साहित्य चक्र

29 June 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 29 जून 2026





पिता से जान मेरी
पिता से पहचान मेरी
पिता से मान मेरा
पिता से अभिमान मेरा
पिता की परी हूं
पिता की राजकुमारी हूं
पिता का गुरूर हूं
पिता का सम्मान हूं
पिता का खून हूं
पिता का नशा हूं
पिता का स्वप्न हूं
पिता का जहाँ हूं
पिता की अस्मत हूं
पिता का अस्मत हूं
पिता का सितारा हूं
पिता का चाँद हूं
पिता का सूरज हूं
पिता है तो जहां है
पिता है तो जीवन है
पिता से ही रिश्ते हैं
पिता से ही कुल है
पिता से ही सुख है
पिता दुखों का नाश है
पिता सुखों की आस है
- सुमन डोभाल काला


*****


चिट्ठी

बहुत दिनों बाद
मन हुआ कि चिट्ठी लिखी जाए-किसी अपने को
किसको सम्बोधित कर लिखूँ लेकिन ?
रिश्तेदारों को तो चिट्ठी -पत्री पढ़ने में कोई खुशी नहीं मिलती है,
ना ही वे लिखते हैं।

फिर किसे लिखूँ ?
सोचता हूँ, सबसे पहले लगातार अपनी धुरी पर घूमती हुई
पृथ्वी को लिखता हूँ।

फिर लिखूँगा, चमकते हुये उगते सूर्यदेव को
जिससे हम मनुष्यों और तमाम जीव-जंतुओं को
ऊर्जा मिलती है।

फिर लिखूँगा, चन्द्रमा को
उनसे मामा-भांजे का सम्बंध जो स्थापित है-आज भी।

फिर लिखूँगा हवा को
उसकी पीठ पर ही उसको चिट्ठी लिखूँगा।

फिर लिखूँगा, अपनी जगह अडिग हिमालय पर्वत को
जो अपने भीतर न जाने कितनी औषधीय पौधे समेटे खड़ा है
आभार सहित लिखूँगा।

नदी के सीने में लिखूँगा तमाम जल-कोषों के नाम।

वृक्षों-पौधों को लिखूँगा सारे पंछियों को भी।

लिखूँगा चिट्ठी आज
और कुछ नहीं तो आकाश के सीने में सभी को
सम्बोधित करते हुए लिखूँगा
ताकि सिर उठाकर सब पढ़ सके
एक ही चिट्ठी सबके नाम


- सुधीर कुमार सोनी



*****


पिता

पापा आपसे कुछ कहना था,
संघर्षशील राहों की थकान
जो आपने मेरे लिए सही थी।

आज मैं उसी राह पर हूं,
बस यही आपसे कहना था।


- कांता शर्मा


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स्त्री का रोना

स्त्री जब रोती है,
तो उसके आँसुओं के पीछे छिपे
दर्द का कारण समझ पाना
अक्सर कठिन हो जाता है।
उसकी आँखों से बहती हर बूँद
अपने भीतर अनगिनत अनकही कथाएँ
और मौन पीड़ाएँ समेटे होती है।
उसके आँसू सदैव से पुरुष मन को
एक ऐसे असमंजस के
द्वार पर लाकर खड़ा कर देते हैं,
जहाँ वह चाहकर भी
उसके अंतर्मन की गहराइयों को
पूर्णतः समझ नहीं पाता।


- सुभाष 'अथर्व'


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हर बार अफसोस जताते है,
सुधरने का नाम नहीं लेते है।
कभी शासन, कभी प्रशासन
के सिर जिम्मेदारी मड़ देते हैं।
हर बार, एक जैसा व्यवहार...
मृतकों को जातियों में बांट देते हैं।
जब अपना कोई मरता है, तो
फिर हम नंगा रोना रोते हैं।
आखिर कितने बेशर्म हैं हम!
सुधरने का नाम नहीं लेते हैं।
एक नागरिक के रूप में, हम
जिम्मेदारी क्यों नहीं लेते हैं ?


