ये पृथ्वी है घर सभी का
चलती हुई ट्रेन में बेटिकट
मैं देखता हूॅं अपने समय के दृश्य में
गॅंगातीरे शहनाई फूॅंक रहे हैं बिस्मिल्लाह
अमज़द अली खोज रहे हैं भैरवी के रॅंग
और पूछ रही हैं उमराव जान पूछ रही हैं
दरवाज़े खोलते हुए,खोजते हुए बचपन
ये क्या जगह है दोस्तों,कौन-सा मुक़ाम है
कि जगह-जगह,ग़र्दो-ग़ुबार ही गुबार है
बताते हैं,समझाते हैं भीमसेन जोशी
किशोरी अमोणकर को स्मृतियों में
ज़रा भी अपराध नहीं है सपने देखना
देखना सपने सबूत है आदमी होने का
सपने नहीं तो आदमी भी कहीं नहीं
सपनों का होना,आदमी होने का सपना है
किसी को भी घटाने से घटता है ख़ुद ही
सच्चा-झूठा नहीं होता है देश कोई भी करते हैं
होड़ काल से और मरते हैं बेमौत
हथियारों की होड़ ही बनाती है पागल
और पागल आदमी देश नहीं,दुश्मन है
किसी भी देश में,किसी भी देश का
भूल जाता है आदमी कि आदमी है वह
नहीं किसी दूसरी दुनिया का दूसरा प्राणी
हाथ हैं दो ही उसके भी,जैसेकि अन्य
पाॅंव हैं दो ही उसके भी,जैसेकि अन्य
कान हैं दो ही उसके भी,जैसेकि अन्य
और है एक खोपड़ी भी सभी के जैसी ही
फिर क्यों घृणा,क्यों ईर्ष्या,युद्ध क्यों
फिर क्यों ध्वस्त बारहखड़ी फिर-फिर
फिर क्यों मटियामेट पानी के संकल्प
क्यों क़त्ल किये जाते हैं फिर उड़ते पक्षी
अपनी-अपनी हद के बेहद में हैं सभी
और अपनी-अपनी ध्वनियों के ताप में भी
अपनी-अपनी स्वतंत्रताओं सहित निर्मल
है नहीं जगह कम किसी की भी,कहीं भी
ज़रा-सा वक़्त,ज़रा-सी जगह है सभी की
ज़रा-ज़रा मिट्टी,ज़रा-ज़रा आग,है सभी में
ये पृथ्वी है घर सभी का।
- राजकुमार कुम्भज
*****
यू टर्न
जब देखो आजकल लोग यू टर्न लेते हैं मार
अपने कंधों से जिम्मेवारी एकदम देते हैं उतार
सोचता रह जाता है कोई कि यह क्या हो गया
झूठ बोलते है फिर मुकर जाते हैं लेते है पल्ला झाड़
सबसे ज्यादा यू टर्न लेते हैं नेता छोटा हो या बड़ा
कड़वे बचनों का तीर रहता है इनके तरकश में पड़ा
चिकना घड़ा होते हैं इनको परवाह नहीं किसी की
वक्त पड़ने पर होता नहीं किसी के साथ खड़ा
अभी कहते हैं कुछ थोड़ी देर में हैं मुकर जाते
जुबान इनकी चलती है दोष मीडिया पर हैं मढ़ आते
आका को खुश करने से बिल्कुल नहीं हैं घबराते
असर इन पर कोई नहीं चिकने घड़े हैं बन जाते
सड़क पर जब आगे हैं निकल जाते
तब यू टर्न लेकर फिर हैं लौट आते
यू टर्न लेना भी कई बार होता है जरूरी
वरना अपनी मंजिल तक कभी नहीं पहुंच पाते
बॉस अपने मातहत से करवाता है बहुत काम
न करे तो फिर फंस जाती है आफत में जान
लिखित में होता नहीं धौंस से है करवाता
उसकी यू टर्न से फंस जाता है कोई,
आता नहीं उसका नाम
- रवींद्र कुमार शर्मा
*****
आज भी याद है वह किताब,
खोलूँ तो महके जनाब,
उड़ते हैं पन्नों से अलसाए ख़्वाब,
भीग उठे मन का शबाब।
बीच पन्नों में सूखा गुलाब,
दबा हुआ कोई अनकहा जवाब,
हल्की सी खुशबू, हल्का सा हिसाब,
और धड़कनें बेहिसाब।
कहीं शार्पनर से छिली पेंसिल की कुरचन,
कोनों में अटकी बचपन की धड़कन,
स्याही के धब्बे, आधी सी रचना,
जैसे समय की कोई अटकी कम्पन।
कभी नाम लिखा था चुपके से,
कभी आँसू गिरे थे पन्नों पे,
कभी हँसी छिपी थी लफ़्ज़ों में
सब दर्ज है उस किताब में।
कैसे भूलें वह किताब,
जिसमें उम्र का हर पड़ाव,
कुछ यादें थीं बेहद ख़ास,
और कुछ सपने… बेहिसाब।
- सविता सिंह मीरा
*****
इल्जाम
एक इल्जाम
मेरे नाम आया है
न होते हुए भी मोहब्बत
सरेआम
मेरा नाम आया है।
मैं ढूंढता रहा
हर जगह खुद को ही
न जाने क्यों
फिर भी मेरा नाम
किसी ओर के साथ आया है।
लोग पूछते रहे मुझे
मेरे गम का कारण
और मैं हर गम में
खुदा तेरा नाम
हर बार लेता आये हूँ।
- डॉ. राजीव डोगरा
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सभ्यता
सुनो सभ्यता!
