साहित्य चक्र

27 February 2017

सरकार की एक और पहल

                


जी हां... अब सड़कों पर विवश बच्चों की देखभाल के लिए सरकार ने एक और ठोस कदम उठाया है। 'मानव संचालन प्रक्रिया' जिसका उद्देश्य सड़कों पर जीवन यापन करने वालों का पुर्नवास करना है। महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने 21 फरवरी 2017 को इस पहल की पेश की। इस पहल का मकसद सड़कों में जीवन जी रहे बच्चों को संरक्षण देना हैं। जहां इस पहल को कई लोगों द्वारा सहारा गया हैं। 

वहीं सरकार मानव संचालन प्रक्रिया के जरिए उन बच्चों को संरक्षण के साथ एक नया आयाम देना चाहेगी। जो सड़क के किनारे बच्चों को गोद में लेकर घूमा करते है। इस पहल का मकसद उन बच्चों को शिक्षा, सुरक्षा के साथ-साथ स्वास्थ्य सेवाएं भी देना है। जिन सेवाओं से वो लोग वछिंत रहते हैं। ये लोग सड़कों के किनारे अपना जीवन जीने को मजबूर है। क्योंकि ना तो इनके पास कोई घर है, ना कोई इन्हें काम देना चाहता हैं। क्योंकि हम जैसे लोग इन लोगों से घृणा करते हैं। जो हमारे लिए कलंक है। सरकार की इस पहल में कोई सहारे या नहीं लेकिन मैं जरूर सहरूंगा। 

इस पहल के माध्यम से सरकार जो करना चाहती है, वह बेहद ही बेहतर है। लेकिन एक सवाल मन में जरूर उठ जाता है। क्या यह पहल कागजों में ही होगी या फिर जमीनी स्तर पर भी होगी। वैसे मैं इस पहल के लिए मेनका गाँधी की तारीफ करूंगा। जिन्होंने इस पहल को पेश कर सरकार के सम्मुख रखा। 

आखिरकार सरकार ने भी इस पहल को सहारा। वहीं सरकार भी चाहेगी, इस पहल के माध्यम से सबसे पहले इन लोगों को मूलभूत सुविधाएं दी जाए। जिससे इस पहल के माध्यम से सरकार हर बच्चे की खुशहाली का सपना देख सकती हैं। जो आने वाले देश के भविष्य है। वहीं आने वाला समय ही बता पाएगा यह पहल कितनी कारगर साबित हुई। पहल तो कई किए जाते है, लेकिन उन पर जमीनी स्तर पर काम देखने को नहीं मिलता है। जो हमारे देश की सबसे बड़ी कमजोरी है। सरकार कई पहल करती है और कई नियम बनाती है, लेकिन उन पर असल में काम नहीं होता है। 


              संपादक- दीपक कोहली      


25 February 2017

मैं तेरी राधा, तू मेरा श्याम...।


मैंने तुझको बना लिया श्याम,
मैं तेरी राधा, तू मेरा घनश्याम।।

विंदावन की गलियों में नाचे तू,
मथुरा की खिड़की से देखूं मैं।।

हाथों में बंसी, कानों में कुंडल, 
मयूर संग नाचे तू अपने मंडल ।।

सिर पर मुकुट, चेहरे पर हंसी,
गायों के साथ खेले तू रस्सी।।

मैं तेरी राधा, तू मेरा श्याम...।

                 कवि- दीपक कोहली 

#ना सच हम, ना सच तुम#

                     



ना सच हम, ना सच तुम

जिए तो क्या जिए...?

ये दुनिया है बड़ी झूठी।।



                                   ना सच गुरु, ना सच ब्रह्मा

                                   पूजें तो क्या पूजें...?

                                   ये दुनिया है बड़ी झूठी।।


ना सच प्रेम, ना सच प्यार 

करे तो क्या करे...?

ये दुनिया है बड़ी झूठी।।


                                      ना सच मीठा, ना सच खट्टा

                                       चखें तो क्या चखें...?

                                       ये दुनिया है बड़ी झूठी।।


ना सच हम, ना सच तुम...।।


                                                          कवि- दीपक कोहली


  विलुप्त होती, हमारी बोली..।

मारा देश विभिन्न संस्कृतियों और भाषाओं का देश माना जाता हैं। यहां हर राज्य की अपनी - अपनी संस्कृति और अपनी - अपनी बोलियां हैं। जिसमें हमारा उत्तराखंड ( देवभूमि ) भी है। जो अपनी संस्कृति के लिए पूरे भारतवर्ष में जाना जाता है। वहीं आज हमारे देश की कई भाषाएं विलुप्त होती दिख रही हैं। जिसमें हमारी उत्तराखंड की भी कई भाषाएं शामिल हैं। आइये आपको बताते है। हमारे उत्तराखंड में कितनी बोलियां (भाषाएं) बोली जाती हैं। सन् 1906 से लेकर 1927 तक चले 'जार्ज गियर्सन'  की रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखंड में कुल 13 भाषाएं बोली जाती हैं। जिसमें गढ़वाली, कुमाऊंनी, जौनसारी, जौनपुरी, जौहारी, रवाल्टी, बांगडी, माच्छार, राज़ी, जाड़, रंग ल्वू, बुकसाणी, थाल हैं। जो उत्तराखंड की कई स्थानों में बोली जाती हैं। जिसमें कुमांऊनी  और गढ़वाली उत्तराखंड की प्रमुख भाषा हैं। कुमांऊनी भाषा कुमांऊ मंडल तो गढ़वाली भाषा गढ़नवाल मंडल में ज्यादा बोली जाती हैं।  

