तुम्हारे और मेरे धार्मिक होने में धरती और आसमान का फर्क है। तुम पंडित, मौलाना, पादरी और आदि धर्म गुरु के बताए गए मार्गों या कर्मों को ही धर्म समझ लेते हो। मगर मैं अन्याय के खिलाफ लड़ना, सच को सच व गलत को गलत कहना और अत्याचार के विरुद्ध खड़ा होने को अपना धर्म मानता हूं। मेरे से नहीं होती काम चोरी, मेरे से नहीं बोला जाता झूठ, मैं इंसानों में नहीं कर पाता हूं भेद और मैं अपने धर्म को सर्वश्रेष्ठ घोषित नहीं करता हूं, क्योंकि मैं तुम्हारे जैसा धार्मिक नहीं हूं।
हां तुम करते होंगे दिन-रात पूजा-पाठ और पांच वक्त की नमाज़ अदा... मगर मैं नहीं करता। क्योंकि मेरा ईश्वर (प्रकृति) मुझे किसी भी बंधन में नहीं बांधता है। तुम्हारे ईश्वर और अल्लाह ने तुम्हारे लिए नियमों की सूची बना रखी है। मेरा ईश्वर (प्रकृति) मुझे सभी जीव जंतुओं को बराबर मानने या देखने को कहता है। तुमने अपने ईश्वर और अल्लाह को कभी देखा नहीं होगा, मगर मैं अपने ईश्वर (प्रकृति) को हर रोज देखता और महसूस करता हूं। मेरा ईश्वर (प्रकृति)मुझ से हर रोज सूर्य की पहली किरण के साथ संवाद की शुरुआत करता हैं और शाम की संध्या के साथ संवाद को विराम देते हैं।
मुझे नहीं पता तुम्हारा ईश्वर और अल्लाह तुम्हारे सुख-दुख में शामिल होते हैं या नहीं, मगर मेरा ईश्वर (प्रकृति) मेरे साथ हमेशा खड़ा रहता हैं। मेरा ईश्वर (प्रकृति) मुझे अपना विकराल रूप भी दिखता है, डरता है, हंसना है और मेरे लिए लड़ता भी है। इतना ही नहीं बल्कि मुझे जिंदा रखने के लिए कई बार खुद बीमार भी पड़ जाता है। बस यही फर्क है तुम्हारे और मेरे ईश्वर में... इसलिए मैं तुमसे अलग हूं।
- दीपक कोहली


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