- दीपक कोहली


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तू ही तू

यूं तो जिंदगी में किस किसका
ना मलाल किया ?
उफ्फ!
कम्बख्त याद भी आई तो तेरी आई।
महफिल में बैठकर जिक्र हुआ
तमाम मुद्दों पर मगर
हर मुद्दे पर बात भी आई तो तेरी आई।
मुआमला दिल का था,
फिर दिन क्या और रात क्या ?
दिन तो मेरे रहे लेकिन
ये रात भी आई तो तेरी आई।
मेरे हिस्से में आए
ये मंदिर, ये पीर और दरगाह
मीरा जैसा ये दिवानापन,
लेकिन जब भी सिर झुका
लब पर,
मुराद भी आई तो तेरी आई
मना लिया था खुद को
कि मेरा दिल छोटा है
तेरी हैसियत के हिसाब से,
अरे पागल ! आंखों में बनकर
मेरे आंसू,
सौगात भी आई तो तेरी आई।
मैंने कब किसी और को सोचा
तेरे बगैर,
तेरी वफ़ा, तेरा गुमां
हर तरफ तू ही तू
मेरे ख्यालों में भी कभी,
बारात भी आई तो तेरी आई।


- मंजू सागर


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तुम आना तो
मेरे शहर की हवा सुनना,
यहाँ हर झोंके में
अपनों की दुआ बसती है।

मैं तुम्हें लिखना चाहती हूँ
हमारी मिट्टी को मिलाकर,
ताकि मेरी लिखावट
हमेशा घर की खुशबू बन जाए!

तुम आना तो
मेरे शहर में ठहर जाना,
यहाँ एहसासों की धूप में
अपनों की यादें महकती हैं।

मैं तुम्हें पढ़ना चाहती हूँ
बंद लिफ़ाफ़ों के अल्फ़ाज़ से,
ताकि मेरी लिखावट
तुम्हारा जीवन गीत बन जाए!


- अंशिता त्रिपाठी


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उफ्फ्फ! यह चाय

आज फिर वही रस, वही तृप्ति,
युगों बाद जागी वह सुवास,
या कोई गुप्त रहस्य छिपा है,
जिसकी लगी रहती है आस।

कतिपय अनकहे शब्द मौन के,
घुल जाते चाय में हर बार,
मात्र तुम्हारी सुधि आते ही,
जीवंत हो उठता वही स्वाद।


- सविता सिंह मीरा


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हम हैं गुनहगार

तुँ जननी तुँ भगिनी है   तुँ नारी
खुद दर्द पीकर जीवन है संवारी
तेरी करूण कथा पे हम शर्मसार
हम पुरूष वर्ग   तेरी है गुनहगार

दहेज की लोभ में जिन्दा जलाया
क्रूर जलालत की तमगा पहनाया
भोग्य वस्तु तुम्हें माना एक उपहार
परिजन की खिदमत में तुम गई हार

वंश बेल तुमने हमारी आगे बढ़ाया
खुद बेदना झेल खानदान की साया
तेरी कुर्बानी  पे हम हैं तेरी कर्जदार
फिर भी ना समझा नादान संसार

मायके की मोह त्याग पिया घर आई
पति की सेवा में खुद को तुम लुटाई
तेरी आँचल में हम पाया गुलजार
फिर भी ना हुए हम तेरी वफादार

शराबी बन कर जब जब घर आया
प्रेम से तुमने हमें मेरे लिये समझाया
फिर भी तुम्हें हमने दिया डंडे की मार
अपशब्दों की पहनाया गले में हार

तेरी इज्जत पे आँच कभी जब आया
महाभारत का दृश्य तब पूर्वज ने सजाया
फिर भी हमने दी तुमको घृणित बाजार
कितना गिर गया पुरूष आज मेरे यार


- उदय किशोर साह


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ढलती शाम का सफ़र
सांझ ढली है, सूरज लाल,
पेड़ों के पीछे छुपा गुलाल।
कच्ची सड़क पर उड़ती धूल,
घर लौट रहे हैं सब  जल्दी जल्दी,
अपनी धुन में हैं मशगूल।
मोटरसाइकिल की जलती लाइट,
धीमे-धीमे होती अंधेरी नाइट।
आगे-आगे दौड़ती ज़िंदगी की गाड़ी,
पीछे छूटती खेतों की क्यारी।
बैलगाड़ी पर लदा सूखा घास,
दिलाता है गुज़रे ज़माने का अहसास।
दूर कहीं एक धुंधली सी राह,
थके हुए कदमों को घर की चाह।
यह ढलता सूरज, यह शांत समां,
कहता है, थम गया है जहां।
दिनभर की मेहनत का सुंदर ये अंत,
गांव की शाम है बड़ी जीवंत।


