साहित्य चक्र

29 December 2021

उत्तराखंड की गेठी या गेंठी

उत्तराखंड में 2000 मीटर तक ऊँचाई वाले क्षेत्रों में गेठी कई बेल पाई जाती है। गेठी एक बेल वाला पौधा है। इसको के इंग्लिश में Air Potato के नाम से जाना जाता है। पहाड़ो में बरसात के समापन के समय अर्थात अक्टूबर और नवंबर में एक विशेष सब्जी जो लताओं में लगती है। आलू के आकार की होती है। इसे पहाड़ी भाषा में गेठी की सब्जी बोलते हैं। कंद रूप की यह सब्जी गर्म तासीर और औषधीय गुणों से युक्त होती है।




गेठी का प्रयोग मुख्यतः सब्जी के रूप में किया जाता है। इसका स्वाद आलू की अपेक्षा थोड़ा कसैला होता है। उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में पहाड़ी लोग गेठी इकट्ठा करके रख लेते हैं। शरद ऋतु में इसको उबाल कर सब्जी या सलाद के रूप में प्रयोग करते हैं। ठंड के मौसम में इसका प्रयोग बहुत लाभदायक होता है। पहाड़ी लोग इसका गर्म राख में पका कर सेवन करते हैं। इसे खांसी की अचूक औषधि माना जाता है। अगर आपको इसकी सब्जी खानी हो तो आपको उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में जाना होगा।


27 December 2021

महान लेखक अमीर खुसरो जी की 18 पहेलियाँ






























































पढ़िए 26 दिसंबर 2021 की टॉप-10 कविताएँ



पहली कविता



दूसरी कविता



तीसरी कविता


चौथी कविता




पांचवी कविता




छठी कविता




सातवीं कविता



आठवीं कविता




नौवीं कविता




दसवीं कविता



18 December 2021

शनिवार 18 दिसंबर 2021 की टॉप-5 कविताएँ

पहली



दूसरी



तीसरी



चौथी



पांचवी





17 December 2021

कविताः राम भजन




श्रीराम के चरण में चलो,
सियाराम के शरण में चलो।

श्रीराम हैं मुक्तिदाता,
माता जानकी है भाग्यविधाता।
ऐसे प्रभु के चरण में चलो,
सियाराम के शरण में चलो।

जिनके सुमिरन से जीवन तर जाता,
जिनके आशीष से सौभाग्य मिल जाता।
ऐसे प्रभु के चरण में चलो,
सियाराम के शरण में चलो।

श्रीराम दुलारे हैं,
अपने भक्तों के रखवाले हैं।
माता जानकी प्यारी है, 
सुख-समृद्धि देने वाली है।
ऐसे प्रभु के चरण में चलो,
सियाराम के शरण में चलो।

कौशल्या के आँखों के तारें,
दशरथ नंदन राम दुलारे।
जिन्होंने रावण संहारा है,
जन संताप निवारा है।
ऐसे प्रभु के चरण में चलो,
सियाराम के शरण में चलो।

जिसने प्रभु श्रीराम को पुकारा है,
श्रीराम ने उसे भवसागर से तारा है।
ऐसे प्रभु के चरण में चलो,
सियाराम के शरण में चलो।

ये है मेरी नई कृति,
सियाराम के चरणों में समर्पित।
जय श्रीराम, जय -जय राम,
जय-जय राम,जय श्रीराम।
   
                                कुमकुम कुमारी 'काव्याकृति'


कविताः रात






रात हुई भई रात हुई ।
दिन हो गया ज्यूँ छुई मुई ।।

रात हुई अंधेरा साथ लाई ।
आसमान में तारों की बारात आई ।।

टिमटिम- टिमटिम तारे चमके ।
गिनते- गिनते आँखें झपके ।।

छोटे- छोटे झुरमुट से तारे ।
कुछ पगडंडी जैसे लगते तारे ।।

सबसे बड़ा  चमकीला तारा ।
उत्तर दिशा में दिखता धुरतारा।।

अलगअलग समय कुछ दिखते तारे ।
सप्त ऋषिमण्डल कीर्ति कुछ तारे।।

तारे देख दादी-नानी समय बताती ।
रात जाते-जाते तारे साथ ले जाती ।।
       

                           मईनुदीन कोहरी नाचीज़ बीकानेरी




19 September 2021

कण-कण से किस्मत लिखना


धरती के कण-कण से  
तू अपनी किस्मत लिखना 
मेहनत की डगर पर 
यू ही.. तू बढ़ता जाना 

हवा का रूख बदलने की
तू कोशिश मत करना 
भाग्य का भरोसा मत करना 
आज जो साँसे हैं... 

