साहित्य चक्र

10 May 2019

सूने-सूने हो गये गाँव

भूल स्वीकार कर 
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मकरन्द पान करते भ्रमर 
इठलाती-मँडराती तितलियाँ 
कुहू-कुहू की टेर लगाती कोयलिया 
प्रेम आलिंगन करती गौरैया 
अब ये सब कहाँ चले गए...

फोटो- दीपक कोहली



सूने-सूने हो गये गाँव 
मिलती नहीं बरगद वाली छाँव 
चुप हो गया पक्षियों का कलरव 
भरते नहीं चौकडियाँ मृग-खरगोश

हरियाली मिटती जा रही 

धरा नित-नित बंजर हो रही 
विकास नाम का चल रहा खंजर 
कंकरीट के जंगल फैल गये चहुँओर

पेड़-पौधे लग रहे हैं गमलों में 
ऐसे तो पर्यावरण नहीं बचेगा 

प्लास्टिक के फूलों से खुशबू नहीं मिलेगी 
प्राणवायु ऑक्सीजन भरपूर नहीं मिलेगी


ए मनुज! भूल स्वीकार कर 
प्रकृति के साथ मत अन्याय कर 
अगर पर्यावरण स्वच्छ रहेगा 
तो हर प्राणी का अस्तित्व रहेगा । 


                                                            - मुकेश कुमार ऋषि वर्मा 



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