साहित्य चक्र

11 September 2026

रेलवे केबिनमैन: गौरा काका


"काका राम-राम बाप !" बचपन में सुबह-सुबह जॉगिंग के लिए जाते वक्त ये आवाज़ सुनाई दे तभी महसूस होता था कि वाकई सवेरा हुआ है। अहले सुबह सफेद ड्रेस पहने, लेफ्टिनेंट कर्नल के स्टाइल में मोजे के अंदर फुल पैंट के निचले हिस्से को खोंसे, कंधे पर चार सेल की बड़ी टॉर्च टांगकर साईकिल से सिल्ली की ओर से आते गौरा कुम्हार आते-जाते आते-जाते हर परिचित-अपरिचित हर किसी को राम-राम ज़रूर कहते थे। उनके कहने का अंदाज ही निराला था जिस कारण यह सुबह का नज़ारा पूरे बन्ता गांव सहित आस-पास के इलाके के लोगों की भी चर्या बन चुकी थी।

दरअसल गौरा कुम्हार बन्ता गांव से सिल्ली जाने वाली सड़क पर सिल्ली रेलवे स्टेशन के ईस्ट केबिन के पास बने रेलवे क्रासिंग पर केबिनमैन के साथ ही गेटकीपर का भी काम करते थे। हम लोगों ने ज्यादातर देखा कि उनकी ड्यूटी रात को ही लगती थी। शाम को गांव से ड्यूटी के लिए रवाना होने से पहले दो पैग मारकर लेफ्टिनेंट कर्नल के गेटअप में सफेद पोशाक और टॉर्च कंधे पर टांगकर सबको राम-राम कहते हुए ही जाते थे। ड्यूटी ज्वाइन करने से पहले दो पैग और मारकर मस्ती से ड्यूटी किया करते थे।






रात नौ बजे के बाद मजाल है कि कोई भी उन्हें सोने से रोक सके ! पाठक सोचेंगे कि इतने संवेदनशील ड्यूटी पर वे सोते थे तो ड्यूटी कैसे होती होगी ! तो बता दूं कि उनके सोने का स्टाइल भी स्वान निद्रा थी। उन्हें हर आती-जाती ट्रेनों के लिए ट्रैक चेंज करने के समय का पूरा ख्याल रहता था। उन्हें किसी अलार्म की भी जरूरत नहीं होती थी। ऊंघते हुए भी स्पीकर पर आती हर सूचना पर उनका पूरा ध्यान रहता था। यही कारण है कि अपने पूरे कार्यकाल में कभी भी ड्यूटी की लापरवाही का उन पर कोई आरोप नहीं लगा। रही बात रेलवे क्रासिंग की तो एक मजेदार बात बताते चलूं कि वो इतने शातिर और ढीठ थे कि रात नौ बजे के बाद वे क्रॉसिंग के रेलवे फाटक को पूरी तरह से बंद कर ही सोते थे।

सड़क पर चलने वाले अनजाने राहगीर तो जबतक केबिन की सीढ़ियां चढ़ कर उन्हें न जगाएं गेट खुलना संभव ही नहीं था। लेकिन इलाके के लगभग सभी लोगों को पता था कि गेट बंद है मतलब गौरा काका सो रहे हैं। चूंकि हमारे इलाके में काका-भतीजा में बाप-बेटे की तरह मज़ाक चलता है तो इलाके के लोग नीचे से ही गौरा काका को कुछ सभ्य और मजाकिया गालियां देकर चिल्लाते थे तो उधर से भी "काका राम-राम बाप" के संबोधन के साथ सम्मानपूर्वक फाटक खुलता था।

सुबह जब गौरा काका की छुट्टी होती थी तो एक बार फिर लेफ्टिनेंट कर्नल के गेटअप के साथ टॉर्च टांगे साईकिल से सबसे पहले मयखाने की ओर जाते थे। फिर दो पैग लगाने के बाद ही हर राहगीर को अपना चिर-परिचित अभिवादन करते हुए बन्ता गांव लौटते थे। हर इंसान कुछ अच्छे-बुरे गुणों को मिलाकर जीवन जीते हैं लेकिन जो भी हो गौरा कुम्हार सबके दिलों में बसते थे। बीतते वक्त के साथ एक समय वो भी आया जब वो रिटायर्ड हुए। यूं तो अधिकतर इंसान रिटायरमेंट के दिन मायूस और इमोशनल हो जाते हैं लेकिन गौरा काका उस दिन और भी ज्यादा प्रफुल्लित थे। उस दिन वे सर से पांव तक मयखाने में महुए के रंग में सराबोर होकर उसी चिर-परिचित अंदाज में गांव पहुंचे। गांव वालों ने भी उनका गर्मजोशी से स्वागत किया।

इतने खुशमिजाज आदमी को भूलना तो कठिन होता है लेकिन अचानक एक दिन ख़बर मिली की अत्यधिक तनाव की वजह से हार्ट अटैक से वो चल बसे। उनकी मौत से न केवल उनके परिवार, बल्कि पूरे गांव में मातम पसर गया। यूं तो गौरा कुम्हार नहीं रहे लेकिन आज़ भी सुबह-सुबह बन्ता-सिल्ली उस सड़क पर उनका अहसास नज़र आता है। रेलवे क्रासिंग पर अब फ्लाई ओवर बन चुका है और वो केबिन भी अब कंप्यूटराइज्ड हो चुका है। उस केबिन में अब कोई ड्यूटी पर नहीं रहता है लेकिन फ्लाई ओवर के ऊपर से गुजरते हुए आज़ भी लगता है कि खिड़की से हाथ हिलाकर गौरा काका कह रहे हैं"काका राम-राम बाप !!"