उन साँसों का भी 
भरोसा मत करना 
यू तो जिंदगी कट जाऐगी... 
कटने से पहले ! 
धरती के कण - कण से 
तू अपनी किस्मत लिखना 

                                              मणिकान्त 


14 September 2021

कविताः हिंदी अपनाएं


भारत माता के माथे की ,
बिंदी है यह हिंदी।

हिंदी में बसने वालों वीरो,
 आओ एक अभियान चलाएं।

आओ हिंदी को अपनाकर ,
भारत मां का मान बढ़ाएं।

हिंदी के गौरव के खातिर ,
आओ एक परिवार बनाएं।

जीवन में अपना के हिंदी ,
देश का मान बढ़ाएं।

बच्चे ,युवा हम सब मिलकर, 
घर-घर में हिंदी पहुंचाएं।

हिंदी है संस्कार की जननी ,
हम इसकी अलख जगह।

हिंदी हमारी मातृभाषा,
आओ हम सब मिलकर,
अपनी मांँ को अपनाएं।


                                       डॉ. माधवी मिश्रा "शुचि"



12 September 2021

रतनगढ़ का रहस्यमयी इतिहास

रतनगढ़ की राजकुमारी को हासिल करने की नियत से कर डाली थी उनके सात भाईयों की हत्या फिर भी उन्हें कभी ना पा सका।


अलाउद्दीन ख़िलजी मानव के रूप में एक बहशी दरिंदा राक्षस था।करीब चार सौ साल पुरानी घटना है जब मुस्लिम तानाशाह अलाउद्दीन खिलजी ने, पारस पत्थर जो किसी भी धातु को सोने में बदल देने की रहस्यमयी शक्ति रखता था, उस अद्भुत पत्थर को पाने के लालच में मध्यप्रदेश की पावनभूमि पर जगह-जगह आक्रमण करने शुरू किए और इसी बीच उसे रतनगढ़ की राजकुमारी की सुंदरता के विषय में सुनने को मिला। बस इतना सुनते ही वासना के भूखे उस दरिंदें ने उस राजकुमारी को हर कीमत पर हासिल करने की योजना बनायी और सेंवढ़ा से रतनगढ़ में आने वाला पानी बंद कर दिया तो राजा रतन सिंह की बेटी मांडुला व उनके भाई कुंअर गंगाराम देव ने इसका मुखर विरोध किया। 


बस इसी बहाने क्रूर अल्लाउद्दीन ख़िलजी ने रतनगढ़ किले पर अपनी पूरी सेना के साथ हमला कर दिया और उस भयावह युद्ध में राजकुमारी मांडुला के 6 भाइयों की बड़ी ही बेरहमी से हत्या करके जैसे ही वह महल की तरफ बढ़ा तो मांडुला के सबसे छोटे 7वें भाई ने कहा, 'हम पीठ नहीं दिखा सकते हम लड़ेगें।' यह सुनते रोते हुए मांडुला ने अपने भाई को तिलक लगाकर युद्ध विजय को भेजा पर जहां पहुंच कर सांतवा भाई उस ख़िलजी की सेना पर मौत बन टूट पड़ा और अनेकों सैनिकों को कीड़े-मकोड़े की तरह मरता देख ख़िलजी के इशारे पर उनका युद्ध से ध्यान भटकाने वास्ते उनपर कई जहरीले नाग फिंकवा दिये गये पर कुँवर साहब के दिव्य तेज के सामने सब नाग नतमस्तक, किसी नाग ने उन्हें नहीं काटा। 


