साहित्य चक्र

28 October 2019

दीपोत्सव



किसी जगह पर दीप जले अरु कहीं अँधेरी रातें हों ।
नहीं  दिवाली  पूर्ण बनेगी, अगर भेद की  बातें  हों ।।

ऐसे  व्यंजन  नहीं  चाहिए, हक  हो  जिसमें औरों का ।
ऐसी  नीति महानाशक  है, नाश करे  जो  गैरों   का ।।

हम  तो  पंचशील  अनुयायी, सबके  सुख में जीते हैं ।
अगर प्रेम  से मिले जहर भी, हँस करके ही  पीेते  हैं ।।

चूल्हा  जले पड़ोसी  के  घर, तब हम  मोद  मनाते हैं ।
श्मशान तक  कंधा  देकर,  अन्तिम  साथ निभाते हैं ।।

किन्तु चोट हो स्वाभिमान पर,जिन्दा कभी ना छोड़ेंगे ।
दीप  जलाकर किया  उजाला, राख बनाकर छोड़ेंगे ।।

दीपोत्सव का मतलब तो यह,सबके घर खुशहाली हो ।
दीन दुखी निर्बल  के घर भी, भूख मिटाती थाली हो ।।

प्रथम दीप के प्रथम रश्मि की,कसम सभी जन खाएँगे।
दीप  जलाकर  सबके  घर में, अपना  दीप जलायेंगे ।।

घर घर में जयकारा गूँजे, कण कण में खुशहाली हो ।
सच्चे अर्थों  में उस दिन  ही, दीपक पर्व  दिवाली हो ।।

                                                                      डॉ अवधेश कुमार अवध


26 October 2019

" माटी के दीप से सदा लीजे प्रेरणा "


  

दीपावली त्यौहार ही नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व को एक प्यारा-सा संदेश भी देती है, दीपावली ही एकमात्र ऐसा पर्व है, जो दीपों के बिना शून्य है, हमारे घरों के प्रत्येक कोने, दीवार और छतों पर जब तक दीये का प्रकाश नहीं छा जाता, तब तक ये पर्व फीका-फीका सा लगता है, एक ऐसा दीया जो सदैव मौन बनकर भी अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देता है, अपने अंतिम दौर तक दीया अंधकार से लड़ता रहता है।




             आखिर लड़े भी क्यों ना ईश्वर ने जो ताकत मनुष्य को विपत्तियों और संघर्षों से लड़ने की प्रदान की है, वही ताकत ईश्वर ने निर्जीवता को भी प्रदान की है। हमारे भीतर भी सदा ऐसा ही दीया जलना चाहिए, लेकिन साथ में प्रेम, समर्पण और आत्मविश्वास सदा प्रज्वलित रहना चाहिए। एक दीया इंसान को इंसानियत, अधर्म को धर्म, मूर्ख को बुद्धिमान बनने की प्रेरणा प्रदान करता है ।

               हम भी माटी के ही पुतले है, और दीया भी माटी से ही बना है, जितना हम अपने अंतर्मन की ज्योति के प्रकाश को फैलाएंगे, वह उतना ही पराक्रमी बनता है, ठीक उसी प्रकार दीया भी अपनी बाती रूपी ज्योति को जाग्रत करके अपने प्रकाश को इतना प्रगाढ़ बना देता है, कि वह अंत समय तक अपनी जीत तय कर लेता है।

              अहं का नाश करके मानव को सदैव सौम्य,सरल, धैर्यवान होकर बुद्धिमानी का परिचय देना चाहिए। यदि भगवान की पुजा करे तो भी दीये का महत्व अपनी महत्ता को दर्शाता है, इसलिए सदैव दीया बने, और अपने जीवन में प्रकाश की ज्योत सदैव जलाकर रखें, ताकि जीवन में कठिन से कठिन डगर भी आसान हो जाए।

  इसी के साथ सभी देशवासियों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं।


                                                    - सुनील पोरवाल "शेलु"


सदियों से है कृपा


सदियों से है कृपा उनकी पूरे इस संसार पर
लक्ष्मी माता आएंगी दीवाली के त्योहार पर
धन वैभव और सुख समृद्धि कमल पुष्प ले हाथ में
रिद्धि-सिद्धि भी हैं आईं गणपति बप्पा साथ में
भक्त सभी हैं जान लगाए इनके सत्कार पर
लक्ष्मी माता आएंगी दीवाली के त्योहार पर



मां से वैभव दुनिया की निर्धन को देतीं हैं धन
पांव रखे जो माटी पर तो वो बन जाता है कंचन
वर देतीं भक्तों को उनकी भक्ति के आधार पर
लक्ष्मी माता आएंगी दीवाली के त्योहार पर