- कुणाल


आरक्षण कुमार और मेरिट ठाकुर की दोस्ती!






एक गांव में आरक्षण कुमार और मेरिट ठाकुर नाम के दो लड़के थे और दोनों ही आपस में बहुत अच्छे दोस्त थे। दोनों साथ में खेलते, पढ़ाई करते और स्कूल जाते थे। एक बार गांव में भागवत कथा का आयोजन होने वाला था। भागवत कथा की तैयारी को लेकर पूरे गांव में खुशी की लहर थी। मैरिड और आरक्षण दोनों दोस्त गांव वालों के साथ मिलकर भागवत कथा के आयोजन कार्य में जुट गए। पंडाल बनकर तैयार था और लोगों की बैठने की व्यवस्था भी पूरी हो चुकी थी। भागवत कथा का शुभारंभ हुआ और सभी गांव वाले कथा सुनने के लिए आने लगे। तभी कुछ लोगों ने गांव वालों को अलग-अलग स्थान पर बैठाना शुरू कर दिया। शुरुआत में आरक्षण और मेरिट को लगा कि यह व्यवस्था बनाए रखने के लिए किया जा रहा है।

अचानक आरक्षण ने देखा और महसूस किया कि उसके समाज के लोगों को एक ही स्थान पर बैठाया जा रहा है। पहले तो उसे लगा कि यह गलती से हो गया होगा, मगर जब आरक्षण की माता कथा सुनने के लिए आई, तो उसको भी लोग ने वहीं पर बैठा दिया गया जहां पर आरक्षण के समाज के सभी लोग बैठे थे। जबकि दूसरे जगह पर काफी स्थान खाली था। आरक्षण ने यह बात मेरिट को बताई, मेरिट ने आरक्षण को समझने की कोशिश की। इसके बाद जब मेरिट ने इस विषय पर अपने समाज के लोगों से बात की, तब उसके समाज के लोगों ने मेरिट से कहा इन लोगों की जाति हमसे नीच है। इसलिए यह भागवत कथा हमारे लोगों के साथ बैठकर नहीं सुन सकते हैं।

मेरिट नहीं पलट कर जवाब दिया और कहा कि आरक्षण के समाज के लड़कों ने भी पंडाल बनाने और व्यवस्था को बेहतर करने में अपना सहयोग दिया है। फिर अंत में आप लोग इस तरह का भेदभाव क्यों कर रहे हैं ? 

मेरिट के तथाकथित ऊंच समाज के लोगों ने जवाब दिया- पंडाल बनने के बाद हमने पंडाल का शुद्धिकरण कर दिया था और उन सभी लड़कों को उसके बाद पंडाल के अंदर आने नहीं दिया। इसलिए तुम ज्यादा होशियार बनने की कोशिश मत करो, जो व्यवस्था सदियों से चली आ रही है, तुम उसको बदलने की कोशिश मत करो। अगर हमारे समाज में रहना है तो इन नियमों का पालन करना होगा। वे लोग चाहे कितना ही पैसा कमा ले, कितना ही शिक्षित क्यों ना हो जाए, मगर वे जाति के आधार पर हमसे बड़े और आगे नहीं हो सकते हैं।

मेरिट ठाकुर खामोशी से पंडाल से बाहर निकाल और आरक्षण कुमार के साथ पंडाल से दूर बैठकर भागवत कथा सुनने लगा। तभी मेरिट ने आरक्षण से कहा- दोस्त मैं तुमसे माफी चाहता हूं। मगर यह सत्य है कि हमारे समाज के लोगों ने तुम्हारे समाज के लोगों को जान बूझकर अलग बैठाया है। 

इस पर आरक्षण कुमार बोला- मित्र यह तुम्हारी गलती नहीं बल्कि हमारे समाज का दुर्भाग्य है। हमारे समाज ने यातनाएं झेली, भेदभाव झेला, अपमान सहा, मगर फिर भी कभी इस धर्म को छोड़ने के बारे में नहीं सोचा। मुझे अपने समाज की इस मूर्खता पर आज हंसी आ रही है। मित्र! बाकी आपने इस विषय को गंभीरता से लिया और अपने समाज के लोगों से बात की इसके लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। कम से कम आप ने इस विषय को समझने की कोशिश तो की अन्यथा आपके समाज के लोग समझना तो दूर की बात, सुनना तक नहीं चाहते हैं।

मेरिट ठाकुर ने कहा- मित्र, हमारा समाज इतना संकीर्ण और मूर्ख होगा मुझे नहीं पता था। खैर! तुम मेरे मित्र हो‌‌ और हमेशा रहोगे। समाज की कोई भी बुरी ताकत हमारी इस मित्रता को खत्म नहीं कर सकती है। आज नहीं तो कल हमारे समाज को अपनी इन बुराइयों पर पछतावा होगा। इन्हीं बुराइयों की वजह से हमारा समाज कभी भी एकता के सूत्र में नहीं बंध सका है।

आरक्षण कुमार थोड़ी देर विचार करने के बाद बोला- दोस्त! मुझे नहीं पता तुम्हारे समाज की ये बुराइयां खत्म होगी या नहीं, मगर मैं इतना जरूर कह सकता हूं कि मैं इस व्यवस्था से खुद को बाहर कर लूंगा। और अपना लूंगा कोई ऐसा धर्म व व्यवस्था जहां मुझे और मेरे परिवार को सामाजिक और जातीय अपमान नहीं सहना पड़े।

