साहित्य चक्र

05 July 2026

कहानी- आखिरी टिकट


स्टेशन उस शाम असामान्य रूप से भरा हुआ था। बरसात अभी-अभी थमी थी और प्लेटफ़ॉर्म की भीगी ज़मीन पर भागते कदमों की आवाज़ें किसी बेचैन धड़कन-सी सुनाई दे रही थीं। अनाउंसमेंट बार-बार एक ही बात दोहरा रहा था। “गाड़ी संख्या 12155, भोपाल एक्सप्रेस, कुछ ही मिनटों में प्लेटफ़ॉर्म नंबर तीन से प्रस्थान करेगी…”

टिकट खिड़की के सामने लंबी कतार लगी थी। उसी कतार के आख़िरी छोर पर खड़ी थी, नैना। उसकी उँगलियाँ भीग चुकी थीं, पर हथेली में दबा वह पुराना-सा पत्र अब भी सुरक्षित था। पत्र के कोने घिस गए थे, शब्द हल्के पड़ गए थे, पर एक पंक्ति आज भी उतनी ही साफ़ थी।


“अगर कभी लौटना चाहो, तो मैं उसी शहर,
उसी स्टेशन पर तुम्हारा इंतज़ार करूँगा।”






तुम्हारा आरव

नैना ने काँपते हाथों से पत्र मोड़ा। पंद्रह साल पहले वह इसी शहर से गई थी,बिना मुड़कर देखे, बिना कुछ कहे, बिना किसी सफ़ाई के। उसने प्रेम को ठुकराया नहीं था; बस घरवालों की इच्छा, पिता की बीमारी, और छोटे भाई-बहनों की ज़िम्मेदारियों के आगे अपने मन को चुप करा दिया था। फिर जीवन की दौड़ में इतनी उलझी कि पीछे छूटे एक चेहरे को बस यादों में रख सकी।

लेकिन तीन दिन पहले अचानक पुराने सामान के बीच उसे यह पत्र मिला। उसी के साथ एक और कागज़ एक अस्पताल की पर्ची, जिस पर किसी परिचित लिखावट में दर्ज था।

“आरव मेहरा हृदय रोग विभाग।”

बस तब से उसके भीतर एक ही बेचैनी थी,उसे जाना है। एक बार। केवल एक बार। कहने के लिए नहीं कि वह आज भी उससे प्रेम करती है; बल्कि यह पूछने के लिए कि क्या इतने वर्षों बाद भी किसी के इंतज़ार की उम्र बची रह जाती है ?

कतार धीरे-धीरे आगे बढ़ी। नैना जब खिड़की तक पहुँची, तो क्लर्क ने स्क्रीन पर नज़र डालते हुए कहा “भोपाल? … सिर्फ़ एक टिकट बची है। आख़िरी टिकट।”

नैना का दिल जैसे उछलकर गले में आ अटका।
“मुझे वही चाहिए,” उसने तुरंत कहा।
क्लर्क ने टिकट निकालकर उसकी ओर बढ़ा दी।
“जल्दी कीजिए, ट्रेन खुलने वाली है।”

नैना ने टिकट पकड़ ली। वह कागज़ का छोटा-सा टुकड़ा उसके लिए किसी अवसर, किसी प्रायश्चित, किसी अधूरे वाक्य का अंतिम शब्द बन गया था। वह भागती हुई प्लेटफ़ॉर्म की ओर बढ़ी। ट्रेन सीटी दे चुकी थी। किसी तरह डिब्बे में चढ़कर उसने राहत की साँस ली। सीट पर बैठते ही उसने खिड़की से बाहर देखा। बारिश की बूँदें शीशे पर बह रही थीं और बाहर का शहर पीछे छूटता जा रहा था वैसे ही जैसे वर्षों पहले छूटा था। फर्क बस इतना था कि तब वह भाग रही थी, और आज लौट रही थी।

रात लंबी थी। डिब्बे की पीली रोशनी में उसने फिर पत्र खोला। हर शब्द जैसे कोई पुराना घाव सहला रहा था। “नैना, प्रेम का अर्थ साथ पाना ही नहीं होता। कभी-कभी किसी के निर्णय का सम्मान करते हुए उसी मोड़ पर खड़े रहना भी प्रेम होता है…”