यह देख खिलजी ने कुँवर सिंह के पीठ पर वार करके बड़े ही मक्कारी से षड्यंत्र के तहत मार दिया। सांतवे भाई को भी क्रूरतापूर्ण तरीके से मारने की यह खबर कुछ विश्वासपात्र सैनिकों ने अपनी जान पर खेल कर उनकतक पहुंचायी। इधर क्रूर खिलजी यह  सोचने लगा कि अब वह जीत गया तुंरत महल में घुस कर अपना ख्वाब पूरा करेगा। 


इतने मैं ही राजकुमारी ने जैसे ही यह बुरी खबर सुनी तो वह वहीं किले के पीछे पहाड़ों पर जाकर चीखीं कि हे! धरती माँ यदि मैं पूरी तरह पवित्र हूँ और हम सब अपनी मातृभूमि के लिए लड़े हैं और अगर मैं तेरी सच्ची भक्त हूँ तो हे! धरती माँ, मुझे अपनी गोद में स्थान दो। और तभी वहां पहाड़ों में विवर उठा यानि गहरा गड्डा हो जाना/धरती फटी और राजकुमारी उसी में समां गयी। 


यह सब देखकर ख़िलजी बौखला गया और सिर पीटता हुआ वहां से लौटा जिसमें उसके भी बड़ी संख्या में लोग मारे जा चुके थे। बता दें कि मुसलमानों से युद्ध का स्मारक हजीरा पास में ही बना हुआ है। हजीरा उस स्थान को कहते हैं जहां हजार से अधिक मुसलमान एक साथ दफनाये गये हों। विन्सेण्ट स्मिथ ने इस देवगढ़ का उल्लेख किया है जो ग्वालियर से दस मील की दूरी पर है। युद्ध में मारे जाने वाले राजकुमार का चबूतरा भी यहां बना हुआ है जिसे कुंवर साहब का चबूतरा कहा जाता है।


कुँवर जी लोकदेवता के रूप में विख्यात- बुन्देलखण्ड के प्रायः प्रत्येक गांव में, गांव के बाहर अथवा भीतर एक चबूतरे पर दो ईंटें रखी रहती हैं जिन्हें कुंवर साहब का चबूतरा कहा जाता है। इन्हें जनमानस में लोक देवता के रुप में प्रतिष्ठा प्राप्त है। सामान्य व्यक्तियों को इनके सम्बन्ध में केवल इतना ही बात है कि ये कोई राजपुत्र थे। अनेक स्थानों पर बहुत प्राचीन सर्प के रुप में भी ये दिखाई देते हैं। उस समय एक दूध का कटोरा रख देने से ये अदृश्य हो जाते हैं। ऐसा लोगों का विश्वास है।


यह गांव नहीं दुर्ग है- यह जगह कोई गांव नहीं है बल्कि मध्यप्रदेश के दतिया जिला के सेंवढ़ा से आठ मील दक्षिण पश्चिम की ओर रतनगढ़ नामक एक स्थान है। यहां एक ऊंची पहाड़ी पर दुर्ग के अवशेष मिलते हैं। दुर्ग सम्पूर्ण पत्थर का रहा होगा, जिसकी दीवारों की मोटाई बारह फीट के लगभग है। यह पहाड़ी तीन ओर से सिन्धु नदी की धारा से सुरक्षित है। इसी विचार से यह दुर्ग बनाया गया होगा। यहां उस पहाड़ी पर एक देवी का मंदिर बना हुआ है जिसे रतनगढ़ की माता के नाम से जाना जाता है।