मेरिट ठाकुर ने कहा- मित्र, हम सभी एक ही धर्म को मानने वाले लोग। फिर क्यों ना हम सभी को सामाजिक मंथन कर इन बुरी प्रथाओं का बहिष्कार कर बेहतर समाज की नींव डालकर आगे बढ़ना चाहिए।

आरक्षण कुमार ने मेरिट का जवाब देते हुए कहा- दोस्त यह काम मेरे समाज और जाति के लोगों का नहीं, बल्कि आपके तथाकथित ऊंची जाति के लोगों का है। बाकी हमारे समाज के लोग तो सदियों से कहते आ रहे हैं कि यह जातीय व्यवस्था मानव समाज के लिए सही नहीं है। इसी जाति व्यवस्था के कारण हमारा देश हजारों साल गुलाम रहा और तो और इसी व्यवस्था के कारण हमारे समाज के लोगों के पास ना जमीन थी, ना संपत्ति थी, ना शिक्षा थी और ना ही व्यापार था। फिर भी हमारे समाज ने विद्रोह नहीं किया और ना ही किसी बाहरी के साथ मिलकर अपने समाज के साथ गद्दारी की। 

मेरिट ठाकुर ने आरक्षण की बात सुनकर थोड़ी देर विचार किया और उसके बाद विनम्रता से कहा- मित्र तुम्हारी बातें शत-शत प्रतिशत सही है। यह हमारे समाज की मूर्खता ही है कि उसने हजारों सालों तक आपके समाज पर अत्याचार, भेदभाव और शोषण किया। मगर कभी पछतावा कर माफी मांगने के बारे में नहीं सोचा, बल्कि आज भी मौका मिलते ही शोषण, भेदभाव और अत्याचार करना शुरू कर देता है। 

मित्र! मैं मेरिट और तुम आरक्षण हो। मेरे पास सदियों से शिक्षा, संपत्ति और व्यापार पर एकाधिकार रहा है। तुम्हें तो आजादी के बाद संवैधानिक व्यवस्था कर तुम्हारी जनसंख्या के आधार पर अधिकार व हिस्सेदारी देने का एक छोटा सा प्रयास किया गया है। इस छोटे से संवैधानिक प्रयास से भी हमारा समाज घृणा और नफ़रत कर रहा है। मैं माफी के साथ कहता हूं कि भारतीय संविधान के तहत आपके समाज को मिले संवैधानिक अधिकार व हिस्सेदारी तब तक बनें रहने चाहिए, जब तक की हमारे समाज द्वारा आपके समाज के किसी भी एक व्यक्ति के साथ किसी भी प्रकार का जातीय उत्पीड़न, भेदभाव और शोषण किया जाता है।

आरक्षण कुमार बोला- दोस्त! काश तुम्हारी तरह तुम्हारे समाज के सभी लोग हमारी इस पीड़ा को समझ पाते और हमारे समाज की जाति व्यवस्था, उत्पीड़न और भेदभाव जैसी बुरी प्रथाओं का विरोध कर एक स्वस्थ समाज बनाने की दिशा में कदम बढ़ाते। शायद! इसी जातीय व्यवस्था के कारण से हमारा देश आज भी एकता के सूत्र में नहीं बंध पाया है।


                                                         - दीपक कोहली


07 September 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 07 सितम्बर 2026





वो भी क्या दिन थे

वो गाँव की मिट्टी,
वो गाँव का आँगन,
वो बचपन के सुहाने दिन,
वो अपनों का दुलार और अपनापन।
कुएँ से पानी खींचना,
आम के पेड़ पर चढ़कर आम तोड़ना,
दोस्तों के संग खेलना-कूदना,
नन्हीं नावों को पानी में छोड़ना।
बारिश की बूंदों में बेफिक्र भीगना,
मिट्टी की खुशबू में मन का महकना,
न कोई चिंता, न कोई फिक्र थी,
हर छोटी खुशी ही तब बड़ी खुशी थी।
न मोबाइल था, न कोई भागदौड़,
न रिश्तों में था कोई मन का मोड़,
वो हँसी, वो मस्ती, वो प्यारा बचपन,
आज भी ढूँढ़ता है उन्हें मेरा मन।
वो दिन लौटकर अब नहीं आएँगे,
बस यादों में आकर हमें सताएँगे,
जब भी बीते दिनों को याद करेंगे,
आँखों में नमी और होंठों पर मुस्कान लाएँगे।
सच कहूँ तो दिल आज भी यही कहता है-
वो भी क्या दिन थे,
वो भी क्या दिन थे…
जो लौटकर अब कभी नहीं आएँगे,
बस याद बनकर दिल में रह जाएँगे।

- गरिमा लखनवी


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अपनों की भीड़ में रह कर भी तन्हा हो गया हूँ मैं,
अपनी ही नज़र में खुद पर ही रुस्वा हो गया हूँ मैं।

​बुझा कर शम्अ खुद अपने ही हाथों से अँधेरे में,
किसी की उम्मीद में रोशनी का धोखा हो गया हूँ मैं।

​ज़माने की नज़र में मुकम्मल ज़ात हूँ लेकिन,
हक़ीक़त जानिए तो अंदर से टूट गया हूँ मैं।

तअल्लुक़ तोड़ने वालों का शिक़वा तक नहीं कोई,
यूँ चुपके से किसी की याद से रुख़्सत हो गया हूँ मैं।