नैना की आँखें भर आईं। क्या सचमुच कोई पंद्रह साल तक उसी मोड़ पर खड़ा रह सकता है ? सुबह जब ट्रेन भोपाल पहुँची, तो उसके कदमों में अजीब-सी घबराहट थी। स्टेशन से बाहर निकलते ही उसने सीधा उसी अस्पताल का रुख किया, जिसका नाम पर्ची पर लिखा था।

अस्पताल के हृदय रोग विभाग में असामान्य शांति थी। नैना ने रिसेप्शन पर जाकर धीमे स्वर में पूछा “मुझे आरव मेहरा से मिलना है।”

रिसेप्शन पर बैठी नर्स ने कुछ क्षण उसे देखा, फिर रजिस्टर पलटते हुए पूछा “आप कौन ?”

नैना के पास इस प्रश्न का कोई सरल उत्तर नहीं था। वह कुछ पल चुप रही, फिर बोली “पुरानी पहचान हूँ… बहुत पुरानी।”


नर्स ने गहरी साँस ली। “आप देर से आई हैं।”
नैना के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। “मतलब…?”
“कल रात उनकी मृत्यु हो गई।”


शब्द बहुत साधारण थे, पर नैना के भीतर जैसे सब कुछ टूटकर बिखर गया।
उसने सामने की कुर्सी पकड़ ली। होंठ काँपे, पर आवाज़ न निकली। इतने वर्षों की दूरी, इतने बरसों का मौन, इतनी सारी अनकही बातें- सब एक ही वाक्य के नीचे दब गईं “आप देर से आई हैं।”

उसकी आँखों से आँसू ढुलक पड़े। वह किसी तरह खुद को सँभालकर मुड़ी ही थी कि नर्स ने उसे पुकारा “सुनिए…”

नैना ठिठक गई। नर्स ने दराज़ से एक छोटा-सा लिफ़ाफ़ा निकाला। “उन्होंने कहा था अगर कभी ‘नैना’ नाम की कोई स्त्री आए, तो यह उसे दे देना।”

नैना के हाथ काँप उठे। उसने लिफ़ाफ़ा खोला। भीतर एक पुरानी रेल टिकट थी पीली पड़ चुकी, किनारों से मुड़ी हुई। उसके पीछे आरव की लिखावट थी
“उस दिन तुम चली गई थीं। मैं इसी स्टेशन तक तुम्हें छोड़ने आया था। मैंने सोचा था, तुम्हें रोकूँगा… पर तुम्हारी आँखों में मजबूरी देख ली। तुम्हारी ट्रेन छूटने के बाद मैंने वापसी के लिए टिकट लिया था । आखिरी टिकट। तब समझा कि कुछ यात्राएँ साथ होकर भी अकेले पूरी करनी पड़ती हैं।

मैंने विवाह नहीं किया। इंतज़ार भी नहीं कहा उसे… बस मन ने तुम्हारे हिस्से की जगह किसी और को दी ही नहीं। यदि तुम कभी लौटो, तो अपने आपको दोष मत देना। प्रेम में देर हो सकती है, अभाव हो सकता है, विरह हो सकता है । पर शिकायत नहीं होनी चाहिए। और हाँ, यदि यह पत्र तुम्हारे हाथों तक पहुँचे, तो समझना मैंने तुम्हें अंतिम बार नहीं, आखिरी साँस तक चाहा।”

नैना के आँसू उस टिकट पर गिरते रहे। वह टिकट अब सिर्फ़ एक यात्रा का प्रमाण नहीं था; वह उन दो जीवनों का दस्तावेज़ था जो साथ चल सकते थे, पर समय की पटरियाँ उन्हें अलग दिशाओं में ले गईं। नर्स ने धीरे से कहा "उनके तकिए के नीचे यह टिकट हमेशा रहती थी। आखिरी दिनों में भी अक्सर कहते थे। ‘कुछ लोग लौटते नहीं, फिर भी उनके लिए दरवाज़ा खुला रखना चाहिए।"

नैना ने टिकट को सीने से लगा लिया। वह अस्पताल की खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गई। बाहर वही सुबह थी, वही भीगा शहर, वही भागती दुनिया पर उसके भीतर सब कुछ स्थिर हो चुका था। उसने पहली बार जाना। हर स्टेशन पर छूट जाने वाली चीज़ ट्रेन नहीं होती; कभी-कभी एक पूरा जीवन छूट जाता है।

