साहित्य चक्र

18 February 2026

आज की प्रमुख कविताएँ- 19 फरवरी 2026






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मासिक वेदना

हर माह चुपचाप चली आती,
दर्द की हल्की आह सुनाती,
तन में जैसे तूफ़ान उठे,
मन में गहरी थकान जगाती।

कमर झुके पर हौसला ऊँचा,
चेहरे पर मुस्कान सजाती,
पीड़ा की हर लहर को सहकर,
कर्तव्य पथ पर बढ़ती जाती।

कभी ऐंठन, कभी उदासी,
आँखों में नमी भी लाती,
फिर भी जीवन की इस धारा को
शक्ति बनाकर अपनाती।

यह कमजोरी का चिह्न नहीं है,
यह सृजन की पहचान कहलाती,
मासिक वेदना की हर बूंद
नारी की महिमा गुनगुनाती।


- डॉ. सारिका ठाकुर 'जागृति'


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हुंकार: न्याय की मशाल


उठो राष्ट्र के भाग्य विधाता, मौन त्यागना होगा अब,
अपने हक की खातिर तुमको, खुद ही जागना होगा अब।
शमसाबाद की पावन धरती, आज गवाही देगी यह,
शिक्षक के स्वाभिमान की, ज्वाला नहीं दबेगी अब।

दशक बीत गए सेवा में, अब परीक्षा की बात चली,
कलमकार के स्वाभिमान पर, क्यों यह तीखी घात चली ?
अनुभव की जो पूंजी है, वह सब डिग्रियों से भारी है,
सम्मान हमारा मत छीनो, यह चेतावनी हमारी है।

वो पुरानी पेंशन जो है, संबल है लाचारी का,
हक छीनकर मार्ग चुना क्यों, शासन ने हठकारी का ?
सींचा है भविष्य भारत का, हमने अपना रक्त जला,
पर न्याय मांगते शिक्षक का ही, क्यों घोंटा जाता गला ?

मर्यादित अनुशासित हम हैं, संविधान को मानते,
पर अधिकार किसे कहते हैं, शिक्षक अच्छे से जानते।
आयुष! तुम हुंकार भरो अब, स्वर को अपने तेज करो,
अन्याय के आगे झुकने से, तुम साफ मना-परहेज करो।

संगठित हो साथ चलो सब, संगठन ही शक्ति है,
अधिकारों की लड़ाई लड़ना, सबसे बड़ी भक्ति है।
जब तक पेंशन बहाल न होगी, चैन न हम पा पाएंगे,
शिक्षक संघ के ये सेनानी, अब पीछे न हट जाएंगे।


- देवेश चतुर्वेदी


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मेथी के फूल

मेथी के फूलों ने कहा मुझसे
क्यों देख रहे हो मेरी ओर,
मैं तो बस एक अदना सा फूल हूँ
अपनी खुशबू से महकता हूँ,

मेरी ओर देखने से
क्या तुम्हें मिलेगा कुछ ?
मैं तो मात्र एक फूल हूँ
अपनी जिन्दगी खुद जीता हूँ,

क्यों है तुम्हारी नज़रें मुझ पर
क्या तुम्हें मेरी जरूरत है?
मैं तो बस एक छोटा सा हिस्सा हूँ
इस बड़ी दुनियां का,

मेथी के फूलों की बातें सुनकर
मैंने सोचा अपने मन में,
कुछ पल तुम्हें देख कर ऐ दोस्त
अपना मन बहलाता हूँ,

तेरी इन नन्हीं पंखुड़ियों में प्यारे
एक रूहानी सुन्दरता है,
बरबस खिंचती है वह मुझे
उसकी खुशबू में खो जाता हूँ।


- बाबू राम धीमान


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बसंत ऋतु

शीत ऋतु के बाद अब बसंत ऋतु आ रही है,
पेड़ पौधों पर नवजीवन की बाहर आ रही है।

मौसम बदला सर्दी जा रही है गर्मी आ रही है,
ठिठुरन हो रही है गायब तपत वापिस आ रही है।

हल्के सूती कपड़े अब फिर बाहर आने लगे हैं,
गर्म कपड़ों की पोटली फिर संदूक में जा रही है।

हीटर गीजर को मिलेगा अब कुछ आराम,
पंखे कूलर ऐ सी की बारी अब आने लगी है।

अंगीठी,धूप सेंकने की रुत वापिस जाने लगी है,
ठंडी छांव खातिर अब पेड़ों की याद आने लगी है।