- डॉ. मुश्ताक अहमद शाह


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बीते लम्हों की खुशबू

बीते लम्हो की खुशबू, आज भी दिल में है समायी,
भले, बीते दिन अनेक, मगर आज भी याद नहीं है गयी।

शहर की आबोहवा मे,हाँ कुछ वक्त को है भूले,
लेकिन जैसे ही फुर्सत में होते है,याद आते है गाँव के झूले।

गाँव के वो सब खेत खलिहान, बगीचे बाग याद है सब,
दोस्तो के संग लुकाछिपी, गाय चराने भी याद आते है अब।

माँ की डांट, चाची की गोद,बुआ की पुचकार,
दादा दादी के साथ मस्ती की याद है बरकरार।

सबकुछ याद आज भी खूब मन में है आते,
उन लम्हो को याद कर, मन है तडप जाते।

ये गाँव मे बिताये गये लम्हे, बहुत ही यादगार है,
उन लम्हो की खुशबू आज भी मन मे बरकरार है।

शहर की भीड़ वाली जिदंगी से मन उबकने है लगी,
गाँव मे बिताये गये हर पल अब,याद आने है लगी।

रिश्ते मे संबंध के नाम हे सबो को थे जानते,
जहाँ हरेक किसी का प्यार खूब थे मिलते।

यहाँ शहर मे तो बस,अप ने और अपपे के मतलबी बने,
रिश्ते का प्यार छोड़ो, रिश्ते मे संबंध मे लगे कटने।

सुख दुख की सहभागिता में पूरे गाँव इकट्ठा थे होते,
यहाँ तो शहर मे,बस अपने से ही सब है संभालते।

बस अब तो मन उचटने से लगा है, शहर से मेरा,
गाँव की हरेक लम्हे को खुशबू याद आने लग है सारा।


- चुन्नू साहा



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सुलझा लो...

सुलझा लो वक्त रहते,
उन रिश्तों को ज़रा,
जो खामोशियों की गाँठों में
कहीं उलझ गए हैं।
बस एक बात न कह पाने से,
जो अंदर ही अंदर
धीरे-धीरे बिखरने लगे हैं।

ज़रा सोचो तो...
आख़िर ऐसा क्या है,
जो प्रेम से भी बड़ा हो गया?
कौन-सी वह बात है,
जो एक छोटी-सी नाराज़गी को
इतना विशाल बना रही है?

जिस लड़ाई में जीतकर भी
चेहरे पर मुस्कान न लौटे,
वह जीत भला किस काम की?
जब चोट उसे लगे,
और दर्द तुम्हें हो,
तो यह अहंकार...
यह ज़िद...
आख़िर किस काम की?
थोड़ा तुम झुक जाओ,
थोड़ा वह भी संभल जाएगा।

यक़ीन मानो,
धीरे-धीरे सारे गिले-शिकवे
अपने आप मिट जाएँगे।
कोई रिश्ता ऐसा नहीं
जहाँ कभी नाराज़गी न हो।

मगर रिश्ते
नाराज़गी से नहीं,
एक-दूसरे को मनाने की चाह से
ज़िंदा रहते हैं।
बस एक बार पहल करके तो देखो...
क्या पता,
कौन-सी मुलाक़ात आख़िरी हो,
कौन-सी बात आख़िरी हो,
और कब किसी अपने को
मनाने का अवसर ही न मिले।

रिश्तों को जीतने की नहीं,
निभाने की कोशिश कीजिए।
क्योंकि अपने,
बहस से नहीं...
प्रेम से अपने बने रहते हैं।


- नरेंद्र मंघनानी


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दिलों में अनगिनत जज़्बात हैं