रहस्य- जब राजकुमारी विवर में समां गयीं तब से यह जगह बहुत विरान हुआ करती थी पर एक दिन ऐसा हुआ कि जंगल में घूमते कुछ लोगों को सांप ने काट लिया। तो वहां कुछ लोगों ने मिलकर बंध लगाया और राजकुमारी व उनके सांतवे भाई का नाम आन देकर वह बंध लगा दिया कि अब वह उसे अस्पताल ले जा सकते हैं पर तभी रहस्यमयी घटना घटी कि वह लोग प्राकृतिक रूप से इकदम स्वस्थ हो गये। तबही से वहां सांप कटे लोगों को राजकुमारी व कुँवर जी के नाम से बंध लगाने का काम शुरू हुआ और भीड़ जुटने लगी तो भक्ति भाव से सराबोर लोगों ने राजकुमारी को अपनी माता मानकर उनका सुन्दर मंदिर बनवा दिया और यह मंदिर रतनगढ़ की माता के नाम से पूरे देश में प्रसिद्ध हुआ। आज वर्षभर 25 लाख से ज्यादा श्रद्धालु रतनगढ़ वाली माता के दर्शनों को आते हैं और माता उनकी मुरादें पूरी करतीं हैं।


मंदिर में है सबसे बड़ा घण्टा- रतनगढ़ माता के मंदिर पर देश का सबसे वजनी घंटा (ध्वनि-यंत्र) है। विशेष पूजा अर्चना के बीच मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सपत्नीक (साधना सिंह) इस घंटे को अर्पित किया। यह अनूठा एवं आकर्षक घंटा लगभग 21 क्विंटल वजनी है। देश के किसी भी मंदिर में स्थापित यह सबसे बड़ा घंटा बताया जा रहा है। यह घंटा मंदिर में अब तक चढ़ाए गए श्रद्घालुओं के छोटे-छोटे घंटों को मिलाकर बनाया गया है।आधिकारिक जानकारी के अनुसार घंटे को टांगने के लिए लगाए गए एंगल व उन पर मढ़ी गई पीतल और घंटे के वजन को जोड़कर कुल वजन लगभग 50 क्विंटल होता है। इस घंटे को प्रख्यात मूर्ति शिल्पज्ञ प्रभात राय ने तैयार किया है।


नोट- यह स्थान इतना विरान है कि यहां रात में रूकना सख्त मना है। लोगों का मानना है कि  यहां इतना रक्तपात हुआ है कि लोगों की आत्मायें रात में विचरण करतीं हैं और आज भी राजकुमारी व उनके भाई की दिव्यात्मा अपने किले व आसपास फैले उस जंगल की रक्षा करते हैं। इतिहास साक्षी है कि जिनके कर्म पवित्र होते हैं वह देवताओं तक ऊँचा उठते हैं।


                                                     - आकांक्षा सक्सेना 



कविताः वैक्सीनेशन


गांव, नगर, जनपद, प्रदेश,
मिलकर बनता है नेशन ‌।
और देश सेवा का अवसर,
देता वैक्सीनेशन।।

फैली चारों ओर बिमारी,
त्राहि-त्राहि घर-आंगन।
छीन लिए जिस बिमारी ने,
अपने कितने प्रियजन ।।

क्रूर कोरोना सुरसा सम,
अपना मुख फैलाए ।
पवन पुत्र की भांति हमें भी,
रहना बचे बचाए ।।

समय-समय पर हाथ है धोना,
ध्यान रहे डिक्टेशन।।1।‌।

और देश सेवा का अवसर....


जुड़ी हैं हमसे जो -जो कड़ियां,
होंगी तभी सुरक्षित ।
जब स्वयं को रखेंगे हम,
दिनामान संरक्षित।।

माॅस्क पहनने को समझें,
हम सब न मजबूरी,
हम लेंगे संकल्प आज अब,
रखेंगे दो गज दूरी।।

मिटे कोरोना क्रूर बीमारी,
न नाम कहीं हो मेंशन।।2।।

और देश सेवा का अवसर...

सर्वथा हितकारी है,
वैक्सीनेशन जानो ।
वैक्सीनेशन की गुणवत्ता को,
सब ही पहचानो ।।

अवरुद्ध करो पथ अफवाहों का,
जागो और जगाओ ।
सुख, समृद्धि, आरोग्यता की,
मिलकर फसल उगाओ।
हे करुणापति! करुणा करो,
आए अमित सुमति सेशन।।3।।

और देश सेवा का अवसर,
देता वैक्सीनेशन..


