साहित्य चक्र

13 April 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 13 अप्रैल 2026






पक्षियों के लिए गर्मी में पानी कौन रखता है
आजकल घरों में रोशनदान कौन रखता है

बड़े बुजुर्गों की बातें हमेशा ध्यान से सुनना
जो भी कहते हैं वो बड़े तजुर्बे से कहते हैं

बिना दरिया के मौजों में रवानी कौन रखता है
बिना लैला के मजनू की कहानी कौन रखता है

ये दौलत ये शोहरत पल भर का तमाशा है
मां बाप गुरुओं की कद्रदानी कौन करता है।


- मनोज कौशल


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बेमौसमी ओलावृष्टि 

बेमौसमी ओलावृष्टि का देख ताण्डव 
सबक तक नहीं सीख रहा है मानव।
फसल बर्बाद हो रही
लहलहाने के बजाय खेतों में ढह रही।
बागवान मुश्किल में दिख रहे
उन्हें भी अपनी फसल के बर्बादी के लक्षण लग रहें।।
बादलों की गड़गड़ाहट से धरती कांपें 
तो कभी भूकम्प के झटकों से  हांफे ।
लगता है अब गर्मी का मौसम नहीं आएगा 
सीधे बरसात में ही प्रवेश हो जाएगा।
इंसान बदला बदल रहा मौसम
दोष किसको दें बस यही लगी है कशमकश।
सम्भल जा रे इंसान अब तो थोड़ा सोच
शायद अब वो दिन दूर नहीं
जब तूं जताएगा अफसोस।


- विनोद वर्मा


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जैसी तेरी मर्जी

आना न आना तेरी मर्जी
मैं न आऊँ, ये क्यों रोक दी ?
एकतरफा ही सही,
लेकिन आना जाना है ही

खैर कोई बात नहीं,
जैसे तेरी मर्जी,
लेकिन मै हूँ और वही हूँ
सफर मे जहाँ तू रूकी थी

यदि आना चाहो तो,
तू आना, मैं हूँ अभी भी,
भले वक्त कुछ बदला है,
मन मेरा वही ही है।

आ जाओ तो, तू सही,
सब वैसा ही हो जायेगा,
जैसा मन है तेरी,
वादा है मेरा, मानो सही।

प्रेम अमरत्व है,
ये मरता कभी नही
पुनः दोहराता हूँ तुझसे
आना है तो, आ ही जाओ।

देर, अब किस बात की ?
गिले शिकवे जीवन का हिस्सा है
ये तो चलते रहेगा ही
यूँ ही... यूँ ही... यूँ ही।


- चुन्नू साहा


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मुझे तुमसे फिर से मोहब्बत हो गई
जब मैं सो कर उठा तो
तुम शीशे के सामने बैठी मुस्कुरा रही थी
मैंने तुम्हारा मुस्कुराते चेहरे को देखा...
तुम्हारे गाल पर पड़ते डिम्पल को देखा...
तुम्हारी ठोड़ी पर बने प्यारे से तिल को देखा...
तुम शरमा रही थीं
तुम इतरा रही थीं
और जब तुम शरमाई
और इतराई तभी मुझे तुमसे
फिर से मोहब्बत हो गई...


- दीपक बारुपाल


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अधूरे ख़्वाब

क्यों दिल के कुछ ख़्वाब अधूरे ही रह जाते हैं,
जो तमाम कोशिशों से भी मुक़म्मल नहीं हो पाते।

ये सपनों की दुनिया भी कितनी विचित्र होती है,
जिसमें लोग देखते हैं ख़ुद को खुश होते हुए।

इंसान हालातों का मारा एक नुमाइंदा मात्र है,
जिसे करना होता है सब्र अपने टूटे अरमानों का।

मुरझाई मुस्कान का या जागती हुई नींदों का,
हाँ होती है उसे बेहद तकलीफ़ इनके टूटने पर।

जिन्हें तन्हाई में जीता है और अक्सर सोचता है,
ख़ामोश गहरी रातों में उन अजीवित पलों को।

फिर भी नहीं करता किसी से कोई शिकायत,
और कर लेता है संतोष अपने आप से कहीं,

उदासी के साथ ख़ुद को ख़ुद में समेटे हुए,
मजबूरी में दबी रह जाती है उसकी हर आरज़ू।

अपनी नाकाम क़िस्मत का लेखा समझ कर,
एक दिन जब उसकी ये आँखें बंद हो जाती हैं।

तो उनमें कैद हो जाते हैं उसके वो सभी ख़्वाब,
जो उसने देखे तो थे पर कभी पूरे नहीं हो पाए।


- आनन्द कुमार


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शाम तो ढल जाने दें...

​न रोक ए हम नवा अब मेरे आंसू,
आंखों से ये समन्दर तो निकल जाने दें।

​जुल्फों की घनी छाओं की चाहत है दो घड़ी
कुछ पल ही सही दिल की गहराई में उतर जाने दें।

​आंखों से तेरी, थोड़ी मैं पीलूं तो बुरा क्या है,
मैं हूं मदहोश थोड़ा सा मुझको भी बहक जाने दें।

​मै खुद ही चला जाऊंगा, हूं मुसाफिर तन्हा-तन्हा,
अभी सूरज भी नहीं डूबा जरा शाम तो ढल जाने दें।

​आतिशे इश्क है ऐसे न बुझेगी अब मुश्ताक
अपने होठों को मेरे होठों के करीब तो आ जाने दें।

- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह


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प्रयास

नए सत्र की हुई देखो अब शुरुआत,
नई किताबें नई वर्दी नया बैग नई कक्षा,
नए जोश से इस वर्ष की करेंगे शुरुआत।

नन्हे नन्हे कदम वक्त से मिलाएंगे अब ताल,
छोटे छोटे पर नेक मजबूत इरादे हमारे,
गुरुओं की सीख संग करेंगे इक नया आगाज़।

जो कमियां रह गई थी पिछले साल,
उन पर मेहनत से करेंगे कुठाराघात,
हर सिखाई गई बात को करेंगे अब आत्मसात।

अब न आलस होगा न ही कोई उत्पात,
समय से पहले संभालेंगे अपने कदमों को,
ताकि वर्ष के अंत में न हो कोई पाश्चाताप।

कईयों का होगा नया स्कूल,होगी नई क्लास,
मेल जोल बढ़ाएंगे सबसे करेंगे प्यार से बात,
अपनों के सपनों को पूरा करने का करेंगे प्रयास।


- राज कुमार कौंडल


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अजनबी होते रिश्ते


रिश्ते भी आजकल अजनबी से हैं होने लगे
लोग नफरतों के बीज अब बहुत हैं बोने लगे
प्यार मोहब्बत की फसलें तो अब तबाह हो गई
खूनी रिश्ते भी अब पहचान हैं खोने लगे

रिश्तेदार ही नारी की आबरू को कर रहे तार तार
मां बहन बेटी की छबि को फैंक चुके दिल से बाहर
न खौफ कानून का न इज़्ज़त का ही है डर
डर रहे हैं आज सभी एक दूसरे पर भरोसा कर