आज उत्तराखंड में हिंदी और अंग्रेजी के बढ़ते प्रभाव से कुमांऊनी और गढ़वाली भाषा विलुप्त होती जा रही हैं। जो वहां की संस्कृति के लिए एक विशाल खतरा है। वैसे कुमांऊनी और गढ़वाली भाषा हिंदी की सहायक भाषा है। वैसे आपको बता दूं, कि कुमांऊनी भाषा देश की   325 मान्यता प्राप्त भाषा हैं। जो आज विलुप्त होने की कगार पर है। कुमांऊनी भाषा देवनागरी लिपि की भाषा है। जो देवनागरी में लिखी जाती है। वहीं यूनेस्को की एक रिपोर्ट के अनुसार इन भाषाओं को संरक्षण की जरूरत है। जिसका मुख्य कारण लोगों में सोशल मीडिया और आधुनिक होना है। वहीं कुछ विशेषज्ञ का कहना है, कि जिसका एक कारण पलायन भी है। क्योंकि रोजगार की कमी के कारण यहां के युवा बड़े शहरों की ओर भाग रहे है। जिससे उन्हें अपनी भाषा छोड़ अंग्रेजी, हिंदी आदि भाषा अपनानी पड़ती हैं। जो यह दर्शाती है, मजबूर होकर लोग अपनी भाषा छोड़ रहे हैं। अगर उत्तराखंड को अपनी ये भाषाएं बचाई रखनी है, तो यहाँ के युवाओं को आगे आना होगा। जिससे यहां के युवाओं को एक नया जोश मिलेगा। वैसे केंद्र सरकार को भी इस विषय में सोच-विचार करने की जरूरत है। अगर ऐसा ही चलता रहा तो, ये सब भाषाएं विलुप्त हो जाएंगी। जिससे हमारी संस्कृति में असर पड़ेगा। हम आधुनिकता के चलते अपनी संस्कृति होते जा रहे है। जो हमारे समाज के लिए कलंक साबित हो रहा है। क्यों हम अपनी संस्कृति छोड़े या खोए..?

                                       संपादक- दीपक कोहली       


20 February 2017

देश के प्रथम राष्ट्रपति & बिहार का लाल प्रसाद

                           

                         

बिहार वो भूमि है, जिसने देश को प्रथम राष्ट्रपति दिया। जी हॉं.. हमारे देश के प्रथम राष्ट्रपति बिहार के ही थे। जिनका जन्म 3 दिसंबर 1884 में बिहार के जीरादेई गांव में हुआ। जो महादेव सहाय के छोटे पुत्र थे। बिहार ने हमारे देश को कई लाल दिए है, जिनमें से एक डॉ. राजेंद्र प्रसाद भी हैं। आइए आपको डॉ. प्रसाद के कुछ तथ्यों से अवगत कराते है। डॉ, प्रसाद बढ़े ही शांत सभाव के थे। जिनकी प्रांरभिक शिक्षा उनकी जन्म भूमि जीरादेई में हुई। जब डॉ. प्रसाद 12 साल के थे, तो उनकी शादी उनके पिता ने कर दी। उस समय डॉ. प्रसाद कक्षा पांच में पढ़ते थे। जब उनकी शादी राजवंशी देवी से हुई। जिसके बाद डॉ. प्रसाद पढाई के लिए कोलकाता चले गए। 1902 में उन्होंने कोलकत्ता के प्रेसिडेंसी कॉलेज में प्रवेश लिया। इसके बाद उन्होंने 1915 में मास्टर डिग्री पूरी की, जिसके लिए उन्हें गोल्ड मेडल से सम्मानित किया गया। इसके बाद डॉ. प्रसाद ने कानून में डॉक्टेरट की उपाधि ली। जिसके बाद डॉ. प्रसाद वकालत करने लगे। सन् 1917 में डॉ, प्रसाद, महात्मा गांधी से मिले। जिसके पश्चात उनकी विचार धारा प्रभावित हुई। 1919 में पूरे देश में सविनय आन्दोल की लहर चली। जिसमें स्कूलों, सरकारी कार्यालयों का बहिष्कार किया गया। जिसके बाद डॉ. प्रसाद ने नौकरी छोड़ने का फैसला लिया। 1931 में डॉ. प्रसाद को मुंबई काग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में डॉ. प्रसाद ने भाम लिया। डॉ. प्रसाद भारतीय सविंधान सभा के अध्यक्ष भी रहे थे। 

राष्ट्रपति बनने से पहले डॉ. प्रसाद एक मेधावी छात्र, जाने-माने वकिल, संपादक, आंदोलनकारी, आदि  के रूप में पहचाने जाते थे। डॉ. प्रसाद दो सप्ताहिक पत्रिका निकाला करते थे। जिसमें एक अंग्रेजी, तो एक हिंदी में प्रकाशित होती थी। जिनका नाम - 1) देश, 2) सर्चलाइट था। 26 जनवरी 1950 में देश को डॉ. राजेंद्र प्रसाद के रूप में एक राष्ट्रपति मिला। जो 1962 तक इस सर्वोच्च पद पर विराजमान रहे। 1961 में डॉ, प्रसाद गंभीर बीमार पड़े, जिसके बाद 1962 में डॉ. प्रसाद ने राष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे दिया। वहीं सन् 1962 में उन्हें भारत रत्न से नवाजा गया था। डॉ. प्रसाद को दयालु & निर्मल स्वभाव के जाना जाता है। इनकी छवि भारतीय इतिहास में एक महान विनम्र राजनेता के तौर पर होती है। डॉ. प्रसाद ही वो व्यक्ति थे जिन्होंने सन् 2 जून 1954 में भारत रत्न की शुरूआत की। सन् 1921 से 1941 के दौरान राजनीति सक्रियता के दिनों डॉ. प्रसाद बिहार के विद्या पीठ भवन में रहे। जिसे अब डॉ. राजेंद्र प्रसाद संग्रहालय बना दिया गया है। डॉ. प्रसाद को गांधी और बोस के बीच मतभेद दूर कराने के लिए भी जाना जाता है। वहीं सन् 1934 में बिहार भूंकप से पीड़ित लोगों के लिए रिलीफ फंड जमा करने में प्रसाद का अहम योगदान रहा था। डॉ. प्रसाद दमा के मरीज थे। जिसके चलते 28 फरवरी 1963 में प्रसाद की मृत्यु हो गई।  

