साहित्य चक्र

02 February 2020

रंग तिरंगा रंग जाऊं मैं




चाहे बहे अश्रू की धाराएं
आए निज पथ में विपदाएं 
परवाह ना एक कर पाऊं मैं
तन मन धन जीवन समर्पित 
इस मिट्टी को कर जाऊं मैं
यह जीवन है तो राष्ट्र का है 
और राष्ट्र हेतु  मर पाऊं मैं
आकांक्षा तो बस इतनी सी अब
की रंग तिरंगा रंग जाऊं मैं 


चाहे मरूस्थल की तपती दोपहरी
या हो हिमालय की शीतलहरी
चिंता ना कर ऐ मात्रभूमि तु 
है तेरा पुत्र खरा बनके प्रहरी
चाहे आए जलधी में ज्वार भाटाएं
बवंडर देख मन भी यदि घबराए 
फिर भी रख जान हथेली पर
प्रकृति के आगे तन जाऊं मैं
मृत्यु भी अगर निश्चित हो तो 
मृत्यु से भी लर जाऊं मैं 
आकांक्षा तो बस इतनी सी अब
की रंग तिरंगा रंग जाऊं  मैं


कर क्षमा मुझे ए मात मेरी तु 
तेरा सहारा ना मैं बन पाऊंगा 
है शरहद मुझे पुकार रही 
खातिर उसके अब जाऊंगा 
चाहता हूं रुकना मैं भी पर
अब कदम रोक ना पाऊंगा 
कर क्षमा मुझे ए मात मेरी तु
तेरा सहारा ना मैं बन पाऊंगा 
प्रार्थना मेरी ईश्वर से है यह
की फिर तेरा गर्भ ही पाऊं मैं
दोनों जन्मों का कर्ज चुकाने 
तेरे कोख से आऊं मैं 
आकांक्षा तो बस इतनी सी अब
की रंग तिरंगा रंग जाऊं  मैं


न मोह जीवन से 
ना भय मृत्यु का 
हे ईश्वर इतना ही चाहूं मैं 
देश सोए मेरा नींद चैन कि 
खातिर इसके जग जाऊं मैं
निज मातृभूमि की रक्षा हेतु
अपना शीश चढ़ाऊं मैं
यह जीवन है तो राष्ट्र का है 
और राष्ट्र हेतु  मर पाऊं मैं
तब जाके भारतभूमि का 
वीर सपूत कहलाऊं मैं 
आकांक्षा तो बस इतनी सी अब
की रंग तिरंगा रंग जाऊं  मैं

                                      अनंत सिंह


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