और उस दिन उसे यह भी समझ आया कि
दुनिया में सबसे भारी कागज़ कोई वसीयत,
कोई डिग्री, कोई दस्तावेज़ नहीं होता।
सबसे भारी होता है वह “आखिरी टिकट”,
जो हमें वहाँ तो पहुँचा देती है जहाँ हमें जाना था,
पर वहाँ नहीं पहुँचा पाती जहाँ हमें समय रहते होना चाहिए था।


- डॉ. सारिका ठाकुर 'जागृति'



योग धर्म नहीं विज्ञान हैं, मन की शांति योग से ही संभव


यूं कहे तो योग धर्म नहीं बल्कि विज्ञान जगत हैं। योग में ये शक्ति है की ये हमारे शरीर, मन एवम आत्मा को जोड़ने का विधान है। योग सम्पूर्ण मनुष्य के शरीर, मन एवम आत्मा को ऊर्जा, तागद एवम सौंदर्य प्रदान करता है। योग से कई प्रकार की चीजे निकल कर आई है अगर मनुष्य द्वारा रोज इस मूल्यवान विधान को अपना लिया जाए तो मनुष्य को कई रोगों से छुटकारा मिल सकता है।





योग का अर्थ है अपने आप को ऊर्जा में समाहित करना, उससे जोड़ना। अगर मानव में प्रतिदिन योग करने की चाहत हो जाए तो यू मान लीजिए की वह अपने स्वास्थ्य जीवन और सौंदर्यता को प्राप्त कर ही लेगा। रोगमुक्त जीवन जीने के लिए हर व्यक्ति को इस भागदौड़ रूपी जिंदगी से कुछ समय निकालकर योग करने की आदत डालने की आवश्यकता है।

आध्यात्मिक प्रगति के तरफ मनुष्य की झुकाव हो इसके लिए योग एक अनिवार्य चीज़े बन चुकी हैं। अवसाद को दूर करने के लिए योग एक वरदान से कम नहीं है।

आत्मा से जुड़ने के लिए योग दर्शन परम आवश्यक है।स्वयं को बदलने से ही इस अलौकिक विश्व में बदलाव आएगा एवम योग से ही जीवन सुखमय होगा। जिनके शरीर और मन स्वस्थ नहीं होते हैं उनके मस्तिक में चेतना और काया में फुर्ती नाम मात्र ही होती है। अगर आप अशांत है एवम आपका किसी काम में मन नहीं लगता है तो योग जरूर अपनाएं।

सफलता तो तीन चीजों में ही आधुनिक संसार में मापी जाती रही हैं दौलत सोहरत और शांति एवम शांति हमेशा योग से ही मिलता है। अपने व्यक्तिगत कमियों पर चिंतन करना और खामियों को दूर करने के लिए योग का रास्ता तालशना होगा।


- दीपक कुमार सिंह

02 July 2026

छायाचित्राधारित पंक्तियाँ पढ़िए- 03 जुलाई 2026






अडिग खड़ा हिमालय है, भारत का मस्तक है,
जब जी चाहे घुम्मकड़, पंहुच जाते है आग़ोश में,
कितना सुकून मिलता है, सारी थकान मिट जाती है,
ताज़ी हवा वातावरण में, जब प्रकृति में घुल जाता है।

- सुमन डोभाल काला


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उच्च हिमालय के तल पर, यह कौन खड़ा छत्र उठाए।
जैसे लगता है कान्हा, अंगुली में है गोवर्धन उठाए।

- रत्ना बापुली


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हमने अपनी पूरी सम्भावनाओं के
साथ हाथ फैलाकर देख लिए,
रे कुदरत, तेरे आगे आज भी हम छोटे हैं।
देख-सदियों से अडिग खड़ा हिमालय तेरा,
हमारे क्षणिक सर्जन के भी टोटे हैं।

- स्वाति जोशी


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हिम-शिखरों ने आज फिर, साहस का संदेश सुनाया।
जो ऊँचाइयों से प्रेम करे, उसने जीवन का अर्थ पाया।

- डॉ. सारिका ठाकुर 'जागृति'


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ख्वाहिश

काश तेरी पनाहों में एक बसेरा हो,
हर रात मै कविता लिखूं...
जब तुम सुकून से पढ़ो,
तो तसल्ली से एक सबेरा हो।

