साहित्य चक्र

19 June 2021

ज़िंदगी




क्यूॅऺ   ज़िंदगी   नासाज़ है,
करती  मगर  आगाज़  है।

पहचान  हम  पाए  नहीं,
सबकी  वही  हमराज़  है।

जाना सभी को एक दिन
ये   ज़िन्दगी   परवाज़  है।

ले जाएंगी किसको कहाॅऺ,
करती  नहीं   आवाज़  है।

हमसे  हुईं  है  भूल  कुछ,
लगती   बहुत  नाराज़  हैं।

सब पे जुदा इसका असर,
उसका  अलग  अंदाज़ है।

                                नागेन्द्र नाथ गुप्ता

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