सियासतों में फ़रेब छुपकर, अमन की बातें भी हो रही है,
लहू से भीगी है ज़मीं पर, वफ़ा की कसमें बड़ी नई हैं।
ग़रीब बस्ती में भूख गहरी, महल में दावतें हो रही है,
कफ़न भी मुश्किल हुआ है लेना, मगर इमारत बड़ी नई है।
कहीं पे बच्चा किताब ढूँढे, कहीं पे हथियार बाँटे जा रहे,
ग़ुलाम क़ौमें बता रही हैं, ये सल्तनत भी बड़ी नई हैं।
जो सच कहेगा, वो रद्द होगा, जो झूठ बोले, सर बिठाया जाए
जहाँ की रीतें बता रही हैं, रवायतें सब बड़ी नई हैं।
यहां हर इंसा लहू से रंजित, मगर तिजारत बड़ी हँसी है,
जहाँ के सौदागर अब दिखाएँ, अमन की क़ीमत बड़ी नई है।
- मधु शुभम पाण्डे
*****
थकी हुई सी ज़िंदगी
थकी हुई सी ज़िंदगी
हर मोड़ पर ठहर जाती है,
चलना चाहो भी तो अक्सर
ख़ामोशी साथ आ जाती है।
दिन उजाले में कट जाते हैं
रात सवालों में ढलती है,
किसने छीना अपने सपने
ये बात समझ न पलती है।
कंधों पर लदे फ़र्ज़ों ने
मन को धीरे झुका दिया,
खुद के लिए जो पल थे कभी
वक़्त ने सब चुरा लिया।
फिर भी दिल के किसी कोने में
एक सिसकी सी पलती है,
कहती है - “मैं ज़िंदा हूँ”
बस हालात से जलती है।
जिस दिन इस सिसकी को
आवाज़ मिल जाएगी,
थकी हुई सी ये ज़िंदगी
फिर से मुस्कुराएगी।
- रेखा चंदेल
*****
चलते रहना
जीवन की उलझी पहेलियाँ
धैर्य से सुलझाते रहना,
उत्तर न भी मिलें तुरंत
तो प्रश्न सँजोते रहना।
पथ यदि काँटों से भरा हो
तो भी पग न ठहराना,
राह कठिन हो-
बस चलते रहना।
बाहर के शोर में न खोकर
अंतर में दीप जलाते रहना,
ओठ चुप हों यदि कभी
मन से मुस्कराते रहना।
जब मन अपने ही बोझ से
थककर बैठना चाहे,
तब कुछ आदतें, कुछ सोचें
धीरे-धीरे बदलते रहना।
यदि भीतर कहीं
रिक्तता, अभाव,
सूनापन दिखे-
तो शिकायत नहीं
सृजन से भरते रहना।
हार, विराम नहीं होती
यह याद रखते रहना,
जीवन साधना है मित्र-
राह कठिन हो
तुम चलते रहना।
- नरेंद्र मंघनानी
*****
मां भारती की शान
गीत वह महान है मां भारती की शान है
रोम- रोम में वसा हिंदोस्ता की जान है।
गा-गा के जिसको चल पड़े फिरंगियों से लड़ पड़े।
देखी थी शक्ति गीत की उम्मीद फिर थी जीत की।
गीत की इस शक्ति ने चूल को हिला दिया,
वस कुछ समय के और हो उनको सही बता दिया।
वृत्तांत सुन उनके मस्तिष्क में अवसान था।
गीत वह महान है मां भारती की था।
जिसने बनाया हिंद की आजादी का था रास्ता,
मिलकर हुए सभी खड़े दे स्वाधीनता का वास्ता।
कोशिश करी थी तोड़नें की एकता निज हिन्द की
वैरियों की चाल जिसमें न सफल है हो सकी।
भंग हुआ विच्छेद फिर बंगालियों की भक्ति से
हो गये सफल तभी इस गीत की शक्ति से,
एकीकृत बंगाल का त्याग निज महान था।
गीत वह महान है मां भारती की शान था।
बंगाल के जुड़ाव से ये यात्रा बढ़ने लगी
जन- जन के मुख पर गीत से वह शक्तियां हिलनें लगी।
भानू न अस्त होता था जिसके शासनकाल में,
वो फिरंगी फंस गये थे मातरम् के जाल में।
गीत ये जाल जो आजादी की मशाल था
गीत वह महान है मां भारती की शान था।
आजादी के संघर्ष में वस गीत ही आस था
हर श्वास में ऐसा लगा मां भारती का साथ था।
