Jeffrey Epstein का नाम आज केवल एक व्यक्ति का नाम नहीं रह गया है; वह एक ऐसे अंधेरे अध्याय का प्रतीक बन चुका है, जिसने मानवता, न्याय और नैतिकता- तीनों को कठघरे में खड़ा कर दिया। “एपस्टीन फाइल्स” केवल कागज़ों का पुलिंदा नहीं हैं। वे उन अनसुनी आवाज़ों की प्रतिध्वनि हैं, जिन्हें कभी शक्ति, प्रभाव और धन के शोर में दबा दिया गया था।
जब यह मामला सामने आया, तो दुनिया ने देखा कि कैसे प्रभावशाली लोगों के बीच भी अपराध छिप सकते हैं। कैसे सत्ता और संपर्क कभी-कभी सच्चाई पर पर्दा डाल देते हैं। और कैसे पीड़ितों की चुप्पी को वर्षों तक अनसुना किया जाता है। इन फाइल्स में सिर्फ नाम नहीं हैं- इनमें विश्वासघात की कहानियाँ हैं, टूटे हुए बचपन हैं, और उस समाज का आईना है जो कभी-कभी सच जानकर भी चुप रह जाता है।
कई लोगों के लिए यह केवल एक “स्कैंडल” हो सकता है। पर जिनकी ज़िंदगियाँ प्रभावित हुईं, उनके लिए यह जीवन भर का घाव है। एपस्टीन की कहानी हमें यह सिखाती है कि न्याय में देर हो सकती है, पर सच को पूरी तरह दफन नहीं किया जा सकता। जब दस्तावेज़ खुलते हैं, तो केवल तथ्य नहीं निकलते- वे हमारी सामूहिक जिम्मेदारी को भी उजागर करते हैं।
यह आलेख किसी सनसनी के लिए नहीं, बल्कि एक स्मरण के लिए है- कि समाज की वास्तविक शक्ति उसके प्रभावशाली लोगों में नहीं, बल्कि उसके नैतिक साहस में होती है। जब भी “एपस्टीन फाइल्स” का नाम लिया जाएगा, वह हमें याद दिलाएगा- कि चुप्पी भी कभी-कभी अपराध की साझेदार बन जाती है। और सच बोलना, चाहे देर से ही सही, मानवता का सबसे बड़ा कर्तव्य है।
- प्रफुल्ल सिंह "संवेदन स्पर्श"

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