रिशतों में अपनेपन की मिठास अब हो गई है कम
इंतज़ार करती थी जो आंखे रिश्तेदारों के आने का
अपनो के पास आना भी अब बोझ लगने लगा है
समय ही नहीं है एक दूसरे के पास आने जाने का

गया वो जमाना जब आपस में होता था बहुत प्यार
आज एक दूसरे की कर रहे बहुत टांग खिंचाई
एक दूसरे के घर आते जाते थे बहुत रिश्तेदार
संपति के चक्कर में दुश्मन बन बैठे हैं भाई

पुरानों में था बहुत रिश्ते निभाने का चलन
धीरे धीरे रिश्तों का उजड़ रहा अब चमन
अब तो घर में घरवाले ही बेगानों की तरह हैं रहते
पैसों के चक्कर में कोई छोड़ रहा घर कोई छोड़ रहा वतन

मोबाइल पर व्यस्त रहते हैं आपस में कुछ नहीं हैं कहते
कानून का डर नहीं किसी को बेखौफ हैं घूमते
वो रिश्तों की कद्र क्या जाने जो खुद
चरस गांजा अफीम चिट्टा खाकर नशे में हैं झूमते


- रवींद्र कुमार शर्मा


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लिखना, न लिखना!

यदि मुझे लिखना आता,
तो सबसे पहले यह लिखता- मत लिखो।
यह पढ़ते ही एक हल्की-सी उदास मुस्कान उभरती है।
शब्द जन्म लेते हैं, पर प्रश्न भी साथ लाते हैं,
लिखा हुआ कितना पढ़ा जाएगा,
और पढ़ा हुआ कितना समझा जाएगा ?
दुनिया शब्दों से भरी है, पर भावों तक पहुँचना दुर्लभ है।
जो समझा भी गया, वह कितनी देर ठहरेगा ?
स्मृतियाँ भी समय की धारा में धीरे-धीरे धुंधली हो जाती हैं।
लिखा हुआ क्षणभंगुर है, ठीक जीवन की तरह।
पर इसका अर्थ यह नहीं कि न लिखें।
लिखना ही तो उस क्षणभंगुरता के विरुद्ध एक मौन विद्रोह है।
हम लिखते हैं, क्योंकि उसी क्षण में हम सच में जीते हैं।
सार्थकता शब्दों के फैलाव में नहीं, उनके जन्म में है।
इसलिए लिखो,भले ही कोई पढ़े या न पढ़े…
क्योंकि क्षणभंगुर भी सुंदर होता है।


- नरेंद्र मंघनानी


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बड़े खफा हो खुद से

बड़े खफा हो खुद से, ये कैसी लड़ाई है,
आईना भी चुप है, पर आँखों में रुलाई है।
हर ख्वाब से दूरी, हर चाहत अधूरी है,
दिल ने ये खुद से की कैसी बेवफाई है।

कल तक जो हँसता था, आज वही सहमा है,
अपनों की भीड़ में क्यों खुद से ही बहका है।
क्यों हर गलती को तुम सजा बना बैठे हो,
क्यों अपने ही दिल को क़ैदख़ाना बनाएं बैठे हो।

थोड़ा ठहरो, खुद को समझो, ये ज़िंदगी तुम्हारी है,
हर ठोकर के पीछे छुपी एक सीख सिखानी है।
जो टूट गया है अंदर, उसे फिर से जोड़ो,
खुद से जो रूठे हो, अब खुद से ही जोड़ो।

खुद को माफ़ करना में एक हिम्मत होती है,
हर रात के बाद नई सुबह भी होती है।
ये ग़म, ये शिकवे, सब धुंधले हो जाएंगे,
जब तुम खुद से कहोगे कि हम फिर से मुस्कुराएंगे।


- डॉ. सारिका ठाकुर 'जागृति'


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रवायत

हमें यूं तुमको
देखने की आदत है।
न है मोहब्बत
फिर भी बहुत कुछ
कहने की आदत है।

कभी सोचा ही नहीं
तुमको पाने का
बस यूं ही तुमसे
दिल लगाने की आदत है।

लोग सोचते हैं
जिस्म को छूने की
हमें यूं ही
तुम्हारी रूह को
गले लगाने की आदत है।


- डॉ. राजीव डोगरा


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बस यूँ ही...

फिर से दिल ने तुम्हे पुकारा है।
इसको तुम बिन न कुछ गंवारा है।

आप चाहो हमें ज़ुरूरी नहीं,
हमने भी कब किया इशारा है।

जिसकी आंखों में संवरते थे कभी,
उसने ही कर लिया किनारा है।

क्यों कहा करते थे कहो ऐसा,
जो तुम्हारा है। वो हमारा है।

देखकर क्यों न तुमको मुस्काऊँ,
कौन तुम सा हसीं है प्यारा है।

दिल में मीरा को क्यों बसाया था,
और नज़रों से क्यों उतारा है।


- सविता सिंह मीरा


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12 April 2026

कौशल-ज्ञान का अलग-अलग होना तरक्की में रोड़ा!


भारतीय संस्कृति में ज्ञान और कौशल कभी भी एक साथ समांतर चलते हुए नहीं दिखाई देते हैं। भारतीय इतिहास बताता है कि एक ओर जहां कौशल को जातियों में बांटा गया तो दूसरी ओर ज्ञान को सीमित कर दिया गया था। किसी भी राष्ट्र और समाज की तरक्की तब तक संभव नहीं है जब तक कि ज्ञान और कौशल का मिश्रण नहीं हो जाता है। भारतीय समाज में ज्ञान और कौशल को अलग-अलग जातियों व वर्गों में बांटने के कारण समाज‌ के विकास व समृद्धि का पहिया जातिवाद और भेदभाव जैसी कुप्रथाओं में धस गया। इन कुप्रथाओं के कारण समस्त भारत को सदियों तक गुलाम रहना पड़ा था। अब वक्त आ गया है कि इस विषय पर हम सभी भारतीयों को सोचना चाहिए।

भारत के पास ज्ञान का भंडार है, मगर हमने उस ज्ञान का सही से इस्तेमाल किया ही नहीं है। बस ज्ञान के माध्यम से हमने अपने समाज में पाखंडता फैलाई और मनुष्यता को बांटने का काम किया है। इसके लिए हमारा समस्त समाज जिम्मेदार है, जिसने पाखंड फैलाया वो भी और जिसने उस पाखंड को ज्ञान और परंपरा मान लिया वो भी।‌ भारत के पास ऐसी कौशल कला थी कि उसके उदाहरण- पुराने मंदिर, महल और किलों के रूप में आज भी जिंदा हैं। हमने कभी भी अपने देश और संस्कृति की कौशल कला का वो मान-सम्मान नहीं किया, जो होना चाहिए। बल्कि हम आधुनिकता की दौड़ में अपने देश की कौशल कला को लगातार भूलते या खोते जा रहे हैं।




आज हम पश्चिमी कला, कौशल और ज्ञान को सब कुछ मान बैठे हैं। जिस कौशल को हमने जातियों में बांटा दिया था, आज उसी कौशल का नाम पश्चिमी देशों के कारण परिवर्तित होने पर हम सभी उसे बतौर पेशे के रूप में अपना रहे हैं। जैसे- हेयर डिजाइनर यानी नाई, सिविल इंजीनियर्स यानी बढ़‌ई, फैशन डिजाइनर यानी दर्जी, नर्स यानी दाई, आदि। मतलब जिस कौशल के कारण हमारा समाज जातियों में बांटा रहा और कुछ लोगों के साथ हमारे समाज ने उनके पेशे के कारण जानवरों जैसा व्यवहार किया। मगर आज देखिए उन्हीं लोगों का पेशा हम सभी हंसी-खुशी अपना रहे हैं। यह सब देकर मेरे मन में एक ही प्रश्न उठता है- आखिर हमारा समाज इतना दोगला क्यों है ?

