साहित्य चक्र

10 July 2021

अजीबो गरीब दुनिया


अजीबो गरीब दुनिया है,
गजब निराले इसके खेल...
कोई कैसे समझे इसको,
किसका किससे बनता मेल...

दूसरे की गलती पर जज है अपने लिए बनते वकील... 
सब को झूठा साबित करके खुद के लिए हजारों दलील,
शराफत इतनी भरी हुई है फरिश्ते भी हो जाए फेल...
अजीबो गरीब दुनिया है,
गजब निराले इसके खेल...
अपनों को चढ़ता देख झूठी हंसी हंस देते हैं.. 

जरा सा कोई चूक जाए तो फबती उसी वक्त कस देते हैं, 
होठों पर हो फरेबी मुस्कान, विकास किसी का ना पाए झेल... 
अजीबो गरीब दुनिया है, 
चेहरे पर चेहरे लगे हैं पीछे कुछ सामने कुछ और... 

क्रूरता इतनी भरी हुई है छीन ले हाथ से मुंह का कोर,
बातों में गुड सी मीठास, काम ऐसे ज्यों जहरीली बेल... 
अजीबो गरीब दुनिया है,
ऐसे तो वो चुप रहता है, जब उसकी लाठी पड़े..... 

भाग नहीं सकते उससे, आखिर में बलि चढ़े,
संवार ले खुद के जीवन को , बना मत इसको अंधेरी जेल.. 

अजीबो गरीब दुनिया है।

                                                  अपराजिता


1 comment:

  1. ऐसी ही है दुनिया सारी !कुछ कहो कुछ सुनो ,कुछ समझौते कर लो! तभी चलेगी पटरी पर रेल।।

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