साहित्य चक्र

22 May 2021

कुछ नहीं कर पा रहा इंसान



जब से कोरोना ने दस्तक दी है
ज़िन्दगी नरक सी बन गई है सब की
डर के साये में जी रहे हैं लोग
यह तो मर्जी है सिर्फ रब की
जिधर देखो आंसुओं का सैलाब है
लाशों को कम पड़ गए शमशान
आज तो सासें भी बिक रही हैं
कितना लालची हो गया है इंसान
सब को राजनीति की पड़ी है
बहुत मुश्किल की यह घड़ी है
आपदा में अवसर तलाश रहे हैं
रुक नहीं रही आंसुओं की झड़ी है
ऑक्सीजन की मारामारी है
हर तरफ बेबसी और लाचारी है
अपनों ने अपनों का साथ छोड़ दिया
कैसी खतरनाक यह महामारी है
शहरों को रौंदता अब बढ़ गया
गांवों की ओर यह तूफान
हलचल मचा दी शांत समुद्र में
कुछ नहीं कर पा रहा इंसान

                                  रवींद्र कुमार शर्मा


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