​मेरे होने न होने से किसी को फ़र्क क्या पड़ता,
चराग़-ए-सुब्ह की मानिंद बुझा दिया गया हूँ मैं।

​मुश्ताक़ अब तो ख़ुद से भी वाबस्ता नहीं हूं मैं,
ख़ुदा जाने मैं अपने आप से क्या हो गया हूँ मैं।

- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़


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इजहार

खत में भेज रहा हूँ प्रेम का इजहार
सच्चे दिल से करता हूँ तुमसे प्यार
वन उपवन से आती है प्रेम पुकार
कोरे कागज पे लिखा है प्रेम करार

मैं तन मन से करता हूँ आज इकरार
हर जन्म में हुआ है तुमसे मेरा प्यार
मत करना मेरे प्यार का कभी इनकार
तेरा मेरा दिल धड़कता है संग दिलदार

ना कर मेरी आरजू को अब शर्मसार
तेरे लिये कर ली है मैं जग से तकरार
फकत तुम हो मेरे जीवन की संसार
एक बार मुड़ेर पे आ कर लूँ तेरी दीदार

बादलों की धुन्ध से करा दूँ तेरी श्रृंगार
प्रेम से अर्पण है मेरा जिगर उपहार
मेरे दिल की खुली है तेरे लिये मेरा द्वार
किस बात की अब करती हो तुम विचार

आ जा मेरे आँगन में तुम इक बार
भूल जाऊँ तेरे जुल्फों में छुप संसार
ले जाऊँगा सनम तुम्हें चाँद के उस पार
एक दुजे में समाँ जाऊँगा आ मेरे दिलदार

- उदय किशोर साह


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हर रोज़ एक नई जंग

शिक्षक हूं मैं, हर रोज एक नई जंग लड़ती हूं,
लड़ाई के मैदान में नहीं, बच्चों के दिलों में उतरती हूं।
झांकती हूं मैं नन्हें दिलों में, अंतर की थाह पाने को,
कितने आतुर हैं ये नन्हें बालक, प्यार सबका पाने को।

एक मुस्कान ही काफी है, इनके दिल में उतर जाने को,
बाहें फैला कर रखते हैं हर पल, ये सबको अपनाने को।
करते हैं नादानियां, है शरारतों का समंदर इनमें,
नहीं सुनते ये किसी की, रहते हैं मगन निज धुन में।

जिसके लिए रोको इनको, वही तो है करना इनको,
गिर-गिर कर ही तो है, संभलना इनको।
नाज़ुक तन और निश्चल मन है,
जब-जब गौर से देखूं इनको।

नन्हें से शैतान हैं प्यारे, अल्हड़पन से भरे हुए,
नित नई शरारत सूझे इनको, करते हैं परेशान मुझे।
रोज समस्या नई है लाते, जंग में हैं मुझको उलझाते,
हर चीज़ को अपना बतलाते, नहीं जरा भी खौफ हैं खाते।

माथा अपना पकड़ मैं लेती, समस्या सुलझाते-सुलझाते।
रोज एक नई जंग लड़ती हूं, बच्चों को पढ़ाते-पढ़ाते।
बच्चों के दिलों में उतरती हूं, प्यार से समझाते-समझाते।
रोज एक नई जंग लड़ती हूं, खुद को आजमाते-आजमाते।

- कंचन चौहान


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गांव का आदमी

उठता है सुबह तड़के
डालता है सिरहाने के नीचे हाथ
निकालता है बीड़ी का बण्डल और लाइटर
जलाता है बीड़ी खींचता है जोर का कश
जैसे मानों एक ही कश में अपने अंदर
समेट लेगा जीवन के दुखों को
चलता है धीरे धीरे अपनी गौशाला की ओर
करता है इकट्ठा गोबर एक टोकरी में
उठाकर सिर पर चला जाता है दूर खेत के कोने में
फैंकता है गोबर के ढेर पर ऐसे जैसे
मानों दूर छिटक रहा हो अपनी परेशानियों को
उठाता है दूध की भरी केनी
चल पड़ता है शहर की ओर
हलवाई को बेचने के लिए
चार पैसे बन जाएंगे परिवार चलाने के लिए
लौट कर पीता है चाय फौजी जग में
लेता है एक एक घूंट ऐसे जैसे
समेटना चाहता हो परिवार के
दुखों को अपने अंदर
नहा धोकर करता है प्रार्थना अपने इष्टदेव से
मिल जाये दिन भर के लिए काम
उठाता है प्लास्टिक के डिब्बे में रखी रोटी
चटनी एक छीला हुआ प्याज साथ में हरी मिर्च
चल पड़ता है सड़क की ओर जहां
ढेर लगा है पत्थरों का
निकालता है झोले में पड़ा हथौड़ा
करता है शुरू पत्थर कूटना
ऐसे चलता है उसका हथौड़ा
मानो कूटना चाहता हो अपनी उलझनों को
शाम को थका हारा पहुंचता है घर
बैठ जाता है टूटी चारपाई पर
फिर निकालता है जेब से बीड़ी का बंडल
एक बीड़ी ही तो है जो देती है
पूरा दिन रात उसका साथ
तभी पुकारती है घरवाली खाने के लिए
हाथ मुंह धोकर पोंछता है गमछे से
जो रहता है उसके कांधे पर
रूखा सूखा जो भी बना खा लेता है
बच्चों के साथ बैठ कर
पाता है अपनेपन का एहसास
सो जाता है फिर चारपाई पर
देखता है छत्त की ओर
नज़र आती है वही बांस की कड़ियाँ
खिड़की से आती ठंडी ठंडी हवा
नींद की आगोश में ले लेती हैं उसको
सुबह उठते ही रहती है फिर
बंडल से निकली एक बीड़ी
उसकी परेशानियों को धुएं के छल्ले
में उड़ाने के लिए तैयार
यही तो है गांव का आदमी
समाप्त हो जाएगी उसकी जिंदगी
काम के बोझ तले दबकर
सबका साथ छूट जाएगा
पर बीड़ी निभाएगी साथ
अंतिम सांस तक