मां की ममता पाने को सब लामबंद हो गये,
हो गया आजाद हिंद आजाद सब हैं हो गये।
आजाद हिंद हो गया यह गीत स्वाभिमान है
गीत वह महान है मां भारती की शान है।
- करन सिंह "करुण"
*****
हरारत नहीं रही
कभी भी सच कहने से हमें डर नहीं लगता।
जी हुज़ूरी इल्म का मेरे हिस्सा नहीं रही।
ज़मीं-आसमां से कभी मिलती ही नहीं है।
जुगनूओं की शोलों से कभी यारी नहीं रही।
हिन्दू-मुसलमां के बीच अब दीवार आ गई।
अलगू और जुम्मन में पहली सी यारी नहीं रही।
तारीफें हुस्न-इश्क की अब तब्दील हो गईं।
बाज़ार-ए-हुस्न में कोई चीज़ महंगी नहीं रही।
मंज़िल पर निगाह तो कोई रोक नहीं सकता।
कहता हूँ तुझमें जोश व हिम्मत नहीं रही।
चाँद भी वही चांदनी भी वो ही है मुश्ताक।
रिश्तों में मगर वो पहली सी हरारत नहीं रही।
- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह
*****
बात ख़त्म
तुम बोलो या ना बोलो,
हमको सुनना है बात ख़त्म।
हो चाहे जिसके भी तुम ,
तुम बस मेरे बात ख़त्म।
चाहा बहुत, न चाहे तुमको,
पर ये हो गया बात ख़त्म।
बिना छुए ही छुए हृदय को,
दिल में बस तुम हो बात ख़त्म।
दूरी, उम्र, बचकानी बातें
भर दिए बचपना बात ख़त्म।
जो कहना था, कह चुका मन,
अब क्या कहना बात ख़त्म।
- सविता सिंह मीरा
*****
अगर मेरे हिस्से भी कभी
ज़माने की रंगतें आई होतीं,
जवानी के शौक़,
खुलकर हँसने की इजाज़त,
और सपनों को जीने की
आज़ादी मिली होती…
तो इस रंगीन दुनिया में
यूँ ख़ामोश, बेरंग रहना
मुझे कभी रास न आता।
मैं भी चाहती
हवा के साथ उड़ना,
भीड़ में खोकर खुद को पाना,
हर रंग को बिना डर के अपनाना।
पर हालातों ने मेरे हाथों में
ज़िम्मेदारियों की स्याही थमा दी,
और मैंने
ख़्वाहिशों के रंग दिल में ही सहेज लिए।
लोग कहते हैं,
तुम सादा सी रहती हो,
पर क्या किसी ने पूछा कि ये सादगी
चुनाव थीया मजबूरी?
मैं बेरंग नहीं हूँ,
बस वो रंग जो मुझे मिलने थे,
किसी और के हिस्से चले गए…
- आरती कुमारी
*****
संख्याओं का मेला
आओ बच्चों तुम्हें सुनाएँ, एक अनोखी बात,
संख्याओं की दुनिया से, करवाएँ मुलाक़ात।
रेखा पर जो सजती हैं, सबको साथ बुलाती हैं,
"वास्तविक संख्याएँ" वो, जग में जानी जाती हैं।
एक, दो, तीन से गिनती शुरू, "प्राकृतिक" इनका नाम,
शून्य (0) को जब जोड़ लिया, तो बना "पूर्ण" का धाम।
सीधी-सादी, प्यारी-प्यारी, गिनती में ये आती हैं,
वास्तविक संख्याओं का, ये आधार बनाती हैं।
प्लस (+) की दुनिया दाईं ओर, माइनस (-) बाईं ओर जाए,
शून्य खड़ा है बीच में, सबको राह दिखाए।
ये सब मिलकर कहलाते, "पूर्णांक" प्यारे भाई,
घटने और बढ़ने की, इन्होंने रीत बनाई।
बटे (p/q) में जो लिख जाएँ, "परिमेय" नाम कमाएँ,
जैसे आधा (1/2) या हो पूरा, सब इसमें मिल जाएँ।
लेकिन जो न रुक पाएँ, जैसे पाई (π) या रूट (√2),
"अपरिमेय" हैं वे संख्याएँ, जो चलतीं बेछूट।
चाहे दशमलव शांत हो, या हो वो अशांत,
वास्तविक संख्या के घर में, सब रहते हैं शांत।
संख्या रेखा इनका घर है, यही इनकी पहचान,
गणित की इस दुनिया का, ये ही हैं सम्मान!
