साहित्य चक्र

21 March 2021

वो गौरैया



कहां गुम हो गई तुम गौरैया।
सबकी आंखें तुझे ढूंढ़ती
आंगन द्वारे चहुं ओर देखती
नहीं कहीं तुम दिखाई पड़ती
मुंडेरों पर नहीं चहकती।
आ के सुबह तुम रोज जगाती थी
चिं चीं करके सबको उठाती थी।
नन्हे मुन्ने तुम्हे देखते इधर उधर जब
तुम उछलती थी।
कभी यहां तो कभी वहां तुम घर के
अंदर ही रहती थी।
नन्हे मुन्ने बच्चों के संग दाना।चुंगती खूब उछलती
याद है मुझको जब मां ने चावल तेरे लिए गिराती

अभी चुगेगी आ  गौरैया हम सबको मां  यही  बताती।
लगती थी तुम प्यारी प्यारी सबको लगती बड़ी दुलारी।

गेहूं धो कर जब फैलाती राज की बातें दादी बतलाती।
 हिस्सा है इसमें ही उसका भोजन भला वो कैसे बनाती।
ढूंढ भात का लिए कटोरा नन्हा चुन्नू उसे खिलाता
अपनी तुतली प्यारी भाषा से गौरैया को अपने पास बुलाता।
साथ हमाले खाएगी क्या फ़िर खेलेंगे साथ में मिल कर
कितना रौनक रहता था तब 
जब तूं घर आंगन में फुदकती।
ची ची करते करते अक्सर चौके में भी घुस आती थी।
कभी पलंग पर बैठी मिलती,
देख हमें फुर्र उड़ जाती थी।

कहां लुप्त हुई गौरैया आ जाओ सब तुझे बुलाते।
अब तो वर्ष में एक दिन गौरैया का दिवस मनाते।
आ जाओ गौरैया रानी सुना लगता घर आंगन।
राह ताकते सब है तेरा आकुल है बच्चों का मन।

                                                              मणि बेन द्विवेदी

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