- सुतपा घोष


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महफ़िल की भीड़ में भी तन्हा था, क्या अपने क्या पराये।
तन्हाइयों में भी महफ़िल जता गये, ये पर्वतों के साये।

- कुणाल


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खुशनुमा है ये धरती और आसमान ,
आच्छादित है बर्फ से घाटियां महान।

- मनोज कौशल


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बर्फ से ढके मनमोहक पहाड़, प्रकृति की अनुपम छटा देखकर,
इस निर्जन, एकाकी स्थान पर भी हृदय आनंदित हो गया।

- प्रवीण कुमार


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ऊँचाइयों पर पहुँचकर, बस इतना एहसास हुआ,
सबसे सुंदर मंज़िल, अपने ही भीतर मिली।

- नरेंद्र मंघनानी


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शहर की उदासी से, जेब की लाचारी से, भाग चलें कही दूर हम।
नदी किनारे बैठ कर, पर्वत से लग कर, छोड़ दे सारे दुःख, दर्द और गम।

- प्रणव राज


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एक दूसरे को निहार रहे,
कौन ? कितना पिघल रहे।

- जितेंद्र बोयल


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दुनियां से दूर, खुद के पास, जहां है अपनी ही तलाश।
कितना मीठा, कितना सुखद, है यह मन का एहसास।

- रोशन झा


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धवल हिमगिरी शिखर की तलहटी में पलता जीवन मोती,
गगन चुंबी तरुवर की छाया में हो प्यारी सी कुटिया।
उसके रक्त चन्दन से छत के नीचे खड़े होकर,
मैं निहारु असली मोती, मैं निहारु असली मोती,
असीम मिलती शान्ति जहां, हर वक्त विचरण करता रहूँ वहां।

- बाबू राम धीमान


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29 June 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 29 जून 2026





पिता से जान मेरी
पिता से पहचान मेरी
पिता से मान मेरा
पिता से अभिमान मेरा
पिता की परी हूं
पिता की राजकुमारी हूं
पिता का गुरूर हूं
पिता का सम्मान हूं
पिता का खून हूं
पिता का नशा हूं
पिता का स्वप्न हूं
पिता का जहाँ हूं
पिता की अस्मत हूं
पिता का अस्मत हूं
पिता का सितारा हूं
पिता का चाँद हूं
पिता का सूरज हूं
पिता है तो जहां है
पिता है तो जीवन है
पिता से ही रिश्ते हैं
पिता से ही कुल है
पिता से ही सुख है
पिता दुखों का नाश है
पिता सुखों की आस है
- सुमन डोभाल काला


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चिट्ठी

बहुत दिनों बाद
मन हुआ कि चिट्ठी लिखी जाए-किसी अपने को
किसको सम्बोधित कर लिखूँ लेकिन ?
रिश्तेदारों को तो चिट्ठी -पत्री पढ़ने में कोई खुशी नहीं मिलती है,
ना ही वे लिखते हैं।

फिर किसे लिखूँ ?
सोचता हूँ, सबसे पहले लगातार अपनी धुरी पर घूमती हुई
पृथ्वी को लिखता हूँ।

फिर लिखूँगा, चमकते हुये उगते सूर्यदेव को
जिससे हम मनुष्यों और तमाम जीव-जंतुओं को
ऊर्जा मिलती है।

फिर लिखूँगा, चन्द्रमा को
उनसे मामा-भांजे का सम्बंध जो स्थापित है-आज भी।

फिर लिखूँगा हवा को
उसकी पीठ पर ही उसको चिट्ठी लिखूँगा।

फिर लिखूँगा, अपनी जगह अडिग हिमालय पर्वत को
जो अपने भीतर न जाने कितनी औषधीय पौधे समेटे खड़ा है
आभार सहित लिखूँगा।

नदी के सीने में लिखूँगा तमाम जल-कोषों के नाम।

वृक्षों-पौधों को लिखूँगा सारे पंछियों को भी।

लिखूँगा चिट्ठी आज
और कुछ नहीं तो आकाश के सीने में सभी को
सम्बोधित करते हुए लिखूँगा
ताकि सिर उठाकर सब पढ़ सके
एक ही चिट्ठी सबके नाम