पूर्णता को तरसती तुम्हारी परिभाषा
विचलित करती है मुझे
कितनी बदरंग हो गयी है
तुम्हारी प्रकृति
तुम्हारी रक्त-नलिका में बहने वाला लहू
संवेदनशीलता से दूर
क्यों होता जा रहा है
देखने को बाध्य क्यों है
आज का मनुष्य
अपने समाज में एक भीषण युद्ध
सभ्यता का
सभ्यता के विरुद्ध ?
- अनिल कुमार मिश्र
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मातृ भाषा हिंदी दिवस
आज बनी त्योहार है हिंदी,
आज बड़ी खाश है हिंदी।
मिट रहा जिसका अस्तित्व,
पहन कर ताज खड़ी हिंदी।
पाती थी सम्मान जो हिंदी,
आहत सी ताकती वो हिंदी।
नहीं क्यों रोज देते सम्मान,
आज ही सिर्फ बोलते हिंदी।
चमकी बिंदिया सी हिंदी,
बन प्रश्नचिह्न सी खड़ी हिंदी।
लेकर उपहास की थैली,
कहते हमारी मैया है हिंदी।
दंश उपहास का झेलती,
अपमानित होती रहती हिंदी
सीमित वेद उपनिषद भाषा
सूर तुलसी,मीरा की हिंदी।
खोखली रस्मों का पहना ताज,
बनाते है महान हम हिंदी।
पढ़ा बच्चों को हम अंग्रेजी,
कहते हमारी शान है हिंदी।
- मीना तिवारी
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गांव में एक घर
सड़क के उस छोर पर
छोटे से गांव में,
नीम की छांव में
घर के आंगन में एक नल हुआ करता था
गांव में मेरा भी एक घर हुआ करता था।
मिल जाती थी अक्सर
बाट जोहती अम्मा, हुक्का पीते बाऊजी,
शाम से ही ताक में जलता,
एक दिया हुआ करता था,
गांव में मेरा भी एक घर हुआ करता था।
मिट्टी का एक चूल्हा,
खूंटे से बंधे चौपाए,
आंगन में बिछाकर खाट,
हमारा बिस्तर हुआ करता था,
गांव में मेरा भी एक घर हुआ करता था।
चूल्हे पर हांडी में पकता हुआ साग,
आंगन में मिट्टी से लीपने की खुशबू,
कोने पर चटनी बनाने को,
सिल पर पत्थर हुआ करता था,
गांव में मेरा भी एक घर हुआ करता था।
छत पर नाचता मोर,
गली के बाहर पहरेदारी करता कुत्ता,
पेड़ पर गौरैया का घर,
गुटर गूं करता कबूतर हुआ करता था,
मेरा भी गांव में एक घर हुआ करता था।
हरे भरे खेत , खेतों में बहता ताजा पानी
पानी में गोते लगाते बगुले,
गेहूं और बाजरे की बाल,
मीठा मीठा मटर हुआ करता था,
गांव में मेरा भी एक घर हुआ करता था।
- मंजू सागर
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समंदर मे चीनी घोलना सीखिए
हो सके त मीठ बोलना सीखिए
अगर पूर्णिमा देखना चाहते है,
दिल के दराज़ खोलना सीखिए
ज़ब चराग जलाए है आसियानो मे
तूफान जैसा भी हो संभालना ‘सीखिए
जिनगी को आराम से चलने दीजिये
मधुमक्खी के छाता मे हाथ न डालना सीखिए
बिना मेहनत के घी नही निकता
मन लगा के दही मोहना सीखिए
दुनिया बस मे हो या ना हो लेकिन
परिवार के बाट खोजना सीखिए
घर आंगन मे घास पुस लग जाए तो
मुहब्बत के खुरपी से सोहना सीखिए
मछलीं पानी मे नहांने से शुद्ध नहीं होंगी
ईमानदारी के साबुन से दाग धोना सीखिए
जिस कश्ती मे मुसाफिर बैठे हुए है ‘सदानंद’
एक इलतेज़ा है नाव मत डुबोना सीखिए
- सदानंद गाज़ीपुरी
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हिसाब
लाशों पर बने महलों में क्या चैन से रह पाओगे,
छीनी जो सांसे उनका हिसाब क्या दे पाओगे ?
