांधती,
रूठने मनाने के न जाने कितने सिलसिले लांघती।


खुशी गम दोनों में संगम सी है मिलती,
गंगा जमुना के अविरल प्रवाह सी है चलती।


- अंशिता त्रिपाठी


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दोस्ती

दोस्ती नही कभी आजमायी जाती,
ये तो बस आपस में निभाई जाती।

ऊंच नीच का फर्क नही है दोस्ती में
बिना भेद के दोस्ती अपनाई जाती।

सवाल जबाब से परे रहती दोस्ती,
विश्वास एक दूसरे पर कमाई जाती।

दोस्त दूर या पास रहते सदैव खास,
दूरियां दिलों की इसमें मिटाई जाती।

मुश्किल में ढाल बन जाते हैं दोस्त,
दोस्ती ऐसी मुश्किल से पाई जाती।

जीवन को बीच मंझधार में नही छोड़े,
ऐसी दोस्ती कठिनाई से बनाई जाती।


काले धूसर रंगों से भरे जीवन को भी,
सतरँगी बनाना दोस्ती को बताई जाती।

दोस्ती नही कभी आजमाई जाती,
ये तो बस आपस मे निभाई जाती।


- रूचिका राय


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साथी

साथी, दो जिस्म एक है जान,
साथी है तो, काम सब आसान,
मन की सारी व्यथा
साथी ही है, जो सुनता।

औरों के क्या कहने,
रहते वो सदैव, छलने,
साथी, जीवन के आन, बान शान,
साथी है तो, तू है महान।


- चुन्नू साहा



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जंतर-मंतर

विज्ञान के
आने से
चमत्कार तो
बंद हुए
मगर
जंतर-मंतर
अभी भी
कायम हैं
कोई माने
या न माने
जंतर-मंतर
होता
जरूर हैं
कोकरोच किसी
और ने कहा
भड़का कोई
भूखा कोई
लठ्ठ खाये कोई
झुका कोई
इस्तीफा दिया कोई
मंत्री बना कोई
सच में
जंतर-मंतर
होता है!


- डॉ. जितेन्द्र बोयल


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पहला मित्र


हँसी बाँटी, आँसू बाँटे,
साथ चले हर धूप-बरसात।

न कोई बंधन, न अनुबंध,
मन से मन का था संबंध।

राहें भले बदल गईं आज,
स्मृतियाँ अब भी हैं हमराज़।

दूरी चाहे जितनी आए,
स्नेह कभी कम हो न पाए।

आज मित्रता-दिवस के दिन,
याद तुम्हारी आई फिर।

जहाँ रहो, मुस्काते रहना,
जीवन-दीप जलाते रहना।

पहला मित्र न भूल सकेगा,
मन जब तक धड़कन लिखेगा।


- नरेंद्र मंघनानी


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बस तेरा साथ चाहिए

भले ही राहें मुश्किल हों और मंजिल दूर,
पर तेरा साथ हो तो हर सफर मंजूर।
थामे रहना तुम हाथ मेरा...
हर वक़्त साथ चाहिए तुम्हारा।

मुझे चलने के लिए कारवाँ नहीं चाहिए
लड़खड़ा जाए पावं मगर,
ए दोस्त... बस हाथ चाहिए तुम्हारा,
हर वक़्त साथ चाहिए तुम्हारा।

नाराज़गी में भी एक आस होती है,
सच्ची दोस्ती वाकई हमेशा खास होती है।
लड़खड़ाने न देंगे कभी कदम तुम्हारा,
हर वक़्त साथ चाहिए तुम्हारा।


- सूरजमल AkS


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मैं चाहता हूं

जीवन को जीना एक ख्वाब है,
मैं उस ख्वाब से जीवन जीना चाहता हूं।

मिलती है हर कदम में ना उम्मीदियां मुझे,
मैं उन ना-उम्मीदिया के संग ख्वाब सजाना चाहता हूं।

यह जग नहीं प्रपंच है भ्रमों का
मैं उन भ्रमों से परे उम्मीदों का दीपक जलाना चाहता हूं।

तुम्हारा जाना, गमों का आना
ख्वाबों का टूटना, टूटे ख्वाबों के संग आँखों का रोना।

रोती आँखों से मन का विचलित होना, होते है जीवन के संग
इन सब को एक तरफ कर मैं अपनी
सफलता का प्रकाश बिखेरना चाहता हूं।