- देवेश चतुर्वेदी
*****
इज़हार-ए-मोहब्बत
खामोशियाँ बेइंतहा हुईं, अब कुछ कहना जरूरी है,
दिल में दफन है जो अफसानें अब बताना जरूरी है।
यूँ तो हर दिन उनकी यादों की महक साथ रहती है,
मगर आज इस महक को हकीकत बनाना जरूरी है।
मोहब्बत में फिजूल के वादे-दांवे नहीं किया करते है,
प्रेम को सिर्फ मर्यादाओं के साथ निभाना जरूरी है।
इश्क में इरादा बस इतना कि उम्र भर चलना है,
छोटी-छोटी खुशियों में प्रेम में रंग भरना जरूरी है।
इश्क में साथ चलने से मंजिलें आसां हो जाती है,
इस मोहब्बत की यादों का कारवां बनाना जरूरी है।
मोहब्बत के सफर में बिना कहे हाथ थमते हैं,
सब रास्ते मुकम्मल होंगे, बस साथ देना जरूरी है।
खामोशियाँ बेइंतहा हुईं, अब कुछ कहना जरूरी है,
दिल में दफन है जो अफसानें अब बताना जरूरी है।
यूँ तो हर दिन उनकी यादों की महक साथ रहती है,
मगर आज इस महक को हकीकत बनाना जरूरी है।
मोहब्बत में फिजूल के वादे-दांवे नहीं किया करते है,
प्रेम को सिर्फ मर्यादाओं के साथ निभाना जरूरी है।
इश्क में इरादा बस इतना कि उम्र भर चलना है,
छोटी-छोटी खुशियों में प्रेम में रंग भरना जरूरी है।
इश्क में साथ चलने से मंजिलें आसां हो जाती है,
इस मोहब्बत की यादों का कारवां बनाना जरूरी है।
मोहब्बत के सफर में बिना कहे हाथ थमते हैं,
सब रास्ते मुकम्मल होंगे, बस साथ देना जरूरी है।
- दीपक कोहली
*****
खिड़की खुली है
क्यों अब भी कुछ बचा है
सब कुछ कहने के बाद भी,
खिड़की खुली है,
दरवाजा बंद होने के बाद भी।
भौरों को फूलों से मिलना है
चकोर को भी राह चांद का तकना है।
कौन खींच रहा किसको_
ये मुश्किल समझना है।
नदियां खल खल लांघती,
सागर की आगोश
में सामने को।
मोर नाच रहा पंखे फैला,
बता रहा वो भी दीवाना है।
लहरें उछले पूनम की रात,
प्यारे चांद को पाने को,
परवाने भी पीछे कहां,
समा की एक झलक काफी है,
जान लुटाने को।
अधूरेपन को पूरा करने की,
अभिलाषा सबमें जागे।
सब अपने चहेतो के पीछे,
शायद इसी लिए भागे।
इस अधूरापन से ही मन बाऔराए ,
कोई अपने होश में न रह पाए।
ये अधूरापन ही प्यार है,
नहीं तो क्यों फूल खिले,
चकोर चांद को ताके
और नन्ही बुलबुल गीत गाए।
क्यों अब भी कुछ बचा है
सब कुछ कहने के बाद भी,
खिड़की खुली है,
दरवाजा बंद होने के बाद भी।
भौरों को फूलों से मिलना है
चकोर को भी राह चांद का तकना है।
कौन खींच रहा किसको_
ये मुश्किल समझना है।
नदियां खल खल लांघती,
सागर की आगोश
में सामने को।
मोर नाच रहा पंखे फैला,
बता रहा वो भी दीवाना है।
लहरें उछले पूनम की रात,
प्यारे चांद को पाने को,
परवाने भी पीछे कहां,
समा की एक झलक काफी है,
जान लुटाने को।
अधूरेपन को पूरा करने की,
अभिलाषा सबमें जागे।
सब अपने चहेतो के पीछे,
