साहित्य चक्र

16 February 2020

कलयुगी नगरी

 बड़े   जोरों    पर   है    झूठ   का   कारोबार
 असत्य रूपी तलवारें निरन्तर सत्य पर करती वार

  कलयुगी नगरी में हर दिशा एक रावण है
 सुनाई देती यहाँ मक्कारी  की  चीत्कार

भ्रष्टाचार इस कदर बैठा है कुण्डली जमाकर
निरा मूर्ख समझे खुद को सयाना सरदार

खुदा के सब बन्दे हैं फिर दरिन्दगी का शोर कैसा
वस्तुओं को छोड़ करते देह का व्यापार

उतारे नहीं उतरता अजब-गजब भाव लिए
चढ़ जाता जब सिर पर सियासी  बुखार

धैर्य को बांधे मैंने भी देखा है अक्सर
गीदड़ों की पंचायत में मिमियाता  सियार

                                       उमा पाटनी


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