जीवन को जीना एक ख्वाब है,
मैं उस ख्वाब के संग जीवन जीना चाहता हूं।


- कमल जोशी


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डायरी की कहानी

वो डायरी,
जो महीनों से खाली थी।
खुलती रोज थी,
ओर वैसे ही बंद हो जाती थी।

फिर एक दिन आया,
जो शब्दों का सैलाब लाया।
जो बातें दिल तक नहीं रुकी,
वो डायरी में समा गई।

आज पन्नों पर स्याही है,
स्याही में शब्द हैं,
शब्दों में गहराई है,
और डायरी बोल रही हैं।

अब वो डायरी,
जो कभी खाली थी,
मुझसे बात करती है।
मैं उसे , वो मुझे,
अपने किस्से बताया करती है।


- दीपा पाण्डे


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"ताजा ताजा है"

उम्र पर धूल जमी वक्त की आंधियों की,
पर याद तुम्हारी आज भी ताज़ा-ताज़ा है

न शिकवा न कोई गिला है ज़माने से,
पर आज भी ये घाव मेरा ताज़ा-ताज़ा है

भुलाने की कोशिश में सावन भी गुज़र गया,
पर प्यार की बारिश आज भी ताज़ा-ताज़ा है

दफ़न कर दिए कई पन्ने खतों के,
पर उनकी खुशबू आज भी ताज़ा-ताज़ा है

रिश्तों के कई फूल मुरझा कर गिर गए,
पर उनकी चुभन आज भी ताज़ा-ताज़ा है


- रत्ना बापुली


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प्रेम-डोर जब थाम ली, जुड़ते सकल जहान।
अहं तनिक जो बीच में, उजड़े सब उद्यान॥

धागे के दो छोर हैं, दो जीवन के द्वार।
एक सँभाले याद को, दूजा दे विस्तार॥
कंपन-कंपन कह रहा, जीवन रचा विधान-
प्रेम-डोर जब थाम ली, जुड़ते सकल जहान॥

खींचा यदि अहंकार ने, टूटी हर पहचान।
जीत गए शब्दों मगर, हार गया इंसान॥
झुककर जिसने बाँध ली, वही रहता महान-
प्रेम-डोर जब थाम ली, जुड़ते सकल जहान॥

प्रेम न केवल भाव है, जीवन का आधार।
सूखे मन में भी जगा, हरियाला संसार॥
बाँट सका जो नेह को, पाया अमृत-दान-
प्रेम-डोर जब थाम ली, जुड़ते सकल जहान॥

विश्वासों की उँगलियाँ, थामे जब विश्वास।
अदृश्यों में दिखने लगे, सृष्टि-हृदय के पास॥
ब्रह्मांडों की डोर भी, प्रेममयी पहचान-
प्रेम-डोर जब थाम ली, जुड़ते सकल जहान॥


- डॉ. प्रियंका सौरभ


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निश्चल संवेदना

बदलते वक्त के साथ
बहुत कुछ बदलता देखा
मित्र को शत्रु बनते
शत्रु को मित्र बनते देखा।
जानता भी नहीं था जिनको
उनको अपना बनते देखा
और जानता था जिनको
उनको पराया होते देखा।
भागता रहा हमेशा ही
अपनों की तलाश में
खोजता रहा भावनाओं के द्वार
हर किसी के हृदय में।
अन्वेषण करता रहा
विचारों को समझने वालों की
खोजता रहा मन के मीतों को
जो समझ जाए मेरे हृदय की
हर निश्चल संवेदनाओं को।


- डॉ.राजीव डोगरा


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चूहे जो मिली सुंडी री गठी
सै पण्सारी बणी गया,
सुंडी री गठी रा खोली कन्ने पण्सारखाना
सै अमर हुई गया,
गल्ला कत्थी कन्ने लोक बणादें ख्वाणे,
बराक आई कन्ने जीभा ज़बानी पर
सै अमर हुई गया,
चूहे जो मिली सुंडी री गठी
सै पण्सारी बणी गया,
छड्डी दित्ते कुतरने लेफ रजाईयाँ
छड्डी दित्ता कड्डणा मस्सकेर,
पण्सारखाने रे चक्करा बिच पई कन्ने
भूली गया बिला रा बी फेर,
भूली गया बिला रा बी फेर,
देखी कन्ने बिल्ली मिंजो
तुनकणे लगी कानाओं अपणे
बणने लगी गई शेर,
तिस्सा जो देखी कन्ने, सोचा बिच पई गया चूहा
चार-चफेरे नज़रां घुमाईयाँ,करदा सोच-विचार -
सुंडी री गठी जे नईं मिली हुंदी
न आऊँदी आफ़त, न बणदा पण्सारी,
खरा था सै बिल, खरा था सै मस्सकेरा रा ढेर
न तुनकणे थे कान बिल्लिया, न तिस्सा बणना था शेर।


