वो भी क्या दिन थे
वो गाँव की मिट्टी,
वो गाँव का आँगन,
वो बचपन के सुहाने दिन,
वो अपनों का दुलार और अपनापन।
कुएँ से पानी खींचना,
आम के पेड़ पर चढ़कर आम तोड़ना,
दोस्तों के संग खेलना-कूदना,
नन्हीं नावों को पानी में छोड़ना।
बारिश की बूंदों में बेफिक्र भीगना,
मिट्टी की खुशबू में मन का महकना,
न कोई चिंता, न कोई फिक्र थी,
हर छोटी खुशी ही तब बड़ी खुशी थी।
न मोबाइल था, न कोई भागदौड़,
न रिश्तों में था कोई मन का मोड़,
वो हँसी, वो मस्ती, वो प्यारा बचपन,
आज भी ढूँढ़ता है उन्हें मेरा मन।
वो दिन लौटकर अब नहीं आएँगे,
बस यादों में आकर हमें सताएँगे,
जब भी बीते दिनों को याद करेंगे,
आँखों में नमी और होंठों पर मुस्कान लाएँगे।
सच कहूँ तो दिल आज भी यही कहता है-
वो भी क्या दिन थे,
वो भी क्या दिन थे…
जो लौटकर अब कभी नहीं आएँगे,
बस याद बनकर दिल में रह जाएँगे।
- गरिमा लखनवी
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अपनों की भीड़ में रह कर भी तन्हा हो गया हूँ मैं,
अपनी ही नज़र में खुद पर ही रुस्वा हो गया हूँ मैं।
बुझा कर शम्अ खुद अपने ही हाथों से अँधेरे में,
किसी की उम्मीद में रोशनी का धोखा हो गया हूँ मैं।
ज़माने की नज़र में मुकम्मल ज़ात हूँ लेकिन,
हक़ीक़त जानिए तो अंदर से टूट गया हूँ मैं।
तअल्लुक़ तोड़ने वालों का शिक़वा तक नहीं कोई,
यूँ चुपके से किसी की याद से रुख़्सत हो गया हूँ मैं।
मेरे होने न होने से किसी को फ़र्क क्या पड़ता,
चराग़-ए-सुब्ह की मानिंद बुझा दिया गया हूँ मैं।
मुश्ताक़ अब तो ख़ुद से भी वाबस्ता नहीं हूं मैं,
ख़ुदा जाने मैं अपने आप से क्या हो गया हूँ मैं।
- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़
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इजहार
खत में भेज रहा हूँ प्रेम का इजहार
सच्चे दिल से करता हूँ तुमसे प्यार
वन उपवन से आती है प्रेम पुकार
कोरे कागज पे लिखा है प्रेम करार
मैं तन मन से करता हूँ आज इकरार
हर जन्म में हुआ है तुमसे मेरा प्यार
मत करना मेरे प्यार का कभी इनकार
तेरा मेरा दिल धड़कता है संग दिलदार
ना कर मेरी आरजू को अब शर्मसार
तेरे लिये कर ली है मैं जग से तकरार
फकत तुम हो मेरे जीवन की संसार
एक बार मुड़ेर पे आ कर लूँ तेरी दीदार
बादलों की धुन्ध से करा दूँ तेरी श्रृंगार
प्रेम से अर्पण है मेरा जिगर उपहार
मेरे दिल की खुली है तेरे लिये मेरा द्वार
किस बात की अब करती हो तुम विचार
आ जा मेरे आँगन में तुम इक बार
भूल जाऊँ तेरे जुल्फों में छुप संसार
ले जाऊँगा सनम तुम्हें चाँद के उस पार
एक दुजे में समाँ जाऊँगा आ मेरे दिलदार
- उदय किशोर साह
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हर रोज़ एक नई जंग
शिक्षक हूं मैं, हर रोज एक नई जंग लड़ती हूं,
लड़ाई के मैदान में नहीं, बच्चों के दिलों में उतरती हूं।
झांकती हूं मैं नन्हें दिलों में, अंतर की थाह पाने को,
कितने आतुर हैं ये नन्हें बालक, प्यार सबका पाने को।
एक मुस्कान ही काफी है, इनके दिल में उतर जाने को,
बाहें फैला कर रखते हैं हर पल, ये सबको अपनाने को।
करते हैं नादानियां, है शरारतों का समंदर इनमें,
