साहित्य चक्र

18 April 2020

मानवता की डोर

रुदन अंतर्मन


रुदन मेरा आज रुक नहीं रहा..है
अंतर मन मेरा मुझे डस रहा है..

न रौक सकूँ मे भूखमारी अपने वतन मे..
न मिटा सकूँ गरीबी अपने देश से..


लाचार पा रही हु खुद को देश की परिस्थिति सन्मुख..
आज हर गरीब नागरिक भुगत रहा है देश मे दुख..

व्यापारी हर जगह पर अपने पहिये खोद रही है..
लाचारी हर जगह पर नन्गे पाव भटक रही है..


मानवता की डोर बड़ी बेरहमी से टूट रही है..
बेबशी आज गली गली मे सरेआम बिक रही है..

लाचारी से जजुमती नारी का श्रृंगार बिक रहा है..
आज हर सहर सहर  बेटियों का दुप्पटा बिक रहा है..


मजदूरों की रोटी आज बड़े सवाल उठा रही है..
पूंजीवादियों के सामने अपना हक़ मांग रही है..

राजनीती के बलबूते पर खेल सारा रच रहे है..
ये बड़े बड़े नेता अपना हाथ साफ कर रहे है..


संविधान चाहे बदलो.. चाहे राजनीती बदलिए..
बस इन मासूम गरीबो की रोजी रोटी न छीनिये..

किसी एक  गरीब के घर चूल्हा गर ना जले
वो देश के सारे प्रधान को शर्मिंदा होना पड़े..


ये भूखमारी मे गरीबो के पेट के चीथड़े उड़े..
उसी देश के प्रधान  स्वेत वस्त्र मे निर्वस्त्र घूमे..


                                               अल्पा मेहता 

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