साहित्य चक्र

26 April 2020

अनूठा प्रकाश





आज ये कहकर
उतरी है रात, कि
कुछ सितारे, उधार
ले लूंगी आसमान से
रंग दूंगी उन्हें
खुशनुमा रंगों से
चांदनी की ये जो चूनर
बरसों से फ़ीकी
पड़ी है न...

उनमें जड़ दूंगी
ले जाकर ये
रंग _बिरंगे सितारे..
सजीले रंग बिखर
जाएंगे फिर चारों तरफ़...

और जब नींद..
ख़्वाब टटोलेगी
तो भर दूंगी उसकी मुट्ठी
भी इन रंगों से.
हौले हौले सुबह
प्रकृति की गोद में
सिमटने लग जाएगी
फूट पड़ेगी चारों
तरफ़ रंगीन किरणें
जिनसे फैलेगा, हर
तरफ एक अनूठा प्रकाश

                                                निधि भार्गव मानवी


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