- बाबू राम धीमान


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फकीरों की संसार

ये है फकीरों की अद्भूत संसार
यहाँ नहीं लगती दौलत की बाजार
हर जन मस्ती में यहाँ है चूर
चिन्ता फिक्र है जहाँ से कोसों दूर

दिल से है हर जन जन धनवान
लुट खसोट की नहीं कहीं है दुकान
हर शख्स अपने में है यहाँ मगरूर
वैमनस्यता को ना जगह है हुजूर

हर मन में बसा है शांति की अरमान
सब ग्रामीणों पे रब है यहाँ मेहरवान
हर चेहरे पे झलकता यहाँ पे नूर
खुदा को भी है ये नगर मंजूर

भाईचारा की सबका जहाँ कारीबार
बेईमानों की ना है कोई भी व्यापार
ईमानदारी की है जहाँ रस्म। दस्तूर
हर जन जन पे छाई है हँसी की सरूर

काश ! इस जगत सा होता ये संसार
दुश्मन भी शर्म से हो जाता शर्मसार
दोस्ती के लिये हर मानव होता मजबूर
मस्ती में झूमता कण कण में मजकूर


- उदय किशोर साह


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आना-जाना लिखते हो।
खोना- पाना लिखते हो।

चुन-चुन कर अल्फ़ाज़ सही,
हाल ज़माना लिखते हो।

लिखते हो बातें अपनी,
सच बेगाना लिखते हो।

ग़ज़लों में तुम जीवन का,
ताना -बाना लिखते हो।

दिखलाकर सबको सपना,
मन समझाना लिखते हो।

मुश्किल,आसाँ हो सबका,
आबो-दाना लिखते हो।

बातों ही बातों में तुम,
तीर चलाना लिखते हो।


- नवीन माथुर पंचोली


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नारी

नारी की क्या परिभाषा दूं।
वो तो जग की एक आशा है।
उसकी शक्ति और प्रेम ही तो है जो,
इस घर को मंदिर बनाती है।

पूजा है, अर्चना है,
वो शंकर की साधना है।
कभी रीति के रिवाजमें,
वो देवी है हर लिबाज में।

ज्वाला है, पवन है,
वो बहती शीतल गंगा की धारा है।
कविता है, कहानी है,
वो हर महाकाव्य की गाथा है।
लक्ष्मी है, सरस्वती है
वो रणभूमि की महाकाली है।

भक्ति है उस नारी की,
शक्ति है उस चिंगारी की।
जितना तुम उसे दबाओगे
एक ज्वाला को भड़काओगे।

देखा तप-तप के शोलों पे,
ये जल-बन चुका ज्वाला है।
तोड़ बेड़ियाँ सदियों की,
अब नारी ने रण संभाला है।

छोड़कर शृंगार रस की बातें,
शक्ति ने उठालिया भाला है।
जीत लिया ज़मी से नभ तक,
इतिहास नया रच डाला है।
निकल के खुले गगन में,
पहनी विजय श्री माला है।

जिससे पूर्ण होता है ब्रह्मांड,
यही तो नारी की परिभाषा है।


- समृद्धि विश्वकर्मा


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आपका परिचय

आपकी परिचय है खुद आपकी व्यवहार
वार्तालाप का लहजा बताता है संस्कार
चाल चलन है नमूना तेरा तेरे का परिवार
कुछ पूछने बताने की नहीं है अब दरकार
आपकी करतूत से दिखता आपकी विचार
सूरत आपका बतलाता है आपकी संसार
संवाद दिखलाता है आपकी अहंकार
कुछ पूछने बताने की है नहीं अब दरकार
करते हो पड़ोसी से गर नित्य ही तकरार
पता चलता है आपके जेहन की कुविचार
तेरी आदत बन गई तेरी ही। सहचार
कुछ पूछने बताने की नहीं है अब दरकार
गुरूर से पता चलता है तेरी घर का द्वार
हनक दिखलाता है तेरी कितना हो समझदार
जिद बालाता है तेरी खुद की आचार विचार
कुछ पूछने बताने की नहीं है अब दरकार
घमंड की बगिया को है जो भी बयार
औछेपन की नगरी का हो तुम बाजार
बात बात पे करते है किसी के साथ र्दुव्यवहार
कुछ पूछने बताने की नहीं है अब दरकार


