भानु, धरती, गगन, पवन
जिसका करते सादर सम्मान
ऐसे ही गुरु की महिमा का
करती हूँ मैं गुणगान।
गुरु की जिसके समदा झुकते
ब्रह्मा विष्णु महेश्वर
कीर्ति जिसकी प्रतिबिंबित करते
अचल शिखि रत्नाकार
किंकखत् रहते हैं जिसके
महाद्वीप -अनन्य,महान
ऐसे ही गुरु की महिमा का
करती हूँ मैं गुणगान।
शिक्षा संस्कार देकर जिसने
जीवन पथ सुगम बनाया
प्रगति लक्ष्य परिभाषित कर
मानवता का अंश बढ़ाया
गुरु-मूल पर ही अवलंबित
हमारी उन्नति का अभिमान
ऐसे ही गुरु की महिमा का
करती हूँ मैं गुणगान।
चारु चरित्र उदारु प्रवृत्ति
सतोगुण करें निवास
पदिन्दु हस्त-चंद्रिका रूपी
वाणी गत कोमल कंजा भास
गुरु दक्षिणा और सेवा हेतु
प्रतिपल उत्सुक है मेरे प्राण
ऐसे ही गुरु की महिमा का
करती हूँ मैं गुणगान।
- अंशिता त्रिपाठी
*****
गुरु चरणों का प्रकाश
पूर्णिमा की शीतल चाँदनी में,
गुरु का तेज़ निखर आया है।
झुका हुआ यह शीश नहीं केवल,
जीवन ने खुद को अपनाया है।
गुरु के चरणों में जो झुकता है,
वह कभी पराजित नहीं होता।
उनके आशीष का एक स्पर्श,
मन का हर संशय हर लेता।
वे शब्द नहीं, संस्कार गढ़ते हैं,
अंधकार में दीप जलाते हैं।
भटके हुए हर पथिक को,
सत्य की राह दिखाते हैं।
आओ गुरु पूर्णिमा पर प्रण करें,
अहंकार का हर बंधन तोड़ेंगे।
गुरु के बताए प्रेम, ज्ञान और विनय से,
अपने जीवन को प्रकाश से जोड़ेंगे।
- डॉ. सारिका ठाकुर 'जागृति'
*****
मुझे अच्छे लगते हैं!
मुझे अच्छे लगते हैं
मेहनतकश स्त्रियाँ
और खाता बनाते पुरुष
अच्छे लगते हैं
उनके किए गए
अपने हिस्से का काम
वर्षों की बनाई रीति
परम्परा
नियम और कानून
को मात देना
दोनों खुश रहते हैं
अपने काम को
करते हुए
दोनों को विश्वास है
अपने कर्मों पर
सच में,
मुझे बहुत अच्छे लगते हैं
मेहनत स्त्रियां और
खाना बनाते पुरुष
- मनोज कौशल
*****
हर कर्म का होता है अपना विधान,
हर साधन का होता है सम्मान।
दर्जी को नाप, पुजारी को जाप,
संगीत को सुर, यज्ञ को प्रताप।
नेता भी यदि भूलें अपना धर्म,
जनसेवा से हो जाएँ वे विमुख कर्म।
तब जनता का जागृत प्रताप ज़रूरी है,
मत की चोट और जवाब ज़रूरी है।
लोकतंत्र की यही सच्ची पहचान,
जनमत ही है सबसे बड़ा विधान।
सत्ता का मद क्षणभर में ढह जाता है,
जब मतदाता अपना निर्णय सुनाता है।
- नरेंद्र मंघनानी
*****
गुरु की महिमा
हम गुरु को प्रणाम करते है,
हमको जो सही रास्ता दिखाएं,
वही सच्चा गुरु होता है,
भगवान से पहले गुरु ही,
हमे रास्ता दिखाते है,
जीवन के अंधेरों से,
उजाला की ओर लाते है,
जीवन के संघर्षों से हमे,
जीना सिखाते हैं,
सही गलत हम क्या कर रहे,
हमको वह बतलाते है,
शिष्यों के खुशी में,
खुद ही खुश हो जाते है,
हम कही भटक रहे हो,
रास्ता वही दिखाते हैं,
गुरु का कितना बखान करु,
भगवान से वह मिलाते हैं,
समस्त गुरु को मेरा शत शत नमन।
- गरिमा लखनवी
*****
दूध नहाए हैं सभी, फिर क्यों बिगड़े हाल ?