                      तब भारत ने एक महान नायक को खो दिया।। जय हिंद जय भारत..।।

   संपादक- दीपक कोहली


नामाज़ या सलाह

नमाज़ का अर्थ  "सलाह का पर्याय" होता है। सलाह को ही नामाज़ कहा जाता है। नमाज़ इस्लाम की पवित्र कुरान शरीफ में बार-बार आया एक शब्द है। जो मुसलमान को इसे पढ़ने का आदेश देता है। वैसे नमाज़ एक प्रकार से हिंदूओं की पूजा-पाठ की तरह है। जिस तरह हिंदूओं में पूजा-पाठ करना जरूरी माना जाता है, ठीक उसी तरह इस्लाम में नमाज़ अदा करना जरूरी है। नमाज़ पढ़ना मुसलमानों के लिए बहुत बड़ा कर्तव्य है। आज मैं आपको इस्लाम में नमाज़ की क्या भूमिका है या नमाज़ क्यों पढ़ी जाती है...?  नमाज़ किस तरह अदा की जाती है। कितने तरीके की नमाज़ होती है..?  हर वो तथ्यों से मैं आपको रूबरू कराऊंगा। आखिररकार इन तथ्यों को जानना भी चाहिए। जो हमारे समाज के लिए बेहद जरूरी है। 

वैसे नमाज़ पांच प्रकार की होती है। जो इस प्रकार है-

1) नमाज़-ए-फजर - जिसे (उषाकाल की नमाज़) भी कहते है। जो सूर्य उदय से पहले पढ़ी जाती है। 

2) नमाज़-ए-जुह्ल - जिसे ( अवनति काल की नमाज़) भी कहते है। जो मध्याह सूर्य के ढ़लना शुरू करने के बाद पढ़ी जाती है। 

3) नमाज़-ए-अस्र- जिसे ( दिवसावसान की नमाज़) भी कहते है। जो सूर्य अस्त होने से पहले पढ़ी जाती है।

4) नमाज़-ए-मगरिब - जिसे ( पश्चिम की नमाज़) भी कहते है। जो सूर्यास्त के तुरंत बाद पढ़ी जाती है।

5) नमाज़-ए-अशा - जिसे ( रात्रि की नमाज़ ) भी कहते है। जो सूर्यास्त के डेढ़ घंटे बाद पढ़ी जाती है।

अब आपको नमाज़ पढ़ने से पहले क्या किया जाता है। उन तथ्यों से अवगत कराता हूं। 

नमाज़ पढ़ने से पहले प्रत्येक नमाज़ अदा करने वाले व्यक्ति को (अर्धस्नान) बुजू यानि बाजू तक हाथ धोना, धुटने तक पैर धोना, पूरा मुख धोना, नाक साफ करना, आदि।

वहीं अगर नमाज़ किसी मस्जिद में हो रही हो तो अजॉं भी दी जाती है। अब आप सोच रहे होंगे अजॉं क्या होती है। अजॉं एक उर्दू शब्द है जिसका अर्थ पुकार होता है। यानि आवाज देना, या संदेश देना। अजॉं नमाज  पढ़ने से पहले 15 मिनट दी जाती है। अजॉं इसलिए दी जाती है, ताकि मस्जिद के आस-पास या जहां तक आवाज जा रही हो, वहां के मुसलमान नमाज़ के लिए मस्जिद आ सके जिससे वो नमाज़ अदा कर सके। अजॉं मुसलमानों के लिए एक प्रकार की सूचना है। जो ये बताती है कि, मुसलमान लोग नमाज़ के लिए मस्जिद आए। नमाज़ में एक और खास बात ये है कि, नमाज में कुरान का पहला बाब पढ़ना आवश्यक माना जाता है। वैसे नमाज़ दो रकअतों में पढ़ी जाती है, कभी कभी चार रकअतों में भी पढ़ी जाती है। कुरान के अनुसार पांच बार की नमाज अदा करना, किसी पांच पवित्र नदियों का दर्शन द्वार है। प्रतिदिन पांच नमाज़ों के सिवा शुक्रवार को एक जुम्मअ की नमाज होती है। जिसे पढ़ने से पहले एक भाषण दिया जाता है। वहीं दूसरी नमाज़ ईदुलफित्र के दिन यानि ईद के दिन पढ़ी जाती है। एक और नमाज़ के बारे में आपको बता दूं, जब कोई मुसलमान मार जाता है तो उसे नहला कर श्वेत वस्त्र (कफन) में ढक कर मस्जिद ले जाया जाता है। वहां सब लोग एक लाइन में खड़े हो जाते है। जिसके बाद मृतक व्यक्ति की आत्मा के लिए नमाज अदा की जाती है। जिसके बाद मृतक का अंतिम संस्कार किया जाता है। अगर नमाज को देखा जाए तो पूजा-पाठ की तरह इस्लाम में इसे जगह दी गई है। जो हमें ये बताती है कि धर्म अलग-अलग हो सकते है। लेकिन ईश्वर एक ही है। चाहे राम कहलो या फिर अल्ला कह लो।।