पश्चिमी देशों में रंगभेद से लेकर विभिन्न प्रकार की बुराइयां थी, मगर उन्होंने उन बुराइयों को पीछे छोड़ कर अपने देश व समाज की प्रगति एवं विकास को आगे रखते हुए आधुनिकता के साथ आगे बढ़ने का फैसला किया। आज पश्चिमी देश हमसे हर क्षेत्र में कई गुना आगे हैं। मगर हम आज भी जातीय श्रेष्ठता और धर्म के लड़ाई में उलझे हुए। हजारों साल गुलाम रहने के बाद भी अगर हमारा समाज रक्त शुद्धि जैसे खोखले दांवों के साथ अपने ही समाज के लोगों के साथ जातिवाद और भेदभाव करता है, जो यह अवश्य ही मूर्खों जैसा व्यवहार है। आज के इस आधुनिक युग में लगभग हर समाज के लोग रक्तदान भी करते हैं और बीमार पड़ने पर उस रक्त का इस्तेमाल भी करते हैं। बाकी किसका कितना रक्त शुद्ध है यह दावा कर पाना अपने आप में ही हमारे लिए अपने पूर्वजों का अपमान है।




विश्व के पटल पर बतौर राष्ट्र हमें जाति, धर्म को पीछे छोड़ कर अब अपने देश के विकास, प्रगति और उन्नति को ध्यान में रखते हुए कौशल और ज्ञान को साथ-साथ आगे बढ़ना होगा। आप और हम सिर्फ यह सोचे कि मैं ही आगे बढूं या मेरा ही समाज आगे बढ़े तो इससे राष्ट्र की प्रगति नहीं होती है, बल्कि इससे राष्ट्र में अमीरी और गरीबी की खाई बढ़ती है जो राष्ट्र को गृह युद्ध की ओर लेकर जाता है। इसलिए हमें जाति और धर्म के बंधन से ऊपर उठकर सोचना होगा। क्यों ना हर देश का नागरिक हमारे भारतीय समाज व संस्कृति का ज्ञान, कला एवं कौशल को अपनाएं। हमारी संस्कृति और सभ्यता 'वसुधैव कुटुम्बकम्' यानी एक विश्व-एक परिवार पर आधारित है।


- दीपक कोहली


युवाओं में सोशल मीडिया के दुष्प्रभाव


लगातार सोशल मीडिया पर लगे रहने की आदत की तुलना तंबाकू की लत से की गई है। सोशल मीडिया की लत की समस्या का समाधान आसान नहीं है। केवल अदालत द्वारा प्रतिबंध लगाने से यह लत खत्म हो जाएगी, ऐसा मानना सही नहीं है। कैलिफोर्निया की अदालत ने मेटा और अल्फाबेट जैसी बड़ी तकनीकी कंपनियों से कहा है कि वे जानबूझकर ऐसे फीचर्स बनाती हैं, जो युवाओं को ऑनलाइन बने रहने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। इंस्टाग्राम, स्नैपचैट आदि को इस तरह डिजाइन किया गया है कि 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चे (और यहां तक कि बड़े लोग भी) फोन नीचे रखने का मन नहीं करते।


फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप तीनों सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म मेटा के पास हैं, जबकि यूट्यूब और गूगल अल्फाबेट के पास हैं। मेटा और अल्फाबेट दोनों ही ऐसे फीचर्स डालते हैं, जो किशोरों को आकर्षित करते हैं और धीरे-धीरे उन्हें इसका आदी बना देते हैं। इसके परिणामस्वरूप वे अवसाद और निराशा का शिकार हो जाते हैं तथा किसी भी काम में एकाग्रता नहीं रख पाते।

सोशल मीडिया की लत की तुलना तंबाकू की लत से की गई है। मेटा और अल्फाबेट की कमाई अरबों डालर में होती है। 2025 में अल्फाबेट की शुद्ध आय 132 बिलियन डालर थी, जबकि मेटा की शुद्ध आय 60.46 बिलियन डालर थी। एक 20 वर्षीय युवती के बिगड़े मानसिक स्वास्थ्य के लिए मेटा और अल्फाबेट को जिम्मेदार ठहराते हुए कैलिफोर्निया की अदालत ने दोनों कंपनियों पर कुल 6 मिलियन डालर का जुर्माना लगाया। हालांकि सच्चाई यह है कि इतनी बड़ी कंपनियों पर 6 मिलियन डालर का जुर्माना कोई खास असर नहीं डालता।




अदालत ने कहा कि जुर्माने की राशि महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि इन कंपनियों को कानून के दायरे में लाना जरूरी है। 16 वर्ष से कम उम्र के नागरिकों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने वाला आस्ट्रेलिया पहला देश बना है। वहां 16 साल से कम उम्र के बच्चे टिकटॉक, फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब, स्नैपचैट और थ्रेड्स का उपयोग नहीं कर सकते। वे नए अकाउंट नहीं बना सकते और उनके पुराने अकाउंट भी निष्क्रिय कर दिए गए हैं।

कुछ सोशल मीडिया कंपनियां अन्य नामों से सेवाएं शुरू करके युवाओं को आकर्षित करने की कोशिश करती हैं, लेकिन आस्ट्रेलिया इस पर कड़ी निगरानी रख रहा है। दुनिया के अन्य देश भी आस्ट्रेलिया के इस कदम के प्रभाव पर नजर रख रहे हैं, क्योंकि सभी देश अपने युवाओं को सुरक्षित रखना चाहते हैं।

आस्ट्रेलिया के इस प्रतिबंध का उद्देश्य युवाओं को सकारात्मक सोच और रचनात्मक कार्यों की ओर प्रेरित करना है। इससे वे स्क्रीन पर कम समय बिताएं और उनका मानसिक स्वास्थ्य बेहतर बना रहे। 2025 में किए गए एक अध्ययन के अनुसार 10 से 15 वर्ष के 96 प्रतिशत बच्चे मोबाइल का उपयोग करते हैं और हानिकारक सामग्री देखते हैं। किशोरों में अत्यधिक जिज्ञासा होती है और वे जानना चाहते हैं कि उनके माता-पिता या बड़े मोबाइल पर क्या देखते रहते हैं।




