साहित्य चक्र

07 March 2020

ये मिट्टी सोना तो देती है



मत काट ये झाड़ पेड़ 
उन्होंने तेरा क्या बिगाड़ा है
तेरे जन्म से तेरे अंत तक
बस उनका ही सहारा है

तुझे सांसे देने वाला वो
अंतिम सांसे भर रहा है
अब तो रुक जा मानव
देख ये पर्यावरण मर रहा है

कल कल करती नदिया को 
क्यों अपनी माता कहता है
मत भूल उन्हीं के जल से 
तू इस जग में जिंदा रहता है

उनको गंदा करके क्यों तू
अमृत को विष कर रहा है
अब तो रुक जा मानव
देख ये पर्यावरण मर रहा है

ये मिट्टी सोना तो देती है
तू फिर भी लालच करता है
उत्पाद बढ़ाने के चक्कर में
तू उसमें रसायन भरता है

यूं दवा डाल डालकर बस 
तू उसको बंजर कर रहा है
अब तो रुक जा मानव
देख ये पर्यावरण मर रहा है

                            ✍️ नीलेश मालवीय "नीलकंठ"

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