- उदय किशोर साह


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दो लफ़्ज़ लिखूँ माँ के लिए,
पर क्या ही लिखूँ
प्यार लिखूँ या संसार लिखूँ
या अपने जीवन का सारांश लिखूँ,
दो लफ़्ज़ लिखूँ वह भी कम
आखिर क्या ही लिखूँ,
मैं इतना कामयाब नहीं
कि माँ के बारे में कुछ लिख सकूँ,
दो लफ़्ज़ लिखूँ माँ के लिए
पर क्या ही लिखूँ,
माँ के होने से जीवन में खुशी
उन्नत प्रगति है,
दो लफ़्ज़ लिखूँ आखिर क्या ही लिखूँ,
माँ का होना क्यों जरूरी है
इसके बारे में क्या ही लिखूँ,
दो लफ़्ज़ लिखूँ माँ के लिए
पर क्या ही लिखूँ।


- प्रीत मौर्या


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अपने ज़मीर से लड़लूं, कोई अखबार हो जाऊं

​हक़ की बातें न करूं मैं सच्चाई से दूर हो जाऊं,
अपने ज़मीर से लड़लूं, कोई अख़बार हो जाऊं।

​मेरे दिल को हो गया भरम कि मैं फ़रिश्ता हूं,
मगर डर लगता है ज़माने से इंसान हो जाऊं।

​तिजारत का है बाज़ार, हर चीज़ यहां है सस्ती,
ज़माने के साथ चलूं ईश्क़ का बाज़ार हो जाऊं।

​उससे है गर मुहब्बत तुझको तो सोचना क्या है,
बेहतर है कि बस उसका ही तलबगार हो जाऊं।

​ग़लतियां मेरी नहीं हैं फ़िर भी अब बहुत सोचूं,
बड़ा हूं घर का अब मैं ही समझदार हो जाऊं।

​ईश्क़ के सभी रिश्ते यहां कच्चे धागों से बंधे हैं,
मैं भी इस खेल का मुश्ताक़, फ़नकार हो जाऊं।


- डॉ. मुश्ताक अहमद शाह "सहज़"


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तुम्हारी गलियों का कुछ और सच है,
सिर्फ चुप रहना ही तुम्हारा कवच है।

करके भरोसा नक्शे कदम पर चला,
आंख खोला तो हर कदम पर गच है।

हर चाहतें लूटा दी सिर्फ तेरे भरोसे पर,
सबकुछ पचाने वाले! ये क्यों अपच है?

सनद रहे चोरी सीनाजोरी सदा नहीं चलती,
बाहर मौन है मगर अंदर रहा शोर मच है।

विकास उसके सर से पगड़ी उतरेगी एकदिन जरूर,
सर छुपा के जिन्दा है भला बताओ कैसा सरपंच है ?


- राधेश विकास


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सावन की बूँदे

मुझे सावन की बूंदों से
बहुत सी बातें करनी है,
बहुत कुछ पूछना है...
जब तुम मोती बनकर
ठहर जाती हो पत्तों पर,
क्या भय नहीं होता
अपने अस्तित्व के अंत होने पर ?
जब गिरती हो किसी की
कोमल हथेली पर,
सच सच कहना...
क्या जी लेती हो जी भर ?
तुम हमेशा बिछड़ जाती हो
अपने बादलों से ,
फिर उनसे मिलन कब होता है ?
क्या तुमसे बिछड़कर
तुम्हारी तरह बादल भी रोता है ?
कर देती हो ये धरा हरी भरी
लेकिन तुम पगली प्यासी सी
किसी ओस के पत्ते पर पड़ी,
निहारती हो धूप को,
खुद का अंत होने तक
सावन की बूंदों मुझे तुमसे
बहुत कुछ पूछना है ...
आखिर इतना धैर्य तुम कहां से लाती हो ?
समुंदर में गिरो तो सीप का मोती
मिट्टी में गिरो तो खुशबू बन जाती हो।


- मंजू सागर


*****