साहित्य चक्र

20 February 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 20 फरवरी 2026



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“निशा की नीरव वीणा”

निशा की नीरव वीणा पर,
किसने मधुर स्वप्न छेड़ा है?
चाँदनी की चंचल छाया में
मन क्यों आज अकेला है?

वन की वीथियों में वायु
धीरे-धीरे कुछ गाती है,
सूनी सरिता की लहरों में
पीड़ा चुपके मुस्काती है।

तारों के अश्रु झिलमिल हैं,
अंबर का हृदय उदास है;
मेरे अंतर के कोने में
किस स्मृति का निवास है?

ओ दूर क्षितिज के दीपक!
किस आशा से तुम जलते हो?
मेरे मौन निमंत्रण को
क्या तुम भी सुनते-चलते हो?

मैं खोज रही उस छाया को
जो स्वप्नों में मुस्काती है,
जो हर मधुमय उषा बनकर
जीवन-पथ पर आती है।

निशा ढलेगी, उषा खिलेगी,
तम का आवरण टूटेगा-
मेरे अंतर्मन का पंछी
फिर से गान नया छेड़ेगा।


- डॉ सारिका ठाकुर 'जागृति'



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बातें, तो आख़िर बातें हैं
शब्दों का एक खेल हैं बातें
जिनसे मन बहलाता हूँ,
हासिल क्या हुआ और क्या होगा इनसे ?
यक्ष प्रश्न उठाता हूँ,
क्या ये कभी खत्म होंगी ?
ज़रा गौर फरमाइएगा
बातें, तो आख़िर बातें हैं,

कहीं से भी शुरू करो
थमने का नाम नहीं लेती बातें,
उतार देती है गहराई में कभी-कभी
मन में पैदा करती है उलझने,
हल जब तक कोई नहीं निकलता इनका,
ख़त्म होने का नाम नहीं लेती बातें,

सिलसिला इनका जब शुरू होता
रुकने का नाम फ़िर नहीं लेती बातें,
उठते हैं मन में कई सवाल इनको लेकर
कभी लगता है कि जवाब मिल गया, और
कभी लगता है कि अभी कोसों है दूर
बेनतीजा जब ये रहती,
मन को बहुत धड़काती ये बातें,

नादान सी कभी लगती बातें
कभी हंसाती तो कभी रुलाती बातें,
कईयों के मुख पर बहुत जचती बातें
अपना जब ये जादू दिखाती,
गिरगिट की तरह रंग बदलती बातें ,
सिवाय मौन के
कोई कुछ नहीं कर सकता इनका,
क्योंकि बातें, तो आख़िर बातें हैं


- बाबू राम धीमान


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जाति-पाति की गिरा दो दीवार

गिरा दो अब जाति-पाति की दीवार
हम आर्य हैं, हमें मत बाँटों मेरे यार
समाज में बन्द करो जाति की तकरार
हम हैं हिन्द का सब एक ही   परिवार

हमें विधाता ने सिर्फ इन्सान है बनाया
हम इसे भारत व इरान नक्से में लाया
हमने अपना समृद्ध हिन्दुस्तान  बनाया
फिर हमें जाति में क्यूं आपने गिनवाया?

कौन भेद भाव कर बाँट रहा है  समाज
इनका मुखड़ा उतार दो मिलकर आज
षड़यंत्र की है कोई देश में एक छुपी राज
वोट बैंक की है ये  गहरी खाई  की काज

हम भारत वासी है सब यहाँ पे भाई भाई
पड़ोस में रह रही है  हमारी अपनी  ताई
सब अपना है जहाँ  नहीं है कोई भी पराई
कौन पैदा कर रहा समाज में जाति की खाई

सभ्य समाज से बना है हमारा यह परिवार
जाति पाँति है रोग करना है इसका वहिष्कार
समाज को बाँटने वाले का हो यहाँ से तिरष्कार
कानून बना दो इस पर ओ मजबूत सरकार