                                          -अमित मिश्रा


कविताः तुम फिर मिलोगे



तुम मुझे फिर मिलोगे
कहां, कैसे,कुछ पता नहीं !

शायद मेरी कल्पनाओं के पर
पे सवार होकर..
मेरी प्रेरणा के स्रोत बन कर
मेरी लेखनी में समा जाओगे..
या फिर शब्दों में ढल कर
मेरे कोरे कागज़ पे बिछ जाओगे ?

यकीं है मुझे मेरे हमदम
हर तूफान से बचाकर तुम..
मीठी फुहारों से नहला दोगे !

आ कर मेरी ज़िंदगी में..
मुझे सम्पूर्ण कर दोगे !

और फिर वो दिन भी आएगा 
जब तुम मेरी जीत बनकर..
मुझे 'अपराजिता' कर दोगे !

मैं और तो कुछ नहीं जानती..
पर मेरे रूह में जब जब तुम उभरोगे
एक सिहरन सी जगाकर
क्या जिस्म के साथ यादों को भी
फना कर दोगे ?

                                       अपराजिता_मेरा_अंदाज


एक कविताः हिन्दी



हिन्दी है इक प्यारी भाषा ,
मेरे हिंदुस्तान की ।
बड़ी सरल है मेरे बच्चों,
भारत देश महान की ।।

नजमा बोले ,राखी बोले ,
और बोलते सुखविंदर ।
जॉन ,पॉल,और मोहन बोले,
भाषा बहुत है सुंदर ।।

इतनी प्यारी हिन्दी भाषा,
जन जन इसको बोले,
मातृ भाषा भी है अपनी ,
झूम झूम कर डोलें ।।

सब जन मिलकर हिन्दी का ही
हम परचम लहराएं ।
हिन्दी है समृद्ध हमारी ,
हिन्दी को अपनाएं ।।

हिन्दी का वैशिष्ट्य अनूठा
बात समझ जब आएगी।
पूर्ण विश्व मे उच्च पताका ,
हिन्दी की लहराएगी ।।


                                          डॉ. कमलेंद्र कुमार श्रीवास्तव




कविताः रिश्ते



ये रिश्ते.. भी कैसे हैं रिश्ते
जब बनते.. तब जीवन खिलते
जब.. मन को पीड़ित करते
तब.. भीतर से जख्म रिसते

अपनों से.. ज्यादा गम होता है
औरों से कुछ.. कम होता है
लेकिन गम तो गम होता है
ज्यादा हो.. या कम होता है

गम की क्या.. परिभाषा है
जिससे बांधी.. अभिलाषा है
उसने डोर खींची.. जब मन की
नि:शेष हुई.. आशा जीवन की

इसी लिए सबसे.. कहता हूं
अपनी ही धुन में.. बहता हूं
आशाओं के दीप जलाओ
अपना जीवन हर्षित कर जाओ।


                                                     डॉ. प्रभात द्विवेदी


11 September 2021

लेखः विश्व साक्षरता दिवस





शिक्षा जीवन की रोशनी है। उसके उजाले में ही जीवन पथ पर चलने का हौसला, उम्मीद एवं जीवन जीने की किरण मिलती है।शिक्षा के बिना मानव पशु के समान है। शिक्षा के बिना जीवन में अंधकार ही अंधकार है। साक्षरता से व्यक्ति अपने अधिकारों को समझ सकता है। 

अपने कर्तव्यों का पालन कर सकता है। अपना स्वयं का और राष्ट्र के महत्व को समझ सकता है। इस प्रकार वह देश ही नहीं बल्कि दुनिया का शिक्षित समझदार नागरिक बनने की प्रथम सीढ़ी के रूप में आधार बन सकता है। 17 नवंबर 1965 में ईरान की राजधानी तेहरान में विश्व के अनेक देशों के शिक्षा मंत्रियों का एक सम्मेलन हुआ जिसमें यह प्रस्ताव रखा गया कि 8 सितंबर को विश्व साक्षरता दिवस के रुप में मनाया जाए।