नहीं सुनते ये किसी की, रहते हैं मगन निज धुन में।
जिसके लिए रोको इनको, वही तो है करना इनको,
गिर-गिर कर ही तो है, संभलना इनको।
नाज़ुक तन और निश्चल मन है,
जब-जब गौर से देखूं इनको।
नन्हें से शैतान हैं प्यारे, अल्हड़पन से भरे हुए,
नित नई शरारत सूझे इनको, करते हैं परेशान मुझे।
रोज समस्या नई है लाते, जंग में हैं मुझको उलझाते,
हर चीज़ को अपना बतलाते, नहीं जरा भी खौफ हैं खाते।
माथा अपना पकड़ मैं लेती, समस्या सुलझाते-सुलझाते।
रोज एक नई जंग लड़ती हूं, बच्चों को पढ़ाते-पढ़ाते।
बच्चों के दिलों में उतरती हूं, प्यार से समझाते-समझाते।
रोज एक नई जंग लड़ती हूं, खुद को आजमाते-आजमाते।
- कंचन चौहान
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गांव का आदमी
उठता है सुबह तड़के
डालता है सिरहाने के नीचे हाथ
निकालता है बीड़ी का बण्डल और लाइटर
जलाता है बीड़ी खींचता है जोर का कश
जैसे मानों एक ही कश में अपने अंदर
समेट लेगा जीवन के दुखों को
चलता है धीरे धीरे अपनी गौशाला की ओर
करता है इकट्ठा गोबर एक टोकरी में
उठाकर सिर पर चला जाता है दूर खेत के कोने में
फैंकता है गोबर के ढेर पर ऐसे जैसे
मानों दूर छिटक रहा हो अपनी परेशानियों को
उठाता है दूध की भरी केनी
चल पड़ता है शहर की ओर
हलवाई को बेचने के लिए
चार पैसे बन जाएंगे परिवार चलाने के लिए
लौट कर पीता है चाय फौजी जग में
लेता है एक एक घूंट ऐसे जैसे
समेटना चाहता हो परिवार के
दुखों को अपने अंदर
नहा धोकर करता है प्रार्थना अपने इष्टदेव से
मिल जाये दिन भर के लिए काम
उठाता है प्लास्टिक के डिब्बे में रखी रोटी
चटनी एक छीला हुआ प्याज साथ में हरी मिर्च
चल पड़ता है सड़क की ओर जहां
ढेर लगा है पत्थरों का
निकालता है झोले में पड़ा हथौड़ा
करता है शुरू पत्थर कूटना
ऐसे चलता है उसका हथौड़ा
मानो कूटना चाहता हो अपनी उलझनों को
शाम को थका हारा पहुंचता है घर
बैठ जाता है टूटी चारपाई पर
फिर निकालता है जेब से बीड़ी का बंडल
एक बीड़ी ही तो है जो देती है
पूरा दिन रात उसका साथ
तभी पुकारती है घरवाली खाने के लिए
हाथ मुंह धोकर पोंछता है गमछे से
जो रहता है उसके कांधे पर
रूखा सूखा जो भी बना खा लेता है
बच्चों के साथ बैठ कर
पाता है अपनेपन का एहसास
सो जाता है फिर चारपाई पर
देखता है छत्त की ओर
नज़र आती है वही बांस की कड़ियाँ
खिड़की से आती ठंडी ठंडी हवा
नींद की आगोश में ले लेती हैं उसको
सुबह उठते ही रहती है फिर
बंडल से निकली एक बीड़ी
उसकी परेशानियों को धुएं के छल्ले
में उड़ाने के लिए तैयार
यही तो है गांव का आदमी
समाप्त हो जाएगी उसकी जिंदगी
काम के बोझ तले दबकर
सबका साथ छूट जाएगा
पर बीड़ी निभाएगी साथ
अंतिम सांस तक
- रवींद्र कुमार शर्मा
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“गुरु- एक उजाला”
हम मिट्टी थे हम
आपने हमें आकार दिया,
अक्षरों की दुनिया से आगे
जीवन का व्यवहार दिया।
जब समय की आँधियों ने
हमारे दीप बुझाने चाहे,
आपने हथेलियों की ओट से
हमारे उजाले बचाए।
हमारी आँखों में पलते
हर छोटे-से स्वप्न को,
आपने अपनी प्रार्थनाओं में
माँगा था हर क्षण को।