- उदय किशोर साह



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दिल की अलमारी

दिल की अलमारी में बिखरा सा हर सामान है,
लगता है यहां कोई आया तूफान है,
तितर बितर हैं सहेजे हुए लम्हें,
औंधे पड़े हैं ख्यालों के पुलिंदे,
और सिलवटों में सिकुड़े हुए ख्वाब,
कहीं एक कोने में उदास पड़ा मासूम अरमान है
दिल की अलमारी में बिखरा सा हर सामान है।
फट गए है यादों के लिफाफे,
कुछ अनकही बातें चल पड़ी हैं,
दिल की अलमारी से बाहर की ओर
और खुल गई हैं तह नींदों की,
सुकून सिर्फ कुछ देर का मेहमान है
लगता है यहां कोई आया तूफान है।
कुछ नहीं रखा सलीके से,
ना यादें, ना ख्याल, ना उम्मीदें
रखीं है तो आज भी धड़कनें,
कुछ हलचल और अहसास,
जिनसे आज भी ये बहुत दिल परेशान है।
दिल की अलमारी में बिखरा सा हर सामान है।
हैं दिल की दराजे खाली सी,
सब कुछ फैला है इधर उधर
और खुली पड़ी है ये अलमारी,
दिल भटक रहा है क्या पाने को ?
इस बात से ये बिल्कुल अनजान है
लगता है यहां कोई आया तूफान है।


- मंजू सागर


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प्रतिध्वनि

मुझे मसल कर देख लो,
हाथों में खुशबू मेरी रह जाएगी।
इंतकाम गर लेना है तो,
शौक़ से लेना ये आरज़ू भी पूरी कर लो।

पता होगा तुम्हें -
समंदर सब कुछ लौटाता है,
फिर मेरी यादों को भी
फेंक कर देख लो।

मेरी तस्वीर से रंग छीनना चाहते हो,
छीन लो-श्याम श्वेत सी भी
जिंदगी जीना आता है।

रंगों से भरम तो टूटेगा,
आप और मैं रहेंगे सदा,
हम होने का भरम तो छूटेगा।

बनकर आए ख्वाब,
लेकिन ख्वाब को टूटना होता है।
हर मिलने वाले को यहां
बिछड़ना होता है।

तुम रास्ता थे,मंजिल समझ बैठा।
कारवां रुका रास्ते में-
सब कुछ लुटा के बैठा।


- रोशन कुमार झा


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फागुन

फागुन का रंग,
रचता हैं बसंत।
प्रेम का रंग,
प्रीत कुसुम अनंत।

महक उठता अंग,
संयम के प्रतिबन्ध।
रचते रस छन्द,
होती होली ले उमंग।

बौराते जन जन,
बांसुरी की तरंग।
आई रुनझुन रुनझुन,
कच्चे पक्के ले रंग।

गाते फागुन सँग,
प्रीत प्रकर पंथ।
नजरो की ठिठोली,
भरी प्रेम के भंग।

हँसे खामोश सुगंध,
जगे रंगों के रंग।
मिलकर होते सारे,
जग कर सारे रंग।


- मीना तिवारी


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उन्हीं की भाषा में उनको बस समझाने की ठानी है।

ये उकसावे की नीति नही तो इसे बताओ क्या बोलें ?
मानवता के दुश्मन को हम दैत्य नही तो क्या बोलें ?
अरे कितनी बार चेताया हमने एक न उसने मानी है,
अब उसी की भाषा में उसको बस समझाने की ठानी है।
बार बार समझाने पर भी मर्यादा को तोड़ दिया
भारत जैसी महाशक्ति से टकराने का मन जोड़ लिया।
आतंक के आका आसिम और शहवाज तनिक तुम धैर्य धरो,
मोदी जी यह सही समय है इनका तुम उद्धार करो।
अग्नि नही आकाश नही ब्रह्मोस इसी का उत्तर है।
जब- जब संधान किया हमने तब- तब पाक निरुत्तर है।