- रवींद्र कुमार शर्मा


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“गुरु- एक उजाला”

हम मिट्टी थे हम
आपने हमें आकार दिया,
अक्षरों की दुनिया से आगे
जीवन का व्यवहार दिया।

जब समय की आँधियों ने
हमारे दीप बुझाने चाहे,
आपने हथेलियों की ओट से
हमारे उजाले बचाए।

हमारी आँखों में पलते
हर छोटे-से स्वप्न को,
आपने अपनी प्रार्थनाओं में
माँगा था हर क्षण को।

हम हारकर लौटे तो
आपने हार नहीं मानी,
हमने खुद को कम आँका
आपने हमारी कीमत जानी।

हमने तो बस पाठ पढ़े,
आपने जीवन पढ़ा दिया,
हमने केवल मंज़िल माँगी
आपने रास्ता बना दिया।

आज हम जो भी हैं,
उसमें आपका अंश है,
हमारी हर उड़ान के पीछे
आपके विश्वास का आकाश है।

गुरु होना केवल पढ़ाना नहीं,
किसी के भीतर का दीप बन जाना है…
और शिष्य की सफलता देखकर
चुपचाप मुस्कुरा जाना है।

- डॉ. सारिका ठाकुर ‘जागृति’


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शिक्षक दिवस

पहली गुरु मेरी मां
पहला नमन मां को

दूसरा गुरु मेरे पिताजी
दूसरा नमन पिताजी को

तीसरा गुरु मेरे भाई बहन
तीसरा नमन भाई बहन को

चौथे गुरु मेरा समस्त परिवार
जिन्होंने मुझे हर चीज़ सिखाई

पाँचवां गुरु मेरे शिक्षक
नमन वंदन अपने गुरुओं को

छठवां गुरु पूरा समाज
जिन्होंने कई सारी चीजें सिखाई

सातवां गुरु मेरे साथी
कुछ अच्छे अनुभव सीखे

नमन वंदन सारे संसार को
नमन वंदन समस्त गुरुओं को


- सुमन डोभाल काला


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एक शिक्षक की कलम से

मैं एक शिक्षक हूँ
समाज का सच्चा पथ प्रदर्शक हूँ
शिक्षा देना है मेरा काम
मकसद है सबो को मिले शिक्षा का ज्ञान।

भेद-भाव नहीं रखता हूँ जाति-पाति का
उद्देश्य रखता हूँ समाज में शांति का
सत्य अहिंसा का पाठ सदैव पढ़ाता हूँ
अधर्म से धर्म-पंथ के ओर पग बढ़वाता हूँ

न किसी को अन्याय करने को कहता हूँ
न किसी को अन्याय सहने को कहता हूँ
धर्म-अधर्म का फर्क सदैव बतलाता हूँ
अधर्म के विरूद्ध खड़े रहने को कहता हूँ ।

जबतक हूँ मै शिक्षक पद पर विराजमान
देता रहूँगा अपनी शिक्षा का ज्ञान
अबोध को बोध कराकर
निरक्षरों को अक्षर अक्षर सिखाकर।

बनाता हूँ उनसबो को सबल
ताकि बिन अक्षर,संस्कार के न हो जाये कही निर्बल
ऐसा ही तो एक शिक्षक का है काम
अपने संपूर्ण शिक्षा का कर दे दान।

- चुन्नू साहा


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दरिया सा बहने लगता हूँ

चित्र अपना देख कर
न जाने क्यों ?
दरिया सा बहने लगता हूँ

भीतर मेरे गोविन्द सागर
लहरों सा बहता रहता हूँ
सुख-दुःख को रख कर किनारे
मैं खुद को ही गहरा करता हूँ
ये लाल साफा -
मेरी पगड़ी नहीं , निशानी है
ठौहड़ू की मिट्टी की सोंधी सुगंध
और उसी की ही कहानी है
जितना झुका हूँ, उतना ही उठा हूँ
ये दरिया नहीं
पहाड़ की रवानी है,
आँखों में देखा, तो समंदर पाया
पलकों में रोक रखा, एक अर्सा पुराना
फ़ौलाद की फैक्ट्रियों के धुएँ में भी
बिलासपुर की आबो-हवा सा
महका करता हूँ

लोग कहते हैं-
तस्वीर तो, बस तस्वीर है
मैं कहता हूँ-
ये आईना है, मेरे सफर का,
जहाँ हर लकीर में लिखा है-
इज्ज़त का, शोहरत का, और सबर का
हर वक्त इम्तहान होता है

भृगु ने लात मारी थी हरि को-
श्री हरि ने चरण दबाए थे,
मैंने तो खुद को ही लात मारी
और खुद को ही गले लगाया है

चित्र अपना देख कर,
न जाने क्यों दरिया सा बहने लगता हूँ
क्योंकि- मैं पत्थर तो हूँ नहीं,
और मैं तो ठौहडू का पानी हूँ,
जो बहता है अपने ही प्रवाह से
और बह कर भी, पहाड़ सा रहता हूँ
चित्र अपना देख कर न जाने क्यों ?
दरिया सा बहने लगता हूँ।।

