साहित्य चक्र

04 January 2020

स्त्री क्या है ?



स्त्री की परिभाषा


पूर्ण नहीं कर सकती कोई लिपि कोई भाषा ,
क्या लिखू मै उसका अस्तित्व बताने को ,
बात एक नहीं कई सारी है जताने को ,
कुछ व्यथा बताने को उसकी मै कोशिश एक नाकाम करू ,
चन्द तस्वीरो में उसकी आज मै रंग भरू,
कह दो तो प्रश्नों की बौछार करू ,
आपके शांत मस्तिस्क में जरा हाहाकार करू 
क्यों कोई ना कोई स्त्री रोज देहज की आग में जलाई जाती है ?
क्यों भावी स्त्री कोई गर्भ में ही मार गिराई जाती है ?
क्यों कोई न कोई स्त्री दुष्कर्मो की भेट चढाई जाती है ?
क्यों स्त्री समाज की बहशी नजरो से छिपाई जाती है ?
बहशी नजरो से छिपाई जाती है ?

क्यों हम स्त्रियों को खुद की मर्जी से जीने का अधिकार नहीं ,
कही चरणों की दासी है , तो होता इनसे देह व्यापार कही ,
ऐसे ही ना जाने कितने प्रश्न मेरे अंदर जूझ रहे , 
बहुत खोजे उत्तर इनके , पर कही नहीं सूझ रहे ,
बेटी पत्नी बहन बहु और माँ ना जाने कितने किरदार निभाती है ,
चाहे हो कोई देश लोग अनजाने हर जगह स्त्री रम जाती है ,
कहते है यहाँ तो घर घर में नारी की पूजा होती है ,

गर ऐसा है तो क्यों कोई नारि चीख़ चीख़ कर रोती है ?
क्यों चीख़ चीख़ कर रोती है ?
क्यों कोई स्त्री अकेले जाने से बाहर डरती है , 
क्यों किसी की नज़रे गन्दी उसको हरदम अखरती है ,
पहले बेटी फिर पत्नी और माँ बन जाना हर स्त्री की यही आपबीती है ,
सदेव नाचती है दूसरो के इशारों पर खुद के लिए वो कब जीती है ,

क्यों स्त्री के साथ ही हमेशा सारे दुराचार होते है ?
क्यों आँखों के सामने ही हमारी ये अत्याचार होते है ?
क्यों देख कर भी हम अनजान से बन जाते है ?
बात स्त्री के अस्तित्व की आने पर कैसे हम बेबस पड़ जाते है ?
कैसे बेबस पड़ जाते है ?

सबको छोड़ो अपनी माँ के एहसानों को ही जरा तुम याद करो ,
उतार दो बोझ को खुद को आबाद करो ,
खुद गीले में सोकर तुमको सूखे में वो सुलाती थी ,
खुद भूखी रहकर भी खाना तुमको खिलाती थी ,
कहते है ....हर सफ़र व्यक्ति के पीछे स्त्री का हाथ होता है ,
कठिन नहीं कोई डगर जब तक स्त्री का साथ होता है ,
मै नहीं कहती की तुम उसको पूजा करो गुणगान करो ,

साथ निभाओ उसका ज़िन्दगी के सफ़र में और उसका सम्मान करो ,
नहीं कोई धन दौलत उसको और ना कोई आलीशान मकान चाहिये ,
नजरो में सभी की स्वयं के लिए उसको बस स्थान चाहिये ,
जिस दिन ये सम्मान और स्थान हर स्त्री पा जायगी ,
उस दिन परिभाषा स्त्री की शायद पूर्ण हो जायगी ,
शायद पूर्ण हो जायगी।

                                                                       
                                                   आंशिकी त्रिपाठी 'अंशी '


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