          संपादक- दीपक कोहली  

*मुरली वाला*



मां देवकी ने जन्म दिया, 
मां यशोदा ने पला-पोसा।।

कभी माखन चोर कहलाया,
कभी गोपियाों का दिवाना।।

कभी हाथों में बंसुरी तो,
कभी सिर में मयूर पंख ।।

काल कोठरी में जन्म तेरा,
विन्दावन में खेला तूने।।

कभी मीरा, तो कभी राधा हुई,
तेरे नाम की दिवानी ।।

कहीं माखन चोर तो,
कहीं मुरली वाला नाम तेरा।।

              कवि- दीपक कोहली 

17 February 2017

आज का साहित्य बाजार-

 आज का साहित्य बाजार-


अगर किसी देश की संस्कृति और सभ्यता जाननी हो तो, वहां का साहित्य एक बार जरूर पढ़े। क्योंकि साहित्य से हम किसी भी देश की संस्कृति जान सकते है।  वहीं अगर आपने किसी देश का रहन-सहन, वातावरण के बारे में जानना हो तो, आप वहां के साहित्य से जान सकते है। साहित्य ही एक ऐसा माध्यम है, जिसके द्वारा हम किसी भी देश के बारे में जान सकते है। वहीं अगर आज की साहित्य की बात करें तो, आज का साहित्य कहीं खो सा जा रहा है। जिसका मुख्य कारण सोशल मीडिया को माना जा रहा है। इसका कारण यह है, कि आजकल के युवा या कहे लोगों में साहित्य के प्रति रुचि नहीं है। आजकल के युवा या लोग इंटरनेट, मोबाइल आदि का प्रयोग ज्यादा कर रहे है। जिससे उनमें साहित्य के प्रति कोई लगाव देखने को नहीं मिलता। जो हमारे समाज के लिए चिंता का विषय है। जहां एक समय था जब साहित्य से विचार, संस्कार पैदा किए जाते थे। आज वहीं साहित्य संघर्ष कर रहा है। अगर बात करे साहित्य की तो, एक कोरे कागज (बच्चा) के लिए साहित्य का ज्ञान बेहद ही जरूरी है। जिस तरह मनुष्य के लिए खाना जरूरी होता है, ठीक उसी तरह एक कोरे कागज (बच्चा) के लिए साहित्य का ज्ञान होना जरूरी होता है। साहित्य के बिना ये एक शिष्य की जीवन अधूरा है। आज के बच्चों में पुस्तकों के प्रति रुचि घटती जा रही है। जो ये दर्शाता है कि हमारे आने वाले भविष्य की पीढ़ी को साहित्य का ज्ञान नहीं होगा। वैसे बच्चों को देश का भविष्य भी माना जाता हैं। एक समय था जब हमारे समाज में साहित्य की मजबूत पकड़ थी। वहीं आज बिना इंटरनेट से कुछ नहीं हो पा रहा है। एक ऐसा टाइम था, जब घर-घर में न्यूज़ पेपर आ करता था। वहीं आज के टाइम में लोग अख़बार मोबाइल पर ही पढ़ रहे है। या कहे सकते है कि लोगों के जेब में पूरा साहित्य है। वैसे यह भी कहा जाता है कि अख़बार पढ़ने से साहित्य की समझ बढ़ती है। अगर हम बात करें बाल साहित्य की तो, आज का बाल साहित्य में कोई रुचि नहीं रखता। जिससे हमारी बाल साहित्य खतरे में दिखाई देती है। जिसके लिए हमारे साहित्यकारों को कुछ परिवर्तन लाने की जरूरत है। जिससे हमारे बाल साहित्य की ओर आकर्षित हो। साहित्य ही असली ज्ञान की प्राप्त है। साहित्य को बाजार में एक नया रूप देना होगा। जिससे हमारी साहित्य बरकरार रह सके। मैं अपनी नई पीढ़ी से आशा करूगां कि वो इस लेख को पढ़ने के बाद साहित्य की ओर अपना ध्यान जरूर लगाएगें। जिससे हमारा साहित्य हमारे समाज में बरकरार रहे या बना रहे।।

