साहित्य चक्र

04 January 2020

छंद

मनहरण घनाक्षरी


घनाक्षरी  छंद जान
शब्द अनुबन्ध गान
मन बस भावना से
सराबोर चाहिए ।

नदिया  सी बहे  धार
सहज हो ज्यों प्रवाह
नाचता मगन मुग्ध
मन मोर चाहिए ।

पूनम के चाँद जैसा
तट  पर  बाँध जैसा
बाँसुरी की धुन कोई
चित चोर चाहिए

सूर्य जब हो उदित 
रोम रोम  प्रमुदित
अंधकार चीरती सी
होनी भोर चाहिए

                             ✍🏻रागिनी स्वर्णकार


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