साहित्य चक्र

17 May 2019

जो मां ने कष्ट उठाए...।



हम भूल गए नौ मासों को जो मां ने कष्ट उठाए थे
भूल गए उन उम्मीदों को जिनसे,मां ने हमको जाए थे

नौ माह तक बिना चेहरा देखे बच्चे से प्रेम करती है
अंधे प्रेम की सच्ची परिभाषा तो मां ही पेश करती है

हम भूल गए की पापा भी हमारे कलरव में खोते थे
मां सोती गीले बिस्तर पर हम सूखे में सोते थे

हम भूल गए मम्मी पापा ने हाथ पकड़कर खड़ा किया
हम भूल गए मम्मी पापा ने पेट काटकर बड़ा किया

जिसको पकड़कर चलना सीखा वो मां पापा की उंगली थी
हमको सफल बनाने की वो कोशिश ही पहली थी

हमारे सभी ख्वाहिशों पर पापा ने पैसे फेंके थे
हम भूल गए उन सपनों को जो पापा ने देखे थे

हम भूल गए कि देर होनेपर मां परेशान हो जाती थी
और हम जब तक न आते मां खाना नहीं खाती थी

हम भूल गए उस आंचल को जिसमें संसार बसा था
भूल गए उस थप्पड़ को जिसमें मां का प्यार बसा था

नौकरी हो गई तो पापा ने पूरी आजादी कर दी
एक अच्छी सी लड़की देख हमारी शादी कर दी

अब नौकरी और बीबी में हम पूरे व्यस्त हो गए
मां पापा के अनदेखी के अभ्यस्त हो गए

बीबी बच्चे और जाल में इस कदर खो गए
कि मां बाप के लिए हमारे एहसास मानो सो गए

हमारी यह अनदेखी उनके मन में घर करने लगे
शायद इन्हीं तनावों से वे बीमार पड़ने लगे

हम इतने खुदगर्ज हुए की मिलने भी जा न पाए
बुढापे की लाठी का एहसास उन्हें दिला न पाए

एक दिन जग के सारे बंधन अनायास ही तोड़ गए
पुत्र वियोग में इस दुनिया को वो दोनों ही छोड़ गए

तब हमारी आंखे खुली और होने लगे अचेत
अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत

कुछ दिनों शोक मनाकर हम फिर से व्यस्त हो गए
भूल गए सबकुछ अपनी दुनिया में मस्त हो गए

अब दिल में कोई अफसोस नहीं और होठों पर फरियाद नहीं
बीबी का बर्थडे याद है मां बाप की वर्षी याद नहीं 

                                                   विक्रम कुमार



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