- सुधीर कुमार सोनी



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पिता

पापा आपसे कुछ कहना था,
संघर्षशील राहों की थकान
जो आपने मेरे लिए सही थी।

आज मैं उसी राह पर हूं,
बस यही आपसे कहना था।


- कांता शर्मा


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स्त्री का रोना

स्त्री जब रोती है,
तो उसके आँसुओं के पीछे छिपे
दर्द का कारण समझ पाना
अक्सर कठिन हो जाता है।
उसकी आँखों से बहती हर बूँद
अपने भीतर अनगिनत अनकही कथाएँ
और मौन पीड़ाएँ समेटे होती है।
उसके आँसू सदैव से पुरुष मन को
एक ऐसे असमंजस के
द्वार पर लाकर खड़ा कर देते हैं,
जहाँ वह चाहकर भी
उसके अंतर्मन की गहराइयों को
पूर्णतः समझ नहीं पाता।


- सुभाष 'अथर्व'


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हर बार अफसोस जताते है,
सुधरने का नाम नहीं लेते है।
कभी शासन, कभी प्रशासन
के सिर जिम्मेदारी मड़ देते हैं।
हर बार, एक जैसा व्यवहार...
मृतकों को जातियों में बांट देते हैं।
जब अपना कोई मरता है, तो
फिर हम नंगा रोना रोते हैं।
आखिर कितने बेशर्म हैं हम!
सुधरने का नाम नहीं लेते हैं।
एक नागरिक के रूप में, हम
जिम्मेदारी क्यों नहीं लेते हैं ?


- दीपक कोहली


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तू ही तू

यूं तो जिंदगी में किस किसका
ना मलाल किया ?
उफ्फ!
कम्बख्त याद भी आई तो तेरी आई।
महफिल में बैठकर जिक्र हुआ
तमाम मुद्दों पर मगर
हर मुद्दे पर बात भी आई तो तेरी आई।
मुआमला दिल का था,
फिर दिन क्या और रात क्या ?
दिन तो मेरे रहे लेकिन
ये रात भी आई तो तेरी आई।
मेरे हिस्से में आए
ये मंदिर, ये पीर और दरगाह
मीरा जैसा ये दिवानापन,
लेकिन जब भी सिर झुका
लब पर,
मुराद भी आई तो तेरी आई
मना लिया था खुद को
कि मेरा दिल छोटा है
तेरी हैसियत के हिसाब से,
अरे पागल ! आंखों में बनकर
मेरे आंसू,
सौगात भी आई तो तेरी आई।
मैंने कब किसी और को सोचा
तेरे बगैर,
तेरी वफ़ा, तेरा गुमां
हर तरफ तू ही तू
मेरे ख्यालों में भी कभी,
बारात भी आई तो तेरी आई।


- मंजू सागर


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तुम आना तो
मेरे शहर की हवा सुनना,
यहाँ हर झोंके में
अपनों की दुआ बसती है।

मैं तुम्हें लिखना चाहती हूँ
हमारी मिट्टी को मिलाकर,
ताकि मेरी लिखावट
हमेशा घर की खुशबू बन जाए!

तुम आना तो
मेरे शहर में ठहर जाना,
यहाँ एहसासों की धूप में
अपनों की यादें महकती हैं।

मैं तुम्हें पढ़ना चाहती हूँ
बंद लिफ़ाफ़ों के अल्फ़ाज़ से,
ताकि मेरी लिखावट
तुम्हारा जीवन गीत बन जाए!


- अंशिता त्रिपाठी


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उफ्फ्फ! यह चाय

आज फिर वही रस, वही तृप्ति,
युगों बाद जागी वह सुवास,
या कोई गुप्त रहस्य छिपा है,
जिसकी लगी रहती है आस।

कतिपय अनकहे शब्द मौन के,
घुल जाते चाय में हर बार,
मात्र तुम्हारी सुधि आते ही,
जीवंत हो उठता वही स्वाद।


- सविता सिंह मीरा


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हम हैं गुनहगार

तुँ जननी तुँ भगिनी है   तुँ नारी
खुद दर्द पीकर जीवन है संवारी
तेरी करूण कथा पे हम शर्मसार
हम पुरूष वर्ग   तेरी है गुनहगार

दहेज की लोभ में जिन्दा जलाया
क्रूर जलालत की तमगा पहनाया
भोग्य वस्तु तुम्हें माना एक उपहार
परिजन की खिदमत में तुम गई हार

