साहित्य चक्र

04 July 2021

तुम्हारा स्वर्ग तुम्हें ही मुबारक हो।




हम जाति से
पहचाने जाते है भाई
यहाँ हमारे गुण,योग्यता का
कोई भी मोल नही
चाहे कितने भी
विनोद काम्बली बने
या फिर गीतकार शैलेन्द्र।

कुछ लोगों के लिये
हम तो एकमात्र 
चीटियों के समान है
जिन्हें प्रतिदिन
रौदा जाता है
जातिवाद, और भेदभाव के
खूनी पैरो से
केवल और केवल
झूठे दम्भ में।

मेरा उच्चासन
यहीं मेरी जमीन है
मै यहीं जीना
यहीं मरना चाहता हू
जब इस धरा पर
जिसे तुम घिनौना
नर्क कहते हो
इतना जघन्य अत्याचार
इतना अलौकिक भेदभाव
इतनी प्रताड़ना
वो भी सिर्फ दलित होने की
क्या गारंटी है
स्वर्ग में यह सब न होगा
जरूर होगा भाई
मुझे नही जाना ऐस स्वर्ग में
तुम्हारा स्वर्ग तुम्हें ही
मुबारक हो।


                                 रामराज बौद्ध


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