गेहूं पक रही है पीली सरसों लहलहा रही है,
रंगों का त्यौहार होली भी चुपके से आ रही है।

गौरैया घोंसले बनाने लगी,कोयल गाने लगी है,
और देखो बसंत रंग बिरंगे फूल खिला रही है।

परिवर्तन है कुल ब्रह्मांड का अटल नियम,
इसी नियम में बंध अब बसंत ऋतु आ रही है।


- राज कुमार कौंडल


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कदम-कदम पर लगा मेला है बहुत।
लब ए जान की खातिर झमेला है बहुत।

जितनी सड़क होती जाती चौड़ी यहाँ,
उतना ही बढ़ रहा नित रैला है बहुत।

छूँछ पैलगी जिउ झन्न का दौर है दोस्तों,
भले संभाले रहो सब अपना थैला है बहुत।

सिर्फ लिबास में है कोबरा परन्फ्यूम है,
मगर हर किसी के मन में भरा मैला है बहुत।

सारी हेकड़ी निकाल ली पहली ही रात में,
पहले जो निकलता था बनके छैला बहुत।

जिंदगी की रेसिपी को समझना आसान नहीं विकास,
हाथ में जो ककड़ी है खाने पर लगता है करैला बहुत।


- राधेश विकास


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दो जीव

एक खेत मे थे भगवान के रचे दो जीव,
एक था जानवर और एक था इंसान,
उसके लिए वो जानवर था वरदान,
वो इंसान कराता था उससे मजदूरी,
वह भी करता था मन से हुजूरी,
वो दोनों पूरे तन से जोतते थे खेत,
रात मे फिर भरते थे अपना पेट,
इंसान का तो यह कर्म था,
उस जानवर का यह धर्म था,
मन से करत थे काम, दोनों थे मेहनती,
वो दोनों एक दूसरे के थे साथी,
पर, एक थक जाता,
तो दुसरे को खानी पड़ती लाठी,
दोनों करते थे भगवान से विनती,
एक को चाहिए थी पसल अच्छी,
तो, एक तो चाहिए थी कमज़ोर लाठी,
दोनों की विनती थी सच्ची,
दोनों थे भगवान के ही रचे,
इस बात को समझने के लिए थे कच्चे।


- प्रणव राज


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वक्त के ऐतबार से ख़ामोश हूं मैं....

ना मंद पड़ी हैं गुबारें दिल की,
ना ही चूक गया हूं मैं।
हालात की दुश्वारियों से,
हां थोड़ा सा रुक गया हूं मैं।

वक्त के ऐतबार से ख़ामोश हूं मैं....

दबा के हसरतें दिल में कहीं,
तेरी नज़रों से बस छुप गया हूं मैं।
जुर्म तेरी ही सही मगर तेरी खातिर,
बेवजह भी झुक गया हूं मैं।

वक्त के ऐतबार से ख़ामोश हूं मैं....

आदी हूं हमेशा बादशाहत का,
हां ज़रूर अभी लुट गया हूं मैं।
हर सितम का हिसाब लूंगा वक्त आएगा,
तमाशों से तेरी ऊब गया हूं मैं।

वक्त के ऐतबार से ख़ामोश हूं मैं....


- कुणाल


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मैं इसलिए साथ हूँ…

किसी ने पूछा मुझसे यूँ ही,
“तुम हर किसी के लिए क्यों खड़ी रहती हो?”
मैं मुस्कुराई हल्की-सी,
और दिल की आवाज़ से कहती गयी-

क्योंकि मैंने भी वो रातें देखी हैं,
जब आंसू तक हमसफ़र नहीं थे,
भीड़ तो थी चारों ओर मगर,
दिल के लिए कोई दर नहीं थे।

मैंने महसूस किया है वो सन्नाटा,
जो शब्दों से भी गहरा होता है,
जब इंसान टूटता अंदर से,
पर बाहर से बस ठहरा होता है।

शायद इसलिए मैं ठहर जाती हूँ,
जब कोई चुपचाप बिखर रहा हो,
शायद इसलिए हाथ बढ़ा देती हूँ,
जब कोई खुद से ही डर रहा हो।

मैं जानती हूँ अकेलापन क्या है,
और उसका बोझ कितना भारी,
इसलिए बन जाती हूँ छाँव कभी,
किसी की तपती दोपहरी सारी।

