साहित्य चक्र

12 May 2020

अंतर्द्वन्द



अंतर्द्वंद निरंतर मन में
युद्ध स्वयं का संयम से
परिस्थितियां कितनी विषम
प्रश्न अनकहे जाने कितने

सूझे ना मार्ग कोई
उजाले लगे अँधेरे से
शून्य मन-मस्तिष्क भी
हंसी में नहीं ठहाके से

नीर नयन का सूख चला
अधरों से ना बात बने
जाने कैसी परीक्षा ये
हौसला ना अब साथ दे

जीवन डगर नहीं सीधी
मिले चुनौती हर मोड़ पे
ले ना जाए पथ किसी मंज़िल
हो गए गुमशुदा क्या सब रस्ते


                                          विनीता पुंढीर 


1 comment:

  1. Sachin Chaturvedi12 May, 2020

    wow u wrote very beautiful Vineeta ji

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