- बाबू राम धीमान


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गुरु

जो दुनिया दिखाए वो माँ पहली गुरू है,
पर जो जग में जीने काबिल बनाए वो गुरु है।

खुद जले और औरों को रोशन करे,
वो निरंतर जलने वाला दीपक गुरू है।

वीराने में फूल खिला दे और कांट छांट कर,
सुंदर पौधे का रूप जो दे वो माली गुरू है।

अंधेरी राहों को जो उजालों से भर दे,
जीने का मकसद जो दिखाए वो राहबर गुरू है।

सजा दे जो तालीम से अपने शागिर्दों को,
वो अकेला सच्चा हमदर्द खैरख्वाह गुरू है।

नाकामी के कांटों को चुन चुन कर जो निकाले,
जीवन में साये से बढ़कर वो हमसफर गुरू है।

बेशक तनख्वाहदार होने से कद्र कम हो गई,
बेकद्री में जो तालीम की लौ जगाए वो गुरु है।

वक्त और संगीन हालातों ने गिरा दिया वजूद,
वजूद को संभालने में संघर्ष जो करे वो गुरू है।

- राज कुमार कौंडल


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शिक्षक दिवस

नमन मात पिता चरणों में
नमन गुरु के चरणों में
जीवन पथ प्रदर्शक आप हो
हो भाग्य विधाता तुम्हीं

आपके सानिध्य में बना आज मैं
आप हो जीवन दाता गुरुवर
आप से संस्कार दुलार प्यार
पाया हरपल जीवन में गुरूवर

दो आशीर्वचन इतना मैं
जीवन में हार कभी न पाऊं
आपकी की बातें
चाक और डस्टर न भूलूँ मैं
इतना सफलता पाऊं गुरुवर

- मनोज कौशल


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उनको कहाँ फ़ुर्सत कि अब मुलाक़ात हो,
काश फिर कभी दो घड़ी उनसे बात हो।

मुलाक़ातों के सफ़र में रह गईं ख़ामोशियाँ,
काश ख़ामोशियों में भी कोई बात हो।

दिल के आँगन में उदासी का बसेरा है मगर,
किसी दिन फिर से ख़ुशियों की बरसात हो।

वक़्त की कोई पाबंदी नहीं होती इश्क़ में,
दिन हो चाहे रात हो, बस उनकी याद हो।

हमने तो हर मोड़ पर उनका ही इंतज़ार किया,
क्या ख़बर थी रास्तों में इतनी रात हो।

वो मिले तो पूछ लेंगे हाल-ए-दिल अपना कभी,
क्या पता उस एक पल में सारी कायनात हो।

दूरियाँ बढ़ती गईं, रिश्ते भी ख़ामोश हो गए,
पर दिल नरेंद्र कहता है- कभी मुलाक़ात हो।

उनको कहाँ फ़ुर्सत कि अब मुलाक़ात हो,
काश फिर कभी दो घड़ी उनसे बात हो...

- नरेन्द्र सोनकर, बरेली


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भरे हुए पन्ने पर कैसे लिखूँ ?

भरे हुए पन्ने पर कैसे लिखूँ,
हर कोना किसी बीती हुई बात का घर है,
हर अक्षर किसी चेहरे की परछाईं,
हर ख़ाली जगह भी
किसी अधूरे ख़त का असर है।

मैंने सोचा था,
जहाँ शब्द खत्म होंगे,
वहीं से कुछ नया लिखूँगा;
मगर इस पन्ने की ख़ामोशी ने बताया,
कुछ जगहें खाली नहीं होतीं,
बस वहाँ शब्दों की जगह
धड़कनें रहती हैं।

ये काग़ज़ भी अजीब है,
जितना पढ़ता हूँ,
उतना अपना लगता है;
जितना अपना लगता है,
उतना ही पुराना निकलता है।
शायद ये पन्ना नहीं,
मेरा दिल है,
जिस पर हर मिलने वाले ने
अपनी एक पंक्ति लिख दी,
किसी ने स्याही से,
किसी ने आँसुओं से,
और किसी ने
सिर्फ़ छोड़कर।

कुछ पन्ने पलटे नहीं जाते,
क्योंकि उनके साथ
पूरी ज़िंदगी पलट जाती है।
और कुछ पन्ने,
कितने भी भरे हों,
हम उन्हें बार-बार पढ़ते हैं,
इस उम्मीद में कि
कहीं किसी हाशिए पर
हमारे लिए बचा हो
एक छोटा-सा ख़ाली कोना।

- नरेंद्र मंघनानी


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हिन्दुस्तान के कोने कोने का सुमधुर संवाद है।

धड़कनों में गूंजती है ज़बान हमारी शान है,
हिंदी अपनी मातृभाषा, देश की पहचान है।

​सरहदों को चीरती जो भाव का विस्तार है,
रीति-नीति और संस्कृति का अमर श्रृंगार है।

वेद की ऋचाओं से जो निकली अनघ नाद है,
हिन्दुस्तान के कोने कोने का सुमधुर संवाद है।

​पूरब से पश्चिम तक जो सेतु का काम है,
हर जुबां पर गूंजता जिसका प्यारा नाम है।

कबीर की साखियों में जो मिठास घोलती,
मीरा के भजनों में जो प्रेम बनके बोलती।

​आधुनिकता की दौड़ में मत इसे विस्मृत करो,
अपनी इस विरासत पर गर्व तुम निरंतर करो।

- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़



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04 September 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 04 सितम्बर 2026