गणपति बप्पा की महिमा भी जग में बड़ी निराली है
उनसे ही अपनी दुनिया में सदबुद्धि खुशहाली है
रखते दया का हाथ सदा ही हम सबके परिवार पर
लक्ष्मी माता आएंगी दीवाली के त्योहार पर


विनती है लक्ष्मी माता से और गणेश जी आपसे भी
सारे दीन-दुखी को दे दें धन वैभव और समृद्धि 
कृपा बनाएं रखें सदा ही दीन-दुखी-लाचार पर
लक्ष्मी माता आएंगी दीवाली के त्योहार पर
लक्ष्मी माता आएंगी दीवाली के त्योहार पर


                                     विक्रम कुमार


लक्ष्मी गणेश जी के नाम पत्र-



पूजनीय/ पूजनीया
लक्ष्मी और गणेश जी के पावन चरणों में पृथ्वी लोक से रिखब चन्द राँका 'कल्पेश' का कोटि कोटि प्रणाम।

   
मैं यहाँ पर कुशल पूर्वक हूँ। आप भी स्वर्ग लोक में कुशल मंगल होंगे आपको विदित है कि इस पृथ्वी लोक पर अनेक त्योहार मनाएँ जाते हैं। जिसमें सबसे बड़ा त्योहार दीपावली का पर्व जिसमें आप दोनों के साथ ज्ञान की देवी सरस्वती माँ की भी पूजा होती है। 

     मैं आपसे यह निवेदन करता हूँ कि धरती पर कई लोग गरीब है। वे अपना जीवन बड़े कष्टमय बिताते है।आपके चरणों में निवेदन है कि उनके घर में धन की वर्षा करें सुख समृद्धि की बौछार कर उनका घर धन धान्य से परिपूर्ण करें। जिससे वे सब भी दीपावली का त्योहार आनन्द पूर्वक मना सके और विनय व श्रद्धा भाव से आपकी पूजा कर सके। इतनी कृपा कर दो माँ।

   ‌‌‌  रिद्धि सिद्धि के दातार गणेश जी महाराज व ज्ञान की देवी सरस्वती माँ आपके चरणों में निवेदन है कि इस पृथ्वी पर लगभग 6 करोड़ बच्चे प्राथमिक शिक्षा से वंचित है। जिनको विद्या की‌ अति आवश्यकता है। यदि आप दोनों की कृपा हो जाए और आशीर्वाद मिल जाए तो यह बच्चे भी शिक्षित होकर आत्मनिर्भर बनकर देश सेवा में योगदान दे सके माँ।इस‌ अज्ञान रूपी अंधकार में ज्ञान रूपी दीपक जलाकर शिक्षा का उजियारा फैला दो माँ।

    इस पृथ्वी लोक पर राम राज्य‌ आ जाए। गरीबी दूर हो, सबको रोजगार मिले, भष्ट्राचार का अंत हो। सब लोग मिलजुलकर प्यार और शांति के साथ रहे। परोपकार की भावना सबके मन में हो ऐसा आशीर्वाद प्रदान करो माँ। आप तो अंतर्यामी है सब कुछ जानकर भी अनजान बनी हो। भक्तों के संकट दूर करो।

   मुझे आशा ही नही अपितु पूर्ण विश्वास है कि आप दीपावली के महान पावन पर्व पर मेरी अभिलाषा को पूर्ण करेंगे साथ ही आप सब दीपावली की सांयकाल को मेरे घर पधारकर आशीर्वाद प्रदान करे व मेरे परिवार को धन्य करेंगे।

आपसे सादर निवेदन है कि परमपिता परमेश्वर प्रजापति ब्रह्मा जी,क्षीर सागर में विराजित नारायण हरि विष्णु जी व कैलाश पर्वत पर विराजित भोलेनाथ शंकर जी के पावन चरणों व स्वर्ग लोक में विराजित सभी देवगणों को मेरा प्रणाम कह दीजिए।


                                                                   आपका चरणरज
                                                             रिखब चन्द राँका 'कल्पेश'


स्वच्छता एवं प्रकाश का पर्व दीपावली

                  
दीपावली शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के दो शब्दों  दीप अर्थात दीया एवं आवली अर्थात् लाइन या श्रृंखला के मिश्रण से हुई है। दीपावली या दीवाली अर्थात् रोशनी का त्यौहार शरद ऋतु (उत्तरी गोलार्द) में प्रत्येक वर्ष मनाया जाने वाला एक प्राचीन हिंदु त्यौहार है ।भारत में प्राचीन काल से दीवाली को हिंदू कैलेंडर के कार्तिक मास में गर्मी की फसल के बाद एक पर्व के रूप में दर्शाया गया है ।



