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बोलेगी तकदीर कहीं
मेरी मंजिल पास नहीं
जाना मुझको दूर कहीं।
श्रम को तुम जीते रहना,
बोलेगी तकदीर कहीं।
चमक तुम्हारी गायब है,
चेहरा है बेनूर कहीं।
पहचानों पहले खुद को,
मिलना मुझको दूर कहीं।
यादों की दुनिया बसती,
मिलते हैं मजबूर कहीं।
चाहत का संसार सजाये,
सपने रखते दूर कहीं।
कृष्ण भक्ति में लीन रहे,
मिल जाते हैं सूर कहीं।
- वाई. वेद प्रकाश
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सब गवां दिया
देखो, तुम्हारे बिना मैने सब खो दिया,
पुरानी तस्वीरें देखते-देखते मैं रो दिया,
तुम्हे याद अब नहीं करता हु,
तुम्हारे चक्कर में मैने अपन आपको भी खो दिया।
तुम्हारे बाद मैने आलम को सब दिखा दिया,
तुम्हारे बारे में कुछ लिखा था मैने,
सिगरेट के धुएं में मैने सब कुछ उड़ा दिया,
तुम्हारे लिए मैने अपना सब कुछ लूटा दिया।
- प्रणव राज
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आखिर क्या करें
बेरोजगार आखिर क्या करें
पहले तो दिन रात एक कर,
पढ़ाई को पूरा करें।
फिर बेरोजगारों की पंक्ति में
खड़े होकर रोजगार का इंतजार करें।
नौकरी पाने को भारी फीस भर भरकर,
प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी करें।
एक पद पर हजारों दांव पर लगे,
पर एक ही नियुक्ति प्राप्त करें।
प्रक्रिया का दौर मुश्किल होता जाए,
कभी कभी बोरा उठाकर भी रोजगार प्राप्त करें।
वेतन शिक्षा के अनुसार न मिले
खुद तो हैं पर घरवालों को भी परेशान करें।
ज्ञान का भरा हो चाहे भंडार
पर कद्र कोई न करें।
मां बाप के सपनें होते हैं बड़े
पढ़ाई पर भी खर्च ज्यादा करें।
दुख तो तब है होता
जब संतान रोजगार का इंतजार करें।
बेरोजगारी की दुर्दशा
मन को हताश बड़ा करें।
- विनोद वर्मा
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आपके शब्दों ने मुझे
इस कद्र प्रभावित कर दिया,
कहना चाहता था मैं भी बहुत कुछ
मगर खामोश कर दिया,
हल्क से नीचे ही रह गए मेरे अल्फाज़ तड़पते हुए,
मगर करता भी क्या? ज़रा आप ही बताईए
कहना चाहते थे बहुत कुछ वह भी
बंदिश ने आपकी होंठों पर ताला लगा दिया
लाख कोशिश की मैंने, उस ताले को खोलने में
खुल न पाया वह ज़ालिम, शर्मिन्दा कर दिया,
झुक गया शर्म से मेरा सर इस कद्र
देखती रही निगाहें, शर्मसार कर दिया,
कुछ कर न सका मिली तन्हाई इस कद्र
देखता रहा दूर तक, एक उम्मीद की तलाश में
नज़र नहीं आई आशा की कोई किरण
विवश और नज़रबंद कर दिया,
जब नज़र डाली मैंने
अपने तड़पते हुए अल्फाजों पर,
कांप गई रूह मेरी, लाचार कर दिया
आहें भरते रहे मेरे अल्फाज़ इस कद्र
आंसू बहाने को मजबूर कर दिया,
ज़िद पर अपनी अड़े रहे मेरे कम्बख़त अल्फाज़
न खुद कह पाए कुछ
और मुझे भी खामोश कर दिया।
- बाबू राम धीमान
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पशु मित्र से पशुओं सा व्यवहार