कैसे भूल जाऊँ अपनी गाँव की पावन मिट्टी।
जेहन में कौंध रहा जिनकी यादें खट्टी मिठी॥
बचपन से सिखाया ना रोना सदा मस्कुराना।
शहर में आकर मैं बन गया सबका बेगाना॥

शुद्ध हवा शुद्ध पानी की नदी थी हमें प्यारी।
अमुवा के बगीचे में बीतता था वक्त हमारी॥
पहाड़ों से आती थी जब शेर की दहाड़।
सीने में धड़कता था बैरी जन का भी प्यार॥

बाग बगीचे हरी भरी वन व घर की गुलशन।
मेहमानों का भी मोह लेते थे उनके चित्तमन॥
कोयलिया काली काली की करूण पुकार।
याद आती है नित्य हमें घर व गाँव जवार॥

माता पिता का था घर में एकलौता  दुलारा।
उनके लिये मैं था एक अनमोल ही सितारा॥
ये पत्थर के महल ये कंकरीट पथ अनजाना।
मजबूरी में भी नहीं होता इस शहर में जमाना॥

काश ! ये पापी पेट, जीवन में ना हमें रूलाता।
रोटी कमाने शहर हमें, कभी ना बुलाता॥
गाँव की पर्णकुटी था, स्वर्ग सा अपन नजारा।
सुकून देता था घर का टूटी खाट पे सारा॥

- उदय किशोर साह


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साथ सच का

जीवन में हमेशा सही के साथ चले हैं,
शायद तभी आज अकेले खड़े हैं।
हमें चाहिए ही नहीं
गलत लोगों का साथ,
क्योंकि कुछ रिश्ते सिर्फ़ दिखावे के होते हैं,
सामने अपनापन जताते हैं,
और पीछे से
आपकी जड़ें खोद जाते हैं।
हमने तो सच को ही अपना साथी माना है,
सच की राह को ही अपना रास्ता जाना है।
फिर भला दुनिया की भीड़ से
क्यों डरें हम,
जब सिर पर रब का हाथ है,
तो किस बात का संशय,
किस बात का डर है?
मन को उम्मीद के धागे से बाँध रखा है,
विश्वास की लौ को अब भी जला रखा है।
कर्म के पथ पर
निर्भय होकर कदम बढ़ाते हैं,
जो होगा, अच्छा ही होगा-
बस इसी विश्वास के साथ
यूँ ही चलते जाते हैं।
न किसी से शिकायत,
न किसी से होड़,
सच का साथ हो
तो अकेलापन भी
ईश्वर का दिया हुआ एक सुकून है।
क्योंकि भीड़ में खड़े होने से बेहतर है,
सच के साथ अकेले खड़ा होना।

- पूनम गूंजा


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क्या है मेरिट ?
मैं पूछता हूं!
एक व्यक्ति,
अपनी पीढ़ी का
पहला साक्षर है।
यानी उसके माता-पिता,
दादा-दादी अनपढ़ थे।
तथाकथित मेरिट के अनुसार!
जबकि वे कुशल कारीगर थे।
जिन्हें तुम आज!
सिविल इंजीनियर...
फैशन डिजाइनर...
हेयर डिजाइनर...
और वैज्ञानिक कहते हो।
जरा! अपने दादा-दादी से पूछो
कि तुम्हारा पुश्तैनी घर
किसने बनाया था ?
क्या घर बनाना,
मेरिट में नहीं आता ?
क्या विशाल मंदिर बनाना
मेरिट में नहीं आता ?
क्या चमड़ा उतार कर
जूते-चप्पल बनाना
मेरिट में नहीं आता ?
फिर! तुम्हारी मेरिट में
क्या आता है ? और
इस तथाकथित मेरिट का
आधार क्या है ?
ना बराबर संपत्ति...
ना बराबर व्यापार...
ना बराबर जमीन...
ना बराबर अधिकार...
कही तुम्हारी मेरिट,
जातिवादी तो नहीं है!

- दीपक कोहली


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हादसा हो जाऊं

तेरी नज़रों सी नज़र मैं कहां से लाऊं,
बेसबब क्यों मैं तुझ से ख़फ़ा हो जाऊं।

राबता मुझसे महफ़िल में नहीं था उसका,
बेहतर है खामोशी से अब मैं दफ़ा हो जाऊं।

मायूस जुस्तजू है दिल भी टूटने वाला,
सफ़ीना मेरा डूबे, मैं हादसा) हो जाऊं।

अफ़साना मेरा किसी अफ़साने में नहीं,
बहती रहे आंखें टूटा आइना हो जाऊं।

छेड़ते क्यों हैं बरसों पुराने मंज़र मुझको,
दीदार का यारब कोई तो बहाना हो जाऊं।

शर्मिंदा न कर तर्केतालुक़ करके मुश्ताक़,
मेरी तो यही तमन्ना के बस में तेरा हो जाऊं।

- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़


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दरवाज़ा खुला रहने दो

दरवाज़ा खुला हो
तो ज़रूरी नहीं
आँधियाँ ही घर में आएँ,
कभी किसी सुबह की
सुनहरी धूप भी दस्तक देती है।
हर खुली खिड़की
खतरे का संकेत नहीं होती,
कभी कोई खूबसूरत पंख
उड़ता हुआ भीतर आता है,
और सूने आँगन में
उम्मीद के रंग भर जाता है।
हाँ, कुछ हवाएँ
घर अस्त-व्यस्त कर जाती हैं,
मगर हर हवा तूफ़ान नहीं होती,
कुछ हवाएँ तो
बंद कमरों में
जीने की खुशबू भर जाती हैं।
कभी-कभी
ज़िंदगी भी तो
पंख लगाकर आती है,
और बस इतना चाहती है
कि कोई दरवाज़ा खुला हो…!