अधूरे सपनों की रात है,
धीरे - धीरे ढल जाएगी,
चंद दिनों की ही तो बात है।
होगी उनसे भी मुलाकात,
दिलों में अनगिनत जज़्बात हैं।


- चेतना सिंह 'चितेरी



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नशे में डूब रही है जवानी

न वह चूल्हे की रोटी न वह घड़े का पानी
बदल सी गई कुछ ऐसी ज़िंदगानी
बुढापा भी कुछ और सा बीत रहा अब
अलग ही चाल चल रही कुछ आज की जवानी

नशे की स्याही से लिख रहा युवा
आज की अपनी यह कहानी
उस देश का भविष्य क्या होगा
जहां नशे में डूब रही है जवानी

सुनते किसी की नहीं करे अपनी मनमानी
जान कर भी अनजान हैं कर रहे नादानी
किस दिशा में जा रही आज की युवा पीढ़ी
कैसे हो गई यह नशे की दीवानी

नशे के कारोबार में जो लिप्त है
खून नहीं उनकी रगों में है पानी
अपनी औलाद भी जब करेगी नशा
तब बनेगी फिर एक नई कहानी

आज की पीढ़ी को बहुत मुश्किल है समझाना
अच्छा नहीं लगता उनको बार बार बताना
टोका टोकी तो बिल्कुल भी पसंद नहीं
मन की करेंगे चाहे इधर से उधर हो जाये जमाना

बुजुर्गों की बातों की हंसी हैं उड़ाते
आजाद रहना चाहते हैं बन्धन उनको नहीं भाते
कैसा मुश्किल का दौर है यह आया
मां बाप को बृद्धाश्रम पहुंचाने में नहीं है शर्माते


- रवींद्र कुमार शर्मा



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अनकहा इज़हार

हां मैं लिखता हूं
सिर्फ लिखने के लिए नहीं
अपने जज्बातों के
इज़हार के लिए भी

हां मैं लिखता हूं
हर अल्फ़ाज़ में तुमको
मगर कहता नहीं कभी
अपने लफ्जों में तुमको

हां मैं लिखता हूं
अपने हृदय की
गहरी अनुभूति के साथ
मगर जाता नहीं कभी
अपने जज्बातों के आर पार।


- डॉ. राजीव डोगरा


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मानवीय संवेदनाएँ

मानवीय संवेदनाएँ शून्य हो गई हैं,
कुछ लोग सबकी ज़िंदगी से खेल रहे हैं।
क्या पैसा इतना ज़रूरी हो गया है,
कि इंसानियत का मूल्य ही खो गया है?
ज़िंदगी तो बहुत छोटी होती है,
क्या कोई धन साथ लेकर जाता है?
क्यों नहीं सोचते लोग यह बात,
केवल कर्म ही अंत तक साथ निभाता है।
उन मासूमों का क्या दोष था,
जो असमय काल के गाल में समा गए।
उन माताओं का क्या हाल होगा,
जिनकी गोद हमेशा के लिए उजड़ गई।
आँखों के आँसू अभी सूखे भी नहीं,
पर कुछ समय बाद लोग सब भूल जाएंगे।
फिर होगा कोई और हादसा,
और हम केवल शोक मनाते रह जाएंगे।
क्या प्रशासन फिर भी नहीं जागेगा?
क्या वह केवल अपनी जेबें भरता रहेगा?
जिस दिन किसी बड़े व्यक्ति का अपना दुख होगा,
शायद तभी वह इस पीड़ा को समझ पाएगा।


- गरिमा लखनवी


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21 June 2026

काफल: उत्तराखंड के पहाड़ों से जुड़ी मेरे बचपन की मीठी यादें

उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में पला-बढ़ा मेरा बचपन प्रकृति की गोद में बीता है। गर्मियों के दिन आते ही हमें काफल के पकने का बेसब्री से इंतजार रहता था। खेतों के किनारे और जंगलों में लगे काफल के पेड़ हमारे लिए किसी खजाने से कम नहीं थे। स्कूल जाते समय, छुट्टियों में और खाली समय में हम अपने दोस्तों के साथ पेड़ों पर चढ़ जाते थे और घंटों काफल खाते रहते थे। उस समय न मोबाइल का आकर्षण था, न कंप्यूटर और न ही टीवी की दुनिया का प्रभाव। हमारा बचपन प्रकृति के साथ बीता और शायद यही कारण था कि हम शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ और मजबूत रहे।