हम हारकर लौटे तो
आपने हार नहीं मानी,
हमने खुद को कम आँका
आपने हमारी कीमत जानी।
हमने तो बस पाठ पढ़े,
आपने जीवन पढ़ा दिया,
हमने केवल मंज़िल माँगी
आपने रास्ता बना दिया।
आज हम जो भी हैं,
उसमें आपका अंश है,
हमारी हर उड़ान के पीछे
आपके विश्वास का आकाश है।
गुरु होना केवल पढ़ाना नहीं,
किसी के भीतर का दीप बन जाना है…
और शिष्य की सफलता देखकर
चुपचाप मुस्कुरा जाना है।
- डॉ. सारिका ठाकुर ‘जागृति’
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शिक्षक दिवस
पहली गुरु मेरी मां
पहला नमन मां को
दूसरा गुरु मेरे पिताजी
दूसरा नमन पिताजी को
तीसरा गुरु मेरे भाई बहन
तीसरा नमन भाई बहन को
चौथे गुरु मेरा समस्त परिवार
जिन्होंने मुझे हर चीज़ सिखाई
पाँचवां गुरु मेरे शिक्षक
नमन वंदन अपने गुरुओं को
छठवां गुरु पूरा समाज
जिन्होंने कई सारी चीजें सिखाई
सातवां गुरु मेरे साथी
कुछ अच्छे अनुभव सीखे
नमन वंदन सारे संसार को
नमन वंदन समस्त गुरुओं को
- सुमन डोभाल काला
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एक शिक्षक की कलम से
मैं एक शिक्षक हूँ
समाज का सच्चा पथ प्रदर्शक हूँ
शिक्षा देना है मेरा काम
मकसद है सबो को मिले शिक्षा का ज्ञान।
भेद-भाव नहीं रखता हूँ जाति-पाति का
उद्देश्य रखता हूँ समाज में शांति का
सत्य अहिंसा का पाठ सदैव पढ़ाता हूँ
अधर्म से धर्म-पंथ के ओर पग बढ़वाता हूँ
न किसी को अन्याय करने को कहता हूँ
न किसी को अन्याय सहने को कहता हूँ
धर्म-अधर्म का फर्क सदैव बतलाता हूँ
अधर्म के विरूद्ध खड़े रहने को कहता हूँ ।
जबतक हूँ मै शिक्षक पद पर विराजमान
देता रहूँगा अपनी शिक्षा का ज्ञान
अबोध को बोध कराकर
निरक्षरों को अक्षर अक्षर सिखाकर।
बनाता हूँ उनसबो को सबल
ताकि बिन अक्षर,संस्कार के न हो जाये कही निर्बल
ऐसा ही तो एक शिक्षक का है काम
अपने संपूर्ण शिक्षा का कर दे दान।
- चुन्नू साहा
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दरिया सा बहने लगता हूँ
चित्र अपना देख कर
न जाने क्यों ?
दरिया सा बहने लगता हूँ
भीतर मेरे गोविन्द सागर
लहरों सा बहता रहता हूँ
सुख-दुःख को रख कर किनारे
मैं खुद को ही गहरा करता हूँ
ये लाल साफा -
मेरी पगड़ी नहीं , निशानी है
ठौहड़ू की मिट्टी की सोंधी सुगंध
और उसी की ही कहानी है
जितना झुका हूँ, उतना ही उठा हूँ
ये दरिया नहीं
पहाड़ की रवानी है,
आँखों में देखा, तो समंदर पाया
पलकों में रोक रखा, एक अर्सा पुराना
फ़ौलाद की फैक्ट्रियों के धुएँ में भी
बिलासपुर की आबो-हवा सा
महका करता हूँ
लोग कहते हैं-
तस्वीर तो, बस तस्वीर है
मैं कहता हूँ-
ये आईना है, मेरे सफर का,
जहाँ हर लकीर में लिखा है-
इज्ज़त का, शोहरत का, और सबर का
हर वक्त इम्तहान होता है
भृगु ने लात मारी थी हरि को-
श्री हरि ने चरण दबाए थे,
मैंने तो खुद को ही लात मारी
और खुद को ही गले लगाया है
चित्र अपना देख कर,
न जाने क्यों दरिया सा बहने लगता हूँ
क्योंकि- मैं पत्थर तो हूँ नहीं,
और मैं तो ठौहडू का पानी हूँ,
जो बहता है अपने ही प्रवाह से
और बह कर भी, पहाड़ सा रहता हूँ
चित्र अपना देख कर न जाने क्यों ?