दीवाली का स्कंद पुराण नामक संस्कृत के ग्रंथ में भी उल्लेख मिलता है:- दीए अर्थात दीपक को स्कंद पुराण के अनुसार सूर्य के हिस्सों का प्रतिनिधित्व करने वाला माना जाता है ।सूर्य जो जीवन के लिए उर्जा और प्रकाश का लौकिक दाता है। उपनिषदों की भी आज्ञा है :-तमसो मा ज्योतिर्गमय अर्थात् अंधेरे से ज्योति और प्रकाश की ओर जाइए । 9 वीं शताब्दी में संस्कृत आचार्य राजशेखर ने अपनी कृति काव्यमीमांसा में इसे दीपमालिका कह कर संबोधित किया है ,जिस समय घरों की पुताई की जाती है और रात में घरों को तेल के दीयों से सजाया जाता है। भारत की यात्रा करने वाले फारसी यात्री और सुप्रसिद्ध इतिहासकार अलबेरूनी ने दीपावली को कार्तिक माह में  चंद्रमा के दिन पर हिंदुओं द्वारा मनाया जाने वाला  पर्व कहां है। भारतीय हिंदू परंपरा के अनुसार अयोध्या नरेश दशरथ के परम प्रिय पुत्र राम के14 वर्ष के बनवास के पश्चात अयोध्या आगमन से कार्तिक मास की सघन काली अमावस्या की रात्रि घी के दीयों की रोशनी से जगमगा उठी ,तब से आज तक भारतीय परंपरा में प्रत्येक वर्ष यह प्रकाश पर्व उल्लास और हर्ष से मनाया जाता है । 

इस पर्व को सिक्ख, जैन और बौद्ध धर्म के लोगों द्वारा भी मनाया जाता है ।जैन धर्म के लोग इसे महावीर के मोक्ष दिवस के रूप में भी मानते हैं तथा सिक्ख धर्म इसे बंदी छोड़ के रूप में मनाया जाता है। दीवाली भारत के सबसे बड़े और प्रतिभाशाली पर्व में से एक माना गया है ।यह पर्व आध्यात्मिक रूप से अंधकार पर प्रकाश की विजय को दर्शाता है। भारतीयों  का अटूट विश्वास है कि सत्य की सदा विजय होती है और झूठ का नाश होता है ।दीवाली ही दर्शोती हैं :-असतो मा सद्गमय ,तमसो मा ज्योतिर्गमय।दीवाली को  स्वच्छता व प्रकाश का प्रतीक माना गया है । दीवाली को आध्यात्मिक रूप से अंधकार पर आंतरिक प्रकाश ,अज्ञान पर ज्ञान, असत्य पर सत्य ,बुराई पर अच्छाई का उत्सव माना गया है और दूसरी तरफ दीवाली का धार्मिक महत्व हिंदू दर्शन ,क्षेत्रीय मिथकों , मान्यताओं और किंवदंतियों पर निर्भर करता है। 

दीवाली को भारत के हिंदू ,सिक्ख, जैन समुदाय के साथ-साथ विशेष रूप से दुनिया भर में भी मनाया जाता है। जैसे:- दीवाली को नेपाल में तिहार के रूप में मनाया जाता है। यह भारत में दीवाली के साथ ही पांच दिन की समयावधि तक मनाया जाता है। मलेशिया में दीवाली का पर्व धार्मिक सद्भावना और धार्मिक जातीय समूहों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंधों का एक अवसर बन गया है। लिटल इंडिया में दीवाली की सजावट सिंगापुर में हिंदुओं के लिए एक विशेष वार्षिक उत्सव है। 

एशिया के परे ऑस्ट्रेलिया के मेलबार्न में भारतीय मूल के लोगों और स्थानीय लोगों के बीच सार्वजनिक रूप से मनाया जाता है ।संयुक्त राज्य अमेरिका के शहरों टैक्सास और सैन एन्टोनियो जैसे शहरों में समारोह का आयोजन किया जाता है। लीसेस्टर ,यूनाइटेड किंगडम सबसे बड़ी दीवाली समारोह के लिए मेजबान की भूमिका निभाता है ।न्यूजीलैंड में दीवाली का पर्व दक्षिण एशियाई  प्रवासी के संस्कृतिक समूहों के बीच एक सार्वजनिक कार्य का काम करता है । इसके अतिरिक्त फिजी और अफ्रीका के   मॉरिशस और  रीयूनियन में भी हिंदुओं द्वारा दीवाली को मनाया जाता है। इस प्रकार अंधकार पर प्रकाश की विजय का यह पर्व भारतीय समाज में ही नहीं ,विदेशों में उल्लास, प्रेम व भाई चारे का संदेश फैलाता है। 