आजकल तीन साल के बच्चे भी अपने दादा-दादी से बेहतर मोबाइल चला लेते हैं। कई बच्चे साइबर बुलिंग का शिकार भी होते हैं। छोटे बच्चों को मोबाइल की ओर आकर्षित करने में उनके परिवारजन ही जिम्मेदार होते हैं। बच्चों को शांत रखने के लिए उनके हाथ में मोबाइल दे दिया जाता है। इसलिए बचपन से ही बच्चों को मोबाइल से दूर रखकर उन्हें आउटडोर खेलों की ओर प्रेरित करना चाहिए। इसके लिए सबसे पहले परिवार के लोगों को खुद मोबाइल का कम उपयोग करना चाहिए।

भारत में भी सोशल मीडिया की लत बड़े पैमाने पर देखी जा रही है। अक्टूबर, 2025 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में फेसबुक के 403 मिलियन, इंस्टाग्राम के 481 मिलियन और यूट्यूब के 500 मिलियन सक्रिय उपयोगकर्ता हैं। इसलिए आस्ट्रेलिया की तरह भारत में भी 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने की आवश्यकता है।


- अनिकेत सिंह



एक ही कोख- दो फर्क क्यों ?





एक पुरुष का स्पर्म मैं भी हूँ,
एक पुरुष का स्पर्म तू भी है।
माँ की कोख से तू भी जन्मा है,
माँ की कोख से मै भी जन्मी हूँ ।
9 महिने माँ तक माँ की कोख में तू भी था,
9 महिने तक माँ की कोख में मैं भी थी।
जितने दिन में तूने धड़कना शुरू किया,
उतने ही दिन में मैंने भी धड़कना शुरू किया।
जितने महीने में तूने लात मारना शुरू किया,
उतने महीने में मैंने भी लात मारना शुरू किया।
माँ तेरे एहसास से जितना खुश होती थी,
उतना ही मेरे भी एहसास से खुश होती थी।
पेट के अंदर तू भी बच्चा
कहलाता था,
पेट के अंदर मै भी बच्चा कहलाती थी।
कोख से बाहर आने पर,
तू जितनी जोर से चिल्लाया,
उतनी ही जोर से मैं भी चिल्लाई।
बस फर्क इतना था,
तू बच्चा कहलाया,
और मैं बच्ची कहलायी।
कोख से बाहर आने पर तू भी जोर से रोया था,
मैं भी जोर से रोई थी ।
तेरी भी नाल माँ से जुड़ी थी,
मेरी भी नाल माँ से जुड़ी थी ।
तेरी भी नाल को काट कर माँ से अलग किया गया,
मेरी भी नाल को अलग किया गया।
तूने भी माँ का ही दुध पिया था, मैंने भी माँ का ही दुध पिया था ।
तुझे भी माँ ने सीने से लगाया, मुझे भी माँ ने सीने से लगाया था।
तेरे भी पैदा होने पर बाप का कोई रोल नहीं रहा,
मेरे भी पैदा होने पर बाप का कोई रोल नहीं रहा।
तेरे भी लालन पालन से बाप ग़ायब था,
मेरे भी लालन पालन से बाप ग़ायब था।
जैसा तू दिखता था,
वैसे ही मैं भी दिखती थी।
सारे अंग तेरे मेरे एक ही जैसे, संख्या में भी बराबर ही थे।
नंगा तू भी पैदा हुआ था,
नंगी मैं भी पैदा हुई थी।
लिंग तुझमे भी था,
लिंग मुझमें भी था।
बस फर्क इतना था,
तेरा लिंग लिंग कहलाया,
मेरा लिंग योनि कहलाई।
तू बेटा कहलाया,
मै बेटी कहलाई।
इंसान तू भी है, इंसान मैं भी हूँ।
गर्मी सर्दी ठंड तुझे भी लगती है, मुझे भी लगती है ।
पसीना तुझे भी आता है,
पसीना मुझे भी आता है।
भावनाएँ तुझमे भी होती हैं,
भावनायें मुझमें भी होती हैं।
जिस चीज को जैसे तू महसूस करता है,
उस चीज़ को वैसे ही मैं भी महसूस करती हूं।
जिस चीज से जितनी चोट तुझे लगती है,
उस चीज़ से उतनी ही चोट मुझे भी लगती है।
जिस चीज़ से जितना दर्द तुझे होता है,
उस चीज़ से उतना ही दर्द मुझे भी होता है।
तकलीफ तुझे भी होती है, तकलीफ मुझे भी होती है।
आंसू तेरे भी निकलते हैं,
आंसू मेरे भी निकलते हैं।
जो तुझे पसंद होता है, वो मुझे भी पसंद होता है।
जो तुम्हें नहीं पसन्द होता,
वो मुझे भी नहीं पसन्द होता।
जो तुम्हें अच्छा लगता है,
वो मुझे भी अच्छा लगता है।
जो तुझे नहीं अच्छा लगता,
वो मुझे भी अच्छा नहीं लगता।
जिस चीज से जितनी खुशी तुझे होतीं है,
उस चीज़ से उतनी ही खुशी मुझे भी होती है।
गुस्सा तुझे भी आता है,
उतना ही गुस्सा मुझे भी आता है।
माँ बाप तुम्हें जितने प्यारे होते हैं,
उतने ही मुझे भी प्यारे होते हैं।
मेरी जगह खुद को और खुद की जगह मुझे रख कर,
हर दिन पल महसूस करो,
तुम्हें कैसा लगता है?
जाने क्यू दुनिया ने ये फर्क बनाई,
तू अपना खून कहलाया,
मैं पराया धन कहलायी।
तू लड़का कहलाया,
मैं लड़की कहलायी।
इस धूर्त दुनिया ने,
तुझे कितना क्रूर निर्लज्ज बेशरम और अत्याचारी बनाया।
और सारी शर्म, इज़्ज़त, संस्कार की चादर मुझे उड़ाई।
तू पुरुष कहलाया,
मैं स्त्री कहलाई।
शादी तो पुरुषों की भी हुई,
फिर महिला की ही केवल विदाई क्यू हुई।
ससुराल तो पुरुषों के भी हुए,
फिर महिला ही केवल ससुराल में जमाई क्यू गयी।
सास ससुर तो पुरुषों के भी हुए,
फिर महिला से ही केवल सेवा कराईं क्यू गयी।
दुल्हा तो पुरुष भी बने,
फिर महिला की केवल मुह दिखाई क्यू हुई।
बच्चे तो पुरुष ने ही पैदा कराए,
फिर महिला की ही केवल गोद भराई क्यू हुई।
धोती-कुर्ता तो पुरुषों के लिए भी है,
फिर साड़ी केवल महिला को ही पहनाई क्यू गयी।
शादी तो पुरुषों की भी हुई,
फिर सुहागन केवल महिला ही कहलाई क्यू गयी।
शादी तो पुरुषों की भी हुई,
फिर महिला ही केवल गुलाम बनाई क्यू गयी।
माँ बाप तो महिलाओ के भी हुए,
फिर महिला ही केवल अपनों की पराई क्यू हुई।
घर तो महिलाओ के भी हुए,
फिर महिला ही केवल अपने घर से भगाई क्यू गयी।
नंगी तो महिलाये भी पैदा हुई,
फिर महिला को ही केवल शर्म इज़्ज़त थोपाई क्यू गयी।
इंसान तो पुरुष भी थे,
फिर महिला को ही केवल संस्कारों की चादर उड़ाई क्यू गयी।
शादी तो पुरुषों की भी हुई,
फिर केवल महिला के ही बापों की बिकाई क्यू हुई।
शादी तो पुरुषों की भी हुई,
फिर महिला की ही केवल विदाई क्यू हुई।