दरिया सा बहने लगता हूँ।।
- बाबू राम धीमान
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गुरु
जो दुनिया दिखाए वो माँ पहली गुरू है,
पर जो जग में जीने काबिल बनाए वो गुरु है।
खुद जले और औरों को रोशन करे,
वो निरंतर जलने वाला दीपक गुरू है।
वीराने में फूल खिला दे और कांट छांट कर,
सुंदर पौधे का रूप जो दे वो माली गुरू है।
अंधेरी राहों को जो उजालों से भर दे,
जीने का मकसद जो दिखाए वो राहबर गुरू है।
सजा दे जो तालीम से अपने शागिर्दों को,
वो अकेला सच्चा हमदर्द खैरख्वाह गुरू है।
नाकामी के कांटों को चुन चुन कर जो निकाले,
जीवन में साये से बढ़कर वो हमसफर गुरू है।
बेशक तनख्वाहदार होने से कद्र कम हो गई,
बेकद्री में जो तालीम की लौ जगाए वो गुरु है।
वक्त और संगीन हालातों ने गिरा दिया वजूद,
वजूद को संभालने में संघर्ष जो करे वो गुरू है।
- राज कुमार कौंडल
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शिक्षक दिवस
नमन मात पिता चरणों में
नमन गुरु के चरणों में
जीवन पथ प्रदर्शक आप हो
हो भाग्य विधाता तुम्हीं
आपके सानिध्य में बना आज मैं
आप हो जीवन दाता गुरुवर
आप से संस्कार दुलार प्यार
पाया हरपल जीवन में गुरूवर
दो आशीर्वचन इतना मैं
जीवन में हार कभी न पाऊं
आपकी की बातें
चाक और डस्टर न भूलूँ मैं
इतना सफलता पाऊं गुरुवर
- मनोज कौशल
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उनको कहाँ फ़ुर्सत कि अब मुलाक़ात हो,
काश फिर कभी दो घड़ी उनसे बात हो।
मुलाक़ातों के सफ़र में रह गईं ख़ामोशियाँ,
काश ख़ामोशियों में भी कोई बात हो।
दिल के आँगन में उदासी का बसेरा है मगर,
किसी दिन फिर से ख़ुशियों की बरसात हो।
वक़्त की कोई पाबंदी नहीं होती इश्क़ में,
दिन हो चाहे रात हो, बस उनकी याद हो।
हमने तो हर मोड़ पर उनका ही इंतज़ार किया,
क्या ख़बर थी रास्तों में इतनी रात हो।
वो मिले तो पूछ लेंगे हाल-ए-दिल अपना कभी,
क्या पता उस एक पल में सारी कायनात हो।
दूरियाँ बढ़ती गईं, रिश्ते भी ख़ामोश हो गए,
पर दिल नरेंद्र कहता है- कभी मुलाक़ात हो।
उनको कहाँ फ़ुर्सत कि अब मुलाक़ात हो,
काश फिर कभी दो घड़ी उनसे बात हो...
- नरेन्द्र सोनकर, बरेली
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भरे हुए पन्ने पर कैसे लिखूँ ?
भरे हुए पन्ने पर कैसे लिखूँ,
हर कोना किसी बीती हुई बात का घर है,
हर अक्षर किसी चेहरे की परछाईं,
हर ख़ाली जगह भी
किसी अधूरे ख़त का असर है।
मैंने सोचा था,
जहाँ शब्द खत्म होंगे,
वहीं से कुछ नया लिखूँगा;
मगर इस पन्ने की ख़ामोशी ने बताया,
कुछ जगहें खाली नहीं होतीं,
बस वहाँ शब्दों की जगह
धड़कनें रहती हैं।
ये काग़ज़ भी अजीब है,
जितना पढ़ता हूँ,
उतना अपना लगता है;
जितना अपना लगता है,
उतना ही पुराना निकलता है।
शायद ये पन्ना नहीं,
मेरा दिल है,
जिस पर हर मिलने वाले ने
अपनी एक पंक्ति लिख दी,
किसी ने स्याही से,
किसी ने आँसुओं से,
और किसी ने
सिर्फ़ छोड़कर।
कुछ पन्ने पलटे नहीं जाते,
क्योंकि उनके साथ
पूरी ज़िंदगी पलट जाती है।
और कुछ पन्ने,
कितने भी भरे हों,
हम उन्हें बार-बार पढ़ते हैं,
इस उम्मीद में कि
कहीं किसी हाशिए पर
हमारे लिए बचा हो
एक छोटा-सा ख़ाली कोना।
- नरेंद्र मंघनानी
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हिन्दुस्तान के कोने कोने का सुमधुर संवाद है।
धड़कनों में गूंजती है ज़बान हमारी शान है,
हिंदी अपनी मातृभाषा, देश की पहचान है।
सरहदों को चीरती जो भाव का विस्तार है,
रीति-नीति और संस्कृति का अमर श्रृंगार है।
वेद की ऋचाओं से जो निकली अनघ नाद है,
हिन्दुस्तान के कोने कोने का सुमधुर संवाद है।
पूरब से पश्चिम तक जो सेतु का काम है,
हर जुबां पर गूंजता जिसका प्यारा नाम है।
कबीर की साखियों में जो मिठास घोलती,
मीरा के भजनों में जो प्रेम बनके बोलती।
आधुनिकता की दौड़ में मत इसे विस्मृत करो,
अपनी इस विरासत पर गर्व तुम निरंतर करो।
- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़
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