वंश बेल तुमने हमारी आगे बढ़ाया
खुद बेदना झेल खानदान की साया
तेरी कुर्बानी  पे हम हैं तेरी कर्जदार
फिर भी ना समझा नादान संसार

मायके की मोह त्याग पिया घर आई
पति की सेवा में खुद को तुम लुटाई
तेरी आँचल में हम पाया गुलजार
फिर भी ना हुए हम तेरी वफादार

शराबी बन कर जब जब घर आया
प्रेम से तुमने हमें मेरे लिये समझाया
फिर भी तुम्हें हमने दिया डंडे की मार
अपशब्दों की पहनाया गले में हार

तेरी इज्जत पे आँच कभी जब आया
महाभारत का दृश्य तब पूर्वज ने सजाया
फिर भी हमने दी तुमको घृणित बाजार
कितना गिर गया पुरूष आज मेरे यार


- उदय किशोर साह


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ढलती शाम का सफ़र
सांझ ढली है, सूरज लाल,
पेड़ों के पीछे छुपा गुलाल।
कच्ची सड़क पर उड़ती धूल,
घर लौट रहे हैं सब  जल्दी जल्दी,
अपनी धुन में हैं मशगूल।
मोटरसाइकिल की जलती लाइट,
धीमे-धीमे होती अंधेरी नाइट।
आगे-आगे दौड़ती ज़िंदगी की गाड़ी,
पीछे छूटती खेतों की क्यारी।
बैलगाड़ी पर लदा सूखा घास,
दिलाता है गुज़रे ज़माने का अहसास।
दूर कहीं एक धुंधली सी राह,
थके हुए कदमों को घर की चाह।
यह ढलता सूरज, यह शांत समां,
कहता है, थम गया है जहां।
दिनभर की मेहनत का सुंदर ये अंत,
गांव की शाम है बड़ी जीवंत।


- डॉ. मुश्ताक अहमद शाह


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बीते लम्हों की खुशबू

बीते लम्हो की खुशबू, आज भी दिल में है समायी,
भले, बीते दिन अनेक, मगर आज भी याद नहीं है गयी।

शहर की आबोहवा मे,हाँ कुछ वक्त को है भूले,
लेकिन जैसे ही फुर्सत में होते है,याद आते है गाँव के झूले।

गाँव के वो सब खेत खलिहान, बगीचे बाग याद है सब,
दोस्तो के संग लुकाछिपी, गाय चराने भी याद आते है अब।

माँ की डांट, चाची की गोद,बुआ की पुचकार,
दादा दादी के साथ मस्ती की याद है बरकरार।

सबकुछ याद आज भी खूब मन में है आते,
उन लम्हो को याद कर, मन है तडप जाते।

ये गाँव मे बिताये गये लम्हे, बहुत ही यादगार है,
उन लम्हो की खुशबू आज भी मन मे बरकरार है।

शहर की भीड़ वाली जिदंगी से मन उबकने है लगी,
गाँव मे बिताये गये हर पल अब,याद आने है लगी।

रिश्ते मे संबंध के नाम हे सबो को थे जानते,
जहाँ हरेक किसी का प्यार खूब थे मिलते।

यहाँ शहर मे तो बस,अप ने और अपपे के मतलबी बने,
रिश्ते का प्यार छोड़ो, रिश्ते मे संबंध मे लगे कटने।

सुख दुख की सहभागिता में पूरे गाँव इकट्ठा थे होते,
यहाँ तो शहर मे,बस अपने से ही सब है संभालते।

बस अब तो मन उचटने से लगा है, शहर से मेरा,
गाँव की हरेक लम्हे को खुशबू याद आने लग है सारा।


- चुन्नू साहा



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सुलझा लो...

सुलझा लो वक्त रहते,
उन रिश्तों को ज़रा,
जो खामोशियों की गाँठों में
कहीं उलझ गए हैं।
बस एक बात न कह पाने से,
जो अंदर ही अंदर
धीरे-धीरे बिखरने लगे हैं।

ज़रा सोचो तो...
आख़िर ऐसा क्या है,
जो प्रेम से भी बड़ा हो गया?
कौन-सी वह बात है,
जो एक छोटी-सी नाराज़गी को
इतना विशाल बना रही है?