यह त्योहार सामूहिक एवं व्यक्तिगत दोनों तरह से मनाया जाने वाला एक ऐसा विशेष पर्व है ,जो धार्मिक संस्कृतिक एवं समाजिक विशिष्टता रखता है। पर दुनिया के अन्य प्रमुख त्यौहारो के साथ ही दीवाली का पर्यावरण और स्वास्थ्य पर प्रभाव चिंता जननीय हैं क्योंकि इस दिन वायु प्रदूषण और जलने  जैसी घटनाएं देखने को मिलती है। यह बात माननीय है कि दीवाली एक प्रकाश पर्व है ,पर इस दिन हमें कम से कम पटाखों का प्रयोग करना चाहिए ,क्योंकि इससे हम वायु प्रदूषण और कई होने वाली घटनाओं को रोक सकते हैं ,और यह कार्य प्रत्येक सामान्य नागरिक की हाथ में है तभी हम दीवाली को स्वच्छता और प्रकाश का पर्व कह सकते हैं ।।                  

                                      अमित डोगरा, पीएचडी  (शोधार्थी)



19 October 2019

पश्चाताप के आँसू



विनय प्रताप का नया-नया तबादला हुआ था। यह शहर उसके लिए बिल्कुल नया था । दोपहर को चाय पीने के लिए अपने कार्यालय के ठीक सामने वाली रामू टी स्टॉल पर एक कप चाय का आर्डर देने ही वाला था कि उसकी नजर बस स्टॉप की बैंच पर बैठी जानी-पहचानी सी एक बूढी औरत पर चली गई। पास जाकर देखा तो विनय एकदम से पहचान गया।


‘माता जी आप यहाँ कैसे... आगरा घूमने आई हैं? आकाश के साथ आई हैं, कहाँ है वो... क्या कोई सामान लेने गया है?’ एक ही सांस में विनय ने तमाम प्रश्न माताजी से कर डाले। माताजी विनय के सवालों के जवाब देने की वजाय उलटे फूट-फूटकर रो पडीं।

किसी तरह विनय ने माताजी को धैर्य बँधाया और उन्हें अपने साथ घर ले गया। घर पर माताजी ने पूरा घटना क्रम विनय प्रताप को बता दिया। विनय को बड़ा आश्चर्य हुआ कि उसका लंगोटिया यार आकाश इतना गिरा हुआ काम भी कर सकता है। अगले ही दिन माताजी को साथ लेकर विनय अहमदाबाद चला गया।


केन्द्र सरकार का प्रथम श्रेणी आफिसर आकाश अपने बड़े से बंगले के गार्डन में विदेशी कुत्ते से खेल रहा था। तभी उसकी नजर अपनी माँ पर पड़ी। माँ को देखते ही आकाश के पैरों तले जमीन खिसक गई। तालियाँ बजाता हुआ विनय भी सामने आ गया। ‘वाह ! आकाश वाह... लाखों की पगार पाने वाला इतना बड़ा आफीसर अपनी बूढ़ी बेबस, लाचार माँ को मरने के लिए सैकड़ों मील एक अनजान शहर में छोड़ आया। क्या माताजी का खर्च तुम्हारे इस विदेशी नस्ल के कुत्ते से भी अधिक था, जो तुम उठाने में असमर्थ हो गये।’

आकाश को अपनी गलती का एहसास हुआ तो वह अपने किये पर आंसू बहाने लगा, वो कुछ बोलता इससे पहले विनय जा चुका था। आकाश अपनी माँ के चरणों को पश्चाताप के आँसुओं से धो रहा था...।

                                                   - मुकेश कुमार ऋषि वर्मा 


माना बहुत बिखरा हूँ मैं

" मैं अभी खुद से हारा नही"



माना बहुत कुछ खोया है मैंने,
पर में अभी हारा नही।
देख जिंदगी तेरे सितम से,
मैं अभी घबराया नहीं।


आ रहा हूँ दहाड़ देने,
तू जिंदगी रंजिष न कर।
मैं बस थक कर बैठा हूँ,
मैं अभी खुद से हारा नहीं।


माना बहुत बिखरा हूँ मैं,
पर इतना भी टूटा नही।
देख जिंदगी तेरे कहर से,
मैं अभी तक रूठा नहीं।


आ रहा हूँ खुद का वजूद ले कर,
तू जिंदगी इंतजार कर।
मैं बस थक कर बैठा हूँ,
मैं अभी खुद से हारा नही।


माना कोई साथ नही है,
पर खुद का साथ मैंने छोड़ा नहीं।
देख जिंदगी अकेले होकर भी ,
मैंने खुद का वजूद तोड़ा नहीं।


आ रहा हूँ एक जवाब बनकर,
तू जिंदगी स्वागत कर।
मैं बस थक कर बैठा हूँ,
मैं अभी खुद से हारा नही।


                                           ममता मालवीय

रूद्राभिषेक

बलीवर्द हूं...