हम केवल पके हुए काफल का ही आनंद नहीं लेते थे, बल्कि कच्चे काफल का स्वाद भी हमारे लिए किसी विशेष व्यंजन से कम नहीं था। दोपहर के समय जब घर के बड़े-बुजुर्ग आराम कर रहे होते थे, तब हम सब दोस्त चुपके से कच्चे काफल इकट्ठा करते। फिर सिलबट्टे में पीसे हुए नमक में थोड़ा सरसों का तेल मिलाकर उसके साथ कच्चे काफल खाते थे। उसकी खट्टी-तीखी स्वादिष्टता आज भी याद आते ही मन को बचपन की गलियों में पहुँचा देती है।





जब हम अपने माता-पिता के साथ उत्तराखंड के जंगलों में जाते थे, तब भी पेड़ों पर चढ़कर काफल तोड़ना और वहीं बैठकर खाना हमारे लिए सबसे बड़ा आनंद होता था। हमने इस प्राकृतिक फल को खूब खाया, लेकिन कभी इससे हमारी तबीयत खराब नहीं हुई। स्थानीय लोगों के अनुभव और कई वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार काफल में अनेक लाभकारी गुण पाए जाते हैं, जो स्वास्थ्य के लिए उपयोगी माने जाते हैं।


आश्चर्य की बात यह है कि अनेक शोधों के बावजूद आज भी काफल की व्यावसायिक खेती करना आसान नहीं हो पाया है। यह फल विशेष प्रकार की मिट्टी, ठंडी जलवायु और उत्तराखंड जैसे पहाड़ी वातावरण में ही अच्छी तरह पनपता है। शायद यही कारण है कि यह दुर्लभ होता जा रहा है और बड़े बाजारों में बहुत कम दिखाई देता है।


आज हम बड़े हो गए हैं। जीवन की भागदौड़ में वही काफल हमारे लिए एक दुर्लभ स्वाद बन गया है। आज भी जब स्कूल के पुराने मित्र मिलते हैं, तो बचपन की वही बातें छिड़ जाती हैं- पेड़ों पर चढ़ना, जंगलों में घूमना, कच्चे काफल को नमक और सरसों के तेल के साथ खाना और बिना किसी चिंता के प्रकृति के साथ जीना।


आज हम उसकी तस्वीरें देखते हैं और मन ही मन यही सोचते हैं- काश! उत्तराखंड के पहाड़ों में बिताए गए वे बचपन के दिन फिर लौट आते और हम एक बार फिर अपने दोस्तों के साथ पेड़ों पर चढ़कर उसी काफल का स्वाद ले पाते। मेरे लिए काफल केवल एक फल नहीं, बल्कि उत्तराखंड की मिट्टी की खुशबू, पहाड़ों की संस्कृति, दोस्तों का साथ और बचपन की अनमोल यादों का एक जीवंत हिस्सा है।


- बीना सेमवाल


आज की प्रमुख रचनाएँ- 21 जून 2026





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पिता ने सिखाया

सिखाया पिता ने यही सिखाया
हार जाना पर कभी भी हार नहीं मानना
हार जो मानोगे तो लड़ना भूल जाओगे
शत्रुओं से फिर कभी भी लड़ नहीं पाओगे
ग़ुलामी करोगे, ग़ुलाम ही कहलाओगे
सड़ा दिए जाओगे दलदली-यातनाघरों में
ज़रा भी पूछना नहीं पड़ेगा पता नरक का
नरक होगा पल-पल पूरा आमने-सामने
नहीं चाहोगे अंतत: फिर भी भुगतोगे
ऑंखें होते हुए भी मगर जान नहीं पाओगे
करोगे क्या ऐसा जातक जीवन पाकर
चाहोगे पर चाहकर भी मर नहीं पाओगे
सिखाया पिता ने यही सिखाया।


