साहित्य चक्र

11 March 2026

लेख- परमात्मा का इंतज़ाम



रोज़ाना की तरह ही आज़ भी मैं कई बार पार्सल डिलीवरी के लिए घोड़ा बाबा मंदिर के पास से गुजरा। शाम से ही हल्का-सा ध्यान ज़रूर था कि मंदिर के पास सड़क पर तकरीबन 13-14 साल की उम्र के दो लड़के लगातार मौजूद रहकर कुछ कर रहे हैं। लेकिन मैंने इस बात को उतनी गंभीरता से नहीं लिया था। शाम के करीब पौने आठ बजे होंगे। मैं आज़ की सातवीं पार्सल डिलीवरी लेकर तेज़ी से चित्रगुप्त कॉलोनी की ओर जा रहा था। चूंकि चित्रगुप्त कॉलोनी के लिए रॉन्ग साइड से होकर ही सर्विस लेन पर रास्ता कटता था सो मैं घोड़ा बाबा मंदिर की ओर बने सर्विस लेन पर ही जाना उचित समझा। अभी सरपट मंदिर के पास से गुजर ही रहा था कि अचानक आवाज़ आई-"भैया-भैया ! रुकिए !





चूंकि मैं जल्दबाजी में था इसलिए बिना रुके आगे बढ़ गया। कुछ ही दूर गया था कि मन में कुछ खटका। शाम से ही ये बच्चे आखिर यहां कर क्या रहे हैं ? क्या आते-जाते राहगीरों से कुछ मांग रहे हैं ? शाम से लेकर अबतक वहीं पर हैं तो क्या अबतक किसी राहगीर ने उनकी बात नहीं सुनी होगी ? क्या वे बच्चे भूखे हैं ? कौन हैं,क्या हैं एक क्षण में अनगिनत प्रश्न दिल में उमड़ पड़े। अचानक मैंने अपनी असमंजस तोड़ते हुए क्लीयर कट तय किया कि भले ही आज़ और डिलीवरी नहीं करूंगा। लेकिन अभी का पार्सल डिलीवर करने के बाद तुरंत लौटकर उन बच्चों से मिलकर बातें करूंगा। वैसे भी आज़ लगभग चार सौ रुपए आ चुके हैं तो और ना भी हो तो कोई बात नहीं।

घोड़ा बाबा मंदिर के पास ही एक छोटा-सा रेस्टोरेंट है-"बेरोजगार ढाबा"। मैं अक्सर वहां अपनी फैमिली के साथ आया करता हूं। पूरे शहर में सबसे अच्छी और सस्ती बिरयानी यहीं मिलती है। मैं फैसला कर चुका था कि आज़ की शाम,उन दो बच्चों के नाम। आज़ उन्हीं के साथ बिरयानी पार्टी होगी। पार्सल डिलीवर करने के बाद मैं उल्लासित होकर तेज़ी से घोड़ा बाबा मंदिर की ओर चल पड़ा। दिल के किसी कोने में यह भी बातें चल रही थीं कि क्या वे बच्चे सचमुच बेसहारा हैं ? क्या उनके मां-बाप गैर ज़िम्मेदार हैं इसलिए वे इतनी रात सड़क पर भटक रहे हैं ? या मां-बाप हैं भी या नहीं ?






फिर मन के अपराध को वहीं पर रोकते हुए अगले ही पल तय किया कि मुझे ये सब कुछ नहीं सोचना है। कौन,क्या, कैसे भाड़ में जाए। आज़ बिरयानी पार्टी होकर रहेगी उन बच्चों के साथ। महज़ 180 रुपए में तीनों खा लेंगे। इतने रुपए तो न जाने कितने उड़ जाते हैं अक्सर। इन्हीं ख्यालों में खोया जैसे ही मैं मंदिर के पास पहुंचा, बच्चे नदारद। रात के लगभग नौ बज रहे थे।

उन बच्चों को न देखकर मेरा सारा उल्लास काफूर हो गया। मैं अंदर ही अंदर बेचैन हो उठा कि काश ! जाते वक्त ही थोड़ा-सा रुककर बातें कर लेता और उनसे दस मिनट वहीं इंतज़ार करने कहता। मुझे खुद पर बेतहाशा गुस्सा आ रहा था और दमभर खुद को कोस भी रहा था। ब्लॉक गेट से लेकर टीचर ट्रेनिंग मोड़ तक मैं उन बच्चों की तलाश में लगभग चार-पांच राउंड मारा। पर वो बच्चे कहीं नज़र नहीं आए।

शाय़द अपने घर चले गए होंगे या उनका जहां ठिकाना है वहीं चले गए होंगे। मैं भारी मन से वापस स्टोर की ओर चल पड़ा। मन में कसक ज़रूर थी कि उन बच्चों को कुछ खिला नहीं पाया। लेकिन मुझे हमेशा से एक तथ्य का भान है कि परमात्मा सबकुछ पहले से तय रखते हैं। वे सबके लिए ज़रूरत के हिसाब से इंतज़ाम करके रखते हैं। वो माध्यम क्या होगा ये बस वही जानते हैं और इसकी अनुभूति मैंने अपने जीवन में अनगिनत बार किया है।

मेरी भावना सकारात्मक ज़रूर थी लेकिन मुझे परमात्मा पर पूरा भरोसा है कि शायद वो आज़ उन बच्चों का इंतजाम मेरे हाथों नहीं कराना चाहते होंगे, कोई बात नहीं नेक्स्ट टाइम मौका न चूकूं इसका ध्यान रखने की कोशिश करूंगा। लेकिन हां ! उनकी व्यवस्था किसी के हाथों ज़रूर करा दिए होंगे इतना मुझे परमात्मा के इंतज़ाम पर संपूर्ण विश्वास है। बस इसी तसल्ली के साथ वापस अपने काम पर लग गया।


-कुणाल




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