मुझे कुडें के ढेर पर 
छोड़ दिया 
इस ऋषिओं की 
देवभूमि पर 

जहां मेरे लिये होते थे 
पुरश्चरण
तपोवन में 

चिखते है वो 
मंत्र......
जो मेरे लिये गढित थे।
व्यथित है वो 
ऋचाएं ....
जिसमे मुझे 
उच्चता प्राप्त है..

रोती है वे कविताएं
जहां मुझे 
बहुत आध्यात्मिक 
ठहरा दिया है..।

शिवालय 
जहां मेरे सानिध्य में
होते है रूद्राभिषेक 
वे अचंभित है!

बलीवर्द हूं 
आज बल खो चुका अपना
यांत्रिकता के दौर में!

क्या तथाकथित
पूजित था इस सृष्टि का ?
हमेशा प्रतीक्षा में रहता पूजने की आज 
पाषाण नंदी के समीप 

मैं पार कर चुका हूं
विरह की संपूर्ण सीमाएं
संवेदनहीन मानव की दृष्टि में

आज का विज्ञान
बन बैठा मेरे काल का 
तड़प प्रतीक
तुम्हारे सब के सब प्रतीक रुद्ध हो गये

                                             डॉ नवीन दवे मनावत


उन्मुक्त पंछी

उन्मुक्त पंछी
उन्मुक्त गगन का पंछी हूँ
दूर कही जा
उड़ जाऊंगा।

लेकर तेरी यादों को संग
अंबर की छोर में
जा अकेला
कही छुप जाऊंगा।

ढूंढेंगी तेरी अखियां
तलाश करेगी
तेरे दिल की हर धड़कनें।

पर मैं तेरी
यादों की नाव ले
समुंदर की गहरी ओट में
कही जा छुप जाऊँगा।

तुम ढूंढगे मुझे
टूटी हुई
अपनी हर अनुभूति में।

तुम तलाश करोगें मुझे
बिखरी हुई
अपनी हर अभिव्यक्ति में।

पर मैं तुम्हें मिलूंगा
उस अनंत ईश्वर की
अब छोर में।

क्योंकि तुमने
मुझे छोड़ दिया था
जीवन के हर मोड़ में।


                                      राजीव डोगरा


दीपावली का त्यौहार भारतवर्ष में बहुत ही धूमधाम से मनाया जाने वाला त्यौहार है।



प्राचीन मान्यता के अनुसार जब सतयुग में श्री रामचंद्र 14 वर्ष का वनवास हुआ था। तब अयोध्या वासी बहुत दुखी हो गए थे और चौदह वर्ष के लंबे अंतराल के बाद जब उन्हें प्रभु श्री राम के अपनी नगरी में पुनः आगमन का समाचार प्राप्त हुआ तो सभी बहुत प्रसन्न हुए।


कार्तिक मास की अमावस्या को प्रभु श्री राम ने अपना चौदह वर्ष का वनवास खत्म करके अयोध्या नगरी में प्रवेश किया था।इस खुशी के अवसर पर अयोध्या वासियों ने अयोध्या को दुल्हन की भांति सजाया और घर-घर में दीप दान कर अपनी खुशी को व्यक्त किया। तभी से हर वर्ष कार्तिक मास की अमावस्या को दीपावली का पर्व मनाया जाता है।


यह कथा सतयुग की थी और अभी चल रहा है कलयुग चल रहा है। कलयुग में प्रभु श्री राम को फिर से वनवास मिला है और ये वनवास भारत की अदालतों ने दिया है, जिस की समय सीमा अवधि भी तय नही।
पता नही कब अवधपुरी के लोग अपने श्री राम को पुनः उन की नगरी में देख पाएंगे,क्योंकि अयोध्या जो श्री राम की नगरी है।उस में बावरी मस्जिद और मंदिर निर्माण का झगड़ा समाप्त होने के आसार नही दिख रहे।




जहाँ बीजेपी सरकार 1990 से "राम लाल हम आयेंगे, मंदिर वही बनायेंगे"का नारा सिर्फ और सिर्फ वोट बैंकिंग के लिए लगाती हैं। जब बीजेपी सत्ता में आती है तो सारे वादे दरकिनारे कर दिए जाते है।बेचारी जनता जो वर्षो से अपने प्रभु राम को मंदिर में देखने की आस लिए वोटिंग भी करती और केस की सुनवाई भी होती है। पर फैसला आज तक ना हुआ ना ही होता नजर आता है।