पशु मित्र बनाने के लिए
कौन इतनी क्रूरता है दिखा रहा
पच्चीस किलो का बोझ उठाकर
पूरे ग्राउंड में है दौड़ा रहा
बेरोजगार है हमारा युवा
मजबूर है कुछ नहीं कर पा रहा
बहुत मेहनत करता है दिन रात
लेकिन पेपर फिर भी लीक हो जा रहा
कौन है सलाहकार ऐसा
जो ऐसे नियम बना रहा
देव भूमि को कर रहा शर्मशार
ममता का गला दबा रहा
मजबूरी किसी की तू क्या जाने
क्यों इतना जुल्म नारी पर ढा रहा
पांच हजार के लिए क्या जान लेगा
क्यों इनको इतना सता रहा
पशुओं से बदतर कर रहा व्यवहार
इनको पशु मित्र बता रहा
खुद के पास गाड़ी बंगला धन दौलत नौकर और कार
क्यों जोंक बनकर इनका खून चूसे जा रहा
पॉलिसी की दे रहे दुहाई
कोई बताए यह पॉलिसी किसने है बनाई
क्या पशु मित्रों को भी बार्डर पर है लड़ना
जो पच्चीस किलो बजन वाली पॉलिसी है बनाई
- रवींद्र कुमार शर्मा
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बांस हूं मैं
बैंहज गलांदे मिंजो बांस गलांदे,
ओ बजे मेरी मुरलियां,
ओ बजदी बांसुरियां-२
खड़ा रैंहंदा सीना ताणी,
आईजाओ झक्खनेहरी,
अकड़ी रे बड्डे,बड्डे,हूंदे टुकड़े-२
अऊ छूंदा पैर धरतिया अम्मा रे।
कुछ नी बिगाड़ी सकदी
बड्डी -२ आंधियां!
ओ बजे मेरी मुरलियां
इक था जमाना घरें मेरा ही राज था,
महलां री छत बणे मेरे सहारे,
गरीबां री झोंपड़ियां।
ओ बजे मेरी बांसुरियां
पशुआं रा चारा मैं,
कुल्फी आइसक्रीमां बिच मैं,
मंजे मंजोलू मेरे,
फल-सब्जी अन्ना जो
सजांदियां मेरी टोकरियां।
ओ बजे मेरी बांसुरियां
वेदिका च मैं तोरणद्वारा
बिच मैं,
ओ पालकियां सजदे लाड़े लाड़ियां
ओ बजे मेरी बांसुरियां
तांजे लक्क लगो झुकणे,
सहारा बणे मेरी लाठियां,
मोक्षधामा जाणेजो,
चार कंधयां पर बांस सजाए अर्थियां,
सद्गति करने जो-२
छेदूं मैं खोपड़ियां।
ओ बजदी बांसुरियां
मैं सिक्खया घाअ ते,
तूं सिख माहते,
निक्की -2 जड़ां मेरियां ,
जड़ीरी टबरा रे सहारे,
ओ सीना ताणी कने चलीरा छूणे,
अंबर होर तारे,
चुम्मी लैंदा धरती रे चरण प्यारे,
तांहि मेरे अग्गे हारे नेहरी आंधियां।
ओ बजदी बांसुरियां
- बृजलाल लखनपाल
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प्रेम
प्रेम किसी ख़ास दिन का मोहताज़ नहीं,
यह तो हर रोज़ हृदय में अंकुरित होता है,
और परिपक्व होकर निखरता जाता है,
इसके पोषक तत्व हैं सम्मान व विश्वास,
जब किसी से बेतहाशा स्नेह हो जाए,
तो समझ लेना वो ही सच्चा प्रेम है,
इस संसार में सुकून से जीने के लिए,
प्रेम का होना अत्यंत ही आवश्यक है,
बशर्ते इसमें अपनापन और सच्चाई हो,
हर वक़्त किसी का स्मरण करना,
उसकी यादों को दिल में समेटे हुए,
उसके मुस्कुराने की वजह ढूंढना,
ख़ुद कष्ट में रहकर भी उससे ना कहना,
उसके लिए हर वो मुमकिन कार्य करना,
जिसकी वजह से उसे ख़ुशी मिलती हो,
हमेशा उसकी सलामती की दुआएं करना,
उससे वक़्त के सिवा कुछ ना मांगना और,
