साहित्य चक्र

29 May 2021

* हम अपने भाग्य के निर्माता स्वयं हैं *




जिंदगी के किसी भी मोड़ पर यदि हम असफल हो जाते हैं तो इसका अर्थ यह कतई नहीं हो सकता है कि इस चीज को हासिल करना हमारे भाग्य में था ही नहीं बल्कि असफलता यह दर्शाती है कि सफलता प्राप्त करने के लिए पर्याप्त प्रयास हमने किया ही नहीं। हमें सुख या दुःख देने की शक्ति किसी के पास है ही नहीं। वो तो हमारे कर्म हैं जो हमें सुख या दुःख के रूप में मिलता है। हम जिस प्रकार के कर्मो को करते हैं उसी के अनुरूप हमें फल भी भोगना पड़ता है। परमात्मा किसी के भाग्य में सुख और किसी के भाग्य में दुःख लिखता ही नहीं है यह तो हम सबके अपने कर्मों का फल है। अतः अपने कर्मों द्वारा हम अपने भाग्य को सँवार सकते हैं। यानि हम अपने भाग्य के निर्माता स्वयं है।

      कर्मो के संबंध में गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी कहा है। सकल पदारथ है जग माही। कर्महीन नर पावत नाही।। इसका मतलब यह हुआ कि इस दुनियाँ में सारी चीजें हासिल की जा सकती है लेकिन वे कर्महीन व्यक्ति को कभी नहीं मिलती है। दुनियाँ में कोई भी चीज ऐसी नहीं है जिसे हम प्राप्त नहीं कर सकते हैं आवश्यकता है तो उसे प्राप्त करने के लिए पर्याप्त कर्म करने की।

       इसी प्रकार गीता में भी भगवान श्री कृष्ण ने कर्म की प्रधानता का विस्तृत वर्णन किया है और हमें हमारे कर्म के आधार पर ही फल की प्राप्ति होती है। कर्म केवल शारीरिक क्रियाओं से ही संपन्न नहीं होती बल्कि कर्म को संपन्न करने में हमारा मन ,विचार एवं भावनाओं का भी हाथ होता है।

 हिंदी साहित्य के प्रख्यात राष्ट्रकवि मैथलीशरण गुप्त ने भी कहा है- 

 जब प्राप्त तुम्हें सब तत्व है यहाँ
 फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ
 तुम सत्त्व सुधा रस पान करो
 उठकर अमरत्व विधान करो
दवरूप रहो भव कानन को
नर हो, न निराश करो मन को

           अर्थात जिस भी चीज को हम चाहते हैं अपने जीवन को बदलने के लिए या लक्ष्य को पाने के लिए वह सबकुछ पहले से ही हमारे पास विद्यमान है। वह सत्त्व कहाँ जा सकता है। इसलिए हे नर उठो और उस सत्त्व को ढूढो क्योंकि परमपिता परमात्मा ने वह सारी चीजें पहले से ही तुम्हें दे रखा है। जरूरत है तो सिर्फ उसे पहचानने और उसका सदुपयोग करने की।

               इसलिए हे नर उठो और इस मौके को पकड़ो और अपने जीवन के सत्य को प्राप्त करने की कोशिश करो। क्योंकि तुम ईश्वर की अमूल्य कृति हो। उठो और अपने अंदर व्याप्त निराशा का परित्याग करो सत्त्व को प्राप्त कर अमृत का पान करो। इस प्रकार हम देखते हैं कि हम अपने भाग्य के निर्माता स्वयं हैं।


                                                कुमकुम कुमारी 'काव्याकृति'


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