- राजकुमार कुम्भज


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दिल में दबाते हो दर्द को तुम, लवों पर क्यूँ लाते नहीं हो,
समंदर समेटे हो अश्कों का भीतर, आँखों से क्यूँ इन्हें बहाते नहीं हो।
हँसते रहते हो फीकी सी हंसी, नकाब क्यूँ हसी का हटाते नहीं हो,
चाहते हो बताना हर बात तुम, चाहकर भी क्यूँ मगर बताते नहीं हो।
दिल में दबाते हो दर्द को तुम, लवों पर क्यूँ लाते नहीं हो।

कशमकश बहुत है भीतर-भीतर, बाहर क्यूँ इसे लाते नहीं हो,
आँखे बंद करके करते हो इबादतें, मंदिर मस्जिद क्यूँ जाते नहीं हो।
लाख पूछने पर भी हमें तुम, बात दिल में दबी क्यूँ बताते नहीं हो,
झुकी नज़रों से देखते हो तुम, नज़र से नज़र क्यूँ मिलाते नहीं हो।
दिल में दबाते हो दर्द को तुम, लवों पर क्यूँ लाते नहीं हो।

गहरी किसी ठोकर से घायल हो तुम, जख्मों को क्यूँ दिखाते नहीं हो,
महफ़िल में भी रहते हो गुमशुम, वजह क्यूँ इस चुप्पी की बताते नहीं हो।
गुनगुनाते हो तन्हाई में बहुत, राग-ए-दिल क्यूँ महफ़िल में गाते नहीं हो,
आ जाने दो आँधियों को एक बार तुम, उठते तूफानों को यूँ दबाते नहीं है।
दिल में दबाते हो दर्द को तुम, लवों पर क्यूँ लाते नहीं हो।


- धरम चंद धीमान



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इतनी सी जिंदगी

दो जून की रोटी,
दो कपड़े,
दो ईंटों का घर,
दो मीठे बोल,
दो कदम हमसफ़र
दो पल का चैन-
बस इतनी सी तो होती है ,
दो दिन की असल जिंदगी।


- रोशन कुमार झा



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बड़ा बड्डीखणा बी खरा नी हुन्दा
एड़ा गल्लांन्दे आए स्याणे,
कर ले सब्र, जे आई ख़बर
फेरी बादा बिच पऊंणा पच्छ्ताणे

ओच्छे बणी कन्ने, कुछ नी मिलदा
चार दिना री हुन्दी बड्डीयाई,
फेरी नी पूछदा कोई भाईयों
याद आऊँदी फेरी अपणी कमाई,

ओच्छे अपणा, ओच्छपण नी छड्डदे
चाहे बादा बिच पओ पच्छ्ताणे,
चौहट्टे-चबारे फेरी गल्लां लगदिया
लोक हंसदे,तान्ने कसदे, याद आऊँदे फेरी स्याणे,

अक्कड़ बुरी, अकड़ना तिस दे बी बुरा
न मिलदा कुछ कुसी जो, ना ई आऊँदा पूरा,
कर सुरत, रह नीठा,छड्ड दे बड्डीखणा ओ बन्देया
निवां बणी कन्ने चल, आई नी पऊणा पच्छ्ताणे,

गल्लां हुंदियाँ सच्चीयाँ, लोक बणादें ख्वाणे
जीभा ज़बानी ये गल्लां चड़दियाँ स्वाद कोई क्या जाणे ?
कर ले अम्ल, बान गठ्ठी, याद आऊँदे फेरी स्याणे
रसभरूरिया ये गल्लां लोकों, कीमत कोई क्या जाणे ?


- बाबू राम धीमान



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-पिता कब अच्छे दोस्त बन गए... पता ही नहीं चला!