बातों का कभी ना रुकने वाला सिलसिला,
ये सभी उस अथाह प्रेम की निशानी है,
जिसके लिए दिल इंतज़ार करता है,
एक ऐसा इंसान जो मन को भाए,
जिसके होने का अहसास तब भी हो,
जब वह हमारे पास नही होता है,
जिसकी मौजूदगी साँसों में समाई हो,
ये वो क्षण हैं जो सुखद अनुभूति देते हैं,
प्यार का इज़हार तो रोज़ होना चाहिए,
इसके लिए किसी ख़ास दिन का,
इंतज़ार करने की ज़रूरत नहीं है,
इस प्रेम के बदले में मांगना है तो,
सिर्फ़ और सिर्फ़ उसका हाथ और साथ,
तब जाकर इस उमड़ते हुए प्यार की,
पराकाष्ठा पूर्ण होती है और मिलता है,
हमें एक नेक इंसान बनने का अवसर।
- आनन्द कुमार
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भारत की अनुपम ऋतुएँ
भारतीय संस्कृति और जीवन दर्शन में
विभिन्न भावों को दर्शाती हैं ऋतुएँ
भारत की मनभावन ऋतुएँ
प्रकृति से सीधा होकर आबद्ध
करती हैं मानव तन-मन को प्रभावित
अत्यंत मनोरम हैं ,भारत की ऋतुएँ
भारत का श्रृंगार हैं ,ये ऋतुएँ
नवउल्लास का, नवस्फूर्ति का
उन्नति का, विकास का प्रतीक है
मौसम बहारों का है ,ऋतुराज बसंत
हमारे हयात में जोश का, संघर्ष का
तप का, श्रम का प्रतीक है
गरमाहट से, तपिस से
भरपूर है ग्रीष्म ऋतु
जीवन के पुनरुत्थान का,
हरियाली का
प्रकृति के सृजन का प्रतीक है
ऋतुओं की रानी, वर्षा ऋतु
विविधता से,नवीनता से
प्राकृतिक सौंदर्य से हैं परिपूर्ण
भारत की मनोरम ऋतुएँ
भारत का श्रृंगार हैं, ये ऋतुएँ
सर्दी की ऋतु है आराम का
शक्तिसंचय का, स्वर्णिम अवसर
इसमें करें आंतरिक-विकास एवं
आत्म-प्रेम की ओर बढ़ाएँ कदम
हेमंत शांति से, अविचलता से
जीवन जीना सिखाए
शिशिर सहनशील होना
विनम्रता से जीना हमें बताए
भारत की ये मनोरम ऋतुएं
भारत का श्रृंगार हैं ये ऋतुएँ
निरंतर परिवर्तित होती ये ऋतुएं
अस्थिरता को दर्शाती हैं ये ऋतुएँ
जीवन में कभी खुशी होगी
कभी होगा गम,
यह बात बताती हैं, ये ऋतुएँ
हमें जीवन में मुस्कुराते हुए
हर स्थिति में आगे, बढ़ते जाना है,
यही संदेश देती हैं, ये ऋतुएँ
भारत की ये अनुपम ऋतुएं
भारत का श्रृंगार हैं ये ऋतुएँ
- प्रवीण कुमार
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मेरी गुड़िया
नन्हीं सी, फूल सी, मिसरी सी,
तितली सी, शीशे सी।
मेरा खिलौना, मेरी हंसी,
मेरी खुशी, मेरी परी।
मैं उससे खेलता,
वह मुझसे खेलती,
नन्हे हाथ उसके
मुझको थामते,
नन्हे पांव उसके
मुझे पीछे भगाते।
उसकी हंसी मुझे गुदगुदाए,
मैं उसको, वो मुझे किस्से सुनाए।
आंखे उसकी मुझको देखती,
दिल को छू जाए,
मेरे हर ज़ख्म पर,
उसकी प्यारी मुस्कान
शीतल मरहम बन जाए।
दुआ है,गुड़िया खूब पढ़े
आगे बढ़ती जाए।
किसी की नजर न लगे उसको
शादी हो आबाद रहे।
एक दिन वो भी
गुड्डा गुड़ियों की प्यारी
बने एक हस्ती बुलंद,
करे सब उसको पसंद
सबों का प्यार बरसे उसपर,
एक शीतल छांव बन जाए।
- रोशन कुमार झा