"मिलती है तो सिर्फ तारीख पर तारीख"

इसी आस में कितनी दीपावली निकल गयी, सरकारें आयी और निकल गयी।

पर ना मस्जिद का इंसाफ हुआ, ना मंदिर को न्याय मिला।
कब अयोध्या में फिर से वही दीपावली मनाई जायेगी।।


                                                               संध्या चतुर्वेदी


12 October 2019

एक सवाल अभी बाकी है

"रावण अभी बाकी है"




एक सवाल अभी बाकी है,
एक जवाब अभी बाकी है।
सदियों से रावण जला रहे,
लेकिन उसका पाप अभी बाकी है।


नारी को देखने वाली,
बुरी नजर अभी बाकी है।
अबला पर शक्ति आज़माने वाली,
सोच अभी बाकी है।


पवित्र रिश्तों में ज़हर घोलने वाले,
लोग अभी बाकी है।
मर्द होने पर घमंड करने वाले,
इंसान अभी बाकी है।


कौन कहता है, रावण मर गया,
ज़रा गौर से देखो समाज में,
कितने रावण अभी बाकी है।


एक सवाल अभी बाकी है,
एक जवाब अभी बाकी है।
सदियों से रावण जला रहे,
लेकिन उसका अहंकार अभी बाकी है।


भाई को कपटी कह कर,घर से निकालने वाले,
पाखण्डी अभी बाकी है।
अपने स्वार्थ के लिए,दुश्मन को दोस्त बना ले,
तेरे स्वार्थी अभी बाकी है।


अपनी अर्धागिनी का तिरस्कार करने वाले,
पशुजन अभी बाकी है।
पापी तन औऱ मन से खुद को शिव भक्त कहने वाले,
महामूर्ख अभी बाकी है।


कौन कहता है रावण मार गया,
जरा गौर से देखो समाज मे,
कितने रावण अभी बाकी है।

                                       ममता मालवीय

जंगल की इज्जत




सारा आदिवासी समुदाय फ़ॉरेस्ट ऑफिसर के अत्याचारों से कराह रहा था | वो जब भी जंगल में राउंड मारने आता, तब ही उसे एक नई लड़की चाहिए होती | जंगल की इज्ज़त खतरे में पड़ गई | इस बार उसकी नजर हिरनो पर पड़ी | हिरनो साँवली जरूर थी, पर उसके जैसा सुंदर - भरा हुआ बदन शायद ही पूरे आदिवासी समुदाय की किसी लड़की का हो | उसकी सुंदरता पर लट्टू होकर ही फिल्मनिर्माता रघुवर कपूर ने उसे अपनी आगामी फिल्म ऑफर की थी, परन्तु हिरनो अपना गाँव नहीं छोड़ना चाहती थी और इसी वजह से उसने रघुवर कपूर का ऑफर ठुकरा दिया | खैर रघुवर कपूर अपना प्रोजेक्ट पूरा करके मुंबई चले गये और जाते-जाते अपना कार्ड दे गये, ताकि जब कभी हिरनो का मन फिरे तो वह सीधे मुंबई चली आये | लेकिन हिरनो का मन कभी फिरा नहीं |

देर रात चार-पाँच जल्लाद खाकी पहने, नकाब से चेहरा ढके हिरनो की झोपड़ी में कूद गये और उसे जबरन उठाकर फोरेस्ट ऑफीसर के सामने पटक दिया | सारी रात सरकारी गैस्ट हाउस हिरनो की दर्दभरी चीखों से गूंजता रहा | सुबह उसकी लाश झरने के पानी में तैरती हुई देखी गई... |

पुलिस रिकार्ड के अनुसार, हिरनो जब झरने से पानी लेने गई होगी तब उसका पैर फिसल गया होगा और वो गहरे पानी में चली गई होगी | इसतरह पानी में डूबने से उसकी मृत्यु हो गई | और इसी के साथ हिरनो की फाइल बंद हो गई | न जाने ऐसी कितनी अनगिनत हिरनो सरकारी फाइलों में दबकर दफन हो चुकी हैं | 

लेकिन जंगल की इज्जत के साथ यह खेल आज भी अनवरत चल रहा है और पता नहीं ये कब तक चलता रहेगा... |

                                                       - मुकेश कुमार ऋषि वर्मा 


शरद पूर्णिमा में रास

शरद पूर्णिमा में रास


शरद यामिनी प्रगटे निधिवन
परमानंद गुण अद्वैत गोपाला
शीश मुकुट श्रवण मीन कुंडल
कंठ विभूषित वैजयंती माला 