अगर मेरे होने से
किसी का एक पल हल्का हो जाए,
तो मेरे बीते दर्द का मतलब
शायद थोड़ा सा समझ में आ जाए।


- आरती कुमारी


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ये इश्क नहीं आसां

जुनून–ए–इश्क है मगर इकरार कैसे करूं ?
मैं उस अजनबी शख्स से प्यार कैसे करूं ?
आदतन बदल गई हूं उसके हिसाब से ,
वो सामने आ जाए तो मैं इजहार कैसे करूं ?
तेरे रूबरू आते ही उड़ जाते हैं होश मेरे ,
अपनी धड़कनों पर ऐतबार कैसे करूं ?
नकाब में हूं कि मुझको कहीं जमाना ना देख ले ,
इस नकाब को लिए तेरा दीदार कैसे करूं ? 
जिसे मालूम ही नहीं मेरे दिल का मुआमला
इस दिल को लेकर उससे तकरार कैसे करूं ?
काश ! आ जाए इस बहाने वो मेरा हाल पूछने
लेकिन मैं खुद को इतना बीमार कैसे करूं ?
जुस्तजू है कि पहल उसकी तरफ से ही हो
मगर तब तलक मैं वक्त का इंतजार कैसे करूं ?
कनीज़ नहीं मल्लिका बनने की चाहत है ,
तेरी सल्तनत में मैं खुद का अख्तियार कैसे करूं ?
ये इश्क नहीं आसां इतना तो समझ लिया है ,
ये आग का दरिया है इसे पार कैसे करूं ?


- मंजू सागर


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शिक्षक की वेदना

जब थामी थी इस विभाग की डगर, मन में एक अरमान जगा था,
मजदूरों के उन नन्हे दीयों में, सूरज सा एक तेज दिखा था।
सोचा था, जो पसीने से तर हैं उन मजदूरों के लाल पढ़ाऊंगा,
शिक्षा की अलख जगाकर मैं भी, देश सेवा का मान बढ़ाऊंगा।

मगर... कलम हाथ में थामी थी, पर काम सैकड़ों आ गए,
शिक्षण के उन पावन क्षणों को, विभागीय झमेले खा गए।
कभी जनगणना की चौखट, कभी मतगणना का शोर है,
कभी पोलियो की खुराक, तो कभी चुनावी जोर है।

किताबों की खुशबू के बदले, राशन का हिसाब रखना पड़ता है,
धनिया, पुदीना, मिर्च-मसाले के, कड़वे सच को चखना पड़ता है।
कभी सिलेंडर का बोझ कंधों पर, कभी मीनू की तैयारी है,
क्या एक शिक्षक के जिम्मे ही, ये दुनिया भर की जिम्मेदारी है?

मन कहता है कि गर छोड़ ये सब, बस अक्षर ज्ञान सिखाता मैं,
तो सरकारी स्कूल के टाट से भी, 'आईएएस' बनाता मैं।
इन बच्चों की आंखों में भी, अफसर बनने के सपने हैं,
पर व्यवस्था के इन चक्रव्यूहों में, फंसे हुए हम अपने हैं।

फिर भी... जो लम्हे बचते हैं आपाधापी में, उनमें प्राण फूँक देता हूँ,
जितना भी मिलता है समय, पूरी निष्ठा से झोंक देता हूँ।
थका हुआ हूँ उलझनों से, पर हार नहीं मानी है,
राष्ट्र के इन नौनिहालों की, लिखनी नई कहानी है।


- आयुष गंगवार


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मन

इतने सारे
यातायात के साधन हैं
लंबी से लंबी दूरी
तय करने के लिए
अब चाँद भी
थोड़ा नजदीक है
और हाँ
अंतरिक्ष,मंगल भी।
काश! एक रेलगाड़ी
मेरे मन से
तेरे मन तक भी जाती।


- अनिल कुमार मिश्र


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शवों को जलाओ या दफनाओ... उन शवों को क्या फर्क पड़ता है ?
जिनके जाने के बाद तुम रो रहे हो दुनिया को दिखाने के लिए कि तुम्हें उसके जाने का कितना दुःख है।
क्या सच में दुःख है! अगर है तो फिर उसके साथ क्यों नहीं चले जाते हो ?
सच कहूं- तुम अपने स्वार्थ के लिए उनसे प्रेम का ढोंग करते हो।
- दीपक कोहली


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