- नरेंद्र मंघनानी


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जीवन का सार बस प्यार

जीवन का सार है, बस प्यार
प्यार बिना जीवन है बेकार
इस बात से क्यों करते है इंकार
जीवन है तो होगा ही प्यार।

प्यार का मतलब सब में है भिन्न-भिन्न
जितने भी रिश्ते है, सब में ये है अभिन्न
भाई का भाई के प्रति है प्यार
माता पिता का बच्चों से है प्यार।

दोस्ती में दोस्ती जैसा है प्यार
तो भाई-बहन का है अनोखा प्यार
पेड़-पौधों से भी होता है प्यार
तो जीव-जंतुओं में भी है आधार।

एक-दूसरे से करो सब प्यार
सुकून की जीवन का रहे हकदार
बनेगा बहुत सुन्दर सा संसार
जीवन का सार है, बस प्यार और प्यार।

- चुन्नू साहा


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काम नेकी का हरदम किया कीजिए।
मुफ़्लिसों का सदा तुम भला कीजिए।।

देख राहों में काँटे रुके ना कदम।
साथ अपनों के हरदम चला कीजिए।।

प्रेम तेरा कभी कम न हो साथिया।
चाँद-तारों की बातें किया कीजिए।।

हाथ में हाथ तेरा रहे हर जनम।
रब से मेरे लिए ये दुआ कीजिए।।

दिल की हसरत थी जो वो मिली ही नहीं।
ज़िंदगी से भला क्या गिला कीजिए।।

- रति सिंह 'रिंकी'


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वो सच को क्या समझेंगे
जो जीवित है सिर्फ अभिनय में।
नित लिपटे हैं रति से,
कब डुबोया खुद को प्रणय में।
देह की भूख मन की
कहाँ भरपाई करता है?
वासना-भावना ऐसे ही
खेलतीं हर सांस हर शय में।

- राधेश विकास


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युवा पीढ़ी क्यों गांवों को भूलती जा रही

एक दिन वह गांव का घर भी छूट जाएगा
वह शहर का घर भी नहीं बचा पायेगा
जाना तो पड़ेगा अकेले उस मंजिल की ओर
जहां से फिर कोई वापिस नहीं आएगा

घर का आंगन मिट्टी से भरा हुआ
वह कच्ची दीवारें भी मिट्टी में समा जाएंगी
एक एक ईंट पत्थर जोड़ कर बनाया था जिहोने
उनकी यादे भी धीरे धीरे धुंधली नज़र आएंगी

सब मस्त हैं सब की अपनी अपनी ज़िंदगी है
बचपन के यार दोस्त कोई अब नहीं बुलाते
कहाँ गए वह सुंदर लम्हें वह अनमोल समय
नाम लेकर दूर से अब कोई आवाज़ नहीं लगाते

सुनसान आंगन में लगे पत्थर अब भी करते हैं याद
एक दूसरे के पीछे दौड़ते कितना होता था वाद विवाद
ऐसा क्या हुआ वक्त ने कैसी यह करवट बदली
हर कोई क्यों चाह रहा गांव से होना आज़ाद

शहर की ज़िंदगी क्यों सभी को रास आ रही
एकदूसरे से अनजान ऐसी ज़िन्दगी क्यों भा रही
गांव अब वैसे नहीं रहे तेजी से हो रहा विकास
फिर भी युवा पीढ़ी क्यों गांवों को भूलती जा रही

शहर तो शहर है कभी किसी का अपना न हुआ
युवा पीढ़ी को चाहिए बना लो गांव में भी एक ठाँव
कोरोना जैसी महामारी से जो हो गया फिर सामना
तो फिर याद आएगा अपना वही छोटा सा गांव

- रवींद्र कुमार शर्मा



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मुझसे उसका नाम बड़ा है।
मुझको इससे लेना क्या है।

जीत हमेशा होगी उसकी,
अफ़वाहों से कौन डरा है।

वो कैसे बिल्ली पालेगा,
जिसने तोता पाल रखा है।

पहले ही तासीर है कड़वी,
और करेला नीम चढ़ा है।

भूख मिटेगी किससे किसकी,
दाने -दाने पर लिक्खा है।

उसको डर है खो जाने का,
जिसको ज़्यादा साथ मिला है।

साथ हमारे दूर सफ़र में,
कौन पराया कौन सगा है।

सबकी अपनी-अपनी हस्ती,
अपना-अपना फ़न, रुतबा है।

- नवीन माथुर पंचोली


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काया कंचन

आँखों से हिय में गया उतर,
अब मौन प्रीत हो गई मुखर।
वो छुवन दुपहरी धूप हुई,
काया कंचन-सी गई निखर।

नयनों में नूतन स्वप्न सजे,
साँसों में सुरमई साज़ बजे।
तपती दुपहरी शीतल हो,
जब संग प्रिये का रूप सजे।

धड़कन की गति पल-पल बढ़े,
चंदन-सी चाहत मन में चढ़े।
इस चंचल मन के आँगन में,
चाहत के मधुर चिराग जले।

चमकी चाहत की छाँव घनी,
हर साँस आज सर्वस्व बनी।
मीरा के मोहन मिल ही गए,
सुंदर-सी यह सांझ बनी।

                                - सविता सिंह मीरा


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