- प्रीति जायसवाल


आज की प्रमुख रचनाएँ- 12 अप्रैल 2026




*****

मलौण किला

ऊँचे पहाड़ पर दुर्ग मलौण, गौरव गाथा गा रहा
वीर गोरखाओं ने बसाया, गुणगान उनका गा रहा
रणनीति से दुर्ग बना, अठारह सौ चार से चौदह काल
बेकार यहाँ से करते रहे वो, दुश्मन की हर ओच्छी चाल

हुआ अंग्रेजों से युद्ध भयंकर, अठारह सौ पंद्रह था बर्ष
तोपों की गड़गड़ाहट से, जग में फैला गोरखा उत्कर्ष
भक्ति थापा वीरता के पर्याय, अंततः रण में हुए बलिदान
देश-धर्म और कौम रक्षा में, कुर्बान कर दिए अपने प्राण

अमर सिंह थापा के नेतृत्व में, गोरखाओं ने तन-मन लगाया
संसाधनों की कमी ने लेकिन, मजबूर उन्हें था बनाया
माता काली मंदिर इसमें, कहानी आज भी है बता रहा
गोरखा संघर्ष और अंग्रेजी चाल के, किस्से बहुत सुना रहा

अब भी खंडहर बना खड़ा है, सहता हुआ समय की मार
टूटी दीवारें बता रही हैं , था वैभव इसका कितना अपार
पर्यटक आज भी देखते हैं, रह-रह इसकी पुरानी शान
अपने कैमरों में संजो लेते हैं, इस धरोहर की पहचान

संरक्षण की राह संजोता किला, कर रहा है अब यही पुकार
इससे पहले की कण- कण हो जाऊं, कर दो मेरा जीर्णोद्वार
अमर रहे मलौण किला, दुनिया में गूंजता रहे इसका नाम
शत-शत नमन जिन्होंने बनाया, दिल से दें उनको सम्मान


- धरम चंद धीमान


*****


स्पंदन

प्रेम में दिल की स्पन्दन से, बैचेन हुए मन
मिलने को आतुर हुए तो, बढ़ी दिल की धड़कन

खतरे में था मिलना उससे, हाथ पांव में बढ़ी कंपन
हौसला न गिरने दिया, पहुंचा उसकी भवन

पहरे लगे थे खूब उनके, प्रेम में थे हम मतवाले
रूके न हमारे कदम, जुगाड़ में दिल मचले

नयनों ही नयनों से हुई कुछ इशारे, उसे भी बढ़ी स्पन्दन
चोर निगाहें से बचती हुई, वो छोड़ आयी निज भवन

सबके निगाहें से बचते-छिपते, चले गये बहुत दूर
जहाँ जाकर हमने एक नयी दुनिया बसाई, हुए मगरूर


- चुन्नू साहा


*****


जय होती है मानुस की
जब लड़ता है दुश्वारी से।
होती है पराजय मानुस की
जब लड़ता न दुश्वारी से।

रुकता न जो तूफानों में,
वह साहस की पहचान बना।
कांटों भरे हर पथ पर चलकर,
वह खुद अपनी मिसाल बना
सींचा है जिसने जीवन वट को,
मेहनत की श्रमवारि से
जय होती है मानुस की,
जब लड़ता है दुश्वारी से।।

जलती है हृदय में जिसके,
पावन ज्योति,कठिन परिश्रम की।
जीवन पथ में,चलता है वही,
काँटों की पथवारी पर।
सुंदर सुमन तोड़ता है वही,
जीवन की फुलवारी से।
जय होती है मानुस की
जब लड़ता है दुश्वारी से


- मनोज कुमार भूपेश


*****


भविष्य से खिलवाड़

मोबाइल में व्यस्त
युवा पीढ़ियां
कर रहे भविष्य से खिलवाड़
लगातार जूझ रहे
फ्री फायर पब जी जैसे खेलों में
वे बेफिक्र हैं
अपनी ही धुन में
कर रहे मौज
मां बाप के बनाएं
धन दौलत परिश्रम
के बदौलत
हर फिक्र को फोन में
उड़ा रहे
उन्हें पता है
ये मौज ये मस्ती
नहीं काम आयेगी
एक दिन नाकाम होना है
छोड़ो फ्री फायर पब जी खेल
उठाओ कलम और किताब
बदल डालो इतिहास
अरे उठो धरातल
के अमर सपूतों
पुनः नवल निर्माण करो
करो मां बाप गुरुओं
का सम्मान
धरती मां को प्रणाम करो।


- मनोज कौशल


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एक टीचर की डायरी

डायरी के पीले पन्नों पर
चॉक-धूल की हल्की रेखाएँ हैं,
कुछ अधूरी जाँची कॉपियाँ,
कुछ बच्चों की मुस्कानें हैं।

हर पन्ना कहता है मुझसे
“तुम केवल पाठ नहीं पढ़ाती हो,”
तुम तो सपनों को आकार देती,
जीवन की राह दिखाती हो।

कक्षा में जब शोर मचता है,
मन में फिर भी स्नेह उमड़ता है,
हर नन्ही शंका के पीछे
एक विश्वास खड़ा दिखता है।

कोई कहता, “मैम, यह समझाइए,”
कोई चुपचाप नज़रें झुकाता,
मैं अक्षर-अक्षर में ढूँढ़ती,
उसका मौन भी कुछ कह जाता।

जब थककर कोई बैठ जाता,
मैं हौसलों की बात लिखूँ,
“तुममें उजियारा बहुत है,”
ऐसी हर सौगात लिखूँ।

परीक्षा के अंकों से बढ़कर
उनकी कोशिश प्यारी लगती,
हार में भी जो सीख मिले,
वही विजय हमारी लगती।

डायरी में दर्ज हैं आँसू भी,
कभी विदा की नमी के साथ,
पर गर्व भरे वे क्षण भी हैं
जब वे बढ़ते अपनी राह।

मैं एक शिक्षिका हूँ,
पर उनसे रोज़ सीखती हूँ,
उनके विश्वास की छाया में
खुद को फिर से सींचती हूँ।

मेरी डायरी गवाह है इस बात की ...
यह रिश्ता केवल पाठशाला का नहीं,
यह मन से मन की वह डोरी है
जो जीवन भर टूटती नहीं।


- डॉ. सारिका ठाकुर ‘जागृति’


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हम मुसाफ़िर

ख़्वाब पलकों पे सजाएँ तो सँवर जाते हैं
हम तो ख़ुशबू की तरह हद से गुज़र जाते हैं।

यह जो मुँठी में लिये बैठे हैं यादों के दीए
रोशनी बन के अंधेरों में बिख़र जाते हैं।