हर आतंकी की घटना पर हम उसके मौन को क्या बोलें ?
खुली पोल उन जालिम की अब और बताओ क्या खोलें?
हर बार दलीलें दी हमने पर एक न उसने मानी है।
अब उसी की भाषा में उसको बस समझाने की ठानी है।
ब्रेन वॉश कर भारत में नफरत को फैलाया है
भारत मां के अमन चैन पर पाक ग्रहण सा छाया है ,
प्रभाव ग्रहण का बढ़े उससे पहले उसका उपचार करो
प्रकाश निगलने से पहले उस पर तीखा प्रहार करो ।
जैश मुहम्मद लश्कर तैय्यबा सबने की मनमानी है
अब उसी की भाषा में उसको बस समझाने की ठानी है।
हर बार करी गद्दारी हमको दिया हमेशा धोखा है।
अस्त-व्यस्त भारत करने को सबकुछ उसने झोका है।

सबकुछ उसने झोंक दिया पर बाल न बांका कर पाया
जब रक्तचूर्ण अभियान चला, तब वैरी भी था थर्राया।
सीख न लेकर कोई अपितु एक न उसने मानी है,
अब उसी की भाषा में उसको बस समझाने की ठानी है।
बहुत हो चुकी लुका छिपी अब आकर इसको बन्द करो
यदि मां का दूध पिया तुमने तो आकर सीधे द्वन्द करो।
युद्ध धर्म की सभी विद्या द्धन्द में तुम्हे सिखा देंगे
जन्नत वाली हूरों से किये देरी बिना मिला देंगें ।
वसुन्धरा से जन्नत की हूरों की रची कहानी है
अब उसी की भाषा में उसको बस समझाने की ठानी है।


- करन सिंह ''करुण'


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प्रेम-विवाह

“प्रेम” शब्द सुनते-बोलते ही
एक नई ऊर्जा का संचार होने लगता है।

मनुष्य प्रेम में रहते हुए अपने जीवन के
सबसे सुखद पलों का आनंद ले रहा होता है,
पर शर्त है, वह प्रेम वासनाग्रस्त न हो।

प्रेम में रहने वाले दो प्रेमियों के
मध्य जन्म–जन्मांतर तक के वादे हो जाते हैं;
वे चले जाते हैं एक अलग दुनिया में, पर

जब वह इस समाज की सच्चाई से वाकिफ होते हैं
तो उन्हें ही घृणा होने लगती है “प्रेम” से।

समाज सब कुछ बर्दाश्त कर सकता है;
सिर्फ दो प्रेमियों के मिलन को छोड़कर, पर

यदि प्रेम को जीवन का भाग मान लिया जाये
तो समाज भी एक दिन टेक देगा घुटने प्रेमियों के आगे।


- सुभाष "अथर्व"


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मेरी अंजुमन में आने की
अब खता ना किजिए
इस कदर मेरी दिल को
और दगा ना दिजिए
मेरी अंजुमन मे आने की…

मेरी रूह से निकलती है
तेरी लिए आहे
मेरी आह को पाने कि
सजा ना किजिए
मेरी अंजुमन मे आने की…

मै देखती रही उन्हे
अक्स भरी निगाहो से
मुझे मोम को पत्थर बनने की
दुवा ना दिजीए
मेरी अंजुमन मे आने की…


- किरन शर्मा


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नूरानी आँखों में हजारों ख्वाब सँजोती
प्यारी लगती हैं बेटियाँ।
घर के काम खत्म करके, किताबें
पढ़ती प्यारी लगती हैं बेटियाँ।
हरेक मुद्दे पर बेबाकी से नजरिया बताती
प्यारी लगती हैं बेटियाँ।
पार कर दहलीज आँगन की मनमौजी से मुसकाती
प्यारी लगती हैं बेटियाँ।
अपने हर फर्ज को बेताबी से निभाती
प्यारी लगती है बेटियाँ।
बाबा का सहारा बनकर लाठी थामती
प्यारी लगती है बेटियाँ।
माँ, बहन, बीवी के फर्ज को एहतियात से निभाती
प्यारी लगती है बेटियाँ।
खुद के वजूद को सहेजती-सुलझाती
प्यारी लगती है बेटियाँ।