जो बोया सो काटते, फिर क्यों करे बवाल॥
सत्य छोड़कर चल दिए, छल की लेकर चाल।
फिर क्यों रोते घूमते, लेकर मन में ज्वाल॥
कर्मों का प्रतिफल मिला, कैसा फिरे मलाल
जो बोया सो काटते, फिर क्यों करे बवाल॥
नफ़रत के बीजों से कहाँ, उगते प्रेम-गुलाब।
काँटे ही काँटे मिले, सूख गए सब ख़्वाब॥
जैसी जिसकी सोच है, वैसा उसका हाल
जो बोया सो काटते, फिर क्यों करे बवाल॥
लोभ-मोह की आग में, जलते रहे उसूल।
स्वार्थों की आँधी चली, बिखर गए सब फूल॥
अपनों से ही दूर हो, कैसा यह भूचाल
जो बोया सो काटते, फिर क्यों करे बवाल॥
झूठ अगर सम्मान हो, सच हो जाए मौन।
फिर मत पूछो देश में, दोषी होगा कौन॥
नीति बिना समाज का, डगमग हर इक ताल
जो बोया सो काटते, फिर क्यों करे बवाल॥
'सौरभ' कर्मों का सदा, रहता सच्चा लेख।
समय कभी करता नहीं, पक्षपात या भेद॥
सत्य, दया, सद्कर्म से, सँवरें सबके हाल
दूध नहाए हैं सभी, फिर क्यों बिगड़े हाल?
जो बोया सो काटते, फिर क्यों करे बवाल॥
- डॉ. प्रियंका सौरभ
*****
प्रकृति:सृजन और संहार
प्रकृति, तेरी शक्ति असीमित है,
बारिश बन अमृत बरसाती है,
धरा पर जीवन मुस्काता है,
हर प्राणी तुझसे ही पलता है।
तू अपनी ही गति से चलती है।
कभी-कभी लगती है निष्ठुर-सी,
मानव के कर्मों का फल दे जाती।
कहीं सूखा, कहीं बाढ़ का प्रकोप,
अपना भीषण तांडव दिखलाती।
पानी के बिना भी जीवन मरता,
पानी से भी जीवन हार जाता।
कौन तुझ पर काबू कर पाया?
आज तक कौन तुझसे जीत पाया,
जो आज तुझे हराने की ठाने?
जब मानव तुझसे दूर हुआ,
स्वार्थ में खुद ही चूर हुआ।
तुझे भुलाकर प्रकृति का मान खोया,
फिर क्यों न आए सूखा और विपदा,
क्यों छोड़ दे तू उसके कर्मों का लेखा?
तेरा रूप जब विकराल बनता,
मानो साक्षात काल उतर आता।
बाढ़ के वे भयावह नज़ारे,
सावन-आषाढ़ के बेचारे।
तब इंसान को याद आती अपनी औकात,
धन-दौलत, शक्ति सब हो जाती मात।
न नौका साथ निभा पाती,
न कोई कश्ती पार लगा पाती।
प्रकृति का सम्मान करो मानव,
सामना तो कर सकते नहीं।
तू खुद खिलौना है,
तू किसी से खेल सकते नहीं।
- रोशन कुमार झा
*****
असम की व्यथा
घिर-घिर आये नभ में बादल , बरस रहे पुरजोर,
जलराशि संभाली न जाए, ब्रह्मपुत्र मचा रही है शोर,
गाँव डूबे, शहर डूबे, घर, पथ, आँगन सब डूबा जाए,
आंसू ही आंसू है असम में, हाल किसे दिल का सुनाए ?