ढूँढ़ने निकले जो तुझको तो यह "जानां",
पाँव थकते हैं मगर हौसलों से भर जाते हैं।

मंज़िलें उन को ही आग़ोश में लेती हैं नादां,
जो कड़ी धूप में हँस कर ही यहाँ जाते हैं।

सिर्फ़ दीवार व दर व बाम ही घर तो नहीं,
दिल सलामत हो तो वीराने भी घर जाते हैं।

वक़्त बाँटेगा भला कैसे हमें ऐ मुश्ताक़,
हम मुसाफ़िर हैं जहाँ चाहें ठहर जाते हैं।


- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़


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कुर्सीनामा

कुर्सीनामा किस-किस का ढूंढोगे ?
जिन्दगी की वसीहत किसी के नाम तो नहीं,
बहियों को खोलता हूँ, पन्नों को पलटता हूँ,
देखता हूँ बारम्बार,
चेहरे के धुंधले अक्स
फ़िर भी खाली दिखते हैं

न दिखती बड़ी-बड़ी कोठियां कहीं
न दिखती हवेलियां,
न दिखते आलिशान बंगलें कहीं,
खंडहरों में बदल गई मीनारें
बजती थीं जहां कभी मेंगल
आज कबूतरों का डेरा वहां,
देखता हूँ रोजनामचे की रपट
जब खंगालता हूँ इतिहास,
चेहरे के धुंधले अक्स
फिर भी खाली दिखते हैं,
न कोई पद मिला, न कोई प्रतिष्ठा मिली
न कोई धन मिला, ना कोई तमगा मिला,
बही खोली तो, कर्मों की लम्बी फेहरिस्त मिली
पढ़ा जब फेहरिस्त को,तो हाथ लगी मेरे उदासी,
आंसुओं की बूंदों की झड़ी
गालों से टपकने लगी,
चेहरे के धुंधले से अक्स
फिर भी खाली दिखाई देने लगे,
खोखला सा वही प्रश्न,मुझसे पूछने लगा-
कुर्सीनामा किस-किस का ढूंढोगे
और करोगे क्या उसका ?

- बाबू राम धीमान


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टैंक पर लोकतंत्र

टैंक जब रौंद रहे हों हर-कहीं
बच्चों,बूढ़ों,स्त्रियों और अस्पतालों को
बम जब बरसाये जा रहे हों दुनियाभर में
खेतों,कारख़ानों में, हल चलाते, कल चलाते
किसानों,मज़दूरों,कामगारों की रीढ़ पर
जब संधि-समझौतों से छुपाकर लगातार
लिखी जा रही हों नृशंसताएं, बर्बरताएं
फूलों की जगह बिछाई जा रही हों लाशें
जहाँ-जहाँ दिखाई देती थीं पाठशालाएं
अगर वहाँ-वहाँ उड़ाई जा रही हो बारूद
तो मैं कैसे लिख सकता हूँ कविता
तो मैं कैसे लिख सकता हूँ है ईश्वर कहीं
तो मैं कैसे लिख सकता हूँ पानी का संगीत
तो मैं कैसे लिख सकता हूँ युद्ध विरूद्ध बुद्ध
और मैं कैसे लिख सकता हूँ अनुनय-विनय
सचमुच मैं लिख ही कैसे सकता हूँ प्रार्थनाएं
कैसे लिख सकता हूँ टैंक पर लोकतंत्र ?


- राजकुमार कुम्भज


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व्यर्थ की चिंता छोड़िए न करें
कोई अफसोस,
कल की चिंता चिता समान
खो देती है होश,
जो होना होकर रहेगा नियति
है प्रभु की देन,
अच्छी सोच और समझ ही
देती ऊर्जा और जोश।


- कांता शर्मा


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क्या सच में बंजारा बनना है?

मन फिर आज बंजारा बनने को चला
सबसे दूर भागने की
आदत को छोड़ न सका...

मन फिर आज बंजारा बनने को चला
ठहरने का इसे आज कोई
वक्त ही नहीं रहा...

मन आज फिर बंजारा बनने को चला
एक कहानी, दो कहानी
हजारों कहानियों में बहाना ढूंढ रहा...

मन आज फिर बंजारा बनने को चला
ढूंढना क्या है जो
बन कर मिला वो उसका न हो सका...

मन आज फिर बंजारा बनने को चला
खुद को इससे से पृथक कर
अपने को ही न समझ सका...

मन अब कब तक बनवासी बन
यूँ अपने को ठुकराता रहेगा
एक ठहराव पर रुक और सोच
क्या सच में बंजारा बनना था
अगर हाँ, तो बन के भी क्या फायदा
जब सुकून और शांति
ही नहीं रहा...


- आध्या गुप्ता


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व्यतीत जीवन की तन्हाई में,
यह साथ तो है चौथेपन की परछाई में।
तब तुम और हम स्वतन्त्र होंगे,
हर कार्य से रिहा होंगे।

तब बैठेंगे साथ हम कुछ पल,
इस वक़्त को दोहराएंगे।
सपनों में अपने बीते हर पल की,
छवि फिर बनाएंगे।

तब तुम मुझ से रूठ न जाना,
मेरा साथ तब भी निभाना।
हम- तुम मिलकर एक नई कश्ती फिर सजाएंगे,
एक-दूजे में खो जाएंगे।

कभी तुम मेरा सहारा बनना,
कभी हम तुम्हारे काम आएंगे।
बच्चो का क्या है,
वह तो अपने जीवन में आगे बढ़ जाएंगे,
तब साथ बस हमारा होगा,
जीवन का सहारा होगा।

तेरे चहरे की हंसी में,
हम अपने गम छूपाएंगे।
हम-तुम एक-दूजे में खो जाएंगे,
नई दुनियाँ फिर बनाएंगे।


- रितु जाजू


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हाइकू

1) नीला आकाश
सफेद बादल हैं
रूई पहाड़

2) अकेला पेड़
छाँव फल देता है
खेत के बीच

3) फूल वह है
जो खुशबू बाँटता
पतझर में

4) चल रहे हैं
मंज़िल ना निशाना
फिर भी राही

5) रात अशांत
चैन हुआ बेचैन
देख चाँदनी

6) चुप किताब
अक्षर बोल पड़े
मैं आवाज हूँ

7) काटों ऊपर
जो भी चल पड़ा है
वही राही है

8) गहरे पेड़
इनको आग लगी
दुख बढ़े हैं

9) हवा के रंग
बदलते मौसम
भरे उमंग

10) देख सूरज
मेरे पास आया है
किरणों राहीं


- कश्मीरी लाल चावला


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मैं सिमटती गई

कभी घूंघट,कभी बुर्के के पीछे
मैं छिपती गई,
तुमने जिस मर्यादा में रखा
उसमें मैं सिमटती गई।

अपने प्रेम और त्याग से
जिन्दगी की माला पिरोती गई,
तुमने जिस मर्यादा में रखा
उसमें मैं सिमटती गई।