- नितेश पालीवाल 'नूर'


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हम उदास होते ही ढूंढते हैं तुम्हें
सुबह और शाम ढूंढते हैं तुम्हें

जैसे तुम आ ही रही हो ढूंढते हैं तुम्हें
हर सवाल और जवाब में ढूंढते हैं तुम्हें

तुम चांद सी चमकती हो हरदम
तुम्हें पाने की ज़िद में ढूंढते हैं तुम्हें

हर क्लास हर सांस में ढूंढते हैं तुम्हें
हर एक एहसास में ढूंढते हैं तुम्हें


- मनोज कौशल


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तुम देना साथ मेरा

ओ प्रिये, तुम देना साथ मेरा
जब थक जायेगा राहों में कदम मेरा
जिंदगी की ये राह आसान नहीं
रूक जाता है पग मेरा कहीं-कहीं
लक्ष्यहीन हो जाता हूँ, मायूस होकर
कि जब खाता हूँ राहों में ठोकर
अकेला राही मैं, कुछ समझ न पाता हूँ।

कुसुम पथ पर भी काँटे महसूस करता हूँ
होकर थका हारा बेसहारा बनकर पथिक
मिलता नहीं है मेहनत का उचित पारिश्रमिक
ऐसे वक्त में तेरी आती है बहुत याद
कि कितनी अच्छी होती यदि तू होती मेरे साथ।
बाँट लेते आपस में ही सुख-दुःख को
मिटा लेते मन के भूख को
दो-चार प्रेम की बातें कर लेते
प्रिये, यदि तुम मेरे साथ में होते ?

यूँ ही हंसते रोते काट लेते सफर
दिल में रहता न कोई कसर
चलो प्रिये अब उठो ना तुम भी
पुकार रहा है तुझे चुन्नू कवि
एक मीठी मुस्कान दे खिला दो मेरा चेहरा
अब थक गया हूँ प्रिये, साथ दो मेरा


- चुन्नू साहा



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बसंत का आगमन

​ऋतु वसंत का हुआ पदार्पण,
स्वागत में खेतों में सरसों खिली।

​वृक्षों पर नव-कोपलें हैं आईं,
पवन भी सर-सर मस्त चली।

​दूर कोकिला फगुआ गाती,
अमवा पर सुंदर मंजरी खिली।

​खेतों ने भी ली है अंगड़ाई,
मुस्का रही गेहूँ की बाली।

​रंगों का पावन त्योहार आया,
उड़ रहे चहुँ ओर अबीर-गुलाल।

​छोड़ क्लेश, मन प्रेम-रंग में रँगना,
छाएगी खुशियों की फिर नव बहार।


- राघवेंद्र प्रकाश 'रघु'



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यह दुनियां न तेरी न मेरी

यह दुनियां किसी की नहीं है जागीर
कठपुतली हैं सब यहां राजा हो या फकीर
अपना किरदार निभाकर सबको है जाना
मिलेगा वही किसी को जो लिख देती है तकदीर

कोई यहां गरीब है कोई जन्म से अमीर
ईमानदार है कोई किसी का मर गया है ज़मीर
तकदीर के भरोसे मिल रहा किसी को सब कुछ
कोई बन गया है राजा और कोई बना बज़ीर

न कोई किसी के साथ आता है
न कोई किसी के साथ है जाता
मिलना भी उसी से होता है यहां
जिससे होता है कोई पिछले जन्म का नाता

किस्मत में जो होगा वह मिलकर रहेगा
उसे कोई छीन नही पायेगा
जो हमारा नहीं है वह लाख कोशिश पर भी नहीं मिलेगा
उसे हथेली पर से छीन कर भी कोई ले जाएगा

छोड़ना पड़ेगा सब कुछ एकदम जब बुलावा आएगा
आंख बंद हो जाएगी कुछ देख नहीं पाएगा
दूर खड़े देखेंगे सब तेरी अंतिम विदाई
अपना जिसको समझता रहा पास आने से भी घबराएगा


- रवींद्र कुमार शर्मा


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