साहित्य चक्र

30 December 2022

कविताः मत वहन करो



मत वहन करो मेरे विचार को
मुझे भी नहीं चाहिए
तुमसे अलंकार के भूषण।

मत वहन करो मेरी वाणी को
मुझे भी नहीं चाहिए
तुमसे छंदों के बंधन।

मत वहन करो मेरे अंतर्द्वंद को
मुझे भी नहीं चाहिए
तुमसे परिछंदों के द्वंद।

मत वहन करो मेरे अंत:वेगों को
मुझे भी नहीं चाहिए
तुमसे रागों की रागनी।

मत वहन करो
मेरे हृदय तल की असवादों  को
मुझे भी नहीं चाहिए
तुम्हारे रसों से उत्पन्न रसायन।

                        - राजीव डोगरा



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