                                         संपादक- दीपक कोहली          

16 February 2017

सोमेश्वर की 51- विधानसभा

                                     सोमेश्वर की 51- विधानसभा


जी हॉं... आज मैं बात करूगां। उत्तराखंड की सोमेश्वर विधानसभा सीट की। जो एक आरक्षित सीट है। वैसे इस सीट पर ज्यादा दबदबा किसी भी एक पार्टी का नहीं रहा है। अगर पिछले पंद्रह सालों में नज़र डालें तो, इस 
सीट पर टम्टा परिवार का कब्जा था। उत्तराखंड बनने के बाद साल 2002 में यहां पहला विधानसभा चुनाव हुआ। जिसमें इस सीट से कांग्रेस प्रत्याशी प्रदीप टम्टा विधायक चुने गए। इसके बाद साल 2007 में दूसरे विधानसभा चुनाव हुए। जिसमें बीजेपी प्रत्याशी अजय टम्टा विधायक चुने गए। वहीं साल 2009 में कांग्रेस प्रत्याशी प्रदीप टम्टा लोकसभा सीट से सांसद चुने गए। जिसके बाद ये सीट औऱ भी रोमांचक हो गई। क्योंकि जहां कांग्रेस के पास विधायक के लिए कोई नामी चहेरा सामने नहीं था तो वहीं बीजेपी प्रत्याशी अजय टम्टा लोकसभा चुनाव हार गए। जिससे बीजेपी के लिए 2012 के विधानसभा चुनाव और आसान हो गया। क्योंकि कांग्रेस के पास 2012 में कोई नामी चेहरा नहीं था। साल 2012 में सोमेश्वर विधानसभा सीट से एक बार फिर बीजेपी प्रत्याशी अजय टम्टा को शानदार जीत मिली।
असली खेल तो तब शुरू हुआ जब 2014 में लोकसभा चुनाव हुए। क्योंकि यहां बीजेपी के पास कोई उम्मीदवार नहीं था। उसे विधायक अजय टम्टा को ही यहां से एक बार फिर लोकसभा टिकट देना पड़ा। जिसमें मोदी की लहर के साथ अजय टम्टा यहां भी जीत गए। बड़ी बात तो ये थी कि उनके विरुद्ध कांग्रेस के सबसे नामी नेता प्रदीप टम्टा थे। जिन्हें हार का मुंह देखना पड़ा। वहीं एक बार फिर सोमेश्वर विधानसभा सीट खाली हो गई।
क्योंकि विधायक अजय टम्टा सांसद बन गए, जिसके चलते ये सीट खाली हो गई। इस बार यह खेल और भी रोमांचक हो गया। क्योंकि एक ओर कांग्रेस के नामी नेता प्रदीप टम्टा ने चुनाव लड़ने से मना कर दिया। वहीं बीजेपी में भी कोई नामी चेहरा नहीं था। तो दूसरी ओर बीजेपी प्रत्याशी अजय टम्टा सांसद बन चुके थे। ना कांग्रेस के पास कोई चेहरा था, ना बीजेपी के पास कोई बड़ा चेहरा। आखिर करे तो क्या करें, जिस सीट में टम्टा परिवार का दबदबा हुआ करता था। वह सीट खाली थी। खेल का असली मजा तब शुरू हुआ, जब 2012 की निर्दलीय विधानसभा प्रत्याशी  रेखा आर्या को कांग्रेस से टिकट दिया गया। इसे पहले रेखा बीजेपी की ओर जाती दिखी थी, लेकिन बीजेपी ने उन्हें टिकट देने से इनकार कर दिया। जिसके बाद रेखा ने कांग्रेस से 2014 का उप विधानसभा लड़ा। जिसमें उन्हें भारी मतों से जीत मिली थी। वहीं बीजेपी ने अपने पुराने कार्यकर्ता मोहन राम आर्या पर विश्वास जताया। जिसमें मोहन राम आर्या जनता का विश्वास नहीं जीत पाए। वहीं एक बार फिर इस सीट को लेकर काफी कयास लगाए गए। जहां एक ओर कांग्रेस प्रत्याशी रेखा आर्या ने कांग्रेस से बगावत कर, बीजेपी शामिल हो गई। जिससे कांग्रेस में टिकट को लेकर चिंता की लहर दौड़ और एक बार फिर राजेंद्र बाराकोटी को बलि का बकरा बनाया गया। वहीं बीजेपी ने रेखा को टिकट देकर बीजेपी के कर्यकर्ताओं में फूट जरूर पाड़ दी। क्योंकि रेखा इससे पहले कांग्रेस से चुनाव लड़ चुकी है। जिससे ये साफ होता है कि रेखा एक दलबदलू या बागी नेता है। वैसे रेखा आर्या सोमेश्वर की रनमन क्षेत्र से है। इससे पहले रेखा आर्या जिला पंचायत सदस्य भी रह चुकी है। जिसके बाद 2012 में रेखा ने सोमेश्वर विधानसभा सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ा जिसमें वो हार गई। लेकिन खास बात ये रही कि निर्दलीय चुनाव लड़ने के बाद भी रेखा दूसरे स्थान पर रही। जिससे ये साबित होता है कि रेखा ने लोगों में किस तरह अपनी पहचान बनाई। लेकिन यह एक बड़ा सवाल भी खड़ा करता है। आखिरकार कोई अपनी पहचान इतनी जल्दी कैसे बना सकता है..? वैसे रेखा अपने पति और चुनाव प्रचार में पैसों को लेकर काफी सुर्खियों में रही है। रेखा के पति  गिरधारी लाल उर्फ शाहू यूपी का एक हिस्ट्रीशटर है। जिनके ऊपर कई केस दर्ज हैं। जिसमें एक केस ये भी है कि उन्होंने कई लोगों की जमीन अवैध तरीके से बेची हैं। वैसे रेखा के पति मुरादाबाद के रहने वाले है। वहीं नैनीताल, सोमेश्वर, रुद्रपुर, हल्द्वानी, में करोड़ो की जमीन रेखा के नाम है, साथ ही तीन गाड़िया और एक किलो जेवरात भी है। जो ये बताते है कि आखिर एक सामान्य परिवार की बेटी इतना कैसे कमा सकती है। जो 2012 से पहले कुछ करती ही नहीं थी। बस एक बार जिला पंचायत सदस्य जरुर रही। आखिर सवाल ये उठते है कि एक जिला पंचायत सदस्य या फिर एक विधायक जो ढ़ाई साल रहा हो, वह इतना कहा से कमा लेता है। ये सोचने वाली बात जरूर है। आखिरकार हम भी इस देश के नागरिक है। हमारे पास भी जानने का पूरा अधिकार है। हम भी आजाद है।

                                   संपादक- दीपक कोहली     

       
           







11 February 2017

देश के युवा पोर्न साइट के शिकार

                                   
            