जल समाधि ले रही हैं फसलें, किसान नयन जलधार,
मेहनत और पसीने की कमाई, बह जाती है क्यूँ हर बार ,
बच्चे ,बूढ़े सब तड़फ रहे हैं, रो रही है धरती माता,
दिले हाल अब किसे सुनाएं, नहीं समझ कुछ आता।
भूखे पेट, सूखे गाल, मजदूर की छिन गई रोज-रोटी,
सूने हुए बाज़ार, गलियाँ, हो गई गायब बिजली की जोती,
टूट रही छत्त, बह रहा घर, कर न सके कुछ हैं लाचार,
आ जाती है ये विपदा कहाँ से, रह-रह फिर करती प्रहार।
व्याकुल हैं सब पशु और पक्षी, मिल नहीं रहा कोई ठौर,
नदी ले गई घोंसले, घरौंदे, ठिकाना रहा नहीं अब और,
बछड़े, गायें, खरगोश, हिरन, है सब में ख़ामोशी छाई,
क्रूर प्रकृति क्यूँ इतनी हो गई, बात ये इनकी समझ न आई।
धरम मिलकर सब हाथ बढ़ाओ,इनकी मदद का बनो आधार,
दुःख की इस विकराल घड़ी में , बाँट लो उनसे प्यार अपार,
करो प्रार्थना मुस्काएं सभी, हो खुशहाली हर खेत, घर द्वार,
जीतेगा जीवन फिर से असम में, जीतता है ज्यूँ हर बार।
- धरम चंद धीमान
*****
सृष्टि हो या प्रलय,
दोनों जीवन का लय।
प्रकृति की आपदा,
है जीवन की सम्पदा।
देती है वह प्रेरणा,
जीने की एषणा।
सावन करता जलमग्न
तब भी देखो जीवन,
चलता रहता अविरल
क्षण क्षण पल पल।
व्यवस्था का रोना
क्यो रोएं हर वर्ष,
सच्चा जीवन वही
जो मनाता है हर्ष।
हर साल होता जल भरांव
यही तो है अपना गांव।
फिर भी जीवन मस्त है।
नित कर्म में व्यस्त हैं।
कर साईकिल की सवारी,
पानी में भी चलता है।
भाई को भी साथ बैठा,
बाढ़ को चुनौती देता है।
यही जीवन का अंदाज ,
समझ ले अगर कोई।
कभी न घिर पाए घटा,
दुःखों का यहां कोई।
दोनों जीवन का लय।
प्रकृति की आपदा,
है जीवन की सम्पदा।
देती है वह प्रेरणा,
जीने की एषणा।
सावन करता जलमग्न
तब भी देखो जीवन,
चलता रहता अविरल
क्षण क्षण पल पल।
व्यवस्था का रोना
क्यो रोएं हर वर्ष,
सच्चा जीवन वही
जो मनाता है हर्ष।
हर साल होता जल भरांव
यही तो है अपना गांव।
फिर भी जीवन मस्त है।
नित कर्म में व्यस्त हैं।
कर साईकिल की सवारी,
पानी में भी चलता है।
भाई को भी साथ बैठा,
बाढ़ को चुनौती देता है।
यही जीवन का अंदाज ,
समझ ले अगर कोई।
कभी न घिर पाए घटा,
दुःखों का यहां कोई।
- रत्ना बापुली लखनऊ
*****
बाढ़
काले काले मेघ घन आए,
शहर गाँव सब पानी पानी।
बिज़ली कौंधी पानी बरसा,
घर आंगन सब पानी पानी।
खेत खलिहान सब पानी पानी,
बहा ले गया सब बाढ़ का पानी।
गरज-गरज के पानी बरसा,
घर आंगन , बाज़ार गौशाला डूबे।
ज़ार ज़ार कर इंसा रोये,
पशु-पछी भी प्राण गंवाए।
गाँव गलियाँ स्कूल सब कुछ डूबे,
काले घन जब भी आते अंदर से सब थर थर कांपे।
असम में जो प्रकृति रूठी हुई,
ब्रह्मपुत्र का विकराल स्वरूप।
गलती किसकी ? भुक्त भोगी कौन,
गरीब ही जान गंवाए गरीब ही मारा जाए।
- सुमन डोभाल
*****
कहीं ठंडी हवाओं का मधुर अहसास,
कहीं बाढ़ ने छीन लिए जीवन के विश्वास।
कोई प्रकृति का सौंदर्य निहार रहा,
कोई अपनों का आशियाना पुकार रहा।
उफनती लहरों ने सब कुछ बहा दिया,
निर्धनों का हर सपना रुला दिया।
आओ बढ़ाएँ मानवता का हाथ,
असम के संग चले सारा देश आज।
- बीना सेमवाल
*****
तोड़कर
भी तुम तोड़
नहीं पाओगे।
चाहकर
भी अंगूठा
काट नहीं पाओगे।
अगर
एकलव्य अपनी
पर आ ही जाएगा,
तो
याद रखना कोई भी
अर्जुन समर में उतार नहीं पाओगे।
पल
भर में साफ
सारा अपशिष्ट हो जाएगा।
ये
वो दौर नहीं
कि एकलव्य शिष्ट हो जाएगा।
समर
तुमने जरूर
जीत लिए हैं छल बल से,
मगर
तुम्हारे मन माफिक
कहाँ अभिष्ट हो जायेगा?
