शहर की चमक-दमक में पला-बढ़ा आरव हमेशा मानता था कि सफलता का मतलब बड़ा घर, महँगी गाड़ी और लोगों के बीच प्रसिद्धि है। कॉलेज से निकलते ही उसने एक बड़ी कंपनी में नौकरी पा ली। तनख्वाह अच्छी थी, जीवन तेज़ रफ्तार से आगे बढ़ रहा था, पर भीतर कहीं एक अजीब-सी खालीपन की धुंध छाई रहती।
एक दिन कंपनी के प्रोजेक्ट के सिलसिले में उसे पहाड़ों के एक छोटे-से गाँव जाना पड़ा। वहाँ इंटरनेट कम चलता था, सड़कें कच्ची थीं और बाजार भी छोटा था। आरव को लगा जैसे वह समय में पीछे आ गया हो। गाँव में उसकी मुलाकात हुई- एक बुज़ुर्ग शिक्षक, शंभूनाथ जी से।
वे एक छोटे-से कच्चे घर में रहते थे। पहनावा साधारण, भोजन सादा, लेकिन चेहरे पर अद्भुत शांति। गाँव के बच्चे उन्हें “गुरुजी” कहते और रोज़ शाम को उनके आँगन में पढ़ने आते।
आरव ने एक दिन उनसे पूछा, “गुरुजी, आपने शहर जाकर बड़ी नौकरी क्यों नहीं की? यहाँ तो सुविधाएँ भी नहीं हैं।”
शंभूनाथ जी मुस्कराए, “बेटा, सुविधा और सुख एक नहीं होते। सुविधा बाहर से मिलती है, सुख भीतर से उगता है। मैंने सादगी चुनी, क्योंकि सादगी मन को हल्का रखती है।”
आरव चुप हो गया। अगले कुछ दिनों में उसने देखा- गुरुजी बच्चों को पढ़ाने के बाद खेतों में किसानों की मदद करते, बीमारों के लिए जड़ी-बूटियाँ लाते और शाम को नदी किनारे बैठकर ध्यान करते। उनके पास धन नहीं था, पर सम्मान और स्नेह की संपदा अपार थी।
एक शाम आरव नदी किनारे उनके साथ बैठा था। पहाड़ों के पीछे सूरज ढल रहा था। गुरुजी बोले, “सादगी का अर्थ अभाव नहीं है। यह तो इच्छाओं का संयम है। जब मन अनावश्यक चाहतों से मुक्त होता है, तभी वह सच्ची समृद्धि को पहचानता है।”
उनकी बातें आरव के मन में गूंजती रहीं। शहर लौटते समय उसने महसूस किया कि गाँव की शांति उसके भीतर कहीं बस गई है। शहर आकर उसने अपने जीवन की रफ्तार धीमी की। अनावश्यक खर्च कम किए, सप्ताहांत में झुग्गी-बस्तियों के बच्चों को पढ़ाना शुरू किया और हर दिन कुछ समय स्वयं के लिए निकालने लगा। धीरे-धीरे उसके चेहरे पर भी वही संतोष झलकने लगा, जो उसने गुरुजी में देखा था।
कुछ महीनों बाद जब वह फिर गाँव गया, तो गुरुजी ने उसे देखकर कहा, “लगता है, तुम्हें तुम्हारी सच्ची संपदा मिल गई।” आरव ने नम्रता से उत्तर दिया, “हाँ गुरुजी, अब समझ आया कि सादगी ही सच्ची संपदा है।”
उस दिन आरव ने जाना- धन से जीवन सजता है, पर सादगी से जीवन संवरता है। बाहरी वैभव क्षणिक है, पर सरलता और संतोष ही वह दीपक हैं जो जीवन भर प्रकाश देते हैं।
- रेखा चंदेल

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