सन् 1966 में प्रथम विश्व साक्षरता दिवस मनाया गया तथा 2009-10 को संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा साक्षरता दशक घोषित किया गया। शिक्षा से ज्ञान, समझ पैदा होती है और ज्ञान से सोच-समझ और मजबूत सोच-समझ से कुशल व्यवहार से व्यापार तथा रोजगार प्राप्त किया जा सकता है तथा रोजगार से जीवन चलता है। 

सुखी जीवन के लिए पौष्टिक भोजन, वस्त्र मकान, शुद्ध पानी ,उत्तम स्वास्थ्य की आवश्यकता होती है।रोजगार के लिए साधनों की आवश्यकता होती है जिसके लिए दुनिया के सभी लोगों की श्रम-साधना की जरूरत है और इस श्रम साधना हेतु साधनों की। हमारे देश की बढ़ती जनसंख्या के जनबल रूपी धन को धनबल में लगाने के लिए सर्वप्रथम सर्वश्रेष्ठ महत्वपूर्ण कार्य है तो वह शिक्षा एवं शिक्षित और आदर्श नागरिक की।

आज के इस तकनीकी युग में साक्षर होना और उसका दूसरा जन्म होना है।व्यक्ति साक्षर होकर ही रोजगार प्राप्त कर सकता है और रोजगार से ही अपना देश और विश्व का विकास करना संभव है आज के इस दौर में, विश्व महामारी में दुनिया के प्रत्येक नागरिक को आत्मनिर्भर बनने हेतु तथा राष्ट्र को आत्मनिर्भर बनाने हेतु उत्तम शिक्षा,स्वास्थ्य एवं रोजगार से ही संभव है। तभी हमारा विकास सही मायने में संभव हो सकेगा। 

आज इस विश्व महामारी कोरोना ने बच्चों की फिजिकल कक्षाओं को, वर्चुअल क्लास के रुप में ले ली है।जिसकी वजह से देश- दुनिया को अत्यधिक कठिनाइयों का सामना जरूर करना पड़ रहा है। किंतु शिक्षा  घर-घर और द्वार-द्वार से शिक्षित-जन विद्या -दान के माध्यम से विश्व महायज्ञ में अपनी आहुति से संपन्न कर मानव मात्र का कल्याण हेतु इस महायज्ञ में अपनी आहुति देकर इसे सफल बना सकता है। संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट के मुताबिक 4 अरब लोग मात्र साक्षर हैं वही 1 अरब लोग पढ़ना- लिखना भी नहीं जानते हैं। भारत में साक्षरता के आंकड़ों  को देखें तो केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने 2018 में शैक्षिक सांख्यिकी रिपोर्ट के मुताबिक साक्षर लोगों की संख्या 79 प्रतिशत है जो ग्रामीण एवं शहरी जनसंख्या को मिलाकर है। 

ग्रामीण साक्षरता के रूप में 64.7%  है जिसमें 74.3 प्रतिशत पुरुष और 56.8% महिलाएं साक्षर है। शहरी क्षेत्र में 79.5% साक्षरता है जिसमें 83.7% पुरुष है एवं 74% महिला साक्षर हैं। इन आंकड़ों पर गौर करें तो महिलाओं के साक्षरता का आंकड़े पुरुष साक्षरता से पीछे हैं इसका मुख्य कारण देश में लिंग असमानता एवं रूढ़िवादी सोच का कारण है। आज नई शिक्षा नीति में प्राथमिक शिक्षा को मातृभाषा में देने की बात कही गई है जिससे कुछ हद तक सुधार संभव है। 

महान कवि, साहित्यकार कन्हैया लाल सेठिया ने भी कहा है कि-

"मायड़ भाषा बोलता, जणने  आवे लाज।       
अस्या कपुता सूं दु:खी सगळो देश समाज।"


निजी एवं सरकारी स्कूल निरीक्षक बच्चों को गोद लेकर उनके भोजन,मनोरंजन एवं स्वास्थ्य तथा छात्रवृत्ति के माध्यम से भी निरीक्षक बच्चों को साक्षर करने में सहयोग प्रदान कर सकते हैं।


                                                    -डॉ. कान्ति लाल यादव