बदलते
दौर में तुम
खुद को बदल नहीं पाए।
जैसा
जुबां पे है वैसा
दिल से ढल नहीं पाए।
बातों
में तुम तो
बड़े-बड़े किले ढहा दिए,
सच
के समर में
एक कदम भी नहीं निकल पाए।
आज के
एकलव्य को
हर चुनौती स्वीकार है
हर वार झेल जाएंगे,
पहना
तू चाहे जितना
तोड़ हर नकेल जाएंगे,
पानी
जब सर से ऊपर
निकलने लगे तो समझ लेना,
विकास
आज के एकलव्य
खुला खेल फर्रुखाबादी खेल जाएंगे।
- राधेश विकास
*****
जीवन का रंग
हम धरा पर जन्म एक बार लेंगे,
लाख कठिनाई आयी चाहे।
जगत में अपना नाम करेंगे,
लाख हस्तियाँ आयी चाहे।
बिना नाम किए गुजर गए होंगे
लाख बुराई मिली चाहे।
समझकर कुछ हस्तियाँ जी जान लगा दिए होंगे।
लाख ठोकरे खाई चाहे।
उन्ही हस्तियों का स्वर्णाक्षरों में नाम मिलेंगे।
- ओम प्रकाश साह
*****
समय
चुपचाप
चौखट पर बैठा रहा,
हम
बीते कल की धूल
झाड़ते रहे।
समय
रास्ते बिछाता रहा,
हम
पगचिह्नों की गिनती में
अटके रहे।
समय
हर सुबह
नई दस्तक लाया,
हम
बंद खिड़कियों से
रोशनी का हिसाब पूछते रहे।
जब तक
कुंडी खुली,
समय
मुस्कुराकर
अगली चौखट पर
जा चुका था।
- नरेंद्र मंघनानी
*****
मीठी चूं-चूं
सुबह उठ कर रात बची रोटी को तोड़कर,
घर की छत पर प्यार से चारों ओर बिखरा दिया।
अभी रोटी के टुकड़ों को बिखराया ही था,
पंछियों ने आकर चीं-चीं का राग सुना दिया।
गौरैया मैना छोटे बड़े पंछी सब आए थे,
जो पहुंचे न थे उन्हें भी चूं चूं कर बुला लिया।
सब अपने अपने बच्चों का ख्याल रख रहे थे,
और नन्हे परिंदों ने आसमान सर पर उठा लिया।
कोई झगड़ा नहीं कोई परेशानी कहीं नहीं,
खाने से पहले निवाला बच्चों को दिया।
मिलजुल कर सब बांट कर खा रहे थे,
मिलवर्तन का इक नया जहां बसा दिया।
जहां हम सभी बंटे है दुनिया के तंग दायरों में,
वहीं प्रेम से रहना पंछियों ने हमें सिखा दिया।
जो प्रेम सबक हम पढ़ लिख कर न सीख पाए,
वो इन परिंदों की मीठी चूं-चूं ने सिखा दिया।
- राज कुमार कौंडल
*****
देहाती इलाक़े में
भूख, गरीबी, बेबसी से
तंग आकर
एक अधेड़
पेड़ पर लटक गया?