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आओ वृक्ष को लगायें
अय हवा तुम पर क्या मैं कोई झुठा इल्जाम लगाऊँ
अपनी ही गलती को हम किस किस से नजर छिपाऊँ
प्रदुषण की हमने जग में कर दी है पैदा आज भरमार
प्राणवायु की किल्लत से अब जूझ रहा सारा संसार
वाहन की जहरीली धुआँ बन गई है जान की दुश्मन
कल कारखाने की प्रदुषित गैस कैसे करे आचमन
जानलेवा गैस का वायुमंडल में हो रहा नित्य, सेवा
गली मुहल्ले की गंदा पानी कर रहा है सबपे धावा
पेड़ पौधे से मानव मात्र हो गये हैं इनके जॉनी दुश्मन
विकास के नाम पे देखो उजाड़ रहे हैं वन व उपवन
प्राण वायु के बगैर सोंच कैसे बचा पायेगा जीवन
जंगल काट उजाड़ रहे हैं अपने ही खुशी का ऑंगन
बरगद पीपल व तुलसी हो रहे है मानचित्र से गायब
पेड़ पौधे की सज गई है चित्र में शोभा सजा अजायब
हर कोई अब तो बैठ कर सोंचों कैसे होगी वायु सफाई
बंजर परती भूमि पे हो जाये पुनः जंगल की रोपाई
आओं हम सब बुद्धिजीवी करें एक साथ ये अब प्रण
जंगल की रक्षा करेगें ना काटेगें जंगल को आगे हम
जंगल है तो हमारा जीवन है प्राणों से बढ़कर हो रक्षा
प्रर्यावरण को बचाने की प्रण लो ताकि हो जीव सुरक्षा
- उदय किशोर साह
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हुंकार: ज्ञान के रणक्षेत्र में
उठो हिंद के वीर पुत्रों, आलस का परित्याग करो,
कलम हाथ में ढाल बनी है, अज्ञानता पर घात करो।
ये पाठशाला युद्ध क्षेत्र है, पुस्तकें अस्त्र तुम्हारी हैं,
विजय उसी की होगी जिसकी, तैयारी सबसे भारी है।
मत भूलो तुम उन हाथों को, जो खेत-धूप में जलते हैं,
पिता तुम्हारे पत्थर ढोकर, घर का चूल्हा बलते हैं।
माँ की आँखों के सपनों को, तुमको सच कर दिखलाना है,
पसीने की हर एक बूँद का, कर्ज तुम्हें चुकाना है।
गणित चक्रव्यूह सा खड़ा अगर, तो तुम अभिमन्यु बन जाओ,
सूत्रों के बाणों से बच्चों, मुश्किल को मार गिराओ।
संख्याओं के इस दंगल में, जो जूझ गया वो जीतेगा,
मेधावी वही बनेगा जो, बाधाओं को चीरेगा।
आराम हराम है वीरों अब, रातों की नींदें वार दो,
बनकर मेधा की मशाल तुम, जग को नया आकार दो।
तुम्हारे शौर्य की गाथाएँ, कल पूरा अंबर गाएगा,
जो आज तपेगा पढ़ने में, वो कल लोहा कहलाएगा।
- देवेश चतुर्वेदी "ईशान"
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दुर्गुणों से दूर रहा कैसे जाएं
मानव से देव बना कैसे जाएं।
ईश भी है इसके शिकार जब,
तब ईष्र्या द्वेष छोड़ा कैसे जाएं ।
स्वार्थ की प्रीति करे सब कोई,
अमर कथन को भुलाया कैसे जाएं।
औरों की बुराई आंखों में खलती ,
खुद को आईना दिखाया कैसे जाए।
गर दुर्योधन इतना ही बुरा होता ,
तो स्वर्ग वह भला पा कैसे जाए।
दुनिया है बुराइयों का एक गढ़,
इससे बचकर रहा कैसे जाएं।
कर्म का फल भोग रही है तू रत्न,
दूसरों पे यह पाप मढ़ा कैसे जाएं।
- रत्ना बापुली
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