साहित्य चक्र

12 March 2021

#बराबरी_कितनी_हो ?


सोशल मीडिया में बहुत सारे लोग नारी पुरुष की बराबरी की बात करते हैं। इस बात में कितनी हकीकत है इसे आप उनकी आईडी में जाकर अंदाजा लगा सकते हैं। यह वही लोग हैं जो दोहरा चरित्र रखते हैं। एक तरफ इन्हें पुरुष और नारी की बराबरी सिर्फ सोशल मीडिया पर चाहिए, तो दूसरी तरफ यही लोग अपने घर की मां, बहन, पत्नी को विभिन्न प्रकारों के रोक लगाते फिरते हैं।

अगर मैं गलत कह रहा हूं तो आप इन लोगों का टेस्ट करके देख सकते हैं। इसके लिए आपको इनकी आईडी में जाकर इनकी आईडी को खंगालना होगा, जो मैं समय-समय पर करता रहता हूं। मैं नारी पुरुष को एक समान दृष्टि से देखता हूं। हां कुछ चीजों में नारी पुरुष से आगे हैं और कुछ चीजों में पुरुष नारी से आगे है इस बात को भी मैं स्वीकार करता हूं। जैसे एक पुरुष के बिना एक स्त्री एक बच्चे को जन्म नहीं दे सकती है, ठीक उसी प्रकार एक स्त्री के बिना एक पुरुष भी किसी बच्चे को पैदा नहीं कर सकता है। स्त्री के बिना पुरुष का जीवन अधूरा है और पुरुष के बिना स्त्री का जीवन अधूरा है। जिस प्रकार बाप बनने का एहसास एक स्त्री महसूस नहीं कर सकती है, ठीक उसी प्रकार मां बनने का दर्द एक बाप कभी महसूस नहीं कर सकता है। हमें यहां पर प्रकृति को भी मानना चाहिए क्योंकि प्रकृति ने ही पुरुष स्त्री को बनाया है। हां मैं यह भी मानता हूं कि मानव समाज को पुरुषों ने अपनी सुविधा के अनुसार गणित किया है।

हर मानव को बराबरी का अधिकार मिलना चाहिए चाहे वह पुरुष हो या फिर स्त्री हो। मगर सवाल यह उठता है बराबरी कितनी हो और यह कैसे संभव है ?

मुझे लगता है बराबरी का दायरा हमें बढ़ाना चाहिए सिर्फ कुछ चीजों में ही सीमित नहीं करना चाहिए। आज भारतीय स्त्री समाज मैं कुछ स्त्रियों को लगता है कि वह सोशल मीडिया पर पुरुष समाज के खिलाफ खूब सारा लिखेंगे तो उन्हें शायद बराबरी मिल जाएगी जबकि वही लिखने वाला व्यक्ति पुरुष सत्ता से ग्रस्त नजर आता है। भारतीय स्त्री समाज पुरुष सत्ता से इसलिए ग्रस्त है क्योंकि इस देश की संस्कृति ही पुरुष प्रधान रही है। यहां की धर्म, जाति, मजहब सब पुरुष प्रधान के अधीन है। इन सबसे ऊपर उठने के लिए सबसे पहले स्त्री समाज को धर्म, जाति, मजहब के खेल से बाहर आना होगा। हां यह करना बहुत कठिन है क्योंकि यहां पर स्त्री समाज अपने परिवार और समाज की इज्जत को पहने देखेगा। यह हम इसलिए कह रहे है क्योंकि इस देश में सर्वप्रथम महिलाओं के लिए स्कूल सावित्रीबाई फुले जी ने खोला जबकि वही स्त्री समाज आज सावित्रीबाई जी को सही से जानता तक नहीं है। क्या स्त्री समाज को सावित्रीबाई फुले के बारे में नहीं जानना चाहिए..?

अगर स्त्री समाज बिना सावित्रीबाई फुले को जाने बराबरी की बात करता है, तो मैं उनके इस बात को सिरे से नकारता हूं। इसके अलावा भारतीय स्त्री समाज को सबसे पहले अपने धार्मिक ग्रंथों का विरोध करना चाहिए जिन ग्रंथों में स्त्रियों को बहुत ही कम सम्मान दिया गया है। बराबरी के लिए भारतीय स्त्री समाज को जाति, मजहब से उठकर शादियां करनी होंगी क्या इसे भारतीय स्त्री समाज स्वीकार कर सकता है ?

भारतीय स्त्री समाज भी जातिवाद से ग्रस्त है। एक स्त्री दूसरी स्त्री का सम्मान उसकी जाति को देखकर करती है। आप इस बात को सीधे इस तरीके से समझ सकते हैं- जिन लोगों के घर में नौकरानी यानी बर्तन धोने वाली और झाड़ू पोछा करने वाली आती है, उसके साथ उस घर की मालकिन यानी स्त्री कैसा व्यवहार करती है ? दूसरा जब आपस में 2 स्त्रियां लड़ती है उनकी गालियां क्या होती है यह भी एक प्रश्नवाचक चिन्ह लगाता है ?

बराबरी के लिए आपको सभी व्यक्तियों को एक समान दृष्टि से देखना होगा, तभी बराबरी संभव है। भारतीय समाज की स्त्रियां अगर किसी स्थान पर एक लड़का एक लड़की बैठी रहती है, तो उसी समय उन दोनों के चरित्र का वर्णन करना शुरू कर देता है। हमारे भारतीय समाज में मनुष्य को उसकी जाति के आधार पर उच्च-नीच माना जाता है। इसके लिए आज तक स्त्री समाज में आवाज क्यों नहीं उठाई ?

अगर आप भारतीय पहनावे को करीब से देखेंगे तो आपको शादीशुदा स्त्री को पहचानने में बहुत आसानी होगी बल्कि एक पुरुष को आप नहीं पहचान सकते उसकी शादी हुई है या नहीं हुई है। क्या इस पहनावे का भारतीय स्त्री समाज विरोध कर सकता है ?

इसके अलावा भी बराबरी व समानता के लिए कई सारे मापदंड है, जिनकी पूरे भारतीय समाज को बेहद जरूरत है। एक पुरुष ही क्यों अपने से कम पढ़े लिखे लड़की से शादी करें क्या एक लड़की नहीं कर सकती ? आखिर स्त्रियों को ही बाल रखने की जरूरत क्यों है ?

दीपक 'पागल'


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