साहित्य चक्र

04 April 2021

गीत


बटुयें में दुख भरे हुए हैं
 भाव रहित निस्सार
चिंताओं के मस्तक पर हैं
 अवसादी आसार 

ज़ख़्मेवबा का थैला देकर
 चला गया है बीस
कैसे इसको ढो पाएगा
 सोच रहा इक्कीस
प्रश्न हजारों मुंँह बाये हैं
 अर्थनीति बेज़ार
चिंताओं के मस्तक पर हैं
 अवसादी आसार

 दस्तक देता नया वर्ष है
 लेकर नये क़यास 
सहरा में ओएसिस का क्यों
 करा रहे अहसास
पुष्प समर्पित करके देते
 आंँसू 'ज्योति' हज़ार
चिंताओं के मस्तक पर हैं
 अवसादी आसार

इच्छाएँ बोझिल हुईं और
हूईं मुस्कान उदास 
ख़ुशियों की साज़िश पर लेटी
 अरमानों की लाश
प्रजातंत्र में ज़ंग लगी है
 सिस्टम है लाचार
चिंताओं के मस्तक पर हैं
 अवसादी आसार।

                                   ज्योति जैन 'ज्योति'



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