                                
जकल के युवाओं में पोर्न साइटों को लेकर कई सवाल उठते है। इसी को लेकर देश के विद्वानों ने अपनी - अपनी सोच आम लोगों तक तो पहुंचा दी। लेकिन फिर भी युवाओं में पोर्न देखने का क्रेज कम नहीं हुआ है। वहीं हमारी सरकार इन चीजों पर कानून तो बनाती है लेकिन उन पर कोई अमल नहीं करता है। वैसे हमारे देश में शराब बेचना कानून है लेकिन शराब पीना गैरकानूनी हैं। जो ये दर्शाता है  कि हमारे देश का कानून कितना लचीला है। यहीं नियम इन साइटों पर भी लागू होता हैं। वैसे हमारे देश में सेक्स को लेकर कई बातें सामने आती है। जहां एक ओर पढ़े लिखे लोग इसे कानूनन सही मानते है, तो वहीं गांव देहात क्षेत्रों में इसे गलत माना जाता है। अगर देखा जाए तो पोर्न देखना कोई गैरकानूनी नहीं है। क्योंकि हम 21वीं सदीं और पश्चिमी देशों की संस्कृति अपना रहे है। जहां पोर्न खुले आम देखी जाती है। वहीं अगर पश्चिमी देशों की बात करें तो वहां पोर्न देखना कोई अपराध नहीं है। वैसे पोर्न साइट तो आप जानते ही होंगे, अगर नहीं जानते तो आप भी जान लीजिए। पोर्न साइटों के माध्यम से आप गंदी मूवी & सेक्स के बारे में जानकारी ले सकते है। आखिर जानकारी लेनी भी चाहिए। ये हमारा अधिकार है। वैसे हमारे देश के युवाओं को पोर्न देखने की बीमारी लगी है। पिछले कुछ सर्वों के अनुसार हमारे देश में पोर्न मूवी सबसे ज्यादा देखी जा रही है। जो ये दर्शाता है कि हमारे देश में सेक्स को लेकर आज भी लोगों में एक अलग सोच है। इस मुद्दे पर सरकार ने कई फैसले लेने की सोच, लेकिन आज तक इन पर कोई काम नहीं हो पाया। वैसे कुछ लोगों का मानना है कि पोर्न साइटों पर बैन लगाना आटिर्कल 21 का हनन है। जिसमें राइट टू पर्सनल लिबर्टी की बात की गई है। जिससे आप किसी को कुछ करने से नहीं रोक सकते है।  
वैसे अगर  इंटरनेट पर कुल साइटों की बात करें तो, 37 प्रतिशत साइटें पोर्न मूवीयों की है। जो युवाओं के लिए एक रोज से बढ़कर है।  वहीं "एवस्ट्रीम टेक" के अनुसार पूरे विश्व के इंटरनेट में देखी जाने वाली साइटों में 30 % पोर्न साइटें देखी जाती हैं। जिससे ये साफ हो जाता है कि पूरा विश्व पोर्न साइटों का जमकर इस्तेमाल करता हैं। वैसे अगर भारत की बात करें तो, सेक्स को लेकर लोगों की अलग-अलग मानसिकता हैं। वहीं अगर युवाओं की बात करें तो आज हमारे देश के युवा पश्चिमी सभ्यता के प्रति ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। जिससे रेप, छेड़छाड़ जैसे केस बढ़ने लगे हैं। वहीं अगर देश की महिलाओं की बात करें तो चार पुरूषों के मुकाबले एक महिला पोर्न साइट का इस्तेमाल करती है। जिससे यह साबित होता है कि हमारे देश की महिलाएं भी पोर्न साइट का खूब प्रयोग करती है। वहीं आजकल लिविंग रिलेशनशिप में रहने का भी खूब फैशन चल रहा है। जो इन चीजों को बढ़ावा देता है। एक तरफ हम अपनी संस्कृति की बात करते है तो दूसरी तरफ हम आधुनिक बनते जा रहे है। जिससे हमारी संस्कृति खोती जा रही है। जिससे हम पश्चिमी फैशन के शिकार होते जा रहे है।
वैसे अगर सरकार इस पर कोई कदम उठाना चाहे तो कोई गलत नहीं होगा। क्योंकि हाल ही के दिनों में पीएम मोदी ने नोटबंदी जैसा कदम उठाकर पूरी दुनिया को चौका दिया था। ठीक उसी तरह अगर सरकार चाहे तो इन पोर्न साइटों पर बैन लगा सकती है। जिनसे 18 साल से छोटे नवयुवाओं पर बुरा असर पड़ रहा हैं। सरकार इन पोर्न साइटों को महंगी करे या फिर login के जरिए एक पहचान के माध्यम से इन्हें देखने की इजाजत दें। जिससे 18 साल से छोटे नवयुवा इनके शिकार न हो। हमें भी अपनी मानसिकता बदलने की जरूरत हैं। हमें अपने बच्चों को सेक्स से संबंधित जानकारियां देनी होंगी। जिससे उन्हें इन चीजों की नॉलेज मिल सके और जिससे वो समझ पाएं, कि आखिर सेक्स क्या होता है। जिससे हमारे देश के नवयुवाओं की मानसिकता बदलेगी। जिसका फायदा देश को होगा, जिससे देश में रेप, छेड़छाड़ जैसी घटनाओं पर रोक लगेगी।
वैसे हमें भी इन चीजों के बारे में खुलकर बात करनी चाहिए। जिससे हमारे समाज में एक नई सोच पैदा हो सके। आखिर हमारा देश पोर्न देखने में क्यों सबसे आगे है..? इस बारे में हमारी सरकार को कुछ सोचा चाहिए और कुछ नये कानून या शिक्षा के माध्यम से जागरुकता फैलानी चाहिए।।

                                                                        संपादक- दीपक कोहली      

   



      