सरकारी अमले ने
लाश कों
मुर्दाघर पहुंचाया
पोस्टमॉर्टम कमेटी बनीं
जनता दबी जूबां
बतिया रही थी
भूख से मर गया!
पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट
कह रही थी
कुछ खा कर मरा हैं
वो भी फांसी!
यह तो कायरता हैं।
एक सच ओर था
लाश एक नहीं
दो बरामद हुई थीं
एक कों पोस्टमॉर्टम
हेतु भेजा गया
दुसरे किसी पेड़ कों
मुर्दे को जलाने के लिए
मरघट भेजा गया।
- जितेंद्र बोयल
*****
दर्द-ए-ला-दवा
जो ज़ख़्म दिल को मिले, हम छुपाए बैठे हैं,
ज़ीस्त अपनी तमाम महफ़िलमें लुटाए बैठे हैं।
वो आ के पूछ रहे हैं हाले दिलअब मेरा,
ख़ुद ही दाग़ दामन में जो लगाए बैठे हैं।
मंजिलों को चाहत में कहां से कहां पहुंचे,
सफ़र के मोड़ पे सब कुछ गँवाए बैठे हैं।
न कोई ख़्वाब बचा है, न अब आरज़ू कोई ,
हम अपनी राख में चिंगारी छुपा के बैठे हैं।
नसीब मेरा तुम्हारी हसरतों में खोया है,
हाथों की लकीरों में सजा के बैठे हैं।
ग़म-ए-हयात के पत्थर रास्तों से मेरे हट जाओ,
ज़ख्मों पर'मुश्ताक़' हम तो नमक लगाके बैठे हैं।
- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़
*****
साथियां तेरे बिन
साथियां तेरे बिन जी ना पायेंगे,
कसम से कहता हूँ, अब ना जीयेंगे
जब तुम ही नहीं, मेरे जिंदगी में तो
अब इस दुनिया मेंं जी कर क्या करेंगे ?
तुम्हीं से तो मेरी ये दुनिया बसी है,
तुमसे ही तो मुझे गम और खुशी है,
सुख-दुःख में तुम ही मेरे साथ रही है,
फिर अचानक मन में ये जुदाई कैसी है ?
जो भी हो गिले शिकवे सब मैं स्वीकारा,
सुधरने का तो साथियां मौका दो दोबारा,
शिकायत का अब ना कोई मौका देंगे,
साथियां सात जन्मों का बंधन है हमारा।
- चुन्नू साहा
*****
"अंधेरे से उजाले तक"
ढलती शामों की हवा ये बताती है कि,
रातें कभी-कभी कितनी काली हो जाती हैं।
जब जीवन की हर राह अचानक अनजानी हो जाए,
और अपने ही कदम अपना बोझ उठाने से थक जाएँ।
जब चाहकर भी कुछ बदल पाना संभव न रहे,
और समय हर उत्तर अपने भीतर छिपा ले।
जब आँखों में सपने नहीं,सिर्फ़ जागती हुई रातें रह जाएँ,
और मुस्कान का अर्थ चेहरे से बहुत दूर चला जाए।
तब मन किसी सूने चौराहे पर खड़ा होता है-
न लौटने का साहस, न आगे बढ़ने का विश्वास।
बस चारों ओर घना, निःशब्द अँधकार...
जो धीरे-धीरे मन की हर रोशनी को निगलने लगता है।
ऐसे समय में कोई आँसू भी साथ नहीं देते,
क्योंकि वे भी आँखों में ही पत्थर बन जाते हैं।
और तब समझ आता है-
सबसे कठिन युद्ध दुनिया से नहीं,
अपने ही भीतर फैले उस अँधेरे से होता है
जो हर पल कहता है-
"अब और नहीं..."
