साहित्य चक्र

12 June 2021

वक़्त ने चलाया दो राहों का चक्र




वक़्त ने चलाया दो राहों का चक्,

पहली को नाम दिया सब्र ,

दूसरी कहलाई कब्र 


खुला छोड़ दिया मानव को,

और मौत के दानव को,

कौन सी राह चुने करना था फ़ैसला इंसां को 


बंद करो इधर-उधर घूमना ,

नाज़ुक हालातों को  भाँपना , 

सबको ख़तरे की खाई में झोंकना 


हाथ में ले खड़ा है दराती कोरोना कसाई ,

जिसने भी थोड़ी सी नज़दीकियाँ ढ़ाई ,

समझो उसपर दराती चलाई 


वक़्त का इशारा समझो ,

लक्ष्मण रेखा खींचो ,

दूर रह इक-दूजे का जीवन सींचो 


थोड़ी दूरी सहकर ,

खुदको और सबको जीवन देकर,

कर ये वक़्त गुज़र संभलकर 


आओ थोड़े दिन रह लें अकेले ,

फिर लगेंगे महफ़िलों के मेले ,

गुज़रेंगे गलियों से बेख़ौफ़ क़ाफ़िले 


इधर-उधर हैं सब बिखरे ,

पार कर के सब्र के सागर गहरे ,

दिन अवश्य देखोगे सुनहरे 


इतरा रहें हैं कुछ चाँद के लगा चक्कर ,

यहाँ धरती पर इंसान घूम रहा मुँ ढककर ,

कुछ महत्वाकांक्षी कर रहे जानलेवा खोज लालच में पड़कर 


धरती पर हैं ऐसे लालची लोग भार ,

रुका नहीं ग़र इनका अमानवीय व्यवहार , 

मिट जाएगा सारा संसार 


और कितनी वैक्सीन बनाओगे ?

कितने और कोरोना लाओगे ?


लालच पर जब तक क़ाबू नहीं पाओगे ,

ऐसे ही हालातों  में घिरा पाओगे 


ऐसे ही हालातों में घिरा पाओगे 


                                         इंदु नांदल 



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