बचपन में जिनसे सबसे ज़्यादा डर लगता था,
आज उन्हीं से हर बात कहने का मन करता है।

जो कभी कहते थे- "इतना मत हँसो..."
"समय पर घर आना..." "पढ़ाई पर ध्यान दो..."
तब लगता था, ये सिर्फ़ रोकते-टोकते हैं।
लेकिन समय ने धीरे-धीरे बताया...
वे रोक नहीं रहे थे,
वे जीवन की ठोकरों से बचा रहे थे।

एक उम्र के बाद एहसास हुआ कि
पिता के पास हर सवाल का उत्तर नहीं होता,
लेकिन हर मुश्किल में कंधा ज़रूर होता है।

अब उनसे बातें होती हैं... कभी व्यापार की,
कभी परिवार की, कभी जीवन की,
और कभी बिना किसी वजह के भी।

अब समझ आता है, वे केवल पिता नहीं,
मेरे सबसे सच्चे, सबसे मौन और
सबसे भरोसेमंद दोस्त हैं।
दोस्त वह नहीं जो हर बात पर "हाँ" कह दे,
दोस्त वह है जो आपकी भलाई के लिए
ज़रूरत पड़ने पर "ना" भी कह सके।

शायद इसी लिए... पिता पहले अनुशासन बने,
फिर सहारा बने, और एक दिन...
पता ही नहीं चला कि वे सबसे अच्छे दोस्त बन गए।

जो लोग आज भी अपने पिता के साथ
बैठकर दो पल हँस सकते हैं,
उनसे अधिक अमीर शायद ही कोई होगा।


- नरेंद्र मंघनानी


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बीत गए वह दिन पर उनकी यादें पास हैं,
दूर हो तुम पर तुम्हारी यादें पास हैं।

हर वक्त मुझे याद आती है तुम्हारी,
तुम्हारे वापस आने की खास है,

मैने हमेशा तुम्हें याद किया है,
इसलिए शायद बस यादें पास है,

तुम्हारा जिस्म नहीं है मेरे पास,
पर तुम्हारे होने का एक एहसास है,

कई समय से मैं रह रहा हूं अकेला,
अकेलेपन से लड़ने का मुझे अभ्यास है,

जब हम पहली बार मिले थे,
तब से तुम्हारी धड़कन मेरे पास है,

तुम दिया थी मेरी जिंदगी की,
पर अब दिया- बत्ती नहीं बस प्रकाश है,

शाम को घर की ओर जाने लगता हूं,
घर पर तुम देखोगी ये आस है,

मैं तो कब का दफन हो जाता,
वह तो तुम्हारी यादें मेरे पास हैं,

साथ हमारा कभी छूट नहीं सकता,
तुम हो वहां पर दिल मेरे पास है,

हमारी कुछ बातें अधूरी रह गई,
उनके पूरे होने की आस है,

तुम्हें देखूं तो ग़ज़ल बन जाए,
पर अब यह कागज एक लाश है,

तुम गई तो स्याही भी ले गई,
पर फिर से लिखूंगा ग़ज़ल ये आस है,

कुछ यादें हमेशा साथ में रह जाती हैं,
जैसे तुम्हारी मेरे पास है,

रात को कमरे में बैठे गुनगुनाता हूं,
तुम्हारे लिए लिखे गीत आज भी पास हैं,

तुम्हे आज भी रोज देखता हु,
तुम्हारी तस्वीर आज भी पास है,

तुम जब आई थी मेरी जिंदगी में,
वह पल आज भी खास है,

इसीलिए तो जिंदा है "राज",
तुम्हारी यादें अभी भी पास है।


- प्रणव राज


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व्यक्तित्व

व्यक्तित्व केवल रूप नहीं,
न ही वाणी का श्रृंगार।
यह तो अंतर्मन की सुगंध है,
जो देती जीवन को आकार॥

विपदा में जो धैर्य रखे,
सफलता में रहे विनीत।
वही व्यक्तित्व उज्ज्वल होता,
जिसके भाव रहें संगीत॥

सत्य, करुणा, प्रेम और सेवा,
जिसके जीवन का आधार।
उसके पदचिह्नों से महके,
धरती, अम्बर और संसार॥

चमक नहीं पहचान बनाती,
न ही ऊँचे पद का मान।
व्यक्तित्व वही श्रेष्ठ कहलाए,
जो जीते सबके हृदय-प्राण॥


- डॉ. सारिका ठाकुर 'जागृति'