07 February 2017

- गांधी परिवार के दो लाल -

                         - गांधी परिवार के दो लाल -
              
                            
गांधी परिवार की बात सामने आते ही गांधी परिवार के दो लाल याद आते है। एक कांंग्रेस के लाल है तो दूसरे बीजेपी के सांसद है। जी हां... मैं राहुल गांधी और वरुण गांधी की बात कर रहा हूं। ये गांधी परिवार के वो सपूत है। जिन्हें देश का बच्चा - बच्चा जानता हैं। इन्हें गांधी परिवार का भविष्य कहा जाए तो गलत नहीं होगा। वैसे देश की जनता इन्हें गांधी परिवार की वजह से जानती हैं। क्योंकि इनकी दादी देश की प्रधानमंत्री रही है। चाहे वह राहुल हो या फिर वरुण गांधी ही क्यों ना हो। वैसे हमारे देश में गांधी परिवार का एक अहम रोल रहा है। चाहे वह आजादी की बात हो या फिर देश को दो भागों में बॉंटने की। हर जगह गांधी परिवार अपनी मौजूदगी देखता आया है। ऐसे में आज गांधी परिवार का वर्चस्व खतरे में है। जिसे देखकर ये लगता है कि देश गांधी परिवार के चुगल से निकल रहा है। वहीं एक ओर कांग्रेस की नैया डूबने में लगी है, तो दूसरी ओर राहुल अपना कद बढ़ाने में लगे है। वहीं अगर बात करे वरुण गांधी की तो उनका बीजेपी में कोई वर्चस्व दिखता नज़र नहीं आता। वैसे इस गांधी परिवार को हर देशवासी जाता है। कोई इसे महात्मा गांधी के नाम से जानता है, तो कोई इसे इंदरा गांधी के नाम से आज भी जाता है। वैसे अगर बात की जाए तो गांधी परिवार की नई पीढ़ी कि, तो अभी तक दोनों सपूतों में से कोई भी देश की राजनीति में ज्यादा प्रभाव नहीं छोड़ पाए हैं। जिससे ये साबित होता है, कि गांधी परिवार का दबदबा खत्म - सा हो रहा है। जहां एक ओऱ राहुल गांधी कांग्रेस की साख बचाने मेंं लगे है, तो वहीं वरुण गांधी अपनी एक अगल पहचान बनाने में लेगे है। वैसे वरुण गांधी को संजय गांधी की तरह समझा जाता है। वरुण गांधी कदम उठाने में विश्वास रखते है। ना की राजनीति करके उसे मुद्दा बनाते है। वहीं अगर राहुल की बात की जाए तो, राहुल को जबर्दस्ती राजनीति में लाया गया है। आखिर गांधी परिवार का दबदबा क्यों कम होता जा रहा है। क्या गांधी परिवार के इन दो लालों को राजनीति करनी नहीं आती है। या फिर देश की जनता गांधी परिवार का पूरा सच जान चुकी है। जो भी हो लेकिन इतना जरूर कह सकते है कि देश में गांधी परिवार का वर्चस्व बरकरार रहेगा। चाहे देश का प्रधानमंत्री गांधी परिवार से ना बने। लेकिन देश की राजनीति में उनका वर्चस्व लगातार बरकरार रहेगा। यह मेरा कहना नहीं है, यह तो देश की राजनीति का कहना है। वैसे आपको बता दूं कि राहुल गांधी और वरुण गांधी के पिता भाई थे। लेकिन आप सोच रहे होगे कि राहुल गांधी कांग्रेस के उपाध्यक्ष है, तो वरुण गांधी बीजेपी से सांसद क्यों..? इसके भी कई मायने है। जिस पर मैं बात नहीं करना चाहता। जहां एक ओर राहुल गांधी को कांग्रेस भविष्य का पीएम उम्मीदवार मानती है। वहीं अगर वरुण गाँधी की बात करें तो उनका कोई वर्चस्व बीजेपी में दिखता नजर नहीं आता। जिससे ये कयास लगाए जा रहे है, कि वरुण कहीं कांग्रेस में शामिल न हो जाए। अगर ऐसा होता है, तो यह गाँधी परिवार के लिए एक संजीवनी बूंटी से कम नहीं होगी। वैसे गांधी परिवार भी ये चाहेगा कि अगर दोनों सपूतों कांग्रेस पार्टी को आगे बढ़ाने में लगे तो बुरा नहीं होगा। जिससे घर की पार्टी में एक नया जोश और जज्बा देखने को मिल सकता है। इंद्रा गांधी के समय में भी गांधी परिवार के सपूतों ने कांग्रेस पार्टी को एक नया आयाम दिया था। जिसे आज भी याद किया जाता है। अब देखने वाली बात ये रहेगी, कि देश की राजनीति में गांधी परिवार के ये सपूत कितने कामयाब होते हैं। ये तो समय ही बताएगां ।
गाँधी परिवार के इन पुत्रों के लिए मैं इतना ही कह सकता हूं, कि ये राजनीति है इसमें कोई किसी का नहीं होता।
बस राजनीति करते जाओ और सीखते जाओ। तब दांव खेलो...।।

                                                                        संपादक-  दीपक कोहली  

     




         
     

03 February 2017

देवभूमि का दिव्यलोक कैंची धाम

                             देवभूमि का दिव्यलोक कैंची धाम




कैंची धाम कहे या नीम करोली बाबा कहे तो गलत नहीं होगा। कैंची धाम उत्तराखंड के नैनीताल जिले के भवाली-अल्मोड़ा-रानीखेत मोर्टर मार्ग पर 
 स्थित है। इसे देवभूमि का दिव्यलोक भी कहा जाता है। ये धाम पूरे विश्व में लोक प्रसिद्ध है। वैसे यहां हनुमान जी का विशाल मंदिर है। लेकिन ये धाम फिर भी यहां के नीम करोली बाबा के नाम से जाना जाता है। आपको बता दूं इस धाम के बारे में कई रोचक कथाएं प्रसिद्ध है। इसी में से एक कथा ये भी बताई जाती है। इस मंदिर में 1962 में नीम करोली बाबा ने अपने कदम रखे थे। जिन्होंने यहां कई लीलाएं रचीं। जो लीलाएं आज लोकप्रसिद्ध है। आपको बता दूं कि, यहां के नीम करोली बाबा हर हमेशा एक कंबल ओढ़ा करते थे। नीम बाबा ने अपने जीवन काल में 108 हनुमान मंदिरों का निर्माण करवाया था। नीम करोली बाबा हनुमान भक्त थे। इस मंदिर का नाम कैंची धाम इस लिए पड़ा क्योंकि यहां पर सड़क कैंची कि तरह कटी हुई है। जिसके चलते यहां के लोगों ने इसे कैंची धाम नाम दे दिया। धीरे धीरे ये नाम आज लोक प्रसिद्ध हो गया। इतना ही नहीं इस मंदिर में दुनिया के हर कोने से श्रदालु दर्शन के लिए आते हैं। पिछले कुछ साल पहले यहां FACEBOOK के CEO मार्क जुकेरबर्ग भी आए थे। इस बात की पुष्टि खुद मार्क जुकेरबर्ग ने की है। कैंची धाम कोसी नदी के किनारे पर बसा है। यहां का वातावरण स्वर्ग का आभास कराता है। वैसे होने को तो उत्तराखंड के हर कर्ण में स्वर्ग का आभास होता है। कैंची धाम अपने आप में एक अलग ही महिमा को दर्शाता है। यहां के लोगों का इस धाम के बारे में कुछ अलग ही मान्यता है। यहां के लोग बाबा नीम करोली को ही अपना ईश्वर मानते है। उन्हीं के भरोसे अपना जीवनयापन करते है। यह स्थान उत्तराखंड की विभिन्न पर्यटन स्थलों में से एक है। वैसे यह मंदिर दिखने में तो बहुत ही सुंदर है। मैं आप लोगों से एक बार जरूर कहूंगा, कि आप भी इस मंदिर में दर्शन के लिए एक बार जरूर आए और अपने दिल को स्वर्ग का आभास जरूर कराएं। इस मंदिर के बारे जानने की कोशिश भी करें। यह मंदिर दिव्यलोक कहा जाता है। दुनिया के कई हस्तियां यहां दर्शन के लिए आ चुके है। कहीं आप न रह जाए। आइए एक बार मेरी देवभूमि के दर्शन तो करिए। वैसे बाबा करोली को हनुमान का रूप भी माना जाता है।  