पीतांबर धारे आभूषण सजीले
कटि पर मधुर किंकिणि चंगी 
नख से शिख सब अति सुंदर
वंशी लिए मुस्काये त्रिभंगी


उन्मुक्त भयीं समस्त ब्रज नारी
स्वामी, कुटुंब, भवन बिसारे
रासभूमि में आईं सखियां
श्याम विरह का क्षोभ निवारे


मुदित मन से नाचें गोपियां
अष्ट सखियां मधुर धुन गावें
श्री राधा झूल रही हिंडोला
कृष्ण अधर धर वेणु बजावें


अति सौम्य शीतलप्रद रात्रि
शरद पूर्णिमा का उज्ज्वल चंदा
दर्शन मदन गोपाल मनोहर
महारास रचाये नंद का नंदा


मोहित तरु तमाल खग धेनु
सखियों के घूंघट-पट छूटे
विस्मित हुआ समग्र शशिमंडल
चौदह भुवन को मोहन लूटे


अधरपान परिरंभन सिंधु
प्रेममग्न सब सखियां सहेली
रति लीला में मस्त हुईं सब
प्रमोद वाटिका में हो रही केली


शिव शंकर वेष धरा गोपी का
हिय प्रेम का ताप उपजावे
कुमकुम, अंजन से सज्जित कर
गोपियां औघड़ शम्भू नचावें


                                              अनुजीत इकबाल


06 October 2019

#अजीब_सी_बात


दोस्तों शायद आपने बहुत सारे अनुभव सुनें और पढ़े होंगे, मगर आज जो मैं आपको बताने जा रहा हूं, वह अनुभव वाकई में सबसे अलग है।




बात मेरे स्कूल के दिनों की है। आपको बता दूं, मैंने सरकारी स्कूल में पढ़ाई की है, जो गांव-ेदेहात में होते है। जहां एक या दो अध्यापक पढ़ाने के लिए आते हैं। लकड़ी के काले पट्टे में मैंने अ आ इ ई उ ऊ सीखें। जिसे हमें बांस की कलम और सफेद मिट्टी से भरा करते थे। शुरू में मुझे मेरीे बड़ी बहनें ले जाया करते थे। मैं 4-5 साल में स्कूल जाना शुरू किया। मगर मेरा नाम 6 साल की आयु में लिखा गया, क्योंकि मैं अपने मां-बाप का पहला बेटा था, जिसके कारण में खूब लाड-प्यार मिला। इसलिए मेरा नाम मेरे दादाजी ने 6 साल की आयु में 1 कक्षा में लिखाया। मेरी 1 से लेकर 5 तक की पढ़ाई गांव के स्कूल में ही हुई। जहां सिर्फ दो अध्यापक थे। जिसमें से एक बहुत ही मारते थे। जिनसे पूरा स्कूल डरता था। 

मैं बचपन में बहुत की तेज और लड़ाकू था। मैं अपने सहपाठियों के साथ खूब मार पीट करता था। वैसे आपको बता दूं, मैं पढ़ाई में साधारण छात्रा रहा हूं, क्योंकि मेरे घर में कोई भी व्यक्ति पढ़ा-लिखा नहीं था। हां मेरी बहनें मेरे से बड़ी जरूरी थी। मगर दो-तीन कक्षाएं जिन्हें भी खुद मेहनत करनी पढ़ती थी। घर में मम्मी और हम अकेले हुआ करते थे। पापा पहले नौकरी करते थे बाद में खेती-बाड़ी। पापा के नौकरी के चलते घर में मम्मी अकेली हुआ करती थी। जो हमें भी संभालती थी और घर का कारोबार भी, जिसमें गाय और भैंस भी शामिल थे। 

एक बात हैं- मैंने और मेरे भाई-बहनों ने खूब देसी दही-दूध खाया है। मेरी मम्मी की एक आदात थी, उसने कभी भी दूध और दही बेचा नहीं। जब पापा नौकरी से घर आते थे, तो हम सब डर के मारे चुप-चाप रहते थे। सिर्फ बड़ी बहन बोलती थी। पापा पूरे गांव के बच्चों को डांटते थे, जो आज भी जारी है।

मैंने अपने पापा से बहुत कुछ सीखा- जैसे बोलना, खाना, पहनना आदि। पापा समझाते थे और मैं उसे अपने दिमाग में भर लेता था। मैंने बहुत प्रयास किये अपने पापा को समझने की, मगर बोलते है ना बाप बाप ही होता है और बेटा बेटा ही होता है। चाहे बेटा कितना ही क्यों ना पढ़ ले मां-बाप की बराबरी और उनकी कर्ज नहीं उतार सकता है।