मेरी जिन्दगी पर मुझे छोड़
सबकी हुकूमत चलती गई,
तुमने जिस मर्यादा में रखा,
उसमें मैं सिमटती गई।

समाज के बनाए नियम,
कायदों में मेरी जिन्दगी पिसती रही,
तुमने जिस मर्यादा में रखा
उसमें मैं सिमटती गई।

अपनी इस घुटन भरी जिन्दगी से
खुली हवा में जाने को
मैं तड़पती रही, तरसती रही।
तुमने जिस मर्यादा में रखा
उसमें मैं सिमटती गई।


- अंकिता जैन अवनी


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सूखती ममता

तुम मानो या ना मानो,
तुम्हारे लिए जहां हूं,
हां तुम्हारी ही मां हूं।

धरा पर आई स्वर्ग छोड़ कर,
तुम सब को नीर सा अमृत
पीला कर।

जीवन दिया है,खुद का अस्तित्व
मिटाकर,
सींचे खेत तुम्हारे,कमी नहीं की,
रखा कुछ भी नहीं पास बचाकर।

तुम कैसे भूल गए मुझे,
बांध दिए किनारों को,
मैला किए पवित्र मेरे
जलधाराओं को।

रेत निकले,महल बनाए।
अपनी सारी मैल मुझसे धुलवाए।

तुम स्वार्थी इतने कैसे हो गए,
खुद की प्यास बुझाते बुझाते
मुझको सूखे रेत में दफना गए।

तुमने मेरे बारे में न सोचा तो ना सही,
तेरे बच्चे रह ना जाए प्यासे कहीं।

मैं अब किस्सा बन जाऊंगी,
तुम्हारे अतीत का हिस्सा बन जाऊंगी।

मैं तुम्हारी मां हूं, जो चली गई
तो फिर नहीं आऊंगी,
मुझको बचा सको तो बचा लो,
नहीं तो अश्रु संग तुझे भी बहा
ले जाऊंगी।


- रोशन कुमार झा


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यादों का झरोखा

​उसे भूलना इतना आसान नहीं था,
मगर मैं गलतफहमी का शिकार हो गया।
मुझे लगा कि मैं भूल गया हूँ उसे,
पर गाहे-बगाहे दोस्तों ने चुटकी ले ली।

​नाम उसका मेरे नाम के साथ जोड़कर,
एक पल में दुनिया भर की खुशी दे दी।
मैं खोने लगा फिर से उसकी यादों में,
बीते वक्त का एहसास फिर जिंदा होने लगा।

​मैं खुद से, उससे भी ज्यादा प्यार करने लगा,
इस बात पर गौरवान्वित होते हुए-
कि उस खूबसूरत नाज़नीन का मैं दीवाना था,
और वह भी हद से ज्यादा मेरी दीवानी थी।

​बस एक-दूसरे से मिलकर,
हाल-चाल ही जानना होता था,
कभी उसकी झील सी आँखों में,
यूँ ही डूब जाना होता था।

​उसके कोमल हाथ, जो कभी-कभी
मेरे बालों को सहला जाते,
एक मीठी मुस्कान के साथ,
चेहरे का हर भाव बता जाते।

​"कोई इतना प्यार भरा ख्याल कैसे रख सकता है?"
मगर वह जताती नहीं थी कि-"मैं तुमसे प्यार करती हूँ",
मैंने भी कभी कहा नहीं कि-"मैं तुमसे प्रेम करता हूँ।"

​बीता हुआ समय वक्त के साथ बदलता गया,
मैं उस जूस वाली दुकान पर,
फिर से अकेला ही जाता रहा।
वक्त के साथ वह किसी और की हो गई,
और मैं गुमनामी में कुछ साल जीता रहा।

​मगर आज देखो ना, पुराने दोस्तों ने—
हँसी-हँसी में मेरे नाम के साथ उसका नाम जोड़ दिया,
हँसते हुए फिर वही पुरानी चुटकी ले ली।
मैं भी फिर कहीं यादों में खो गया।

​एक चुटकी सिंदूर ही तो बाकी था,
ताउम्र उसके हाथों से सर सहलाने के लिए;
हँसी-ठिठोली के साथ थोड़ा रूठना और मनाना,
मज़ा देता... इस "याद वाली सज़ा" की जगह।

​मगर वक्त और हालात ने सब कुछ बदल दिया,
फिर यादों का सहारा ही चेहरे की हँसी बन गया।
देखो ना! मज़ाक-मज़ाक में यादों से उसकी मुलाकात फिर हो गई।

कुछ यादें चाहकर भी भुलाई नहीं जातीं,
इंसान बस उन्हीं मीठी यादों को संजोए ज़िंदा रहता है,
एक-दूसरे के दिल के किसी कोने में।
और हाँ "उसे भूलना इतना आसान नहीं हैं।"

​तभी फिर किसी दोस्त ने टोका-
"चल, बाहर निकल यादों के झरोखे से,
कहीं तू फिर से खो गया है!"
"हाँ-हाँ चल, समोसे का स्वाद-
इमली की चटनी के साथ लेते हैं।"

​और फिर क्या... ऑर्डर कर दिया,
इस बार उसके लिए नहीं, अपने दोस्तों के लिए।


- राघवेंद्र प्रकाश 'रघु'


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हां ! धीरे-धीरे ओझल हो रहा हूं मैं....

मानो इरादों की इमारतें ढह गई हैं,
वक्त की तेज़ धार में शरारतें बह गई हैं,
महफ़िलों से सन्नाटे की ओर चल पड़ा अब,
गुमनाम अंधेरों में शामिल हो रहा हूं मैं....

धीरे-धीरे ओझल हो रहा हूं मैं....

बेफ़िक्री दबाने की मुझे आदत नहीं थी,
फिर वक्त को भी तो रुक जाने की फितरत नहीं थी,
सर झुका हालातों से हार ही जाऊं सोचा है,
हर अरमां के अपने, क़ातिल हो रहा हूं मैं....

धीरे-धीरे ओझल हो रहा हूं मैं....

रंगमंच पे आकर झिंझोड़ा है किसी ने,
करतबों का सिलसिला तोड़ा है किसी ने,
खेल ख़त्म अब गिर रहा है परदा,
निगाहों में सबकी बोझिल हो रहा हूं मैं....

हां ! धीरे-धीरे ओझल हो रहा हूं मैं....


-कुणाल


*****


स्कूल चलो!

छोड़ो घर का सारा काम
सुबह सूर्य को करो प्रणाम
बहुत हुआ घर में आराम
स्कूल चलो!

अभिव्यक्ति की आजादी मिलेगी
जीवन में आराम मिलेगा
ढेर सारा पैगाम मिलेगा
स्कूल चलो!

साक्षर देश बनाना है
लड़का हो या लड़की हो
नहीं करना है इनमें भेद
स्कूल चलो!

मुफ्त में कलम किताब मिलेगा
भोजन पानी साथ मिलेगा
गुरुओं से अच्छी बात मिलेगा
स्कूल चलो!

अच्छी शिक्षा संस्कार मिलेगा
नित नवीन व्यवहार मिलेगा
जीवन का आधार मिलेगा
स्कूल चलो!