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शिकायत

वह कभी प्रेम का इज़हार नहीं करता था,
पर शिकायतों का कोई अवसर नहीं छोड़ता था।

तब समझ में आया,
कभी-कभी प्रेम शब्दों में नहीं,
इसी तरह की शिकायतों में रहता है।

एक दिन न दिखूँ,
तो वह दो दिन गायब हो जाता।
उससे शिकायत करती,
तो बड़ी सहजता से कहता
"पहले तुम तो उस दिन नहीं दिखीं थीं।"

उसकी हर नाराज़गी में
मेरा हिसाब छिपा होता था,
और हर शिकायत में
एक अनकहा अधिकार।

शायद प्रेम हमेशा
"मैं तुमसे प्यार करता हूँ" नहीं कहता,
कभी-कभी वह शिकायतों का लिबास पहनकर भी
हमारे पास आ बैठता है।


- सविता सिंह मीरा


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मेरा पहला प्यार है तू...
हां! तुझसे ज्यादा मैं
पिता से प्यार करता हूं।
मगर तेरी हिफाजत
और सम्मान से
कोई नहीं खेल सकता,
जब तक मैं जिंदा हूं।
तेरे लिए मैं सारे
जगत से लड़ सकता हूं।
हां! गुस्सा होता हूं तेरे से...
कभी लड़ लेता हूं तेरे से...
मगर तेरा अंश हूं तेरे से
बड़ा थोड़ी हो सकता हूं।
तेरे दूध का कर्ज थोड़ी ना
मैं अदा कर सकता हूं।


- दीपक कोहली



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दिव्या अनुराग

जन्म जमांतर की मेरी
अतृप्त इच्छाएं
मुझे छूने लगी है।

देख कर तुमको
मुझ में प्रेम जिज्ञासा
फिर उत्पन्न होने लगी है।

तुम्हारे अस्पर्श अहसास
मेरे सहस्रार को
जागृत करने लगे है।

न चाहते हुए भी
मेरे अनाहत में
तुम्हारे स्वर को गूंजने लगे हैं


- डॉ. राजीव डोगरा



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ज़िन्दगी कटी है

जितनी भी ज़िन्दगी कटी है सब तेरे नाम
बुरा किया अच्छा किया है सब तेरा काम
जैसी बुद्धि दी तूने है उसी का परिणाम
अपने कर्मों का फल भुगतेगा क्यों बन रहा अनजान

जिंदगी में किससे मिलना है तुझे नहीं मालूम
किससे मिलाना है यह वही तय है करता
मालूम है तुझे कि जाना पड़ेगा एक दिन खाली हाथ
मोहमाया में फंस गया जाने से बहुत है डरता

बने बनाये खेल को बिगाड़ना
या बिगड़े हुए खेल को बनाना
किसी के हाथ में तो कुछ भी नहीं
अपनी मर्जी से आता है उसको नचाना

कभी करता है वह दिल्लगी
कभी उपहास है उड़ाता
भटकाता है अकेली राहों में
तो फिर राह भी है दिखाता

जिंदगी को जो यूं ही तमाम कर दिया
जिसने दिया सब कुछ उसी को बदनाम कर दिया
अवसर जो मिले आगे बढ़ने के उन्हें गंवा बैठा
दूसरों का जीना भी हराम कर दिया


- रवींद्र कुमार शर्मा


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मौत सच है रहेंगे सदा हम नहीं।
जीने का भी यहाॅं पे मज़ा कम नहीं।।

ज़िंदगी चार दिन की जियो शान से।
बाटो खुशियाॉं जहाॉं में मगर ग़म नहीं।।

ज़ुल्म सहते रहे उनके हॅंसते हुए।
रोए ऐसे की ऑंखें हुई नम नहीं।।

ज़ेहनी कमजोर जो लड़ते फिरते हैं वो।
गुस्से में कांपते जिनके कुछ दम नहीं।।

जंग बल से नहीं तुम लड़ो अक़्ल से।
नज़रें दुश्मन पे हों ये मगर ख़म नहीं।।

चढ़ने के बाद जल्दी न उतरे मिरी।
फूल महवे की पीता कभी रम नहीं।।

लोग क्यूॅं डर रहे देख मुझको निज़ाम।
ठर्रा बोतल में है ये कोई बम नहीं।।


- निज़ाम फतेहपुरी



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