हां पापा पढ़ना लिखना जानते थे, मगर वो नौकरी पर रहते, जिसके कारण हमें घर में कोई पढ़ाने वाला नहीं था। मम्मी सिर्फ किताब खोलने के लिए बोलती थी, जब हम भाई-बहन किताब खोलते तो खूब लड़ाई झगड़ा हुआ करता था। अगर साफ शब्दों में बोलो तो रोज कोई ना कोई रोता था। जिसमें कभी-कभी मैं भी शामिल रहता था। वहीं स्कूल जाते समय भी यही हाल हुआ करता था। किसी दिन सीसा टूटता था तो किसी दिन रोते हुए स्कूल जाते थे। आज भी उन दिनों को याद कर बहुत हंसता हूं। मगर एक बात हैं- मम्मी से डर बहुत लगता था। जब वो मारती थी।

 एक बार मैं अपने ताऊ जी के बेटे यानि अपने बड़े भाई के साथ स्कूल की छूट्टी कर मेला जाने के लिए तैयार हुआ। मम्मी से पूछा तो मम्मी ने साफ-साफ माना कर दिया मेले में जाने के लिए, मगर मैं अपनी जिद में था, तो जाने लगा, फिर क्या मम्मी ने इतना मारा की मैं बेहोश हो गया और 1 घंटे बाद होश आया। उस दिन एक और शपथ ली कि आज से वो काम नहीं करने हैं, जो घर वालों को परेशानी में डालें और उन्हें अपमानित करें।

यानि मम्मी की मार मेरे लिए एक सीख बनी। मेरी मम्मी मेरे छोटे भाई को बहुत प्यार करती हैं। मैं अपने दादाजी से बहुत ज्यादा प्यार करता था- करता हूं और करता रहूंगा। मगर मेरे दादा जी मुझे अकेला छोड़ चले गए है। दादाजी आप मेरे आदर्श हो और रहोंगे।

एक दिन की बात है- स्कूल में फ्रीस जमा करनी थी, मगर मम्मी के पास पैसे नहीं थे। बड़ी बहन चिल्ला रही थी फ्रीस के लिए और हम भी। चाचा ताऊ से बोला पैसे है तो दे दो। मगर उनके पास भी उस दिन नहीं थे। वो भी मजदूरी करते थे। इसलिए उनके पास भी हमेशा पैसे नहीं रहते थे। उन दिन मुझे एहसास हुआ- हमारी क्या औकात है और हम कितने पानी में है। धन-दौलत से कुछ नहीं होता, आपके पास सही दिमाग और शिक्षा होनी चाहिए। तभी तुम अपने आप को कामयाब और एक सही मार्ग पर ले जा सकते हो।

वैसे मेरा घर गांव-जंगल क्षेत्र में है। जहां कभी-कभी बारिश आंधी तूफान से तबाही आ सकती है। मगर इसके अलावा कोई डर नहीं है। अगर सीधा कहें तो स्वर्ग है। मेरी मम्मी पढ़ना लिखना नहीं जानती थी, मगर उसकी परवरिश साफ और ईमानदार थी। उसने हमें गलत संगती और माहौल में जाने रोक और डरा-डरा कर पढ़ाया। जिसके चलते आज मैं सोशल मीडिया में अपनी बात आप लोगों तक साझा कर पा रहा हूं। मैं अपनी मम्मी का कर्ज कभी भी नहीं उतार सकता, क्योंकि उसने जिस संघर्षों से हमें पाला-पौछा हैं, शायद ही किसी और की मम्मी ने साहा होगा।

अपने स्कूल के एक अध्यापक जी की बात साझा कर रहा हूं, जो मुझे नहीं करनी चाहिए, मगर क्या करूं मजबूर हूं- हमारे स्कूल के अध्यापक जी जो बहुत ही कमाल के थे- जब कोई बच्चा उनके पास शिकायत लेकर जाता था , तो वो गजब का जवाब देते थे। जैसे हम बोलते थे- अध्यापक जी वो सुरेश मुझे मार रहा है, तो वो बोलते थे- तुम उसे पीट दो। मतलब हर समय इस तरह के जवाब उनके पास तैयार रहते थे।

एक बात तो साफ है- बचपन में बांस की कलम से लकड़ी के पट्टे में अ आ इ ई लिखने का अपना ही मजा है। जो आज बहुत ही कम बच्चे शायद ही लिखते होंगे।

आगे और भी अपने जीवन के कुछ अनुभवों के कुछ अजीब सी बातें आपके साथ साझा करता रहूंगा।

                                                          ।।दीपक कोहली।।