 बाबा नीम करोली की जय हो.......।। 




                                     संपादक- दीपक कोहली 




  




02 February 2017

हिटलर की हकीकत


                

हिटलर को तो आप जानते ही होंगे। हिटलर का पूरा नाम एडोल्फ हिटलर था। हिटलर का जर्मनी के इतिहास में वहीं स्थान है जो फ्रांस में नेपोलियन बोनाबार्ट का, इटली में मुसोनली, तुर्की में मुस्तफा कमालशापा का था। इसी प्रकार मैं आज आपको तानाशाही हिटलर के बारे में कुछ तथ्यों से अवगत कराऊंगा। जो आपने कभी सुनी ही नहीं होंगी। क्या आपको पता है तानाशाह हिटलर की जिंदगी कैसी थी। हर एक वो तथ्य, मैं आपके सामने रखूंगा। आखिर हिटलर की जिंदगी कैसी थी। 
हिटलर आज भी अपने तानाशाह के लिए पूरे विश्व में जाना जाता है। हिटलर यहूदियों पर अत्याचार की बारिश करने वाला भयानक मानवहित का हन्न करने वाला एक दुष्ट व्यक्ति था। हिटलर का जन्म 20 अप्रैल 1889 में ऑस्ट्रिया के वियेना में हुआ था। वैसे बचपन में हिटलर पादरी बनना चाहता था। लेकिन भाग्य ने साथ नहीं दिया। आर्थिक तंगी के कारण हिटलर अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पाए। जिसके कारण हिटलर अच्छी शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाए। वैसे ये भी माना जाता है कि जब हिटलर अपनी मां क्लारा हिटलर के गर्भ में थे तो उनकी मां गर्भपात करना चाहती थी। लेकिन बाद में कुछ डॉक्टरों की सलाह से नहीं करवाया। हिटलर जर्मनी सेना का एक सिपाही था। जिसने प्रथम विश्न युद्ध में जर्मनी का प्रतिनिधित्व किया था। हिटलर वहीं घायल सिपाही है जिसे ब्रिटिश सेना ने विश्न युद्ध के दौरान बक्श दिया था। वैसे हिटलर ने फ्रांस में कई लड़ाइयों में भाग लिया था। लेकिन जर्मनी युद्ध नहीं जीत सकीं। जिसके बाद हिटलर सेना छोड़ चले आये थे। प्रथम विश्न युद्ध के बाद जहां एक ओर तानाशी प्रकृति का उदय हुआ तो वहीं दूसरी ओर जर्मनी में हिटलर के नेतृत्व में नाजी दल की स्थापना हुई। जिसके बाद जर्मनी में हिटलर का उदय हुआ। हिटलर को उनके भाषणों के लिए भी जाना जाता है क्योंकि वो अपने भाषणों से लोगों का दिल जीत लेते थे। वैसे हिटलर के बारे में ये भी कहा जाता है कि हिटलर अपनी जुबांन की ताकत से जर्मनी की सत्ता में बैठा था। हिटलर अपने भाषणों में यहूदियों के विरोध भड़काऊ बयान दिया करते थे। जिससे जर्मन जनता उनसे बहुत खुश होती थी। वहीं हिटलर के बारे में ये भी कहा जाता है कि उनके पास एक ही अंडाणुकोष था। जिसके कारण हिटलर कभी बाप नहीं बन पाया। हिटलर अपनी सेक्स पावर बढाने के लिए बैलों के वीर्य से बने इंजेक्शन का इस्तेमाल किया करता था। हिटलर आधुनिक इतिहास का वह व्यक्ति है जिसने धूम्रपान का विरोध किया था। वह नहीं चाहता था कि दुनिया धूम्रपान से ग्रस्त हो। हिटलर ने अपनी पुस्तक "माइक कम्फ" में अपने संघर्षों के बारे में विस्तार से बताया है। हिटलर एक सामान्य परिवार से संबंध रखता था। जिसके बाद भी 1933 में हिटलर जर्मनी का चांसलर बन बैठा। हिटलर के शासक में ही यहूदियों का कत्लेआम करवाया जाता था। हिटलर को 1938 में Time Magazine का Man of The Year का खिताब दिया गया था। वैसे हिटलर के बारे में यह भी कहा जाता है कि हिटलर को चॉकलेट बहुत ही पंसद थे। वह एक दिन में एक किलो चॉकलेट खाता था। हिटलर यहूदियों पर अत्याचार करने के लिए पूरे विश्व में जाना जाता है। हिटलर का पहला प्यार एक यहूदी लड़की ही थी। लेकिन हिटलर कभी उसका इझहार नहीं कर सका। सन् 1939 में हिटलर का नाम शांति नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया था। वैसे हिटलर चार्ली चैपियन का बहुत बड़ा फैंस था। हिटलर चार्ली की तरह मूछें रखता था और चार्ली की मूछें पर मरता था। हिटलर की मूछों को टूथब्रश मूछें भी कहा जाता था। हिटलर हर प्रकार का नशा करता था और ड्रग्स का आदि था।
वैसे हिटलर के बारे में ये भी कहा जाता है कि हिटलर इतना बड़ा तानाशाह होने के बाद भी एक शुद्धशाकाहारी था। जर्मनी के एकीकरण में हिटलर का अहम रोल रहा था। हिटलर ने जर्मनी को एक अलग रूप दिया था। जर्मनी के इतिहास में हिटलर का नाम हर हमेशा जिंदा रहेगा। वहीं विश्व के इतिहास में जब जब तानाशाह शासकों की बात होगी, तो हिटलर का नाम भी उस लिस्ट में जरूर होगा।    


                                          संपादक - दीपक कोहली