भूख से बिलबिला रहे हैं जो बेबस मजबूरी में,
उन लोगों को कभी अपना मुख दिखा पाओगे ?
इंसान है खुदा की बनाई बेशकीमती रचना,
उस कीमत को कैसे सिद्ध कर पाओगे ?
कीड़े मकोड़े की तरह मसल देते हो इंसानों को,
उनका इंसान होने का दर्द कब समझ पाओगे ?
हर मसला नहीं होता बम गोली बारूद से हल,
इस छोटी सी बात को दिमाग में कब बिठाओगे ?
माना की आप जैसी समझ नहीं है हम लोगों की,
इंसा को इंसा समझने की समझ कब लाओगे ?
खुदगर्जी में फंसकर मत खेलो होली रक्त की,
रक्त के हर कतरे का हिसाब कैसे दे पाओगे ?
- राज कुमार कौंडल
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तेरी दोस्ती
तेरी दोस्ती ने हमको
जीवन जीना सिखा दिया
उदास रहता था मेरा चेहरा
उसको मुस्कुराना सिखा दिया।
न मिली मोहब्बत जीवन में
इसका अब कोई गम नहीं रहा
तेरी दोस्ती ने मुझको
हर लम्हा जीना सिखा दिया।
रब करे तू हमेशा खुश रहे
मेरी हर दुआ में शामिल रहे
तेरी दोस्ती ने मुझको
जीवन का बदलाव सिखा दिया।
मेरी रिद्धियां मेरी सिद्धियां
तुमको सदा सलामत रखें
तेरी दोस्ती ने मुझको
मानव से महामानव बना दिया।
- डॉ. राजीव डोगरा
*****
अब चलते हैं...
जिंदगी के इस रंगमंच पर सब
अपना किरदार निभा जाते हैं।
कुछ लोग कठपुतली बन जाते है
कुछ लोग मेहनत करते जाते हैं।
बहुत हुआ एहसान ए जिंदगी मुझ पर...
अब चलते है बस अब चलते हैं।
सुबह सुबह जब आँखें
खुलती मंज़िल ही दिख जाती हैं।
लिए बोझ सर पर जिंदगी की
मेहनत करते जाते हैं।
बहुत हुआ एहसान ए जिंदगी मुझ पर..
अब चलते है बस अब चलते हैं।
मदद किया अपनो का अपना दर्द भुलाकर।
अपनो ने मुँह ऐसा मोड़ा कि गिरगये हम जमी पर।
बहुत हुआ एहसान ए जिंदगी मुझ पर...
अब चलते है बस अब चलते है।
- अजीत कुमार सिंह
जिंदगी के इस रंगमंच पर सब
अपना किरदार निभा जाते हैं।
कुछ लोग कठपुतली बन जाते है
कुछ लोग मेहनत करते जाते हैं।
बहुत हुआ एहसान ए जिंदगी मुझ पर...
अब चलते है बस अब चलते हैं।
सुबह सुबह जब आँखें
खुलती मंज़िल ही दिख जाती हैं।
लिए बोझ सर पर जिंदगी की
मेहनत करते जाते हैं।
बहुत हुआ एहसान ए जिंदगी मुझ पर..
अब चलते है बस अब चलते हैं।
मदद किया अपनो का अपना दर्द भुलाकर।
अपनो ने मुँह ऐसा मोड़ा कि गिरगये हम जमी पर।
बहुत हुआ एहसान ए जिंदगी मुझ पर...
अब चलते है बस अब चलते है।
- अजीत कुमार सिंह
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काश! मैं, आपको अपनी कमाई से
एक छोटा सा तोहफा दे पाता...
मेरा सारा कर्जा उतर जाता...
आपकी दी गई ज्ञान की तिजोरी
मैंने आज भी संभाल कर रखी है...
चाहे पांच पीढ़ी पहले का इतिहास हो
या समाज को आईना दिखाते हुए
आपका विधवा से शादी कर लेना हो
आप हमारे बरगद के वृक्ष हो...
जिसकी छाया हमेशा हमारे और
आने वाले पीढ़ी के ऊपर रहेगी...
आपका परिश्रम, संघर्ष की कहानी,
मजबूत दृढ़ संकल्प.. और
अपनी बातों से लोगों को जीतने की कला...
मुझे हमेशा आपकी याद दिला देती है।
काश! मैं आपको अपनी कमाई से
एक तोहफा दे पाता...
- दीपक कोहली
*****























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