जिस लड़ाई में जीतकर भी
चेहरे पर मुस्कान न लौटे,
वह जीत भला किस काम की?
जब चोट उसे लगे,
और दर्द तुम्हें हो,
तो यह अहंकार...
यह ज़िद...
आख़िर किस काम की?
थोड़ा तुम झुक जाओ,
थोड़ा वह भी संभल जाएगा।

यक़ीन मानो,
धीरे-धीरे सारे गिले-शिकवे
अपने आप मिट जाएँगे।
कोई रिश्ता ऐसा नहीं
जहाँ कभी नाराज़गी न हो।

मगर रिश्ते
नाराज़गी से नहीं,
एक-दूसरे को मनाने की चाह से
ज़िंदा रहते हैं।
बस एक बार पहल करके तो देखो...
क्या पता,
कौन-सी मुलाक़ात आख़िरी हो,
कौन-सी बात आख़िरी हो,
और कब किसी अपने को
मनाने का अवसर ही न मिले।

रिश्तों को जीतने की नहीं,
निभाने की कोशिश कीजिए।
क्योंकि अपने,
बहस से नहीं...
प्रेम से अपने बने रहते हैं।


- नरेंद्र मंघनानी


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दिलों में अनगिनत जज़्बात हैं

अधूरे सपनों की रात है,
धीरे - धीरे ढल जाएगी,
चंद दिनों की ही तो बात है।
होगी उनसे भी मुलाकात,
दिलों में अनगिनत जज़्बात हैं।


- चेतना सिंह 'चितेरी



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नशे में डूब रही है जवानी

न वह चूल्हे की रोटी न वह घड़े का पानी
बदल सी गई कुछ ऐसी ज़िंदगानी
बुढापा भी कुछ और सा बीत रहा अब
अलग ही चाल चल रही कुछ आज की जवानी

नशे की स्याही से लिख रहा युवा
आज की अपनी यह कहानी
उस देश का भविष्य क्या होगा
जहां नशे में डूब रही है जवानी

सुनते किसी की नहीं करे अपनी मनमानी
जान कर भी अनजान हैं कर रहे नादानी
किस दिशा में जा रही आज की युवा पीढ़ी
कैसे हो गई यह नशे की दीवानी

नशे के कारोबार में जो लिप्त है
खून नहीं उनकी रगों में है पानी
अपनी औलाद भी जब करेगी नशा
तब बनेगी फिर एक नई कहानी

आज की पीढ़ी को बहुत मुश्किल है समझाना
अच्छा नहीं लगता उनको बार बार बताना
टोका टोकी तो बिल्कुल भी पसंद नहीं
मन की करेंगे चाहे इधर से उधर हो जाये जमाना

बुजुर्गों की बातों की हंसी हैं उड़ाते
आजाद रहना चाहते हैं बन्धन उनको नहीं भाते
कैसा मुश्किल का दौर है यह आया
मां बाप को बृद्धाश्रम पहुंचाने में नहीं है शर्माते


- रवींद्र कुमार शर्मा



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अनकहा इज़हार

हां मैं लिखता हूं
सिर्फ लिखने के लिए नहीं
अपने जज्बातों के
इज़हार के लिए भी

हां मैं लिखता हूं
हर अल्फ़ाज़ में तुमको
मगर कहता नहीं कभी
अपने लफ्जों में तुमको

हां मैं लिखता हूं
अपने हृदय की
गहरी अनुभूति के साथ
मगर जाता नहीं कभी
अपने जज्बातों के आर पार।


- डॉ. राजीव डोगरा


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मानवीय संवेदनाएँ

मानवीय संवेदनाएँ शून्य हो गई हैं,
कुछ लोग सबकी ज़िंदगी से खेल रहे हैं।
क्या पैसा इतना ज़रूरी हो गया है,
कि इंसानियत का मूल्य ही खो गया है?
ज़िंदगी तो बहुत छोटी होती है,
क्या कोई धन साथ लेकर जाता है?
क्यों नहीं सोचते लोग यह बात,
केवल कर्म ही अंत तक साथ निभाता है।
उन मासूमों का क्या दोष था,
जो असमय काल के गाल में समा गए।
उन माताओं का क्या हाल होगा,
जिनकी गोद हमेशा के लिए उजड़ गई।
आँखों के आँसू अभी सूखे भी नहीं,
पर कुछ समय बाद लोग सब भूल जाएंगे।
फिर होगा कोई और हादसा,
और हम केवल शोक मनाते रह जाएंगे।
क्या प्रशासन फिर भी नहीं जागेगा?
क्या वह केवल अपनी जेबें भरता रहेगा?
जिस दिन किसी बड़े व्यक्ति का अपना दुख होगा,
शायद तभी वह इस पीड़ा को समझ पाएगा।