अभिभावक को जगना होगा
बच्चों का भविष्य बनाना होगा
लापरवाही से होगा हानि
प्रतिदिन बच्चों को भेजो स्कूल
स्कूल चलो, स्कूल चलो!


- मनोज कौशल


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मासूम नन्हें प्यासे परिंदे

​तेज़ धूप का आलम देखो, न साया है न राहत है,
हवाएं गरम हैं कितनी, उफ़ कैसे उड़ते फिरते हैं।

उनके नन्हे पाँव, वो भी कोमल बैचेनी में लगते हैं,
निगाहें पानी को ढूंढती इसी उम्मीदों मे पलते हैं।

​असीमित और लाचारी से इनका भरा है जीवन,
प्यारे प्यारे सुंदर सुंदर,इंद्र धनुष से ये लगते हैं।

शिक़व, शिक़ायत और फ़रियाद कहां ये करते हैं,
चहचहाहट से आंगन को ख़ुशियों से ये भर देते हैं।

​हमारा फर्ज़ कुछ तो होगा जो इनकी मदद करें हम,
मिट्टी के प्याले में हम भी इक दरिया भर के रखते हैं।

एक क़तरा पिएंगे पानी लाख दुआएं तुमको देजाएंगे,
दीवारें, ओर घर तुम्हारे सुकून-ओ-चैन से भर देते हैं।

​पक्षियों की प्यास बुझाना इबादत से है बड़ी इबादत,
प्यार मुश्ताक़ सच्चा है तो ये लोट के फिर से आते हैं।


- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़


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ये क्या बात हुई

तुम मिलने ही ना आओ
और हम शिकायत भी ना करें,
ये क्या बात हुई ?

तुम बेपरवाह ख़ामोश बैठे रहो
हम नादां बग़ावत भी ना करें,
बोलो ये क्या बात हुई ?

घिरे हो कितने अजनबियों से तुम,
क्या तुम्हारी हिफ़ाज़त भी ना करें,
बताओ ये क्या बात हुई ?

सच में पत्थर दिल सनम है मेरा
तो हम उसकी इबादत भी ना करें,
कहो ना ये क्या बात हुई ?

तुम्हारी बदमाशी तुम्हे मुबारक,
अब हम शराफ़त भी ना करें,
वाकई ये क्या बात हुई!

बेशक दिल तोड़ना दस्तूर है तुम्हारा,
सुनो उनकी इज़्ज़त भी ना करें
भई ये क्या बात हुई?

भले ही नफ़रत पाले हो मन में,
पर हम मोहब्बत भी ना करें,
अजी ये क्या बात हुई?


- आनन्द कुमार


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नफ़रत का बाजार

नफरत का बाजार बेशर्मी से सजाने लगा है,
जो कभी तलबगार थे पाक मुहब्बत के,
उन्हें अब नफरत का साजोसामान देने लगा है।

नफरत का गुबार दिलों में कैसे भरना लगा है,
जो हाथ उठता था कभी औरों की मदद में,
वो अब कत्ल के इरादे से उठने लगा है।

आंखों का प्यारा ही ,आंखों में खटकने लगा है,
जिसको छुपाया था कभी पलकों के साए में,
वहीं अब आंखे दिखा कर बात करने लगा है।

रिश्तों में भी दिखावे का अहसास छाने लगा है,
इक दूजे के बिन जहां जी नहीं पाते थे लोग,
रिश्तों को भी अब गहरे गर्त में दफनाने लगा है।

खुदगर्जी का आलम इस कदर छाने लगा है,
बेशर्मी से लाशों के ढेर पर बैठ कर आदमी,
तिजोरियां खुद की बेगैरत होकर भरने लगा है।

कर्मों का हिसाब तो हर किसी को देना पड़ा है,
गलतफहमी में रहते हैं,जिसकी लाठी उसकी भैंस
याद रखना कभी बबूल के पेड़ पर आम लगा है।


- राज कुमार कौंडल


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चलते जाना है
चलते जाना है,रुकना नहीं है
कोई तुम्हें समझे या ना समझे
कोई तुम्हें जाने या ना जाने
कोई तुम्हें पहचाने या ना पहचाने
कोई तुम्हें कहे अच्छा या कहे बुरा
कोई निंदा करे या करे स्तुति
कोई प्रीति करे या करे घृणा
रुकना नहीं है,चलते ही जाना है
जग में कोई नहीं है अपना
कौन कब स्वार्थ हेतु साथ छोड़ जाए
कोई नहीं जानता
अक्सर हमने लोगों को कलिकाल में
विश्वास को तोड़ते-मरोड़ते देखा है
हृदय को विदीर्ण करते देखा है
प्रेम में हमने देखे हैं धोखे
सादगी का हमने मजाक बनते देखा है
ऐसा लगता है कि
सब ओर गिरगिटों का अम्बार है
अरे! फिर भी,फरेब से भरी दुनिया में
चलना तो है,
हर कदम फूंक -फूंक कर चलिये
रुकना नहीं है,बस चलते ही जाना है
हे मानव ! जग में स्वकर्तव्य का कर निर्बहन
ईश्वर का सुमिरन करते जाओ तुम
प्रेमपूर्ण, भक्तिपूर्ण प्रार्थनाएं होती हैं
दया भाव से,करुणा से नित्य कबूल
तभी उस करुणामय, प्रेम के सागर
ईश्वर को हृदय से नमन है
वाणी से वंदन है
जो है इस सृष्टि का पालक
इस सृष्टि का मूल
रुकना नहीं है हमें जीवन में
प्रेम से,सच्चाई से परोपकार हेतु
निरंतर आगे बढ़ते जाना है
आगे बढ़ते जाना है।


- प्रवीण कुमार


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औरतें
औरत का दुःख धुएँ सा होता है,
जो आँखों में चुभता है,
पर आसमान तक दिखता नहीं।

हँसते हुए होंठों के पीछे,
वो चुपचाप राख बनती रहती है,
कोई ताप नहीं माप पाता।

मर्द का दुःख बादल जैसा-
गरजे तो दुनिया सुन ले,
बरसे तो हर कोई भीग जाए।

पर औरत…
वो समंदर की गहराई है,
जिसमें आँसू डूबते रहते हैं,
और सतह पर
सिर्फ़ शांति दिखाई देती है।


- 'रूद्राणी' पूनम शर्मा


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खामोश यादें

मैं गूंजता रहूंगा तेरे शहर में
तेरी यादों के संग।
मैं अकेला ही सही
पर फ़िरता रहूंगा हर जगह
तेरी खामोशी को ले अपने संग।
लोग पूछेगे मुझें जब
क्या दर्द है तुम्हें?
मगर मैं फिर भी
चुपचाप फिरता रहूंगा
सीने में दफन की
तेरी खामोश यादों को ले संग।
मैं लिखता रहूंगा
हर जगह इश्क़
लोग पूछेंगे मुझे
कौन है हमराही तेरा?
तो मैं चुपचाप हंसता रहूंगा,
तेरी मुस्कुराहट को याद कर।


- डॉ. राजीव डोगरा


*****