शायद इसी लिए भागे।
इस अधूरापन से ही मन बाऔराए ,
कोई अपने होश में न रह पाए।
ये अधूरापन ही प्यार है,
नहीं तो क्यों फूल खिले,
चकोर चांद को ताके
और नन्ही बुलबुल गीत गाए।
- रोशन कुमार झा
*****
परदे के पीछे
सिंहासन दिखता, राजा दिखता,
पर सूत्र कहीं और हिलते हैं,
जनता सोचती- हम चुनते हैं,
पर फैसले और ही बनते हैं।
काग़ज़ पर चलता लोकतंत्र,
मन में चलता व्यापार बड़ा,
सच बोलने वाला अकेला,
झूठ का मेला फैला पड़ा।
परदे के पीछे जो हाथ हिलाए,
वह दीपक नहीं- छाया बनता,
डर से चलता शासन सारा,
न्याय कहीं खोया रहता।
लेकिन सुन लो, हे मानव प्यारे,
यह अंधकार स्थायी नहीं,
जब मन सत्य से जुड़ जाता है,
भय खुद ही हार मान जाता है,
Deep State हो या झूठी सत्ता,
सब मिट जाता है।
राज न टिके, षड्यंत्र न टिके,
न टिके अहं का भारी भार,
वही सच्चा शासक, वही सरकार।
सिंहासन दिखता, राजा दिखता,
पर सूत्र कहीं और हिलते हैं,
जनता सोचती- हम चुनते हैं,
पर फैसले और ही बनते हैं।
काग़ज़ पर चलता लोकतंत्र,
मन में चलता व्यापार बड़ा,
सच बोलने वाला अकेला,
झूठ का मेला फैला पड़ा।
परदे के पीछे जो हाथ हिलाए,
वह दीपक नहीं- छाया बनता,
डर से चलता शासन सारा,
न्याय कहीं खोया रहता।
लेकिन सुन लो, हे मानव प्यारे,
यह अंधकार स्थायी नहीं,
जब मन सत्य से जुड़ जाता है,
भय खुद ही हार मान जाता है,
Deep State हो या झूठी सत्ता,
सब मिट जाता है।
राज न टिके, षड्यंत्र न टिके,
न टिके अहं का भारी भार,
वही सच्चा शासक, वही सरकार।
- नरेंद्र मंघनानी
*****
इश्क के इस दौर में
हम भी दिल दे बैठे
ज़माने की फितरत में
मन परवाज़ उड़ा बैठे
वन वीक सीरीज के दौर में
कमबख्त! हम किताबों से
जिगर लगा बैठे...
वाट्सअप यूनिवर्सिटी के भ्रमजाल में
हम नासमझ
रेफ्रेंस बुकों में माथा खफा बैठे
जंगल की आग में
बर्फ का गोला बन बैठे
यह जिगर है मानता नहीं
हम मानवता को गले लगा बैठे
बचपन में जिस कागज़ से
नाव बनाते रहे
आज उसी कागज़ पर
पेन की पतवार खै रहे
कमबख्त पेन से स्याही
क्या खलक गई
मैं लिखता मोहब्बत रहा
वो इंकलाब लिख गई
- जितेंद्र बोयल
हम भी दिल दे बैठे
ज़माने की फितरत में
मन परवाज़ उड़ा बैठे
वन वीक सीरीज के दौर में
कमबख्त! हम किताबों से
जिगर लगा बैठे...
वाट्सअप यूनिवर्सिटी के भ्रमजाल में
हम नासमझ
रेफ्रेंस बुकों में माथा खफा बैठे
जंगल की आग में
बर्फ का गोला बन बैठे
यह जिगर है मानता नहीं
हम मानवता को गले लगा बैठे
बचपन में जिस कागज़ से
नाव बनाते रहे
आज उसी कागज़ पर
पेन की पतवार खै रहे
कमबख्त पेन से स्याही
क्या खलक गई
मैं लिखता मोहब्बत रहा
वो इंकलाब लिख गई
- जितेंद्र बोयल
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