- गरिमा लखनवी


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21 June 2026

काफल: उत्तराखंड के पहाड़ों से जुड़ी मेरे बचपन की मीठी यादें

उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में पला-बढ़ा मेरा बचपन प्रकृति की गोद में बीता है। गर्मियों के दिन आते ही हमें काफल के पकने का बेसब्री से इंतजार रहता था। खेतों के किनारे और जंगलों में लगे काफल के पेड़ हमारे लिए किसी खजाने से कम नहीं थे। स्कूल जाते समय, छुट्टियों में और खाली समय में हम अपने दोस्तों के साथ पेड़ों पर चढ़ जाते थे और घंटों काफल खाते रहते थे। उस समय न मोबाइल का आकर्षण था, न कंप्यूटर और न ही टीवी की दुनिया का प्रभाव। हमारा बचपन प्रकृति के साथ बीता और शायद यही कारण था कि हम शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ और मजबूत रहे।




हम केवल पके हुए काफल का ही आनंद नहीं लेते थे, बल्कि कच्चे काफल का स्वाद भी हमारे लिए किसी विशेष व्यंजन से कम नहीं था। दोपहर के समय जब घर के बड़े-बुजुर्ग आराम कर रहे होते थे, तब हम सब दोस्त चुपके से कच्चे काफल इकट्ठा करते। फिर सिलबट्टे में पीसे हुए नमक में थोड़ा सरसों का तेल मिलाकर उसके साथ कच्चे काफल खाते थे। उसकी खट्टी-तीखी स्वादिष्टता आज भी याद आते ही मन को बचपन की गलियों में पहुँचा देती है।





जब हम अपने माता-पिता के साथ उत्तराखंड के जंगलों में जाते थे, तब भी पेड़ों पर चढ़कर काफल तोड़ना और वहीं बैठकर खाना हमारे लिए सबसे बड़ा आनंद होता था। हमने इस प्राकृतिक फल को खूब खाया, लेकिन कभी इससे हमारी तबीयत खराब नहीं हुई। स्थानीय लोगों के अनुभव और कई वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार काफल में अनेक लाभकारी गुण पाए जाते हैं, जो स्वास्थ्य के लिए उपयोगी माने जाते हैं।


आश्चर्य की बात यह है कि अनेक शोधों के बावजूद आज भी काफल की व्यावसायिक खेती करना आसान नहीं हो पाया है। यह फल विशेष प्रकार की मिट्टी, ठंडी जलवायु और उत्तराखंड जैसे पहाड़ी वातावरण में ही अच्छी तरह पनपता है। शायद यही कारण है कि यह दुर्लभ होता जा रहा है और बड़े बाजारों में बहुत कम दिखाई देता है।


आज हम बड़े हो गए हैं। जीवन की भागदौड़ में वही काफल हमारे लिए एक दुर्लभ स्वाद बन गया है। आज भी जब स्कूल के पुराने मित्र मिलते हैं, तो बचपन की वही बातें छिड़ जाती हैं- पेड़ों पर चढ़ना, जंगलों में घूमना, कच्चे काफल को नमक और सरसों के तेल के साथ खाना और बिना किसी चिंता के प्रकृति के साथ जीना।


आज हम उसकी तस्वीरें देखते हैं और मन ही मन यही सोचते हैं- काश! उत्तराखंड के पहाड़ों में बिताए गए वे बचपन के दिन फिर लौट आते और हम एक बार फिर अपने दोस्तों के साथ पेड़ों पर चढ़कर उसी काफल का स्वाद ले पाते। मेरे लिए काफल केवल एक फल नहीं, बल्कि उत्तराखंड की मिट्टी की खुशबू, पहाड़ों की संस्कृति, दोस्तों का साथ और बचपन की अनमोल यादों का एक जीवंत हिस्सा है।


- बीना सेमवाल