फिर भी... कहीं बहुत भीतर, राख के नीचे दबी
एक नन्ही-सी चिंगारी चुपचाप साँस लेती रहती है।
शायद वही चिंगारी एक दिन फिर से
जीवन का सूरज बने...
क्योंकि सबसे गहरा अँधेरा भी,
प्रकाश की संभावना को कभी समाप्त नहीं कर पाता।
- आरती कुमारी
*****
मंत्री जी का दौरा
पूरे शहर भर पोस्टर लगाया जाएगा,
आधे अधूरे कामों को,
पूरा दिखाया जाएगा।
जाम नालियां, टूटी सड़के,
जर्जर विद्यालय,
लोगों की बदहाली का,
कहीं भी जिक्र ना आएगा।
महंगाई, बेरोजगारी, गरीबी,
भुखमरी और शहर भर की गंदगी पर,
फिलहाल पर्दा डाला जाएगा।
हर चौक चौराहे पर,
चमकता पोस्टर, पोस्टर में सरकार की,
बस तारीफ नजर आएगा।
जब जब शहर में
मंत्री जी का दौरा कराया जाएगा।
- बाबू लाल
पूरे शहर भर पोस्टर लगाया जाएगा,
आधे अधूरे कामों को,
पूरा दिखाया जाएगा।
जाम नालियां, टूटी सड़के,
जर्जर विद्यालय,
लोगों की बदहाली का,
कहीं भी जिक्र ना आएगा।
महंगाई, बेरोजगारी, गरीबी,
भुखमरी और शहर भर की गंदगी पर,
फिलहाल पर्दा डाला जाएगा।
हर चौक चौराहे पर,
चमकता पोस्टर, पोस्टर में सरकार की,
बस तारीफ नजर आएगा।
जब जब शहर में
मंत्री जी का दौरा कराया जाएगा।
- बाबू लाल
*****
सब रिश्ते सोच समझकर नहीं बनाए जाते,
कुछ रिश्ते यूं हीं बन जाते हैं चलते-चलते,
दो-चार मुलाकातों में,
कुछ एक हंसी ठहाकों में,
कुछ अपनी,
कुछ दूसरों की सुनने-सुनाने में,
किसी का दुःख,
अपने दुःख जैसा महसूस होने पर,
किसी की बातों में,
अपनापन महसूस होने पर,
किसी की बातों में अपने लिए,
अपनापन महसूस होने पर,
किसी को थोड़ी ज्यादा ,
तवज्जो मिल जाने पर,
कोई दे जरा हौंसला जो
नई उड़ान भरने को,
जो थाम ले हाथ कोई ,
ठोकर लग गिर जाने से पहले ही,
जब कोई जान ले अक्सर हाल,
बिना कुछ बोले ही...!
बस इन्ही छोटे छोटे किस्सों से,
नजदीकियां बढ़ जाती हैं अक्सर,
प्यार चाहे हो न हो,
हां मगर...
एक एहसासों की डोर
जुड़ जाती है अक्सर... ख़ैर!
कुछ रिश्ते यूं हीं बन जाते हैं चलते-चलते,
दो-चार मुलाकातों में,
कुछ एक हंसी ठहाकों में,
कुछ अपनी,
कुछ दूसरों की सुनने-सुनाने में,
किसी का दुःख,
अपने दुःख जैसा महसूस होने पर,
किसी की बातों में,
अपनापन महसूस होने पर,
किसी की बातों में अपने लिए,
अपनापन महसूस होने पर,
किसी को थोड़ी ज्यादा ,
तवज्जो मिल जाने पर,
कोई दे जरा हौंसला जो
नई उड़ान भरने को,
जो थाम ले हाथ कोई ,
ठोकर लग गिर जाने से पहले ही,
जब कोई जान ले अक्सर हाल,
बिना कुछ बोले ही...!
बस इन्ही छोटे छोटे किस्सों से,
नजदीकियां बढ़ जाती हैं अक्सर,
प्यार चाहे हो न हो,
हां मगर...
एक एहसासों की डोर
जुड़ जाती है अक्सर... ख़ैर!
- सुमन डोभाल काला
*****

